नियम बनाने की शक्ति
नियम बनाने की शक्ति
295. (1) बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए नियम, भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगा।
(2) विनिर्दिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे–
(क) 10आय के किसी वर्ग का अभिनिश्चय और अवधारण;
(ख) वह रीति जिसमें, और वह प्रक्रिया जिसके द्वारा--
(i) 11भागत: कृषि से और भागत: कारबार से प्राप्त आय की दशा में;
(ii) 12भारत के बाहर निवास करने वाले व्यक्तियों की दशा में;
13[(iii) किसी व्याष्टि की दशा में जो धारा 64 की उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन निर्धारण के दायित्वाधीन है,]
आय निकाली जाएगी।
(ग) 14इस अधिनियम के अधीन कर से प्रभार्य किसी परिलब्धि के मूल्य का ऐसी रीति में और ऐसे आधार पर अवधारण जो बोर्ड को उचित और युक्तियुक्त प्रतीत हो;
(घ) 15अवलिखित मूल्य पर प्रतिशतता, जो भवनों, मशीनरी, संयंत्र या फर्नीचर की बाबत अवक्षयण के रूप में अनुज्ञात की जा सकेगी।
16[(घघ) 17वह परिमाण जिस तक, और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, धारा 37 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट कोर्इ व्यय अनुज्ञात किया जा सकेगा;]
18[(घघक) 19धारा 44कक की उपधारा (2) और (3) में विनिर्दिष्ट विषय।]
(ड़) 20[धारा 80ग* की उपधारा (4) के खंड (i) के अधीन] विहित की जाने वाली प्रतिशतता या रकम;
21[(ड़ड़) 22वे शर्तें या मर्यादाएं जिनके अधीन रहते हुए निर्धारिती द्वारा किए गए किराए के किसी संदाय की धारा 80छछ के अधीन कटौती की जाएगी'
(ड़ड़क) वे मामले, आस्तियों की प्रकृति और मूल्य, व्यय और नियमों की परिसीमाएं और वे शीर्ष जिनका धारा 139 की उपधारा (6) के अधीन विहित किया जाना अपेक्षित है;
(ड़ड़ख) 23वह समय जिसके भीतर कोर्इ व्यक्ति स्थायी लेखा संख्यांक दिए जाने के लिए आवेदन कर सकेगा, वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिसमें ऐसा आवेदन किया जा सकेगा और वे विशिष्टियां जो ऐसे आवेदन में होंगी और वे संव्यवहार जिनकी बाबत स्थायी लेखा संख्यांक का ऐसे संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेजों में धारा 139क24 के अधीन हवाला दिया जाएगा;
(ड़ड़ग) 25लेखा परीक्षा की रिपोर्ट का प्ररूप और वे विशिष्टियां जो ऐसी रिपोर्ट में धारा 142 की उपधारा (2क) के अधीन होगी;]
(च) 26वह रीति जिसमें और वह अवधि जिसके लिए कोर्इ ऐसी आय जो धारा 180 में उल्लिखित है, आबंटित की जा सकेगी;
(छ) 27इस अधिनियम के प्रयोजनों में से किसी के लिए विहित किया जाने वाला प्राधिकारी;
(ज) दोहरे कराधान की बाबत राहत अनुदत्त करने के लिए या दोहरे कराधान अपवचन के लिए किसी ऐसे करार के जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाए, निबंधनों को प्रभावी करने की प्रक्रिया;
(झ) वह प्ररूप और रीति जिसमें कोर्इ आवेदन या दावा किया जा सकेगा या कोर्इ विवरणी या जानकारी दी जा सकेगी और वह फीस जो किसी आवेदन या दावे की बाबत ली जा सकेगी;
(ञ) वह रीति जिसमें इस अधिनियम के अधीन दाखिल की जाने के लिए अपेक्षित कोर्इ दस्तावेज सत्यापित की जा सकेगी;
(ट) 28प्रतिदायों के लिए आवेदनों पर अपनार्इ जाने वाली प्रक्रिया;
29[(टट) 30इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन निर्धारितियों द्वारा संदेय ब्याज या सरकार द्वारा निर्धारितियों को संदेय ब्याज के परिकलन के लिए अपनार्इ जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अंतर्गत उस अवधि का जिसके लिए ब्याज का परिकलन किया जाना है, पूर्णांकन जब ऐसी अवधि में मास का भाग सम्मिलित है, और वे परिस्थितियां जिनमें और वह मात्रा जिस तक निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याज की छोटी-मोटी रकमें छोड़ी जा सकेंगी, विनिर्दिष्ट करना आता है;]
(ठ) 31किसी ऐसे मामले का विनियमन जिसके लिए धारा 230 में उपबंध किया गया है।
(ड) 32वह प्ररूप और रीति जिसमें कोर्इ अपील या प्रत्याक्षेप इस अधिनियम के अधीन दाखिल किया जा सकेगा, उसकी बाबत संदेय फीस और वह रीति जिसमें ऐसे किसी आदेश की सूचना धारा 249 की उपधारा (2) के खंड (ग) में उल्लिखित किए गए अनुसार, की तामील की जा सकेगी;
33[(डड) 34वे परिस्थितियां जिनमें, वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए और वह रीति, जिसमें 35[* * *] 36[आयुक्त (अपील)] किसी अपीलाथ्र्ाी को ऐसा साक्ष्य पेश करने के लिए अनुज्ञात कर सकता है, जो उसने 37[निर्धारण] अधिकारी के समक्ष पेश नहीं किया था, या जिसे पेश करने के लिए उसे अनुज्ञात नहीं किया गया था];
38[(डडक) 39वह प्ररूप जिसमें धारा 285ख के अधीन विवरण 37[निर्धारण] अधिकारी को दिया जाएगा;]
(ढ) 40धारा 288 की उपधारा (2) में परिभाषित विधि व्यवसायियों और लेखापालों से भिन्न ऐसे व्यक्तियों के, जो आय-कर प्राधिकारियों के समक्ष वकालत करते हैं, रजिस्टर का रखा जाना और उस धारा की उपधारा (5) में निर्दिष्ट प्राधिकरण का गठन और उसके द्वारा अपनार्इ जाने वाली प्रक्रिया।
(ण) निर्धारिती द्वारा कर का भुगतान सत्यापित करने वाला प्रमाणपत्र दिया जाना;
(त) कोर्इ अन्य विषय जो इस अधिनियम द्वारा विहित किया जाना हो या किया जाए।
(3) उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन आने वाले मामलों में, जहां कर के दायित्वाधीन आय निश्चयपूर्वक अभिनिश्चित नहीं की जा सकती या निर्धारिती को उतने कष्ट और व्यय से ही अभिनिश्चित की जा सकती है, जो बोर्ड की राय में अयुक्तियुक्त है, वहां इस धारा के अधीन बनाए गए नियम--
(क) ऐसी पद्धतियां विहित कर सकेंगे जिनके द्वारा ऐसी आय का प्राक्कलन किया जाए; और
(ख) उपधारा (2) के खंड (ख) के उपखंड (i) के अधीन आने वाले मामलों में आय का वह अनुपात विनिर्दिष्ट कर सकेंगे जिसे कर के दायित्वाधीन आय समझा जाएगा,
और ऐसे प्राक्कलन या अनुपात पर आधारित निर्धारण इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार सम्यक् रूप से किया गया समझा जाएगा।
41[(4) इस धारा द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत नियमों को या उनमें से किसी नियम को भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी है और जब तक (अभिव्यक्त रूप से या आवश्यक विवक्षा द्वारा) इसके प्रतिकूल अनुज्ञात न किया जाए तब तक किसी नियम को इस प्रकार भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा कि निर्धारिती के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े तथा इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्व किसी तारीख से भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा।
10. नियम 9क और 9ख देखिए।
11. नियम 7 और 8 देखिए।
12. नियम 10 और 11 देखिए।
13. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित।
14. नियम 3 देखिए।
15. नियम 5 देखिए।
16. वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित।
17. नियम 6कग, 6ख और 6घ (अब लोप कर दिया गया) देखिए।
18. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।
19. नियम 6च देखिए।
20. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1968 से "यथास्थिति, धारा 87 की उपधारा (3) के खंड (i) या धारा 80क की उपधारा (4) के खंड (i) के अधीन" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
21. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।
22. नियम 11ख देखिए।
23. नियम 114 और प्ररूप सं. 49क देखिए।
24. नियम 114ख से 114घ और प्ररूप सं. 60 और 61 देखिए।
25. नियम 14क और प्ररूप सं. 6ख देखिए।
26. नियम 9(2) देखिए।
27. देखिये नियम 2ग, 2घ, 2ड़, 5क, 6, 6ककक, 6ककग, 11घघ, 11ठ, 16क, 16ख, 16ग, 18ककक, 18ककख, 18खखक, 18खखग, 18खखघ, 18ग, 20, 20क, 36क, 37च, 52 और 114घ.
* उसके स्थान पर अब धारा 88 रख दी गर्इ है।
28. नियम 41 देखिए।
29. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से अंत:स्थापित।
30. नियम 119क देखिए।
31. नियम 42, 43 और 44 तथा प्ररूप सं. 31 से 34 देखिए।
32. नियम 45, 46 और 47 और प्ररूप सं. 35 से 36क देखिए।
33. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1972 से अंत:स्थापित।
34. नियम 46क देखिए।
35. "उपायुक्त (अपील) या" शब्दों का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से लोप किया गया। इससे पहले, "उपायुक्त (अपील)" शब्द, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "सहायक आयुक्त (अपील)" के स्थान पर रखे गए थे तथा "या" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित किया गया था।
36. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित।
37. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
38. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।
39. नियम 121क और प्ररूप सं. 52क देखिए।
40. नियम 52 से 66 देखिए।
41. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 18.8.1974 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

