आयकर नियमों के संबंधित नियमों के एक विश्लेषण
परिशिष्ट दो
आय-कर नियमों के सुसंगत नियमों का विश्लेषण
धारा 2(1क)/नियम 7 और 8 : ऐसी आय की संगणना जो भागत: कृषि आय है और भागत: कारबार से आय है
नियम 7 में उपबंधित है कि एक संयुक्त कारबार आय को जो भागत: कृषि आय है और भागत: गैर कृषि आय, अलग-अलग करने के लिए किसी कृषि उपज का 'बाजार मूल्य', जो निर्धारिती द्वारा उगार्इ गर्इ है या वस्तु के रूप में किराए के रूप में उसके द्वारा प्राप्त की गर्इ है और या उसके द्वारा कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त की गर्इ है, घटा दिया जाता है। निर्धारिती द्वारा किसान के रूप में या वस्तु के रूप में किराए के प्राप्तिकर्ता के रूप में किए गए किसी खर्च के बाबत किसी और कटौती की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जहां कृषि उपज उसके कच्ची अवस्था में बाजार में साधारणत: बेची जाती है, अथवा ऐसी किसी प्रक्रिया को लागू करने के बाद बेची जाती है जो किसान द्वारा या वस्तु के रूप में किराए के प्राप्तिकर्ता द्वारा उसे बाजार ले जाने योग्य बनाने के लिए आमतौर पर प्रयुक्त की जाती है, वहां वह बाजार मूल्य उस औसत कीमत के अनुसार निकाला गया मूल्य होगा जिस पर उसे सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान इस प्रकार बेचा गया है।
जहां कृषि उपज उसकी कच्ची अवस्था में या पूर्वोक्त कोर्इ प्रक्रिया लागू करने के बाद साधारणत: नहीं बेची जाती है वहां बाजार मूल्य निम्नलिखित का योग होगा–
(i) खेतीबाड़ी के व्यय;
(ii) उस क्षेत्रफल के लिए जिसमें वह उगार्इ गर्इ थी, दिया गया भू-राजस्व या किराया; और
(iii) ऐसी रकम जिसे निर्धारण अधिकारी प्रत्येक मामले में सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए युक्तियुक्त लाभ दर्शाने के लिए पाए।
नियम 8 में उपबंधित है कि चाय पत्ती उगाने और चाय बनाने के कारबार की बाबत आय अधिनियम के अधीन संगणित की जाती है मानो वह अनुज्ञेय कटौतियां करने के बाद कारबार से प्राप्त की गर्इ हो। इस प्रकार निकाली गर्इ आय का 40 प्रतिशत भाग कारबार आय के रूप में माना जाता है और शेष 60 प्रतिशत भाग कृषि आय के रूप में।
ऐसी आय की संगणना करते समय उन झाड़ियों के स्थान पर जो पहले से उगाए गए क्षेत्र में मर गर्इ हैं या स्थायी रूप से बेकार हो गर्इ हैं, नर्इ झाड़ियां लगाए जाने की लागत के संबंध में मोक दिया जाएगा, यदि ऐसा क्षेत्र पहले ही छोड़ नहीं दिया गया है। किंतु ऐसी लागत तय करने के लिए किसी सहायता राशि की बाबत कोर्इ कटौती नहीं की जाएगी जो धारा 10 के खंड (30) के उपबंधों के अधीन कुल आय में शामिल नहीं की जा सकती।
धारा 9/नियम 10 और 11 : अनिवासियों की दशा में आय की संगणना/अनिवासियों के साथ किए गए संव्यवहारों से होने वाली आय का अवधारण
जहां किसी अनिवासी व्यक्ति को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली आय की वास्तविक रकम, चाहे प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:–
• भारत में किसी कारबार संबंध से या उसके माध्यम से; या
• भारत में किसी संपत्ति से या उसके माध्यम से; या
• भारत में किसी आस्ति/आय के स्रोत से या उसके माध्यम से; या
• ब्याज पर दिए गए और भारत में लाए गए किसी धन से या उसके माध्यम से;
निर्धारण अधिकारी के अनुसार पक्की तौर पर अभिनिश्चित नहीं की जा सकती, वहां ऐसी आय की रकम निम्नलिखित में से किसी भी तरीके से निकाली जा सकती है :
• इस प्रकार प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले कुल आवर्त का प्रतिशत जो निर्धारण अधिकारी उचित समझे; या
• ऐसी रकम जो ऐसे व्यक्ति के कारबार के कुल लाभ और अभिलाभ के उतने अनुपात में है जितना अनुपात इस प्रकार प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली प्राप्तियों का कारबार की कुल प्राप्ति से है; या
• ऐसी रीति से निकाली गर्इ रकम, जो निर्धारण अधिकारी ठीक समझे।
धारा 92 में उल्लिखित रीति से चलाए गए किसी कारबार से प्राप्त लाभ और अभिलाभ का अवधारण भी ऊपर बतार्इ गर्इ रीति से किया जा सकता है।
ऊपर बतार्इ गर्इ तीन रीतियों में से किसी का सहारा लेने से पूर्व निर्धारण अधिकारी को यह समाधान करना होता है कि निर्धारिती के पास अपेक्षित तथ्य सामग्री नहीं है या अन्यथा भी आय की सही या वास्तविक रकम अभिनिश्चित नहीं की जा सकती। यदि वास्तविक आय भारतीय आय की बाबत रखे गए लेखाओं में प्रकट आय में कुछ समायोजन करके निकाली जा सकती है तो नियम 10 लागू नहीं किया जा सकता।
नियम 10(i)–युक्तियुक्त प्रतिशत निकालने के लिए सुसंगत सामग्री निर्धारिती द्वारा दी जानी होगी। कुछ सुसंगत बातें जो युक्तियुक्त प्रतिशत का प्रयोग करते समय निर्धारण अधिकारी को ध्यान में रखनी चाहिए, वे इस प्रकार हैं : कारबार की प्रकृति; कारबार में अनिवासी द्वारा प्राप्त शुद्ध लाभ की दर; उसी प्रकार के कारबारों में लाभ की सामान्य दर; भारत में चलार्इ गर्इ कारबार संक्रिया की किस्म आदि।
नियम 10(ii)–नियम 10(ii) तभी लागू होता है जब आय कारबार से हो। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए :
• भारतीय आय-कर विधियों के अनुसार कारबार से अनिवासी निर्धारिती की विश्व में होने वाली कुल आय की संगणना।
• कराधेय राज्यक्षेत्रों के भीतर प्रोतभूत या उद्भूत होने वाली प्राप्तियों और कारबार की कुल विश्व प्राप्ति में अनुपात का अवधारण।
• आय-कर का निर्धारण करने के प्रयोजनों के लिए उस अनुपात को लागू करके कारबार के लाभों या अभिलाभों का अवधारण।
इस प्रकार अवधारित आय बिना किसी और मोक के कराधेय होगी।
धारा 10(14) / नियम 2खख : विहित भत्ते जो विहित सीमा तक छूटप्राप्त हैं
धारा 10(14) के अधीन विशेष भत्तों और फायदों पर छूट प्रदान की गर्इ है। खंड (14) को दो भागों में बांटा गया है–
(1) धारा 10 के खंड (14) के उपखंड (i) के अनुसार किसी परिलब्धि की प्रकृति की भत्ते या प्रसुविधा से भिन्न कोर्इ विहित विशेष भत्ता या फायदा, जो लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में पूर्णत:, आवश्यक रूप से और अनन्य रूप से उपगत व्यय पूरे करने के लिए विशेष रूप से दिया गया हो, उस सीमा तक छूट-प्राप्त है जिस तक ऐसे व्यय उस प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत किए जाएं। इस प्रयोजन के लिए विहित भत्तों (जो पूरी तरह छूट प्राप्त हैं) का उल्लेख नियम 2खख(1) में किया गया है। वे भत्ते निम्नलिखित हैं :
• दौरे या स्थानांतरण पर यात्रा खर्च को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, इसमें ऐसे स्थानांतरण के संबंध में निजी चीजों के स्थानांतरण, पैकिंग और ले जाने के संबंध में दी गर्इ कोर्इ धनराशि भी शामिल है।
• ऐसा कोर्इ भत्ता, जो कर्मचारी को दौरे के संबंध में या स्थानांतरण के संबंध में यात्रा की अवधि के लिए अपने सामान्य कार्यस्थल से अनुपस्थित रहने के कारण उसके द्वारा उपगत सामान्य दैनिक खर्च को पूरे करने के लिए दिया गया हो।
• किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में आने-जाने के संबंध में उपगत व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, बशर्ते कि नियोजक द्वारा नि:शुल्क परिवहन यान उपलब्ध न कराया हो।
• किसी हैल्पर पर उपगत व्यय पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, जहां ऐसा हैल्पर किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों का पालन करने के लिए लगाया गया हो।
• शिक्षा और शोध संस्थाओं में शैक्षणिक, शोध और प्रशिक्षणपरक कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता।
• किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों का पालन करते समय पहनने के लिए वर्दी खरीदने और उसके रखरखाव पर किए गए व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता।
(2) धारा 10(14) के उपखंड (ii) के अधीन, निर्धारिती को ऐसे स्थान पर जहां लाभ के उसके पद या नियोजन के कर्तव्यों का उसके द्वारा सामान्यतया पालन किया जाता है या ऐसे स्थान पर जहां वह साधारणतया रहता है, उसके निजी खर्च पूरे करने के लिए अथवा रहन-सहन की बढ़ी हुर्इ लागत के लिए उसकी प्रतिपूर्ति करने के लिए दिया गया कोर्इ विहित भत्ता विहित सीमा तक छूट-प्राप्त है। नियम 2खख(2) में ये भत्ते और सीमाएं दी गर्इ हैं जिस तक वे छूट-प्राप्त हैं। ये भत्ते निम्नलिखित हैं :
| भत्ते का नाम/स्थान जहां छूट प्राप्त हैं | छूट की सीमा |
|---|---|
| (i) *विशेष प्रतिकारात्मक (पहाड़ी क्षेत्र) भत्ता या अधिक ऊंचार्इ भत्ता या प्रतिकूल जलवायु भत्ता या हिम क्षेत्र भत्ता या बवंडर भत्ता की प्रकृति का कोर्इ विशेष प्रतिकारात्मक भत्ता– | |
| (i) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 1 के स्तंभ 3 में मद 1 के अधीन वर्णित स्थानों पर | 800* रु. प्रतिमास |
| (ii) जम्मू-कश्मीर का सियाचिन क्षेत्र | 7,000* रु. प्रतिमास |
| (iii) समुद्री तल से 1000 मीटर या उससे अधिक की ऊंचार्इ वाले अन्य स्थानों पर | 300* रु. प्रतिमास |
| (ii) सीमा क्षेत्र भत्ता या दूरस्थ स्थान भत्ता या कठिन क्षेत्र भत्ता या विक्षुब्ध क्षेत्र भत्ता की प्रकृति का *कोर्इ विशेष प्रतिकारात्मक भत्ता– | |
| (क) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 1 में वर्णित स्थानों पर | 1300* रु. प्रतिमास |
| (ख) भारत के महाद्वीपीय शेल्फ में और भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के अधिष्ठापन केंद्र | 1100* रु. प्रतिमास |
| (ग) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 3 में वर्णित स्थानों पर | 1050* रु. प्रतिमास |
| (घ) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 4 में वर्णित स्थानों पर | 750* रु. प्रतिमास |
| (ड़) कर्नाटक में जिला शिमोगा में जोग फाल्स | 300 रु. प्रतिमास |
| (च) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 6 में वर्णित स्थानों पर | 200* रु. प्रतिमास |
| (iii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 3 के स्तंभ 3 में वर्णित राज्यों में *विशेष प्रतिकारात्मक (जनजातीय क्षेत्र/अनुसूचित क्षेत्र/ऐजेन्सी क्षेत्र) भत्ता | 200* रु. प्रतिमास |
| (iv) एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवहन के अनुक्रम में किए गए अपने कार्य के दौरान व्यक्तिगत व्यय पूरा करने के लिए किसी परिवहन प्रणाली में कार्यरत कर्मचारी को दिया गया कोर्इ भत्ता बशर्ते कि ऐसा कर्मचारी दैनिक भत्ता नहीं लेता हों (संपूर्ण भारत में) | ऐसे भत्ते का 70 प्रतिशत जो अधिकतम 6000*/- रु. प्रतिमास हो |
| (v) बालक शिक्षा भत्ता (संपूर्ण भारत में) | प्रति बालक 100*/- रु. प्रतिमास जो अधिक से अधिक दो बालकों पर मिल सकता है |
| (vi) कर्मचारी के बालक के होस्टल खर्च को चुकाने के लिए उसे दिया गया कोर्इ भत्ता | प्रति बालक 300*/- रु. प्रतिमास जो अधिक से अधिक दो बालकों पर मिल सकता है |
| (vii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 7 के स्तंभ 3 में वर्णित स्थानों पर प्रतिकरात्मक फील्ड एरिया भत्ता | 2600** रु. प्रतिमास |
| (viii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 8 के स्तंभ 3 में वर्णित स्थानों पर प्रतिकरात्मक मोडिफाइड फील्ड एरिया भत्ता | 1000** रु. प्रतिमास |
| (ix) 30 दिन से अधिक की अवधि तक अपने स्थायी कार्यस्थल से दूर क्षेत्रों में कार्यरत सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिए गए प्रति-राजद्रोह भत्ता की प्रकृति का कोर्इ विशेष भत्ता (संपूर्ण भारत में) | 3900** रु. प्रतिमास |
| (x) अपने निवास स्थान और कार्य स्थल के बीच आने-जाने के प्रयोजनार्थ व्यय पूरा करने के लिए कर्मचारी को [(xi) में उल्लिखित कर्मचारी से भिन्न] दिया गया परिवहन भत्ता (संपूर्ण भारत में) | 800† रु. प्रतिमास |
| (xi) †अपने निवास स्थान से कार्य स्थल के बीच आने-जाने के प्रयोजन के लिए व्यय को पूरा करने के लिए, ऐसे कर्मचारी को दिया गया परिवहन भत्ता जो नेत्रहीन है या न्यूनतर चरम सीमा की निर्योग्यता में शारीरिक रूप से अपंग है (संपूर्ण भारत में) | 1,600† रु. प्रतिमास |
| (xii) ऐसे किसी कर्मचारी को जो भूमिगत कोयला खानों में प्रतिकूल, अप्राकृतिक जलवायु में काम करता है, दिया गया भूमिगत भत्ता (संपूर्ण भारत में) | 800‡ रु. प्रतिमास |
| $(xiii) बहुत ऊंचार्इ वाले स्थानों में कार्यरत सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिया गया अधिक ऊंचार्इ क्षेत्र भत्ते के रूप में कोर्इ विशेष भत्ता (प्रतिकूल जलवायु भत्ता) | |
| (क) 9000 से 15000 फुट की ऊंचार्इ के लिए | 1,060 रु. प्रतिमास |
| (ख) 15000 फुट से अधिक ऊंचार्इ के लिए | 1,600 रु. प्रतिमास |
| $(xiv) विशेष प्रतिकारात्मक अति सक्रिय फील्ड क्षेत्र की प्रकृति को भत्ते के रूप में सशस्त्र बलों के सदस्य को दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता (संपूर्ण भारत में) | 4200 रु. प्रतिमास |
| £(xv) द्वीप समूह (कार्य) (अंदमान तथा निकोबार और लक्षद्वीप द्वीप समूह) भत्ते की प्रकृति का सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता | 3250 रु. प्रतिमास |
टिप्पण : जो निर्धारिती उपर्युक्त (vii) और (viii) के अधीन छूट का दावा करता है, वह (ii) में निर्दिष्ट भत्ते की बाबत छूट के लिए हकदार नहीं होगा।
जो निर्धारिती (ix) के अधीन छूट का दावा करता है वह (ii) (विक्षुब्ध क्षेत्र भत्ता) में निर्दिष्ट भत्ते की बाबत छूट के लिए हकदार नहीं होगा।
धारा 32 / नियम 5(2) : अवक्षयण : अवक्षयण की ऊंची दर का दावा करने के लिए विहित शर्तें
संयंत्र और मशीनरी की दशा में अवक्षयण की सामान्य दर 25 प्रतिशत है। किंतु यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं तो संयंत्र और मशीनरी को नियम 5(2) के फलस्वरूप (निर्धारण वर्ष 1988-89 से 1991-92 के लिए 50 प्रतिशत) 40 प्रतिशत की दर पर अवक्षयण के योग्य आस्तियों के समूह के भागरूप माना जाएगा :
• यदि नर्इ मशीनरी या संयंत्र किसी चीज या वस्तु (जो ग्यारहवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोर्इ चीज न हो) के विनिर्माण या उत्पादन के कारबार के प्रयोजनों के लिए निर्धारण वर्ष 1988-89 (या किसी पश्चात्वर्ती वर्ष) के सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान लगाया जाए।
• यदि ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा वित्त पोषित प्रयोगशाला में अथवा पब्लिक सेक्टर कंपनी या विश्वविद्यालय या संस्थान जो सचिव, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग द्वारा इस निमित्त मान्यताप्राप्त हो, के स्वामित्वाधीन प्रयोगशाला में विकसित किसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का प्रयोग करके किया जाए अथवा वह उसमें आविष्कृत कोर्इ चीज या वस्तु हो।
• यदि ऐसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का प्रयोग करने या ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन करने का अधिकार ऐसी प्रयोगशाला के स्वामी से या ऐसे स्वामी से हक प्राप्त करने वाले किसी व्यक्ति से अर्जित कर लिया गया हो।
• यदि किसी पूर्ववर्ष के लिए जिसमें उक्त मशीनरी या संयंत्र अर्जित किया जाए, निर्धारिती द्वारा दी गर्इ विवरणी के साथ सचिव, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद का यह प्रमाणपत्र भी लगाया जाएगा कि ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन ऐसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का, जिसका विकास ऐसी प्रयोगशाला में किया जाए, प्रयोग करके किया गया है अथवा वह ऐसी चीज या वस्तु है जिसका आविष्कार ऐसी प्रयोगशाला में किया गया है।
धारा 40क (3)/नियम 6घघ : कारबारी नामंजूरी–विहित सीमा से अधिक नकद संदाय–विहित स्थितियां और परिस्थितियां जिनमें भुगतान राशि अधिक है– विहित सीमा चैक से भिन्न रूप में भी की जा सकती है
तारीख 1.4.1996 से यथासंशोधित धारा 40क(3) के अधीन निर्धारिती द्वारा 20,000/- रु. से अधिक राशि का कोर्इ भुगतान तभी पूर्ण रूप में कटौती योग्य होगा जब ऐसा भुगतान क्रास चैक द्वारा या क्रास बैंक ड्राफ्ट द्वारा किया जाता है। यदि ऐसा भुगतान किसी अन्य तरीके से किया जाता है तो ऐसे भुगतान का 20 प्रतिशत कटौती के रूप में मंजूर नहीं किया जाएगा। तारीख 1.4.1996 से पूर्व इस उपधारा के अनुसार समग्र रकम पर पूरा वर्जन था यदि भुगतान क्रास चैक या क्रास बैंक ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया गया हो। फिर भी नियम 6घघ(ञ) में, जिस रूप में उस समय विद्यमान था, उन दशाओं में साधारण अपवाद का उपबंध था जिनमें निर्धारिती निर्धारण अधिकारी का यह समाधान कर देता था कि क्रास चैक/ड्राफ्ट द्वारा भुगतान (i) आपवादिक या अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण, अथवा (ii) विहित रीति से भुगतान करने की अव्यवहार्यता के कारण, या (iii) ऐसी प्रमाणिक कठिनार्इ के कारण, जो भुगतान से आदाता को होती, नहीं किया जा सका। नियम 6घघ में इस खंड (ञ) का 25.7.1995 से अब लोप कर दिया गया है और तारीख 1.12.1995 से नियम 6घघ में नए खंड (ञ) से (ठ) अंत:स्थापित किए गए हैं। अब उन स्थितियों के सिवाय जिन्हें नियम 6घघ में खासतौर पर छोड़ दिया गया है, सभी स्थितियों में रकम के 20 प्रतिशत की नामंजूरी निरपवाद लागू होगी। इस नियम के अधीन (जिस रूप में यह नियमों के 21वें संशोधन के पश्चात् 1.12.1995 को विद्यमान था) धारा 40क(3) के अधीन कोर्इ नामंजूरी नहीं दी जाएगी जहां भुगतान निम्नलिखित स्थितियों/परिस्थितियों में किया जाता है :
1. जहां भुगतान बैंककारी या अन्य क्रेडिट संस्थाओं को किया जाए जैसे भारतीय रिजर्व बैंक/भारतीय स्टेट बैंक/अनुसूचित बैंक/पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के वाणिज्यिक बैंक/जीवन बीमा निगम/भारतीय यूनिट ट्रस्ट/आर्इ सी आर्इ सी आर्इ/आर्इ एफ सी आर्इ/आर्इ डी बी आर्इ/सहकारी बैंक या भूमि बंधक बैंक/प्राइमरी एग्रिकलचरल क्रेडिट सोसाइटी/प्राइमरी क्रेडिट सोसाइटी/मद्रास इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेन्ट कारपोरेशन लि., मद्रास/आंध्र प्रदेश इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि., हैदराबाद/केरल स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि. त्रिवेन्द्रम/स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ महाराष्ट्र लि., मुंबर्इ/पब्लिक स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., चंडीगढ़/नेशनल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., नर्इ दिल्ली/मैसूर स्टेट इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., बंगलौर, हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि., चंडीगढ़/राज्य वित्त निगम।
2. केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को भुगतान, यदि ऐसी सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में कानूनी टेंडर में भुगतान का उपबंध है, जैसे प्रत्यक्ष कर, सीमा शुल्क या उत्पाद शुल्क, विक्रय कर, रेल भाड़ा आदि का भुगतान। इस प्रकार रेल भाड़ा खर्च के लेखे या वेगन बुक कराने के लिए रेल विभाग को किए गए भुगतान की दशा में धारा 40क(3) लागू नहीं होगी–देखिए परिपत्र सं. 34, तारीख 5.3.1970.
3. निर्धारिती द्वारा आदाता को प्रदाय किए गए किसी माल या दी गर्इ सेवाओं के लिए निर्धारिती को देय धन के लिए आदाता के खाते में निर्धारिती द्वारा बही समायोजन द्वारा किए गए भुगतान।
4. बैंककारी प्रणाली से किए गए भुगतान जैसे क्रेडिट पत्र, डाक अंतरण, तार अंतरण, उसी बैंक या एक बैंक और दूसरे बैंक के बीच बही समायोजन और विनिमय पत्र जिनके अंतर्गत बैंक का भुगतान योग्य बनार्इ गर्इ हुंडियां भी हैं।
5. खेतिहर, बुवार्इ करने वाले या उत्पादक को कृषि या वन उपज अथवा वन्य प्राणी उत्पाद (इनमें हड्डियां और खालें भी शामिल हैं) या डेरी या कुक्कुट पालन या मछली या मछली उत्पाद अथवा उद्यान या जलकृषि के उत्पादों के चाहे वे प्रसंस्कृत हों या नहीं मद्दे भुगतान।
6. उत्पादक को उसके उत्पाद खरीदने के लिए भुगतान यदि उनका विनिर्माण या प्रसंस्करण कुटीर उद्योग में बिना विद्युत के किया जाता है।
7. ऐसे व्यक्ति को किए गए भुगतान जो साधारणतया ऐसे गांव में रहता है या कारबार चलाता है जिसमें कोर्इ बैंक नहीं है। किंतु यदि भुगतान बैंक की सुविधा वाले कस्बे में के ग्रामवासी को किया जाता है तो यह अपवाद लागू नहीं होगा।
8. प्रतिवर्ष 7500 रु. से अनधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को उपदान/छंटनी प्रतिकर आदि जैसी सीमांत प्रसुविधाओं का भुगतान।
9. कर्मचारी को दिया गया वेतन (धारा 192 के अधीन स्रोत पर कटौती के पश्चात्) जब ऐसा कर्मचारी अपने सामान्य कार्यस्थल से भिन्न किसी स्थान पर या पोत पर 15 या अधिक दिन लगातार अस्थायी तौर पर तैनात किया जाता है, और वह ऐसे स्थान या पोत पर किसी बैंक में कोर्इ खाता नहीं रखता।
10. ऐसे दिन किए जाने के लिए अपेक्षित भुगतान जिसको बैंक छुट्टी या हड़ताल के कारण बंद हैं।
11. किसी व्यक्ति द्वारा अपने उस एजेन्ट को किया गया भुगतान जिससे ऐसे व्यक्ति की ओर से माल या सेवा के लिए नकद भुगतान करने की अपेक्षा की जाती है।
12. किसी प्राधिकृत व्यौहारी/मनीचेंजर द्वारा अपने कारबार के सामान्य अनुक्रम में विदेशी करेंसी या यात्री चैक के क्रय पर किया गया भुगतान।
धारा 89/नियम 21क : राहत की - जब वेतन बकाया या अग्रिम आदि के रूप में दिया जाता है - संगणना के नियम
कभी-कभी वेतनभोगी कर्मचारी को वेतन बकाया, उपदान, छुट्टी नकदीकरण और पेंशन के सारांशीकृत मूल्य के रूप में एकमुश्त राशि मिल सकती है। ये भुगतान, जो अतीत में की गर्इ सेवा के संबंध में और उपदान, छुट्टी नकदीकरण और पेंशन के सारांशीकृत मूल्य की दशा में होते हैं, इस तथ्य के कारण हो सकता है कर छूट प्राप्त न हों कि विहित शर्तें और धनीय सीमाएं पूरी नहीं होती हैं। यदि इन एकमुश्त राशियों के भुगतान पर उनकी प्राप्ति वर्ष में कर लगाया जाता है तो उत्तरोत्तर बढ़ती कर दर की वजह से कर का भार बहुत अधिक हो जाएगा। इस भारी कर लगने से होने वाली कठिनार्इ को हल्का करने के लिए अधिनियम में ऐसे एकमुश्त भुगतानों पर कर राहत मंजूर करने के लिए उपबंध किया गया है।
वे मदें जिन पर राहत अनुज्ञेय है–निम्नलिखित मदों पर राहत दी जाती है :
• बकाया के रूप में या अग्रिम रूप में प्राप्त वेतन
• कम से कम पांच वर्ष की सेवा करने के पश्चात् प्राप्त उपदान (बिना छूट का भाग)
• नियोजन समाप्ति के लिए प्रतिकर बशर्ते कि कर्मचारी कम से कम तीन वर्ष की लगातार सेवा कर चुका हो और सेवा का शेष काल कम से कम 3 वर्ष हो
• पेंशन का सारांशीकृत मूल्य (बिना छूट का भाग)
• छुट्टी नकदीकरण (बिना छूट का भाग)।
बकाया वेतन की प्राप्ति पर या अग्रिम वेतन मिलने पर राहत की गणना किस प्रकार की जाएगी - बकाया वेतन की या अग्रिम वेतन की प्राप्ति पर (जिसे इसमें आगे अतिरिक्त वेतन कहा गया है) राहत की गणना नियम 21क(2) में दी गर्इ रीति से निम्न प्रकार की जाएगी :
1. उस सुसंगत पूर्ववर्ष की, जिसमें अतिरिक्त वेतन प्राप्त हो, कुल आय पर जिसके अंतर्गत अतिरिक्त वेतन भी है, संदेय कर की संगणना कीजिए।
2. उस सुसंगत पूर्ववर्ष की, जिसमें अतिरिक्त वेतन प्राप्त हो, कुल आय पर अतिरिक्त वेतन को छोड़कर, संदेय कर की संगणना कीजिए।
3. (1) और (2) के अनुसार निकली कर की रकम का अन्तर निकालिए।
4. उस पूर्ववर्ष में, जिससे ऐसा वेतन संबंधित है, अतिरिक्त वेतन को निकालने के पश्चात् कुल आय पर कर की संगणना कीजिए।
5. उस पूर्ववर्ष में, जिससे ऐसा वेतन संबंधित है, अतिरिक्त वेतन को निकालने के पश्चात्, कुल आय पर कर की संगणना कीजिए।
6. (4) और (5) के अनुसार निकली कर की रकम का अंतर निकालिए।
7. (3) पर संगणित कर की जितनी राशि (6) के अनुसार संगणित कर से अधिक है वह राशि धारा 89(1) के अधीन स्वीकार्य राहत राशि है। किंतु यदि (3) के अनुसार संगणित कर (6) पर संगणित कर से कम है तो कोर्इ राहत स्वीकार्य नहीं है। ऐसे मामले में निर्धारिती कर्मचारी को राहत के लिए आवेदन नहीं करना चाहिए।
यदि अतिरिक्त वेतन का संबंध एक से अधिक पूर्ववर्षों से है तो वेतन उन पूर्ववर्षों में, जिनके लिए वह है, ऊपर बतार्इ गर्इ रीति से उनमें दिखाया जाएगा।
उपदान की बाबत राहत की संगणना किस प्रकार की जाएगी : धारा 89(1) के अधीन यदि उपदान विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक प्राप्त होता है तो राहत का दावा किया जा सकता है। किंतु यदि कराधेय उपदान पांच वर्ष से कम की गर्इ सेवा की बाबत है तो कोर्इ राहत स्वीकार्य नहीं है। जिन मामलों में राहत मंजूर की जा सकती है उन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है, अर्थात् (क) जहां संदेय उपदान 15 या अधिक वर्षों की विगत सेवा की बाबत हो, और (ख) जहां ऐसी अवधि 5 वर्ष या अधिक हो किंतु 15 वर्ष से कम हो। प्रथम वर्ग की स्थिति में राहत की गणना निम्न प्रकार की जाती है :–
1. प्राप्ति वर्ष में उपदान सहित कुल आय पर कर की औसत दर की संगणना कीजिए।
2. ऊपर (1) के अनुसार संगणित कर की औसत दर पर उपदान पर कर ज्ञात कीजिए।
3. एक तिहार्इ उपदान राशि पिछले तीन वर्षों में से हर वर्ष की अन्य आय में जोड़कर कर की औसत दर की संगणना कीजिए।
4. ऊपर (3) में बतार्इ गर्इ रीति से निकाली गर्इ तीन-औसत दरों का औसत ज्ञात कीजिए और उस दर पर उपदान पर कर की संगणना कीजिए।
5. ऊपर (2) के अनुसार संगणित उपदान पर कर और ऊपर (4) के अनुसार कर में जो अंतर आएगा वह धारा 89(1) के अधीन स्वीकार्य राहत होगी।
दूसरे वर्ग के अंतर्गत आने वाले मामलों में राहत उसी तरह संगणित की जाती है जैसे ऊपर बतार्इ गर्इ है। अंतर केवल इतना है कि पूर्व तीन वर्षों की औसत दरों के औसत के बजाय पूर्व दो वर्षों की दरों के औसत की संगणना पूर्व दो वर्षों में से प्रत्येक वर्ष की अन्य आय में राशि एक बटा दो उपदान जोड़कर की जाती है।
नियोजन की समाप्ति पर प्रतिकर संबंधी राहत की संगणना–यदि निर्धारती द्वारा कम से कम तीन वर्ष की लगातार सेवा के पश्चात् अपने नियोजन की समाप्ति पर या उसके संबंध में अपने नियोजक से या पूर्व नियोजक से प्रतिकर प्राप्त किया जाता है और नियोजन की शेष बची अवधि भी तीन वर्ष से कम नहीं है तो राहत की संगणना वैसे ही की जाती है मानो कर्मचारी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि की सेवा की बाबत उपदान दिया गया हो।
पेंशन के सारांशीकरण में भुगतान की बाबत राहत की संगणना–पेंशन सारांशीकरण में विहित सीमाओं से अधिक प्राप्त भुगतान राशि की बाबत राहत का दावा किया जा सकता है। ऐसी राहत की संगणना वैसे ही की जाती है मानो कर्मचारी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि की सेवा की बाबत उपदान दिया गया हो।
अन्य भुगतानों के संबंध में राहत की संगणना–ऊपर उल्लिखित से भिन्न कर्मचारी द्वारा प्राप्त आय के संबंध में, धारा 89(1) के अंतर्गत राहत प्रत्येक व्यक्तिगत मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा प्रदान की जाएगी।
राहत का दावा कैसे किया जाए–सामान्य अनुक्रम में, निर्धारिती को केवल उस पूर्ववर्ष के सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए आय की विवरणी में राहत का दावा करना चाहिए जिसमें एकमुश्त भुगतान प्राप्त हो। इस प्रयोजन के लिए, ब्यौरेवार संगणना वर्णित करते हुए राहत के लिए एकमात्र आवेदन पत्र आय की विवरणी के साथ उपाबद्ध किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप में, वह कम दर पर कर की कटौती करने के लिए नियोजक को निदेश देने हेतु आय-कर अधिकारी को भुगतान के किए जाने के पूर्व भी आवेदन कर सकता है।
इस सामान्य प्रक्रिया के अपवाद के रूप में अधिनियम द्वारा उस निर्धारिती को एक विशेष सुविधा दी जाती है जो निम्नलिखित प्रवर्गों में से किसी के अंतर्गत आता हो :
• सरकारी सेवक।
• किसी कंपनी, सहकारी सोसाइटी, स्थानीय प्राधिकारी, विश्वविद्यालय, संस्था, संगम या निकाय का कर्मचारी।
ऐसे किसी निर्धारिती की दशा में, नियोजक द्वारा स्रोत पर कर की कटौती के समय भी राहत की गणना की जा सकती है और उसे अनुज्ञात किया जा सकता है। इस प्रयोजन के लिए, निर्धारिती-कर्मचारी को फार्म सं. 10ड़ में विहित विशिष्टियां देनी होंगी।
धारा 203क/नियम 114क - कर कटौती खाता संख्या के लिए विहित प्रक्रिया
नियम 114क(3) में यह उपबंध है कि जहां किसी व्यक्ति ने 1.6.1987 को या उसके पश्चात् अध्याय 17ख के उपबंधों के अनुसार कर की कटौती की है या कटौती करता है, वहां वह उस मास की समाप्ति से एक मास के भीतर जिसमें कर की कटौती की गर्इ थी कर कटौती खाता संख्या आबंटित करने के लिए आवेदन करेगा।
• किसी व्यक्ति को एक बार कर कटौती खाता संख्या आबंटित हो जाने पर उसे कर कटौती खाता संख्या के लिए और आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है। इस संबंध में, यह स्थायी खाता संख्या की ही तरह है।
• यदि आवेदन करने में व्यतिक्रम हो तो क्या होगा?–संबंधित व्यक्ति को कर कटौती खाता संख्या के आबंटन के लिए तुरंत आवेदन करना चाहिए और व्यतिक्रम नहीं करते रहना चाहिए।
कर कटौती खाता संख्या के लिए आवेदन किसे किया जाना चाहिए?–नियम 114क(2) में यह उपबंध है कि कर कटौती खाता संख्या के लिए आवेदन निम्नलिखित को किया जाएगा–
क. निर्धारण अधिकारी, जिसे मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा कर कटौती खाता संख्या के आबंटन का कार्य सौंपा गया हो; और
ख. जहां आवेदक का निर्धारण करने की अधिकारिता रखने वाले निर्धारण अधिकारी को ऐसा कोर्इ कार्य सौंपा न गया हो।
बोर्ड के परिपत्र सं. 497, तारीख 9.10.1987 में यह कथन है कि अहमदाबाद, बंगलौर, मुंबर्इ, कलकत्ता, दिल्ली, हैदराबाद, मद्रास और पुणे महानगरों में कर कटौती खाता संख्या आबंटन के कार्य का नगरों के मुख्यालयों पर केन्द्रीयकरण कर दिया गया है।
कर कटौती खाता संख्या आबंटन के लिए आवेदन कैसे किया जाना चाहिए ?–नियम 114क(1) में यह उपबंध है कि कर कटौती खाता संख्या के आबंटन के लिए आवेदन फार्म सं. 49ख में दो प्रतियों में किया जाएगा।
धारा 139क/नियम 114ख से 114घ - कतिपय विहित संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेज़ों मे स्थायी खाता संख्या कोट करना
कानूनी पृष्ठभूमि
(i) अधिनियम की धारा 139क(5)(ग) द्वारा यह अपेक्षित है कि प्रत्येक व्यक्ति उसके द्वारा किए गए कतिपय विहित संव्यवहारों से संबंधित सभी दस्तावेजों में उसे आबंटित स्थायी खाता संख्या (पी ए एन), राजस्व के हित में, कोट करेगा। इसमें यह भी उपबंध है कि जब तक व्यक्ति को स्थायी खाता संख्या आबंटित नहीं होता तब तक उसे साधारण सूचकांक रजिस्टर संख्यांक (जी आर्इ आर) कोट करना चाहिए। अधिनियम की धारा 139क(6) में यह अधिकथित है कि ऐसे विहित संव्यवहार से संबंधित किसी दस्तावेज को प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दस्तावेज में स्थायी खाता संख्यांक या साधारण सूचकांक रजिस्टर संख्यांक सम्यक्त: कोट किया गया है। तारीख 1.8.1998 से यथा संशोधित अधिनियम की धारा 139क(8) में अन्य बातों के साथ-साथ यह उपबंध है कि बोर्ड निम्नलिखित पहलुओं के संबंध में नियम बना सकेगा :
• संव्यवहारों के प्रवर्ग, जिनके संबंध में उपरोक्त संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेजों में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पी ए एन या जी आर्इ आर कोट किए जाने चाहिएं।
• ऐसे व्यक्तियों का वर्ग या वर्ग के जिसे या जिन्हें उपरोक्त अध्यपेक्षा लागू नहीं होगी।
• वह फार्म और रीति जिसमें ऐसा व्यक्ति घोषणा करेगा जिसे पी ए एन या जी आर्इ आर आबंटित नहीं हुआ है।
• वह रीति जिसमें उक्त संव्यवहारों में पी ए एन या जी आर्इ आर कोट किया जाना चाहिए।
• वह समय और रीति जिसमें उक्त संव्यवहारों की विहित प्राधिकारों की संसूचना दी जानी चाहिए।
नियम 114ख से नियम 114घ में पूर्वोक्त पहलू आते हैं।
प्रभाव की तारीख
(ii) नियम 114ख से नियम 114घ तारीख 1.11.1998 से प्रवृत्त हुए हैं। अत: उस तारीख को या उसके पश्चात् विहित संव्यवहारों में शामिल होने वाले व्यक्तियों को सुसंगत दस्तावेजों में पी ए एन या जी आर्इ आर आवश्यक रूप से कोट करने चाहिए या अन्यथा (फार्म सं. 60 में) घोषणा करनी चाहिए, यदि उन्हें पी ए एन आबंटित नहीं किया गया है और उनके पास जी आर्इ आर भी नहीं है। [नीचे (v) देखिए]
छूट प्राप्त व्यक्ति
(iii) नियम 114ग पी ए एन या जी आर्इ आर कोट करने अथवा घोषणा प्रस्तुत करने की अध्यपेक्षा से निम्नलिखित व्यक्तियों के प्रवर्गों को छूट प्रदान करता है।
p कृषक - वे व्यक्ति, जिनके पास केवल कृषि आय है और कर से प्रभार्य कोर्इ अन्य आय नहीं है छूट प्राप्त हैं। तथापि, उन्हें उनके द्वारा किए गए प्रत्येक नकद संव्यवहार के संबंध में फार्म सं. 61 में एक घोषणा देनी होगी यदि वह संव्यवहार, विहित संव्यवहारों में से कोर्इ एक संव्यवहार है।
p अनिवासी - अधिनियम की धारा 2(30) में यथा परिभाषित अनिवासी व्यक्ति को भी छूट प्राप्त है।
p केन्द्रीय सरकार - उन संव्यवहारों में जहां केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों और कौंसलर अधिकारी दाता हैं, उन्हें छूट प्राप्त है।
विहित संव्यवहार
(iv) नियम 114ख संव्यवहारों के उन प्रवर्गों का उल्लेख करता है जिनके संबंध में पी ए एन या जी आर्इ आर कोट किए जाने चाहिएं या घोषणा फाइल की जानी चाहिए यदि वे संव्यवहार 1.11.1998 को या उसके पश्चात् किए जाते हैं। विनिर्दिष्ट संव्यवहारों को संक्षेप में नीचे स्पष्ट किया गया है :
(ivक) संपत्ति संबंधी व्यवहार - पांच लाख रुपए या उससे अधिक मूल्य की जंगम संपत्ति के विक्रय या क्रय से संबंधित संव्यवहार इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट किए गए हैं। प्रकटत:, धनीय सीमा, अंतरण संबंधी दस्तावेज में दिखाए गए मूल्य को लागू होगी। चूंकि "क्रय" और "विक्रय" दोनों इसके अंतर्गत आते हैं, इसलिए क्रेता और विक्रेता दोनों को भी अपना पी ए एन या जी आर्इ आर कोट करना चाहिए या घोषणा फाइल करनी चाहिए।
(ivख) यान संबंधी व्यवहार - किसी ऐसे मोटर यान या मोटर यान अधिनियम की धारा 2(28) में यथा परिभाषित यान के, जिनका उस अधिनियम के अध्याय 4 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा रजिस्ट्रीकृत किया जाना अपेक्षित है विक्रय या क्रय से संबंधित संव्यवहार इस प्रयोजन के लिए आगे विनिर्दिष्ट हैं। फिर भी, उन दुपहिया यानों का, जिनके अंतर्गत मोटर यान के साथ एक अतिरिक्त पहिए वाली अलग की जा सकने वाली बगली कार भी है, इनसे बाहर रखा गया है। अत: स्कूटरों, मोपेडों और इसी प्रकार के अन्य यानों के क्रय/विक्रय के लिए पी ए एन/जी आर्इ आर कोट करने की अध्यपेक्षा लागू नहीं होती। यहां भी, चूंकि "क्रय" और "विक्रय" दोनों इसके अंतर्गत विनिर्दिष्ट हैं, इसलिए क्रेता और विक्रेता दोनों को अपना पी ए एन/जी आर्इ आर कोट करना चाहिए या घोषणा फाइल करनी चाहिए।
(ivग) बैंकों में सावधिक निक्षेप - आगे किसी बैंक (राष्ट्रीयकृत बैंक, अनुसूचित बैंक, सहकारी बैंक आदि) में कलिक निक्षेप (अर्थात् सावधिक निक्षेप) से संबंधित संव्यवहार विनिर्दिष्ट हैं यदि प्रत्येक अवसर पर उसमें अंतर्वलित रकम 50,000/- रु. से अधिक है। यदि कर योग्य आय न रखने वाला कोर्इ अवयस्क ऐसा खाता खोलना चाहता है तो संव्यवहार से संबंधित दस्तावेज में (अर्थात् खाता खेलने के लिए आवेदन पत्र) उसे, यथास्थिति अपने पिता या माता या संरक्षक का पी ए एन/जी आर्इ आर कोट करना चाहिए।
(ivघ) डाकघरों में निक्षेप - आगे डाकघर बचत बैंक के किसी खाते में 50,000/- रुपए से अधिक निक्षेप से संबंधित संव्यवहार विनिर्दिष्ट हैं। "किसी खाते" शब्दों के प्रयोग यह स्पष्ट होता है कि वह खाता बचत बैंक खाता या कालिक निक्षेप खाता हो सकता है। तथापि, राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्रों, इन्दिरा विकास पत्रों में किए गए विनिधान इसके अंतर्गत नहीं आते क्योंकि वे डाकघर बचत बैंक में 'निक्षेप' नहीं हैं।
(ivड़) शेयर संबंधी संव्यवहार - आगे 10 लाख रुपए से अधिक मूल्य की प्रतिभूतियों के क्रय या विक्रय की संविदा से संबंधित संव्यवहार विनिर्दिष्ट हैं।
(ivच) बैंक खाते खोलना - इसके बाद किसी भी बैंक में (राष्ट्रीयकृत बैंक, अनुसूचित बैंक, सहकारी बैंक आदि) खाता खोलने से संबंधित संव्यवहार विनिर्दिष्ट हैं। यहां अनुध्यात 'खाता', चालू खाता, बचत खाता या ओवर ड्राफ्ट खाता हो सकता है। इसमें ऊपर (ivग) में निर्दिष्ट कालिक निक्षेप शामिल नहीं है।
यदि कर योग्य आय न रखने वाला कोर्इ अवयस्क ऐसा खाता खोलना चाहता है तो संव्यवहार से संबंधित दस्तावेज में (अर्थात् खाता खोलने के लिए आवेदन पत्र) उसे, यथास्थिति अपने पिता या माता या संरक्षक का पी ए एन/जी आर्इ आर कोट करना चाहिए।
(ivछ) नए टेलीफोन कनैक्शन - आगे टेलीफोन कनैक्शन लेने के लिए आवेदन पत्र (जिसमें सेलुलर टेलीफोन कनैक्शन शामिल है) किया जाना विनिर्दिष्ट है।
(ivज) होटल बिल - अंत में विनिर्दिष्ट मद होटलों और रेस्टोरेंटों के बिलों के भुगतान से संबंधित है यदि एक समय में बिल की रकम 25,000/- रुपए से अधिक हो।
घोषणा का फाइल किया जाना
(v) नियम 114ख के तीसरे परन्तुक के अधीन कोर्इ घोषणा फाइल करने का प्रश्न केवल ऐसे मामलों में उत्पन्न होगा जहां विहित संव्यवहारों में से कोर्इ संव्यवहार करने वाले व्यक्ति को पी ए एन आबंटित नहीं हुआ है और उसके पास जी आर्इ आर भी नहीं है। इस परन्तुक में यह अनुध्यात है कि जब भी ऐसे व्यक्ति द्वारा विहित संव्यवहारों में से किसी संव्यवहार में नकद या अन्यथा किसी बैंक द्वारा जारी क्रास चैक द्वारा या क्रेडिट कार्ड से भिन्न किसी रीति में भुगतान किया जाए तो उसे फार्म सं. 60 में घोषणा फाइल करनी चाहिए। यदि किसी बैंक द्वारा जारी क्रास चैक या क्रेडिट कार्ड द्वारा भुगतान किया जाता है तो घोषणा आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि क्रास चैक द्वारा कोर्इ बैंक खाता खोला जाता है या 25,000/- रुपए से अधिक रकम के होटल के बिल का भुगतान क्रेडिट कार्ड द्वारा किया जाता है और दाता के पास पी ए एन या जी आर्इ आर नहीं है, तो उसके लिए फार्म सं. 60 में घोषणा फाइल करना आवश्यक नहीं है।
अन्य पक्षकार की जिम्मेदारी
(vi) नियम 114ग के उपनियम (2) के अधीन संव्यवहार को अंतिम रूप देने वाले व्यक्ति [जैसे रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी, बैंक प्रबंधक, शेयर दलाल, टेलीफोन प्राधिकारी, होटल/रेस्टोरेंट, पोस्टमास्टर–देखिए नीचे (viक)] द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है कि संबंधित दस्तावेज में पी ए एन या जी आर्इ आर कोट किया गया है या फार्म सं. 60 में घोषणा प्रस्तुत की गर्इ है।
(viक) नियम 114ग(2) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति–निम्नलिखित व्यक्ति नियम 114ग(2) में विनिर्दिष्ट किए गए हैं–
(क) रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रीकरण अधिकारी;
(ख) ऊपर (ivख) में निर्दिष्ट रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी;
(ग) किसी बैंक का कोर्इ प्रबंधक या अधिकारी;
(घ) पोस्टरमास्टर;
(ड़) शेयर दलाल, उप दलाल, शेयर अंतरण एजेंट, किसी इश्यू का बैंककार, न्यास विलेख का न्यासी, इश्यू का रजिस्ट्रार, मरचेंट बैंककार, अवलेखक, पोर्टफोलियो प्रबंधक, विनिधान सलाहकार और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम की धारा 12 के अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसे कोर्इ अन्य मध्यवर्ती;
(च) टेलीफोन लगाए जाने के लिए उसके द्वारा आवेदन प्राप्त करने वाला कोर्इ प्राधिकारी या कंपनी;
(छ) अपर (ivज) में निर्दिष्ट बिल जारी करने वाला कोर्इ व्यक्ति;
(ज) जंगम संपत्ति या मोटर यान का क्रय या विक्रय करने वाला कोर्इ व्यक्ति।
अन्य पक्षकार द्वारा अनुवर्ती कार्रवार्इ
(vii) नियम 114घ ऊपर (viक) में उल्लिखित प्रत्येक व्यक्ति को यह व्यादेश देती है कि वह संबंधित आय-कर निदेशक (अन्वेषण) को निम्नलिखित दस्तावेज अग्रेषित करे, अर्थात् :
(क) फार्म सं. 60 में घोषणा की प्रतियां।
(ख) फार्म सं. 61 में घोषणा की प्रतियां।
ऊपर (ivच) में निर्दिष्ट संव्यवहारों के संबंध में प्रस्तुत की गर्इ घोषणा की प्रतियां आय-कर निदेशक (अन्वेषण) को प्रस्तुत नहीं की जाएंगी।
किसी वित्तीय वर्ष के दौरान फार्म सं. 60 और 61 में प्राप्त सभी घोषणाएं संबंधित आय-कर निदेशक (अन्वेषण) को दो किस्तों में अग्रेषित की जाएंगी अर्थात् 30 सितम्बर तक प्राप्त फार्म उस वर्ष में अधिक से अधिक 31 अक्तूबर तक और 31 मार्च तक प्राप्त फार्म उसी वर्ष में अधिक से अधिक 30 अप्रैल तक अग्रेषित किए जाएंगे।
*तारीख 1.8.1997 से।
**तारीख 1.5.1999 से।
†तारीख 1.8.1997 से।
‡तारीख 24.4.2000 से।
$तारीख 1.5.1999 से।
£तारीख 29.2.2000 से।
[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित रूप में]

