व्यष्टि की आय में पति या पत्नी, अवयस्क संतान आदि की आय का भी सम्मिलित होना
व्यष्टि की आय में पति या पत्नी, अवयस्क संतान आदि की आय का भी सम्मिलित होना
64. (1) किसी व्यष्टि की कुल आय की संगणना करने में ऐसी सब आय सम्मिलित की जाएंगी जो प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:–
(i) [वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
(ii) किसी ऐसे समुत्थान से जिसमें उस व्यष्टि का पर्याप्त हित है, ऐसे व्यष्टि के पति या पत्नी को वेतन, कमीशन, फीस या किसी अन्य रूप में पारिश्रमिक से, चाहे नकद या वस्तु रूप में उद्भूत हो:
परन्तु इस खंड की कोर्इ भी बात पति या पत्नी को प्राप्त होने वाली आय के संबंध में इस दशा में लागू नहीं होगी यदि पति या पत्नी तकनीकी या वृत्तिक अर्हताएं रखते हैं और वह आय अनन्यत: उनके तकनीकी या वृत्तिक ज्ञान और अनुभव के प्रयोगों के फलस्वरूप प्राप्त हुर्इ मानी जा सकती है।
(iii) [वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
(iv) धारा 27 के खंड (i) के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसे व्यष्टि के पति या पत्नी की उन आस्तियों से उद्भूत हो जो व्यष्टि द्वारा पति या पत्नी को पर्याप्त प्रतिफल या अलग-अलग रहने के करार के संबंध में प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अंतरित किए जाने से अन्यथा अंतरित की गर्इ हो।
(v) [वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
(vi) ऐसे व्यष्टि की पुत्रवधु को उन आस्तियों से उद्भूत हो जो ऐसे व्यष्टि द्वारा उस पुत्रवधु को 1 जून, 1973 को या उसके पश्चात् पर्याप्त प्रतिफल के लिए प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अंतरित किए जाने से अन्यथा अंतरित की गर्इ हो;
(vii) किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के संगम को उन आस्तियों से उद्भूत हो जो व्यष्टि द्वारा उस व्यक्ति को या व्यक्तियों के संगम को पर्याप्त प्रतिफल के लिए प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अन्तरित किए जाने से अन्यथा अन्तरित की गर्इ हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसी आस्तियों से होने वाली आय उसके पति या पत्नी के तात्कालिक या आस्थगित फायदे के लिए है, और
(viii) किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के संगम को उन आस्तियों से उद्भूत हो जो व्यष्टि द्वारा उस व्यक्ति को या व्यक्तियों के संगम को पर्याप्त प्रतिफल के लिए प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अन्तरित किए जाने से अन्यथा 1 जून, 1973 को या उसके पश्चात् अंतरित की गर्इ हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसी आस्तियों से होने वाली आय उसकी पुत्रवधु के तात्कालिक या आस्थगित फायदे के लिए है।
स्पष्टीकरण 1.–खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए ऐसा व्यष्टि, जिसकी कुल आय की संगणना करने में उस खंड में निर्दिष्ट आय सम्मिलित की जानी है, वह पति होगा या पत्नी होगी जिसकी कुल आय (उस खंड में निर्दिष्ट आय को छोड़कर) अधिक है; और जहां ऐसी कोर्इ आय पति या पत्नी में से किसी एक की कुल आय में एक बार सम्मिलित कर ली जाती है, वहां किसी उत्तरवर्ती वर्ष में प्राप्त होने वाली ऐसी कोर्इ आय उस पति या पत्नी में से दूसरे की कुल आय में तब तक सम्मिलित नहीं की जाएगी जब तक निर्धारण अधिकारी का, उस पति या पत्नी को सुनवार्इ का अवसर देने के पश्चात् यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है।
स्पष्टीकरण 2.–खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए किसी व्यष्टि के बारे में यह समझा जाएगा कि उसका किसी समुत्थान में पर्याप्त हित है–
(i) उस दशा में जिसमें ऐसा समुत्थान कंपनी है यदि उसके शेयर (जो ऐसे नहीं हैं जिन पर केवल नियत दर पर लाभांश का हक है चाहे लाभ पाने का और अधिकार हो या नहीं) जिनमें 20 प्रतिशत से अन्यून मतदान शक्ति है, पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय किसी व्यक्ति के फायदाप्रद स्वामित्व में है या भागत: ऐसे व्यक्ति के और भागत: उसके एक या अधिक नातेदारों के फायदाप्रद स्वामित्व में है;
(ii) किसी अन्य दशा में जिसमें ऐसा व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति और उसके एक या अधिक नातेदार कुल मिलाकर, पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय ऐसे समुत्थान के बीस प्रतिशत से अन्यून लाभ के हकदार हैं।
स्पष्टीकरण 2क.–[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
स्पष्टीकरण 3.–खंड (iv) और खंड (vi) के प्रयोजनों के लिए, जहां किसी व्यष्टि द्वारा अपने पति या पत्नी अथवा पुत्रवधु के (जिसे इसके पश्चात् इस स्पष्टीकरण में ''अंतरिती'' कहा गया है) प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अंतरित आस्तियों का अंतरिती द्वारा विनिधान–
(i) किसी कारबार में किया जाता है, ऐसा विनिधान, यथास्थिति, किसी फर्म में भागीदार की हैसियत में, या किसी फर्म में भागीदारी के फायदों में सम्मिलित किए जाने के लिए पूंजी अभिदाय के रूप में नहीं है, वहां किसी पूर्ववर्ष में अन्तरिती को उस कारबार से प्राप्त होने वाली आय का वह भाग, जिसका उस कारबार से अन्तरिती को होने वाली आय से वही अनुपात है जो उस पूर्ववर्ष के प्रथम दिन को पूर्वोक्त आस्तियों के मूल्य का, उक्त दिन को अंतरिती द्वारा उस कारबार में किए गए कुल विनिधान से है;
(ii) किसी फर्म में भागीदार की हैसियत में पूंजी अभिदाय के रूप में किया जाता है, वहां किसी पूर्ववर्ष में अन्तरिती द्वारा उस फर्म से प्राप्य ब्याज का वह भाग, जिसका उस फर्म से अन्तरिती द्वारा प्राप्य ब्याज से वही अनुपात है जो उस पूर्ववर्ष के प्रथम दिन को पूर्वोक्त विनिधान के मूल्य का उक्त दिन को उस फर्म में भागीदार की हैसियत में पूंजी अभिदाय के रूप में किए गए कुल विनिधान से है,
उस पूर्ववर्ष में व्यष्टि की कुल आय में सम्मिलित किया जाएगा।
(1क) किसी व्यष्टि की कुल आय की संगणना करने में, ऐसी सभी आय सम्मिलित की जाएगी जो उसकी अवयस्क संतान को प्राप्त या उत्पन्न होती है, जो धारा 80प में विनिर्दिष्ट प्रकृति की किसी नि:शक्तता से पीड़ित अवयस्क संतान नहीं है:
परन्तु इस उपधारा की कोर्इ बात ऐसी आय की बाबत लागू नहीं होगी, जो अवयस्क संतान को,–
(क) उसके द्वारा किए गए किसी शारीरिक कार्य से; या
(ख) ऐसे क्रियाकलाप से, जिसमें उसके कौशल, प्रतिभा या विशेषज्ञीय ज्ञान और अनुभव का उपयोग हुआ हो,
प्राप्त या वसूल होती है।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, अवयस्क संतान की आय,–
(क) जहां उसके माता या पिता का विवाह अस्तित्व में है, उस माता या पिता की आय में सम्मिलित की जाएगी जिसकी कुल आय (इस उपधारा के अधीन सम्मिलित किए जाने योग्य आय को छोड़कर) अधिक है; या
(ख) जहां उसके माता या पिता का विवाह अस्तित्व में नहीं है, वहां उस माता या पिता की आय में सम्मिलित की जाएगी, जिसने पूर्ववर्ष में अवयस्क संतान का भरणपोषण किया है;
और जहां ऐसी कोर्इ आय माता या पिता में से किसी एक की कुल आय में एक बार सम्मिलित कर ली जाती है वहां किसी उत्तरवर्ती वर्ष में प्राप्त होने वाली ऐसी कोर्इ आय, उस माता या पिता में से दूसरे की कुल आय में तब तक सम्मिलित नहीं की जाएगी जब तक निर्धारण अधिकारी का उस माता या पिता को सुनवार्इ का अवसर देने के पश्चात् यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है।
(2) जहां, ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का सदस्य है, कोर्इ संपत्ति, जो उसी व्यष्टि की पृथक संपत्ति रही है, 31 दिसम्बर, 1969 के पश्चात् किसी समय उस व्यष्टि द्वारा उस पृथक संपत्ति को कुटुम्ब की संपत्ति का रूप देकर या कुटुम्ब की सम्मिलित संपत्ति में मिलाकर या कुटुम्ब के सामान्य स्टाक में डालकर या व्यष्टि द्वारा पर्याप्त प्रतिफल के बिना कुटुम्ब को प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अंतरित करके कुटुम्ब की संपत्ति के रूप में संपरिवर्तित किया गया है (ऐसी संपत्ति को जो, इस प्रकार संपरिवर्तित या अंतरित की गर्इ है, इसमें आगे संपरिवर्तित संपत्ति कहा गया है) वहां इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी 1 अप्रैल, 1971 को या तत्पश्चात् प्रारम्भ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए उस व्यष्टि की कुल आय की इस अधिनियम के अधीन संगणना करने के प्रयोजन के लिए–
(क) यह समझा जाएगा कि उस व्यष्टि ने संपरिवर्तित संपत्ति को कुटुम्ब के माध्यम से कुटुम्ब के सदस्यों को उनके द्वारा संयुक्त रूप से धारण किए जाने के लिए अंतरित कर दिया है;
(ख) संपरिवर्तित संपत्ति या उसके किसी भाग से प्राप्त आय उस व्यष्टि को प्राप्त हुर्इ आय समझी जाएगी न कि कुटुम्ब को;
(ग) जहां संपरिवर्तित संपत्ति कुटुम्ब के सदस्यों के बीच (आंशिक या पूर्ण) विभाजन का विषय रही हो, वहां ऐसी संपरिवर्तित संपत्ति से प्राप्त आय, जो पति या पत्नी को विभाजन पर प्राप्त होती है, ऐसी आय समझी जाएगी कि वह उस व्यष्टि द्वारा उस पति या पत्नी को अप्रत्यक्ष रूप से अंतरित आस्तियों से उस पति या पत्नी को प्राप्त हुर्इ है और उपधारा (1) के उपबंध यावत्शक्य तद्नुसार लागू होंगे:
परन्तु खंड (ख) या खंड (ग) में निर्दिष्ट आय, व्यष्टि की कुल आय में सम्मिलित किए जाने पर, यथास्थिति, कुटुम्ब की अथवा व्यष्टि के पति या पत्नी की कुल आय में से निकाल दी जाएगी।
स्पष्टीकरण 1.–उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए–
''संपत्ति'' के अंतर्गत है जंगम या स्थावर संपत्ति में कोर्इ हित, उसके विक्रय के आगम या तत्समय उसके विक्रय के आगम के रूप में कोर्इ धन या विनिधान और जहां संपत्ति किसी भी ढंग से किसी अन्य संपत्ति में संपरिवर्तित की जाए वहां ऐसी अन्य संपत्ति।
स्पष्टीकरण 2.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए ''आय'' के अंतर्गत हानि भी है।
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

