निर्यात कारबार के लिए प्रतिधारित लाभों की बाबत कटौती
निर्यात कारबार के लिए प्रतिधारित लाभों की बाबत कटौती
80जजग. (1) जहां कोर्इ निर्धारिती जो भारतीय कंपनी है या (कंपनी से भिन्न) ऐसा व्यक्ति है जो भारत में निवासी है, भारत के बाहर किसी ऐसे माल या वाणिज्या के निर्यात के कारबार में लगा है जिसको यह धारा लागू होती है, वहां इस धारा के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए निर्धारिती की कुल आय की संगणना करने में ऐसे माल या वाणिज्या के निर्यात से निर्धारिती द्वारा प्राप्त लाभों की उस सीमा तक जो उपधारा (1ख) में निर्दिष्ट है; कटौती] अनुज्ञात की जाएगी :
परन्तु यह कि यदि निर्धारिती, जो निर्यात गृह प्रमाणपत्र या व्यापार गृह प्रमाणपत्र का धारक है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् यथास्थिति, निर्यात गृह या व्यापार गृह कहा गया है) उपधारा (4क) के खंड (ख) में उल्लिखित यह प्रमाणपत्र देता है कि उसमें विनिर्दिष्ट निर्यात आवर्त की रकम की बाबत इस उपधारा के अन्तर्गत कटौती किसी पृष्ठपोषक विनिर्माता को अनुज्ञात की जाए तो निर्धारिती की दशा में कटौती की रकम में से ऐसी रकम घटा दी जाएगी जिसका निर्धारिती को व्यापार माल के निर्यात से व्युत्पन्न कुल लाभ से वही अनुपात है जो उक्त प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट निर्यात-आवर्त की रकम का ऐसे व्यापार माल की बाबत निर्धारिती के कुल निर्यात-आवर्त से है।
(1क) जहां निर्धारिती ने जो पृष्ठपोषक निर्माता है, पूर्ववर्ष के दौरान किसी निर्यात गृह या व्यापार गृह को किसी माल या वाणिज्या का विक्रय किया है जिसकी बाबत निर्यात गृह या व्यापार गृह ने उपधारा (1) के परन्तुक के अधीन प्रमाणपत्र जारी किया है वहां इस धारा के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए निर्धारिती की कुल आय की संगणना करने में निर्यात गृह या व्यापार गृह को ऐसे माल या वाणिज्या के, जिसकी बाबत निर्यात गृह या व्यापार गृह ने प्रमाणपत्र दिया है, विक्रय किए जाने से निर्धारिती द्वारा प्राप्त किए गए लाभों की उस सीमा तक, जो उपधारा (1ख) में निर्दिष्ट हैं कटौती अनुज्ञात की जाएगी।
(1ख) उपधारा (1) और (1क) के प्रयोजनों के लिए लाभों की कटौती की सीमा–
(i) 1 अप्रैल, 2001 को आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके अस्सी प्रतिशत;
(ii) 1 अप्रैल, 2002 को आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके सत्तर प्रतिशत;
(iii) 1 अप्रैल, 2003 को आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके पचास प्रतिशत;
(iv) 1 अप्रैल, 2004 को आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके तीस प्रतिशत;
के बराबर रकम की होगी और 1 अप्रैल, 2005 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्ष की बाबत कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी।
(2)(क) यह धारा खंड(ख)में उल्लिखित माल या वाणिज्या से भिन्न सभी माल या वाणिज्या को लागू होती है, यदि भारत के बाहर निर्यात किए गए ऐसे माल या वाणिज्या के विक्रय आगम निर्धारिती (पृष्ठपोषक विनिर्माता से भिन्न) द्वारा संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में पूर्ववर्ष की समाप्ति से छह मास की अवधि के भीतर या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर जो सक्षम प्राधिकारी इस संबंध में अनुज्ञात करे भारत में प्राप्त किए जाते हैं या लाए जाते हैं।
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''सक्षम प्राधिकारी'' पद से भारतीय रिजर्व बैंक या ऐसा अन्य प्राधिकारी अभिप्रेत है जो विदेशी मुद्रा में संदायों और व्यवहारों को विनियमित करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अंतर्गत प्राधिकृत है।
(ख) यह धारा निम्नलिखित माल या वाणिज्या को लागू नहीं होती है, अर्थात् :–
(i) खनिज तेल; और
(ii) खनिज और अयस्क (बारहवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रसंस्कृत खनिजों और अयस्कों से भिन्न)।
स्पष्टीकरण 1.–खंड (क)में उल्लिखित विक्रय आगम भारत में प्राप्त किए गए तब समझे जाएंगे जब ऐसे विक्रय आगम भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुमोदन से भारत के बाहर किसी बैंक में निर्धारिती द्वारा उस प्रयोजन के लिए रखे गए पृथक् खाते में जमा किए जाते हैं।
स्पष्टीकरण 2.–शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि जहां किसी माल या वाणिज्या का किसी निर्धारिती द्वारा भारत के बाहर स्थित अपने किसी शाखा कार्यालय, भांडागार या किसी अन्य स्थापन को अंतरण किया जाता है और ऐसा माल या वाणिज्या ऐसे शाखा कार्यालय, भांडागार या स्थापन से विक्रय की जाती है वहां ऐसा अंतरण ऐसे माल और वाणिज्या का भारत के बाहर निर्यात समझा जाएगा और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 50 की उपधारा (1) में उल्लिखित पोत पत्र या निर्यात पत्र में घोषित ऐसे माल या वाणिज्या का मूल्य इस धारा के प्रयोजनों के लिए उसके विक्रय आगम समझे जाएंगे।
(3) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए,–
(क) जहां निर्धारिती द्वारा विनििर्र्मत या प्रसंस्कृत माल या वाणिज्या का भारत के बाहर निर्यात किया जाता है वहां ऐसे निर्यात से प्राप्त लाभ वह रकम होगी जिसका कारबार के लाभों से वही अनुपात है जो निर्यात-आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है;
(ख) जहां व्यापार माल का भारत के बाहर निर्यात किया जाता है वहां ऐसे निर्यात से प्राप्त लाभ ऐसे व्यापार माल के संबंध में वे निर्यात आवर्त होंगे जैसे वे ऐसे निर्यात से संबंधित प्रत्यक्ष लागत और अप्रत्यक्ष लागत को घटाकर आए;
(ग) जहां निर्धारिती द्वारा विनिर्मित या प्रसंस्कृत माल या वाणिज्या का और व्यापार माल का भारत के बाहर निर्यात किया जाता है वहां ऐसे निर्यात से प्राप्त लाभ–
(i) निर्धारिती द्वारा विनिर्मित या प्रसंस्कृत माल या वाणिज्या के संबंध में वह रकम होगी जिसका कारबार के समायोजित लाभों से वही अनुपात है जो ऐसे माल के संबंध में समायोजित निर्यात-आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के समायोजित कुल आवर्त से है; और
(ii) व्यापार माल की बाबत ऐसे व्यापार माल की बाबत वे निर्यात-आवर्त होंगे जैसे कि वे ऐसे व्यापार माल के निर्यात से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागत को घटाकर आएं :
परन्तु इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) या खंड(ग) के अंतर्गत संगणित लाभ में ऐसी रकम और बढ़ा दी जाएगी जिसका धारा 28 के खंड (iiiक) में उल्लिखित राशि के (जो किसी अन्य व्यक्ति से अर्जित किसी अनुज्ञप्ति के विक्रय से लाभ नहीं है) और खंड (iiiख) और खंड (iiiग) में उल्लिखित राशि के नब्बे प्रतिशत है, यह वही अनुपात है जो निर्यात-आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है :
परंतु यह और कि ऐसे निर्धारिती की दशा में, जिसका पूर्ववर्ष के दौरान निर्यात आवर्त दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, यथास्थिति, इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन या पहले परन्तुक को प्रभावी बनाए जाने के पश्चात् संगणित लाभों में ऐसी रकम जोड़ दी जाएगी जो धारा 28 के, यथास्थिति, खंड (iiiघ) या खंड (iiiड़) में उल्लिखित किसी राशि के नब्बे प्रतिशत है, यह उसी अनुपात में है जो निर्यात आवर्त का निर्धारिती द्वारा चालए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है :
परन्तु यह भी कि ऐसे निर्धारिती की दशा में, जिसका पूर्ववर्ष के दौरान निर्यात आवर्त दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, यथास्थिति, इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन या पहले परन्तुक को प्रभावी बनाए जाने के पश्चात् संगणित लाभों में ऐसी रकम जोड़ दी जाएगी जो धारा 28 के खंड (iiiघ) में उल्लिखित किसी राशि के नब्बे प्रतिशत है, यह उसी अनुपात में है जो निर्यात आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के कुल आर्वत से है, यदि निर्धारिती के पास यह साबित करने के लिए आवश्यक और पर्याप्त साक्ष्य है कि–
(क) उसके पास या तो शुल्क वापसी का या ड्यूटी एन्टाइटलमेंट पास बुक स्कीम, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, को चुनने का विकल्प प्राप्त था; और
(ख) सीमाशुल्क के मद्दे वापसी प्रत्यय की दर, ड्यूटी एन्टाइटलमेंट पास बुक स्कीम, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, के अधीन अनुज्ञेय प्रत्यय दर से उच्चतर थी :
परन्तु यह भी कि ऐसे किसी निर्धारिती की दशा में, जिसका पूर्ववर्ष के दौरान निर्यात आवर्त दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन या पहले परन्तुक का प्रभावी बनाए जाने के पश्चात् संगणित लाभों में ऐसी रकम जोड़ दी जाएगी जो धारा 28 के खंड (iiiड़) में उल्लिखित किसी राशि के नब्बे प्रतिशत है यह उसी अनुपात में है जो निर्यात आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है, यदि निर्धारिती के पास यह साबित करने के लिए आवश्यक और पर्याप्त साक्ष्य है कि–
(क) उसके पास या तो शुल्क वापसी का या ड्यूटी फ्री रिप्लेनिशमेंट सर्टिफिकेट, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, चुनने का विकल्प प्राप्त था; और
(ख) सीमाशुल्क के मद्दे प्रत्यक्ष दर ड्यूटी फ्री रिप्लेनिशमेंट सर्टिफिकेट जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, के अधीन अनुज्ञेय प्रत्यय दर से उच्चतर थी।
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "अनुज्ञेय प्रत्यय दर" से ड्यूटी फ्री रिप्लेनिशमेंट सर्टिफिकेट, जो ड्यूटी रिमिशन स्कीम है, के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित रीति में संगणित अनुज्ञेय प्रत्यय दर अभिप्रेत है:
परन्तु यह भी कि यदि इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन संगणना किए जाने की दशा में कोर्इ हानि होती है तो ऐसी हानि का उस रकम में से मुजरा किया जाएगा जो निम्नलिखित के नब्बे प्रतिशत है–
(क) यथास्थिति, खंड (iiiक) या खंड (iiiख) या खंड (iiiग) में उल्लिखित कोर्इ राशि; या
(ख) धारा 28 के, यथास्थिति, खंड (iiiघ) या खंड (iiiड़) में उल्लिखित कोर्इ राशि जो यथास्थिति, दूसरे या तीसरे या चौथे परन्तुक में निर्दिष्ट किसी निर्धारिती की दशा में लागू है।
यह उसी अनुपात में है जो निर्यात आवर्त का निर्धारिती द्वारा चलाए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,–
(क) ''समायोजित निर्यात-आवर्त'' से ऐसा निर्यात-आवर्त अभिप्रेत है जैसा कि वह व्यापार माल की बाबत निर्यात-आवर्त को घटाकर आए;
(ख) ''कारबार के समायोजित लाभ'' से कारबार के ऐसे लाभ अभिप्रेत हैं जैसे कि वे व्यापार माल के भारत के बाहर निर्यात के कारबार से प्राप्त हुए लाभों को, जो उपधारा (3) के खंड (ख) में उपबंधित रीति से संगणित किए जाएं, घटा कर आएं;
(ग) ''समायोजित कुल आवर्त'' से कारबार का ऐसा कुल आवर्त अभिप्रेत है जैसा कि वह व्यापार माल की बाबत निर्यात-आवर्त को घटाकर आए;
(घ) ''प्रत्यक्ष लागत'' से भारत के बाहर निर्यातित व्यापार माल से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित लागत अभिप्रेत है जिसके अंतर्गत ऐसे माल की क्रय कीमत भी है;
(ड़) ''अप्रत्यक्ष लागत'' से व्यापार माल के संबंध में निर्यात-आवर्त के उस अनुपात में, जो उसका कुल आवर्त से है, आबंटित लागत अभिप्रेत है जो प्रत्यक्ष लागत नहीं है;
(च) ''व्यापार माल'' से ऐसा माल अभिप्रेत है जो निर्धारिती द्वारा विनिर्मित या प्रसंस्कृत नहीं किया जाता है।
(3क) उपधारा (1क) के प्रयोजनों के लिए, माल या वाणिज्या के विक्रयों से समर्थनकारी विनिर्माता द्वारा प्राप्त लाभ–
(क) उस दशा में जहां पृष्ठपोषक विनिर्माता द्वारा चलाए जा रहे कारबार मंi अनन्यत: एक या अधिक निर्यात गृहों और व्यापार गृहों को माल या वाणिज्या का विक्रय आता है वहां कारबार के लाभ होंगे;
(ख) उस दशा में जहां पृष्ठपोषक विनिर्माता द्वारा चलाए जा रहे कारबार में, अनन्यत: एक या अधिक निर्यात गृहों, व्यापार गृहों को माल या वाणिज्या का विक्रय नहीं आता है वहां वह रकम होगी जिसका कारबार के लाभ से वही अनुपात है जो संबंधित निर्यात गृह या व्यापार गृह के विक्रय के बारे में आवर्त का निर्धारिती द्वारा किए जाने वाले कारबार के कुल आवर्त से है।
(4) उपधारा (1) के अधीन कटौती तब तक अनुज्ञेय नहीं होगी जब तक कि निर्धारिती आय की विवरणी के साथ धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे के स्पष्टीकरण में परिभाषित लेखापाल की रिपोर्ट विहित फार्म में यह प्रमाणित करते हुए नहीं दे देता कि इस धारा के उपबंधों के अनुसार कटौती का सही दावा किया गया है:
परन्तु उपधारा (4ग) में निर्दिष्ट उपक्रम की दशा में, निर्धारिती आय की विवरणी के साथ विशेष आर्थिक जोन में के उपक्रम से इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त अन्य विधि के उपबंधों के अधीन विशेष आर्थिक जोन में उपक्रम के लेखाओं की संपरीक्षा करने वाले संपरीक्षक द्वारा सम्यक् रूप से प्रमाणित एक प्रमाणपत्र भी देगा जिसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी, जो विहित की जाएं।
(4क) उपधारा (1क) के अंतर्गत कटौती तब तक अनुज्ञेय नहीं होगी जब तक कि पृष्ठपोषक विनिर्माता अपनी आय की विवरणी के साथ विहित प्ररूप में निम्नलिखित नहीं दे देता, अर्थात्:–
(क) धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे दिए गए स्पष्टीकरण में परिभाषित लेखापाल की रिपोर्ट जिसमें यह प्रमाणित किया गया हो कि निर्यात गृह या व्यापार गृह को उसके माल या वाणिज्या के विक्रय के संबंध में पृष्ठपोषक निर्माता के लाभों के आधार पर कटौती का सही दावा किया गया है; और
(ख) निर्यात गृह या व्यापार गृह से एक प्रमाणपत्र जिसमें ऐसी विशिष्टियां अन्तर्विष्ट होंगी जो विहित की जाएं और विहित रीति से यह सत्यापित होगा कि प्रमाणपत्र में उल्लिखित निर्यात-आवर्त के संबंध में निर्यात गृह या व्यापार गृह ने इस धारा के अंतर्गत कटौती का दावा नहीं किया है:
परन्तु खंड (ख) में उल्लिखित प्रमाणपत्र इस अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत या किसी अन्य विधि के अंतर्गत निर्यात-गृह या व्यापार गृह के लेखाओं की संपरीक्षा करने वाले संपरीक्षक द्वारा विधिवत रूप से प्रमाणित किया जाएगा।
(4ख) उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अंतर्गत कुल आय की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए इस अधिनियम के अधीन कर से प्रभारित न की गर्इ किसी आय को सम्मिलित नहीं किया जाएगा।
(4ग) इस धारा के उपबंध किसी ऐसे निर्धारिती को,–
(क) 31 मार्च, 2004 के पश्चात् प्रारंभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए;
(ख) जो ऐसे उपक्रम का स्वामी है, जो भारत में कहीं भी (किसी विशेष, आर्थिक जोन के बाहर) माल या वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्माण या उत्पादन करता है और विशेष आर्थिक जोन में स्थित ऐसे किसी उपक्रम को जो धारा 10क के अधीन कटौती के लिए पात्र है, उसका विक्रय करता है और ऐसा विक्रय इस धारा के प्रयोजनों के लिए भारत से बाहर निर्यात माना जाएगा,
को लागू होंगे।
स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,–
(क) ''संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा'' से अभिप्रेत है ऐसी विदेशी मुद्रा जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) और उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के प्रयोजनों के लिए तत्समय संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा मानी गर्इ है;
(कक) ''भारत के बाहर निर्यात'' के अंतर्गत भारत में स्थित किसी दुकान, एम्पोरियम या किसी अन्य स्थापन में विक्रय के रूप में या अन्यथा कोर्इ ऐसा संव्यवहार नहीं आएगा जिसमें सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) में परिभाषित किसी सीमा शुल्क स्टेशन पर निकासी अन्तर्वलित नहीं है;
(ख) ''निर्यात-आवर्त'' से ऐसे माल या वाणिज्या के, जिसको यह धारा लागू होती है और जिसका भारत के बाहर निर्यात किया जाता है, उपधारा (2) के खंड (क) के अनुसार निर्धारिती द्वारा संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में भारत में प्राप्त किए गए या भारत में लाए गए विक्रय आगम अभिप्रेत हैं किन्तु इसके अंतर्गत ऐसा भाड़ा या बीमा नहीं है, जो सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) में परिभाषित सीमा शुल्क स्टेशन से परे माल या वाणिज्या के परिवहन के कारण हुआ माना जा सकता है;
(खक) ''कुल आवर्त'' के अन्तर्गत ऐसा भाड़ा या बीमा नहीं आएगा जो सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) में परिभाषित सीमा शुल्क स्टेशन से परे किसी माल या वाणिज्या के परिवहन के कारण हुआ माना जा सकता है :
परन्तु 1 अप्रैल, 1991 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में ''कुल आवर्त'' पद इस प्रकार प्रभावी होगा मानो इसके अंतर्गत धारा 28 के खंड (iiiक), खंड (iiiख), खंड (iiiग), (iiiघ) और (iiiड़) में उल्लिखित कोर्इ राशि न हो;
(खकक) ''कारबार के लाभ'' से अभिप्रेत है ''कारबार या वृति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अंतर्गत संगणित कारबार के लाभ, जैसे कि वे निम्नलिखित को घटाकर आएं, अर्थात् :–
(1) धारा 28 के खंड (iiiक), (iiiख), खंड (iiiग), (iiiघ) और (iiiड़) में उल्लिखित किसी राशि का अथवा दलाली, कमीशन, ब्याज, किराया, प्रभार या वैसी ही प्रकृति की किसी अन्य प्राप्ति के रूप में किन्हीं प्राप्तियों का, जो ऐसे लाभों में सम्मिलित हैं, नब्बे प्रतिशत; और
(2) भारत के बाहर स्थित निर्धारिती के किसी शाखा कार्यालय, भांडागार या किसी अन्य स्थापन के लाभ;
(खख) [* * *]
(ग) ''निर्यात गृह प्रमाणपत्र'' या ''व्यापार गृह प्रमाणपत्र'' से भारत सरकार के मुख्य आयात निर्यात नियंत्रक द्वारा दिया गया, यथास्थिति, कोर्इ विधिमान्य निर्यात गृह प्रमाणपत्र या व्यापार गृह प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;
(घ) ''पृष्ठपोषक विनिर्माता'' से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारतीय कंपनी या (कंपनी से भिन्न) भारत में निवासी कोर्इ व्यक्ति हो, जो माल या वाणिज्या का विनिर्माण (जिसके अंतर्गत प्रसंस्करण भी है) करता है और ऐसे माल या वाणिज्या का किसी निर्यात गृह या व्यापार गृह को निर्यात के प्रयोजन के लिए विक्रय करता है।
(ड़) ''विशेष आर्थिक जोन'' का वही अर्थ है जो उसका धारा 10क के स्पष्टीकरण 2 के खंड (viii) में है।
[वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा संशोधित रूप में]

