आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 45

पूंजी अभिलाभ

धारा

धारा संख्या

45

अध्याय शीर्षक

अध्याय IV - कुल आय की गणना

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2014

पूंजी अभिलाभ

पूंजी अभिलाभ

ड़–पूंजी अभिलाभ

पूंजी अभिलाभ

7945. 80[(1)] किसी पूंजी आस्ति81 के पूर्ववर्ष में किए गए81 अन्तरण81 से उद्भूत लाभ या अभिलाभ धारा 82[* * *], 83[54, 54ख, 84[* * *] 85[86[54घ, 87[54ड़, 88[54ड़क, 54ड़ख], 54च 89[, 54छ और 54ज]]]]] में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, ‘‘पूंजी लाभ’’ शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य होंगे और उस पूर्ववर्ष की आय समझे जाएंगे जिसमें अंतरण हुआ है।

90[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोर्इ व्यक्ति,–

(i) बाढ़, बवंडर, तूफान, चक्रवात, भूकंप या अन्य प्राकृतिक उथल-पुथल; या

(ii) बलवे या सिविल उपद्रव; या

(iii) आकस्मिक अग्नि या विस्फोट; या

(iv) किसी शत्रु की कार्रवार्इ या किसी शत्रु का मुकाबला करने के लिए की गर्इ कार्रवार्इ (चाहे युद्ध की घोषणा पर या उसके बिना),

के परिणामस्वरूप किसी पूंजी आस्ति को हुए नुकसान या उसके विनाश के संबंध में किसी बीमाकर्ता से बीमा के अधीन कोर्इ धन या अन्य आस्तियां, किसी पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय प्राप्त करता है, वहां ऐसे धन या अन्य आस्तियों की प्राप्ति से होने वाला कोर्इ लाभ या अभिलाभ ‘पूंजी अभिलाभ’ शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य होगा और वह उस पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें ऐसा धन या अन्य आस्तियां प्राप्त हुर्इ थीं, उस व्यक्ति की आय समझी जाएंगी और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए ऐसी प्राप्तियों की तारीख को किसी धन का मूल्य या अन्य आस्ति का उचित बाजार मूल्य, ऐसी पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत हुए प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।

स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ‘बीमाकर्ता’ पद का वही अर्थ होगा जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (9)91 में उसका है।

92[(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, स्वामी द्वारा किसी पूंजी आस्ति के उसके द्वारा चलाए जाने वाले किसी कारबार के व्यापार स्टाक के रूप में उसके संपरिवर्तन के रूप में अंतरण या माने जाने से उद्भूत लाभ या अभिलाभ ऐसे पूर्ववर्ष की उसकी आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे जिसमें ऐसे व्यापार स्टाक का उसके द्वारा विक्रय या अन्यथा अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए ऐसे संपरिवर्तन या माने जाने की तारीख की आस्ति का उचित बाजार मूल्य पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।]

93[(2क) 94जहां किसी व्यक्ति को पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय किन्हीं प्रतिभूतियों में कोर्इ फायदाप्रद हित प्राप्त था वहां प्रतिभूतियों की बाबत ऐसे फायदाप्रद हित के निक्षेपकर्ता या भागीदार द्वारा किए गए अंतरण से उद्भूत कोर्इ लाभ या अभिलाभ उस पूर्ववर्ष की फायदाप्रद स्वामी की जिसमें ऐसा अंतरण हुआ था, आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा तथा निक्षेपकर्ता की आय नहीं माना जाएगा जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 10 की उपधारा (1) के फलस्वरूप प्रतिभूतियों का रजिस्टर्ड स्वामी समझा जाता है, और–

(i) धारा 48; तथा

(ii) धारा 2 के खंड (42क) के परन्तुक,

के प्रयोजनों के लिए, अर्जन की लागत और कोर्इ प्रतिभूतियां धारण करने की अवधि पहले आओ पहले पाओ की पद्धति के आधार पर अवधारित की जाएगी।

स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ‘‘फायदाप्रद स्वामी’’95, ‘‘निक्षेपकर्ता’’95 और ‘‘प्रतिभूति’’95 पदों का क्रमश: वही अर्थ होगा जो उनका निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (), () और () में है।]

96[(3) किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी फर्म या अन्य व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय को (जो कंपनी या सहकारी सोसाइटी नहीं है) जिसमें वह भागीदार या सदस्य है या हो जाता है, पूंजी अभिदाय करके या अन्यथा किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत लाभ या अभिलाभ ऐसे पूर्ववर्ष की उसकी आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे, जिसमें ऐसा अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए, ऐसी फर्म, संगम या निकाय की लेखा बहियों में पूंजी आस्ति के मूल्य के रूप में अभिलिखित रकम, पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझी जाएगी।

(4) किसी फर्म या अन्य व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय के (जो कंपनी या सहकारी सोसाइटी नहीं है) विघटन पर पूंजी आस्तियों के वितरण के रूप में या अन्यथा किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत लाभ या अभिलाभ उस फर्म, संगम या निकाय की ऐसी पूर्ववर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होंगे जिसमें उक्त अंतरण किया जाता है और धारा 48 के प्रयोजनों के लिए, ऐसे अंतरण की तारीख को आस्ति का उचित बाजार मूल्य, अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या प्रोद्भूत प्रतिफल का पूरा मूल्य समझा जाएगा।]

97[(5) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां पूंजी अभिलाभ किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से, जो किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में अंतरण है, या ऐसे किसी अंतरण से उद्भूत होता है जिसका प्रतिफल केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अवधारित या अनुमोदित किया गया था और ऐसे अंतरण के लिए प्रतिकर या प्रतिफल में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा वृद्धि या पुन: वृद्धि की जाती है वहां पूंजी अभिलाभ के संबंध में कार्रवार्इ निम्नलिखित रीति से की जाएगी, अर्थात्:–

() यथास्थिति प्रथम बार में अधिनिर्णित प्रतिकर अथवा केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रथम बार में अवधारित या अनुमोदित प्रतिफल के प्रति निर्देश से संगणित पूंजी अभिलाभ 98[उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसा प्रतिकर या उसका भाग अथवा ऐसा प्रतिफल या उसका भाग, प्रथम बार प्राप्त किया गया है, ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन आय] के रूप में प्रभार्य होगा; और

() उतनी रकम जितनी प्रतिकर या प्रतिफल में, उस न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा वृद्धि या पुन:वृद्धि की जाती है, वह रकम उस पूर्ववर्ष जिसमें ऐसी रकम निर्धारिती को प्राप्त होती है, ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझी जाएगी :

वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2014 द्वारा 1.4.2015 से धारा 45 की उपधारा (5) के खंड (ख) के पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक अंत:स्थापित किया जाएगा :

परंतु किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के किसी अंतरिम आदेश के अनुसरण में प्राप्त प्रतिकर की किसी रकम को उस पूर्ववर्ष की, जिसमंस ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी का अंतिम आदेश किया जाता है, "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय समझा जाएगा;

99[() जहां किसी वर्ष से संबंधित निर्धारण में, किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ, यथास्थिति, खंड () में निर्दिष्ट प्रतिकर या प्रतिफल अथवा खंड () में निर्दिष्ट वर्धित प्रतिकर या प्रतिफल को हिसाब में लेकर संगणित किया जाता है और तत्पश्चात् ऐसे प्रतिकर या प्रतिफल में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कमी कर दी जाती है, वहां उस वर्ष के इस प्रकार निर्धारित पूंजी अभिलाभ की ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कम किए गए प्रतिकर या प्रतिफल को हिसाब में लेकर पुन: संगणना की जाएगी, जो प्रतिफल का पूरा मूल्य होगी।]

स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए–

(i) खंड () में निर्दिष्ट रकम के संबंध में अर्जन की लागत और सुधार की लागत शून्य मानी जाएगी;

(ii) इस उपधारा के उपबंध उस दशा में भी लागू होंगे जहां अंतरण 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व किया गया है;

(iii) जहां उस व्यक्ति की जिसने अंतरण किया था, मृत्यु के कारण या किसी अन्य कारण से, वर्धित प्रतिकर या प्रतिफल किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है, वहां खंड () में निर्दिष्ट रकम ऐसे अन्य व्यक्ति की ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य आय समझी जाएगी।]

1[(6) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 80गगख को उपधारा (2) में निर्दिष्ट यूनिटों की पुन: क्रय कीमत और ऐसे यूनिटों के पूंजी मूल्य के बीच अंतर को निर्धारिती को उस पूर्ववर्ष में उद्भूत पूंजी अभिलाभ समझा जाएगा जिसमें ऐसा पुन: क्रय किया जाता है या उस धारा में निर्दिष्ट योजना समाप्त होती है और तदनुसार उस पर कर लगाया जाएगा।

स्पष्टीकरण .– इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ‘‘ऐसे यूनिटों के पूंजी मूल्य’’ से निर्धारिती द्वारा धारा 80गगख की उपधारा (2) में निर्दिष्ट यूनिटों में विनिधान की गर्इ कोर्इ रकम अभिप्रेत है।]

 

79. 1965 का परिपत्र सं. 23घ (XXIII-6) और परिपत्र सं. 768, तारीख 24.6.1998 भी देखिए।

सुसंगत केस लाज़ देखिए

80. वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित। वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से उपधारा (2) से (4) के लोप के साथ ‘‘(1)’’ का लोप किया गया समझा गया और कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से उपधारा (2) के अंत:स्थापन के साथ ही अंत:स्थापित किया गया समझा गया।

81. ‘‘अंतरण’’, "पूंजी आस्ति" और "किए गए" पदों के अर्थ के लिए सम्बंधित केस लाज़ देखिए

82. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से ‘‘53’’ अंक का लोप किया गया।

83. वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1970 से ‘‘53 और 54’’ के स्थान पर ‘‘53, 54 और 54ख’’; वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से ‘‘53, 54 और 54ख’’ के स्थान पर ‘‘53, 54, 54ख और 54ग’’; वित्त अधिनियम, 1973 द्वारा 1.4.1974 से ‘‘53, 54, 54ख और 54ग’’ के स्थान पर ‘‘53, 54, 54ख, 54ग और 54घ’’ प्रतिस्थापित किया गया।

84. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से ‘‘54ग’’ का लोप किया गया।

85. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से ‘‘और 54घ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।

86. वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से ‘‘54घ और 54ड़’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।

87. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ‘‘54ड़ और 54च’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।

88. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.10.1996 से अंत:स्थापित।

89. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1991 से ‘‘और 54छ’’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।

90. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।

91. बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2(9) में ‘‘बीमाकर्ता’’ की परिभाषा के लिए देखिए परिशिष्ट।

92. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित। वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से मूल उपधारा (2) अंत:स्थापित की गर्इ थी और बाद में वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से उसका लोप किया गया था।

93. निक्षेपागार अधिनियम, 1996 द्वारा 20.9.1995 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

94. ‘‘अंतरण की तारीख और अभौतिक रूप में धारित प्रतिभूति धारण की अवधि की अवधारण’’ के लिए परिपत्र सं. 768, तारीख 24.6.1998 देखिए.

95. निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2(1) के खंड (), () और () में क्रमश: ‘‘फायदाप्रद स्वामी’’, ‘‘निक्षेपकर्ता’’ और ‘‘प्रतिभूति’’ की परिभाषा के लिए देखिए परिशिष्ट

96. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित। मूल उपधारा (3) और (4), वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित की गर्इ थीं और बाद में वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से उनका लोप किया गया था।

97. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

98. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1988 से भूतलक्षी प्रभाव से ‘उस पूर्ववर्ष के जिसमें अंतरण हुआ है ‘‘पूंजी अभिलाभ’’ शीर्ष के अधीन आय’ के स्थान पर प्रतिस्थापित।

99. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से अंत:स्थापित।

1. वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1991 से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2014 द्वारा संशोधित रूप में]

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