कर के दायरे में मुनाफा
कर से प्रभार्य लाभ
41. 40[41(1) जहां निर्धारिती द्वारा (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्रथम वर्णित व्यक्ति कहा गया है) उठार्इ गर्इ हानि, उपगत किसी व्यय अथवा व्यापार संबंधी दायित्व की बाबत किसी वर्ष के लिए निर्धारण में मोक दिया गया है या कटौती की गर्इ है और तत्पश्चात् किसी पूर्ववर्ष के दौरान,—
(क) प्रथम वर्णित व्यक्ति ने ऐसी हानि या व्यय की बाबत कोर्इ रकम या ऐसे व्यापार संबंधी दायित्व की बाबत कोर्इ फायदा, उसके परिहार अथवा समाप्ति के तौर पर चाहे नकदी में अथवा किसी भी अन्य रीति से, अभिप्राप्त42 किया है वहां ऐसे व्यक्ति द्वारा अभिप्राप्त रकम या उसको होने वाले फायदे के मूल्य को कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा और तदनुसार उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा, चाहे वह कारबार या वृत्ति, जिसके बारे में मोक दिया गया है या कटौती की गर्इ है, उस वर्ष में अस्तित्व में हो या नहीं; या
(ख) कारबार में उत्तरवर्ती ने प्रथम वर्णित व्यक्ति द्वारा उठार्इ गर्इ हानि या उपगत किए गए व्यय की बाबत कोर्इ रकम या खंड (क) में निर्दिष्ट व्यापार संबंधी दायित्व की बाबत कोर्इ फायदा, उसके परिहार अथवा समाप्ति के तौर पर, चाहे नकदी में अथवा किसी भी अन्य रीति से, अभिप्राप्त42 किया है वहां कारबार में उत्तरवर्ती द्वारा अभिप्राप्त रकम या कारबार में उत्तरवर्ती को होने वाले फायदे के मूल्य को कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा और तदनुसार उस पूर्ववर्ष की आय के रूप में आय-कर के प्रभार्य होगा।
43[स्पष्टीकरण 1.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए ''परिहार या समाप्ति के रूप में किसी ऐसे व्यापार दायित्व के संबंध में हानि या व्यय या कोर्इ फायदा'' पद के अंतर्गत खंड (क) के अधीन प्रथम वर्णित व्यक्ति या अपने लेखाओं में ऐसे दायित्व को अपलिखित करके उस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कारबार में उत्तरवर्ती द्वारा एकपक्षीय कार्य द्वारा किसी दायित्व का परिहार या समाप्ति भी है।]
44[स्पष्टीकरण 2].–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ''कारबार में उत्तरवर्ती'' से अभिप्रेत है,—
(i) जहां कंपनी का किसी अन्य कंपनी के साथ समामेलन हो जाता है वहां वह समामेलित कंपनी;
(ii) जहां कोर्इ अन्य व्यक्ति, उस कारबार या वृत्ति में प्रथम वर्णित व्यक्ति का उत्तरवर्ती हो जाता है वहां वह अन्य व्यक्ति;
(iii) जहां कोर्इ अन्य फर्म, कारबार या वृत्ति चलाने वाली फर्म की उत्तरवर्ती हो जाती है वहां वह अन्य फर्म;]
45[(iv) जहां अविलयन हुआ है, वहां परिणामी कंपनी।]
46[(2) जहां कोर्इ भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर–
(क) जिसका स्वामी निर्धारिती है;
(ख) जिसकी बाबत अवक्षयण का दावा धारा 32 या उपधारा (1) के खंड (i) के अधीन किया जाता है; और
(ग) जिसका उपयोग कारबार के प्रयोजनों के लिए किया गया था या किया गया है,
बेचा47 जाए, तिरस्कृत किया जाए, तोड़ा या नष्ट किया जाए47 और, यथास्थिति, ऐसे भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर, की बाबत संदेय धन47 और टूट-फूट के मूल्य की राशि, यदि कोर्इ है, अवलिखित मूल्य से अधिक है तो उतनी अधिक राशि, जितनी वास्तविक लागत और अवलिखित मूल्य के अंतर से अधिक नहीं है, उस पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर के लिए देय48 धनराशि देय हो जाए, कारबार की आय आय के रूप में आयकर से प्रभार्य होगी।]
स्पष्टीकरण.–जहां इस उपधारा में निर्दिष्ट भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर की बाबत संदेय धनराशि उस पूर्ववर्ष में देय हो जाती है जिसमें वह कारबार जिसके प्रयोजनार्थ वह भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर इस्तेमाल किया जा रहा था, अब अस्तित्व में नहीं रहा, वहां इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो वह कारबार पूर्ववर्ष में अस्तित्व में रहा हो।]
(2क) 49[* * *]
(3) जहां कोर्इ आस्ति, जो धारा 43 के खण्ड (4) के साथ पठित धारा 35 की उपधारा (1) के खण्ड (iv) 50[या उपधारा (2ख) के खण्ड (ग)] के अर्थ में वैज्ञानिक अनुसंधान पर पूंजीगत प्रकार के व्यय के रूप में है, अन्य प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाए बिना विक्रीत की गर्इ है और विक्रय के आगम धारा 35 की उपधारा (2) के, 51[यथास्थिति,] खण्ड (i) के अधीन की गर्इ कटौतियों की कुल रकम 51[या खण्ड (iक) के अधीन कटौती की रकम] 52[या उपधारा (2ख) के खण्ड (ग)] के अधीन कटौती की रकम के सहित, पूंजीगत व्यय की रकम से अधिक है, वहां ऐसे आधिक्य या इस प्रकार की गर्इ कटौतियों की रकम में से, जो भी कम हो, उस पूर्ववर्ष की जिसमें वह विक्रय हुआ था, कारबार या वृत्ति की आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगी।
स्पष्टीकरण.—जहां इस उपधारा में निर्दिष्ट किसी आस्ति की बाबत संदेय धन ऐसे पूर्ववर्ष में देय हो जाए, जिसमें कारबार विद्यमान नहीं रहा है वहां इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो वह कारबार के पूर्ववर्ष में विद्यमान रहा है।
53(4) जहां किसी डूबंत ऋण के भाग की बाबत कटौती धारा 36 की उपधारा (1) के खण्ड (vii) के उपबंधों के अधीन अनुज्ञात की गर्इ है, वहां यदि किसी ऋण या उसके भाग पर तत्पश्चात् वसूल हुर्इ रकम, उस ऋण या ऋण के भाग और इस प्रकार अनुज्ञात रकम के अंतर से अधिक है, तो ऐसा आधिक्य कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा और तदनुसार उस पूर्ववर्ष की, जिसमें वह रकम वसूल होती है, आय के रूप में आय-कर से प्रभार्य होगा, चाहे वह कारबार या वृत्ति जिसकी बाबत कटौती की गर्इ है, उस वर्ष में अस्तित्व में हो या न हो।
54[स्पष्टीकरण.–उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिये,—
(1) किसी भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर के संबंध में, ''संदेय धन'' के अन्तर्गत—
(क) उसकी बाबत संदेय बीमा, साल्वेज या प्रतिकर धन है;
(ख) जहां भवन, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर बेचा जाता है वहां वह कीमत जिस पर उसे बेचा जाता है;
किन्तु जहां किसी मोटरकार की वास्तविक लागत, धारा 43 के खंड (1) के परन्तुक के अनुसार, पच्चीस हजार रुपए मानी जाती है वहां ऐसी मोटरकार की बाबत संदेय धन वह राशि मानी जाएगी जिसका अनुपात यथास्थिति, उस रकम के साथ जितने में मोटरकार बेची जाती है या उसकी बाबत संदेय किसी बीमा, साल्वेज या प्रतिकर धन की राशि के साथ (जिसके अन्तर्गत स्क्रैप मूल्य, यदि कोर्इ हो, भी है) वही माना जाएगा जो पच्चीस हजार रुपए की रकम का मोटरकार पर निर्धारिती की उस वास्तविक लागत के साथ है जो उक्त परन्तुक को लागू करने के पूर्व संगणित की गर्इ होती;
(2) ''विक्रीत'' के अंतर्गत विनिमय के रूप में अंतरण या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन भी है किंतु इसके अंतर्गत समामेलन की किसी स्कीम में, समामेलक कंपनी द्वारा समामेलित कंपनी को, जहां समामेलित कंपनी भारतीय कंपनी है, किसी आस्ति का अंतरण नहीं है।]
55[(4क) जहां धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viii) के अधीन सृजित और रखी गर्इ किसी विशेष आरक्षिती की बाबत कटौती अनुज्ञात की गर्इ है वहां बाद में ऐसी विशेष आरक्षिती में से निकाली गर्इ कोर्इ रकम कारबार या वृत्ति का लाभ और अभिलाभ समझी जाएगी और तदनुसार उस पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसी रकम निकाली जाती है, आय के रूप में प्रभार्य होगी।
स्पष्टीकरण.–जहां कोर्इ रकम उस पूर्ववर्ष में विशेष रिजर्व में से निकाली जाती है जिसमें कारबार अब अस्तित्व में नहीं रहा है वहां इस उपधारा के उपबंध वैसे ही लागू होंगे मानो उस पूर्ववर्ष में कारबार अस्तित्व में रहा हो।]
(5) जहां इस धारा में निर्दिष्ट कारबार या वृत्ति अस्तित्व में न रहा है और उस कारबार या वृत्ति की बाबत आय, उपधारा (1) 56[* * *], उपधारा (3) 57[, उपधारा (4) या उपधारा (4क)] के अधीन कर से प्रभार्य हो वहां ऐसी कोर्इ हानि, जो सट्टा कारबार में 58[* * *] उठार्इ गर्इ हानि नहीं है जो उस कारबार या वृत्ति में उस पूर्ववर्ष में उद्भूत हुर्इ हो जिसमें वह अस्तित्व में नहीं रहा और जिसका उस पूर्ववर्ष की किसी अन्य आय के प्रति मुजरा नहीं किया जा सका था, जहां तक हो सके पूर्वोक्त उपधाराओं के अधीन कर से प्रभार्य आय से मुजरा की जाएगी।
59[(6) उपधारा (3) में, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के प्रति, जिसका प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा संशोधन किया गया है, या लोप किया गया है; निर्देशों का, ऐसे संशोधन या लोप के होते हुए भी, उस उपधारा के प्रयोजनों के लिए यह अर्थ लगाया जाएगा मानो ऐसा संशोधन या लोप नहीं किया गया हो।]
40. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित।
41. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
42. ''अभिप्राप्त'' पद के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.
43. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से अंत:स्थापित।
44. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 2 के रूप में पुनर्संख्यांकित किया गया।
45. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से अंत:स्थापित।
46. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1998 से अंत:स्थापित। इससे पहले मूल उपधारा (2) को वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से संशोधित किया गया था और कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1988 से उसका लोप किया गया।
47. ''बेचा'', ''तोड़ा या नष्ट किया जाए'' और ''संदेय धन'' पदों के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
48. 'देय' पद के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
49. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1988 से लोप किया गया। मूल उपधारा (2क) कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित की गयी थी।
50. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित।
51. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से अंत:स्थापित।
52. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित।
53. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
54. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1988 से प्रतिस्थापित।
55. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से अंत:स्थापित।
56. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1988 से ''उपधारा (2), उपधारा (2क)'' शब्दों का लोप किया गया। इटैलिक शब्द कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित किए गए थे।
57. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से ''या उपधारा (4)'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
58. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से 'या ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अंतर्गत' शब्दों का लोप किया गया।
59. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

