सहकारी सोसाइटियों की आय के संबंध में कटौती
4[सहकारी सोसाइटियों की आय के संबंध में कटौती
580त. (1) जहां किसी निर्धारिती की दशा में, जो सहकारी सोसाइटी है, उसकी सकल कुल आय में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कोर्इ आय सम्मिलित है, वहां निर्धारिती की कुल आय में संगणना करने में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट राशियों की कटौती इस धारा के उपबंधों के अनुसार और अध्यधीन की जाएगी।
(2) उपधारा (1) में उल्लिखित राशियां निम्नलिखित होंगी, अर्थात् :–
(क) ऐसी सहकारी सोसाइटी की दशा में जो–
(i) बैंककारी के या अपने सदस्यों6 को उधार सुविधाएं उपलब्ध कराने6 के कारबार में लगी हुर्इ है, या
(ii) कुटीर उद्योग6 में लगी हुर्इ, या
7[(iii) अपने सदस्यों द्वारा उगार्इ हुर्इ कृषि उपज के विपणन8 में लगी हुर्इ है, या]
(iv) अपने सदस्यों को प्रदाय करने के प्रयोजन के लिए कृषि के उपकरणों, बीजों, पशुधन या कृषि के लिए आशयित अन्य चीजों के क्रय में लगी हुर्इ है, या
(v) अपने सदस्यों की कृषि उपज के, शक्ति की सहायता के बिना, प्रसंस्करण में लगी हुर्इ, 9[या]
9[(vi) जो अपने सदस्यों के श्रम के सामूहिक व्ययन में लगी हुर्इ है, या
(vii) मछली पकड़ने या सहबद्ध क्रियाकलापों में लगी हुर्इ है अर्थात् मछली पकड़ने या उसका संसाधन, प्रसंस्करण, परिरक्षण, भंडारकरण या विपणन में या अपने सदस्यों को प्रदाय करने के प्रयोजन के लिए उनसे संबद्ध सामग्री और उपस्कर को क्रय करने में लगी हुर्इ है,]
ऐसे क्रियाकलापों में से किसी एक या अधिक से हुए माने जा सकने वाले कारबार के लाभ और अभिलाभ की संपूर्ण रकम10 :
11[परन्तु यह जबकि उपखंड (vi) या उपखंड (vii) के अंतर्गत आने वाली सहकारी सोसाइटी की दशा में, उस सोसाइटी के नियम और उपविधियां उसके सदस्यों के मताधिकार को निम्नलिखित वर्गों तक निर्बंधित करती है, अर्थात् :–
(1) व्यष्टि, जो अपने श्रम का अभिदान करते हैं या, यथास्थिति, मछली पकड़ने का या सहबद्ध क्रियाकलाप करते हैं;
(2) सहकारी प्रत्यय सोसाइटियां, जो उस सोसाइटी को वित्तीय सहायता देती हैं;
(3) राज्य सरकार;]
12[(ख) ऐसी सहकारी सोसाइटी की दशा में, जो ऐसी प्राथमिक सोसाइटी है जो अपने सदस्यों द्वारा उत्पादित या तैयार किए गए दूध, तिलहन, फलों या सब्जियों का प्रदाय–
(i) किसी परिसंघ सहकारी सोसाइटी को, जो ऐसी सोसाइटी है जो, यथास्थिति, दूध, तिलहन, फलों या सब्जियों के प्रदाय का कारबार करती है; या
(ii) सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को; या
(iii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित किसी सरकारी कंपनी13 को या किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित निगम को (जो ऐसी कंपनी या निगम है जो जनता को, यथास्थिति, दूध, तिलहन, फलों या सब्जियों का प्रदाय करने में लगा हुआ है),
करने में लगी हुर्इ, ऐसे कारबार के लाभ और अभिलाभ की संपूर्ण रकम;]
(ग) ऐसी सहकारी सोसाइटी की दशा में, जो खंड (क) या (ख) में विनिर्दिष्ट से भिन्न क्रियाकलापों14 में, (ऐसे विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों में से सब या किसी से स्वतंत्र रूप में या अतिरिक्त) लगी हुर्इ है उसके ऐसे क्रियाकलापों से माने जा सकने वाले14 लाभों और अभिलाभों में इतना 15[जितना–
(i) जहां ऐसी सहकारी सोसाइटी उपभोक्ता सहकारी सोसाइटी है, 16[एक लाख] रुपए से अधिक नहीं है; और
(ii) किसी अन्य दशा में, 17[पचास] हजार रुपए से अधिक नहीं है।
स्पष्टीकरण.–इस खंड में ‘‘उपभोक्ता सहकारी सोसाइटी’’ से ऐसी सोसाइटी अभिप्रेत है जो उपभोक्ताओं के फायदे के लिए है;]
(घ) सहकारी सोसाइटी की किसी अन्य सहकारी सोसाइटी में उसके विनिधानों से व्युत्पन्न ब्याज या लाभांशों के रूप में किसी आय के संबंध में ऐसी संपूर्ण आय;
(ड़) सहकारी सोसाइटी की वस्तुओं के भंडारकरण, प्रसंस्करण या उपयोगी वस्तुओं के विपणन को सुकर बनाने18 के लिए गोदामों या भांडागारों18 को किराए पर उठाने से व्युत्पन्न किसी आय के संबंध में ऐसी संपूर्ण आय;
(च) ऐसी सहकारी सोसाइटी की दशा में, जो आवासन सोसाइटी या नगरीय उपभोक्ता सोसाइटी या परिवहन कारबार करने वाली सोसाइटी की शक्ति की सहायता से किन्हीं विनिर्माण संक्रियाओं के संप्रदान में लगी हुर्इ सोसाइटी नहीं है, जहां सकल कुल आय बीस हजार रुपए से अधिक नहीं है, वहां 19[***] प्रतिभूतियों पर ब्याज के रूप में किसी आय या धारा 22 के अंतर्गत प्रभार्य गृह संपत्ति से किसी आय की रकम।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए ‘‘नगरीय उपभोक्ता सहकारी सोसाइटी’’ का अर्थ है किसी नगर निगम, नगरपालिका, नगरपालिका समिति, अधिसूचित क्षेत्र समिति, नगर क्षेत्र या छावनी की परिसीमा के अंदर उपभोक्ताओं के फायदे के लिए कोर्इ सोसाइटी।
(3) उस दशा में, जिसमें निर्धारिती 20[***] 21[धारा 80जज] 22[या धारा 80जजक] 23[या धारा 80जजख] 24[या धारा 80जजग] 25[या धारा 80जजघ] 26[या धारा 80झ] 27[या धारा 80झक] या 28धारा 80 ञ 29[***] 30[***] के अधीन भी कटौती के लिए हकदार है, वहां उपधारा (2) के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) में विनिर्दिष्ट राशियों के संबंध में इस धारा की उपधारा (1) के अधीन कटौती, सकल कुल आय में सम्मिलित उन खंडों में यथाविनिर्दिष्ट आय के, यदि कोर्इ हो, प्रति निदेश से जैसी कि वह 31[***] 32[धारा 80जज,] 33[धारा 80जजक,] 34[धारा 80जजख,] 35[धारा 80जजग,] 36[धारा 80जजघ,] 37[धारा 80झ,] 38[धारा 80झक,] 39[40[धारा 80 ञ41 और धारा 80 ञ]] के अधीन कटौतियां] घटा कर आए, अनुज्ञात की जाएगी।]
42[(4) इस धारा के उपबंध किसी प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी या किसी प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक से भिन्न किसी सहकारी बैंक के संबंध में लागू नहीं होंगे।
स्पष्टीकरण–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,–
(क) “सहकारी बैंक” और “प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसायटी” के वही अर्थ होंगे जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के भाग 5 में क्रमश: उनके हैं;
(ख) “प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक” से ऐसी सोसाइटी अभिप्रेत है, जिसका प्रचालन क्षेत्र किसी तालुक तक सीमित है और जिसका मुख्य उद्देश्य कृषि तथा ग्रामीण विकास के क्रियाकलापों के लिए दीर्घकालिक उधार उपलब्ध कराना है।]
4. धारा 81 के स्थान पर अंत:स्थापित, जिसका वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से लोप किया गया था।
5. परिपत्र सं. 722, तारीख 19.9.1995 और परिपत्र सं. 6/2010, तारीख 20.9.2010 भी देखिए।
सुसंगत केस लॉज देखिए।
6. ‘‘उधार सुविधाएं उपलब्ध कराने’’, ‘‘सदस्य’’ और ‘‘कुटीर उद्योग’’ पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
7. आय-कर (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1968 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 द्वारा यथा अंत:स्थापित उपखंड (iii) निम्नलिखित रूप में था :
‘‘(iii) अपने सदस्यों की कृषि उपज के विपणन में लगी हुर्इ है, या’’।
8. ‘विपणन’ पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
9. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से अंत:स्थापित।
10. “ऐसे क्रियाकलापों ............... अभिलाभ की संपूर्ण रकम” पद के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
11. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से अंत:स्थापित।
12. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व यह वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1979 से प्रतिस्थापित किया गया था।
13. ‘‘सरकारी कंपनी’’ की परिभाषा के लिए, देखिए पूर्व पृष्ठ 1.31 पर पाद टिप्पण 64.
14. ‘‘क्रियाकलाप’’ और ‘‘माने जा सकने वाले’’ पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
15. वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से ‘‘जितना बीस हजार रुपए से अधिक नहीं है’’ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इटैलिक शब्दों को वित्त अधिनियम, 1969 द्वारा 1.4.1970 से ‘‘पंद्रह हजार’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया था।
16. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से ‘‘चालीस’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।
17. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से ‘‘बीस’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।
18. ‘‘गोदामों या भांडागारों’’ और ‘‘उपयोगी वस्तुओं के विपणन को सुकर बनाने’’ पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए।
19. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से ‘‘धारा 18 के अधीन प्रभार्य’’ का लोप किया गया।
20. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से ‘‘धारा 80ज या’’ का लोप किया गया।
21. प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित।
22. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से अंत:स्थापित।
23. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
24. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
25. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
26. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित।
27. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
28. अब धारा 80 ञ का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से लोप किया जा चुका है।
29. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से ‘‘या धारा 80 ञञ’’ शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व कोट किए गए शब्द वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित किए गए थे और बाद में वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से उनका लोप किया गया और पुन: वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से अंत:स्थापित किए गए।
30. ‘‘या धारा 80 ञञक’’ का, जिसे पहले वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से अंत:स्थापित किया गया था, वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से लोप किया गया।
31. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से ‘‘धारा 80ज,’’ का लोप किया गया।
32. प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित।
33. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से अंत:स्थापित।
34. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
35. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
36. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
37. वित्त अधिनियम, 1981 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित।
38. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1991 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
39. वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से ‘‘धारा 80 ञ और धारा 80 ञञ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, ‘‘धारा 80 ञ और धारा 80 ञञ’’ शब्द वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से ‘‘धारा 80 ञ, धारा 80 ञ ञ और धारा 8 ञ ञक’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे। ‘‘धारा 80 ञ, धारा 80 ञ ञ और धारा 80 ञ ञ’’ शब्द वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से ‘‘धारा 80 ञ और धारा 80 ञ ञ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे और ‘‘धारा 80 ञ और धारा 80 ञ ञ’’ शब्द वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से ‘‘और धारा 80 ञ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे।
40. वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से ‘‘और धारा 80 ञ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।
41. अब धारा 80 ञ का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से लोप किया जा चुका है।
42. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व उपधारा (4) का वित्त अधिनियम, 1969 द्वारा 1.4.1970 से लोप किया गया था।
[वित्त अधिनियम, 2015 द्वारा संशोधित रूप में]

