कुछ स्थानान्तरण शून्य होने के लिए
अध्याय 23
प्रकीर्ण
52[कुछ अन्तरणों का शून्य होना
281. (1) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान या उसके पूरे हो जाने के पश्चात् किन्तु द्वितीय अनुसूची के नियम 2 के अधीन सूचना की तामील के पूर्व कोर्इ निर्धारिती किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में अपनी आस्तियों में से किसी पर (विक्रय, बंधक, दान, विनिमय या किसी भी अन्य प्रकार के अन्तरण द्वारा) प्रभार का सृजन करता है या उस पर कब्जा छोड़ देता है, वहां ऐसा प्रभार या अन्तरण उक्त कार्यवाही के पूरे होने के परिणामस्वरूप या अन्यथा निर्धारिती द्वारा संदेय किसी कर या किसी अन्य राशि के संबंध में किसी दावे के विरुद्ध शून्य होगा :
परन्तु ऐसा प्रभार या अन्तरण शून्य नहीं होगा यदि वह--
(i) पर्याप्त प्रतिफल के लिए और, ऐसी कार्यवाही के लम्बित होने की सूचना के बिना या निर्धारिती द्वारा यथास्थिति, संदेय ऐसे कर या अन्य राशि की सूचना के बिना किया जाता है; या
(ii) 53[निर्धारण] अधिकारी की पूर्व अनुमति से किया जाता है।
(2) यह धारा उन मामलों को लागू होती है जहां संदेय या सम्भाव्य रूप से संदेय कर राशि या अन्य राशि पांच हजार रुपए से अधिक है और प्रभारित या अंतरित आस्तियों का मूल्य दस हजार रुपए से अधिक है।
स्पष्टीकरण.–इस धारा में "आस्ति" से भूमि, भवन, मशीनरी, संयंत्र, शेयर, प्रतिभूति और बैंकों में सावधि निक्षेप उस मात्रा तक अभिप्रेत है, जहां तक पूर्वोक्त आस्तियों में से कोर्इ आस्ति निर्धारिती के कारबार के व्यापार-स्टाक का भाग नहीं है।]
52. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से प्रतिस्थापित।
53. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

