प्रतिभूतियों में कुछ संव्यवहारों द्वारा कर का परिवर्जन
प्रतिभूतियों में कुछ संव्यवहारों द्वारा कर का परिवर्जन
3794. (1) जहां किसी प्रतिभूतियों का स्वामी (जिसे इस उपधारा में और उपधारा (2) में "स्वामी" कहा गया है) उन प्रतिभूतियों का विक्रय या अंतरण करता है और प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेता है या पुन: अर्जित करता है वहां यदि उस संव्यवहार का परिणाम यह होता है कि प्रतिभूतियों की बाबत संदेय होने वाला कोर्इ ब्याज स्वामी द्वारा प्राप्य होने से अन्यथा प्राप्य है तो पूर्वोक्त संदेय ब्याज, चाहे वह इस उपधारा के उपबंधों के अतिरिक्त भी आय-कर से प्रभार्य होता या नहीं होता, इस अधिनियम के सब प्रयोजनों के लिए स्वामी की आय समझा जाएगा और किसी अन्य व्यक्ति की आय नहीं समझा जाएगा।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा में प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेने या पुन: अर्जित करने के प्रति निर्देशों के अंतर्गत समरूप प्रतिभूतियों को क्रय करने या अर्जित करने के प्रति निर्देश भी समझे जाएंगे किंतु इस प्रकार कि जहां समरूप प्रतिभूतियां क्रय या अर्जित की जाती हैं वहां स्वामी आय-कर के लिए उससे बड़े दायित्व के अधीन नहीं होगा जिसके अधीन वह उस दशा में होता जिसमें मूल प्रतिभूतियां ही क्रय द्वारा वापस ली गर्इ या पुन: अर्जित की गर्इ होती।
(2) जहां किसी व्यक्ति का किसी पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय किन्हीं प्रतिभूतियों में कोर्इ फायदाप्रद हित रहा है और ऐसी प्रतिभूतियों या उनकी आय से संबद्ध किसी संव्यवहार का परिणाम यह है कि ऐसे वर्ष के अंदर ऐसी प्रतिभूतियों के संबंध में उस द्वारा या तो कोर्इ आय प्राप्त नहीं की जाती है या उस द्वारा प्राप्य आय उस राशि से कम है जिस तक कि आय पहुंच गर्इ होती यदि ऐसी प्रतिभूतियों से आय दिन-प्रतिदिन प्रोद्भूत होती और तदनुसार प्रभाजित की गर्इ होती, वहां ऐसे वर्ष के लिए ऐसी प्रतिभूतियों से आय ऐसे व्यक्ति की आय समझी जाएगी।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंध तब लागू नहीं होंगे यदि यथास्थिति, स्वामी या वह व्यक्ति जिसका उन प्रतिभूतियों में फायदाप्रद हित रहा है, 38[निर्धारण] अधिकारी को समाधानप्रद रूप में साबित करता है कि–
(क) आय-कर का कोर्इ परिवर्जन नहीं हुआ है, या
(ख) आय-कर का परिवर्जन आपवादिक था और व्यवस्थित नहीं था और यह कि उसके मामले में तीन पूर्व वर्षों में से किसी में उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रकृति के संव्यवहार द्वारा आय-कर का परिवर्जन नहीं हुआ है।
(4) जहां ऐसा कारबार चलाने वाला कोर्इ व्यक्ति, जिसमें पूर्णत: या भागत: प्रतिभूतियों का व्यवहार, सम्मिलित है, किन्हीं प्रतिभूतियों का क्रय या अर्जन करता है और उन प्रतिभूतियों को विक्रय द्वारा वापस करता है या पुन: अंतरित करता है वहां यदि संव्यवहार का यह परिणाम होता है कि उन प्रतिभूतियों की बाबत संदेय होने वाला ब्याज उसके द्वारा प्राप्य है किंतु उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबंधों के कारण उसकी आय नहीं समझा जाता है वहां उस कारबार से उत्पन्न होने वाले लाभों या उससे हुर्इ हानि को इस अधिनियम के प्रयोजनों में से किसी के लिए संगणित करने में इन संव्यवहारों को, हिसाब में नहीं लिया जाएगा।
(5) उपधारा (4) किन्हीं आवश्यक उपांतरणों के अधीन रहते हुए, इस प्रकार प्रभावी होगी मानो प्रतिभूतियों को विक्रय द्वारा वापस करने या पुन: अंतरित करने के निर्देशों के अंतर्गत समरूप प्रतिभूतियों को बेचने या अंतरित करने के निर्देश भी हैं।
(6) 39[निर्धारण] अधिकारी किसी व्यक्ति से लिखित सूचना द्वारा अपेक्षा कर सकेगा कि उतने समय के अंदर जितना वह निर्दिष्ट करे (जो अट्ठार्इस दिन से कम नहीं होगा) वह ऐसी सब प्रतिभूतियों की बाबत, जिनका कि ऐसा व्यक्ति सूचना में विनिर्दिष्ट कालावधि के दौरान किसी समय स्वामी था या जिनमें वह फायदाप्रद हित रखता था, ऐसी विशिष्टयां दें, जो वह इस धारा के प्रयोजनों के लिए और यह पता लगाने के प्रयोजनों के लिए कि क्या उन सब प्रतिभूतियों पर ब्याज की बाबत आय-कर लगाया जा चुका है, आवश्यक समझता है।
40[(7) जहां–
(क) कोर्इ व्यक्ति, रिकार्ड तारीख के पूर्व तीन मास की अवधि के भीतर कोर्इ प्रतिभूति या यूनिट खरीदता है या अर्जित करता है;
(ख) ऐसा व्यक्ति ऐसी प्रतिभूतियों या यूनिट का, ऐसी तारीख के पश्चात् तीन मास की अवधि के भीतर विक्रय या अंतरण करता है;
(ग) ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसी प्रतिभूतियों या यूनिटों पर प्राप्त या प्राप्य लाभांश या आय पर छूट प्राप्त है,
वहां प्रतिभूतियों या यूनिट के ऐसे क्रय और विक्रय मद्दे उसको होने वाली हानि, यदि कोर्इ हो, उस सीमा तक जिस तक ऐसी हानि ऐसी प्रतिभूतियों या यूनिट पर प्राप्त या प्राप्य लाभांश या आय की रकम से अधिक नहीं है, कर के लिए प्रभार्य उसकी आय की संगणना के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं ली जाएगी।]
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–
(क) "ब्याज" के अंतर्गत लाभांश भी है;
40[(कक) "रिकार्ड तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो, यथास्थिति, लाभांश या आय प्राप्त करने के लिए प्रतिभूतिधारक या यूनिटधारक की हकदारी के प्रयोजनों के लिए किसी कंपनी या किसी पारस्परिक निधि या भारतीय यूनिट ट्रस्ट द्वारा नियत की जाए;]
(ख) "प्रतिभूतियों" के अंतर्गत स्टाक और शेयर भी हैं,
(ग) प्रतिभूतियों समरूप समझी जाएंगी यदि वे उनके धारकों को, पूंजी और ब्याज के बारे में उन्हीं व्यक्तियों के विरुद्ध वैसे ही अधिकारों और उन अधिकारों के प्रवर्तन के लिए इस बात के होते हुए भी वैसे ही उपचारों के लिए हकदार बनाती है, कि संबंधित प्रतिभूतियों की कुल अभिहित रकमों में या उस रूप में जिसमें वे धारित हैं या उस रीति में जिसमें वे अंतरित की जा सकती हैं, अंतर है।
41[(घ) "यूनिट" का वही अर्थ होगा है जो उसका धारा 115कख के स्पष्टीकरण के खंड (ख) में है।]
37. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
38. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
39. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
40. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित।
41. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा संशोधित रूप में]

