पूंजी अभिलाभ
ड़–पूंजी अभिलाभ
पूंजी अभिलाभ
45. (1) किसी पूंजी आस्ति के पूर्ववर्ष में किए गए अन्तरण से उद्भूत लाभ या अभिलाभ धारा 54, 54ख, 54घ, 54ड़, 54ड़क, 54ड़ख, 54च, 54छ और 54ज में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, ''पूंजी लाभ'' शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य होंगे और उस पूर्ववर्ष की आय समझे जाएंगे जिसमें अंतरण हुआ है।
(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति,–
(i) बाढ़, बवंडर, तूफान, चक्रवात, भूकंप या अन्य प्राकृतिक उथल-पुथल; या
(ii) बलवे या सिविल उपद्रव; या
(iii) आकस्मिक अग्नि या विस्फोट; या
(iv) किसी शत्रु की कार्रवाई या किसी शत्रु का मुकाबला करने के लिए की गई कार्रवाई (चाहे युद्ध की घोषणा पर या उसके बिना),
के परिणामस्वरूप किसी पूंजी आस्ति को हुए नुकसान या उसके विनाश के संबंध में किसी बीमाकर्ता से बीमा के अधीन कोई धन या अन्य आस्तियां, किसी पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय प्राप्त करता है, वहां ऐसे धन या अन्य आस्तियों की प्राप्ति से होने वाला कोई लाभ या अभिलाभ 'पूंजी अभिलाभ' शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य होगा और वह उस पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें ऐसा धन या अन्य आस्तियां प्राप्त हुई थीं, उस व्यक्ति की आय समझी जाएंगी और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए ऐसी प्राप्तियों की तारीख को किसी धन का मूल्य या अन्य आस्ति का उचित बाजार मूल्य, ऐसी पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत हुए प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, 'बीमाकर्ता' पद का वही अर्थ होगा जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (9) में उसका है।
56कक[(1ख) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति किसी पूर्व वर्ष के दौरान किसी भी समय किसी यूनिट सहबद्ध बीमा पालिसी, जिसको धारा 10 के खंड (10घ) के अधीन, उसके चौथे और पांचवे परन्तुक के लागू होने के कारण, छूट लागू नहीं होती है, के अंतर्गत कोई राशि प्राप्त करता है, जिसके अंतर्गत ऐसी पालिसी पर बोनस के माध्यम से आबंटित कोई राशि भी है, तब ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसी राशि की प्राप्ति से उदभूत होने वाला कोई लाभ या अभिलाभ "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य होगा और उसे ऐसे व्यक्ति की उस पूर्व वर्ष की आय के रूप में माना जाएगा, जिसमें उसे यह राशि प्राप्त हुई थी और कराधेय आय की संगणना ऐसी रीति में की जाएगी, जो विहित की जाए।;]
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, स्वामी द्वारा किसी पूंजी आस्ति के उसके द्वारा चलाए जाने वाले किसी कारबार के व्यापार स्टाक के रूप में उसके संपरिवर्तन के रूप में अंतरण या माने जाने से उद्भूत लाभ या अभिलाभ ऐसे पूर्ववर्ष की उसकी आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे जिसमें ऐसे व्यापार स्टाक का उसके द्वारा विक्रय या अन्यथा अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए ऐसे संपरिवर्तन या माने जाने की तारीख की आस्ति का उचित बाजार मूल्य पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।
(2क) जहां किसी व्यक्ति को पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय किन्हीं प्रतिभूतियों में कोई फायदाप्रद हित प्राप्त था वहां प्रतिभूतियों की बाबत ऐसे फायदाप्रद हित के निक्षेपकर्ता या भागीदार द्वारा किए गए अंतरण से उद्भूत कोई लाभ या अभिलाभ उस पूर्ववर्ष की फायदाप्रद स्वामी की जिसमें ऐसा अंतरण हुआ था, आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा तथा निक्षेपकर्ता की आय नहीं माना जाएगा जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 10 की उपधारा (1) के फलस्वरूप प्रतिभूतियों का रजिस्टर्ड स्वामी समझा जाता है, और–
(i) धारा 48; तथा
(ii) धारा 2 के खंड (42क) के परन्तुक,
के प्रयोजनों के लिए, अर्जन की लागत और कोई प्रतिभूतियां धारण करने की अवधि पहले आओ पहले पाओ की पद्धति के आधार पर अवधारित की जाएगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ''फायदाप्रद स्वामी'', ''निक्षेपकर्ता'' और ''प्रतिभूति'' पदों का क्रमश: वही अर्थ होगा जो उनका निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (क), (ड़) और (ठ) में है।
(3) किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी फर्म या अन्य व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय को (जो कंपनी या सहकारी सोसाइटी नहीं है) जिसमें वह भागीदार या सदस्य है या हो जाता है, पूंजी अभिदाय करके या अन्यथा किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत लाभ या अभिलाभ ऐसे पूर्ववर्ष की उसकी आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे, जिसमें ऐसा अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए, ऐसी फर्म, संगम या निकाय की लेखा बहियों में पूंजी आस्ति के मूल्य के रूप में अभिलिखित रकम, पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझी जाएगी।
56कख[(4) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई विनिर्दिष्ट व्यक्ति, ऐसे विनिर्दिष्ट अस्तित्व के पुनर्गठन के संबंध में किसी विनिर्दिष्ट अस्तित्व से पूर्ववर्ष के दौरान कोई धन या पूंजी आस्ति या दोनों प्राप्त करता है, वहां विनिर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा ऐसे धन की प्राप्ति से उद्भूत होने वाले कोई लाभ या अभिलाभ, "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन ऐसे विनिर्दिष्ट अस्तित्व की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे और उस पूर्ववर्ष में, जिसमें ऐसा धन या पूंजी आस्ति या दोनों विनिर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए गए थे, ऐसे विनिर्दिष्ट अस्तित्व की आय के रूप में समझे जाएंगे और इस अधिनियम में अंतर्विष्ट तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, ऐसे लाभों या अभिलाभों का अवधारण निम्नलिखित सूत्र के अनुसार किया जाएगा, अर्थात्:—
क = ख+ग-घ,
जहां,
क = "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन विनिर्दिष्ट अस्तित्व की आय के रूप में इस उपधारा के अधीन कर से प्रभार्य आय;
ख = ऐसी प्राप्ति की तारीख को विनिर्दिष्ट अस्तित्व से विनिर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा प्राप्त किसी धन का मूल्य;
ग = ऐसी प्राप्ति की तारीख को विनिर्दिष्ट अस्तित्व से विनिर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा प्राप्त पूंजी आस्ति के उचित बाजार मूल्य की रकम; और
घ = विनिर्दिष्ट अस्तित्व के गठन के समय पर, उसके बही खातों में विनिर्दिष्ट व्यक्ति के पूंजी खाते (किसी भी रीति में व्यपदिष्ट) में अतिशेष की रकम;
परंतु यदि उपरोक्त सूत्र में "क" का मूल्य नकारात्मक है, तो उसका मूल्य शून्य समझा जाएगा:
परन्तु यह और कि विनिर्दिष्ट अस्तित्व की लेखा बहियों में विनिर्दिष्ट व्यक्ति के पूंजी खाते में अतिशेष को, किसी आस्ति के पुन:मूल्यांकन के कारण या स्वसृजित गुडविल या किसी अन्य स्वसृजित आस्ति के कारण विनिर्दिष्ट व्यक्ति के पूंजी खाते में वृद्धि को हिसाब में लिए बिना संगणित किया जाए।
स्पष्टीकरण 1- इस उपधारा के प्रयोजन के लिए,—
(i) "विनिर्दिष्ट अस्तित्व" और "विनिर्दिष्ट व्यक्ति" पदों का क्रमश: वही अर्थ होगा, जो उनका धारा 9ख में है;
(ii) "स्वसृजित गुडविल" और स्व-सृजित आस्ति" से, यथास्थिति, ऐसी गुडविल या आस्ति अभिप्रेत है, जिसे क्रय के लिए कोई खर्च उपगत किए बिना अर्जित किया गया है या जिसे कारबार या वृत्ति के अनुक्रम के दौरान सृजित किया गया है।
स्पष्टीकरण 2- शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि जब कोई पूंजी आस्ति किसी विनिर्दिष्ट अस्तित्व से ऐसे विनिर्दिष्ट अस्तित्व के पुनर्गठन के संबंध में किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त की जाती है, तब इस उपधारा का उपबंध धारा 9ख के उपबंधों के अतिरिक्त प्रवृत्त होगा और कराधान उक्त उपबंधों के अधीन स्वतंत्र रूप से निकाला जाएगा।]
(5) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां पूंजी अभिलाभ किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से, जो किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में अंतरण है, या ऐसे किसी अंतरण से उद्भूत होता है जिसका प्रतिफल केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अवधारित या अनुमोदित किया गया था और ऐसे अंतरण के लिए प्रतिकर या प्रतिफल में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा वृद्धि या पुन: वृद्धि की जाती है वहां पूंजी अभिलाभ के संबंध में कार्रवाई निम्नलिखित रीति से की जाएगी, अर्थात्:–
(क) यथास्थिति प्रथम बार में अधिनिर्णित प्रतिकर अथवा केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रथम बार में अवधारित या अनुमोदित प्रतिफल के प्रति निर्देश से संगणित पूंजी अभिलाभ उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसा प्रतिकर या उसका भाग अथवा ऐसा प्रतिफल या उसका भाग, प्रथम बार प्राप्त किया गया है, ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन आय के रूप में प्रभार्य होगा; और
(ख) उतनी रकम जितनी प्रतिकर या प्रतिफल में, उस न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा वृद्धि या पुन:वृद्धि की जाती है, वह रकम उस पूर्ववर्ष जिसमें ऐसी रकम निर्धारिती को प्राप्त होती है, ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझी जाएगी :
परंतु किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के किसी अंतरिम आदेश के अनुसरण में प्राप्त प्रतिकर की किसी रकम को उस पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी का अंतिम आदेश किया जाता है, "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझा जाएगा;
(ग) जहां किसी वर्ष से संबंधित निर्धारण में, किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ, यथास्थिति, खंड (क) में निर्दिष्ट प्रतिकर या प्रतिफल अथवा खंड (ख) में निर्दिष्ट वर्धित प्रतिकर या प्रतिफल को हिसाब में लेकर संगणित किया जाता है और तत्पश्चात् ऐसे प्रतिकर या प्रतिफल में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कमी कर दी जाती है, वहां उस वर्ष के इस प्रकार निर्धारित पूंजी अभिलाभ की ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कम किए गए प्रतिकर या प्रतिफल को हिसाब में लेकर पुन: संगणना की जाएगी, जो प्रतिफल का पूरा मूल्य होगी।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए–
(i) खंड (ख) में निर्दिष्ट रकम के संबंध में अर्जन की लागत और सुधार की लागत शून्य मानी जाएगी;
(ii) इस उपधारा के उपबंध उस दशा में भी लागू होंगे जहां अंतरण 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व किया गया है;
(iii) जहां उस व्यक्ति की जिसने अंतरण किया था, मृत्यु के कारण या किसी अन्य कारण से, वर्धित प्रतिकर या प्रतिफल किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वहां खंड (ख) में निर्दिष्ट रकम ऐसे अन्य व्यक्ति की ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य आय समझी जाएगी।
57[(5क) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी विनिर्दिष्ट करार के अधीन ऐसी किसी पूंजी आस्ति, जो भूमि या भवन या दोनों है, के अंतरण से, किसी ऐसे निर्धारिती को, जो व्यष्टि है या हिन्दू अविभक्त कुटुंब है, को पूंजी अभिलाभ उद्भूत होता है, वहां पूंजी अभिलाभ, उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा, जिसमें सक्षम प्राधिकारी द्वारा संपूर्ण परियोजना या उसके भाग के लिए समापन प्रमाणपत्र जारी किया जाता है; और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए, नकद रूप में प्रतिफल, यदि कोई हो, द्वारा हुई वृद्धि के अनुसार परियोजना में उसे शेयर, जो भूमि या भवन या दोनों हैं, उक्त प्रमाणपत्र जारी करने की तारीख को स्टाम्प शुल्क मूल्य पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा:
परंतु इस उपधारा के उपबंध वहां लागू नहीं होंगे, जहां निर्धारिती उक्त समापन प्रमाणपत्र जारी किए जाने की तारीख को या उससे पहले परियोजना में अपने शेयर का अंतरण करता है और पूंजी अभिलाभ उस पूर्ववर्ष की आय समझे जाएंगे, जिसमें ऐसा अंतरण हुआ था, इस उपधारा के उपबंधों से भिन्न इस अधिनियम के उपबंध ऐसे अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत होने वाले प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के अवधारण के प्रयोजन को लागू होंगे।
स्पष्टीकरण–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,–
(i) "सक्षम प्राधिकारी" पद से तत्समय प्रवृत्त किसी भवन योजना को अनुमोदित करने के लिए सशक्त प्राधिकारी अभिप्रेत है;
(ii) "विनिर्दिष्ट करार" पद से ऐसा रजिस्ट्रीकृत करार अभिप्रेत है जिसमें भूमि या भवन या दोनों का स्वामित्व रखने वाला व्यक्ति, ऐसे किसी शेयर, जो ऐसी परियोजना में भूमि या भवन या दोनों हैं, के प्रतिफलस्वरूप, चाहे वह नकद रूप में प्रतिफल के भाग के संदाय सहित या रहित हो, ऐसी भूमि या भवन पर भू-संपदा परियोजना विकसित करने के लिए एक अन्य व्यक्ति को अनुज्ञात करने का करार करता है;
(iii) "स्टाम्प शुल्क मूल्य" पद से ऐसा मूल्य अभिप्रेत है जिसे स्थावर संपत्ति, जो भूमि या भवन है या दोनों की बाबत स्टाम्प शुल्क के संदाय के प्रयोजन के लिए सरकार के किसी प्राधिकारी द्वारा अंगीकृत किया गया है या निर्धारित किया गया है या उसके द्वारा निर्धारणीय है।]
(6) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 80गगख को उपधारा (2) में निर्दिष्ट यूनिटों की पुन: क्रय कीमत और ऐसे यूनिटों के पूंजी मूल्य के बीच अंतर को निर्धारिती को उस पूर्ववर्ष में उद्भूत पूंजी अभिलाभ समझा जाएगा जिसमें ऐसा पुन: क्रय किया जाता है या उस धारा में निर्दिष्ट योजना समाप्त होती है और तदनुसार उस पर कर लगाया जाएगा।
स्पष्टीकरण .– इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ''ऐसे यूनिटों के पूंजी मूल्य'' से निर्धारिती द्वारा धारा 80गगख की उपधारा (2) में निर्दिष्ट यूनिटों में विनिधान की गई कोई रकम अभिप्रेत है।
56कक. वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा 1.4.2021 से अतंस्थापित।
56कख. वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा 1.4.2021 से प्रतिस्थापित । प्रतिस्थापन से पूर्व उपधारा (4) निम्न प्रकार थी:
"(4) किसी फर्म या अन्य व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय के (जो कंपनी या सहकारी सोसाइटी नहीं है) विघटन पर पूंजी आस्तियों के वितरण के रूप में या अन्यथा किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत लाभ या अभिलाभ उस फर्म, संगम या निकाय की ऐसी पूर्ववर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे जिसमें उक्त अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए, ऐसे अंतरण की तारीख को आस्ति का उचित बाजार मूल्य, अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।"
57. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा संशोधित रूप में]

