कुछ कंपनियों की दशा में हानियों का अग्रनीत किया जाना और उनका मुजरा किया जाना
कुछ कंपनियों की दशा में हानियों का अग्रनीत किया जाना और उनका मुजरा किया जाना
79. इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी कंपनी की दशा में, जो ऐसी कंपनी नहीं है जिसमें जनता पर्याप्त रूप से हितबद्ध है, पूर्ववर्ष में शेयरधारण में तब्दीली हुर्इ है वहां किसी भी ऐसी हानि5 को, जो उस पूर्ववर्ष के पूर्व किसी वर्ष में उठार्इ गर्इ हो, तब तक अग्रनीत नहीं किया जाएगा जब तक कि–
(क) पूर्ववर्ष के अंतिम दिन को कंपनी के ऐसे शेयर जो इक्यावन प्रतिशत से अन्यून मतदान शक्ति वाले थे, ऐसे व्यक्तियों द्वारा फायदाप्रद रूप से धारित न रहे हों जो उस वर्ष या उन वर्षों के अंतिम दिन, जिसमें या जिनमें हानि उठार्इ गर्इ थी कंपनी के ऐसे शेयरों को फायदाप्रद रूप से धारण करते थे जो इक्यावन प्रतिशत से अन्यून मतदान शक्ति वाले थे 6[* * *]:
7[परन्तु इस धारा की कोर्इ बात उस दशा में लागू नहीं होगी जहां किसी शेयरधारक की मृत्यु के परिणामस्वरूप या ऐसे शेयरधारक के, जो ऐसा दान करता है, किसी संबंधी को दान के रूप में शेयरों के अंतरण के कारण पूर्ववर्ष में उक्त मतदान शक्ति में कोर्इ परिवर्तन होता है:]
8[परन्तु यह और कि इस धारा की कोर्इ बात, किसी ऐसी भारतीय कंपनी के, जो विदेशी कंपनी के समामेलन या अविलयन के परिणामस्वरूप किसी विदेशी कंपनी की समनुषंगी है, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि समामेलित या अविलयित विदेशी कंपनी के इक्यावन प्रतिशत शेयरधारक, समामेलित या पारिणामी विदेशी कंपनी के शेयर धारक बने रहते हैं, शेयर धारण में किसी परिवर्तन को लागू नहीं होगी।]
(ख) 9[वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया।]
5. "हानि" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
6. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से "या" शब्द का लोप किया गया।
7. वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
8. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।
9. लोप किए जाने के पहले खंड (ख) निम्नानुसार था :
"(ख) निर्धारण अधिकारी* का यह समाधान न हो जाए कि शेयरधारण में तब्दीली, कर दायित्व से बचने या कम करने के लिए नहीं की गर्इ थी।"
* प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से 'आय-कर' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

