निवास के लिए इस्तेमाल किया संपत्ति की बिक्री पर लाभ
निवास के लिए उपयोग में लार्इ गर्इ संपत्ति के विक्रय पर लाभ
3154. 32[(1)] 33[34[उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां ऐसे निर्धारिती35 की दशा में जो एक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है] पूंजी अभिलाभ ऐसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के अंतरण से पैदा होता है 36[* * *] और जो ऐसे भवनों या उनसे लगी भूमि है और जो ऐसा वास-गृह है, जिसकी आय, "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है (जिसे इस धारा में आगे मूल आस्ति कहा गया है) तथा निर्धारिती ने 37[कोर्इ वास-गृह उस तारीख के जिसको अंतरण हुआ है, एक वर्ष पहले या दो वर्ष पश्चात् खरीदा38 है] या उस तारीख के पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के भीतर बनाया है, वहां], पूंजी अभिलाभ पर उस पूर्ववर्ष के लिए जिसमें अंतरण हुआ था आय के रूप में आय-कर प्रभारित किए जाने के बजाय, उसके संबंध में इस धारा के निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार कार्रवार्इ की जाएगी, अर्थात्–
(i) यदि पूंजी अभिलाभ की रकम 39[इस प्रकार खरीदे गए या बनाए गए 40[वास-गृह] की लागत से अधिक है (जिसे इस धारा के आगे नर्इ आस्ति कहा गया है)] तो पूंजी अभिलाभ की राशि और नर्इ आस्ति का अंतर धारा 45 के अधीन पूर्ववर्ष की आय के रूप में प्रभारित किया जाएगा; और नर्इ आस्ति की बाबत, उसके क्रय या निर्माण जो भी हो के तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की संगणना करने के प्रयोजन के लिए लागत शून्य होगी; या
(ii) यदि पूंजी अभिलाभ की रकम नर्इ आस्ति की लागत के बराबर या उससे कम है, तो पूंजी अभिलाभ धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा और नर्इ आस्ति की बाबत उसके क्रय या निर्माण, जो भी हो, के संबंध में तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की संगणना करने के प्रयोजन के लिए पूंजी अभिलाभ की रकम में से लागत घटा दी जाएगी।
41[* * *]
42[(2) पूंजी अभिलाभ की रकम, जो निर्धारिती द्वारा उस तारीख के पूर्व जिसको मूल आस्ति का अंतरण किया गया है, एक वर्ष के भीतर किए गए नर्इ आस्ति के क्रय में नहीं लगार्इ जाती है या जिसका उसके द्वारा उपयोग धारा 139 के अधीन, आय की विवरणी देने की तारीख के पूर्व नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए नहीं किया जाता है, ऐसी विवरणी देने के पूर्व उसके द्वारा किसी ऐसे बैंक या संस्था में खाते में जमा की जाएगी [ऐसी जमा किसी भी दशा में धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन उस निर्धारिती की दशा में आय की विवरणी देने के लिए लागू निश्चित तारीख के पश्चात् की जाएगी] जो ऐसी स्कीम में बतार्इ जाए और ऐसी स्कीम43 के अनुसार उसका उपयोग किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त बनाए तथा ऐसी विवरणी के साथ ऐसी जमा का सबूत भी प्रस्तुत किया जाएगा और उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए वह रकम, यदि कोर्इ हो, जिसका नर्इ आस्ति के क्रय या निर्माण के लिए निर्धारिती द्वारा पहले ही उपयोग किया जा चुका है, इस प्रकार जमा रकम सहित नर्इ आस्ति की लागत समझी जाएगी :
परन्तु यदि इस उपधारा के अधीन जमा रकम का उपयोग उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर नर्इ आस्ति खरीदने या बनाने में पूर्णत: या भागत: नहीं किया जाता है, तो–
(i) इस प्रकार अप्रयुक्त रही रकम धारा 45 के अधीन उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में कर से प्रभारित की जाएगी जिसमें मूल आस्ति के अंतरण की तारीख से तीन वर्ष की अवधि समाप्त होती है; और
(ii) निर्धारिती उपरोक्त स्कीम के अनुसार ऐसी रकम को वापस लेने का हकदार होगा।
स्पष्टीकरण.–44[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
31. परिपत्र सं. 471, तारीख 15.10.1986, परिपत्र सं. 520, तारीख 11.8.1988, परिपत्र सं. 538, तारीख 13.7.1989, परिपत्र सं. 672, तारीख 16.12.1993, परिपत्र सं. 667, तारीख 18.10.1993 और परिपत्र सं. 743, तारीख 6.5.1996 भी देखिये। ब्यौरों के लिए, देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
32. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव के साथ अंत:स्थापित।
33. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से प्रतिस्थापित।
34. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "ऐसी दशा में जहां निर्धारिती जो एक व्यक्ति हो" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
35. "निर्धारिती" पद के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.
36. वित्त अधिनियम, 1985 तथा 1.4.1985 से "जिसे धारा 53 के उपबंध लागू नहीं होते हैं" शब्दों का लोप कर दिया गया।
37. वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से, "उस तारीख के पूर्व या पश्चात् जिसको अंतरण हुआ था खरीदा है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
38. 'खरीदा है' शब्दों के अर्थ के लिए, देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
39. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से "नर्इ आस्ति की लागत से अधिक है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
40. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से 'गृह संपत्ति' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
41. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से लोप किया गया। वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित मूल स्पष्टीकरण इस प्रकार था--
'स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, "दीर्घकालिक पूंजी आस्ति" से "ऐसी पूंजी आस्ति अभिप्रेत है जो अल्पकालिक पूंजी आस्ति नहीं है।"
42. [वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से यथा अंत:स्थापित और वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से और वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से संशोधित] निम्नलिखित उपधारा (2) के स्थान पर वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से प्रतिस्थापित :
'(2) जहां मूल आस्ति का अंतरण किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में है और ऐसे अर्जन के लिए दिलवाया गया प्रतिकर किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा बढ़ा दिया जाता है, वहां,--
(क) इस प्रकार बढ़ाया गया प्रतिकर ऐसे अंतरण के फलस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूर्ण मूल्य मानकर धारा 48 के अधीन संगणित उतना पूंजी अभिलाभ जितना उपधारा (1) के अधीन धारा 45 के अधीन कर से प्रभारित होने से अपवर्जित नहीं है, या
(ख) प्रतिकर की वृद्धि के रूप में पूंजी अभिलाभ,
जो भी कम हो (जो भी कम है उसे उसमें उपधारा में आगे असमायोजित पूंजी अभिलाभ कहा गया है), यदि निर्धारिती ने अतिरिक्त प्रतिकर की प्राप्ति की तारीख के पूर्व एक वर्ष के भीतर या दो वर्ष के पश्चात् की अवधि के भीतर एक वास-गृह खरीदा है अथवा उस तारीख के पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के भीतर वास-गृह बनाया है (जिसे इस उपधारा में सुसंगत आस्ति कहा गया है), निम्नलिखित रीति से व्यवहृत किया जाएगा, अर्थात्--
(i) यदि असमायोजित पूंजी अभिलाभ की रकम सुसंगत आस्ति की लागत से अधिक है, तो असमायोजित पूंजी अभिलाभ और सुसंगत आस्ति की लागत के बीच अंतर उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में धारा 45 के अधीन प्रभारित किया जाएगा जिसमें अंतरण हुआ था; और सुसंगत आस्ति की बाबत उसके क्रय या निर्माण के तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाला पूंजी अभिलाभ, जो भी हो, की संगणना के लिए, लागत शून्य होगी, अथवा
(ii) यदि असमायोजित पूंजी अभिलाभ की रकम सुसंगत आस्ति की लागत के बराबर है या उससे कम है, तो असमायोजित पूंजी अभिलाभ धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा; और सुसंगत आस्ति की बाबत उसके क्रय या निर्माण की तीन वर्ष की अवधि के भीतर उसके अंतरण से होने वाले किसी पूंजी अभिलाभ की संगणना के लिए, लागत में से असमायोजित पूंजी अभिलाभ की रकम घटा दी जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, धारा 54ख की उपधारा (2) और धारा 54घ की उपधारा (2)–
(1) किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में किसी पूंजी अभिलाभ के अंतरण के संबंध में, "अतिरिक्त प्रतिकर" से किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण द्वारा बढ़ाए गए ऐसी आस्ति के अर्जन प्रतिकर और उस प्रतिकर के बीच अंतर अभिप्रेत है जो संदेय होता यदि ऐसी वृद्धि न की गर्इ होती;
(2) किसी पूंजी आस्ति के अनिवार्य अर्जन के लिए प्रतिकर की किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा की गर्इ वृद्धि के फलस्वरूप पूंजी अभिलाभ इस प्रकार होगा--
(क) जहां धारा 48 के अधीन पूंजी अभिलाभ की संगणना के लिए प्रतिकर को जो यदि ऐसी वृद्धि न की गर्इ होती संदेय होना प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल का पूर्ण मूल्य मानकर इस अंतरण के परिणामस्वरूप हानि होती है या "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन आयकर के लिए प्रभार्य कोर्इ लाभ या अभिलाभ नहीं होता है, वहां धारा 48 के अधीन संगणित पूंजी अभिलाभ अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल का पूर्ण मूल्य मानकर इस प्रकार वर्जित प्रतिकर माना जाएगा; और
(ख) किसी अन्य दशा में--
(i) इस प्रकार बढ़ाए गए प्रतिकर को इस प्रकार प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के रूप में मानकर धारा 48 के अधीन संगणित पूंजी अभिलाभ, और
(ii) धारा 48 के अधीन संगणित पूंजी अभिलाभ को ऐसा प्रतिकर मानकर जो संदेय होता यदि ऐसी वृद्धि नहीं की जाती, इस प्रकार प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल का पूर्ण मूल्य बीच के अंतर होगा।
43. पूंजी अभिलाभ लेखा स्कीम, 1988-सा.का.नि. 724(इ), तारीख 22.6.1988 के पाठ के लिए तथा निक्षेप प्राप्त करने और लेखा रखने के लिए विनिर्दिष्ट बैंकों की प्राधिकृत शाखाओं की सूची के लिए सा.का.नि. 725(इ), तारीख 22.6.1988 के लिए, देखिये टैक्समैन्स डायरैक्ट टैक्सेज सर्कुलर्स, 1999 संस्करण, खंड 1, पृष्ठ 1.1143-1.1164.
44. लोप से पहले, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1992 से यथा संशोधित स्पष्टीकरण इस प्रकार था :
"स्पष्टीकरण.–जहां कोर्इ रकम इस उपधारा के परन्तुक के अनुसार धारा 45 के अधीन प्रभार्य हो जाती है, वहां,--
(क) धारा 48 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन की जाने वाली कटौतियों के प्रयोजनों के लिए इस धारा की उपधारा (2) के अधीन पन्द्रह हजार रुपए की आरम्भिक कटौती अनुज्ञेय नहीं होगी; और
(ख) धारा 53 में की कोर्इ बात ऐसी रकम के बारे में लागू नहीं होगी।"
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

