आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

मुख्य सामग्री पर जाने के लिए यहां क्लिक करें
शब्द आकार
सैचुरेशन
मदद

धारा 271

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

धारा

धारा संख्या

271

अध्याय शीर्षक

अध्याय XXI - शास्तियां दंड

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2023

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

271. (1) यदि इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान निर्धारण अधिकारी या 1[संयुक्त आयुक्त (अपील) या आयुक्त (अपील)] या प्रधान आयुक्त या आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने–

() [* * *]

() धारा 115बघ की उपधारा (2) के अधीन या धारा 115बड़ की उपधारा (2) के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) या धारा 143 की उपधारा (2) के अधीन सूचना का पालन करने में असफल रहा है या धारा 142 की उपधारा (2क) के अधीन किए गए निदेश का पालन करने में असफल रहा है, अथवा

() अपनी आय के विवरण को छिपाया है, या ऐसी आय की गलत विशिष्टियां दी हैं या,

() अनुषंगी फायदों की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसे अनुषंगी फायदों की गलत विशिष्टियां दी हैं;

तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति शास्ति के रूप में निम्नलिखित संदाय करेगा–

(i) [* * *]

(ii) खंड () में उल्लिखित मामलों में उसके द्वारा संदेय कर के अतिरिक्त यदि कोई हो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए दस हजार रुपए की राशि;

(iii) खंड () या खंड () में उल्लिखित मामलों में उसके द्वारा संदेय कर के अतिरिक्त यदि कोई हो ऐसी राशि उसकी आय या अनुषंगी फायदों की विशिष्टियाँ छिपाने या ऐसी आय या अनुषंगी फायदों के गलत विशिष्टियाँ देने के कारण अपवंचन का प्रयास की जाने वाली कर राशि से कम नहीं होगी, किंतु उसकी तिगुनी से अधिक नहीं होगी।

स्पष्टीकरण 1. – जहां इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति की कुल आय की संगणना करने के लिए किन्हीं महत्त्वपूर्ण तथ्यों की बाबत–

() ऐसा व्यक्ति स्पष्टीकरण देने में असफल रहता है, या ऐसा स्पष्टीकरण देता है जो निर्धारण अधिकारी अथवा 1[संयुक्त आयुक्त (अपील) या आयुक्त (अपील)] या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा मिथ्या पाया जाता है, या

() ऐसा व्यक्ति, कोई ऐसा स्पष्टीकरण देता है, जिसे वह सिद्ध करने में असमर्थ है और यह साबित करने में असफल रहता है कि ऐसा स्पष्टीकरण सद्भावी है तथा उससे संबंधित और उसकी कुल आय की संगणना करने के लिए सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसके द्वारा प्रकट किए गए हैं,

वहां उसके परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति की कुल आय की संगणना करने में जोड़ी गई या अनुज्ञात न की गई रकम, इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिये उस आय को उपदर्शित करने वाली समझी जाएगी जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है।

स्पष्टीकरण 2.–जहां किसी व्यक्ति द्वारा यह दावा किया जाता है कि किसी निर्धारण वर्ष में किसी प्राप्ति, निक्षेप, निर्गम या विनिधान का स्रोत ऐसी रकम है, जो किसी पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए ऐसे व्यक्ति के निर्धारण में आय की संगणना करने में जोड़ी गई है या हानि की संगणना करने में काटी गई है, किंतु जिसकी बाबत इस उपधारा के खंड (iii) के अधीन कोई शास्ति उद्गृहीत नहीं की गई है। वहां, उस वर्ष के ठीक पहले के ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष में जिसमें प्राप्ति, निक्षेप, निर्गम या विनिधान प्रकट होता है ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष को इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष कहा गया है) दर्शित रकम के पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त है, निर्धारिती की ऐसी आय समझी जाएगी जिसके संबंध में प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष का विवरण छिपाया गया है या गलत दिया गया है और जहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गई या काटी गई रकम का वह भाग जो इस प्रकार प्रयुक्त रकम के ऐसे भाग के पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त है, (ऐसी रकम या मूल्य को इसके पश्चात् इस स्पष्टीकरण में अप्रयुक्त रकम कहा गया है) निर्धारिती की वह आय समझा जाएगा जिसके संबंध में प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियाँ दी गई हैं; और जहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गई या काटी गई रकम उपयुक्त रकम को पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है, वहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गई या काटी गई रकम जो प्रयुक्त रकम के ऐसे भाग जो इस प्रकार पूरा नहीं किया गया है को पूरा करने के लिए पर्याप्त है निर्धारिती की आय समझी जाएगी, जिसकी विशिष्टियाँ छिपायी गई हैं या उनके दृष्टिगत गलत विशिष्टियाँ दी गई हैं जो प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष में प्रस्तुत की गई और यह क्रम इसी प्रकार तब तक चलेगा जब तक संपूर्ण प्रयुक्त रकम ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष में जोड़ी या काटी गई रकमों से पूरी नहीं हो जाती है।

स्पष्टीकरण 3.–जहां कोई व्यक्ति, उचित कारण के बिना 1 अप्रैल, 1989 को या उसके पश्चात् प्रारम्भ होने वाले उसी निर्धारण वर्ष के संबंध में अपनी आय की विवरणी जिसे देने के लिए धारा 139 के अधीन इसके लिए आवश्यक है धारा 153 की उपधारा (1) विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर देने में असफल रहा है, और पूर्वोक्त के समाप्त होने तक उसे धारा 142 की उपधारा (1) के खण्ड (i) या धारा 148 के अधीन कोई सूचना जारी नहीं की गई है और निर्धारण अधिकारी या 1[संयुक्त आयुक्त (अपील) या आयुक्त (अपील)] का समाधान हो गया है कि ऐसे निर्धारण वर्ष के संबंध में ऐसे व्यक्ति की कराधेय आय है, वहां इस बात के होते हुए भी कि ऐसा व्यक्ति धारा 148 के अधीन सूचना के अनुसरण में पूर्वोक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किसी समय अपनी आय की विवरणी देता है इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति ने ऐसे निर्धारण वर्ष के संबंध में अपनी आय का विवरण छिपाया है।

स्पष्टीकरण 4. - इस उपधारा के खंड (iii) के प्रयोजनों के लिए,-

(क) अपवंचन के लिए प्रयास की जाने वाली कर की रकम निम्नलिखित सूत्र के अनुसार अवधारित की जाएगी-

(क - ख) + (ग - घ)

जिसमें-

क - धारा 115ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों से भिन्न (जिन्हें इसमें साधारण उपबंध कहा गया है) उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय पर कर की रकम;

ख - कर की रकम, जो तब प्रभार्य होती यदि साधारण उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय में से आय की ऐसी रकम को घटा दिया जाता, जिसकी बाबत विशिष्टियां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं;

ग - धारा 115ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय पर कर की रकम;

घ - कर की रकम, जो तब प्रभार्य होती यदि धारा 115ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय में से आय की ऐसी रकम को घटा दिया जाता, जिसकी बाबत विशिष्टयां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं:

परंतुजहां आय की ऐसी रकम, जिसकी बाबत किसी विवाद्यक पर विशिष्टियां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं, पर धारा 115ञख या धारा 115ञग और साधारण उपबंधों, दोनों के अधीन विचार कर लिया गया है, तो ऐसी रकम को, मद घ के अधीन रकम का अवधारण करते समय निर्धारित कुल आय में से नहीं घटाया जाएगा:

परंतु यह और कि ऐसे मामले में जहां धारा 115ञख और धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंध लागू नहीं होते हैं, वहां सूत्र में मद (ग - घ) पर ध्यान नहीं दिया जाएगा;

() किसी ऐसे मामले में, जिसमें आय की उस रकम, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गई हैं, का प्रभाव विवरणी में घोषित हानि को कम करना या उस हानि को आय में संपरिवर्तित करना है, अपवंचन का प्रयास की जाने वाली कर की रकम का अवधारण खंड (क) में विनिर्दिष्ट सूत्र के अनुसार इस उपांतरण के साथ किया जाएगा कि उस सूत्र में मद (क - ख) के लिए अवधारित की जाने वाली रकम, कर की वह रकम होगी जो उस आय पर प्रभार्य होती, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गई हैं, यदि ऐसी आय कुल आय होती।

() किसी ऐसे मामले में, जिसको स्पष्टीकरण 3 लागू होता है, अपवंचन का प्रयास की जाने वाली कर की रकम, धारा 148 के अधीन सूचना जारी किए जाने से पहले संदत्त अग्रिम कर, स्रोत पर कटौती किया गया कर, स्रोत पर संगृहीत किया गया कर और स्व:निर्धारण कर घटाने के पश्चात् निर्धारित कुल आय पर कर होगा।

स्पष्टीकरण 5.–जहां धारा 132 के अधीन 1 जून, 2007 के पूर्व आरंभ की गई तलाशी के दौरान, निर्धारिती के बारे में यह पाया जाता है कि वह किसी धन, सोना, चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज का (जिसे इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् आस्ति कहा गया है) स्वामी है और निर्धारिती यह दावा करता है कि उसने ऐसी आस्तियां–

() ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए जो तलाशी की तारीख से पहले ही समाप्त हो गया है, किंतु ऐसे वर्ष के लिए आय की विवरणी उक्त तारीख से पहले नहीं दी गई है, या जहां ऐसी विवरणी उक्त तारीख से पहले दी गई है, वहां ऐसी आय उसमें घोषित नहीं की गई है; या

() ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए जो तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् समाप्त होना है,

अपनी आय का (पूर्णत: या भागत:) उपयोग करके अर्जित की हैं, वहां इस बात के होते हुए भी कि उसने ऐसी आय तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् दी गई आय की किसी विवरणी में घोषित कर दी है, उसके बारे में इस धारा की उपधारा (1) के खंड () के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण के प्रयोजनों के लिए तब तक यह समझा जाएगा कि उसने अपनी आय का विवरण छिपाया है, या ऐसी आय के गलत विवरण दिए हैं, जब तक कि,–

(1) ऐसी आय या ऐसे संव्यवहार जिनसे ऐसी आय हुई है,–

(i) खंड () के अंतर्गत आने वाले किसी मामले में, तलाशी की तारीख से पहले, और

(ii) खंड () के अंतर्गत आने वाले किसी मामले में, ऐसी तारीख को या उसके पहले,

उसके द्वारा किसी स्रोत से आय के लिए रखी गई लेखा बहियों में, यदि कोई हो, अभिलिखित नहीं किए जाते हैं, या ऐसी आय प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त को उक्त तारीख से पहले अन्यथा प्रकट नहीं की जाती है ; या

(2) वह तलाशी के दौरान धारा 132 की उपधारा (4) के अधीन यह कथन करता है कि कोई धन, सोना-चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज, जो उसके कब्जे या उसके नियंत्रण में पाई गई है, उसने अपनी उस आय से अर्जित की है जो धारा 139 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय की समाप्ति के पहले दी गई आय की विवरणी में प्रकट नहीं की गई है, और कथन में वह रीति भी बताता है जिससे ऐसी आय हुई है, और ऐसी आय की बाबत कर और साथ ही ब्याज, यदि कोई हो, का संदाय करता है।

स्पष्टीकरण 5क–जहां 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् धारा 132 के अधीन आरंभ की गई किसी तलाशी के दौरान निर्धारिती–

(i) किसी धन, बुलियन, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज का (जिसे इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् आस्तियां कहा गया है) स्वामी होना पाया जाता है और निर्धारिती यह दावा करता है कि ऐसी आस्तियां उसके द्वारा ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए अपनी आय का उपयोग (पूर्णत: या भागत:) करके अर्जित की गई हैं; या

(ii) किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों या संव्यवहारों में किसी प्रविष्टि के आधार पर किसी आय का स्वामी होना पाया जाता है और वह यह दावा करता है कि लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों या संव्यवहारों में ऐसी प्रविष्टि ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए उसकी आय को (पूर्णत: या भागत:) दर्शाती है,

जो तलाशी की तारीख से पूर्व समाप्त हो गया है और,–

() जहां ऐसे पूर्ववर्ष के लिए आय की विवरणी उक्त तारीख के पूर्व प्रस्तुत कर दी गई है किन्तु उसमें उस आय को घोषित नहीं किया गया है; या

() ऐसे पूर्ववर्ष के लिए आय की विवरणी फाइल करने के लिए नियत तारीख समाप्त हो गई है किन्तु निर्धारिती ने विवरणी फाइल नहीं की है,

वहां इस बात के होते हुए भी कि ऐसी आय को तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् प्रस्तुत की गई आय की किसी विवरणी में उसके द्वारा घोषित कर दिया गया है, उसके बारे में इस धारा की उपधारा (1) के खंड () के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने अपनी आय की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसी आय की गलत विशिष्टियां दी हैं।

स्पष्टीकरण 6.–जहां धारा 143 की उपधारा (1) के खंड () के परन्तुक के अधीन विवरणी में घोषित आय या हानि और उस धारा के अधीन प्रभारित अतिरिक्त कर में कोई समायोजन किया जाए, वहां इस धारा के उपबंध इस प्रकार किए गए समायोजन को लागू नहीं होंगे।

स्पष्टीकरण 7.–जहां ऐसे निर्धारिती के मामले में जिसने धारा 92ख में परिभाषित अंतरराष्ट्रीय संव्यवहार या विनिर्दिष्ट देशी संव्यवहार किया है धारा 92ग की उपधारा (4) के अधीन कुल आय की संगणना करते समय कोई रकम जोड़ी जाए या अननुज्ञात की जाए, वहां इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिए इस प्रकार जोड़ी गई या अननुज्ञात की गई रकम, के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी आय के रूप में है जिसकी बाबत विवरण छिपाया गया है, या गलत विवरण दिया गया है, जब तक कि निर्धारिती निर्धारण अधिकारी या 1[संयुक्त आयुक्त (अपील) या आयुक्त (अपील)] या प्रधान आयुक्त या आयुक्त के समाधानप्रद रूप में यह साबित न कर दे कि ऐसे संव्यवहार में प्रभारित या संदत्त कीमत की संगणना धारा 92ग के उपबंधों के अनुसार और उस धारा में विहित रीति से सद्भावपूर्वक और सम्यक तत्परता से की गई थी।

(1क) जहां उपधारा (1) के स्पष्टीकरण 2 के आधार पर कोई शास्ति अधिरोपणीय है, वहां इस बात के होते हुए भी कि इस अधिनियम के अधीन वे कार्यवाहियां जिनके दौरान ऐसी शास्ति की कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन शुरू की जा सकती थीं, पूरी हो गई हैं, ऐसी शास्ति के अधिरोपण के लिए कार्यवाहियां शुरू की जा सकती हैं।

(1ख) जहां निर्धारण या पुन: निर्धारण के किसी आदेश में किसी निर्धारिती की कुल आय या हानि की संगणना करने में कोई रकम जोड़ी जाती है या अननुज्ञात की जाती है और उक्त आदेश में उपधारा (1) के खंड () के अधीन शास्ति की कार्यवाहियां आरंभ किए जाने का निदेश है, वहां निर्धारण या पुन: निर्धारण के ऐसे आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि उससे उक्त खंड () के अधीन शास्ति की कार्यवाहियां आरंभ किए जाने के लिए निर्धारण अधिकारी का समाधान गठित होता है।

(2) जब शास्ति का दायी व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत फर्म या ऐसी अरजिस्ट्रीकृत फर्म है जिसका धारा 183 के खंड () के अधीन निर्धारण किया गया है, तब इस अधिनियम के अन्य उपबंधों में की किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन अधिरोपणीय शास्ति उतनी रकम होगी जितनी उस फर्म पर अधिरोपणीय होती यदि वह फर्म रजिस्ट्रीकृत फर्म होती।

(3) [प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया]

(4) यदि इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान निर्धारण अधिकारी या 1[संयुक्त आयुक्त (अपील) या आयुक्त (अपील)] का यह समाधान हो जाता है कि किसी रजिस्ट्रीकृत फर्म के लाभ, भागीदारों के ऐसे अंशों के अनुसार वितरित किए जाने से अन्यथा वितरित किए गए हैं जैसे कि भागीदार की उस लिखत में दर्शित हैं जिसके आधार पर फर्म की इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्री की गई है, और यह कि किसी भागीदार ने विवरणी में अपनी आय को उसकी वास्तविक रकम से कम दर्शित किया है, तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा भागीदार उसके द्वारा संदेय कर के, यदि कोई हो, अतिरिक्त शास्ति के रूप में उतनी राशि संदत्त करेगा जो कर की उस रकम के डेढ़ गुने से अधिक नहीं है जिसे बचाया गया है या जिसे बचाया गया होता यदि ऐसे भागीदार द्वारा विवरणी में दर्शित आय उसकी सही आय मान ली गई होती; और ऐसे निदेश के कारण कोई प्रतिदाय या अन्य समायोजन किसी अन्य भागीदार द्वारा दावा योग्य नहीं होगा।

(4क) और (4ख)[कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से लोप किया गया। मूल उपधारा (4क) और (4ख) आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1965 द्वारा 12.3.1965 से अंत:स्थापित की गई थीं। बाद में उपधारा (4क) कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित की गई थी।]

(5) इस धारा के उपबंध, जैसा कि वे प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा इसका संशोधन किए जाने के पूर्व थे 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारण को या उसके संबंध में लागू होंगे और इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे तत्समय प्रवृत्त और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू उपंबंधों के प्रति निदेश हैं।

(6) इस धारा में आय के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, आय या अनुषंगी फायदों के प्रति निर्देश है और इस धारा के उपबंध, जहां तक हो सके, अनुषंगी फायदों की बाबत किसी निर्धारण के संबंध में भी लागू होंगे।

(7) इस धारा के उपबंध, 1 अप्रैल, 2017 को या बाद में प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारण को या उसके संबंध में लागू नहीं होंगे।

 

 

 

[वित्त अधिनियम, 2023 द्वारा संशोधित रूप मेंें]

फ़ुटनोट