जीवन बीमा प्रीमियम, भविष्य निधि में अभिदाय आदि पर रिबेट
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588. 6[(1) इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोर्इ निर्धारिती, जो कोर्इ व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुंब है, अपनी कुल आय पर, जिससे वह किसी निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य है, आय-कर की रकम में से (जो इस अध्याय के अधीन कटौती अनुज्ञात करने से पूर्व संगणित की गर्इ है)–
(i) किसी व्यष्टि या किसी हिंदू अविभक्त कुटुंब की दशा में, जिसकी सकल कुल आय, अध्याय 6क के अधीन कटौतियां करने से पूर्व, एक लाख पचास हजार रुपए या उससे कम है, उपधारा (2) में निर्दिष्ट कुल राशियों के बीस प्रतिशत के बराबर कटौती का हकदार होगा :
परन्तु यह कि कोर्इ व्यष्टि, उपधारा (2) में निर्दिष्ट कुल राशियों के योग के तीस प्रतिशत की राशि के बराबर कटौती का हकदार होगा, यदि उसकी आय, "वेतन" शीर्ष के अधीन,–
(क) धारा 16 के अधीन कटौती अनुज्ञात करने से पूर्व, पूर्ववर्ष के दौरान एक लाख रुपए से अधिक नहीं है; और
(ख) धारा 80 ख की उपधारा (5) में यथापरिभाषित उसकी सकल कुल आय के नब्बे प्रतिशत से कम नहीं है;
(ii) किसी व्यष्टि या किसी हिंदू अविभक्त कुटुंब की दशा में, जिसकी सकल कुल आय, अध्याय 6क के अधीन कटौतियां करने से पूर्व, एक लाख पचास हजार रुपए से अधिक है किंतु पांच लाख रुपए से अधिक नहीं है, उपधारा (2) में निर्दिष्ट कुल राशियों के पन्द्रह प्रतिशत के बराबर कटौती का हकदार होगा;
(iii) किसी व्यष्टि या किसी हिंदू अविभक्त कुटुंब की दशा में, जिसकी सकल कुल आय, अध्याय 6क के अधीन कटौतियां करने से पूर्व, पांच लाख रुपए से अधिक है, किसी कटौती का हकदार नहीं होगा।]
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट राशियां निर्धारिती द्वारा 7[***] पूर्ववर्ष में अदा की गर्इ या जमा की गर्इ ऐसी राशियां होंगी–
(i) जो उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों का जीवन बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए हैं;
(ii) जो उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों के जीवन पर आस्थगित वार्षिकी, 8[जो खंड (xiiiक) में निर्दिष्ट वार्षिकी योजना नहीं है,] के लिए संविदा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए है:
परन्तु जब ऐसी संविदा में बीमाकृत को उस विकल्प का प्रयोग करने के लिए कोर्इ उपबंध न हो तो वह वार्षिकी के संदाय के बदले में नकद संदाय प्राप्त कर सकेगा;
(iii) जो किसी व्यक्ति को किसी सरकार द्वारा या उसकी ओर से संदेय वेतन में से कटौती के रूप में कोर्इ ऐसी राशि है जो उसके लिए आस्थगित वार्षिकी सुनिश्चित करने या उसकी पत्नी या बच्चों के लिए व्यवस्था करने के प्रयोजन के लिए उसकी सेवा की शर्तों के अनुसार काटी गर्इ राशि है, वहां तक जहां तक कि ऐसी काटी गर्इ राशि वेतन के एक बटा पांच से अधिक न हो;
(iv) जो किसी व्यक्ति द्वारा किसी भविष्य निधि में जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है, अभिदाय स्वरूप है;
(v) जो केंद्रीय सरकार द्वारा स्थापित और राजपत्र में उसके द्वारा इस निमित्त अधिसूचित9 किसी भविष्य निधि में अभिदाय स्वरूप है जहां ऐसा अभिदाय उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में किसी खाते में जमा है;
(vi) जो किसी कर्मचारी द्वारा किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में अभिदाय स्वरूप है;
(vii) जो किसी कर्मचारी द्वारा किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में अभिदाय स्वरूप है;
(viii) जो समय-समय पर संशोधित डाकघर बचत बैंक (संचयी सावधि जमा) नियम, 1959 के अधीन दस वष्र्ाीय खाते में या पंद्रह वष्र्ाीय खाते में जमा के रूप में है, जहां ऐसी राशियां उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों के नाम में किसी खाते में जमा करार्इ गर्इ हो;
(ix) जो केन्द्रीय सरकार की किसी ऐसी प्रतिभूति में 10[या किसी ऐसी निक्षेप योजना में], जो वह सरकार राजपत्र में अधिसूचना11 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें, अभिदाय स्वरूप है;
(x) जो सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) के अधीन जारी किए गए सरकारी बचतपत्र (छठा निर्गम) और राष्ट्रीय बचत पत्र (सातवां निर्गम) में अभिदाय स्वरूप है;
(xi) जो सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) की धारा 2 के खंड (ग) में परिभाषित किसी ऐसे बचतपत्र12 में जिसे केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना13 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय स्वरूप है;
(xii) जो उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट 14[किसी व्यक्ति के नाम में], भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 19 के खंड (8) के उपखंड (क) के अधीन बनार्इ गर्इ समझी गर्इ यूनिट सहबद्ध बीमा योजना, 1971 में (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् यूनिट सहबद्ध बीमा योजना कहा गया है) भाग लेने के लिए अभिदाय स्वरूप है;
(xiii) जो 15[उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में], धारा 10 के खंड (23घ) के अधीन अधिसूचित बीमा निगम के म्युचुअल फंड की किसी ऐसी यूनिट सहबद्ध बीमा योजना में, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना16 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें, भाग लेने के लिए अभिदाय स्वरूप है;
17[(xiiiक) जो जीवन बीमा निगम 18[या किसी अन्य बीमाकर्ता] की ऐसी वार्षिकी योजना के लिए जो केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना19 द्वारा विनिर्दिष्ट करे, संविदा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए है;
(xiiiख) जो धारा 10 के खंड (23घ) के अधीन अधिसूचित किसी म्युचुअल फंड या भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट की किन्हीं यूनिटों में ऐसी स्कीम के अनुसार जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, बनार्इ गर्इ किसी योजना के अधीन अभिदाय स्वरूप है, जो दस हजार रुपए से अधिक नहीं होगा;
(xiiiग) जो धारा 10 के खंड (23घ) के अधीन अधिसूचित किसी ऐसे म्युचुअल फंड द्वारा, 20[या भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित ऐसे भारतीय यूनिट ट्रस्ट द्वारा] जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना21 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, स्थापित किसी पेंशन निधि में किसी व्यक्ति द्वारा अभिदाय स्वरूप है;]
(xiv) जो राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक की (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् राष्ट्रीय आवास बैंक कहा गया है) किसी ऐसी निक्षेप स्कीम में 22[या उसके द्वारा स्थापित किसी ऐसी पेंशन निधि में] जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना23 द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय स्वरूप है;
24[(xivक) जो–
(क) भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए मकानों के निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने में लगी किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी; या
(ख) निवास स्थान की आवश्यकता से निपटने और उसे पूरा करने के प्रयोजन के लिए या नगरों, कस्बों और ग्रामों की योजना, विकास या सुधार के प्रयोजन के लिए या दोनों के लिए बनार्इ गर्इ किसी विधि द्वारा उसके अधीन गठित किसी प्राधिकरण की,
किसी ऐसी निक्षेप स्कीम में, जो ऐसी स्कीम नहीं है जिसके अधीन निक्षेपों पर ब्याज धारा 80 ठ के अधीन कटौती की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए देय है और जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे अभिदाय स्वरूप है;]
25[(xivख) जो–
(क) भारत में स्थित किसी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, विद्यालय या अन्य शिक्षा संस्था को ;
(ख) उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किन्हीें व्यक्तियों की पूर्णकालिक शिक्षा के प्रयोजन के लिए,
चाहे प्रवेश के समय या उसके पश्चात् (किसी विकास फीस या संदान या उसी प्रकार के संदाय के लिए किए गए किसी संदाय को छोड़कर) अध्यापन फीस स्वरूप है;]
(xv) जो आवासीय गृह संपत्ति खरीदने या बनाने के प्रयोजनों के लिए दी गर्इ है 26[* * *] जिससे हुर्इ आय "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य है (या जो यदि निर्धारिती द्वारा अपने निवास के लिए उपयोग में न लायी गर्इ होती तो उस शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य होती) और जहां ऐसे संदाय निम्नलिखित के लिए या के रूप में किए जाते हैं–
(क) स्वामित्व के आधार पर गृह संपत्ति के निर्माण या विक्रय के काम में लगे किसी विकास प्राधिकरण, आवास बोर्ड या अन्य प्राधिकारी का किसी स्ववित्त पोषित स्कीम या अन्य स्कीम के अधीन शोध्य किसी किस्त या रकम का भागत: संदाय करना; या
(ख) किसी कंपनी या सहकारी सोसाइटी को, जिसका निर्धारिती कोर्इ शेयरधारक या सदस्य है, आबंटित गृह संपत्ति की लागत के लिए शोध्य किस्त या रकम का भागत: संदाय करना, या
(ग) निर्धारिती द्वारा निम्नलिखित से उधार ली गर्इ रकम को लौटाना–
(1) केंद्रीय सरकार या कोर्इ राज्य सरकार से, या
(2) किसी बैंक से जिसके अंतर्गत सहकारी बैंक है, या
(3) जीवन बीमा निगम से, या
(4) राष्ट्रीय आवास बैंक से, या
(5) किसी पब्लिक कंपनी से, जो भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए मकान बनाने या खरीदने के लिए दीर्घकालिक वित्त पोषण कराने के कारबार को चलाने के मुख्य उद्देश्य से भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्टर्ड है, 27[और जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है], या
(6) किसी कंपनी से, जिसमें जनता काफी हितबद्ध है या किसी सहकारी सोसाइटी से, जहां ऐसी कंपनी या सहकारी सोसाइटी मकानों को बनाने के लिए वित्त पोषण करने के कारबार में लगी हुर्इ है, या
28[(6क) निर्धारिती के नियोजक से, जहां ऐसा नियोजक, किसी केन्द्रीय या राज्य अधिनियम के अंतर्गत स्थापित या गठित कोर्इ प्राधिकरण या कोर्इ बोर्ड या कोर्इ निगम अथवा कोर्इ अन्य निकाय है; या]
(7) निर्धारिती के नियोजक से, जहां ऐसा नियोजक कोर्इ पब्लिक कंपनी है या पब्लिक सेक्टर कंपनी या विधि द्वारा स्थापित कोर्इ विश्वविद्यालय या ऐसे विश्वविद्यालय से संबद्ध कोर्इ महाविद्यालय या कोर्इ स्थानीय प्राधिकरण 29[या कोर्इ सहकारी सोसाइटी] है;
(घ) निर्धारिती की ऐसी गृह संपत्ति के अंतरण के प्रयोजन के लिए स्टाम्प शुल्क, रजिस्ट्रीकरण फीस और अन्य व्यय,
किन्तु इसके अंतर्गत निम्नलिखित के लिए या के रूप में कोर्इ संदाय नहीं है–
(अ) प्रवेश शुल्क, शेयर की लागत और आरंभिक निक्षेप, जिसका भुगतान कंपनी के शेयर धारक को या सहकारी सोसाइटी के सदस्य को ऐसा शेयर धारक या सदस्य बनने के लिए करना पड़ता है; या
(आ) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]
(इ) गृह संपत्ति के संबंध में किसी परिवर्धन या परिवर्तन अथवा उसके नवीकरण या मरम्मत की लागत, जो प्रमाणपत्र जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस गृह संपत्ति की बाबत समापन प्रमाणपत्र जारी करने के पश्चात् या गृह संपत्ति या उसके किसी भाग को निर्धारिती द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अधिभोग में लेने या उसे किराए पर देने के पश्चात् की जाती है; या
(र्इ) कोर्इ व्यय जिसकी बाबत कटौती धारा 24 के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय है;
30[(xvi) किसी पब्लिक कंपनी द्वारा किए गए आवेदन पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित किसी उपयुक्त पूंजी पुरोधरण के भागरूप साधारण शेयरों या डिबेंचरों के अभिदाय स्वरूप 31[अथवा किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा विहित प्ररूप32 में उपयुक्त किसी पूंजी पुरोधरण के लिए अभिदाय स्वरूप] :
परन्तु जहां किन्हीं साधारण शेयरों या डिबेंचरों की लागत के निर्देश में इस खंड के अधीन कटौती का दावा किया जाता है और वह मंजूर किया जाता है वहां ऐसे शेयरों और डिबेंचरों की लागत को धारा 54 ड़क और 54ड़ख के प्रयोजनों के लिए हिसाब में लिया जाएगा।
33[स्पष्टीकरण.--इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–
(i) "उपयुक्त पूंजी पुरोधरण" से भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत किसी पब्लिक कंपनी या किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा किया गया पुरोधरण अभिप्रेत है और ऐसे पुरोधरण के संपूर्ण आगमों का उपयोग पूर्ण रूप से और अनन्य रूप से धारा 80 झक की उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी कारबार के प्रयोजनों के लिए किया जाता है;
(ii) "पब्लिक कंपनी"34 का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है;
(iii) "लोक वित्तीय संस्था"35 का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 क में है;]
(xvii) धारा 10 के खंड (23घ) में निर्दिष्ट किसी पारस्परिक निधि की और ऐसी पारस्परिक निधि द्वारा प्ररूप36 में किए गए आवेदन पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित किन्हीं यूनिटों के लिए अभिदाय स्वरूप:
परन्तु जहां यूनिटों की लागत के निर्देश में इस खंड के अधीन कटौती का दावा किया जाता है और वह मंजूर किया जाता है वहां ऐसी यूनिटों की लागत को धारा 54 ड़क और धारा 54 ड़ख के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा:
परन्तु यह और कि यह खंड तब लागू होगी जब यदि ऐसे यूनिटों के अभिदाय की रकम का अभिदाय केवल किसी कम्पनी के उपयुक्त पूंजी पुरोधरण में ही किया जाता है।
स्पष्टीकरण.– इस खंड के प्रयोजनों के लिए "उपयुक्त पूंजी पुरोधरण" से वह पुरोधरण अभिप्रेत है जो धारा 88 की उपधारा (2) के खंड (xvi) के स्पष्टीकरण के खंड (i) में निर्दिष्ट है।]
37[(2क) उपधारा (2) के उपबंध किसी आस्थगित वार्षिकी संबंधी किसी संविदा से भिन्न किसी बीमा पालिसी के लिए दी गर्इ प्रीमियम या अन्य संदाय के उतने भाग को हीे लागू होंगे जो वास्तविक बीमा पूंजी राशि के बीस प्रतिशत से अधिक नहीं है।
स्पष्टीकरण.–किसी ऐसी वास्तविक पूंजी राशि की संगणना करने में,--
(i) वापस किए जाने के लिए करार पार्इ गर्इ किन्हीं प्रीमियमों के मूल्य को; या
(ii) वास्तविक बीमा राशि के अतिरिक्त बोनस के रूप में या अन्यथा होने वाले किसी फायदे को, जो किसी व्यक्ति द्वारा पालिसी के अधीन प्राप्त किया जाना है या किया जाए,
हिसाब में नहीं लिया जाएगा।]
38[(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट राशियां, पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय संदत्त या जमा की जाएंगी और निर्धारिती, जो व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुंब है, उपधारा (1) के अधीन ऐसी संदत्त या जमा कुल राशियों में से उतनी कटौती का हकदार होगा, जो सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान कर से प्रभार्य निर्धारिती की कुल आय से अधिक नहीं है।]
(4) उपधारा (2) में उल्लिखित व्यक्ति निम्नलिखित होंगे, अर्थात्–
39[(क) उस उपधारा के खंड (i), खंड (v), खंड (xii) और खंड (xiii) के प्रयोजनों के लिए–
(i) किसी व्यष्टि की दशा में, वह व्यष्टि, ऐसे व्यष्टि की पत्नी या उसका पति और कोर्इ बच्चा, और
(ii) किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में, उसका कोर्इ सदस्य;]
(ख) उस उपधारा के खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए–
(i) किसी व्यष्टि की दशा में, वह व्यष्टि, ऐसे व्यष्टि की पत्नी या उसका पति और कोर्इ बच्चा, और
(ii) 40[* * *]
(ग) उस उपधारा के 41[खंड (viii)] के प्रयोजनों के लिए–
(i) किसी व्यक्ति की दशा में वह व्यक्ति, या ऐसा अवयस्क जिसका वह संरक्षक है;
(ii) किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में, कुटुम्ब का कोर्इ सदस्य,
(iii) 42[* * *]
43[(घ) उस उपधारा के खंड (xivख) के प्रयोजन के लिए, किसी व्यष्टि की दशा में ऐसे व्यष्टि के कोर्इ दो बच्चे।]
44[(5) जहां उपधारा (2) के खंड (i) से खंड (xvii) में निर्दिष्ट किन्हीं राशियों का योग एक लाख रुपए की रकम से अधिक है, वहां उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने भाग के प्रतिनिर्देश करते हुए अनुज्ञात की जाएगी जो एक लाख रुपए की रकम से अधिक नहीं है :
परन्तु जहां उपधारा (2) के खंड (i) से खंड (xv) में निर्दिष्ट किन्हीं राशियों का योग सत्तर हजार रुपए की रकम से अधिक है, वहां उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने भाग के प्रतिनिर्देश करते हुए अनुज्ञात की जाएगी जो सत्तर हजार रुपए की रकम से अधिक नहीं है :
परन्तु यह और कि जहां कि उपधारा (2) के खंड (xv) में निर्दिष्ट किन्हीं राशियों का योग बीस हजार रुपए की रकम से अधिक है वहां उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने भाग के प्रतिनिर्देश से अनुज्ञात की जाएगी जो बीस हजार रुपए की रकम से अधिक नहीं है :]
45[परंतु यह भी कि जहां किसी बच्चे की बाबत उपधारा (2) के खंड (xivख) में विनिर्दिष्ट किसी राशि का योग बारह हजार रुपये से अधिक हो जाता है, वहां ऐसी राशि की बाबत उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने भाग के निर्देश में अनुज्ञात की जाएगी जो ऐसे बच्चे की बाबत बारह हजार रुपए की राशि से अधिक नहीं है।]
(5क) 46[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया।]
(6) 47[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया।]
(7) जहां निर्धारिती किसी पूर्ववर्ष में–
(i) उपधारा (2) के खंड (i) में निर्दिष्ट अपनी 48[बीमा संविदा,–
(क) किसी एकल प्रीमियम पालिसी की दशा में, बीमा प्रारंभ होने की तारीख के बाद दो वर्ष के भीतर, या
(ख) किसी अन्य दशा में, दो वर्ष तक प्रीमियमों का संदाय किए जाने से पूर्व;]
इस आशय की सूचना देकर या जहां संविदा कोर्इ प्रीमियम न दे पाने के कारण प्रवृत्त नहीं रहती वहां उस बीमा संविदा को पुनरुज्जीवित न करके, समाप्त कर देता है; या
(ii) उपधारा (2) के खंड (xii) या खंड (xiii) में निर्दिष्ट यूनिट सहबद्ध बीमा योजना में उस आशय की सूचना देकर अपनी भागीदारी समाप्त कर देता है या जहां वह ऐसी भागीदारी की बाबत पांच वर्ष तक अभिदाय करने से पूर्व, अपनी सहभागिता पुनरुज्जीवित न करके, कोर्इ अभिदाय न कर पाने के कारण भागीदार नहीं रहता है; या
(iii) उपधारा (2) के खंड (xv) में निर्दिष्ट गृह संपत्ति को उस वित्तीय वर्ष के अंत से जिसमें उसके द्वारा ऐसी संपत्ति का कब्जा अभिप्राप्त किया जाता है पांच वर्ष की समाप्ति से पूर्व अंतरित कर देता है, या उस खंड में विनिर्दिष्ट कोर्इ रकम प्रतिदाय के रूप में या अन्यथा वापस प्राप्त की जाती है,
वहां,–
(क) उपधारा (2) के खंड (i), खंड (xii), खंड (xiii) और खंड (xv) में उल्लिखित किसी ऐसी राशि के निर्देश में जो उस पूर्ववर्ष में संदत्त की गर्इ हो, उपधारा (1) के अधीन निर्धारिती को कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी, और
(ख) पूर्ववर्ष या ऐसे पूर्ववर्ष के पहले के वर्षों की बाबत इस प्रकार अनुज्ञात की गर्इ आयकर की कटौतियों की कुल रकम ऐसे पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष में निर्धारिती द्वारा संदेय कर समझी जाएगी और निर्धारिती की कुल आय पर कर में, जिससे वह ऐसे निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य है, जोड़ दी जाएगी।
49[(7क) यदि किन्हीं साधारण शेयरों या डिबेंचरों को, जिनकी लागत के प्रति निर्देश में, उपधारा (1) के अधीन कटौती अनुज्ञात की जाती है, निर्धारिती द्वारा, उनके अर्जन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर किसी समय किसी व्यक्ति को बेच देता है या अन्यथा अंतरित कर देता है तो, उस पूर्ववर्ष या पूर्ववर्ष के पूर्ववर्ती वर्षों में जिसमें ऐसा विक्रय या अंतरण होता है, ऐसे साधारण शेयरों या डिबेंचरों की बाबत आय-कर की कटौतियों की सकल राशि ऐसी पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती द्वारा संदेय कर समझी जाएगी और निर्धारिती की कुल आय पर आय-कर की राशि में, जिससे वह ऐसे निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य है, जोड़ दी जाएगी।
स्पष्टीकरण.–किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने, उस तारीख को ऐसी शेयर या डिबेंचरों को अर्जित किया है जिसको उसका नाम पब्लिक कंपनी के यथास्थिति, सदस्यों या डिबेंचर धारकों के रजिस्टर में उन शेयरों या डिबेंचरों के संबंध में दर्ज किया जाए।]
(8) इस धारा में,–
(i) किसी निधि में "अभिदाय" के अंतर्गत ऋण को प्रतिसंदाय में दी गर्इ राशि या नहीं आएगी;
(ii) "बीमा" के अंतर्गत निम्नलिखित होंगे–
(क) किसी व्यष्टि या ऐसे व्यष्टि के पति या पत्नी या बच्चे या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य की जीवन बीमा पालिसी, जो परिपक्वता की नियत तारीख को, यदि ऐसा व्यक्ति उस तारीख को जीवित है इस बात के होते हुए भी कि वह बीमा पालिसी ऐसे व्यक्ति की उक्त नियत तारीख से पहले मृत्यु हो जाने की दशा में, केवल दी गर्इ प्रीमियमों की (उन पर किसी ब्याज सहित या उसके बिना) वापसी के लिए उपबंध करती है, विनिर्दिष्ट कर के संदाय को सुनिश्चित करती है।
(ख) किसी व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के किसी सदस्य द्वारा अवयस्क के फायदे के लिए इस उद्देश्य से ली गर्इ बीमा पालिसी कि अवयस्क, वयस्क हो जाने पर उस पालिसी को अंगीकार करके और (ऐसे अंगीकरण के पश्चात्) किसी ऐसी तारीख को जो पालिसी में इस निमित्त विनिर्दिष्ट हों, जीवित रहने पर अपने जीवन का बीमा सुनिश्चित कर सके;
(iii) "जीवन बीमा निगम" से जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम अभिप्रेत है;
(iv) "पब्लिक कंपनी"50 का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है;
(v) "प्रतिभूति" से लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खंड (2) में परिभाषित सरकारी प्रतिभूति51 अभिप्रेत है;
(vi) "अंतरण" के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अंतर्गत धारा 269 पक के खंड (च) में उल्लिखित संव्यवहार भी है।
52[ (9) इस धारा के अधीन ऐसे किसी निर्धारिती को, जो कोर्इ व्यष्टि या कोर्इ हिंदू अविभक्त कुटुंब है, 1 अप्रैल, 2005 से आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती वर्षों के लिए आय-कर की रकम से कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।]
5. सुसंगत केस लाज़ देखिए।
6. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1991 से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से, वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1991 से, भूतलक्षी प्रभाव से, और वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से यथासंशोधित उपधारा (1) इस प्रकार थी :
'(1) इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए कोर्इ निर्धारिती जो–
(क) व्यष्टि है, या
(ख) हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है, [* * *]
(ग) [* * *]
अपनी कुल आय पर निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य आयकर की रकम में से (जो इस अध्याय के अधीन कटौती अनुज्ञात करने से पूर्व संगणित की गर्इ है) उपधारा (2) में निर्दिष्ट राशियों के योग के बीस प्रतिशत के बराबर रकम की कटौती का हकदार होगा:
परन्तु किसी ऐसे व्यष्टि की दशा में जिसकी लेखक, नाटककार, कलाकार, संगीतज्ञ, अभिनेता या खिलाड़ी (जिसके अंतर्गत खेलकूद में भाग लेने वाला खिलाड़ी भी सम्मिलित है) के रूप में वृत्ति (पेशा) करने से उसे प्राप्त आय उसकी आय के पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक है, इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "बीस प्रतिशत" शब्दों के स्थान पर "पच्चीस प्रतिशत" शब्द रखे गए हों :
परन्तु यह और कि कोर्इ व्यक्ति उपधारा (2) में निर्दिष्ट राशियों के योग के तीस प्रतिशत के बराबर रकम की कटौती का हकदार होगा यदि "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य उसकी आय–
(क) धारा 16 के अधीन कटौती अनुज्ञात किए जाने के पहले के पूर्ववर्ष के दौरान एक लाख रुपए से अधिक नहीं है; और
(ख) धारा 80 ख की उपधारा (5) में परिभाषित उसकी सकल कुल आय के नब्बे प्रतिशत से कम नहीं है।'
7. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से "कर से प्रभार्य उसकी आय में से" शब्दों का लोप किया गया।
8. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से "जो धारा 80 गगक की उपधारा (1) के खंड (ii) में निर्दिष्ट वार्षिकी योजना न हो" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
9. लोक भविष्य निधि अधिसूचित की जा चुकी है। देखिए : का.आ.55(र्इ), तारीख 31.1.1991.
10. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अंत:स्थापित।
11. राष्ट्रीय बचत स्कीम अधिसूचित की जा चुकी है। देखिए सा.का.नि. 819(र्इ), तारीख 21.10.1992। यह स्कीम 1.11.2002 से बंद कर दी गर्इ है [देखिए सा.का.नि. 710(र्इ.), तारीख 17.10.2002]।
12. "बचत पत्र" की परिभाषा के लिए, देखिए पूर्व पृष्ठ 1.161 पर पाद टिप्पण 45.
13. राष्ट्रीय बचत पत्र (आठवां निर्गम) अधिसूचित किया जा चुका है देखिए का.आ.54(र्इ), तारीख 31.1.1991.
14. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से "किसी व्यक्ति द्वारा" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
15. यथोक्त द्वारा "किसी व्यष्टि द्वारा" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
16. जीवन बीमा निगम म्युचुअल फंड की धनरक्षा 1989 योजना–देखिए का.आ. 56(र्इ), तारीख 31.1.1991.
17. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अंत:स्थापित।
18. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित।
19. जीवन बीमा निगम की जीवनधारा और जीवनअक्षय योजना–देखिये अधिसूचना सं. सा.का.नि. 801(र्इ), तारीख 7.10.1992. जीवन बीमा निगम की नर्इ जीवनधारा/नर्इ जीवन अक्षय योजना–देखिये अधिसूचना सं. 71/2002 [फा.सं. 174/9/2001-आर्इ.टी.(ए-1)], तारीख 2.4.2002 – देखिए अधिसूचना सं. का.आ. 306(र्इ), तारीख 18.3.2003/नर्इ जीवन अक्षय-II–देखिए अधिसूचना सं. का.आ. 569(र्इ.), तारीख 13.5.2004.
20. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से अंत:स्थापित।
21. भारतीय यूनिट ट्रस्ट की सेवानिवृत्ति सुविधा यूनिट स्कीम–देखिए अधिसूचना सं. 9598 [फा.सं. 149/100/94-टी.पी.एल.], तारीख 1.9.1994/कोठारी पायनियर पेंशन प्लान-अधिसूचना सं. का.आ. 76(र्इ), तारीख 30.1.1997.
22. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अंत:स्थापित।
23. राष्ट्रीय आवास बैंक की होम लोन अकाउंट स्कीम अधिसूचित की जा चुकी है–देखिए का.आ. 57(र्इ), तारीख 31.1.1991.
24. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से अंत:स्थापित।
25. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।
26. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से "जिसका निर्माण 31 मार्च, 1987 के पश्चात् पूरा हुआ है, और" शब्दों का लोप किया गया।
27. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2000 से "और जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
28. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.4.2005 से अंत:स्थापित।
29. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से अंत:स्थापित।
30. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित।
31. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अंत:स्थापित।
32. देखिये नियम 20 और प्ररूप सं. 59.
33. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से, वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से और वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से यथा संशोधित स्पष्टीकरण इस प्रकार था:
'स्पष्टीकरण.--इस खंड के प्रयोजनों के लिए–
(i) "उपयुक्त पूंजी पुरोधरण निर्गम" से भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्टर की गर्इ पब्लिक कंपनी या लोक वित्तीय संस्था द्वारा किया गया पुरोधरण अभिप्रेत है और पुरोधरण के सम्पूर्ण आगमों का उपयोग पूर्णत: या अन्यत: तो मूलभूत सुविधाएं विकसित करने, बनाए रखने और उन्हें चलाने के प्रयोजनों के लिए किया जाता है या विद्युत जनन या जनन और वितरण के लिए या दूर संचार सेवाएं चाहे बुनियादी या सेलुलर उपलब्ध कराने के लिए;
(ii) "मूलभूत सुविधा" का वही अर्थ है जो धारा 80 झक की उपधारा (4) के स्पष्टीकरण में है;
(iii) "पब्लिक कंपनी" का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है;
(iv) "लोक वित्तीय संस्था" का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 क में है;'
34. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3 (1) के खंड (iv) में 'पब्लिक कंपनी' की परिभाषा दी गर्इ है। धारा 3 के पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट।
35. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4 क के पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट।
36. देखिए नियम 20क और प्ररूप सं. 59क.
37. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।
38. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व विद्यमान उपधारा (3) का वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से लोप किया गया।
39. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित।
40. यथोक्त द्वारा लोप किया गया।
41. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से "खंड (v) और (viii)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
42. यथोक्त द्वारा लोप किया गया।
43. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व खंड (घ) का वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से लोप किया गया था।
44. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से यथासंशोधित उपधारा (5) इस प्रकार थी :
"(5) जहां उपधारा (2) के खंड (xv) में विनिर्दिष्ट किन्हीं राशियों को योग बीस हजार रुपए की रकम से अधिक है वहां उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने भाग के निर्देश में अनुपात की जाएगी जो बीस हजार रुपए से अधिक नहीं है।"
45. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।
46. लोप किए जाने से पूर्व, उपधारा (5क), जो वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित की गर्इ थी, इस प्रकार थी :
"(5क) जहां उपधारा (2) के खंड (i) से खंड (xv) में विनिर्दिष्ट किन्ही राशियों का योग साठ हजार रुपए की रकम से अधिक है वहां उपधारा (1) के अधीन कटौती ऐसे योग के उतने योग के निर्देश में अनुज्ञात की जाएगी जो साठ हजार रुपए की राशि से अधिक नहीं है :
परन्तु उपधारा (1) के परन्तुक में उल्लिखित व्यक्ति की दशा में, इस उपधारा के उपबंधों का वही प्रभाव होगा मानो "साठ हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर "सत्तर हजार रुपए" शब्द रखे गए हों।"
47. लोप किए जाने से पूर्व, उपधारा (6) का वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से और वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से संशोधन किया गया था।
48. वित्त अधिनियम, 1995 द्वारा 1.4.1996 से "बीमा संविदा, दो वर्ष तक प्रीमियम दिए जाने से पूर्व" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
49. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित।
50. कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 (1) के खंड (iv) में "पब्लिक कंपनी" की परिभाषा दी गर्इ है। धारा 3 के पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट।
51. "सरकारी प्रतिभूति" की परिभाषा के लिए देखिए पूर्व पृष्ठ 1.596 पर पाद टिप्पण 75.
52. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा संशोधित रूप में]

