आपत्तियों की सुनवाई
आक्षेपों की सुनवार्इ
269च. (1) सक्षम प्राधिकारी इस अध्याय के अधीन किसी स्थावर सम्पत्ति के अर्जन के विरुद्ध धारा 269ड़ के अधीन किए गए आक्षेपों की सुनवार्इ के लिए दिन और स्थान नियत करेगा और उसकी सूचना ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को देगा जिसने ऐसा आक्षेप किया है :
परन्तु ऐसी सूचना ऐसी सम्पत्ति के अंतरिती को भी दी जाएगी भले ही उसने कोर्इ आक्षेप न भी किया हो।
(2) प्रत्येक व्यक्ति को, जिसको उपधारा (1) के अधीन सूचना दी गर्इ है, आक्षेपों की सुनवार्इ में सुने जाने का अधिकार होगा।
(3) सक्षम प्राधिकारी को समय-समय पर आक्षेपों की सुनवार्इ स्थगित करने की शक्ति होगी।
(4) सक्षम प्राधिकारी, आक्षेपों का निपटारा करने के पहले, ऐसी और जांच कर सकता है, जो वह ठीक समझे।
(5) सक्षम प्राधिकारी का सुने गए आक्षेपों के बारे में विनिश्चय लिखित रूप में होगा और वह प्रत्येक आक्षेप की बाबत विनिश्चय के कारण बताएगा।
(6) यदि आक्षेपों को, यदि कोर्इ हो, सुनने के पश्चात् और लेखबद्ध सभी सुसंगत सामग्री पर विचार करने के पश्चात् समक्ष प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि–
(क) वह स्थावर सम्पत्ति जिससे कार्यवाहियां संबंधित हैं, 76[एक लाख] रुपए से अधिक उचित बाजार मूल्य की है,
(ख) ऐसी सम्पत्ति का उचित बाजार मूल्य उसके प्रकट प्रतिफल और ऐसे प्रकट प्रतिफल के पंद्रह प्रतिशत से अधिक है, और
(ग) पक्षकारों के बीच करार पाए गए ऐसे अन्तरण के लिए प्रतिफल का अन्तरण-लिखित में सत्य कथन इस उद्देश्य से नहीं किया गया है, जो धारा 269ग की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में उल्लिखित है,
वहां वह आयुक्त का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् इस अध्याय के अधीन सम्पत्ति के अर्जन के लिए आदेश कर सकता है।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा में किसी सक्षम प्राधिकारी के संबंध में ''आयुक्त'' से वह आयुक्त अभिप्रेत है, जिसे बोर्ड लिखित रूप में इस निमित्त साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे।
(7) यदि सक्षम प्राधिकारी का उपधारा (6) में यथा उपबंधित के बारे में समाधान नहीं होता है, तो वह लिखित आदेश द्वारा यह घोषित करेगा कि इस अध्याय के अधीन सम्पत्ति का अर्जन नहीं किया जाएगा।
(8) सक्षम प्राधिकारी, यथास्थिति, उपधारा (6) या उपधारा (7) के अधीन अपने आदेश की एक प्रति अन्तरक पर और अन्तरिती पर और ऐसे प्रत्येक व्यक्ति पर तामील कराएगा जिसने ऐसे अर्जन के विरुद्ध धारा 269ड़ के अधीन आक्षेप किए हैं।
(9) इस अध्याय के अधीन किसी स्थावर सम्पत्ति की बाबत कार्यवाहियों में इस आधार पर कोर्इ आक्षेप ग्रहण नहीं किया जाएगा कि यद्यपि सम्पत्ति के लिए प्रकट प्रतिफल अन्तरण-लिखत के निष्पादन की तारीख को 77[या जहां ऐसी सम्पत्ति धारा 269क के खंड (ड़) के उपखंड (iii) में निर्दिष्ट प्रकृति की है, वहां अन्तरण की तारीख को] सम्पत्ति के उचित बाजार मूल्य से कम है तो भी, पक्षकारों के बीच करार पाए गए प्रतिफल का अन्तरण-लिखत में सत्य कथन किया गया है, क्योंकि ऐसा प्रतिफल 78[सम्पत्ति का अंतरण करने के करार के पूरा होने की तारीख को संपत्ति की उस कीमत को ध्यान में रखते हुए करार किया गया था जो ऐसी संपत्ति के खुले बाजार में अन्तरण पर] सामान्यतया प्राप्त होती उस दशा के सिवाय जहां ऐसा करार रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्टर किया गया है।
76. वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.6.1984 से ''पच्चीस हजार'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
77. आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1981 द्वारा 1.7.1982 से अंत:स्थापित।
78. आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1981 द्वारा 1.7.1982 से "संपत्ति का विक्रय करने के करार के पूरा होने की तारीख को संपत्ति की उस कीमत को ध्यान में रखते हुए करार किया गया था जो ऐसी संपत्ति के खुले बाजार में विक्रय पर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

