आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 272क

सवालों का जवाब बयानों पर हस्ताक्षर, सूचना, रिटर्न या बयान प्रस्तुत, अनुमति देने के लिए विफलता के लिए पेनल्टी निरीक्षण आदि

धारा

धारा संख्या

272क

अध्याय शीर्षक

अध्याय XXI - शास्तियां दंड

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2002

सवालों का जवाब बयानों पर हस्ताक्षर, सूचना, रिटर्न या बयान प्रस्तुत, अनुमति देने के लिए विफलता के लिए पेनल्टी निरीक्षण आदि

सवालों का जवाब बयानों पर हस्ताक्षर, सूचना, रिटर्न या बयान प्रस्तुत, अनुमति देने के लिए विफलता के लिए पेनल्टी निरीक्षण आदि

16[प्रश्नों का उत्तर देने, कथन पर हस्ताक्षर करने, जानकारी, विवरणियां या कथन देने, निरीक्षण की अनुज्ञा देने आदि में असफलता के लिए शास्ति

272क. (1) यदि कोर्इ व्यक्ति,–

() जो अपने निर्धारण के किसी विषय से संबंधित किसी मामले का सत्य कथन करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है, किसी आय-कर प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, अपने से पूछे गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से इनकार करता है; या

() इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के दौरान अपने द्वारा किए गए किसी ऐसे कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करता है जिसकी कोर्इ आय-कर प्राधिकारी उससे वैध रूप से हस्ताक्षर करने की अपेक्षा करे; या

() जिसको धारा 131 की उपधारा (1) के अधीन कोर्इ समन, किसी निश्चित स्थान और समय पर साक्ष्य देने के लिए हाजिर होने के लिए अथवा कोर्इ लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें पेश करने के लिए जारी किया गया है, उस स्थान या समय पर हाजिर होने अथवा लेखा बहियें या दस्तावेजें पेश करने में लोप करता है; या

() 16क[***]

तो वह शास्ति के रूप में ऐसे प्रत्येक व्यतिक्रम या ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए 16ख[दस हजार रुपए की राशि का संदाय करेगा]।

(2) यदि कोर्इ व्यक्ति,–

() धारा 94 की उपधारा (6) के अधीन जारी की गर्इ सूचना का पालन करने में; या

() धारा 176 की उपधारा (3) द्वारा अपेक्षित अपने कारबार या वृत्ति को बंद करने की सूचना देने में; या

() धारा 133 या धारा 206 17[* * *] 18[या धारा 206ग] या धारा 285ख में उल्लिखित विवरणियां, कथन या विवरण सम्यक् समय के भीतर देने में; या

() धारा 134 में निर्दिष्ट किसी रजिस्टर का या ऐसे रजिस्टर में किसी प्रविष्टि का निरीक्षण अनुज्ञात करने में अथवा ऐसे रजिस्टर या उसमें किसी प्रविष्टि की प्रतियाँ लेने के लिए अनुज्ञात करने में; या

() आय की ऐसी विवरणी देने में जिसे देने के लिए उससे धारा 139 की उपधारा (4क) के अधीन अपेक्षा की जाती है या उसे अनुज्ञात समय के भीतर और उस उपधारा के अधीन अपेक्षित रीति से देने में; या

वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से धारा 272क की उपधारा (2) में विद्यमान खंड (ड़) के स्थान पर निम्नलिखित खंड (ड़) प्रतिस्थापित किया जाएगा :

(ड़) आय की ऐसी विवरणी देने में जिसे देने के लिए उससे धारा 139 की उपधारा (4) या उपधारा (4) के अधीन अपेक्षा की जाती है, या उसे अनुज्ञात समय के भीतर और उन उपधाराओं के अधीन अपेक्षित रीति से देने में; या

() धारा 197क में उल्लिखित घोषणा की प्रति का सम्यक् समय पर परिदान करने या कराने में; या

() धारा 203 18[या धारा 206ग] द्वारा यथा अपेक्षित प्रमाणपत्र देने में; या

() धारा 226 की उपधारा (2) के अधीन अपेक्षित कर काटने और संदाय करने में;

18क[() धारा 192 की उपधारा (2) द्वारा यथा अपेक्षित विवरण देने में,]

असफल रहता है तो वह, शास्ति के रूप में 19[ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है, एक सौ रुपए की राशि का संदाय करेगा] :

20[परन्तु 21[धारा 197क में वर्णित घोषणा, धारा 203 द्वारा अपेक्षित प्रमाणपत्र और] धारा 206 और धारा 206ग के अधीन विवरणी के संबंध में असफलता के लिए शास्ति की रकम, यथास्थिति, कटौती-योग्य या संग्रहणीय कर की रकम से अधिक नहीं होगी।]

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अधिरोपणीय कोर्इ शास्ति,–

() ऐसी दशा में, जिसमें ऐसा उल्लंघन, असफलता या व्यक्तिक्रम, जिसकी बाबत ऐसी शास्ति अधिरोपणीय है, 22[संयुक्त] निदेशक या 22[संयुक्त] आयुक्त की पंक्ति से अन्यून पंक्ति के किसी आय-कर प्राधिकारी के समक्ष किसी कार्यवाही के दौरान होता है, ऐसे आय-कर प्राधिकारी द्वारा;

() उपधारा (2) के खंड () के अंतर्गत आने वाली दशा में, मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा; और

() किसी अन्य दशा में 22[संयुक्त] निदेशक या 22[संयुक्त] आयुक्त द्वारा अधिरोपित की जाएगी।

(4) इस धारा के अधीन कोर्इ भी आदेश उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी आय-कर प्राधिकारी द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक उस व्यक्ति को जिस पर शास्ति अधिरोपित की जानी प्रस्तावित है, ऐसे प्राधिकारी द्वारा उस मामले में सुनवार्इ का अवसर नहीं दे दिया जाता है।

स्पष्टीकरण.–इस धारा में "आय-कर प्राधिकारी" के अंतर्गत महानिदेशक, निदेशक, 22[संयुक्त] निदेशक और सहायक निदेशक 23[या उपनिदेशक] तब आएंगे, जब वे धारा 131 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट मामलों के बारे में किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन, किसी न्यायालय में निहित शक्तियों का प्रयोग करते हैं।

 

16. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व धारा 272क, जो कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और बाद में वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से, वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.6.1982 से, कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से और वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.6.1987 से संशोधित की गर्इ थी, इस प्रकार थी :

"272क. प्रश्नों का उत्तर देने, कथन पर हस्ताक्षर करने, निरीक्षण की अनुज्ञा देने आदि में असफल रहने पर शास्ति–(1) यदि कोर्इ व्यक्ति,–

() अपने निर्धारण के विषय से संबंधित किसी मामले की सच्चार्इ बताने के लिए वैधरूप से आबद्ध होने के कारण, निर्धारण अधिकारी या उपायुक्त (अपील) या उपायुक्त या आयुक्त (अपील) या मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पूछे गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से इन्कार करता है; अथवा

() इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के दौरान अपने द्वारा किए गए किसी कथन पर हस्ताक्षर करने से इन्कार करता है जिसकी निर्धारण अधिकारी या उपायुक्त (अपील), उपायुक्त या आयुक्त (अपील) या मुख्य आयुक्त या आयुक्त उससे वैध रूप से अपेक्षा करे,

तो वह शास्ति के रूप में ऐसी राशि का संदाय करेगा जो एक हजार रुपए तक हो सकेगी।

(2) यदि कोर्इ व्यक्ति–

() धारा 133, धारा 206 या धारा 285ख में वर्णित विवरणियों या कथनों में से कोर्इ उचित समय के भीतर देने में; या

() धारा 134 में उल्लिखित किसी रजिस्टर या ऐसे रजिस्टर में किसी प्रविष्टि का निरीक्षण करने देने में या ऐसे रजिस्टर या उसमें किसी प्रविष्टि की प्रतिलिपियां लेने देने से; या

(खक) धारा 197क में वर्णित घोषणा की एक प्रति उचित समय के भीतर देने या दिलवाने में; या

() धारा 203 द्वारा अपेक्षित प्रमाणपत्र देने में; या

() धारा 226 की उपधारा (2) द्वारा अपेक्षित कर काटने और संदाय करने में

असफल रहता है, तो वह शास्ति के रूप में, ऐसी राशि का संदाय करेगा जो असफल रहने के दौरान हर रोज दस रुपए तक हो सकेगी।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अधिरोपणीय कोर्इ शास्ति–

() उस मामले में, जिसमें वह उल्लंघन, असफलता या व्यतिक्रम जिसकी बाबत ऐसी शास्ति अधिरोपणीय है, मुख्य आयुक्त या आयुक्त या आयुक्त (अपील) या उपायुक्त (अपील) के समक्ष किसी कार्यवाही के दौरान होता है, मुख्य आयुक्त या आयुक्त या यथास्थिति आयुक्त (अपील) या उपायुक्त (अपील) द्वारा;

(कक) उस मामले में जो उपधारा (2) के खंड (खक) के अन्तर्गत आता है, मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा; और

() किसी अन्य मामले में, उपायुक्त द्वारा

अधिरोपित की जाएगी।

(4) इस उपधारा के अधीन कोर्इ आदेश उपधारा (3) में उल्लिखित किसी अधिकारी द्वारा उस समय तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति को जिस पर शास्ति अधिरोपित की जानी है, ऐसे अधिकारी द्वारा सुने जाने का अवसर न दे दिया जाए।"

16क. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (घ) इस प्रकार था :

"(घ) धारा 139 के उपबंधों का पालन करने में असफल रहता है,"

16ख. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से "ऐसी राशि का संदाय करेगा, जो ऐसे प्रत्येक व्यतिक्रम या असफलता के लिये पांच सौ रुपए से कम की नहीं होगी किंतु जो दस हजार रुपए तक हो सकेगी" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

17. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.10.1996 से "या धारा 206क या धारा 206ख" शब्दों का लोप किया गया।

18. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से अंत:स्थापित।

18क. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित।

19. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से "ऐसी राशि का संदाय करेगा, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान असफलता जारी रहती है एक सौ रुपए से कम नहीं होगी किंतु जो दो सौ रुपए तक की हो सकेगी" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

20. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से अंत:स्थापित।

21. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से अंत:स्थापित।

22. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से "उप" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

23. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित रूप में]

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