थाईलैंड : व्यापक करार
हस्ताक्षर तिथि
2015
लागू होना
13/10/2015
वित्त मंत्रालय
(राजस्व विभाग)
अधिसूचना
नर्इ दिल्ली, 1 दिसंबर, 2015
(आयकर)
का.आ. 3244 (अ). - जबकि, आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार तथा वित्तीय अपवंचन की रोकथाम करने के लिए भारत गणराज्य की सरकार तथा थार्इलैंड साम्राज्य की सरकार के बीच एक करार (जिसे इसके बाद कथित करार कहा गया है) पर थार्इलैंड में 29 जून, 2015 को हस्ताक्षर किए गए थे;
और चूंकि, उक्त करार 13 अक्टूबर, 2015 को प्रवृत्त हुआ था, जो कि उक्त करार के अनुच्छेद 29 के पैराग्राफ 2 के अनुसार, उक्त करार को लागू करने के लिए संबंधित कानूनों द्वारा यथा अपेक्षित प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए अधिसूचनाओं में से बाद की अधिसूचना की तारीख है।
और जबकि, उक्त करार के अनुच्छेद 29 के पैराग्राफ 3 के खंड (क) में व्यवस्था है कि उक्त करार के उपबंध, भारत में, उस कैलेण्डर वर्ष जिसमें वह करार प्रवृत्त हुआ है, उसके अनुवर्ती कैलेण्डर वर्ष की पहली अप्रैल को अथवा उसके बाद आरंभ होने वाले किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त आय के संबंध में लागू होंगे;
इसलिए, अब आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 90 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केन्द्रीय सरकार एतद्द्वारा अधिसूचित करती है कि इसके साथ संलग्न उपर्युक्त अनुबंध के सभी उपबंध भारत संघ में लागू किए जाएंगे।
(अधिसूचना सं.88/2015/फा.सं.503/5/2005-एफटीडी-II)
रजत बंसल, संयुक्त सचिव
आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान का परिहार करने और वित्तीय अपवंचन रोकने के लिए भारत गणराज्य की सरकार तथा थार्इलैंड साम्राज्य की सरकार के बीच करार।
भारत गणराज्य की सरकार और थार्इलैंड साम्राज्य की सरकार, आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार और राजस्व अपवंचन को रोकने के लिए तथा दोनों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की दृष्टि से एक करार निष्पन्न करने की इच्छा से, निम्नानुसार सहमत हुर्इ है:
अनुच्छेद 1
शामिल व्यक्ति
यह करार उन व्यक्तियों पर लागू होगा जो संविदाकारी राज्यों में से किसी एक अथवा दोनों के निवासी हैं।
अनुच्छेद 2
शामिल कर
1. यह करार किसी संविदाकारी राज्य अथवा इसके राजनैतिक उप-प्रभागों अथवा स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा आय पर लगाए गए करों के संबंध में लागू होगा, चाहे वे किसी भी तरह से लगाए जाएं।
2. चल अथवा अचल सम्पत्ति के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर लगाए गए करों और उद्यमों द्वारा प्रदत्त मजदूरी अथवा वेतनों की कुल राशियों पर करों सहित कुल आय पर अथवा आय के तत्वों पर लगाए गए सभी करों को आय पर लगाए गए करों के रूप में माना जाएगा।
3. जिन मौजूदा करों पर यह करार लागू होगा, वे हैं:
(क) भारत के मामले में आयकर, उस पर लगे किसी अधिप्रभार सहित; (इसके बाद इसे (''भारतीय कर'' कहा जाएगा);
(ख) थार्इलैंड के मामले में;
- आयकर; तथा
- पेट्रोलियम आयकर; (इसके बाद इसे (''थार्इ कर'' कहा जाएगा);
4. यह करार किसी भी समरूप अथवा तत्वत: समान करों पर भी लागू होगा जो करार पर हस्ताक्षर किए जाने की तारीख के पश्चात विद्यमान करों के अतिरिक्त अथवा उनके स्थान पर लगाए जाएंगे। संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संबंध में एक दूसरे को अधिसूचित करेंगे जो उनके अपने-अपने कराधान कानूनों में किए गए हों।
अनुच्छेद 3
सामान्य परिभाषाएं
1. इस करार के प्रयोजनार्थ जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो:
(क) ''भारत'' शब्द से अभिप्रेत है - भारत का राज्यक्षेत्र और इसमें राज्यक्षेत्रीय समुद्र और उसके ऊपर के वायुमंडलीय क्षेत्र के अतिरिक्त कोर्इ भी अन्य समुद्री क्षेत्र शामिल है जिनमें समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिसमय सहित भारतीय कानून तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार भारत के प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकार, अन्य अधिकार तथा क्षेत्राधिकार हैं;
(ख) ''थार्इलैंड'' शब्द से अभिप्रेत है - थार्इलैंड साम्राज्य का क्षेत्र और इसमें आंतरिक जल, राज्यक्षेत्रीय समुद्र और कोर्इ समुद्री क्षेत्र शामिल हैं जिन पर थार्इलैंड साम्राज्य का प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकार है अथवा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार क्षेत्राधिकार है।
(ग) ''एक संविदाकारी राज्य'' तथा ''दूसरा संविदाकारी राज्य'' शब्दों का अर्थ संदर्भ की अपेक्षानुसार भारत गणराज्य अथवा थार्इलैंड साम्राज्य है;
''व्यक्ति'' शब्द पद में कोर्इ व्यष्टि, कोर्इ कम्पनी, व्यक्तियों की कोर्इ संस्था और कोर्इ अन्य सत्ता शामिल है जिसे संबंधित संविदाकारी राज्यों में प्रवृत कराधान कानूनों के तहत एक कराधेय इकार्इ के रूप में समझा जाता है;
(ड.) ''कम्पनी'' शब्द से कोर्इ निगमित निकाय अथवा कोर्इ सत्ता अभिप्रेत है जिसे कर प्रयोजनों के लिए एक निगमित निकाय के रूप में माना जाता है;
(च) ''एक संविदाकारी राज्य का उद्यम'' तथा ''दूसरे संविदाकारी राज्य का उद्यम'' शब्दों से क्रमश: एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा संचालित कोर्इ उद्यम तथा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा संचालित कोर्इ उद्यम अभिप्रेत है;
(छ) ''कर'' शब्द से संदर्भ के अनुसार भारतीय कर अथवा थार्इ कर अभिप्रेत है, परंतु इसमें ऐसी कोर्इ रकम शामिल नहीं होगी, जो उन करों के संबंध में किसी भूल अथवा चूक के संदर्भ में देय हो, जिन पर यह करार लागू होता हो अथवा उन करों के संबंध में लगाए गए अर्थदंड अथवा जुर्माने का द्योतक हो, जैसा भी प्रसंग की अपेक्षा हो;
(ज) ''राष्ट्रिक'' शब्द से अभिप्रेत है:
(i) किसी एक संविदाकारी राज्य की राष्टीयता धारण करने वाला कोई व्यक्ति;
(ii) कोर्इ विधिक व्यक्ति, भागीदारी, एसोसिएशन एवं कोर्इ अन्य संस्था, जिसे अपनी इस तरह की हैसियत किसी संविदाकारी राज्य में प्रवृत कानूनों से प्राप्त होती हो;
(झ) ''अंर्तराष्ट्रीय यातायात'' शब्दों से अभिप्रेत है - एक संविदाकारी राज्य से किसी उद्यम द्वारा परिचालित किसी जलयान अथवा वायुयान द्वारा परिवहन से है सिवाए उस स्थिति के जब जलयान अथवा वायुयान केवल दूसरे संविदाकारी राज्य के स्थानों के बीच ही चलाया जाता हो; और
(ञ) ''सक्षम प्राधिकारी'' शब्द से अभिप्रेत है, भारत के मामले में वित्त मंत्री, भारत सरकार अथवा उसका प्राधिकृत प्रतिनिधि, और थार्इलैंड के मामले में वित्त मंत्री अथवा उसका प्राधिकृत प्रतिनिधि।
(ट) ''राजकोषीय वर्ष'' शब्द से अभिप्रेत है:
(i) भारत के मामले में, अप्रैल की पहली तारीख से शुरू होने वाला वित्तीय वर्ष;
(ii) थार्इलैंड के मामले में, जनवरी की पहली तारीख से शुरू होने वाला प्रभार वर्ष।
2. किसी संविदाकारी राज्य द्वारा जहां तक किसी भी समय इस करार को लागू किए जाने का प्रश्न है, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उसमें अपरिभाषित किसी शब्द का वही अर्थ होगा जो उस करों के प्रयोजनों के लिए उस राज्य, जिस पर यह करार लागू होता है, के कानूनों के अंतर्गत उस समय होता है और यह अर्थ उस राज्य में लागू किए जाने वाले कर कानूनों के अंतर्गत लगाए गए अर्थ पर प्रभावी होगा जो उस राज्य के कर कानूनों के अंतर्गत लगाए जाते हैं।
अनुच्छेद 4
निवासी
1. इस करार के प्रयोजन से ''किसी संविदाकारी राज्य का निवासी'' शब्द का अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति से है जिस पर उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत उसके अधिवास, निवास निगमन का स्थान, प्रबंध-स्थान अथवा इसी स्वरूप के किसी ऐसे ही कारण से कर लगाया जा सकता है और, इसमें वह राज्य और इसका कोर्इ राजनयिक उप-प्रभाग अथवा कोर्इ स्थानीय प्राधिकरण शामिल है। तथापि, इस शब्द में कोर्इ ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं होगा जिस पर केवल उस राज्य में स्थित स्रोत से होने वाली आय पर उस राज्य में कर लगाया जा सकता है।
2. जहां पैराग्राफ 1 के उपबंधों के कारण यदि कोर्इ व्यक्ति दोनों ही संविदाकारी राज्यों का निवासी हो, वहां उसकी हैसियत निम्नानुसार तय की जाएगी:
(क) उसे उसी राज्य का निवासी माना जाएगा जहां उसे एक स्थायी निवास-गृह उपलब्ध हो; यदि उसे दोनों ही राज्यों में कोर्इ स्थायी निवास-गृह उपलब्ध हो, तो वह उस राज्य का एक निवासी माना जाएगा, जिसके साथ उसके व्यक्तिगत और आर्थिक संबंध घनिष्ठतर हैं (महत्वपूर्ण हितों का केन्द्र);
(ख) यदि उस राज्य का जिसमें उसके महत्वपूर्ण हित निहित हैं; निर्धारण नहीं किया जा सकता हो अथवा यदि उसे दोनों राज्यों में से किसी भी राज्य में कोर्इ स्थायी निवास-गृह उपलब्ध नहीं हो, तो उसे उस राज्य का निवासी माना जाएगा जिसमें उसका पारंपरिक निवास हो;
(ग) यदि वह पारंपरिक रूप से दोनों ही राज्यों में रहता हो अथवा उनमें से किसी भी राज्य में नहीं रहता हो, तो वह उस राज्य का निवासी माना जाएगा जिसका वह एक राष्ट्रिक है;
(घ) यदि वह दोनों राज्यों का निवासी है या दोनों में से किसी का भी नहीं है, तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी पारस्परिक सहमति से इस प्रश्न का समाधान करने का प्रयास करेंगे।
3. जहाँ इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 के उपबंधों के कारण किसी व्यष्टि से भिन्न कोर्इ व्यक्ति दोनों संविदाकारी राज्यों का निवासी हो, तो उसे केवल उस राज्य का निवासी माना जाएगा जिसमें उसका प्रभावी प्रबंध स्थान स्थित है। यदि उस राज्य का निर्धारण नहीं किया जा सकता हो जिसमें उसका प्रभावी प्रबंध स्थान स्थित है तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी पारस्परिक सहमति से इस प्रश्न का समाधान करने का प्रयास करेंगे।
अनुच्छेद 5
स्थायी संस्थापन
1. इस करार के प्रयोजनार्थ स्थायी संस्थापन पद का आशय कारोबार के उस निश्चित स्थान से है, जिसके द्वारा किसी उद्यम का कारोबार सम्पूर्णत: अथवा अशंत: किया जाता है।
2. ''स्थायी संस्थापन'' पद में विशेषतया निम्नलिखित शामिल होंगे:
(क) प्रबंध का कोर्इ स्थान
(ख) कोर्इ शाखा
(ग) कोर्इ कार्यालय;
(घ) कोर्इ कारखाना;
(ड.) कोर्इ कार्यशाला;
(च) कोर्इ बिक्री केन्द्र;
(छ) कोर्इ फार्म, बागान अथवा अन्य स्थान जहां कृषि, वानिकी, बागवानी अथवा इससे संबंधित कार्यकलाप किए जाते हों;
(ज) कोर्इ खान, तेल अथवा गैस का कुँआ, खदान अथवा प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण का कोर्इ अन्य स्थान; और किसी व्यक्ति से संबंधित कोर्इ भाण्डागार, जो दूसरों को भण्डारण सुविधाएं मुहैया कराता हो।
(झ) किसी व्यक्ति से संबंधित कोर्इ भाण्डागार, जो दूसरों को भण्डारण सुविधाएं मुहैया कराता हो।
3. ''स्थायी संस्थापन'' शब्द में ये भी सम्मिलित होंगे:
(क) कोर्इ भवन-स्थल, कोर्इ निर्माण, प्रस्थापन अथवा संयोजन परियोजना अथवा उससे संबंधित पर्यवेक्षी कार्यकलाप, जहां ऐसा भवन स्थल, परियोजना अथवा कार्यकलाप कुल 183 दिन या इससे अधिक समय तक जारी रहे;
(ख) सेवाएं प्रस्तुत करना, जिसमें इस प्रयोजन हेतु उद्यम में लगे हुए कर्मचारियों अथवा अन्य कार्मिकों के माध्यम से किसी उद्यम की परामर्शी सेवाएं शामिल हैं, परंतु वहीं जहां उस स्वरूप् के क्रियाकलाप किसी 12 महीने की अवधि के भीतर कुल मिलाकर 183 दिन से अधिक की अवधि या अवधियों के लिए संविदाकारी राज्य के भीतर जारी रहती हों (उसी अथवा संबद्ध परियोजना हेतु)।
4. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के बावजूद भी ''स्थायी संस्थापन'' पद में निम्नलिखित को शामिल नहीं समझा जाएगा:
(क) उद्यम से संबंधित माल अथवा पण्य-वस्तुओं के मात्र भण्डारण अथवा प्रदर्शन के प्रयोजनार्थ सुविधाओं का इस्तेमाल करना;
(ख) मात्र भण्डारण अथवा प्रदर्शन के प्रयोजनार्थ उद्यम से संबंधित माल अथवा पण्य वस्तुओं के किसी स्टॉक का रख-रखाव करना;
(ग) किसी अन्य उद्यम द्वारा केवल संसाधित किए जाने के प्रयोजनार्थ उद्यम के माल अथवा पण्य-वस्तुओं के स्टॉक का रख-रखाव करना;
(घ) उद्यम के लिए माल अथवा पण्य-वस्तुओं का केवल क्रय करने के लिए अथवा सूचना एकत्र करने के लिए कारोबार के किसी निश्चित स्थान का रख-रखाव करना;
(ड.) उद्यम के लिए केवल प्रारम्भिक अथवा सहायक स्वरूप के किसी अन्य कार्यकलाप को चलाने के प्रयोजनार्थ कारोबार के लिए निश्चित स्थान का रख-रखाव करना;
(च) उप-पैराग्राफ (क) से (ड.) तक में उल्लिखित केवल किन्हीं कार्य-कलापों के संयोजन के लिए व्यवसाय के किसी निश्चित स्थान का रख-रखाव करना, बशर्ते कि इस संयोजन के परिणामस्वरूप कारोबार के निश्चित स्थान का समस्त कार्यकलाप किसी प्रारम्भिक या सहायक स्वरूप का हो।
5. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंधों के होते हुए भी, जहां स्वतंत्र हैसियत के किसी अभिकर्ता, जिस पर पैराग्राफ - 7 लागू होता हो, से भिन्न कोर्इ व्यक्ति अन्य संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम की ओर से एक संविदाकारी राज्य में कार्य करता है, वहां प्रथमोल्लिखित संविदाकारी राज्य में उस उद्यम के स्थायी संस्थापन का होना माना जाएगा, यदि ऐसे व्यक्ति को;
(क) उस उद्यम के नाम से उस राज्य में संविदाएं सम्पन्न करने का प्राधिकार प्राप्त हो और वह पारंपरिक रूप से उस प्राधिकार का प्रयोग भी करता हो, जब तक कि ऐसे व्यक्ति की गतिविधियाँ पैराग्राफ 4 में उल्लिखित उन गतिविधियों तक सीमित न हों, जिन्हें यदि वह कारोबार के एक निश्चित स्थान के माध्यम से प्रयोग करता है, को उस पैराग्राफ के उपबंधों के अधीन कारोबार के इस निश्चित स्थान को एक स्थायी संस्थापन नहीं बनाएगा; अथवा
(ख) ऐसा कोर्इ प्राधिकार प्राप्त नहीं हो, किंतु वह फिर भी पारंपरिक रूप से प्रथमोल्लिखित राज्य में उद्यम से संबंधित ऐसे माल अथवा पण्य-वस्तुओं का स्टॉक रखता हो जिसमें से वह उद्यम की ओर से माल अथवा पण्य-वस्तुओं की नियमित रूप से डिलीवरी करता हो; या
(ग) ऐसा प्राधिकार न रखता हो, किंतु स्वयं उद्यम के लिए पूर्णतया अथवा लगभग पूर्णतया प्रथमोल्लिखित राज्य में पारंपरिक रूप से कार्य का आर्डर प्राप्त करता हो।
6. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के होते हुए भी, एक संविदाकारी राज्य के किसी बीमा उद्यम को पुन: बीमा करने के मामले को छोड़कर, दूसरे संविदाकारी राज्य में एक स्थायी संस्थापन का होना तभी माना जाएगा, यदि वह स्वतंत्र हैसियत वाले किसी एजेंट, जिस पर पैराग्राफ 7 लागू होता हो, से भिन्न किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से उस अन्य राज्य के क्षेत्र में बीमें का प्रीमियम एकत्र करता है अथवा वहां स्थित जोखिमों का बीमा करता है।
7. किसी उद्यम का किसी संविदाकारी राज्य में मात्र इस कारण कोर्इ स्थायी संस्थापन का होना नहीं माना जाएगा कि वह उस राज्य में किसी दलाल, सामान्य कमीशन एजेंट अथवा स्वतंत्र हैसियत वाले किसी अन्य एजेंट के माध्यम से कारोबार करता है, बशर्ते कि ऐसे व्यक्ति अपने कारोबार का काम सामान्य रूप से कर रहे हों। तथापि, जब ऐसे किसी एजेंट के कार्यकलाप पूर्णत: अथवा लगभग पूर्णत: उस उद्यम की ओर से किए जाते हों, तो उसे इस पैराग्राफ के अभिप्राय के अंतर्गत स्वतंत्र हैसियत का एजेंट नहीं समझा जाएगा।
8. यह तथ्य कि कोर्इ कम्पनी, जो एक संविदाकारी राज्य की निवासी है, किसी ऐसी कम्पनी को नियंत्रित करती है अथवा किसी ऐसी कम्पनी द्वारा नियंत्रित होती है, जो दूसरे संविदाकारी राज्य की निवासी है अथवा जो उस दूसरे राज्य में (चाहे किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से अथवा अन्यथा) कारोबार करती है, को उन दोनों में से किसी कम्पनी को स्वत: ही दूसरे का स्थायी संस्थापन नहीं माना जाएगा।
अनुच्छेद 6
1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकता है।
2. ''अचल सम्पत्ति'' पद का अर्थ वही होगा जो उस संविदाकारी राज्य जिसमें विचाराधीन सम्पत्ति स्थित है, के कानूनों के अंतर्गत उसका अर्थ है। इस पद में, किसी भी हालत में, ये शामिल होंगे - अचल सम्पत्ति के अवसाधन के रूप में सम्पत्ति, कृषि और वानिकी में प्रयुक्त पशुधन और उपस्कर, ऐसे अधिकार जिन पर भू-सम्पत्ति संबंधी सामान्य कानून के उपबंध लागू होते हों, अचल सम्पत्ति को भोगने के अधिकार और खनिज भण्डार, स्रोत तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए अथवा दोहन के अधिकार के प्रतिफल के रूप में परिवर्तनीय अथवा नियत अदायगियों के अधिकार; जलयान, नाव और वायुयान अचल सम्पत्ति के रूप में नहीं माने जाएंगे।
3. पैराग्राफ 1 के उपबंध, अचल सम्पित्त के प्रत्यक्ष उपयोग, उसे किराए पर देने अथवा इसके किसी अन्य प्रकार के प्रयोग से उदभूत होने वाली आय पर लागू होंगे।
4. पैराग्राफ 1 और 3 के उपबंध, किसी उद्यम की अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर तथा स्वतंत्र व्यक्तिगत सेवाओं के निष्पादन के लिए प्रयुक्त अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर भी लागू होंगे।
अनुच्छेद 7
कारोबार से लाभ
1. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के लाभों पर केवल उसी राज्य में कर लगाया जाएगा जब तक कि वह उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से उस राज्य में कारोबार नहीं करता हो। यदि उक्त उद्यम उपर्युक्त तरीके से कारोबार करता हो तो उस उद्यम के लाभों पर दूसरे राज्य में भी कर लगाया जा सकता है, किंतु उसके लाभों के केवल उतने अंश पर ही कर लगेगा जो उस स्थायी संस्थापन को प्राप्त हुए माने जाएंगे।
2. पैराग्राफ 3 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां एक संविदाकारी राज्य का कोर्इ उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता हो, वहां प्रत्येक संविदाकारी राज्य में ऐसे स्थायी संस्थापन के कारण हुए लाभ, वे लाभ माने जाएंगे जिनके होने की संभावना तब होगी जब एक समान या उससे मिलती-जुलती परिस्थितियों में एक समान या मिलते-जुलते कार्यकलापों में लगे हुए कोर्इ और भिन्न उद्यम हो और वह उस उद्यम के साथ पूर्णत: स्वतंत्र रूप से कारोबार करता है जिसका वह एक स्थायी संस्थापन है।
3. किसी स्थायी संस्थापन के लाभों के निर्धारण करने में, उस राज्य के कानूनों के उपबंधों और उसकी सीमाओं के अध्याधीन उन खर्चों की कटौती की अनुमति दी जाएगी, जो उस स्थायी संस्थापन के प्रयोजनार्थ खर्च किए जाते हैं, जिनमें इस प्रकार लगाए एग कार्यकारी एवं सामान्य प्रशासनिक व्यय भी शामिल हैं, भले ही वे उस राज्य में उस राज्य के कर कानूनों के उपबंधों और उनकी परिसीमाओं के अनुसार किए गए हों, जिसमें स्थायी संस्थापन स्थित है अथवा अन्यत्र किए गए हों।
4. जहां एक संविदाकारी राज्य में उद्यम के कुल लाभ को उसके विभिन्न भागों में प्रभाजन के आधार पर एक स्थायी संस्थापन को होने वाले लाभ का निर्धारण करने की प्रथा हो, वहां पैराग्राफ 2 की कोर्इ भी बात उस संविदाकारी राज्य में प्रचलित पद्धति से कर योग्य लाभ का निर्धारण करने से प्रतिबाधित नहीं करेगी; तथापि, अपनार्इ गर्इ विधि ऐसी होगी कि उसका परिणाम उस अनुच्छेद में निहित सिद्धांतों के अनुकूल होगा।
5. कोर्इ लाभ, केवल इस कारण से किसी स्थायी संस्थापन को हुआ नहीं माना जाएगा कि उस स्थायी संस्थापन ने उद्यम के लिए माल अथवा पण्य-वस्तुएं खरीदी हैं।
6. पूर्ववर्ती पैराग्राफों के प्रयोजनार्थ स्थायी संस्थापन के कारण हुए लाभों को तब तक वर्षानुवर्ष उसी पद्धति से निर्धारित किया जाता रहेगा, जब तक कि उसके विपरीत कोर्इ ठोस तथा पर्याप्त कारण नहीं हो।
7. जहां लाभों में आय की ऐसी मदें शामिल होती हैं, जिनका इस करार के अन्य अनुच्छेदों में अलग से विवेचन किया गया है, वहां उन अनुच्छेदों के उपबंध इस अनुच्छेद के उपबंधों से प्रभावित नहीं होंगे।
अनुच्छेद 8
जहाजरानी और वायु परिवहन
1. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा अंतरराष्ट्रीय यातायात में वायुयानों के प्रचालन से प्राप्त होने वाले आय या लाभों पर केवल उसी संविदाकारी राज्य में कर लगाया जाएगा।
2. अंर्तराष्ट्रीय यातायात में जलपोतों के संचालन से एक संविदाकारी राज्य के उद्यम द्वारा उद्भूत आय या लाभों पर अन्य संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकता है परंतु दूसरे राज्य में प्रभारित कर उसके 50 प्रतिशत तक के बराबर राशि तक कम किया जाएगा।
3. ''जलपोतों या वायुयानों के संचालन'' शब्द का अर्थ अंर्तराष्ट्रीय यातायात में व्यक्तियों, डाक, पशुधन या माल का जलयानों अथवा वायुयानों से परिवहन का व्यवसाय होगा जिसमें ये भी शामिल हैं-
(i) ऐसे परिवहन के संबंध में जलपोतों अथवा वायुयानों की आनुषंगिक पट्टेदारी;
(ii) ऐसे परिवहन के संबंध में कंटेनरों का प्रयोग रखरखाव या भाड़ा; और
(iii) अन्य कोर्इ गतिविधि जो ऐसे परिवहन से प्रत्यक्ष रूप में जुड़ी हो।
4. पैराग्राफ 1 तथा 2 के प्रयोजनार्थ अंर्तराष्ट्रीय यातायात में जलपोतों अथवा वायुयानों के संचालन से प्रत्यक्ष रूप में जुड़ी निधि पर ब्याज को ऐसे जलपातों अथवा वायुयानों के संचालन से आय माना जाएगा।
5. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध किसी पूल में भागीदारी, किसी संयुक्त उद्यम अथवा किसी अंर्तराष्ट्रीय प्रचालन एजेंसी से प्राप्त आय या लाभों पर भी लागू होंगे।
अनुच्छेद 9
सहयोगी उद्यम
1. जहां
(क) एक संविदाकारी राज्य का कोर्इ उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के प्रबंधन, नियंत्रण अथवा पूंजी में प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: भाग लेता है; अथवा
(ख) वे ही व्यक्ति, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम और दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के प्रबंध, नियंत्रण अथवा पूंजी में प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: भाग लेते हैं;
और दोनों में से किसी भी अवस्था में दोनों उद्यमों के बीच उनके वाणिज्यिक अथवा वित्तीय संबंधों में ऐसी शर्तें रखी अथवा लगार्इ जाती हैं जो उन शर्तों से भिन्न है, जो स्वतंत्र उद्यमों के बीच रखी जाएगी तो ऐसा कोर्इ भी लाभ जो उन शर्तों के नहीं होने की स्थिति में उन उद्यमों में से एक उद्यम को प्राप्त हुआ होता, किन्तु उन शर्तों के कारण इस प्रकार प्राप्त नहीं हुआ, तो वे लाभ उस उद्यम के लाभों में शामिल किए जा सकेंगे और उन पर तद्नुसार कर लगाया जा सकेगा।
2. जहां एक संविदाकारी राज्य उस राज्य के किसी उद्यम के लाभों में उन लाभों को सम्मिलित करता है और तद्नुसार कर लगाता है जिस पर दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया गया है और उसमें सम्मिलित किए गए लाभ ऐसे लाभ हैं जो प्रथमोल्लिखित राज्य के उद्यम को उस स्थिति में प्राप्त हुए होते यदि दोनों उद्यमों के बीच लगार्इ गर्इ शर्तें उस तरह की होती जो स्वतंत्र उद्यमों के बीच लगार्इ गर्इ होती, तब वह दूसरा राज्य उन लाभों पर उसमें प्रभारित कर की राशि के बराबर समुचित समायोजन करेगा। इस प्रकार के समायोजन को निश्चित करने में इस करार के अन्य उपबंधों को यथोचित रूप से ध्यान में रखना होगा और यदि आवश्यक हो, तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी एक दूसरे के साथ परामर्श करेंगे।
अनुच्छेद 10
लाभांश
1. एक संविदाकारी राज्य की निवासी किसी कम्पनी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए लाभांश उस दूसरे राज्य में कराधेय होंगे।
2. तथापि, ऐसे लाभांशों पर उस संविदाकारी राज्य में भी और उस राज्य के कानून के अनुसार कर लगाया जा सकेगा जिसका लाभांश अदा करने वाली कम्पनी एक निवासी है, परंतु यदि लाभांश का हितभागी स्वामी अन्य संविदाकारी राज्य का एक निवासी है तो इस प्रकार प्रभार्य कर लाभांशों की सकल राशि के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।
यह पैराग्राफ उन लाभों के संबंध में कम्पनी के कराधान को प्रभावित नहीं करेगा जिसमें से लाभांश अदा किए गए हैं।
3. इस अनुच्छेद में यथा प्रयुक्त ''लाभांश'' पद का अभिप्राय शेयरों अथवा अन्य अधिकारों से प्राप्त आय से है जो लाभ की भागीदारिता के ऋण के दावे न हों, और अन्य अधिकारों से प्राप्त आय से है जिस पर वही कराधान व्यवस्था लागू होती है जो उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत शेयरों से प्राप्त आय पर लागू होती है, जिसकी वितरण करने वाली कम्पनी एक निवासी है।
4. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होगें, यदि लाभांशों का हितभागी स्वामी जो एक संविदाकारी राज्य का निवासी होने के कारण दूसरे संविदाकारी राज्य में वहां स्थित एक स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता है, जिसकी लाभांश अदा करने वाली कम्पनी निवासी है अथवा उस दूसरे राज्य में स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं प्रदान करता है और जिस सम्पत्ति के संबंध में लाभांशों की अदायगी की जाती है वहां वह इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध है। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 7 या अनुच्छेद 14, जैसा भी मामला हो, के उपबंध लागू होंगे।
5. जहां कोर्इ कम्पनी, जो एक संविदाकारी राज्य की निवासी है, दूसरे संविदाकारी राज्य से लाभ अथवा आय प्राप्त करती है, वहाँ दूसरा राज्य कम्पनी द्वारा अदा किए गए लाभांशों पर, किसी भी प्रकार का कर नहीं लगाएगा, जब तक कि ऐसे लाभांश उस दूसरे राज्य के किसी निवासी को अदा किए जाते हों, अथवा जब तक कि जिस सम्पत्ति के बारे में लाभांशों की अदायगी की जाती हो, वह उस दूसरे राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन या किसी नियत स्थान से प्रभावी रूप से संबद्ध हो और न ही कम्पनी के अवितरित लाभों पर कर लगाया जाएगा, चाहे अदा किए गए लाभांश अथवा अवितरित लाभ पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से उस दूसरे राज्य में उद्भूत होने वाले लाभ अथवा आय के रूप में हों।
अनुच्छेद 11
ब्याज
1. एक संविदाकारी राज्य में उत्पन्न होने वाले तथा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए ब्याज पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
2. तथापि, इस प्रकार के ब्याज पर उस संविदाकारी राज्य में भी और उस राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जा सकेगा जिस राज्य में वह उद्भूत होता है, किन्तु यदि ब्याज का हितभागी स्वामी दूसरे संविदाकारी राज्य का निवासी है तो इस प्रकार प्रभारित कर, ब्याज की सकल रकम के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।
3. पैराग्राफ 2 के उपबंधों के होते हुए भी, एक संविदाकारी राज्य में उद्भूत ब्याज पर उस राज्य में कर से छूट प्राप्त होगी बशर्ते कि उसे निम्नलिखित के द्वारा प्राप्त किया गया हो और हितभागी रूप से अपने स्वामित्व में रखा गया हो:
(क) दूसरे संविदाकारी राज्य की सरकार, उसका कोर्इ राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा कोर्इ स्थानीय प्राधिकरण; अथवा
(i) भारत के मामले में, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय निर्यात-आयात बैंक;
(ii) थार्इलैंड के मामले में, बैंक ऑफ थार्इलैंड, थार्इलैंड का निर्यात-आयात बैंक;
(ग) कोर्इ अन्य संस्थान जिस पर संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारियों के बीच समय-समय पर सहमति हुर्इ हो।
4. इस अनुच्छेद में यथा - प्रयुक्त ''ब्याज'' शब्द से अभिप्रेत है - प्रत्येक प्रकार के ऋण संबंधी दावों से प्राप्त आय, चाहे वे बंधक द्वारा प्रतिभूत हों अथवा नहीं और चाहे उन्हें ऋण-दाता के लाभ में भागीदारी का कोर्इ अधिकार प्राप्त हो अथवा नहीं हो और विशेष रूप से सरकारी प्रतिभूतियों से, प्राप्त आय और बंधपत्रों अथवा ऋण-पत्रों से प्राप्त आय जिसमें ऐसी प्रतिभूतियों, बंधपत्रों अथवा ऋण-पत्रों से संबंधित प्रीमियम और पुरस्कार तथा जिस संविदाकारी राज्य में आय बनती है उसके कारधान कानूनों के तहत उधार दी गर्इ राशि से प्राप्त आय को इकट्ठा करना शामिल हों। विलम्बित अदायगी के लिए अर्थदंड संबंधी प्रभारों को इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए ब्याज नहीं समझा जाएगा।
5. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होंगे, यदि ब्याज का हितभागी स्वामी, संविदाकारी राज्य का निवासी होने से दूसरे संविदाकारी राज्य में, जिसमें ब्याज उदभूत हुआ हो, उसमें स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता हो अथवा उस दूसरे राज्य में, उसमें स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता हो और जिस ऋण-दावे के बारे में ब्याज अदा किया गया हो वह इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध हो। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 7 या 14, जैसा भी मामला हो, के उपबंध लागू होंगे।
6. ब्याज किसी संविदाकारी राज्य में उद्भूत हुआ माना जाएगा, यदि ब्याज अदा करने वाला उस राज्य का निवासी हो। तथापि, जहां ब्याज अदा करने वाले व्यक्ति का, चाहे वह किसी संविदाकारी राज्य का निवासी हो अथवा नहीं किसी संविदाकारी राज्य में एक स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान है और इस संबंध में ऋण जिस पर ब्याज प्रदत्त किया गया था, इस प्रकार का ब्याज इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन किया जाता है, तो इस प्रकार का ब्याज उस राज्य में उद्भूत हुआ माना जाएगा जिसमें वह स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान स्थित है।
7. जहां, अदा करने वाले और हितभागी स्वामी अथवा उन दोनों के बीच तथा किसी अन्य व्यक्ति के बीच विशेष संबंध होने के कारण अदा की गर्इ ब्याज की रकम, उस ऋणदावे को ध्यान में रखते हुए जिसके लिए यह रकम अदा की गर्इ है, उस रकम से बढ़ जाती है, जिसके संबंध में इस प्रकार के संबंध नहीं होने की स्थिति में अदा करने वाले और हितभागी स्वामी के बीच सहमति हो गर्इ होती, वहां इस अनुच्छेद के उपबंध अंतिम रूप से वर्णित रकम पर ही लागू होंगे। ऐसे मामले में अदायगियों के आधिक्य भाग पर इस करार के अन्य उपबंधों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संविदाकारी राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जाएगा।
अनुच्छेद 12
रायल्टियां
1. एक संविदाकारी राज्य में उत्पन्न होने वाले तथा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए रायल्टियों पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
2. तथापि, इस प्रकार की रायल्टी पर उस संविदाकारी राज्य में भी और उस राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जा सकेगा जिस राज्य में वह उद्भूत होता है, किन्तु यदि रायल्टी का हितभागी स्वामी दूसरे संविदाकारी राज्य का निवासी है तो इस प्रकार प्रभारित कर, रायल्टी की सकल रकम के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।
3. इस अनुच्छेद में यथा-प्रयुक्त ''रायल्टियां'' शब्द का अभिप्राय है - किसी साहित्यिक, कलात्मक अथवा वैज्ञानिक कृति के किसी कापीराइट, जिसमें सिनेमाटोग्राफ फिल्में अथवा रेडियो अथवा दूरदर्शन प्रसारण के लिए फिल्में अथवा टेपें शामिल हैं, किसी पेटेंट, ट्रेडमार्क, डिजाइन अथवा मॉडल, प्लान, गुप्त फार्मूला अथवा किसी औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा वैज्ञानिक उपकरण के प्रयोग हेतु अथवा प्रयोगाधिकार हेतु अथवा औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा वैज्ञानिक अनुभव से संबंधित सूचना के लिए प्रतिफल के रूप में प्राप्त की गर्इ किसी भी प्रकार की अदायगियां।
4. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होंगे, यदि रॉयल्टी का हितभागी स्वामी, संविदाकारी राज्य का निवासी होने से दूसरे संविदाकारी राज्य में, जिसमें रॉयल्टी उदभूत हुर्इ हो, उसमें स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता हो अथवा उस दूसरे राज्य में, उसमें स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता हो और जिस संपत्ति के अधिकार के बारे में रॉयल्टी अदा की गयी हो वह इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध हो। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 7 या अनुच्छेद 14, जैसा भी मामला हो, के उपबंध लागू होंगे।
5. एक संविदाकारी राज्य में रायल्टियां तब उद्भूत हुर्इ मानी जाएंगी, जब अदाकर्ता स्वयं वह राज्य एक राजनैतिक उप प्रभाग, स्थानीय प्राधिकारी अथवा उस राज्य का कोर्इ निवासी हो। तथापि, जहां रायल्टी अदा करने वाले व्यक्ति का, चाहे वह किसी संविदाकारी राज्य का निवासी हो अथवा नहीं किसी संविदाकारी राज्य में एक स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान है और इस संबंध में दायित्व जिस पर रायल्टी प्रदत्त किया गया था, इस प्रकार की रायल्टी इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन किया जाता है, तो इस प्रकार की रायल्टी उस राज्य में उदभूत हुआ मानी जाएगी जिसमें वह स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान स्थित है।
6. जहां, अदाकर्ता तथा हितभागी स्वामी के बीच अथवा उन दोनों और किसी अन्य व्यक्ति के बीच किसी विशेष प्रकार का संबंध होने के कारण रायल्टियाँ प्रयोग, प्रयोगाधिकार के संबंध में जिस के लिए वह अदा की जाती है, किसी भी कारण से उस राशि से अधिक हो जाती है जिस पर ऐसे संबंधों की अनुपस्थिति में अदाकर्ता तथा हितभागी स्वामी द्वारा सहमति हो गर्इ होती, वहां उस अनुच्छेद के उपबंध केवल अंतिम वर्णित रकम पर लागू होंगे। ऐसे मामले में अदायगियों के आधिक्य भाग पर इस करार के अन्य उपबंधों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संविदाकारी राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जाएगा।
अनुच्छेद 13
पूंजीगत लाभ
1. अनुच्छेद 6 में उल्लिखित और दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित अचल सम्पत्ति के अंतरण से एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा प्राप्त अभिलाभों पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
2. ऐसी चल संपत्ति के अंतरण से होने वाले अभिलाभ पर, जो एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम की दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन की कारोबार संपत्ति का एक हिस्सा है अथवा किसी निश्चित स्थान से संबंधित ऐसी चल संपत्ति के अंतरण से प्राप्त होने वाले अभिलाभ पर, जो संपत्ति एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को दूसरे संविदाकारी राज्य में स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करने के प्रयोजनार्थ उपलब्ध है, जिसमें किसी ऐसे स्थायी संस्थापन (अकेले अथवा पूर्ण उद्यम के साथ) अथवा ऐसे निश्चित स्थान के अंतरण से होने वाले ऐसे अभिलाभ भी शामिल हैं, पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
3. अंर्तराष्ट्रीय यातायात में चलाए जाने वाले जलयानों अथवा वायुयानों के अंतरण से अथवा इस प्रकार के जलयानों, वायुयानों के परिचालन से संबंधित चल सम्पत्ति से प्राप्त अभिलाभों पर केवल उस संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जिसका वह बिक्रेता निवासी है।
4. किसी ऐसी कंपनी, जिसकी मुख्यत: अचल संपत्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी संविदाकारी राज्य में स्थित है, उसके पूंजी स्कंध के शेयरों के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर उस राज्य में कर लगाया जा सकता है।
5. किसी कंपनी, जो संविदाकारी राज्य की निवासी है, पर पैराग्राफ 4 में उल्लिखित के अलावा शेयरों के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर उस राज्य में कर लगाया जा सकता है।
6. पैराग्राफ 1, 2, 3, 4 तथा 5 में उल्लिखित संपत्ति से भिन्न किसी भी संपत्ति के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर संबंधित संविदाकारी राज्यों के कराधान कानूनों के अनुसार कर लगेगा।
अनुच्छेद 14
स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं
1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा व्यावसायिक सेवाओं के निष्पादन अथवा इसी प्रकार के स्वतंत्र स्वरूप वाले अन्य कार्य-कलापों से प्राप्त आय पर केवल उसी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, परंतु निम्नलिखित परिस्थितियों को छोड़कर जब ऐसी आय पर दूसरे संविदाकारी राज्य में भी कर लगाया जा सकेगा :
(क) यदि उसका अपने कार्य-कलापों के निष्पादन के प्रयोजनार्थ, दूसरे संविदाकारी राज्य में एक निश्चित स्थान नियमित रूप से उपलब्ध है तो उस मामले में उस दूसरे राज्य में केवल उतनी आय पर ही कर लगाया जा सकेगा जो उस निश्चित स्थान के कारण उद्भूत हुर्इ मानी जा सकती है; अथवा
(ख) यदि दूसरे संविदाकारी राज्य में उसके ठहरने की अवधि या अवधियां संबंधित किसी बारह महीने की अवधि में कुल मिलाकर 183 दिन अथवा उससे अधिक दिन हों, तो उस मामले में, आय के केवल उतने ही भाग पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जो उस दूसरे राज्य में उसके द्वारा निष्पादित कार्य-कलापों से प्राप्त हुर्इ हो।
2. ''व्यावसायिक सेवाएं'' पद में स्वतंत्र वैज्ञानिक, साहित्यिक, कलात्मक, शैक्षिक अथवा अध्यापन संबंधी कार्य-कलाप तथा चिकित्सकों, वकीलों, इंजीनियरों, वास्तु-विदों, शल्य-चिकित्सकों, दंत चिकित्सकों तथा लेखाकारों के स्वतंत्र कार्य-कलाप शामिल है।
अनुच्छेद 15
परावलम्बित वैयक्तिक सेवाएं
1. अनुच्छेद 16, 18, 19, 20 और 21 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा किसी नियोजन के संबंध में प्राप्त वेतनों, मजदूरियों और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में कर लगेगा, जब तक कि नियोजन का निष्पादन दूसरे संविदाकारी राज्य में नहीं किया गया हो। यदि ऐसा नियोजन किया गया है, तो जो पारिश्रमिक वहां से प्राप्त होता है, उस पर उस दूसरे राज्य में कर लग सकेगा।
2. पैराग्राफ 1 के उपबंधों के बावजूद, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए किसी नियोजन के संबंध में प्राप्त पारिश्रमिक पर केवल प्रथमोल्लिखित राज्य में कर लगाया जा सकेगा, यदि :
(क) प्राप्तकर्ता, संबंधित वित्तीय वर्ष में समाप्त अथवा प्रारंभ हुए किसी बारह महीने की ऐसी अवधि अथवा अवधियों के लिए दूसरे राज्य में रह रहा है जो कुल मिलाकर 183 दिनों से अधिक नहीं हैं;
(ख) पारिश्रमिक ऐसे किसी नियोजक द्वारा अथवा उसकी ओर से अदा किया गया है, जो दूसरे राज्य का निवासी नहीं हैं; और
(ग) पारिश्रमिक ऐसे किसी स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन नहीं किया जाता है, जो नियोजक का दूसरे राज्य में हो।
3. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के बावजूद, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा अंर्तराष्ट्रीय यातायात में संचालित किसी पोत अथवा वायुयान पर किए गए नियोजन के संबंध में प्राप्त पारिश्रमिक पर, उस राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 16
निदेशकों की फीस
निदेशकों की फीस और इसी तरह की अन्य अदायगियों पर जो एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा किसी कम्पनी, जो दूसरे संविदाकारी राज्य की निवासी है, के निदेशक मंडल के सदस्य की हैसियत से प्राप्त की गर्इ हो, पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 17
कलाकार और खिलाड़ी
1. अनुच्छेद 14 और 15 के उपबंधों के बावजूद भी, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा मनोरंजनकर्ता, जैसे कि कोर्इ थिएटर, चलचित्र, रेडियो या दूरदर्शन कलाकार अथवा किसी संगीतकार अथवा किसी खिलाड़ी के रूप में दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए इस प्रकार के अपने वैयक्तिक कार्य-कलापों से प्राप्त आय पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।
2. जहां किसी मनोरंजनकर्ता अथवा किसी खिलाड़ी द्वारा अपने इस प्रकार की हैसियत में किए गए वैयक्तिक कार्य-कलापों के संबंध में प्राप्त आय स्वयं मनोरंजनकर्ता या खिलाड़ी को प्राप्त नहीं हो, अपितु किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त हो, ऐसी आय पर अनुच्छेद 7, 14 और 15 के उपबंधों के बावजूद, उस संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जिसमें मनोरंजनकर्ता अथवा खिलाड़ी के कार्य-कलाप किए जाते हों।
3. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध किसी मनोरंजनकर्ता अथवा किसी खिलाड़ी द्वारा, किसी संविदाकारी राज्य में निष्पादित कार्य-कलापों से प्राप्त आय पर लागू नहीं होंगे यदि दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए कार्य-कलाप एक या दोनों संविदाकारी राज्यों या उसके राजनैतिक उपप्रभागों या स्थानीय प्राधिकरणों की सार्वजनिक निधियों द्वारा समर्थित हों। ऐसे मामले में, उस आय पर केवल संविदाकारी राज्य में कर लगेगा जिसका वह मनोरंजनकर्ता या खिलाड़ी निवासी है।
अनुच्छेद 18
पेंशन
अनुच्छेद 19 के पैराग्राफ 2 के उपबंधों के अध्यथाधीन, किसी संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को उसके पिछले नियोजन के प्रतिफल के रूप में अदा की गर्इ पेंशन और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में कर लग सकेगा।
अनुच्छेद 19
सरकारी सेवा
1. (क) किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय प्राधिकरण अथवा निकाय द्वारा किसी व्यष्टि को उस राज्य अथवा उप-प्रभाग अथवा प्राधिकरण के लिए की गर्इ सेवाओं के संबंध में अदा किए गए पेंशन से भिन्न वेतन, मजदूरी तथा इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में ही कर लग सकेगा।
(ख) तथापि, ऐसे वेतन, मजदूरी और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल दूसरे संविदाकारी राज्य में तभी कर लग सकेगा, यदि सेवाएं उस राज्य में की जाती हैं और व्यष्टि उस राज्य का निवासी हो, जो :
(i) उस राज्य का एक राष्ट्रिक है; अथवा
(ii) सेवाएं पेश करने के प्रयोजन मात्र के लिए उस राज्य का निवासी नहीं बना हो।
2. (क) किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा अथवा उनके द्वारा सृजित निधियों में से किसी व्यष्टि को उस राज्य अथवा उप-प्रभाग अथवा प्राधिकरण के लिए प्रदान की गर्इ सेवाओं के संबंध में अदा की गर्इ किसी पेंशन पर केवल उस राज्य में कर लग सकेगा।
(ख) तथापि, ऐसी पेंशन पर केवल दूसरे संविदाकारी राज्य में कर लगेगा, यदि व्यष्टि उस राज्य का निवासी तथा राष्ट्रिक हो।
3. अनुच्छेद 15, 16, 17 और 18 के उपबंध, किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय प्राधिकरण अथवा निकाय द्वारा चलाए गए किसी कारोबार के सिलसिले में प्रदान की गर्इ सेवाओं के संबंध में वेतन, मजदूरी और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक तथा पेंशन पर लागू होंगे।
अनुच्छेद 20
विद्यार्थी
1. कोर्इ विद्यार्थी जो दूसरे संविदाकारी राज्य की यात्रा करने से तुरंत पूर्व किसी एक संविदाकारी राज्य का निवासी है अथवा था और जो मात्र अपनी शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ उस संविदाकारी राज्य में उपस्थित है, उसे अनुदान और छात्रवृत्ति के अतिरिक्त उस राज्य में निम्नलिखित पर कर से छूट प्राप्त होगी:
(क) उस राज्य से बाहर रह रहे व्यक्तियों द्वारा उसके निर्वाह, शिक्षा या प्रशिक्षण के लिए किए गए भुगतान पर; और
(ख) नियोजन के संबंध में प्राप्त पारिश्रमिक पर जो वह दूसरे संविदाकारी राज्य में करता है यदि वह नियोजन प्रत्यक्ष रूप से उसके अध्ययनों से जुड़ा है।
2. इस अनुच्छेद के लाभ केवल ऐसी समयावधि तक उपलब्ध होंगे जो ऐसी शिक्षा एवं प्रशिक्षण को पूरा करने के लिए तर्कसंगत हो अथवा प्रथागत रूप से अपेक्षित है परंतु किसी भी हाल में किसी व्यष्टि को उसकी शिक्षा और प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ उस दूसरे राज्य में शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ प्रथम आगमन की तारीख से लगातार छ: साल से अधिक समय तक प्राप्त नहीं होंगे।
अनुच्छेद 21
प्रोफेसर, अध्यापक और शोध छात्र
1. कोर्इ प्रोफेसर, अध्यापक अथवा शोधकर्ता जिसे दूसरे संविदाकारी राज्य या विश्वविद्यालय या महाविद्यालय, विद्यालय या किसी अन्य अनुमोदित संस्थान द्वारा आमंत्रित किया गया हो और जो उस दौरे से तुरंत पूर्व एक संविदाकारी राज्य का निवासी है अथवा था तो उसे शिक्षण अथवा शोधकार्य के लिए प्राप्त पारिश्रमिक पर उस दूसरे राज्य में कर से छूट प्राप्त होगी जो उस तारीख से केवल दो वर्षों से अनधिक की अवधि के लिए ही लागू होगी जिस तारीख से वह व्यक्ति का उस प्रथमोल्लिखित राज्य में पहली बार आगमन होता है।
2. यह अनुच्छेद शोध कार्य से प्राप्त आय पर केवल तभी लागू होगा, यदि व्यष्टि द्वारा किया जा रहा ऐसा शोधकार्य लोकहित में हो तथा मुख्य रूप से किन्हीं निजी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के लाभ के लिए न हो।
3. इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को किसी संविदाकारी राज्य का निवासी माना जाएगा यदि वह उस आय के वित्तीय वर्ष में अथवा उससे तुरंत पहले आय के वित्तीय वर्ष में उस राज्य का निवासी है जिसमें वह दूसरे संविदाकारी राज्य का दौरा करता है।
4. पैराग्राफ 1 के प्रयोजनार्थ, ‘‘अनुमोदित संस्थान’’ से अभिप्रेत ऐसे संस्थान से है जिसे संबंधित संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस संबंध में अनुमोदित किया गया है।
अनुच्छेद 22
अन्य आय
1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी की आय की ऐसी मदें, जहां-कहीं वे उद्भूत होती हों, जिन पर इस करार के पूर्वोक्त अनुच्छेदों में विचार नहीं किया गया है, केवल उस राज्य में कराधेय होंगी।
2. पैराग्राफ 1 के उपबंध अनुच्छेद 6 के पैराग्राफ 2 में यथा-परिभाषित अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय से भिन्न आय पर लागू नहीं होंगे, यदि ऐसी आय का प्राप्तकर्ता एक संविदाकारी राज्य का निवासी होने के नाते दूसरे संविदाकारी राज्य में वहां स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता है अथवा उस दूसरे राज्य में वहां स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता है, तथा ऐसा अधिकार अथवा सम्पत्ति जिसके संबंध में ऐसी आय अदा की जाती है, ऐसे स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध है। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 7 या अनुच्छेद 14 जैसा भी मामला हो, के उपबंध लागू होंगे।
3. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंधों के होते हुए भी एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी की आय की मदों, जिन पर पूर्ववर्ती अनुच्छेदों में चर्चा नहीं की गर्इ है और जो दूसरे संविदाकारी राज्य में उद्भूत होते हैं, पर उस दूसरे राज्य में भी कर लगाया जा सकता है।
अनुच्छेद 23
दोहरे कराधान का निरसन
1. दोनों में से किसी भी संविदाकारी राज्य में प्रवृत्त कानून उस स्थिति को छोड़कर संबंधित संविदाकारी राज्यों में आय के कराधान को अधिशासित करते रहेंगे, सिवाय उसके जहां उस करार में विपरीत प्रावधान किए गए हों।
2. दोहरे कराधान को इस प्रकार से समाप्त किया जाएगा:
(i) भारत में,
(क) जहां भारत का कोर्इ निवासी ऐसी आय प्राप्त करता है जिस पर इस करार के उपबंधों के अनुसार थाइलैंड में कर लगाया जा सकता है, भारत वहां उस निवासी की आय पर कर से थार्इलैंड में अदा किए गए कर के बराबर राशि की छूट की अनुमति देगा।
तथापि, ऐसी कटौती, छूट दिए जाने से पहले यथा-संगणित कर के उस भाग से अधिक नहीं होगी, जिसका श्रेय उस आय को हो, जैसा भी मामला हो, जिस पर थार्इलैंड में कर लगाया जा सकता है।
(ख) जहां इस करार के किसी उपबंध के अनुसार भारत के किसी निवासी द्वारा प्राप्त की गर्इ आय भारत में कर से छूट प्राप्त हो, भारत वहां फिर भी ऐसे निवासी की शेष आय पर कर की धनराशि की संगणना के समय छूट-प्राप्त आय को ध्यान में रखेगा।
(ii) थाइलैंड में;
(क) जहां थाइलैंड का कोर्इ निवासी ऐसा आय प्राप्त करता है जिस पर इस करार के उपबंधों के अनुसार भारत में कर लगाया जा सकता है, थाइलैंड वहां उस निवासी की आय पर कर से भारत में अदा किए गए आयकर के बराबर राशि की छूट की अनुमति देगा।
तथापि, ऐसी कटौती, छूट दिए जाने से पहले यथा-संगणित कर के उस भाग से अधिक नहीं होगी, जिसका श्रेय उस आय को हो, जैसा भी मामला हो, जिस पर भारत में कर लगाया जा सकता है।
(ख) जहां इस करार के किसी उपबंध के अनुसार थाइलैंड के किसी निवासी द्वारा प्राप्त की गर्इ आय थाइलैंड में कर से छूट प्राप्त हो, थाइलैंड वहां फिर भी ऐसे निवासी की शेष आय पर कर की धनराशि की संगणना के समय छूट-प्राप्त आय को ध्यान में रखेगा।
अनुच्छेद 24
गैर-भेदभाव
1. एक संविदाकारी राज्य के राष्ट्रिकों पर दूसरे संविदाकारी राज्य में ऐसा कोर्इ कराधान अथवा तत्संबंधी ऐसी कोर्इ अपेक्षा लागू नहीं की जाएगी जो उस कराधान से और तत्संबंधी अपेक्षाओं से भिन्न अथवा अधिक भारपूर्ण हो, जो उस दूसरे राज्य के राष्ट्रिकों पर विशेषत: निवास के संबंध में उन्हीं परिस्थितियों में लागू होती हो अथवा लागू की जा सकती हो। अनुच्छेद 1 के उपबंधों के होते हुए भी यह उपबंध उन व्यक्तियों पर भी लागू होगा जो एक अथवा दोनों संविदाकारी राज्यों के निवासी नहीं है।
2. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित स्थायी संस्थापन पर उस दूसरे राज्य में ऐसा कोर्इ कराधान लागू नहीं किया जाएगा जो उस दूसरे राज्य के उद्यमों पर समरूप कार्यकलापों को करने हेतु लागू होने वाले कराधान से अपेक्षाकृत कम अनुकूल हो। इस अनुच्छेद के उपबंधों का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि एक संविदाकारी राज्य के लिए यह बाध्यकर है कि वह दूसरे संविदाकारी राज्य के निवासियों को, कराधान प्रयोजनों के लिए उनकी सिविल हैसियत अथवा पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए किसी प्रकार की ऐसी व्यक्तिगत छूट, राहत अथवा कटौतियों की मंजूरी दे जो वह अपने निवासियों को देता है। ऐसा नहीं माना जाएगा कि ये प्रावधान किसी संविदाकारी राज्य को दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के स्थार्इ संस्थापन के लाभों पर कर की उस दर को लगाने से रोकते हैं, जो प्रथमोल्लिखित राज्य की समान कंपनी के लाभों पर लगार्इ गर्इ उन करों की दर से अधिक हों और न ही इसका अर्थ अनुच्छेद 7 के पैराग्राफ 3 के उपबंधों के प्रतिकूल होना समझा जाएगा।
3. ऐसे मामले को छोड़कर जहां अनुच्छेद 9 के पैराग्राफ 1, अनुच्छेद 11 के पैराग्राफ 6 या अनुच्छेद 12 के पैराग्राफ 7 के उपबंध लागू होते हैं, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए ब्याज, रायल्टी तथा अन्य भुगतान, ऐसे उद्यम के कराधेय लाभों का निर्धारण करने के प्रयोजनार्थ उन्हीं शर्तों के अनुसार कटौती-योग्य होंगे मानो उनका भुगतान प्रथमोल्लिखित राज्य के किसी निवासी को किया गया हो।
4. एक संविदाकारी राज्य के उद्यमों पर, जिसकी पूंजी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण या आंशिक रूप से दूसरे संविदाकारी राज्य के एक या अधिक निवासियों के स्वामित्व में जो या उनके द्वारा नियंत्रित की जाती हो, प्रथमोल्लिखित राज्य में कोर्इ ऐसा कर नहीं लगाया जाएगा या तत्संबंधी कोर्इ ऐसी अपेक्षा नहीं की जाएगी जो उस कराधान से और तत्संबंधी अपेक्षाओं से भिन्न अथवा अधिक भारपूर्ण है, जो प्रथमोल्लिखित राज्य के अन्य इसी प्रकार के उद्यमों पर लागू की जाती है या लागू की जा सकती है।
5. इस अनुच्छेद के उपबंध केवल उन करों पर लागू होंगे, जो इस करार की विषय वस्तु हों।
अनुच्छेद 25
पारस्परिक करार की विधि
1. जहां कोर्इ व्यक्ति यह समझता है कि एक अथवा दोनों संविदाकारी राज्यों की कार्यवाहियों के कारण उस पर इस प्रकार कर लगाया जाता है अथवा लगाया जाएगा जो इस करार के उपबंधों के अनुरूप नहीं है तो वह उन राज्यों के स्वदेशी कानूनों द्वारा उपलब्ध कराए गए उपायों के होते हुए भी अपना मामला उस संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकता है, जिसका कि वह एक निवासी है अथवा यदि उसका मामला अनुच्छेद 24 के पैराग्राफ 1 के अंतर्गत आता है तो वह अपना मामला उस संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकता है जिसका कि वह राष्ट्रिक है। इस मामले को उस कार्यवाही की प्रथम अधिसूचना से तीन वर्षों के भीतर अवश्य प्रस्तुत कर दिया जाना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप ऐसा कराधान लगाया गया है जो इस करार के उपबंधों के अनुरूप नहीं है।
2. यदि सक्षम प्राधिकारी को आपत्ति उचित लगे और यदि वह स्वयं किसी संतोषजनक हल पर पहुंचने में असमर्थ हो, तो वह ऐसे कराधान के परिहार की दृष्टि से जो इस करार के अनुरूप नहीं है, दूसरे संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी के साथ पारस्परिक सहमति द्वारा उस मामले को हल करने का प्रयास करेगा। इस प्रकार किए गए किसी करार को संविदाकारी राज्यों के स्वदेशी कानूनों में किन्हीं समय सीमाओं के होते हुए भी क्रियान्वित किया जाएगा।
3. इस करार की व्याख्या करने अथवा इसे लागू करने में कोर्इ कठिनार्इयां अथवा शंकाएं हों, तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी उन्हें पारस्परिक सहमति से हल करने का प्रयास करेंगे। वे उन मामलों में भी दोहरे कराधान को दूर करने के लिए परस्पर विचार-विमर्श कर सकते हैं जिनकी इस करार में व्यवस्था नहीं की गर्इ हो।
4. पिछले पैराग्राफों के अभिप्रायों से कोर्इ करार करने के प्रयोजनार्थ संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी एक दूसरे के साथ सीधे पत्र-व्यवहार कर सकते हैं। सक्षम प्राधिकारी इस अनुच्छेद में उपलब्ध पारस्परिक करार विधि को लागू करने के लिए उपयुक्त द्विपक्षीय प्रक्रियाओं, शर्तों, विधियों एवं तकनीकों को विचार-विमर्श के माध्यम से तैयार करेंगे। इसके अतिरिक्त, सक्षम प्राधिकारी उपर्युक्त द्विपक्षीय कार्यवाही की सुविधा तथा पारस्परिक करार विधि को लागू करने के लिए उपयुक्त एकपक्षीय प्रक्रियाओं, शर्तों, विधियों तथा तकनीकों का आविष्कार कर सकते हैं।
अनुच्छेद 26
सूचनाओं का अदान-प्रदान
1. संविदाकारी राज्यों के सक्षम अधिकारी ऐसी सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगे जो कि इस करार के उपबंधों को लागू करने के लिए अनुमानित रूप से संगत हो अथवा संविदाकारी राज्यों या उनके राजनीतिक उप-प्रभागों या करार में दिए करों से संबंधित स्थानीय प्राधिकाररियों द्वारा घरेलू कानूनों के प्रशासन अथवा कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हों, जहां तक कि उनके अधीन कराधान व्यवस्था इस करार के प्रतिकूल नहीं है। सूचनाओं का अदान-प्रदान अनुच्छेद 1 द्वारा प्रतिबंधित नहीं है।
2. किसी भी संविदाकारी राज्य द्वारा प्राप्त की गर्इ कोर्इ भी सूचना उस राज्य के आंतरिक कानूनों के अंतर्गत प्राप्त सूचनाओं के समान ही गुप्त समझा जाएगी और उसे केवल उन व्यक्तियों अथवा प्राधिकारियों (जिनमें न्यायालय और प्रशासनिक निकाय शामिल हैं) को प्रकट किया जाएगा, जो करार में दिए करों के संबंध में करों का निर्धारण या उनकी वसूली करने, उनके प्रवर्तन अथवा अभियोजन के संबंध में अथवा अपीलों का निर्धारण करने से संबंध हों। ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी सूचनाओं का उपयोग केवल ऐसे ही प्रयोजन के लिए करेंगे वे इस सूचना को सार्वजनिक न्यायालय की कार्यवाहियों अथवा न्यायिक निर्णयों में प्रकट कर सकेंगे। भले ही पूर्वोक्त सूचनाओं में कुछ भी कहा गया हो, संविदाकारी राज्य द्वारा प्राप्त की गर्इ सूचनाएं दूसरे प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जा सकती हैं, जब ऐसी सूचनाओं का प्रयोग दोनों राज्यों तथा ऐसे प्रयोग के लिए प्राधिकृत आपूर्तिकर्ता राज्य के प्राधिकरणों के कानूनों के तहत ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए किया जा सकता हो।
3. पैराग्राफ 1 के किसी भी उपबंध का अर्थ दोनों में से किसी संविदाकारी राज्य पर निम्नलिखित के लिए बाध्यता लागू करना नहीं लगाया जाएगा :
(क) उस अथवा दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों और प्रशासनिक प्रथा से हटकर प्रशासनिक उपाय करना;
(ख) ऐसी सूचनाओं की आपूर्ति करना जो इस अथवा दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों के अंतर्गत अथवा प्रशासन की सामान्य स्थिति में प्राप्य नहीं हैं;
(ग) ऐसी सूचना की सप्लार्इ करना जिससे कोर्इ व्यापार, कारोबार, औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा व्यावसायिक, गुप्त अथवा व्यापार प्रक्रिया अथवा सूचना प्रकट होती हो, जिसको प्रकट करना सार्वजनिक नीति (आर्डर पब्लिक) के प्रतिकूल हो।
4. इस अनुच्छेद के अनुसरण में यदि किसी संविदाकारी राज्य द्वारा किसी जानकारी को प्राप्त करने के लिए अनुरोध किया जाता है तो दूसरा संविदाकारी राज्य अनुरोध की गर्इ जानकारी को प्राप्त करने के लिए अपनी सूचना एकत्र करने वाले उपायों का उपयोग करेगा, चाहे दूसरे राज्य को अपने स्वयं के कर प्रयोजनों के लिए ऐसी सूचना की कोर्इ आवश्यकता न हो। पिछले वाक्य में अन्तर्निहित दायित्व पैराग्राफ 3 की सीमाओं के अधीन है, किंतु किसी भी स्थिति में ऐसी सीमाओं का यह अर्थ नहीं होगा कि संविदाकारी राज्य केवल इसलिए सूचना की आपूर्ति करने से मना करते हैं कि ऐसी सूचना में उसका कोर्इ आंतरिक हित नहीं है।
5. किसी भी स्थिति में पैराग्राफ 3 के उपबंधों का अर्थ केवल इसलिए सूचना की आपूर्ति करने से मना करने के लिए किसी संविदाकारी राज्य को अनुमति देने के लिए नहीं लगाया जाएगा कि सूचना किसी बैंक, अन्य वित्तीय संस्थान, किसी एजेंसी या किसी न्यासी क्षमता में कार्यरत नामिती या व्यक्ति के पास है या यह किसी व्यक्ति के स्वामित्व हित से संबंधित है।
अनुच्छेद 27
लाभों का परिसीमन
इस करार के उपबंध किसी भी स्थिति में एक संविदाकारी राज्य को कर परिहार अथवा अपवंचन के संबंध में अपने स्वदेशी कानून एवं उपायों के उपबंधों को लागू करने से नहीं रोकेंगे, चाहे इस तरह वर्णित हो अथवा नहीं।
अनुच्छेद 28
राजनयिक मिशन के सदस्य एवं कौंसुली पद
इस करार की किसी बात से अंर्तराष्ट्रीय कानून के सामान्य नियमों के अंतर्गत अथवा विशेष करारों के उपबंधों के अंतर्गत राजनयिक मिशन अथवा कौंसुली अधिकारियों के सदस्यों के वित्तीय विशेषाधिकारों पर कोर्इ प्रभाव नहीं पडे़गा।
अनुच्छेद 29
प्रवृत्त होना
1. संविदाकारी राज्य इस करार को लागू करने के लिए अपने-अपने कानूनों के अंतर्गत अपेक्षित प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए राजनयिक माध्यमों से लिखित रूप से एक दूसरे को अधिसूचित करेंगे।
2. यह करार इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 में उल्लिखित अधिसूचनाओं की परवर्ती तारीख को लागू होगा।
3. इस करार के उपबंधों का निम्नानुसार प्रभाव होगा:
(क) भारत में, जिस कैलेन्डर वर्ष में यह करार लागू होता है उसके अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के अप्रैल माह की पहली तारीख को अथवा इसके बाद आरंम्भ होने वाले किसी वित्तीय वर्ष के लिए प्राप्त की गर्इ आय के संबंध में।
(ख) थाइलैंड में,
(i) जिस कैलेन्डर वर्ष में यह करार लागू होता है, उसके अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के जनवरी माह की पहली तारीख को या इसके बाद प्राप्त आय की राशि पर, उद्गम स्थल पर रोकी गर्इ आय पर करों के संबंध में; और
(ii) जिस कैलेण्डर वर्ष में यह करार लागू होता है, उसके अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के जनवरी माह की पहली तारीख को या इसके बाद आरम्भ होने वाले किसी कर निर्धारण वर्ष अथवा लेखा अवधि के लिए वसूले जाने वाले ऐसे करों पर, आय पर अन्य करों के संबंध में।
4. जब इस करार के उपबंध पैरा 3 के उपबंधों के अनुरूप प्रभावी हो जाएंगे, तब आय पर करों के संबंध में समझौता ज्ञापन सहित दोहरे कराधान के परिहार और राजकोषीय अपवंचन के लिए भारत गणराज्य की सरकार और थाइलैंड साम्राज्य की सरकार के बीच 22 मार्च, 1985 को नर्इ दिल्ली में हस्ताक्षरित निष्प्रभावी हो जाएगा।
अनुच्छेद 30
समापन
यह करार तब तक लागू रहेगा जब तक कि कोर्इ एक संविदाकारी राज्य इसे समाप्त नहीं कर देता। दोनों में से कोर्इ भी संविदाकारी राज्य, इस करार के लागू होने की तारीख से लेकर पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद शुरू होने वाले किसी कैलेण्डर वर्ष की समाप्ति से कम से कम छह महीने पहले राजनयिक माध्यम से समापन की नोटिस देकर इस करार को समाप्त कर सकता है। ऐसी स्थिति में यह करार निम्नलिखित के संबंध में निष्प्रभावी हो जाएगा:
(क) भारत में, जिस कैलेन्डर वर्ष में समापन की नोटिस दी जाती है, उसके ठीक बाद के अप्रैल माह के प्रथम दिन को अथवा उसके बाद किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त की गर्इ आय के संबंध में।
(ख) थाइलैंड में,
(i) जिस वर्ष नोटिस दी गयी है, उसके अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के जनवरी माह की पहली तारीख को या इसके बाद प्राप्त आय की राशि पर, उद्गम स्थल पर रोकी गर्इ आय पर करों के संबंध में; और
(ii) जिस वर्ष नोटिस दी गयी है, उसके अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के जनवरी माह की पहली तारीख को या इसके बाद आरम्भ होने वाले किसी कर निर्धारण वर्ष अथवा लेखा अवधि के लिए वसूले जाने वाले ऐसे करों पर, आय पर अन्य करों के संबंध में।
जिसके साक्ष्य में, इसके लिए विधिवत रूप से प्राधिकृत अधोहस्ताक्षरियों ने इस करार पर हस्ताक्षर किए हैं।
बैंकॉक में र्इसार्इ युग के र्इस्वी सन् दो हजार पंद्रह के जून माह के 29वें दिन हिन्दी, थार्इ एवं अंग्रेजी भाषाओं में दो प्रतियों में निष्पन्न किया गया और सभी पाठ समान रूप से प्रामाणिक हैं। अर्थ निरूपण में भिन्नता की स्थिति में अंग्रेजी पाठ प्रभावी माना जाएगा।
| भारत गणराज्य की | थार्इलैंड साम्राज्य की |
| सरकार की ओर से | सरकार की ओर से जनरल |
| (सुषमा स्वराज) | (थनासाक पतिमाप्रागोर्ग) |
| विदेश मंत्री | उप प्रधान मंत्री तथा विदेश मंत्री |
प्रोतोकोल
आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार एवं वित्तीय अपवंचन को रोकने के लिए भारत गणराज्य की सरकार तथा थार्इलैंड साम्राज्य की सरकार के बीच करार पर हस्ताक्षर करते समय अधोहस्ताक्षरी निम्नलिखित उपबंधों पर सहमत हुए हैं जो करार का एक अभिन्न अंग बनेंगे।
1. यह माना गया है कि यदि थार्इलैंड करों के संग्रहण में सहायता संबंधी अपने घरेलू कानून में किसी उपबंध का समाविष्ट करता है अथवा किसी अन्य संधि भागीदार के साथ ऐसी सहायता संबंधी समझौता करता है, तो दोनों संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी परस्पर कर संग्रहण में सहायता बढ़ाने हेतु करार में संशोधन करने के लिए बातचीत शुरू करेंगे।
2. इस करार में कोर्इ भी ऐसा अर्थ नहीं लगाया जाएगा जो एक संविदाकारी राज्य को उसके घरेलू कानून के उपबंधों के अनुसार अभिलाभों के प्रबंधन पर कर लगाने से रोकता हो।
3. अनुच्छेद 7 (कारोबार से लाभ) के पैराग्राफ 4 के संदर्भ में यह माना गया है कि यदि एक संविदाकारी राज्य के कराधान प्राधिकरण के पास किसी उद्यम के स्थायी संस्थापन से संबंधित लाभों के निर्धारण हेतु उपलब्ध सूचना अपर्याप्त हो, तो उस अनुच्छेद में दिए किसी भी उपबंध का ऐसे स्थायी संस्थापन की कर देयता के निर्धारण से संबंधित उस राज्य के किसी कानून की प्रयुक्ति पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, बशर्ते कानून का वहीं तक प्रयोग किया जाए जहां तक कि कराधान प्राधिकरण के पास उपलब्ध सूचनाएं उस अनुच्छेद के सिद्धांतों के साथ सामंजस्य की अनुमति देती हों।
4. अनुच्छेद 26 (सूचना का आदान-प्रदान) के संदर्भ में, यह माना गया है कि सूचना में दस्तावेज या दस्तावेजों की सत्यापित प्रतियां शामिल हैं।
जिसके साक्ष्य में, इसके लिए विधिवत रूप से प्राधिकृत अधोहस्ताक्षरियों ने इस प्रोतोकोल पर हस्ताक्षर किए हैं।
बैंकॉक में र्इसार्इ युग के र्इस्वी सन् दो हजार पंद्रह के जून माह के 29वें दिन हिन्दी, थार्इ एवं अंग्रेजी भाषाओं में दो प्रतियों में निष्पन्न किया गया और सभी पाठ समान रूप से प्रामाणिक हैं। अर्थ निरूपण में भिन्नता की स्थिति में अंग्रेजी पाठ प्रभावी माना जाएगा।
| भारत गणराज्य की सरकार की ओर से | थार्इलैंड साम्राज्य की सरकार की ओर से |
| जनरल | |
| (सुषमा स्वराज) | (थनासाक पतिमाप्रागोर्ग) |
| विदेश मंत्री | उप प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री |

