‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन हानियां
75[‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन हानियां
74. 76[(1) जहां किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में, ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन संगणना का अंतिम परिणाम निर्धारिती की हानि है वहां संपूर्ण हानि, इस अध्याय के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अगले निर्धारण वर्ष के लिए अग्रनीत की जाएगी, और–
(क) जहां तक ऐसी हानि का संबंध किसी अल्पकालिक पूंजी आस्ति से है, वहां इसका मुजरा ऐसी आय के प्रति, यदि कोर्इ हो, किसी अन्य पूंजी आस्ति की बाबत उस निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारणीय “पूंजी अभिलाभ” शीर्ष के अधीन किया जाएगा;
(ख) जहां तक ऐसी हानि का संबंध किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति से है, वहां इसका मुजरा ऐसी आय के प्रति, यदि कोर्इ हो, किसी अन्य पूंजी आस्ति की बाबत, जो अल्पकालिक पूंजी आर्स्ति नहीं है, उस निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारणीय “पूंजी अभिलाभ” शीर्ष के अधीन किया जाएगा;
(ग) यदि हानि का मुजरा पूर्णतया इस प्रकार नहीं किया जा सकता है, तो हानि की ऐसी रकम, जिसका मुजरा इस प्रकार नहीं किया गया है, अगले निर्धारण वर्ष के लिए अग्रनीत की जाएगी और इसी प्रकार आगे भी किया जाएगा।]
(2) कोर्इ भी हानि, उस निर्धारण वर्ष के, जिसके लिए उस हानि की संगणना पहली बार की गर्इ थी, ठीक बाद के आठ निर्धारण वर्षों से अधिक के लिए इस धारा के अधीन अग्रनीत नहीं की जाएगी।
(3) 77[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया।]
76. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से यथा संशोधित उपधारा (1) इस प्रकार थी:
‘‘(1) जहां किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में ‘‘पूँजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन संगणना का अंतिम परिणाम निर्धारिती को हानि है, वहां संपूर्ण हानि, इस अध्याय के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अगले निर्धारण वर्ष के लिए अग्रनीत की जाएगी, और–
(क) उसका मुजरा उस निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारणीय ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन हुर्इ आय के प्रति, यदि कोर्इ हो, किया जाएगा; और
(ख) यदि उस हानि का मुजरा पूर्णत: इस प्रकार नहीं किया जा सकता है तो हानि की ऐसी रकम, जिसका मुजरा इस प्रकार नहीं किया जा सकता है, अगले निर्धारण वर्ष के लिए अग्रनीत की जाएगी और आगे भी इसी प्रकार की जाती रहेगी।’’
77. लोप से पूर्व उपधारा (3) इस प्रकार थी:
‘(3) यदि कोर्इ हानि 1 अप्रैल, 1987 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के संबंध में ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन संगणित की गर्इ है और 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व विद्यमान इस धारा के उपबंधों के अनुसार अग्रनीत की गर्इ है तो 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी उत्तरवर्ती निर्धारण वर्ष में उस हानि के बारे में निम्नलिखित रूप में कार्रवार्इ की जाएगी,–
(क) जहां तक उस हानि का संबंध अल्पकालिक पूंजी आस्तियों से है, वह उपधारा (1) और (2) के उपबंधों के अनुसार अग्रनीत और मुजरा की जाएगी;
(ख) जहां तक ऐसी हानि का संबंध दीर्घकालिक पूंजी आस्तियों से है, उसमें से धारा 48 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कटौतियां कम कर दी जाएंगी और कम करके प्राप्त रकम, उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार अग्रनीत और मुजरा की जाएगी, किंतु ऐसा अग्रनयन उस निर्धारण वर्ष के, जिसके लिए उस हानि की संगणना पहली बार की गर्इ थी, ठीक बाद के चौथे निर्धारण वर्ष से आगे अनुज्ञात नहीं किया जाएगा।’
[वित्त अधिनियम, 2015 द्वारा संशोधित रूप में]

