अद्यतित विवरणी क्या है और करदाता के लिए इसकी उपयोगिता क्या है?
विषय
ई-सत्यापन योजना 2021 के लिए अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उत्तर
वित्त अधिनियम 2022 के द्वारा आयकर अधिनियम में एक नई धारा 139(8क) शामिल की गई है। यह नई धारा करदाताओं द्वारा 'अद्यतन विवरणी' दाखिल करने करने के लिए प्रदान की गई है। करदाता प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से दो वर्ष के भीतर अद्यतन विवरणी दाखिल कर सकते हैं। हालांकि, प्रभावी तिथि 1 अप्रैल, 2025 से, अद्यतन विवरणी प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से 48 महीने के भीतर दाखिल की जा सकती है। इस प्रकार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में कोई व्यक्ति निर्धारण वर्ष 2021-22, 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के लिए अद्यतन विवरणी दाखिल कर सकता है।
अद्यतन विवरणी इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना दाखिल की जा सकती है कि करदाता ने मूल विवरणी दाखिल की थी या नहीं। हालांकि, अद्यतन विवरणी दाखिल करने के लिए करदाता को आयकर अधिनियम 1961 की धारा 139(8क) में निर्धारित शर्तें पूरी करनी होंगी, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
1. अद्यतन विवरणी तभी दाखिल की जा सकती है जब करदाता को कोई अतिरिक्त आय प्रकट करनी हो, जो पहले छूट गई हो / छोड़ी गई हो, और उस पर अतिरिक्त कर का भुगतान करना हो।
2. अद्यतन विवरणी किसी आय को कम करने, हानि दर्शाने या हानि बढ़ाने के लिए दाखिल नहीं की जा सकती, जिससे कर दायित्व में कमी या कर वापसी में वृद्धि हो।
3. जहाँ किसी व्यक्ति ने धारा 139(3) के अंतर्गत हानि की विवरणी दाखिल की हो, वह अद्यतन विवरणी दाखिल कर सकता है। हालांकि, ऐसी अद्यतन विवरणी आय की विवरणी होनी चाहिए या उसके परिणामस्वरूप हानि में कमी आनी चाहिए।
4. अद्यतन विवरणी का विकल्प एक निर्धारण वर्ष के लिए केवल एक बार चुना जा सकता है।
5. यदि अद्यतन विवरणी प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से 12 महीने के भीतर दाखिल की जाती है तो 25% अतिरिक्त आयकर और उस पर ब्याज देय होगा। यदि विवरणी प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से 24 महीने के भीतर दाखिल की जाती है तो 50% और उसपर ब्याज देययोग्य होगा। यदि विवरणी प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से 36 महीने के भीतर दाखिल की जाती है तो 60% और उसपर ब्याज देययोग्य होगा और यदि विवरणी प्रासंगिक निर्धारण वर्ष की समाप्ति से 48 महीने के भीतर दाखिल की जाती है तो 70% और उस पर अतिरिक्त आयकर और उस पर ब्याज देय होगा।
अद्यतन विवरणी दाखिल करने की यह सुविधा पहले छूटी हुई आय प्रकट करने और आयकर अधिनियम के अंतर्गत आगे की कार्यवाही से बचने का अवसर भी मानी जा सकती है।

