वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।
निवास गृह से पूंजी अभिलाभ की छूट
53. 30[वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया।]
30. लोप पूर्व कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से और वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से यथासंशोधित धारा 53 निम्न प्रकार थी :
'53. निवास गृह से पूंजी अभिलाभ की छूट--धारा 45 में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी ऐसे अंतरिती की दशा में, जो एक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है, किसी ऐसी दीर्घकालीन पूंजी आस्ति के अंतरण से जो ऐसे भवनों या उनसे अनुलग्न भूमियों के रूप में है और जो ऐसा कोर्इ निवास गृह है जिसकी आय "गृह संपत्ति से आय" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है, पूंजी अभिलाभ उद्भूत होता है, वहां ऐसे अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ के संबंध में इस धारा के निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार कार्रवार्इ की जाएगी, अर्थात्:-
(क) किसी ऐसी दशा में जहां ऐसी पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूर्ण मूल्य दो लाख रुपए से अधिक नहीं है, वहां ऐसा संपूर्ण पूंजी अभिलाभ धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा;
(ख) किसी ऐसी दशा में जहां ऐसे प्रतिफल का पूर्ण मूल्य दो लाख रुपए से अधिक है, वहां ऐसे पूंजी अभिलाभ का उतना भाग जिसका संपूर्ण पूंजी अभिलाभ से वही अनुपात है जो दो लाख रुपए की रकम का ऐसे प्रतिफल से है, धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाएगा:
परन्तु जहां ऐसे अंतरण की तारीख को कोर्इ अन्य निवास गृह निर्धारिती के स्वामित्व में ह,ै वहां इस धारा की कोर्इ बात ऐसे मामले को लागू नहीं होगी।
स्पष्टीकरण.–इस धारा में और धारा 54, धारा 54ख, धारा 54घ, धारा 54ड़, धारा 54च और धारा 54छ में, पूंजी अभिलाभ के प्रति निर्देशों का वह अर्थ लगाया जाएगा कि वे धारा 48 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन संगणित पूंजी अभिलाभ की रकम के प्रति निर्देश हैं।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

