निवास के लिए उपयोग में लार्इ गर्इ संपत्ति के विक्रय पर लाभ
निवास के लिए उपयोग में लार्इ गर्इ संपत्ति के विक्रय पर लाभ
54. (1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां ऐसे निर्धारिती की दशा में जो एक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है पूंजी अभिलाभ ऐसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के अंतरण से पैदा होता है और जो ऐसे भवनों या उनसे लगी भूमि है और जो ऐसा वास-गृह है, जिसकी आय, ''गृह संपत्ति से आय'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य है (जिसे इस धारा में आगे मूल आस्ति कहा गया है) तथा निर्धारिती ने उस तारीख के, जिसको अंतरण हुआ है, एक वर्ष पूर्व या दो वर्ष पश्चात् भारत में एक निवास गृह क्रय किया है या उस तारीख के पश्चात् तीन वर्षों की कालावधि के भीतर सन्निर्मित किया है वहां, पूंजी अभिलाभ पर उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें अंतरण हुआ था आय के रूप में आय-कर प्रभारित किए जाने के बजाय, उसके संबंध में इस धारा के निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार कार्रवार्इ की जाएगी, अर्थात्–
(i) यदि पूंजी अभिलाभ की रकम इस प्रकार खरीदे गए या बनाए गए वास-गृह की लागत से अधिक है (जिसे इस धारा के आगे नर्इ आस्ति कहा गया है) तो पूंजी अभिलाभ की राशि और नर्इ आस्ति का अंतर धारा 45 के अधीन पूर्ववर्ष की आय के रूप में प्रभारित किया जाएगा; और नर्इ आस्ति की बाबत, उसके क्रय या निर्माण जो भी हो के तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की संगणना करने के प्रयोजन के लिए लागत शून्य होगी; या
(ii) यदि पूंजी अभिलाभ की रकम नर्इ आस्ति की लागत के बराबर या उससे कम है, तो पूंजी अभिलाभ धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा; और नर्इ आस्ति की बाबत यथास्थिति उसके क्रय या निर्माण के संबंध में तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की संगणना करने के प्रयोजन के लिए पूंजी अभिलाभ की रकम में से लागत घटा दी जाएगी।
वित्त अधिनियम, 2019 द्वारा 1.4.2020 से धारा 54 की उपधारा (1) के खंड (ii) के पश्चात निम्नलिखित परंतुक अंत:स्थापित किए जाएंगे।
परंतु जहां पूंजी अभिलाभ की रकम दो करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, वहां निर्धारिती अपने विकल्प पर भारत में दो निवास गृह क्रय या संनिर्मित कर सकेगा और जहां ऐसे विकल्प का प्रयोग किया जाता है, वहां-
(क) इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो "भारत में एक निवास गृह" शब्दों के स्थान पर, "भारत में दो निवास गृह" शब्द रख दिए गए थे;
(ख) इस उपधारा और उपधारा (2) में "नर्इ आस्ति" के प्रति किसी निर्देश का अर्थ, भारत में दो निवास गृहों के प्रतिनिर्देश के रूप में लगाया जाएगा:
परंतु यह कि जहां किसी निर्धारण वर्ष के दौरान निर्धारिती वर्ष के दौरान निर्धारिती ने पहले परंतुक में निर्दिष्ट विकल्प का प्रयोग कर लिया है, वहां वह तत्पश्चात् विकल्प का प्रयोग उसी या किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए करने का हकदार नहीं होगा।
(2) पूंजी अभिलाभ की रकम, जो निर्धारिती द्वारा उस तारीख के पूर्व जिसको मूल आस्ति का अंतरण किया गया है, एक वर्ष के भीतर किए गए नर्इ आस्ति के क्रय में नहीं लगार्इ जाती है या जिसका उसके द्वारा उपयोग धारा 139 के अधीन, आय की विवरणी देने की तारीख के पूर्व नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए नहीं किया जाता है, ऐसी विवरणी देने के पूर्व उसके द्वारा किसी ऐसे बैंक या संस्था में खाते में जमा की जाएगी [ऐसी जमा किसी भी दशा में धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन उस निर्धारिती की दशा में आय की विवरणी देने के लिए लागू निश्चित तारीख तक की जाएगी] जो ऐसी स्कीम में बतार्इ जाए और ऐसी स्कीम के अनुसार उसका उपयोग किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त बनाए तथा ऐसी विवरणी के साथ ऐसी जमा का सबूत भी प्रस्तुत किया जाएगा और उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए वह रकम, यदि कोर्इ हो, जिसका नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए निर्धारिती द्वारा पहले ही उपयोग किया जा चुका है, इस प्रकार जमा रकम सहित नर्इ आस्ति की लागत समझी जाएगी :
परन्तु यदि इस उपधारा के अधीन जमा रकम का उपयोग उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर नर्इ आस्ति खरीदने या बनाने में पूर्णत: या भागत: नहीं किया जाता है, तो–
(i) इस प्रकार अप्रयुक्त रही रकम धारा 45 के अधीन उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में कर से प्रभारित की जाएगी जिसमें मूल आस्ति के अंतरण की तारीख से तीन वर्ष की अवधि समाप्त होती है; और
(ii) निर्धारिती उपरोक्त स्कीम के अनुसार ऐसी रकम को वापस लेने का हकदार होगा।
स्पष्टीकरण.–[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

