आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 158खचक

कुछ मामलों में ब्याज और शास्ति का उद्ग्रहण

धारा

धारा संख्या

158खचक

अध्याय शीर्षक

अध्याय XIVख - खोज मामलों के मूल्यांकन के लिए विशेष प्रक्रिया

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2021

कुछ मामलों में ब्याज और शास्ति का उद्ग्रहण

कुछ मामलों में ब्याज और शास्ति का उद्ग्रहण

कुछ मामलों में ब्याज और शास्ति का उद्ग्रहण

158खचक. (1) जहां 1 जनवरी, 1997 को या उसके पश्चात्, धारा 132 के अधीन आरंभ की गर्इ तलाशी या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षित लेखा बहियों, या अन्य दस्तावेजों या किन्हीं आस्तियों की बाबत समूह अवधि की अप्रकट आय सहित कुल आय की विवरणी, जो धारा 158खग के खंड ()के अधीन नोटिस द्वारा अपेक्षित की जाए, ऐसे नोटिस में विनिर्दिष्ट अवधि के बाद दी जाती है या दी नहीं जाती है, वहां निर्धारिती, नोटिस में विनिर्दिष्ट समय बीतने के ठीक बाद के दिन प्रारंभ होने वाली और–

() जहां विवरणी उपरोक्त समय बीतने के बाद दी जाए, वहां विवरणी देने की तारीख को समाप्त होने वाली; या

() जहां कोर्इ विवरणी नहीं दी गर्इ है, वहां धारा 158खग के खंड () के अधीन निर्धारण पूरा होने की तारीख को समाप्त होने वाली,

अवधि के हर मास या मास के भाग के लिए धारा 158खग के खंड () के अधीन अवधारित अप्रकट आय पर कर के एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज देने का दायी होगा।

(2) निर्धारण अधिकारी या आयुक्त (अपील), इस अध्याय के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान, यह निर्देश दे सकेगा कि कोर्इ व्यक्ति शास्ति के रूप में ऐसी राशि का संदाय करेगा जो लिए जाने वाले (उद्गृहीत) कर की रकम से कम नहीं होगी किंतु जो धारा 158खग के खंड () के अधीन निर्धारण अधिकारी द्वारा अवधारित अप्रकट आय की बाबत इस प्रकार लगार्इ जाने वाली कर-राशि की तिगुनी से अधिक नहीं होगी :

परन्तु शास्ति अधिरोपित करने वाला आदेश किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में नहीं किया जाएगा यदि–

(i) ऐसे व्यक्ति ने धारा 158खग के खंड () के अधीन विवरणी दे दी है;

(ii) ऐसी विवरणी के आधार पर देय कर का संदाय कर दिया गया है अथवा यदि अभिगृहीत आस्तियों में धन शामिल है, तो निर्धारिती ने इस प्रकार अभिगृहीत धन को संदेय कर में समायोजित किए जाने की पेशकश की है;

(iii) संदत्त कर का साक्ष्य विवरणी के साथ दे दिया जाता है; और

(iv) विवरणी में दर्शाए गए आय के उस भाग के निर्धारण के विरुद्ध कोर्इ अपील दाखिल नहीं की गर्इ है :

परन्तु यह और कि पूर्व परन्तुक के उपबंध वहां लागू नहीं होंगे जहां निर्धारण अधिकारी द्वारा अवधारित अप्रकट आय विवरणी में दिखार्इ गर्इ आय से अधिक है और ऐसे मामलों में अवधारित अप्रकट आय के उस भाग पर शास्ति लगार्इ जाएगी जो विवरणी में दिखार्इ गर्इ अप्रकट आय की राशि से अधिक है।

(3) उपधारा (2) के अधीन शास्ति अधिरोपित करने वाला कोर्इ आदेश,–

() तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि निर्धारिती को सुने जाने का उचित मौका न दे दिया जाए;

() यथास्थिति, सहायक आयुक्त या उपायुक्त या सहायक निदेशक या उपनिदेशक द्वारा नहीं किया जाएगा, जहां शास्ति की राशि यथास्थिति, संयुक्त आयुक्त या संयुक्त निदेशक, के पूर्व अनुमोदन के सिवाय बीस हजार रुपए से अधिक है;

() ऐसे मामले में नहीं किया जाएगा जिसमें निर्धारण धारा 246 या धारा 246क के अधीन आयुक्त (अपील) से अपील या धारा 253 के अधीन अपील अधिकरण से अपील की विषयवस्तु हो, उस वित्तीय वर्ष के जिसमें वे कार्यवाहियां, जिनके दौरान शास्ति अधिरोपित करने की कार्रवार्इ आरंभ की गर्इ हो, पूरी हो जाएं या उस मास के अंत से छह मास, जिसमें यथास्थिति, आयुक्त (अपील) या अपील अधिकरण का आदेश प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त किया जाए, बीतने के बाद इनमें से जो भी अवधि बाद में समाप्त हो;

() ऐसे मामले में नहीं किया जाएगा जिसमें निर्धारण धारा 263 के अधीन पुनरीक्षण की विषयवस्तु हो, उस मास के अंत से छह मास बीतने पर जिसमें पुनरीक्षण का ऐसा आदेश पारित किया जाता है;

() खंड() और () में वर्णित मामलों से भिन्न किसी मामले में नहीं किया जाएगा उस वित्तीय वर्ष, जिसमें वे कार्यवाहियां जिनके दौरान शास्ति अधिरोपित करने की कार्रवार्इ चालू की गर्इ है, पूरी हो जाएं, अथवा उस मास के अंत से छह मास बीतने पर, जिसमें शास्ति अधिरोपित करने की कार्रवार्इ आरंभ की जाए, इनमें से जो भी बाद में समाप्त हो;

() धारा 132 के अधीन 30 जून, 1995 के पश्चात् किन्तु 1 जनवरी, 1997 के पूर्व आरंभ की गर्इ तलाशी या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षित लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों या किन्हीं आस्तियों की बाबत नहीं किया जाएगा।

स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनार्थ परिसीमा-काल की गणना करते समय–

(i) धारा 129 के परन्तुक के अधीन निर्धारिती को पुन: सुने जाने का अवसर देने में लिया गया समय;

(ii) वह अवधि जिसके दौरान धारा 245ज के अधीन दी गर्इ उन्मुक्ति प्रवृत्त रही; और

(iii) वह अवधि जिसके दौरान उपधारा (2) के अधीन कार्यवाहियां किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश द्वारा रोक दी जाएं,

अपवर्जित कर दी जाएगी।

(4) आय-कर प्राधिकारी उपधारा (2) के अधीन शास्ति अधिरोपित करने संबंधी आदेश करने पर जब तक कि वह स्वयं निर्धारण अधिकारी न हो, ऐसे आदेश की प्रति निर्धारण अधिकारी के पास तुरंत भेजेगा।

 

 

 

[वित्त अधिनियम, 2021 द्वारा संशोधित रूप में]

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