आवेदन प्राप्त होने पर प्रक्रिया
आवेदन की प्राप्ति पर प्रक्रिया
245द. (1) आवेदन की प्राप्ति पर प्राधिकरण उसकी एक प्रति आयुक्त को अग्रेषित कराएगा और यदि आवश्यक हो तो उससे सुसंगत अभिलेख मांगेगा :
परन्तु जहां कोर्इ अभिलेख, प्राधिकरण द्वारा किसी मामले में मंगाए जाते हैं, वहां ऐसे अभिलेख, यथासंभव शीघ्र आयुक्त को लौटा दिए जाएंगे।
(2) प्राधिकरण, आवेदन और मांगे गए अभिलेखों की परीक्षा करने के पश्चात् आदेश द्वारा आवेदन को या तो मंजूर कर सकेगा या नामंजूर कर सकेगा :
12[परन्तु प्राधिकरण, आवेदन वहां मंजूर नहीं करेगा जहां आवेदन में उठाया गया प्रश्न–
(i) किसी आय-कर प्राधिकारी, अपील अधिकरण या किसी न्यायालय के समक्ष पहले से ही लंबित है [धारा 245ढ की खंड (ख) के उपखंड (iii) के अंतर्गत आने वाले निवासी आवेदक के मामले के सिवाय];
(ii) किसी संपत्ति का उचित बाजार मूल्य तय करने के बारे में है;
(iii) किसी ऐसे संव्यवहार या मुद्दे से संबंधित है जो प्रथमदृष्टया आय-कर से बचने के लिए परिकल्पित है [धारा 245ढ के खंड (ख) के उपखंड (iii) में आने वाले निवासी आवेदक के मामले के सिवाय :]
परन्तु यह और कि कोर्इ आवेदन इस उपधारा के अधीन तब तक नामंजूर नहीं किया जाएगा जब तक आवेदक को सुनवार्इ का अवसर न दे दिया गया हो :
परन्तु यह भी कि जहां आवेदन नामंजूर किया जाता है वहां ऐसे नामंजूर किए जाने के कारण आदेश में दिए जाएंगे।
(3) उपधारा (2) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति आवेदक को और आयुक्त को भेजी जाएगी।
(4) जहां उपधारा (2) के अधीन कोर्इ आवेदन मंजूर किया जाता है, वहां प्राधिकरण, ऐसी और सामग्री की परीक्षा करने के पश्चात जो आवेदक द्वारा उसके समक्ष रखी जाए या प्राधिकरण द्वारा अभिप्राप्त की जाए, आवेदन में विनिर्दिष्ट किए गए प्रश्न पर अपना अग्रिम विनिर्णय सुनाएगा।
(5) आवेदक से प्राप्त किसी अनुरोध पर, प्राधिकरण अपना अग्रिम विनिर्णय सुनाने के पूर्व आवेदक को स्वयं या सम्यक् रूप से प्राधिकृत प्रतिनिधि की मार्फत सुनवार्इ का अवसर देगा।
स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए "प्राधिकृत प्रतिनिधि" का वही अर्थ है जो धारा 288 की उपधारा (2) में उसका है, मानो आवेदक, निर्धारिती हो।
(6) प्राधिकरण, आवेदन की प्राप्ति के छह मास के भीतर, लिखित रूप में, अपना अग्रिम विनिर्णय सुनाएगा।
(7) प्राधिकरण द्वारा सुनाए गए अग्रिम विनिर्णय की एक प्रति, जो सदस्यों द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित और विहित रीति13 से प्रमाणित हो, ऐसे सुनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र आवेदक को और आयुक्त को भेजी जाएगी।
12. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.6.2000 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व परन्तुक, जो वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.10.1998 से संशोधित किया गया था, इस प्रकार था :
"परन्तु प्राधिकरण आवेदन को, सिवाय निवासी आवेदक के मामले के मंजूर नहीं करेगा जहां आवेदन में उठाया गया प्रश्न–
(क) आय-कर प्राधिकारी, अपील अधिकरण या किसी न्यायालय के समक्ष आवेदक के मामले में पहले से लंबित है;
(ख) किसी संपत्ति की उचित बाजार मूल्य तय करने के बारे में है;
(ग) ऐसे संव्यवहार के बारे में है जो प्रथमदृष्टया आय-कर से बचने के लिए परिकल्पित है :"
13. प्राधिकरण द्वारा घोषित अग्रिम विनिर्णयों की प्रतिलिपियों के प्रमाणन के लिए देखिए नियम 44च.
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

