अपतट बैंककारी यूनिटों और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र की कतिपय आय की बाबत कटौतियां
46क[अपतट बैंककारी यूनिटों की कतिपय आय की बाबत कटौती
80ठक. (1) जहां किसी ऐसे निर्धारिती की,–
(i) जो अनुसूचित बैंक (भारत से बाहर के किसी देश की विधि द्वारा या उसके अधीन निगमित बैंक नहीं) है;
(ii) जो किसी विशेष आर्थिक जोन में अपतट बैंककारी यूनिटों का स्वामी है,
सकल कुल आय में उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोर्इ आय सम्मिलित है, वहां इस धारा के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए, ऐसी आय से ऐसी कटौती अनुज्ञात की जाएगी जो,–
(क) उस पूर्व वर्ष से, जिसमें बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा23की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अनुज्ञा अभिप्राप्त की गर्इ थी, सुसंगत निर्धारण वर्ष से प्रारंभ होने वाले तीन क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों के लिए ऐसी आय के शतप्रतिशत के बराबर रकम होगी, और उसके पश्चात्;
(ख) दो क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों के लिए ऐसी आय के पचास प्रतिशत के बराबर रकम होगी।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट आय--
(क) किसी विशेष आर्थिक जोन में किसी अपतट बैंककारी यूनिट से;
(ख) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 6 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी कारबार से, जो किसी विशेष आर्थिक जोन में अवस्थित उपक्रम के साथ या ऐसे किसी अन्य उपक्रम के साथ किया गया हो, जो किसी विशेष आर्थिक जोन का विकास करता है, विकास और प्रचालन करता है या प्रचालन और अनुरक्षण करता है;
(ग) विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में प्राप्त,
आय होगी।
(3) इस धारा के अधीन कोर्इ कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि निर्धारिती आय की विवरणी के साथ--
(i) धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे स्पष्टीकरण में यथापरिभाषित लेखापाल की रिपोर्ट विहित प्ररूप में46ख, जिसमें यह प्रमाणित किया गया है कि उक्त कटौती का इस धारा के उपबंधों के अनुसार सही रूप से दावा किया गया है; और
(ii) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 23 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अभिप्राप्त अनुज्ञा की एक प्रति,
नहीं देता है।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,--
(क) "संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा" का वही अर्थ है जो उसका धारा 80ड़जग की उपधारा (4ग) के नीेच स्पष्टीकरण के खंड (क) में है;
(ख) "अपतट बैंककारी यूनिट" से भारत में किसी ऐसे बैंक की शाखा अभिप्रेत है जो किसी विशेष आर्थिक जोन में अवस्थित हो और जिसने बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा23 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अनुज्ञा प्राप्त कर ली है;
(ग) "अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है जो उसका भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा2 के खंड (ड़) में है;
(घ) "विशेष आर्थिक जोन" का वहीं अर्थ है जो उसकाधारा 10क के स्पष्टीकरण 2 के खंड (viii) में है।]
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा संशोधित रूप में]

