प्रधान आयकर महानिदेशक (खुफिया और आपराधिक जांच)
हमारे बारे में
पृष्ठभूमि
- वर्ष 1975 में, आयकर विभाग ने कर डाटा-बेस को सुदृढ़ करने के लिए सेंट्रल इंफॉर्मेशन ब्रांच (CIB) का गठन किया। प्रारंभ में, CIB डीजीआईटी (जांच) की देखरेख में कार्य कर रही थी। बाद में जून 2007 में इसे आयकर (खुफिया) निदेशालय के अधीन लाया गया।
- जैसे-जैसे विश्व तीव्र गति से बदल रहा था और भारत विदेशी अर्थव्यवस्थाओं के साथ अधिकाधिक एकीकृत हो रहा था, लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध अधिक उदार होते गए। पूंजी का देश में आगमन और निर्गमन बढ़ा तथा कर अपवंचन के नए मुद्दे सामने आए। हालांकि, विश्व भर में वित्तीय संस्थानों, कर स्वर्गों तथा असहयोगी देशों पर सूचना के आदान-प्रदान एवं वित्तीय संस्थानों द्वारा अधिक पारदर्शिता के संबंध में नए मानकों को अपनाने का दबाव बढ़ रहा है। इस बदलते परिदृश्य के प्रत्युत्तर में, अगस्त 2011 में डीजीआईटी के अधीन आयकर (खुफिया एवं आपराधिक जांच) निदेशालय नामक एक नया निदेशालय स्थापित किया गया, जिसमें पूर्ववर्ती खुफिया व्यवस्था एवं CIB व्यवस्था को सम्मिलित किया गया।
- इस निदेशालय के अंतर्गत 18 क्षेत्रीय गठन कार्यरत हैं, जिनमें अहमदाबाद, चंडीगढ़, चेन्नई, दिल्ली, जयपुर, कोलकाता, लखनऊ, मुंबई एवं नागपुर में 09 डीएसआईटी (खुफिया एवं आपराधिक जांच); तथा बेंगलुरु, भुवनेश्वर, भोपाल, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोच्चि, कानपुर, पुणे एवं पटना में 09 डीएसआईटी (खुफिया) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, डीआईटी (प्रशासन) भी नई दिल्ली में डीजीआईटी के अधीन प्रत्यक्ष रूप से कार्य करता है।
कार्य के मुख्य क्षेत्र
डीसीआई आयकर विभाग की कर डाटा-बेस को सुदृढ़ करने के लिए एक नोडल एजेंसी है। इसके प्रमुख कार्य क्षेत्र हैं— (i) स्टॉप फाइलर्स एवं नॉन-फाइलर्स की पहचान के माध्यम से कर आधार का विस्तार, (ii) जांच मूल्यांकन हेतु मामलों के उपयुक्त चयन के लिए सूचना उपलब्ध कराकर कर आधार को गहन बनाना, तथा (iii) आंतरिक एवं बाह्य स्रोतों से सूचना का संग्रहण एवं संकलन कर उसका मूल्यांकन अधिकारियों (AOs) एवं आयकर विभाग के अन्य उपयोगकर्ताओं तक प्रसार। यह निवेश, व्यय, कर भुगतान आदि जैसे वित्तीय लेन-देन से संबंधित सूचनाएं तथा निर्दिष्ट गतिविधियों में संलग्न व्यक्तियों का विवरण भी एकत्र करता है। इसके दायित्व में आपराधिक मामलों से उत्पन्न कर अपवंचन से संबंधित मामलों की पहचान एवं जांच भी शामिल है, जिनका किसी प्रत्यक्ष कर कानून के अंतर्गत दंडनीय वित्तीय प्रभाव हो।

