मृत्यु पर से अन्यथा कारबार का उत्तराधिकार
च–कारबार या वृत्ति का उत्तराधिकार
मृत्यु पर से अन्यथा कारबार का उत्तराधिकार
170. (1) जहां किसी व्यक्ति का (ऐसा व्यक्ति इसके पश्चात् इस धारा में पूर्वाधिकारी के रूप में निर्दिष्ट है) जो कोर्इ कारबार या वृत्ति चलाता है, उसमें उत्तराधिकार ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा (जो उसके पश्चात् इस धारा में उत्तराधिकारी के रूप में निर्दिष्ट है) ग्रहण किया जाता है जो उस कारबार या वृत्ति को चलाता रहता है, वहां–
(क) पूर्वाधिकारी, पूर्ववर्ष की, जिसमें उत्तराधिकार हुआ है, उत्तराधिकार की तारीख तक आय की बाबत निर्धारित किया जाएगा;
(ख) उत्तराधिकारी उत्तराधिकार की तारीख के पश्चात् पूर्ववर्ष की आय की बाबत निर्धारित किया जाएगा।
(2) उपधारा (1) में की किसी बात के होते हुए भी, जब पूर्वाधिकारी नहीं पाया जा सकता है, तब पूर्ववर्ष की, जिसमें उत्तराधिकार हुआ, की आय का निर्धारण उत्तराधिकार की तारीख तक और उस वर्ष से पहले की पूर्ववर्ष की आय का निर्धारण उत्तराधिकारी पर उसी रीति में और उसी सीमा तक किया जाएगा जिसमें और जिस तक वह पूर्वाधिकारी पर किया जाता है और इस अधिनियम के सब उपबंध, यावत्शक्य, तदनुसार लागू होंगे।
(3) जब ऐसे पूर्ववर्ष के लिए, जिसमें उत्तराधिकार हुआ, उत्तराधिकार की तारीख तक या उस वर्ष से पहले के पूर्ववर्ष के लिए, ऐसे कारबार या वृत्ति की आय की बाबत इस धारा के अंतर्गत संदेय कोर्इ राशि, जो पूर्वाधिकारी पर निर्धारित है, उससे वसूल नहीं की जा सकती है तब 42[निर्धारण] अधिकारी इस प्रभाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और पूर्वाधिकारी द्वारा संदेय राशि तत्पश्चात् उत्तराधिकारी द्वारा संदेय और वसूल की जा सकेगी और उत्तराधिकारी इस प्रकार संदत्त किसी राशि को पूर्वाधिकारी से वसूल करने का हकदार होगा।
(4) जहां किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब द्वारा चलाया जा रहा कोर्इ कारबार या वृत्ति उत्तराधिकार में जाती है और उत्तराधिकार के साथ ही या उत्तराधिकार के बाद सदस्यों या सदस्यों के समूह में अविभक्त कुटुम्ब संपत्ति का विभाजन हुआ है, वहां उत्तराधिकार में इस कारबार या वृत्ति की उत्तराधिकार की तारीख तक की आय की बाबत देय कर, धारा 171 में उपबंधित रीति में किन्तु इस धारा के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निर्धारित और वसूल किया जाएगा।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए "आय" के अंतर्गत कोर्इ ऐसा अभिलाभ भी सम्मिलित है जो उत्तराधिकार के फलस्वरूप कारबार या वृत्ति के, किसी भी रीति में, अंतरण से प्रोद्भूत होता है।
42. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2013 द्वारा संशोधित रूप में]

