उपधारणात्मक आधार पर कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
34[उपधारणात्मक आधार पर कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध
44कघ. (1) धारा 28 से धारा 43ग में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, ऐसे किसी पात्र निर्धारिती की दशा में जो किसी कारबार में लगा हुआ है, निर्धारिती के, यथास्थिति, ऐसे कारबार मद्दे पूर्ववर्ष में कुल आवर्त या सकल प्राप्तियों के आठ प्रतिशत के बराबर राशि को अथवा पूर्वोक्त राशि से उच्चतर राशि को, जिसका पात्र निर्धारिती द्वारा अर्जित किए जाने का दावा किया गया है, "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य ऐसे कारबार के लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा।
34क[परंतु यह उपधारा इस प्रकार प्रभावी होगी मानो कुल आवर्त या सकल प्राप्तियों की उस रकम की बाबत जिसे किसी पूर्ववर्ष के दौरान या धारा 139 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट नियत तारीख से पूर्व उस पूर्ववर्ष के संबंध में पाने वाले के खाते में देय किसी चेक या खाते में देय बैंक ड्राफ्ट या किसी बैंक खाते के माध्यम से इलैक्ट्रानिक प्रणाली का उपयोग करके प्राप्त किया गया है वहां "आठ प्रतिशत" शब्दों के स्थान पर, "छह प्रतिशत" शब्द रखे गए हों।]
(2) धारा 30 से धारा 38 के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय किसी कटौती के बारे में, उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, यह समझा जाएगा कि उसे पहले ही पूर्ण प्रभाव दे दिया गया है और उन धाराओं के अधीन कोर्इ और कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी:
35[***]
(3) किसी पात्र कारबार की किसी आस्ति का अवलिखित मूल्य ऐसे संगणित किया गया समझा जाएगा मानो पात्र निर्धारिती ने सुसंगत निर्धारण वर्षों में से प्रत्येक वर्ष के लिए अवक्षयण की बाबत कटौती का दावा किया हो और उसे यह वास्तव में अनुज्ञात की गर्इ हो।
35क[(4) जहां कोर्इ पात्र निर्धारिती, इस धारा के उपबंधों के अनुसरण में किसी पूर्ववर्ष के लिए लाभ की घोषणा करता है और वह ऐसे पूर्ववर्ष के उत्तरवर्ती पूर्ववर्ष के सुसंगत पांच निर्धारण वर्षों में से किसी के लिए लाभ की घोषणा करता है, जो उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार नहीं है वह ऐसे पूर्ववर्ष के सुसंगत निर्धारण वर्ष के पश्चात्वर्ती पांच निर्धारण वर्षों के लिए इस धारा के उपबंधों के फायदों का दावा करने का पात्र नहीं होगा जिसमें लाभ की घोषणा उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार नहीं की गर्इ थी ।
(5) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी ऐसा कोर्इ पात्र निर्धारिती से, जिसे उपधारा (4) के उपबंध लागू होते हैं और जिसकी कुल आय ऐसी अधिकतम रकम से अधिक है जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है, धारा 44कक की उपधारा (2) की अपेक्षानुसार लेखा पुस्तकें और अन्य दस्तावेज का रखा जाना और बनाए रखना अपेक्षित होगा और वह उनकी लेखा परीक्षा कराएगा तथा धारा 44कख की अपेक्षानुसार ऐसी लेखा परीक्षा की रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।]
36[(6) इस धारा के उपबंध, पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी,–
(i) धारा 44कक की उपधारा (1) में यथानिर्दिष्ट वृत्ति करने वाले किसी व्यक्ति;
(ii) कमीशन या दलाली की प्रकृति की आय अर्जित करने वाले किसी व्यक्ति; या
(iii) किसी अभिकरण कारबार को करने वाले किसी व्यक्ति,
को लागू नहीं होंगे।]
स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,–
(क) "पात्र निर्धारिती" से,–
(i) कोर्इ व्यष्टि, हिन्दू अविभक्त कुटुंब या भागीदारी फर्म अभिप्रेत है जो निवासी है किंतु सीमित दायित्व भागीदारी अधिनियम, 2008 (2009 का 6) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ढ) के अधीन यथा परिभाषित सीमित दायित्व वाली भागीदारी फर्म नहीं है; और
(ii) जिसने सुसंगत निर्धारण वर्ष में धारा 10क, धारा 10कक, धारा 10ख, धारा 10खक में से किसी के अधीन कटौती का या अध्याय 6क के किन्हीं उपबंधों के अधीन "ग-कतिपय आयों के संबंध में कटौतियां" शीर्ष के अधीन कटौती का दावा नहीं किया है;
(ख) "पात्र कारबार" से,–
(i) धारा 44कड़ में निर्दिष्ट माल वाहनों को चलाने, भाड़े पर या पट्टे पर देने के कारबार के सिवाय कोर्इ कारबार अभिप्रेत है; और
(ii) ऐसा कारबार अभिप्रेत है जिसका पूर्ववर्ष में कुल आवर्त या सकल प्राप्तियां 37[38[दो करोड़ रुपए]] की रकम से अधिक नहीं है।]
34. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.4.2011 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व धारा 44कघ, वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1994 से अंत:स्थापित और बाद में वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.1994/ 1.4.1997 से, वित्त अधिनियम, 1998 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.1997 से और वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.1998 से संशोधित धारा 44कघ निम्न प्रकार थी :
'44कघ. सिविल सन्निर्माण आदि के कारबार के लाभ और अभिलाभ की संगणना करने के लिए विशेष उपबंध–(1) धारा 28 से धारा 43ग में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, किसी निर्धारिती की दशा में, जो सिविल सन्निर्माण या सिविल सन्निर्माण के लिए श्रम का प्रदाय करने के कारबार में लगा हुआ है, यथास्थिति, निर्धारिती को ऐसे कारबार मद्दे पूर्ववर्ष में संदत्त या संदेय सकल प्राप्तियों के आठ प्रतिशत के बराबर राशि या निर्धारिती द्वारा अपनी आय की विवरणी में घोषित पूर्वोक्त राशि से उच्चतर राशि ऐसे कारबार के ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य लाभ और अभिलाभ समझी जाएगी :
परन्तु इस उपधारा की कोर्इ बात चालीस लाख की रकम से अधिक संदत्त या संदेय पूर्वोक्त सकल प्राप्तियों की दशा में लागू नहीं होगी।
(2) धारा 30 से धारा 38 के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय किसी कटौती के बारे में, उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, यह समझा जाएगा कि उसे पहले ही पूर्ण प्रभाव दे दिया गया है और उन धाराओं के अधीन कोर्इ और कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी :
परन्तु जहां निर्धारिती फर्म है वहां उसके भागीदारों को संदत्त वेतन और ब्याज की धारा 40 के खंड (ख)में विनिर्दिष्ट शर्तों और सीमाओं के अधीन रहते हुए उपधारा (1) के अधीन संगणित आय में से कटौती की जाएगी।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट कारबार के प्रयोजन के लिए उपयोग में लार्इ गर्इ किसी आस्ति का अवलिखित मूल्य, ऐसे परिकलित किया गया समझा जाएगा मानो सुसंगत निर्धारण वर्षों में से प्रत्येक के लिए अवक्षयण की बाबत निर्धारिती ने कटौती के लिए दावा किया हो और उसे यह वास्तव में अनुज्ञात की गर्इ हो।
(4)धारा 44कक और धारा 44कख के उपबंध वहां तक लागू नहीं होंगे जहां तक कि वे उपधारा (1) में निर्दिष्ट कारबार से संबंधित हैं, और उन धाराओं के अधीन धनीय सीमाओं की संगणना करने में, उक्त कारबार से, यथास्थिति, सकल प्राप्तियों या आय को अपवर्जित कर दिया जाएगा।
(5) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों की कोर्इ बात, वहां लागू नहीं होगी जहां निर्धारिती दावा करता है और यह साबित करने के लिए साक्ष्य पेश करता है कि 1 अप्रैल, 1997 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान पूर्वोक्त कारबार के लाभ और अभिलाभ, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट लाभ और अभिलाभ से कम हैं और निर्धारण अधिकारी निर्धारिती की कुल आय या हानि का निर्धारण करने के लिए अग्रसर होगा और धारा 143 की उपधारा (3) के अधीन किए गए निर्धारण के आधार पर निर्धारिती द्वारा संदेय राशि का अवधारण करेगा।
(6)इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, निर्धारिती उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट लाभ और अभिलाभ से कम लाभ और अभिलाभ का दावा कर सकता है यदि वह धारा 44कक की उपधारा (2) के अधीन अपेक्षित लेखा पुस्तकें और अन्य दस्तावेज रखता है और धारा 44कख की अपेक्षानुसार अपने लेखाओं की संपरीक्षा करवाता है और ऐसी संपरीक्षा की रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए "सिविल सन्निर्माण" के अंतर्गत–
(क) किसी भवन, बांध या अन्य संरचना अथवा किसी नहर या सड़क का सन्निर्माण या मरम्मत;
(ख) किसी संकर्म संविदा का निष्पादन,
भी है।'
34क. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2017 से अंतस्थापित।
35. वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा 1.4.2017 से परन्तुक का लोप किया गया/लोप किये जाने से पूर्व उपधारा (2) का परन्तुक इस प्रकार था:
"परंतु जहां पात्र निर्धारिती कोर्इ फर्म है, वहां उसके भागीदारों को संदत्त वेतन और ब्याज की, धारा 40 के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट शर्तों और सीमाओं के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) के अधीन संगणित आय में से कटौती की जाएगी।"
35क. वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा 1.4.2017 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व उपधारा (4) और (5) निम्न प्रकार थी:
"(4) अध्याय 17ग के उपबंध, जहां तक वे पात्र कारबार से संबंधित हैं, किसी पात्र निर्धारिती को लागू नहीं होंगे।
(5) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे पात्र निर्धारिती से, जो यह दावा करता है कि पात्र कारबार से उसके लाभ और अभिलाभ उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट लाभों और अभिलाभों से कम हैं और जिसकी कुल आय उस अधिकतम रकम से अधिक हो जाती है जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है, यह अपेक्षित होगा कि वह ऐसी लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों को अपने पास रखें और बनाए रखें जो धारा 44कक की उपधारा (2) में अपेक्षित हैं और धारा 44कख की अपेक्षानुसार उनकी संपरीक्षा कराए तथा ऐसी संपरीक्षा की रिपोर्ट दे।"
36. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.2011 से अंत:स्थापित।
37. वित्त अधिनियम, 2012 द्वारा 1.4.2013 से "साठ लाख रुपए" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व "साठ लाख रुपए" शब्द वित्त अधिनियम, 2010 द्वारा 1.4.2011से "चालीस लाख रुपए" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे।
38. वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा 1.4.2017 से प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा संशोधित रूप में]

