आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 80ग

जीवन बीमा प्रीमियम, भविष्य निधि में योगदान, आदि के संबंध में कटौती

धारा

धारा संख्या

80ग

अध्याय शीर्षक

अध्याय VIक - कुल आय की गणना में की जाने वाली कटौतियाँ

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2007

जीवन बीमा प्रीमियम, भविष्य निधि में योगदान, आदि के संबंध में कटौती

जीवन बीमा प्रीमियम, भविष्य निधि में योगदान, आदि के संबंध में कटौती

ख.–कुछ संदायों की बाबत कटौतियां

24[जीवन बीमा प्रीमियम, आस्थगित वार्षिकी, भविष्य निधि में अभिदाय कतिपय साधारण शेयरों या डिबेंचरों आदि में अभिदान की बाबत कटौती

2580ग. (1) ऐसे किसी निर्धारिती की, जो व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है, कुल आय की संगणना करने में, इस धारा के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए, कर से प्रभार्य उसकी आय में से पूर्ववर्ष में संदत्त या जमा की गर्इ सम्पूर्ण रकम की, जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट कुल राशि है और जो एक लाख रुपए से अधिक नहीें है, कटौती की जाएगी।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट राशियां, वे राशियां होंगी, जो निर्धारिती द्वारा किसी पूर्ववर्ष में निम्नलिखित के लिए संदत्त या जमा की गर्इ हैं,–

(i) उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों का जीवन बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए;

(ii) उपधारा (4) में निर्दिष्ट व्यक्तियों के जीवन पर किसी आस्थगित वार्षिकी के लिए, जो खंड (xii) में निर्दिष्ट कोर्इ वार्षिकी योजना नहीं है, संविदा कराने या उसे प्रवृत्त बनाए रखने के लिए:

परंतु ऐसी संविदा में वार्षिकी के संदाय के बदले में नकद संदाय प्राप्त करने के किसी विकल्प का बीमाकृत द्वारा प्रयोग किए जाने संबंधी कोर्इ उपबंध नहीं है;

(iii) किसी व्यष्टि को सरकार द्वारा या उसकी ओर से संदेय वेतन में से ऐसी कटौती के रूप में, उसके लिए आस्थगित वार्षिकी सुनिश्चित करने के लिए या उसकी पत्नी या पति या बच्चों के लिए व्यवस्था करने के प्रयोजन के लिए जो उसकी सेवा की शर्तों के अनुसार काटी गर्इ राशि है, वहां तक जहां तक कि ऐसी काटी गर्इ राशि वेतन के एक बटा पांच से अधिक न हो;

(iv) किसी व्यष्टि द्वारा किसी भविष्य निधि में, जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है, अभिदाय के रूप में;

(v) केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित और उसके द्वारा राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित26 किसी भविष्य निधि में किसी अभिदाय के रूप में, जहां ऐसा अभिदाय, उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में किसी खाते में जमा है;

(vi) किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि के लिए किसी कर्मचारी द्वारा अभिदाय के रूप में;

(vii) किसी कर्मचारी द्वारा किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में अभिदाय के रूप में;

(viii) केन्द्रीय सरकार की ऐसी प्रतिभूति में या किसी ऐसी निक्षेप स्कीम में, जो वह सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय के रूप में;

(ix) सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) की धारा 2 के खंड (ग)27 में परिभाषित किसी ऐसे बचतपत्र के लिए, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा28 विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय के रूप में;

(x) उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट यूनिट सहबद्ध बीमा योजना, 1971 में (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् यूनिट सहबद्ध बीमा योजना कहा गया है) भाग लेने के लिए किसी अभिदाय के रूप में;

(xi) उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में धारा 10 के खंड (23घ) 29[में निर्दिष्ट] जीवन बीमा निगम पारस्परिक निधि की किसी ऐसी यूनिट सहबद्ध बीमा योजना में, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा30 इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, भाग लेने के लिए किसी अभिदाय के रूप में;

(xii) जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता की ऐसी वार्षिकी योजना के लिए, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना31 द्वारा विनिर्दिष्ट करे, किसी संविदा को कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए;

(xiii) धारा 10 के खंड (23घ) 32[में निर्दिष्ट] किसी पारस्परिक निधि की या प्रशासक या विनिर्दिष्ट कंपनी से, ऐसी स्कीम के अनुसार केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा33 इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, बनार्इ गर्इ किसी योजना के अधीन किन्हीं यूनिटों के अभिदाय के रूप में;

(xiv) धारा 10 के खंड (23घ) 32[में निर्दिष्ट] किसी पारस्परिक निधि द्वारा या प्रशासक द्वारा या विनिर्दिष्ट कंपनी द्वारा स्थापित किसी पेंशन निधि में जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा34, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, किसी व्यष्टि द्वारा अभिदाय के रूप में;

(xv) राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक की (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् राष्ट्रीय आवास बैंक कहा गया है) किसी ऐसी निक्षेप स्कीम में या उसके द्वारा स्थापित किसी ऐसी पेंशन निधि में, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय के रूप में;

(xvi) () किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी की, जो भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए मकानों के निर्माण या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने में लगी हुर्इ है; या

() निवास स्थान की आवश्यकता से निपटने और उसे पूरा करने के प्रयोजन के लिए या नगरों, कस्बों और ग्रामों की योजना, विकास या सुधार के प्रयोजन के लिए या दोनों के लिए अधिनियमित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन भारत में गठित किसी प्राधिकरण की,

किसी ऐसी निक्षेप स्कीम में, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय के रूप में;

(xvii) () भारत के भीतर स्थित किसी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, विद्यालय या अन्य शिक्षा संस्था को;

() उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट किन्हीं व्यक्तियों की पूर्णकालिक शिक्षा के प्रयोजनों के लिए,

चाहे प्रवेश के समय या उसके पश्चात् (किसी विकास फीस या संदान या उसी प्रकार के संदाय के लिए किए गए किसी संदाय को छोड़कर) अध्ययन (ट्यूशन) फीस के रूप में; या

(xviii) किसी आवासीय गृह सम्पत्ति, जिससे हुर्इ आय, "गृह सम्पत्ति से आय" शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य है, (या जो यदि निर्धारिती द्वारा अपने निवास के लिए उपयोग में न लार्इ गर्इ होती तो उस शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य होती), खरीदने या बनाने के प्रयोजनों के लिए और जहां ऐसे संदाय निम्नलिखित के लिए या के रूप में किए जाते हैं–

() स्वामित्व के आधार पर गृह सम्पत्ति के निर्माण और विक्रय में लगे किसी विकास प्राधिकरण, आवास बोर्ड या अन्य प्राधिकरण की, किसी स्व-वित्तपोषित स्कीम या अन्य स्कीम के अधीन शोध्य किसी किस्त या रकम का भागत: संदाय; या

() किसी कंपनी या सहकारी सोसाइटी को, जिसका निर्धारिती कोर्इ शेयरधारक या सदस्य है, आबंटित गृह संपत्ति की लागत मद्दे शोध्य किसी किस्त या रकम का भागत: संदाय; या

() निर्धारिती द्वारा निम्नलिखित से उधार ली गर्इ रकम को लौटाना–

(1) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार से, या

(2) किसी बैंक से, जिसके अंतर्गत सहकारी बैंक है, या

(3) जीवन बीमा निगम से, या

(4) राष्ट्रीय आवास बैंक से, या

(5) किसी पब्लिक कंपनी से, जो भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए मकान बनाने या खरीदने के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण करने के कारबार को चलाने के मुख्य उद्देश्य से भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत है, और जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है, या

(6) किसी कम्पनी से, जिसमें जनता काफी हितबद्ध है या किसी सहकारी सोसाइटी से, जहां ऐसी कंपनी या सहकारी सोसाइटी मकानों को बनाने के लिए वित्तपोषण करने के कारबार में लगी हुर्इ है, या

(7) निर्धारिती के नियोजक से, जहां ऐसा नियोजक किसी केन्द्रीय या राज्य अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित कोर्इ प्राधिकरण या कोर्इ बोर्ड या कोर्इ निगम या कोर्इ अन्य निकाय है, या

(8) निर्धारिती के नियोजक से, जहां ऐसा नियोजक कोर्इ पब्लिक कंपनी या पब्लिक सेक्टर कम्पनी या विधि द्वारा स्थापित कोर्इ विश्वविद्यालय या ऐसे विश्वविद्यालय से संबद्ध कोर्इ महाविद्यालय या कोर्इ स्थानीय प्राधिकरण या कोर्इ सहकारी सोसाइटी है; या

() निर्धारिती को ऐसी गृह सम्पत्ति के अंतरण के प्रयोजन के लिए स्टाम्प शुल्क, रजिस्ट्रीकरण फीस और अन्य व्यय,

किन्तु इसमें निम्नलिखित मद्दे के रूप में कोर्इ संदाय नहीं है–

() प्रवेश शुल्क, शेयर की लागत और आरंभिक निक्षेप, जिसका भुगतान किसी कम्पनी के शेयरधारक या किसी सहकारी सोसाइटी के सदस्य को ऐसा शेयरधारक या सदस्य बनने के लिए करना पड़ता है; या

() गृह सम्पत्ति में ऐसे परिवर्धन या परिवर्तन अथवा ऐसे नवीकरण या मरम्मत की लागत, जो समापन प्रमाणपत्र जारी करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस गृह सम्पत्ति के संबंध में ऐसा प्रमाणपत्र जारी करने के पश्चात् या गृह सम्पत्ति अथवा उसके किसी भाग को निर्धारिती द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अधिभोग में लेने या किराए पर देने के पश्चात् की जाती है; या

() कोर्इ व्यय, जिसके संबंध में कटौती धारा 24 के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय है;

(xix) किसी पब्लिक कंपनी द्वारा किए गए आवेदन पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित पूंजी के किसी उपयुक्त पुरोधरण के भाग रूप साधारण शेयरों या डिबेंचरों के लिए अभिदाय के रूप में या किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा विहित प्ररूप में किसी पूंजी के किसी उपयुक्त पुरोधरण के लिए अभिदाय के रूप में।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

(i) "उपयुक्त पूंजी पुरोधरण" से भारत में बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत किसी पब्लिक कम्पनी या लोक वित्तीय संस्था द्वारा किया गया पुरोधरण अभिप्रेत है और ऐसे पुरोधरण के सम्पूर्ण आगमों का उपयोग पूर्णतया और अनन्य रूप से धारा 80झक की उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी कारबार के प्रयोजनों के लिए किया जाता है;

(ii) "पब्लिक कंपनी" का वही अर्थ है, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 335 में उसका है;

(iii) "लोक वित्तीय संस्था" का वही अर्थ है, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क36 में उसका है;

(xx) धारा 10 के खंड (23घ) में निर्दिष्ट किसी पारस्परिक निधि की और ऐसी पारस्परिक निधि द्वारा विहित रूप में किए गए आवेदन पर बोर्ड द्वारा अनुमोदित किन्ही यूनिटों के लिए अभिदाय के रूप में:

परन्तु यह खंड तभी लागू होगा यदि ऐसी यूनिटों के लिए अभिदाय की रकम का केवल किसी कम्पनी के उपयुक्त पूंजी पुरोधरण में अभिदाय किया जाता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "उपयुक्त पूंजी पुरोधरण" से उपधारा (2) के खंड (xix) के स्पष्टीकरण के खंड (i) में निर्दिष्ट कोर्इ पुरोधरण अभिप्रेत है;

37[(xxi) सावधि निक्षेप के रूप में–

(क) किसी अनुसूचित बैंक में कम से कम पांच वर्ष की किसी नियत अवधि के लिए है; और

(ख) इस खंड के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा बनार्इ गर्इ और राजपत्र में अधिसूचित किसी स्कीम के अनुसार है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "अनुसूचित बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित कोर्इ समनुषंगी बैंक या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्समान कोर्इ नया बैंक या ऐसा कोर्इ अन्य बैंक अभिप्रेत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की दूसरी अनुसूची में सम्मिलित कोर्इ बैंक है।]

वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2008 से धारा 80ग की उपधारा (2) के खंड (xxi) के पश्चात् निम्नलिखित खंड (xxii) अंत:स्थापित किया जाएगा :

(xxii) कृषि और ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक द्वारा जारी किए गए ऐसे बंधपत्रों में, जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अभिदाय के रूप में।

(3) उपधारा (2) के उपबंध किसी आस्थगित वार्षिकी संबंधी संविदा से भिन्न किसी बीमा पालिसी के लिए दी गर्इ किसी प्रीमियम या किए गए अन्य संदाय पर केवल उतने भाग के संबंध में लागू होंगे, जो वास्तविक बीमित पूंजी राशि के बीस प्रतिशत से अधिक नहीं है।

स्पष्टीकरण.–किसी ऐसी वास्तविक बीमित पूंजी राशि को संगणित करने में निम्नलिखित को हिसाब में नहीं लिया जाएगा,–

(i) वापस करने के लिए करार पार्इ गर्इ किन्हीं प्रीमियमों का मूल्य; या

(ii) वास्तविक बीमित राशि के अतिरिक्त अधिक बोनस के रूप में या अन्यथा होने वाला कोर्इ फायदा, जो किसी व्यक्ति द्वारा पालिसी के अधीन प्राप्त किया जाना है या किया जाए।

(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति निम्नलिखित होंगे, अर्थात् :–

() उस उपधारा के खंड (i), खंड (v), खंड (x) और खंड (xi) के प्रयोजनों के लिए,–

(i) किसी व्यष्टि की दशा में, वह व्यष्टि, ऐसे व्यष्टि की पत्नी या उसका पति और कोर्इ बच्चा; और

(ii) किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में उसका कोर्इ सदस्य;

() उस उपधारा के खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यष्टि की दशा में, वह व्यष्टि, ऐसे व्यष्टि की पत्नी या उसका पति और कोर्इ बच्चा;

() उस उपधारा के खंड (xvii) के प्रयोजन के लिए, किसी व्यष्टि की दशा में, ऐसे व्यष्टि के कोर्इ दो बच्चे।

(5) जहां किसी पूर्ववर्ष में कोर्इ निर्धारिती,–

(i) उपधारा (2) के खंड (i) में निर्दिष्ट अपनी बीमा संविदा को–

() किसी एकल प्रीमियम पालिसी की दशा में, बीमा प्रारंभ होने की तारीख के पश्चात् दो वर्ष के भीतर; या

() किसी अन्य दशा में दो वर्ष तक प्रीमियमों का संदाय करने से पूर्व;

उस आशय की सूचना देकर या जहां संविदा किसी प्रीमियम का संदाय न करने के कारण प्रवर्तन में नहीं रहती है, वहां बीमा संविदा को पुनरुज्जीवित न करके समाप्त कर देता है, या

(ii) उपधारा (2) के खंड (x) या खंड (xi) में निर्दिष्ट किसी यूनिट सहबद्ध बीमा योजना में उसे आशय की सूचना देकर अपनी भागीदारी समाप्त कर देता है या जहां वह ऐसी भागीदारी के संबंध में पांच वर्ष तक अभिदाय करने से पूर्व अपनी भागीदारी को पुनरुज्जीवित न करके कोर्इ अभिदाय न कर पाने के कारण भागीदार नहीं रहता है; या

(iii) उपधारा (2) के खंड (xviii) में निर्दिष्ट गृह सम्पत्ति का उस वित्तीय वर्ष के अंत से, जिसमें उसके द्वारा ऐसी संपत्ति का कब्जा अभिप्राप्त किया जाता है, पांच वर्षों के अवसान के पूर्व अंतरण करता है, या उस खंड में विनिर्दिष्ट कोर्इ राशि प्रतिदाय के रूप में या अन्यथा वापस प्राप्त करता है,

वहां–

() उपधारा (2) के खंड (i), खंड (x), खंड (xi) और खंड (xviii) में निर्दिष्ट किसी ऐसी राशि के प्रतिनिर्देश से, जो ऐसे पूर्व वर्ष में संदत्त की गर्इ हो, उपधारा (1) के अधीन निर्धारिती को कोर्इ कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी; और

() पूर्ववर्ष या ऐसे पूर्ववर्ष के पहले वर्षों की बाबत इस प्रकार अनुज्ञात की गर्इ ऐसी आय की कटौतियों की कुल रकम ऐसे पूर्ववर्ष की निर्धारिती की आय समझी जाएगी और ऐसे पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष में कर से दायी होगी।

(6) यदि, किन्ही, ऐसे साधारण शेयरों या डिबेंचरों का, जिनकी लागत के प्रतिनिर्देश से उपधारा (1) के अधीन कटौती अनुज्ञात की जाती है, निर्धारिती द्वारा उनके अर्जन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर किसी समय किसी व्यक्ति को विक्रय या अन्यथा अंतरण किया जाता है तो पूर्ववर्ष या पूर्ववर्ष के पहले वर्षों में, जिसमें ऐसा विक्रय या अंतरण होता है, ऐसे साधारण शेयरों या डिबेन्चरों के संबंध में इस प्रकार अनुज्ञात आय की कटौतियों की कुल रकम निर्धारिती की ऐसे पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी और ऐसे पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष में कर से दायी होगी।

स्पष्टीकरण.–ऐसे व्यक्ति के संबंध में यह समझा जाएगा कि उसने ऐसे शेयरों या डिबेंचरों को उस तारीख को अर्जित किया है, जिसको उसका नाम पब्लिक कंपनी के, यथास्थिति, सदस्यों या डिबेंचरधारकों के रजिस्टर में उन शेयरों या डिबेंचरों के संबंध में दर्ज किया जाए।

(7) इस धारा के प्रयोजनों के लिए,–

() धारा 88 की उपधारा (2) के खंड (i) से खंड (vii) में निर्दिष्ट बीमा, आस्थगित वार्षिकी, भविष्य निधि और अधिवार्षिकी निधि;

() धारा 88 की उपधारा (2) के खंड (xii) से खंड (xiiiक) में निर्दिष्ट यूनिट सहबद्ध बीमा योजना और वार्षिकी योजना;

() धारा 88 की उपधारा (2) के खंड (xiiiग) से खंड (xivक) में निर्दिष्ट पेंशन निधि और निक्षेप स्कीम में अभिदाय;

() धारा 88 की उपधारा (2) के खंड (xv) में निर्दिष्ट किसी आवासीय मकान को खरीदने या बनाने के लिए उधार ली गर्इ रकम,

इस धारा के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन कटौती के लिए पात्र होगी और कटौती इस धारा के उपबंधों के अनुसार अनुज्ञात की जाएगी।

(8) इस धारा में,–

(i) "प्रशासक" से भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की धारा 2 के खंड (क) में निर्दिष्ट प्रशासक अभिप्रेत है;

(ii) किसी निधि में "अभिदाय" के अंतर्गत ऋण के प्रतिसंदाय में दी गर्इ राशियां नहीं आएंगी;

(iii) "बीमा" के अंतर्गत निम्नलिखित होंगे,–

() किसी व्यष्टि या ऐसे व्यष्टि की पत्नी या पति या बच्चे या किसी हिन्दू अविभक्त कुटुंब के सदस्य की जीवन बीमा पालिसी जो परिपक्वता की नियत तारीख को, यदि ऐसा व्यक्ति उस तारीख को जीवित हो इस बात के होते हुए भी कि वह बीमा पालिसी ऐसे व्यक्ति की उक्त नियत तारीख के पूर्व मृत्यु हो जाने की दशा में केवल दी गर्इ प्रीमियमों की (उन पर ब्याज सहित या उसके बिना) वापसी के लिए उपबंध करती है, विनिर्दिष्ट रकम का संदाय सुनिश्चित करती हो;

() किसी व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब के किसी सदस्य द्वारा किसी अवयस्क के फायदे के लिए, इस उद्देश्य से ली गर्इ बीमा पालिसी कि अवयस्क, वयस्क हो जाने पर उस पालिसी को अंगीकार करके और (ऐसे अंगीकरण के पश्चात्) किसी ऐसी तारीख को, जो इस निमित्त पालिसी में विनिर्दिष्ट हो, अपने जीवित रहने की दशा में अपने जीवन का बीमा सुनिश्चित कर सकें;

(iv) "जीवन बीमा निगम" से जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम अभिप्रेत है;

(v) "पब्लिक कंपनी" का वही अर्थ है, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 338 में है;

(vi) "प्रतिभूति" से लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खंड (2)39 में परिभाषित सरकारी प्रतिभूति अभिप्रेत है;

(vii) "विनिर्दिष्ट कंपनी" से भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की धारा 2 के खंड (ज) में निर्दिष्ट कंपनी अभिप्रेत है;

(viii) "अंतरण" के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अंतर्गत धारा 269पक के खंड (च) में निर्दिष्ट संव्यवहार है।]

 

24. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व धारा 80ग का वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया था।

25. धारा 80ग की विषय-वस्तु भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न धाराओं की विषय-वस्तु रही है अर्थात् (i) मूल रूप से अधिनियमित धारा 87; (ii) मूल धारा 80क, जैसी कि वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से पुर:स्थापित की गर्इ थी; और (iii) फिर वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से धारा 80ग पुर:स्थापित की गर्इ थी और उसके स्थान पर 1.4.2006 से धारा 88 रखी गर्इ थी।

पूर्व में, धारा 80ग का वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से, वित्त अधिनियम, 1969 द्वारा 1.4.1970 से, वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से, वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से, वित्त अधिनियम, 1973 द्वारा 1.4.1974 से, वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से, वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1977 से, वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1979 से, वित्त अधिनियम, 1979 द्वारा 1.4.1980 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से, वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से, वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1971 से भूतलक्षी प्रभाव से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1983 से भूतलक्षी प्रभाव से, वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1984 से भूतलक्षी प्रभाव से, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से और वित्त अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1990 से संशोधन किया गया था।

26. अधिसूचित लोक भविष्य निधि के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इंकम टैक्स ऐक्ट।

27. सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 की धारा 2() में यथापरिभाषित "बचत पत्र" की परिभाषा के लिए परिशिष्ट देखिए

28. अधिसूचित बचत पत्र के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

29. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से "के अधीन अधिसूचित" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

30. अधिसूचित जीवन बीमा निगम पारस्परिक निधि की यूनिट सहबद्ध योजना के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इंकम टैक्स ऐक्ट।

31. जीवन बीमा निगम की वार्षिक योजना के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इंकम टैक्स ऐक्ट।

32. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से "के अधीन अधिसूचित" शब्दो के स्थान पर प्रतिस्थापित।

33. इक्विटी सहबद्ध बचत स्कीम, 2005 के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इंकम टैक्स ऐक्ट।

34. अधिसूचित पेंशन निधि के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इंकम टैक्स ऐक्ट।

35. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3(1) के खंड (iv) में "पब्लिक कंपनी" को परिभाषित किया गया है। धारा 3 के पाठ के लिए परिशिष्ट देखिए।

36. कंपनी अधिनियम, 2006 की धारा 4क के पाठ के लिए और उसके अधीन अधिसूचित संस्थाओं के लिए परिशिष्ट देखिए।

37. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से अंत:स्थापित।

38. कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3(1) के खंड (iv) में "पब्लिक कंपनी" को परिभाषित किया गया है। धारा 3 के पाठ के लिए परिशिष्ट देखिए।

39. लोक ऋण अधिनियम, 1944 की धारा 2 के खंड (2) में "प्रतिभूति" को परिभाषित किया गया है। धारा 2(2) के पाठ के लिए परिशिष्ट देखिए।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2007 तथा कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा संशोधित रूप में]

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