आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 40

कटौती न करने योग्य रकमें

धारा

धारा संख्या

40

अध्याय शीर्षक

अध्याय IV - कुल आय की गणना

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2009

कटौती न करने योग्य रकमें

कटौती न करने योग्य रकमें

कटौती न करने योग्य रकमें

40. धारा 30 से 34[धारा 38] तक में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, "कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना करने में, निम्नलिखित रकमों की कटौती नहीं की जाएगी,–

35() किसी निर्धारिती की दशा में–

36[(i) इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य कोर्इ ब्याज (जो 1 अपै्रल, 1938 के पूर्व लोक अभिदाय के लिए जारी किसी ऋण पर ब्याज नहीं है), स्वामिस्व, तकनीकी सेवाओं के लिए फीस या अन्य राशि, जो–

() भारत के बाहर; या

() भारत में किसी अनिवासी को, जो कंपनी नहीं है, या किसी विदेशी कंपनी को,

संदेय है, जिस पर कि अध्याय 17ख के अधीन कर स्रोत पर काटे जाने योग्य है और ऐसे कर की कटौती नहीं की गर्इ है या कटौती करने के पश्चात् उसका पूर्ववर्ष के दौरान या धारा 200 की उपधारा (1) के अंतर्गत विहित समय की समाप्ति से पहले पश्चात्वर्ती वर्ष में संदाय नहीं किया गया है :

परन्तु जहां ऐसी किसी राशि की बाबत कर की कटौती धारा 200 की उपधारा (1) के अधीन विहित समय की समाप्ति के पश्चात् किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में की गर्इ है या कटौती पूर्ववर्ष में की गर्इ है किन्तु उसका संदाय किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में किया गया है वहां ऐसी राशि की, उस पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में, जिसमें ऐसे कर का संदाय किया गया है, कटौती अनुज्ञात की जाएगी।

स्पष्टीकरण.--इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए--

() "स्वामिस्व" का वही अर्थ है, जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण 2 में है;

() "तकनीकी सेवाओं के लिए फीस" का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vii) के स्पष्टीकरण 2 में है;

(iक) किसी निवासी को संदेय कोर्इ ब्याज, कमीशन या दलाली, 37[किराया, स्वामिस्व,] वृत्तिक सेवाओं के लिए फीस या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस या किसी काम को करने के लिए (जिसके अंतर्गत किसी काम को करने के लिए श्रम की आपूर्ति भी है) किसी ठेकेदार या उपठेकेदार को, जो निवासी है, संदेय राशि, जिस पर अध्याय 17ख के अधीन स्रोत पर कर काटे जाने योग्य है और ऐसे कर की कटौती नहीं की गर्इ है अथवा 37क[कटौती के पश्चात्–

() उस दशा में संदाय नहीं किया गया है, जहां कर कटौती योग्य था और उसकी पूर्ववर्ष के अंतिम मास के दौरान धारा 139 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट देय तारीख को या उसके पूर्व इस प्रकार कटौती की गर्इ थी; या

() किसी अन्य दशा में, पूर्ववर्ष के अंतिम दिन को या उसके पूर्व संदाय नहीं किया गया है :]

37ख[परन्तु यह कि जहां किसी राशि के संबंध में कर की कटौती किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में की गर्इ है या उसकी कटौती–

() पूर्ववर्ष के अंतिम मास के दौरान की गर्इ है किंतु उसका संदाय उक्त देय तारीख के पश्चात् किया गया है ; या

() पूर्ववर्ष के किसी अन्य मास के दौरान की गर्इ है किन्तु उसका संदाय उक्त पूर्ववर्ष की समाप्ति के पश्चात् किया गया है,

वहां ऐसी राशि उस पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसे कर का संदाय किया गया है, आय की संगणना करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात की जाएगी।]

स्पष्टीकरण--इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए,--

(i) "कमीशन या दलाली" का वही अर्थ है जो धारा 194ज के स्पष्टीकरण के खंड (i) में उसका है;

(ii) "तकनीकी सेवाओं के लिए फीस" का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vii) के स्पष्टीकरण 2 में उसका है;

(iii) "वृत्तिक सेवा" का वही अर्थ है जो धारा 194ञ के स्पष्टीकरण के खंड (क) में उसका है;

(iv) "काम" का वही अर्थ है जो धारा 194ग के स्पष्टीकरण 3 में उसका है;

38[(v) "किराया" का वही अर्थ होगा जो धारा 194झ के स्पष्टीकरण के खंड (i) में है;

(vi) "स्वामिस्व" का वही अर्थ होगा जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण 2 में है;]

(iख) 38क[* * *]]

39[(iग) अध्याय 12ज के अधीन अनुषंगी फायदा कर के मद्धे संदत्त कोर्इ राशि;]

40(ii) किसी कारबार या वृत्ति के लाभों या अभिलाभों41 पर उद्गृहीत कोर्इ रेट या कर41 अथवा किन्हीं ऐसे लाभों या अभिलाभों के अनुपात पर या अन्यथा उनके आधार पर निर्धारित किसी रेट या कर की बाबत दी गर्इ कोर्इ राशि।

42[स्पष्टीकरण 1.–शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए उद्गृहीत किसी रेट या कर के मद्दे संदत्त किसी राशि में, यथास्थिति, धारा 90 के अधीन कर की राहत या धारा 91 के अधीन संदेय भारतीय आय-कर से कटौती के लिए पात्र कोर्इ रकम सम्मिलित है और वह सदैव से उसमें सम्मिलित की गर्इ समझी जाएगी।]

43[स्पष्टीकरण 2.–शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए उद्गृहीत किसी रेट या कर के मद्दे संदत्त किसी राशि में धारा 90क के अधीन कर की राहत के लिए कोर्इ राशि सम्मिलित है;]

44[45(iiक) धन-कर की बाबत दी गर्इ कोर्इ राशि।

स्पष्टीकरण.–इस उपखण्ड के प्रयोजनों के लिए 'धन-कर' से अभिप्रेत है, धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27) के अधीन प्रभार्य धन-कर या भारत के बाहर किसी देश में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्रभार्य वैसा ही कोर्इ कर या निर्धारिती द्वारा चलाए गए कारबार या वृत्ति की आस्तियों के मूल्य या उसमें लगायी गयी पूंजी के प्रति निर्देश से ऐसी विधि के अधीन प्रभार्य कोर्इ कर, चाहे उस रकम की संगणना में, जिसके प्रति निर्देश से ऐसा कर प्रभारित किया गया है, कारबार या वृत्ति के ऋण कटौती के रूप में अनुज्ञात किए जाते हों या नहीं, किंतु कारबार या वृत्ति की किसी विशिष्ट आस्ति के मूल्य के प्रति निर्देश से प्रभार्य कर इसके अंतर्गत नहीं है;]

46[(iii) कोर्इ ऐसा संदाय, जो "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है, यदि यह,–

() भारत के बाहर; या

() किसी अनिवासी को,

संदेय है और यदि अध्याय 17ख के अधीन उस पर न तो कर का संदाय किया गया है, न ही उसकी उससे कटौती की गर्इ है;]

(iv) कोर्इ ऐसा संदाय, जो निर्धारिती के कर्मचारियों के फायदे के लिए स्थापित भविष्य निधि या अन्य निधि में किया गया हो, उस दशा के सिवाय जबकि निर्धारिती ने यह सुनिश्चित करने के लिए कारगर इन्तजाम कर लिए हैं कि उस निधि में से किए गए किन्हीं ऐसे संदायों में से जो "वेतन" शीर्ष के अधीन कर से प्रभार्य है, कर स्रोत पर ही काट लिया जाएगा;

47[(v) धारा 10 के खंड (10गग) में निर्दिष्ट किसी नियोजक द्वारा वास्तव में संदत्त कोर्इ कर;]

48[() किसी ऐसी फर्म की दशा में, जो फर्म के रूप में निर्धारणीय है,—

(i) किसी ऐसे भागीदार को, जो कार्यकारी भागीदार नहीं है, वेतन, बोनस, कमीशन या पारिश्रमिक का, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो (जिसे इसमें इसके पश्चात् "पारिश्रमिक" कहा गया है) कोर्इ भुगतान; या

(ii) किसी ऐसे भागीदार को, जो कार्यकारी भागीदार है, पारिश्रमिक का, या किसी भागीदार को ब्याज का, कोर्इ संदाय जो, दोनों में से प्रत्येक दशा में, भागीदारी विलेख की शर्तों द्वारा प्राधिकृत नहीं है या उनके अनुसार नहीं है; या

(iii) किसी ऐसे भागीदार को, जो कार्यकारी भागीदार है, पारिश्रमिक का, या किसी भागीदार को ब्याज का, कोर्इ संदाय जो, दोनों में से प्रत्येक दशा में, भागीदारी विलेख के निबंधनों द्वारा प्राधिकृत है और उनके अनुसार है, किंतु जो (ऐसे भागीदारी विलेख की तारीख के पूर्व आने वाली) किसी ऐसी अवधि से संबंधित है जिसके लिए ऐसा संदाय किसी पूर्वतर भागीदारी विलेख द्वारा प्राधिकृत नहीं था या उसके अनुसार नहीं है, अत: फिर भी किसी पूर्वतर भागीदारी विलेख द्वारा ऐसे संदाय के लिए प्राधिकार की अवधि के अंतर्गत ऐसे पूर्वतर भागीदारी विलेख की तारीख के पूर्व की कोर्इ अवधि नहीं आती है; या

(iv) किसी भागीदार को ब्याज का कोर्इ संदाय जो भागीदारी विलेख के निबंधनों द्वारा प्राधिकृत है और उसके अनुसार है तथा जो ऐसे भागीदारी विलेख की तारीख के पश्चात् आने वाली किसी अवधि से संबंधित है, जहां तक कि ऐसी रकम 49[बारह] प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से परिकलित साधारण ब्याज की रकम से अधिक है; या

50(v) किसी ऐसे भागीदार को जो कार्यकारी भागीदार है, पारिश्रमिक का कोर्इ संदाय जो भागीदारी विलेख के निबंधनों द्वारा प्राधिकृत है और उनके अनुसार है तथा जो ऐसे भागीदारी विलेख की तारीख के पश्चात् आने वाली किसी अवधि से संबंधित है, जहां तक कि पूर्ववर्ष के दौरान सभी भागीदारों को किए गए ऐसे संदाय की रकम ऐसी कुल रकम से अधिक है जो निम्नलिखित रूप में संगणित की जाए :—

(1) ऐसी फर्म की दशा में, जो धारा 44कक में निर्दिष्ट वृत्ति चलाती है या जो उस धारा के प्रयोजन के लिए अधिसूचित की जाती है,–

  () बही लाभ के प्रथम 1,00,000 रु. पर या किसी हानि की दशा में   50,000 रु. या बही लाभ  के 90 प्रतिशत की दर से, इनमें से जो भी अधिक हो;
  () बही लाभ के अगले 1,00,000 रु. पर   60 प्रतिशत की दर से; े;
  () बही लाभ के अतिशेष पर   40 प्रतिशत की दर से;

(2) किसी अन्य फर्म की दशा में,–

  () बही लाभ के प्रथम 75,000 रु.   50,000 रु. या बही लाभ पर या हानि की दशा में के 90 प्रतिशत की दर से, इनमें से जो भी अधिक हो;
  () बही लाभ के अगले 75,000 रु.   60 प्रतिशत की दर से; पर
  () बही लाभ के अतिशेष पर   40 प्रतिशत की दर से :

वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.4.2010 से धारा 40 के खंड() के उपखंड (v) की विद्यमान मद (1) और (2) के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा:

(क) बही लाभ के प्रथम 3,00,000 रुपए पर या किसी हानि की दशा में 1,50,000 रुपए या बही लाभ के 90 प्रतिशत की दर से, इनमें से जो भी अधिक हो;
(ख) बही लाभ के अतिशेष पर  60 प्रतिशत की दर से:

परन्तु 1 अप्रैल, 1993 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान भागीदार को इस खंड के अधीन किसी संदाय के संबंध में, भागीदारी विलेख के निबंधनों में, उक्त पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय, ऐसे संदाय के लिए उपबंध किया जा सकेगा।

स्पष्टीकरण 1.–जहां कोर्इ व्यष्टि, किसी अन्य व्यक्ति की ओर से या उसके फायदे के लिए, किसी फर्म में भागीदार है (ऐसे भागीदार और अन्य व्यक्ति को इसमें इसके पश्चात् क्रमश: "प्रतिनिधि की हैसियत में भागीदार" और "इस प्रकार प्रतिनिधित्व प्राप्त व्यक्ति" कहा गया है) वहां,—

(i) प्रतिनिधि की हैसियत से भागीदार से भिé ऐसे व्यक्ति को फर्म द्वारा दिया गया ब्याज इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा;

(ii) प्रतिनिधि की हैसियत से भागीदार के नाते ऐसे व्यक्ति को फर्म द्वारा दिया गया ब्याज और इस प्रकार प्रतिनिधित्व प्राप्त व्यक्ति को फर्म द्वारा दिया गया ब्याज इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में लिया जाएगा।

स्पष्टीकरण 2.–जहां कोर्इ व्यक्ति फर्म में प्रतिनिधि की हैसियत से भिन्न रूप में फर्म में भागीदार है, वहां ऐसे व्यक्ति को फर्म द्वारा दिया गया ब्याज इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा, यदि उसके द्वारा ऐसा ब्याज किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से या किसी और व्यक्ति के फायदे के लिए प्राप्त किया गया है।

स्पष्टीकरण 3.–इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए 'बही लाभ' से शुद्ध लाभ अभिप्रेत है जो, फर्म के सभी भागीदारों को दिए गए या देय पारिश्रमिक की कुल राशि को शामिल करके अध्याय 4घ में बतार्इ गर्इ रीति से संगणित सुसंगत पूर्ववर्ष के लाभ और हानि लेखा में दिखार्इ गर्इ हो, यदि शुद्ध लाभ की संगणना करते समय ऐसी रकम की कटौती की गर्इ है।

स्पष्टीकरण 4.–इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए, "कार्यकारी भागीदारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो उस फर्म के, जिसका वह भागीदार है, कारबार या वृति के काम में सक्रिय रूप से लगा हुआ है;]

51[(खक) किसी व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय की दशा में, [जो किसी कंपनी या सहकारी सोसाइटी या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन या भारत के किसी भाग में प्रवृत्त उस अधिनियम के समान किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी सोसाइटी से भिन्न है] ऐसे संगम या निकाय द्वारा ऐसे संगम या निकाय के किसी सदस्य को दिए गए ब्याज, वेतन, बोनस, कमीशन या पारिश्रमिक का चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, कोर्इ भुगतान।

स्पष्टीकरण 1.–जहां किसी संगम या निकाय द्वारा संगम या निकाय के किसी ऐसे सदस्य को, जिसने संगम या निकाय को ब्याज का संदाय भी कर दिया है, ब्याज का संदाय किया जाता है, वहां इस खंड के अधीन अनुज्ञात किए जाने वाले ब्याज की रकम ऐसी रकम तक सीमित होगी, जिससे संगम या निकाय द्वारा सदस्य को किए गए ब्याज का संदाय, सदस्य द्वारा संगम या निकाय को दिए गए ब्याज से अधिक हो जाता है।

स्पष्टीकरण 2. - जहां कोर्इ व्यष्टि, किसी अन्य व्यक्ति की ओर से या उसके फायदे के लिए किसी संगम या निकाय का सदस्य है (ऐसे सदस्य और अन्य व्यक्ति को इसमें इसके पश्चात् क्रमश: "प्रतिनिधि की हैसियत में सदस्य" और "इस प्रकार प्रतिनिधित्व प्राप्त व्यक्ति", कहा गया है) वहां,—

(i) संगम या निकाय द्वारा ऐसे व्यष्टि को या ऐसे व्यष्टि द्वारा संगम या निकाय को, जो प्रतिनिधि की हैसियत में सदस्य से भिन्न है, संदत्त किया गया ब्याज इस खंड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा;

(ii) संगम या निकाय द्वारा ऐसे व्यष्टि को या ऐसे व्यष्टि द्वारा संगम या निकाय को प्रतिनिधि की हैसियत में सदस्य के रूप में संदत्त ब्याज और संगम या निकाय द्वारा ऐसे व्यष्टि को जिसका इस प्रकार प्रतिनिधित्व किया जाता है या ऐसे व्यष्टि द्वारा जिसका इस प्रकार प्रतिनिधित्व किया जाता है, संगम या निकाय को दिया गया ब्याज इस खंड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में लिया जाएगा।

स्पष्टीकरण 3.–जहां कोर्इ व्यष्टि किसी संगम या निकाय में कोर्इ ऐसा सदस्य है जो प्रतिनिधि की हैसियत से सदस्य से भिन्न है, वहां संगम या निकाय द्वारा ऐसे व्यष्टि को दिया गया ब्याज इस खंड के प्रयोजनों के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा, यदि ऐसा ब्याज उसके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति की ओर से या उसके फायदे के लिए प्राप्त किया जाता है।]

() [प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। इससे पूर्व वित्त अधिनियम, 1963 द्वारा 1.4.1963 से, वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से, वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से, वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से, वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से इसे संशोधित किया गया था।]

() [वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया।]

 

34. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से '39' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

35. परिपत्र सं. 91/58/66-आर्इ.टी.जे.(19), तारीख 18.5.1967 और परिपत्र सं. 786, तारीख 7.2.2000 भी देखियेे। ब्यौरे के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

36. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.4.2005 से विद्यमान उपखंड (i) के स्थान पर उपखंड (i), (iक) और (iख) प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से तथा वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से यथा प्रतिस्थापित उपखंड (i) इस प्रकार था :

'(i) इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य ऐसा कोर्इ ब्याज (जो अप्रैल 1938 के प्रथम दिन के पूर्व सार्वजनिक अभिदान के लिए पुरोधृत उधार पर ब्याज नहीं है), स्वामिस्व, तकनीकी सेवाओं के लिए फीस या अन्य राशि, जो,–

() भारत के बाहर; या

() भारत में किसी ऐसे अनिवासी को, जो कंपनी नहीं है या किसी विदेशी कंपनी को,

संदेय है, जिस पर कर की कटौती नहीं की गर्इ है या कटौती के पश्चात् उसका धारा 200 की उपधारा (1) के अधीन विहित समय की समाप्ति से पूर्व और अध्याय 17ख के अन्य उपबंधों के अनुसार संदाय नहीं किया गया है:

परंतु जहां ऐसी किसी राशि की बाबत अध्याय 17ख के अधीन कर की कटौती की गर्इ है या किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में उसका संदाय किया गया है वहां ऐसी राशि की, उस पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में, जिसमें ऐसे कर का संदाय किया गया है, कटौती अनुज्ञात की जाएगी।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए,–

() "स्वामिस्व" का वही अर्थ है, जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण 2 में है;

() "तकनीकी सेवाओं के लिए फीस" का वही अर्थ है, जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vii) के स्पष्टीकरण 2 में है;'

37. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

37क. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2005 से भूतलक्षी प्रभाव से "कटौती के पश्चात् उस पूर्ववर्ष के दौरान या धारा 200 की उपधारा (1) के अधीन विहित समय की समाप्ति से पहले पश्चात्वर्ती वर्ष में संदाय नहीं किया गया है :" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

37ख. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2005 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व परन्तुक इस प्रकार था :

"परन्तु यह कि जहां किसी ऐसी राशि के संबंध में कर की कटौती किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में की गर्इ है या कटौती किसी पूर्ववर्ष में की गर्इ है किन्तु उसका संदाय धारा 200 की उपधारा (1) के अधीन विहित समय की समाप्ति के पश्चात् किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में किया है, वहां ऐसी राशि की उस पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में जिसमें ऐसे कर का संदाय किया गया है कटौती अनुज्ञात की जाएगी।"

38. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

38क. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2009 से उपखंड (iख) का लोप किया गया। लोप किए जाने से पूर्व, उपखंड (iख), जो वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.4.2005 से अंत:स्थापित किया गया था, निम्न प्रकार था :

"(iख) वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 2004 के अध्याय 7 के अधीन प्रतिभूति संव्यवहार कर के मद्दे संदत्त कोर्इ राशि;"

39. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

40. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

41. "उद्गृहीत कोर्इ रेट या टैक्स" और "किसी कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" पदों के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

42. वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

43. यथोक्त द्वारा 1.6.2006 से अंत:स्थापित।

44. आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से उस अधिनियम की धारा 4 और 5 द्वारा विहित व्यावृत्तियों के अधीन रहते हुए अन्त:स्थापित।

45. सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

46. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, उपखंड (iii) इस प्रकार था :

'(iii) कोर्इ ऐसा संदाय, जो "वेतन" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है, यदि वह भारत के बाहर संदेय है और यदि अध्याय 17ख के अधीन उस पर कर संदत्त नहीं किया गया है या उससे उसकी कटौती नहीं की गर्इ है;'

47. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित। मूल खंड (v), वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1969 से अन्त:स्थापित, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से संशोधित किया गया था और बाद में वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1972 से उसका लोप किया गया था।

48. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से प्रतिस्थापित। इसके प्रतिस्थापन से पूर्व खंड () कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से संशोधित किया गया था।

49. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से "अठारह" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

50. देखिए परिपत्र सं. 739, तारीख 25.3.1996. ब्यौरे के लिए देखिये टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

51. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा संशोधित रूप में]

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