आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 271

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

धारा

धारा संख्या

271

अध्याय शीर्षक

अध्याय XXI - शास्तियां दंड

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2009

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

29[विवरणियां न देना, सूचनाओं का पालन न करना, आय छिपाना, आदि

30271. (1) यदि इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान 31[निर्धारण] अधिकारी या 32[* * *] 33[आयुक्त (अपील)] 34[या आयुक्त] का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने–

() 35[* * *]

() 36[* * *] 37[धारा 115बघ की उपधारा (2) के अधीन या धारा 115बड़ की उपधारा (2) के अधीन या] धारा 142 की उपधारा (1) या धारा 143 की उपधारा (2) के अधीन सूचना का पालन करने में असफल रहा है 38[या धारा 142 की उपधारा (2क) के अधीन किए गए निदेश का पालन करने में असफल रहा है], अथवा

() अपनी आय39 के विवरण को छिपाया है, या ऐसी आय की 40[* * *] गलत विशिष्टियां दी हैं 41[या]42,

43[() अनुषंगी फायदों की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसे अनुषंगी फायदों की गलत विशिष्टियां दी हैं;]

तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति शास्ति के रूप में निम्नलिखित संदाय करेगा–

(i) 44[* * *]

45[(ii) खंड () में उल्लिखित मामलों में उसके द्वारा 46[संदेय कर के अतिरिक्त यदि कोर्इ हो] ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए 47[दस हजार रुपए की राशि];

48[(iii) खंड () 49[या खंड ()] में उल्लिखित मामलों में उसके द्वारा 50[संदेय कर के अतिरिक्त यदि कोर्इ हो] ऐसी राशि उसकी आय 51[या अनुषंगी फायदों] की विशिष्टियाँ छिपाने या ऐसी आय 51[या अनुषंगी फायदों] के गलत विशिष्टियाँ देने के कारण अपवंचन का प्रयास की जाने वाली कर राशि से कम नहीं होगी, किंतु उसकी 52[तिगुनी] से अधिक नहीं होगी।

53[* * *]

54[स्पष्टीकरण 1.–जहां इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति की कुल आय की संगणना करने के लिए किन्हीं महत्त्वपूर्ण तथ्यों की बाबत–

() ऐसा व्यक्ति स्पष्टीकरण देने में असफल रहता है, या ऐसा स्पष्टीकरण देता है जो 55[निर्धारण] अधिकारी अथवा 56[* * *] 57[आयुक्त (अपील)] 58[या आयुक्त] द्वारा मिथ्या पाया जाता है, या

() ऐसा व्यक्ति, कोर्इ ऐसा स्पष्टीकरण देता है, जिसे वह सिद्ध करने में असमर्थ है 59[और यह साबित करने में असफल रहता है कि ऐसा स्पष्टीकरण सद्भावी है तथा उससे संबंधित और उसकी कुल आय की संगणना करने के लिए सभी महत्त्वपूर्ण तथ्य उसके द्वारा प्रकट किए गए हैं],

वहां उसके परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति की कुल आय की संगणना करने में जोड़ी गर्इ या अनुज्ञात न की गर्इ रकम, इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिये उस आय को उपदर्शित करने वाली समझी जाएगी जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है।

60[* * *]

स्पष्टीकरण 2.–जहां किसी व्यक्ति द्वारा यह दावा किया जाता है कि किसी निर्धारण वर्ष में किसी प्राप्ति, निक्षेप, निर्गम या विनिधान का स्रोत ऐसी रकम है, जो किसी पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए ऐसे व्यक्ति के निर्धारण में आय की संगणना करने में जोड़ी गर्इ है या हानि की संगणना करने में काटी गर्इ है, किंतु जिसकी बाबत इस उपधारा के खंड (iii) के अधीन कोर्इ शास्ति उद्गृहीत नहीं की गर्इ है। वहां, उस वर्ष के ठीक पहले के ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष में जिसमें प्राप्ति, निक्षेप, निर्गम या विनिधान प्रकट होता है ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष को इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष कहा गया है) दर्शित रकम के पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त है, निर्धारिती की ऐसी आय समझी जाएगी जिसके संबंध में प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष का विवरण छिपाया गया है या गलत दिया गया है और जहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गर्इ या काटी गर्इ रकम का वह भाग जो इस प्रकार प्रयुक्त रकम के ऐसे भाग के पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त है, (ऐसी रकम या मूल्य को इसके पश्चात् इस स्पष्टीकरण में अप्रयुक्त रकम कहा गया है) निर्धारिती की वह आय समझा जाएगा जिसके संबंध में प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियाँ दी गर्इ हैं; और जहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गर्इ या काटी गर्इ रकम उपयुक्त रकम को पूरा किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है, वहां प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष में इस प्रकार जोड़ी गर्इ या काटी गर्इ रकम जो प्रयुक्त रकम के ऐसे भाग जो इस प्रकार पूरा नहीं किया गया है को पूरा करने के लिए पर्याप्त है निर्धारिती की आय समझी जाएगी, जिसकी विशिष्टियाँ छिपायी गर्इ हैं या उनके दृष्टिगत गलत विशिष्टियाँ दी गर्इ हैं जो प्रथम पूर्ववर्ती वर्ष के ठीक पहले के वर्ष में प्रस्तुत की गर्इ और यह क्रम इसी प्रकार तब तक चलेगा जब तक संपूर्ण प्रयुक्त रकम ऐसे पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष में जोड़ी या काटी गर्इ रकमों से पूरी नहीं हो जाती है।

61[स्पष्टीकरण 3.–जहां कोर्इ व्यक्ति, 62[* * *], उचित कारण के बिना 1 अप्रैल, 1989 को या उसके पश्चात् प्रारम्भ होने वाले उसी निर्धारण वर्ष के संबंध में अपनी आय की विवरणी जिसे देने के लिए धारा 139 के अधीन इसके लिए आवश्यक है धारा 153 की उपधारा (1) विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर देने में असफल रहा है, और पूर्वोक्त के समाप्त होने तक उसे धारा 142 की उपधारा (1) के खण्ड (i) या धारा 148 के अधीन कोर्इ सूचना जारी नहीं की गर्इ है और निर्धारण अधिकारी या 63[* * *] आयुक्त (अपील) का समाधान हो गया है कि ऐसे निर्धारण वर्ष के संबंध में ऐसे व्यक्ति की कराधेय आय है, वहां इस बात के होते हुए भी कि ऐसा व्यक्ति धारा 148 के अधीन सूचना के अनुसरण में पूर्वोक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किसी समय अपनी आय की विवरणी देता है इस उपधारा के खंड () के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति ने ऐसे निर्धारण वर्ष के संबंध में अपनी आय का विवरण छिपाया है।]

स्पष्टीकरण 4.–इस उपधारा के खंड (iii) के प्रयोजनों के लिए अभीष्ट अपवंचन की राशि पद से–

64[() किसी ऐसे मामले में, जिसमें आय की उस रकम का, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गर्इ हैं, प्रभाव विवरणी में घोषित हानि को कम करना या उस हानि को आय में परिवर्तित करना है, वह कर अभिप्रेत है जो उस आय पर, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गर्इ हैं, प्रभार्य होता यदि ऐसी आय कुल आय होती;]

() ऐसे मामलों में जिसको स्पष्टीकरण 3 लागू होता है, 65[निर्धारित ऐसी कुल आय पर कर, जो अग्रिम कर, स्रोत पर काटे गए कर, स्रोत पर संगृहीत कर और धारा 148 के अधीन सूचना जारी करने से पूर्व संदत्त स्वत:निर्धारण कर से घटाकर आए कर अभिप्रेत हैं];

() किसी अन्य मामले में निर्धारित कुल आय पर कर और उस कर के बीच का अंतर अभिप्रेत है, जो प्रभार्य होता है यदि ऐसी कुल आय में से आय की वह रकम घटा दी जाती जिसके संबंध में विवरण छिपाया गया है, या गलत विवरण दिया गया है।]

66[स्पष्टीकरण 5.–जहां धारा 132 के अधीन 67[1 जून, 2007 के पूर्व आरंभ की गर्इ] तलाशी के दौरान, निर्धारिती के बारे में यह पाया जाता है कि वह किसी धन, सोना, चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज का (जिसे इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् आस्ति कहा गया है) स्वामी है और निर्धारिती यह दावा करता है कि उसने ऐसी आस्तियां–

() ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए जो तलाशी की तारीख से पहले ही समाप्त हो गया है, किंतु ऐसे वर्ष के लिए आय की विवरणी उक्त तारीख से पहले नहीं दी गर्इ है, या जहां ऐसी विवरणी उक्त तारीख से पहले दी गर्इ है, वहां ऐसी आय उसमें घोषित नहीं की गर्इ है; या

() ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए जो तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् समाप्त होना है,

अपनी आय का (पूर्णत: या भागत:) उपयोग करके अर्जित की हैं, वहां इस बात के होते हुए भी कि उसने ऐसी आय तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् दी गर्इ आय की किसी विवरणी में घोषित कर दी है, उसके बारे में इस धारा की उपधारा (1) के खंड () के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण के प्रयोजनों के लिए तब तक यह समझा जाएगा कि उसने अपनी आय का विवरण छिपाया है, या ऐसी आय के गलत विवरण दिए हैं, 68[जब तक कि,–

(1) ऐसी आय या ऐसे संव्यवहार जिनसे ऐसी आय हुर्इ है,–

(i) खंड () के अंतर्गत आने वाले किसी मामले में, तलाशी की तारीख से पहले, और

(ii) खंड () के अंतर्गत आने वाले किसी मामले में, ऐसी तारीख को या उसके पहले,

उसके द्वारा किसी स्रोत से आय के लिए रखी गर्इ लेखा बहियों में, यदि कोर्इ हो, अभिलिखित नहीं किए जाते हैं, या ऐसी आय 69[मुख्य आयुक्त या आयुक्त] को उक्त तारीख से पहले अन्यथा प्रकट नहीं की जाती है ; या

(2) वह तलाशी के दौरान धारा 132 की उपधारा (4) के अधीन यह कथन करता है कि कोर्इ धन, सोना-चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज, जो उसके कब्जे या उसके नियंत्रण में पार्इ गर्इ है, उसने अपनी उस आय से अर्जित की है जो धारा 139 की उपधारा (1) 70[* * *] में विनिर्दिष्ट समय की समाप्ति के पहले दी गर्इ आय की विवरणी में प्रकट नहीं की गर्इ है, और कथन में वह रीति भी बताता है जिससे ऐसी आय हुर्इ है, और ऐसी आय की बाबत कर और साथ ही ब्याज, यदि कोर्इ हो, का संदाय करता है।]

71[स्पष्टीकरण 5क–जहां 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् धारा 132 के अधीन आरंभ की गर्इ किसी तलाशी के दौरान निर्धारिती–

(i) किसी धन, बुलियन, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज का (जिसे इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् आस्तियां कहा गया है) स्वामी होना पाया जाता है और निर्धारिती यह दावा करता है कि ऐसी आस्तियां उसके द्वारा ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए अपनी आय का उपयोग (पूर्णत: या भागत:) करके अर्जित की गर्इ हैं; या

(ii) किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों या संव्यवहारों में किसी प्रविष्टि के आधार पर किसी आय का स्वामी होना पाया जाता है और वह यह दावा करता है कि लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों या संव्यवहारों में ऐसी प्रविष्टि ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए उसकी आय को (पूर्णत: या भागत:) दर्शाती है,

जो तलाशी की तारीख से पूर्व समाप्त हो गया है और,–

(क) जहां ऐसे पूर्ववर्ष के लिए आय की विवरणी उक्त तारीख के पूर्व प्रस्तुत कर दी गर्इ है किन्तु उसमें उस आय को घोषित नहीं किया गया है; या

(ख) ऐसे पूर्ववर्ष के लिए आय की विवरणी फाइल करने के लिए नियत तारीख समाप्त हो गर्इ है किन्तु निर्धारिती ने विवरणी फाइल नहीं की है,

वहां इस बात के होते हुए भी कि ऐसी आय को तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् प्रस्तुत की गर्इ आय की किसी विवरणी में उसके द्वारा घोषित कर दिया गया है, उसके बारे में इस धारा की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि उसने अपनी आय की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसी आय की गलत विशिष्टियां दी हैं]

72[स्पष्टीकरण 6.–जहां धारा 143 की उपधारा (1) के खंड () के परन्तुक के अधीन विवरणी में घोषित आय या हानि और उस धारा के अधीन प्रभारित अतिरिक्त कर में कोर्इ समायोजन किया जाए, वहां इस धारा के उपबंध इस प्रकार किए गए समायोजन को लागू नहीं होंगे।]

73[स्पष्टीकरण 7.–जहां ऐसे निर्धारिती के मामले में जिसने धारा 92ख में परिभाषित अंतर्राष्ट्रीय संव्यवहार किया है धारा 92ग की उपधारा (4) के अधीन कुल आय की संगणना करते समय कोर्इ रकम जोड़ी जाए या अननुज्ञात की जाए, वहां इस उपधारा के खंड (ग) के प्रयोजनों के लिए इस प्रकार जोड़ी गर्इ या अननुज्ञात की गर्इ रकम, के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी आय के रूप में है जिसकी बाबत विवरण छिपाया गया है, या गलत विवरण दिया गया है, जब तक कि निर्धारिती निर्धारण अधिकारी या आयुक्त (अपील) 74[या आयुक्त] के समाधानप्रद रूप में यह साबित न कर दे कि ऐसे संव्यवहार में प्रभारित या संदत्त कीमत की संगणना धारा 92ग के उपबंधों के अनुसार और उस धारा में विहित रीति से सद्भावपूर्वक और सम्यक तत्परता से की गर्इ थी।

75[(1क) जहां उपधारा (1) के स्पष्टीकरण 2 के आधार पर कोर्इ शास्ति अधिरोपणीय है, वहां इस बात के होते हुए भी कि इस अधिनियम के अधीन वे कार्यवाहियां जिनके दौरान ऐसी शास्ति की कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन शुरू की जा सकती थीं, पूरी हो गर्इ हैं, ऐसी शास्ति के अधिरोपण के लिए कार्यवाहियां शुरू की जा सकती हैं।]

75क[(1ख) जहां निर्धारण या पुन: निर्धारण के किसी आदेश में किसी निर्धारिती की कुल आय या हानि की संगणना करने में कोर्इ रकम जोड़ी जाती है या अननुज्ञात की जाती है और उक्त आदेश में उपधारा (1) के खंड () के अधीन शास्ति की कार्यवाहियां आरंभ किए जाने का निदेश है, वहां निर्धारण या पुन: निर्धारण के ऐसे आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि उससे उक्त खंड () के अधीन शास्ति की कार्यवाहियां आरंभ किए जाने के लिए निर्धारण अधिकारी का समाधान गठित होता है।]

(2) जब शास्ति का दायी व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत फर्म या ऐसी अरजिस्ट्रीकृत फर्म है जिसका धारा 183 के खंड () के अधीन निर्धारण किया गया है, तब इस अधिनियम के अन्य उपबंधों में की किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन अधिरोपणीय शास्ति उतनी रकम होगी जितनी उस फर्म पर अधिरोपणीय होती यदि वह फर्म रजिस्ट्रीकृत फर्म होती।

(3)76[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया]

(4) यदि इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान 77[निर्धारण] अधिकारी या 78[* * *] 79[आयुक्त (अपील)] का यह समाधान हो जाता है कि किसी रजिस्ट्रीकृत फर्म के लाभ, भागीदारों के ऐसे अंशों के अनुसार वितरित किए जाने से अन्यथा वितरित किए गए हैं जैसे कि भागीदार की उस लिखत में दर्शित हैं जिसके आधार पर फर्म की इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्री की गर्इ है, और यह कि किसी भागीदार ने विवरणी में अपनी आय को उसकी वास्तविक रकम से कम दर्शित किया है, तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा भागीदार उसके द्वारा संदेय कर के, यदि कोर्इ हो, अतिरिक्त शास्ति के रूप में उतनी राशि संदत्त करेगा जो कर की उस रकम के डेढ़ गुने से अधिक नहीं है जिसे बचाया गया है या जिसे बचाया गया होता यदि ऐसे भागीदार द्वारा विवरणी में दर्शित आय उसकी सही आय मान ली गर्इ होती; और ऐसे निदेश के कारण कोर्इ प्रतिदाय या अन्य समायोजन किसी अन्य भागीदार द्वारा दावा योग्य नहीं होगा।]

(4क) और (4ख) [कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से लोप किया गया। मूल उपधारा (4क) और (4ख) आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1965 द्वारा 12.3.1965 से अंत:स्थापित की गर्इ थीं। बाद में उपधारा (4क) कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित की गर्इ थी।]

80[(5) इस धारा के उपबंध, जैसा कि वे प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा इसका संशोधन किए जाने के पूर्व थे 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारण को या उसके संबंध में लागू होंगे और इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे तत्समय प्रवृत्त और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू उपंबंधों के प्रति निदेश हैं।]

81[(6) इस धारा में आय के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, आय या अनुषंगी फायदों के प्रति निर्देश है और इस धारा के उपबंध, जहां तक हो सके, अनुषंगी फायदों की बाबत किसी निर्धारण के संबंध में भी लागू होंगे।]

 

29. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अपने मूल पाठ के रूप में पुन:स्थापित।

30. तारीख 23.12.1967 को हुर्इ डी.टी.ए.सी. की 10वीं बैठक के कार्यवृत्त के सुसंगत अंश एवं 1965 का परिपत्र सं. 17घ भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।

31. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

32. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से "उपायुक्त (अपील) या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व, "उपायुक्त (अपील)" शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से 'सहायक आयुक्त (अपील)' के स्थान पर रखे गए थे और "या" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित किया गया था।

33. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित।

34. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से अंत:स्थापित।

35. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड () वित्त अधिनियम, 1963 द्वारा 28.4.1963 से और कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से संशोधित किया गया था।

36. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से "युक्तियुक्त कारण के बिना" शब्दों का लोप किया गया।

37. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

38. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

39. "अपनी आय" और "ऐसी आय. . . गलत विवरण दिए हैं" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

40. वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से 'सोच समझकर' शब्दों का लोप किया गया।

41. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

42. "अपनी आय," "विवरण को छिपाया है... या गलत विशिष्टियां दी हैं" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

43. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

44. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया। लोप से पूर्व खंड (i) प्रत्यक्ष कर (संशोधन) अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से और कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित किया गया था।

45. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित।

46. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से "संदेय किसी कर के अतिरिक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

47. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से "ऐसी राशि, जो ऐसी हर असफलता के लिये एक हजार रुपए से कम नहीं होगी, किंतु जो पच्चीस हजार रुपए तक की हो सकेगी" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

48. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से प्रतिस्थापित। मूल खंड (iii) वित्त अधिनियम, 1968 द्वारा 1.4.1968 से प्रतिस्थापित किया गया था।

49. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

50. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से "संदेय किसी कर के अतिरिक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

51. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

52. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "दुगुनी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

53. यथोक्त द्वारा लोप किया गया।

54. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से स्पष्टीकरण के स्थान पर प्रतिस्थापित। मूल स्पष्टीकरण वित्त अधिनियम, 1964 द्वारा 1.4.1964 से अंत:स्थापित किया गया था।

55. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

56. शब्दों का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से "उपायुक्त (अपील) या" लोप किया गया। इससे पूर्व "उपायुक्त (अपील)" शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "सहायक आयुक्त (अपील)" शब्दों के स्थान पर रखे गए थे और "या" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित किया गया था।

57. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित।

58. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से अंत:स्थापित।

59. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से अंत:स्थापित।

60. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से परन्तुक का लोप किया गया।

61. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व स्पष्टीकरण 3 वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से संशोधित किया गया था।

62. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से "जो इस अधिनियम के अधीन पहले निर्धारित नहीं किया गया है" शब्दों का लोप किया गया।

63. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से "उपायुक्त (अपील) या" शब्दों का लोप किया गया।

64. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, खंड(क) इस प्रकार था :

"() किसी ऐसे मामले में जिसमें आय की वह रकम जिसके संबंध में विवरण छिपाया है या गलत विवरण दिया गया है, निर्धारित कुल आय से अधिक है, वह कर अभिप्रेत है, जो उस आय-कर जिसके संबंध में विवरण छिपाया है, या गलत विवरण दिया गया है, प्रभार्य होता यदि ऐसी आय कुल आय होती;"

65. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.4.2003 से भूतलक्षी प्रभाव से "निर्धारित कुल आय पर कर अभिप्रत है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

66. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से अंत:स्थापित।

67. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से अंत:स्थापित।

68. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 10.9.1986 से प्रतिस्थापित।

69. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आयुक्त" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

70. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से "के खंड () या खंड ()" शब्दों का लोप किया गया।

71. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.6.2007 से भूतलक्षी प्रभाव से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से यथा अंत:स्थापित स्पष्टीकरण 5क इस प्रकार था :

"स्पष्टीकरण 5क–जहां धारा 132 के अधीन 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् आरंभ की गर्इ तलाशी के अनुक्रम में,–

(i) निर्धारिती के बारे में यह पाया जाता है कि वह किसी धन, सोना-चांदी, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु या चीज का (जिसे इस स्पष्टीकरण में इसके पश्चात् आस्तियां कहा गया है) स्वामी है और निर्धारिती यह दावा करता है कि ऐसी आस्तियां उसके द्वारा ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए अपनी आय का उपयोग (पूर्णत: या भागत:) करके अर्जित की गर्इ है; या

(ii) निर्धारिती के बारे में यह पाया जाता है कि वह किन्हीं लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों या संव्यवहारों में किसी प्रविष्टि के आधार पर किसी आय का स्वामी है और वह यह दावा करता है कि लेखाबहियों या अन्य दस्तावेजों या अन्य संव्यवहारों में ऐसी प्रविष्टि में ऐसे किसी पूर्ववर्ष के लिए उसकी आय (पूर्णत: या भागत:) को दिखाया गया है,

जो तलाशी की तारीख से पूर्व समाप्त हो गया है और ऐसे वर्ष के लिए आय की विवरणी फाइल करने के लिए नियत तारीख समाप्त हो गर्इ है तथा निर्धारिती ने विवरणी फाइल नहीं की है, वहां इस बात के होते हुए कि उसने ऐसी आय की तलाशी की तारीख को या उसके पश्चात् दी गर्इ आय की किसी विवरणी में घोषित कर दी है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने इस धारा की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन किसी शास्ति के अधिरोपण के प्रयोजनों के लिए अपनी आय की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसी आय की गलत विशिष्टियां दी हैं।"

72. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

73. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित।

74. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से अंत:स्थापित।

75. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

75क. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

76. लोप से पूर्व, उपधारा (3) कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से संशोधित की गर्इ थी।

77. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

78. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से "उपायुक्त (अपील) या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पहले "उपायुक्त (अपील)" शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "सहायक आयुक्त (अपील)" के स्थान पर रखे गए थे और "या" शब्द वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित किया गया था।

79. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 10.7.1978 से अंत:स्थापित।

80. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

81. वित्त अधिनियम, 2005 द्वारा 1.4.2006 से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा संशोधित रूप में]

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