आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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परिपत्र सं.

परिपत्र सं. 21/2015

परिपत्र की तिथि

10/12/2015

दस्तावेज़ अपलोड की तिथि

10/12/2015

 परिपत्र सं. 21/2015

परिपत्र सं. 21/2015

 

एफ. सं. 279/विविध/142/2007-आर्इटीजे (पीटी)

भारत सरकार

वित्त मंत्रालय

राजस्व विभाग

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

********

नर्इ दिल्ली, 10 दिसंबर, 2015

 

विषय : उच्चतम न्यायालय के समक्ष एसएलपी तथा आयकर न्यायाधिकरण तथा उच्च न्यायालय के समक्ष विभाग द्वारा अपील के दाखिलीकरण के लिए मौद्रिक सीमा का संशोधन - मुकद्मेबाजी कम करने की सीमा-आगे

 

बोर्ड की निर्देश सं. 5/2014 दिनांक 10.07.2014 जिसमें उच्चतम न्यायालय के समक्ष एसएलपी तथा अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष विभागीय अपील (आयकर मामलों में) दाखिल करने के लिए मौद्रिक सीमा तथा अन्य शर्तें निर्दिष्ट थी, हेतु संदर्भ आमंत्रित है।

2. उक्त निर्देश के अधिक्रमण में, बोर्ड द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि विभागीय अपील मौद्रिक सीमा तथा नीचे निर्दिष्ट शर्तों को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के समक्ष एसएलपी तथा अपीलीय न्यायाधिकरण तथा उच्च न्यायालय के समक्ष योग्यता पर दाखिल की जा सकती है।

3. अब से, अपील/एसएलपी को उन मामलों में दाखिल नहीं किया जाएगा जहां कर प्रभाव नीचे दिए गए अनुसार मौद्रिक सीमा से अधिक न हो :-

क्र.सं. आयकर मामलों में अपील मौद्रिक सीमा (रू. में)
1 अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष 10,00,000/-
2 उच्च न्यायालय के समक्ष 20,00,000/-
3 उच्चतम न्यायालय के समक्ष 25,00,000/-

यह स्पष्ट किया जाता है कि अपील को केवल इसलिए ही नहीं दाखिल करना चाहिए क्योंकि यदि कर प्रभाव उक्त निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक है। ऐसे मामलों में अपील का दाखिलीकरण मामले की पात्रता के आधार पर अधिनिर्णित होना है।

4. इस प्रयोजन के लिए, "कर प्रभाव" का अर्थ कुल मूल्यांकित आय पर कर तथा कर जो वसूलनीय हो गया होता, के बीच अंतर कि ऐसी कुल आय को उसके समक्ष निगर्मन के संबंध में आय की राशि द्वारा घटाया गया था जो अपील दाखिल किए जाने हेतु अभिप्रेत है (तत्पश्चात् "विवादित मुद्दे के तौर पर संदर्भित")। हालांकि कर में आगे से कोर्इ ब्याज शामिल नहीं होगा केवल तब छोड़कर जब ब्याज की वसूलनीयता स्वयं विवाद में हो। यदि ब्याज वसूलनीयता का मुद्दा विवादित हो तो ब्याज की राशि कर प्रभावी होगी। यदि वापसी हानि को कम किया जाता है अथवा आय के तौर पर मूल्यांकित किया जाता है तो कर प्रभाव में विवादित वृद्धि पर काल्पनिक कर शामिल होगा। जुर्माना आदेश की स्थिति में, कर प्रभाव का अर्थ विरूद्धात्मक अपील किए जाने वाले आदेश में जुर्माने को हटाना अथवा कम करने की मात्रा होगी।

5. निर्धारण अधिकारी प्रत्येक निर्धारिती की स्थिति में विवादित मुद्दे के संबध में प्रत्येक निर्धारण वर्ष के लिए पृथक रूप से कर प्रभाव की गणना करेगा। यदि, निर्धारिती की स्थिति में, विवादित मुद्दा एक से अधिक निर्धारण वर्ष में उत्पन्न होता है, अपील, ऐसे निर्धारण वर्ष अथवा वर्षों के संबंध में दाखिल की जा सकती है जिसमें विवादित मुद्दे के संबंध में कर प्रभाव पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक होती है। कोर्इ अपील उस निर्धारण वर्ष अथवा वर्षों के संबंध में दाखिल नहीं की जाएगी जिसमें कर प्रभाव पैरा 3 में निर्दिष्ट मौदिक्र सीमा से कम होता है। अन्य शब्दों में, अब से, अपील को प्रासंगिक निर्धारण वर्ष में कर प्रभाव के संदर्भ में ही दाखिल किया जा सकता है। हालांकि, किसी उच्च न्यायालय अथवा अपीलीय प्राधिकारी के समग्र आदेश की स्थिति में, जिसमें एक से अधिक निर्धारण वर्ष तथा एक से अधिक निर्धारण वर्ष में सामान्य मुद्दे शामिल है, तो अपील ऐसे समस्त निर्धारण वर्षों के संबंध में दाखिल की जाएगी भले ही 'कर प्रभाव' किसी भी वर्ष (वर्षों) में निर्धारित मौद्रिक सीमा से कम हो, यदि उस वर्ष (वर्षों) के संबध में अपील को दाखिल करने का निर्णय लिया जाता हो जिसमें 'कर प्रभाव' निर्धारित मौद्रिक सीमा से अधिक होता हो। यदि समग्र आदेश/निर्णय में एक से अधिक निर्धारिती शामिल हो तो प्रत्येक निर्धारिती पृथक रूप से व्यावहार करेगा।

6. यदि जहां न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय के समक्ष अपील उक्त निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम होने के तौर पर कर प्रभाव के कारण दाखिल नहीं होती तो आयकर आयुक्त विशेष रूप से रिकार्ड करेगा कि "यद्यपि निर्णय स्वीकार्य नहीं है, अपील केवल इस विचार पर दाखिल नहीं की जा रही कि कर प्रभाव इस निर्देश में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम है"। आगे, ऐसे मामलों में, कोर्इ प्रकल्पना नहीं होगी कि आयकर विभाग विवादित मुद्दे पर निर्णय से संतुष्ट नहीं हुआ है। आयकर विभाग किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए उसी निर्धारिती अथवा उसी के लिए किसी अन्य निर्धारिती की स्थिति में अथवा किसी अन्य निर्धारण वर्ष की स्थिति में विवादित मुद्दे के समक्ष अपील के दाखिलीकरण से अलग नहीं होगा, यदि कर प्रभाव निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक होता है।

7. पूर्व में, कर्इ मामले बोर्ड के ध्यान मे आए है जिससे एक निर्धारिती इस आधार पर ही न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय से राहत का दावा करता है कि विभाग ने किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती अथवा उसी अथवा अन्य निर्धारण वर्ष के लिए किसी अन्य निर्धारिती की स्थिति में न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय का निर्णय निसंदेह स्वीकार कर लिया है, उसी विवादित मुद्दे पर आपील को दाखिल न करके। विभागीय प्रतिनिधि/अधिवक्ता को न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय के ध्यान में लाने के लिए प्रत्येक प्रयास करना चाहिए कि ऐसे मामलों में अपील को दाखिल नहीं किया गया था अथवा केवल इसलिए स्वीकृत नहीं की गर्इ थी कि कर प्रभाव निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम रहा है तथा इसलिए, कोर्इ अनुमान रेखांकित नहीं किया जाना चाहिए कि उसमें प्रस्तुत निर्णय विभाग को स्वीकार्य था। तद्नुसार, उन्हें न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय को प्रभावित करना चाहिए कि ऐसे मामले पर कोर्इ पूर्व उदाहरण नहीं है। चूंकि इस निर्देश के कारण अपील दाखिल न करने का प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है, आयकर आयुक्त कार्यालय में न्यायिक पुस्तिका आसान क्षतिपूर्ति के लिए प्रणालीगत तरीके में अनुरक्षित होनी चाहिए।

8. निम्नलिखित मुद्दे से संबंधित प्रतिलोम निर्णय इसके बावजूद पात्रता पर विवादास्पद होना चाहिए कि अपरिहार्य कर प्रभाव उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम हो अथवा कोर्इ कर प्रभाव न हो :

(क) जहां अधिनियम अथवा नियम के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता चुनौती के तहत हो, अथवा

(ख) जहां बोर्ड के आदेश, अधिसूचना, निर्देश अथवा परिपत्र को गैर-कानूनी अथवा अधिकारातीत होने के लिए संघटित किया गया हो, अथवा

(ग) जहां मामले में राजस्व अंकेक्षण आपत्ति को विभाग द्वारा स्वीकृत किया गया हो, अथवा

(घ) जहां संवृद्धि अज्ञात विदेशी परिसंपत्ति/बैंक खाते से संबंधित हो

9. उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा आयकर को छोड़कर रिट मामले तथा प्रत्यक्ष कर मामलों हेतु लागू नहीं होंगे। अन्य प्रत्यक्ष कर मामलों में अपील का दाखिलीकरण कानून एवं नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों द्वारा शासित होना जारी रहेगा। आगे, आयकर की स्थिति में अपील का दाखिलीकरण, जहां कर प्रभाव अनिर्धारणीय हो अथवा शामिल न हो, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12क के अंतर्गत न्यास अथवा संस्थानों के पंजीकरण के मामले में उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट सीमा द्वारा शासित नहीं होगा तथा ऐसे मामले में अपील दाखिलीकरण का निर्णय को विशेष मामले की पात्रता के आधार पर लिया जा सकता है

10. यह निर्देश लंबित अपील तथा उच्च न्यायालय/न्यायाधिकरण में अब से दाखिल की जाने वाली अपील हेतु पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं होगी। उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट कर सीमा से कम की लंबित अपील को निरस्त किया जा सकता है/प्रकाशित नहीं किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील इस विषय पर निर्देश द्वारा शासित होगी, उस समय पर कार्यकारी जब ऐसी अपील को दाखिल किया था।

11. आयकर अधिनियम 1961 की धारा 268क (1) के अंतर्गत निगर्मन

 

(डी. एस. चौधरी)

आयकर आयुक्त (एएंडजे), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

नर्इ दिल्ली

 

निम्न को प्रति :

  1. अध्यक्ष, सदस्य तथा अवर सचिव तथा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड में उससे ऊपर के पद के अन्य समस्त अधिकारी

  2. समस्त अधिकारियों के ध्यान में लाने के अनुरोध के साथ समस्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त तथा समस्त आयकर महानिदेशक

  3. अतिरिक्त महानिदेशक (पीआर, पीपी एंड ओएल), मयूर भवन, नर्इ दिल्ली सामान्य मेलिंग सूची के अनुसार वितरण के लिए तथा त्रैमासिक कर बुलेटिन प्रकाशन के लिए

  4. भारतीय नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक

  5. अतिरिक्त महानिदेशक (सर्तकता), मयूर भवन, नर्इ दिल्ली

  6. संयुक्त सचिव एवं कानूनी सलाहकार, विधि एवं न्याय मंत्रालय, नर्इ दिल्ली

  7. समस्त आयकर महानिदेशालय तथा आयकर महानिदेशक (राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी), नागपुर

  8. आर्इटीसीसी (3 प्रतियां)

  9. अतिरिक्त महानिदेशक (पद्धति)-4, विभागीय वेबसाइट पर अपलोडिंग के लिए

10. irsofficersonline.gov.in पर अपलोडिंग के लिए डाटाबेस प्रकोष्ठ

11. अनुवाद के लिए हिन्दी प्रकोष्ठ

12. गार्ड फाइल

 

(डी. एस. चौधरी)

आयकर आयुक्त (एएंडजे), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

नर्इ दिल्ली