आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 273क

कुछ मामलों में, आदि, दंड को कम या माफ करने के लिए पावर

धारा

धारा संख्या

273क

अध्याय शीर्षक

अध्याय XXI - शास्तियां दंड

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2001

कुछ मामलों में, आदि, दंड को कम या माफ करने के लिए पावर

कुछ मामलों में, आदि, दंड को कम या माफ करने के लिए पावर

58[कुछ दशाओं में शास्ति आदि घटाने या अधित्यजन (वेव) करने की शक्ति

59273क. (1) इस अधिनियम में दी गर्इ किसी बात के होते हुए भी 60[61[* * *] आयुक्त] विवेकानुसार, चाहे स्वप्रेरणा से या अन्यथा--

(i) 62[* * *]

(ii) किसी व्यक्ति पर धारा 271 की उपधारा (1) के खंड (iii) के अधीन अधिरोपित या अधिरोपणीय शास्ति की रकम को घटा सकता है, या उसका अधित्यजन कर सकता है; *[या]

(iii) 63[* * *]

यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति ने--

() 64[* * *]

() खंड (ii) में निर्दिष्ट दशा में, आय के तथ्यों (विशिष्टयों) को छिपाने या ऐसी आय के संबंध में दिए गए तथ्यों की अशुद्धता के 65[निर्धारण] अधिकारी को 66ज्ञात होने से पूर्व स्वेच्छा से67 और सद्भावपूर्वक ऐसे तथ्यों को पूर्णत: और सही प्रकटन67 किया है;

() 68[* * *]

और 69[खंड () में उल्लिखित दशा में] अपनी आय के निर्धारण से संबंधित किसी जांच में सहयोग67 भी किया है और सुसंगत निर्धारण वर्ष की बाबत इस अधिनियम के अधीन पारित आदेश के परिणामस्वरूप संदेय किसी कर या ब्याज या तो संदाय कर दिया है, या संदाय करने के लिए संतोषजनक इन्तजाम कर दिया है।

स्पष्टीकरण.–70[* * *] इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उस दशा में जिसमें विवरणी में उल्लिखित आय से निर्धारित आय का आधिक्य ऐसा है कि उसे धारा 271 की उपधारा (1) के खंड () के उपबंध लागू नहीं होते हैं, तो यह समझा जाएगा कि किसी व्यक्ति ने अपनी आय का या उससे संबंधित विशिष्टियों का पूर्ण और सत्य प्रकटन किया है।

70[* * *]

(2) उपधारा (1) में की किसी बात के होते हुए भी--

() 71[* * *]

() यदि धारा 271 की उपधारा (1) के खंड () के अंतर्गत आने वाले किसी मामले में आय की रकम जिसकी बाबत सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए शास्ति अधिरोपित की जाती है, या अधिरोपणीय है या जहां ऐसा प्रकटन एक से अधिक निर्धारण वर्ष से संबंधित है, वहां उन वर्षों के लिए आय की रकम का योग पांच लाख रुपए की राशि से अधिक है,

तो उपधारा (1) के अधीन शास्ति को घटाने या उसका अधित्यजन करने वाला कोर्इ भी आदेश 72[आयुक्त द्वारा यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक के पूर्व अनुमोदन से ही किया जाएगा अन्यथा नहीं]।

(3) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति के पक्ष में कोर्इ आदेश किया गया है, चाहे ऐसा आदेश एक या अधिक निर्धारित वर्षों से संबंधित हो या नहीं, वहां वह व्यक्ति ऐसा आदेश किए जाने के पश्चात् किसी भी समय किसी अन्य निर्धारण वर्ष के संबंध में उक्त धारा के अधीन कोर्इ राहत (अनुतोष) पाने का हकदार नहीं होगा :

73[परन्तु जहां उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति के पक्ष में कोर्इ आदेश 24 जुलार्इ, 1991 को या उसके पूर्व किया गया है, वहां, यदि वह व्यक्ति, उपधारा (4) में निर्दिष्ट आय-कर प्राधिकारी को 1 अप्रैल, 1992 से पूर्व किसी समय आवेदन करता है, तो अन्य निर्धारण वर्ष या वर्षों के संबंध में केवल एक बार अतिरिक्त राहत पाने का हकदार होगा।]

(4) 74[75[* * *] आयुक्त] इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध द्वारा प्रदत्त शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह है कि आयुक्त, किसी निर्धारिती द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर और ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् इस अधिनियम के अधीन निर्धारिती द्वारा संदेय किसी शास्ति की रकम को घटा सकता है या उसका अधित्यजन कर सकता है अथवा ऐसी किसी रकम की वसूली के लिए कार्यवाहियों को रोक सकता है या उनका प्रशमन कर सकता है यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि,--

(i) मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा न करने से निर्धारिती को वास्तव में कठिनार्इ होगी; और

(ii) निर्धारिती ने निर्धारण से संबंधित जांच में या उससे शोध्य किसी रकम की वसूली की कार्यवाही में सहयोग दिया है :

76[परन्तु जहां इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी शास्ति की रकम, या यदि ऐसा आवेदन एक से अधिक शास्ति से संबंधित है तो ऐसी शास्तियों की संकलित रकम, एक लाख रुपए से अधिक हो जाती है, वहां ऐसी रकम को घटाने या उसका अधित्यजन करने वाला अथवा इस उपधारा के अधीन वसूली की किसी कार्यवाही का प्रशमन करने वाला कोर्इ आदेश 77[यथास्थिति, आयुक्त द्वारा मुख्य आयुक्त या महानिदेशक के पूर्व अनुमोदन से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं।]

(5) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश अंतिम होगा और किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।]

78[(6) इस धारा के उपबंध 79[जैसे कि वह प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा उनका संशोधन किया जाने से ठीक पूर्व थे] 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारण को और उसके संबंध में लागू होंगे, तथा इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे तत्समय प्रवृत्त और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू उन उपबंधों के प्रति निर्देश हैं।]

80[(7) उपधारा (6) में दी गर्इ किसी बात के होते हुए भी यथास्थिति, उपधारा (1), उपधारा (2) या उपधारा (4) के उपबंध [जैसे कि वे प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 (1989 का 3) द्वारा उनका संशोधन किए जाने से ठीक पूर्व थे] 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के किसी निर्धारण के संबंध में शास्ति या ब्याज को घटाने या उसके अधित्यजन के मामले में इन उपांतरणों के साथ लागू होंगे कि उक्त उपधारा (1) के अधीन शक्ति का प्रयोग आयुक्त द्वारा ही किया जाएगा और आयुक्त, ऐसे मामले में कार्यवाही करते समय बोर्ड के पूर्व अनुमोदन के बजाय, यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक, का पूर्व अनुमोदन प्राप्त करेगा।]

 

58. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से अंत:स्थापित।

59. अनुदेश सं. 1417, तारीख 29.9.1981 और परिपत्र सं. 784, तारीख 22.11.1999 भी देखिए। ब्यौरे के लिए, देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

60. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आयुक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

61. "मुख्य आयुक्त" शब्दों का वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.6.1993 से लोप किया गया।

62. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (i) इस प्रकार था :

"(i) धारा 271 की उपधारा (1) के खंड (i) के अधीन किसी व्यक्ति पर, कुल आय की विवरणी देने में, जिसे धारा 139 की उपधारा (1) के अधीन देना उसके लिए आवश्यक था, युक्तियुक्त कारण के बिना, असफल रहने के कारण, अधिरोपित या अधिरोपणीय शास्ति की रकम कम कर सकेगा या उसका अधित्यजन (वेव) कर सकेगा; या"

63. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (iii) इस प्रकार था :

"(iii) धारा 139 की उपधारा (8) या धारा 215 या धारा 217 के अधीन संदत्त या संदेय ब्याज की राशि अथवा धारा 273 के अधीन अधिरोपित या अधिरोपणीय शास्ति की रकम कम कर सकेगा या उसका अधित्यजन (वेव) कर सकेगा।"

"या" शब्द का लोप किया जाना चाहिए।

64. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (क) इस प्रकार था :

"() खंड (i) में उल्लिखित दशा में, धारा 139 की उपधारा (2) के अधीन नोटिस जारी किए जाने से पहले, स्वेच्छा से और सद्भावपूर्वक अपनी आय पूरी और सही प्रकट कर दी हो;"

65. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

66. "डिटेक्शन ज्ञात होना" पद के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

67. "स्वेच्छा से", "सद्भावपूर्वक", "प्रकटन" और "सहयोग किया" शब्दों/पदों के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

68. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (ग) इस प्रकार था :

"() खंड (iii) में उल्लिखित दशा में, धारा 139 की उपधारा (2) के अधीन नोटिस जारी किए जाने से पूर्व, अथवा जहां ऐसा कोर्इ नोटिस जारी नहीं किया गया है और ऐसा नोटिस जारी किए जाने की अबधि बीत चुकी है, धारा 148 के अधीन उसे नोटिस जारी किए जाने से पूर्व स्वेच्छा से और सद्भावपूर्वक, अपनी पूरी और सही आय प्रकट कर दी हो और इस प्रकार प्रकट की गर्इ आय पर कर का संदाय कर दिया हो;"

69. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "खंड (), () और () में उल्लिखित सभी दशाओं में" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

70. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से यथा अंत:स्थापित "1" अंक और स्पष्टीकरण 2 का वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 24.5.1985 से लोप किया गया। लोप किया गया स्पष्टीकरण 2 निम्न प्रकार था :

"स्पष्टीकरण 2.– जहां किसी व्यक्ति की किन्हीं लेखा बहियों, अन्य दस्तावेजें धन, सोना-चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान चीज या वस्तु का धारा 132 के अधीन अभिग्रहण किया जाता है और ऐसे अभिग्रहण के पंद्रह दिन के भीतर, वह व्यक्ति आयुक्त के समक्ष अपनी पूरी और सही आय प्रकट कर देता है, वहां ऐसे व्यक्ति के बारे में इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने आय की विशिष्टियां छिपाने या गलत विशिष्टियां देने के बारे में आयकर अधिकारी द्वारा ज्ञात किए जाने से पूर्व, ऐसी आय की बाबत, स्वेच्छा से और सद्भावर्पूक ऐसी विशिष्टियां प्रकट कर दी हैं।"

71. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड () कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से संशोधित किया गया था और इस प्रकार था :

"() यदि किसी मामले में, धारा 271 की उपधारा (1) के खंड (i) के अधीन अधिरोपित या अधिरोपणीय शास्ति अथवा सुसंगत वर्ष के लिए धारा 273 के अधीन अधिरोपणीय न्यूनतम शास्ति अथवा जहां ऐसा प्रकटन एक से अधिक निर्धारण वर्षों के बारे में है, वहां उक्त खंड के अधीन अधिरोपित या अधिरोपणीय शास्ति और उन वर्षों के लिए उक्त धारा के अधीन अधिरोपणीय न्यूनतम शास्ति का योग एक लाख रुपए से अधिक है, या"

72. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.6.1993 से, "बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा किया जाएगा, अन्यथा नहीं" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पहले "मुख्य आयुक्त या आयुक्त" शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आयुक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे।

73. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 27.9.1991 से अंत:स्थापित।

74. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आयुक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

75. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.6.1993 से "मुख्य आयुक्त या" शब्दों का लोप किया गया।

76. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से अंत:स्थापित।

77. वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.6.1993 से "बोर्ड के पूर्व अनुमोदन से मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा किया जाएगा अन्यथा नहीं" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, "मुख्य आयुक्त या आयुक्त" शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आयुक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित किए गए थे।

78. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

79. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

80. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.6.1994 से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधित रूप में]

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