आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 155

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धारा

धारा संख्या

155

अध्याय शीर्षक

अध्याय XIV - मूल्यांकन के लिए प्रक्रिया

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2005

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155. (1) 91[जहां 1 अप्रैल, 1992 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्ववर्ती निर्धारण वर्ष के लिए किसी फर्म में किसी भागीदारी के किसी संपूरित निर्धारण91क की बाबत–]

() फर्म के निर्धारण या पुन: निर्धारण पर; या

() इस धारा, धारा 154, धारा 250, धारा 254, धारा 260, धारा 262, धारा 263 या धारा 264 के अधीन फर्म की आय को घटाए या बढ़ाए जाने पर; 92[या]

93[() फर्म द्वारा किए गए आवेदन पर धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन पारित किसी आदेश पर,]

यह पाया जाता है कि फर्म की आय में भागीदार का अंश भागीदार के निर्धारण में सम्मिलित नहीं किया गया है या यदि सम्मिलित किया गया है तो सही नहीं है, वहां 94[निर्धारण] अधिकारी, यथास्थिति, निर्धारण में अंश सम्मिलित किए जाने या इसे ठीक किए जाने की दृष्टि से भागीदार के निर्धारण आदेश को संशोधित कर सकेगा और इसको धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि की गणना, 95[उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें उस फर्म की दशा में अंतिम आदेश पारित किया गया था, अंत से] की जाएगी।

96[(1क) जहां किसी फर्म के किसी संपूरित निर्धारण की बाबत–

() फर्म के निर्धारण या पुन: निर्धारण पर, या

() इस धारा, धारा 154, धारा 250, धारा 254, धारा 260, धारा 262, धारा 263 या धारा 264 के अधीन फर्म की आय घटाए या बढ़ाए जाने पर, या

() फर्म द्वारा किए गए आवेदन पर धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन पारित किसी आदेश पर,]

यह पाया जाता है कि किसी भागीदार का कोर्इ पारिश्रमिक धारा 40 के खंड () के अधीन कटौती योग्य नहीं है, वहां निर्धारण अधिकारी उस रकम की उस सीमा तक जो उस प्रकार कटौती योग्य नहीं है, भागीदार की आय का समायोजन करने की दृष्टि से भागीदार के निर्धारण आदेश का संशोधन कर सकेगा और उसको धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि की गणना उस वित्तीय वर्ष के जिसमें उस फर्म की दशा में अंतिम आदेश पारित किया गया था अंत से की जाएगी।

(2) जहां व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय के सदस्य के किसी संपूरित निर्धारण की बाबत,

() संगम या निकाय के निर्धारण या पुन: निर्धारण पर, या

() इस धारा, धारा 154, धारा 250, धारा 254, धारा 260, धारा 262, धारा 263 या धारा 264 के अधीन संगम या निकाय की आय को घटाए या बढ़ाए जाने पर; 97[या]

97[() संगम या निकाय द्वारा किए गए आवेदन पर धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन पारित किसी आदेश पर,]

यह पाया जाता है कि, यथास्थिति, संगम या निकाय की आय में सदस्य का अंश सदस्य के कर निर्धारण में सम्मिलित नहीं किया गया है या यदि सम्मिलित किया गया है तो सही नहीं है, वहां 98[निर्धारण] अधिकारी, यथास्थिति, निर्धारण में अंश को सम्मिलित करने या सही करने की दृष्टि से, सदस्य के निर्धारण के आदेश को संशोधित कर सकेगा और उसको धारा 154 के उपबंध जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना 99[उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें, यथास्थिति, उस संगम या निकाय की दशा में अंतिम आदेश पारित किया गया था, अंत से] की जाएगी।

(3) 1[* * *]

(4) जहां धारा 147 के अधीन आरम्भ की गर्इ कार्यवाहियों के फलस्वरूप हानि या अवक्षयण पुन: संगणित किया गया है और परिणामस्वरूप यह आवश्यक हो गया है कि उत्तरवर्ती वर्ष या वर्षों के लिए, जिनको कि हानि या अवक्षयण मोक की धारा 72 की उपधारा (1) या धारा 73 की उपधारा (2) या धारा 74 की उपधारा (1) 2[या उपधारा (3)], 3[या धारा 74क की उपधारा (3)] के उपबंधों के अधीन अग्रनीत या मुजरा किया गया है निर्धारिती की कुल आय के पुन: संगणित किया जाए, वहां 4[निर्धारण] अधिकारी ऐसे वर्ष या वर्षों की बाबत कुल आय की पुन: संगणना करने की कार्यवाही कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और उसकी धारा 154 के उपबंध जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना धारा 147 के अधीन 5[उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें आदेश पारित किया गया था, अंत से] की जाएगी।

6[(4क) जहां धारा 32क के अधीन किसी निर्धारण वर्ष में किसी पोत या विमान अथवा किसी मशीनरी या संयंत्र की बाबत पूर्णत: या भागत: निर्धारिती को विनिधान मोक के रूप में मोक दिया गया है और तत्पश्चात् –

() उस पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें पोत या वायुयान अर्जित किया गया था या मशीनरी या संयंत्र अधिष्ठापित किया गया था, आठ वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय उस पोत, वायुयान, मशीनरी या संयंत्र का विक्रय या अन्यथा अंतरण निर्धारिती द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को जो सरकार, स्थानीय प्राधिकारी, किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित निगम या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित 7सरकारी कंपनी से भिन्न है अथवा धारा 32क की उपधारा (6) या उपधारा (7) में निर्दिष्ट किसी समामेलन या उत्तरवर्तन के संबंध में किया जाता है; या

() उस पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें पोत या वायुयान अर्जित किया गया था या मशीनरी या संयंत्र अधिष्ठापित किया गया था, दस वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय, निर्धारिती धारा 32क की उपधारा (4) के अधीन रिजर्व खाते में जमा रकम का उपयोग उपक्रम के कारबार के प्रयोजनों के लिए नए पोत या नए वायुयान या (धारा 32क की उपधारा (1) के 8[दूसरे] परन्तुक के खंड (), () और () में निर्दिष्ट प्रकृति की मशीनरी या संयंत्र से भिन्न) नर्इ मशीनरी या संयंत्र के अर्जन के प्रयोजनों के लिए नहीं करता है; या

() खंड () में निर्दिष्ट दस वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय निर्धारिती धारा 32क की उपधारा (4) के अधीन रिजर्व खाते में जमा की गर्इ रकम का उपयोग–

(i) लाभांशों या लाभों के रूप में वितरण के लिए करता है; या

(ii) लाभों के रूप में भारत के बाहर प्रेषण के लिए या भारत के बाहर किसी आस्ति बनाने के लिए करता है; या

(iii) किसी ऐसे अन्य प्रयोजन के लिए करता है जो उपक्रम के कारबार का प्रयोजन नहीं है,

वहां प्रारम्भ में अनुज्ञात विनिधान मोक गलत रूप में अनुज्ञात किया गया समझा जाएगा और 9[निर्धारण] अधिकारी, इस अधिनियम में कि किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती कुल आय पुन: संगणित कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और उसको धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, लागू होंगे तथा उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि की गणना –

(i) खंड () में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के अंत से की जाएगी, जिसमें विक्रय या अन्य अंतरण हुआ था;

(ii) खंड () में निर्दिष्ट दशा में, उस खण्ड में निर्दिष्ट दस वर्ष के अंत से की जाएगी;

(iii) खंड () में निर्दिष्ट दशा में, उस पूर्ववर्ष के अंत से की जाएगी जिसमें रकम का उपयोग किया गया था।

स्पष्टीकरण–खंड () के प्रयोजनों के लिए ''नया पोत'' या नया वायुयान या ''नर्इ मशीनरी या संयंत्र'' का वही अर्थ है जो 10[धारा 32क की उपधारा (2) के नीचे के स्पष्टीकरण] में है।

(5) जहां उपधारा 33 के अधीन या भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) के तत्समान उपबंधों के अधीन किसी निर्धारण वर्ष में, 31 दिसंबर, 1957 के पश्चात् अधिष्ठापित संयंत्र, मशीनरी या पोत की बाबत पूर्णत: या भागत: निर्धारिती को विकास रिबेट के रूप में मोक दिया गया है और तत्पश्चात्,–

(i) उस पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें पोत अर्जित किया गया था या मशीनरी या संयंत्र अधिष्ठापित किया गया था आठ वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय, उस पोत, मशीनरी या संयंत्र का विक्रय या अन्यथा अन्तरण11 निर्धारिती द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को जो सरकार, स्थानीय प्राधिकारी, किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित निगम या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कंपनी12 से भिन्न, अथवा धारा 33 की उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी समामेलन या उत्तरवर्तन के संबंध में किया जाता है; या

(ii) धारा 34 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट आठ वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय निर्धारिती उस उपधारा के खंड () के अधीन रिजर्व खाते में जमा की गर्इ रकम या उपयोग–

() लाभांशों या लाभों के रूप में वितरण के लिए करता है; या

() लाभों के रूप में भारत के बाहर प्रेषण के लिए या भारत के बाहर कोर्इ आस्ति बनाने के लिए करता है; या

() किसी ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए करता है, जो उपक्रम के कारबार का प्रयोजन नहीं हैं,

वहां प्रारम्भ में अनुज्ञात विकास रिबेट गलत रूप में अनुज्ञात किया गया समझा जाएगा और 13[निर्धारण] अधिकारी इस अधिनियम में की किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय पुन: संगणित कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा और उसको धारा 154 के उपबंध जहां तक हो सके लागू होंगे, और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना उस पूर्ववर्ष के, जिसमें वह विक्रय या अंतरण हुआ था, या धन का इस प्रकार उपयोग किया गया था, अंत से की जाएगी।

14[(5क) जहां धारा 33क के अधीन किसी निर्धारण वर्ष में किसी क्षेत्र में रोपण खर्च की बाबत पूर्णत: या भागत: निर्धारिती को विकास मोक के रूप में मोक दिया गया है और तत्पश्चात्–

(i) उस पूर्ववर्ष के अंत से जिसमें, ऐसा मोक आठ वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय दिया गया था, उस भूमि का विक्रय या अन्यथा अन्तरण निर्धारिती द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को जो सरकार, स्थानीय प्राधिकारी, किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित निगम या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कंपनी15 से भिन्न है, अथवा धारा 33क की उपधारा (5) या उपधारा (6) में निर्दिष्ट किसी समामेलन या उत्तरवर्तन के संबंध में किया जाता है; या

(ii) धारा 33क की उपधारा (3) में निर्दिष्ट आठ वर्ष की समाप्ति से पूर्व किसी समय निर्धारिती उस उपधारा के खंड (ii) के अधीन रिजर्व खाते में जमा की गर्इ रकम का उपयोग–

() लाभांशों या लाभों के रूप में वितरण के लिए करता है; या

() लाभों के रूप में भारत के बाहर प्रेषण के लिए या भारत के बाहर कोर्इ आस्ति बनाने के लिए करता है; या

() किसी ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए करता है, जो उपक्रम के कारबार का प्रयोजन नहीं हैं,

वहां प्रारम्भ में अनुज्ञात विकास मोक गलत रूप में अनुज्ञात किया गया समझा जाएगा और 16[निर्धारण] अधिकारी इस अधिनियम में की किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय पुन: संगणित कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और धारा 154 के उपबंध जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चालू वर्ष की कालावधि की गणना, उस पूर्ववर्ष के, जिसमें वह विक्रय या अंतरण हुआ था या धन का इस प्रकार उपयोग किया गया था, के अंत से की जाएगी।]

17[स्पष्टीकरण.–इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, जहां कोर्इ निर्धारिती, जिसका किसी भूमि पर पट्टाधृति या अधिभोग का अन्य अधिकार है, ऐसा अधिकार अंतरित करता है, वहां यह समझा जाएगा कि उसने ऐसी भूमि का विक्रय या अन्यथा अन्तरण किया है।]

18[(5ख) जहां धारा 35 की उपधारा (2ख) के अधीन किसी निर्धारण वर्ष में वैज्ञानिक अनुसंधान पर किसी व्यय की बाबत कोर्इ कटौती की गर्इ है और निर्धारिती कार्यक्रम पूरा किए जाने के लिए अनुज्ञात अवधि की समाप्ति के एक वर्ष के भीतर विहित प्राधिकारी से प्राप्त प्रमाणपत्र देने में असफल रहता है, वहां प्रारम्भ में अनुज्ञात कटौती जो वास्तव में उपगत व्यय के आधिक्य में है, गलत रूप में अनुज्ञात की गर्इ समझी जाएगी और 19[निर्धारण] अधिकारी इस अधिनियम में की किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय पुन: संगणित कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और उसकी धारा 154 के उपबंध जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना उस पूर्ववर्ष के जिसमें विहित प्राधिकारी द्वारा कार्यक्रम के पूरा किए जाने के लिए अनुज्ञात अवधि समाप्त हुर्इ थी, अन्त से की जाएगी।

(6) 20[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(7) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के फलस्वरूप, किसी वर्ष के लिए किसी ऐसी कंपनी के निर्धारण में, जिसके मामले में धारा 104 के अधीन आदेश उस वर्ष के लिए दे दिया गया है, यह आवश्यक है कि उस कंपनी की वितरण योग्य आय पुन: संगणित की जाए, वहां 21[निर्धारण] अधिकारी वितरण योग्य आय को पुन: संगणित करने की कार्यवाही कर सकेगा और ऐसी पुन: संगणना के आधार पर संदेय 22[कर] अवधारित कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और उसको धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, लागू होंगे और उस उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना, उस कार्यवाही के संबंध में 23[उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें उस कंपनी के मामले में अंतिम आदेश पारित किया गया था, अंत से] की जाएगी।]

(7क) 24[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

25[(7ख) जहां किसी वर्ष के लिए निर्धारण में, किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से उद्भूत पूंजी अभिलाभ, धारा 47 के, यथास्थिति, खंड (iv) या खंड (v) के उपबंधों के आधार पर धारा 45 के अधीन प्रभारित नहीं किया जाता हैं, किंतु जो धारा 47क के अधीन ऐसे पूर्ववर्ष के ''पूंजी अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय के रूप में समझा जाता है, जिसमें ऐसा अन्तरण–

(i) ऐसी अंतरिती कंपनी द्वारा ऐसी पूंजी आस्ति के उसके द्वारा अपने कारबार के व्यापार स्टाक में संपरिवर्तित किए जाने या उसके द्वारा उस रूप में माने जाने के कारण; या

(ii) यथास्थिति, मूल कंपनी या उसके नामनिर्देशितियों अथवा नियंत्री कंपनी द्वारा समनुषंगी कंपनी की संपूर्ण शेयर पूंजी धारण करना छोड़ देने के कारण,

ऐसे अंतरण की तारीख से आठ वर्ष की अवधि की समाप्ति से पहले किसी भी समय किया गया था, वहां 26[निर्धारण] अधिकारी इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए अंतरक कंपनी की कुल आय की पुन: संगणना कर सकेगा और उसमें आवश्यक संशोधन कर सकेगा; और उसकी धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसे लागू होंगे तथा उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि उस पूर्ववर्ष के अंत से गिनी जाएगी जिसमें पूंजी आस्ति इस प्रकार परिवर्तित की गर्इ थी या मानी गर्इ थी अथवा जिसमें, यथास्थिति, मूल कंपनी या उसके नामनिर्देशितियों अथवा नियंत्री कंपनी ने समनुषंगी कंपनी की संपूर्ण शेयर पूंजी धारण करना छोड़ दिया है।]

(8) 27[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(8क) 28[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(9) 29[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(9क) 30[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(10) 31[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

32[(10क) जहां किसी वर्ष के लिए निर्धारण में 33[दीर्घकालिक पूंजी आस्ति ] के अंतरण से उद्भूत होने वाले पूंजी अभिलाभ पर कर प्रभारित किया जाता है और ऐसे अंतरण की तारीख के पश्चात् छह मास की अवधि के भीतर निर्धारिती ने धारा 54ड़ की उपधारा (1) के स्पष्टीकरण 1 के अंतर्गत किसी विनिर्दिष्ट आस्ति में विनिधान या निक्षेप किया है, वहां 34[निर्धारण] अधिकारी निर्धारण आदेश को इस प्रकार संशोधित करेगा ताकि धारा 54ड़ 35[की उपधारा (1)] के उपबंधों के अधीन कर के लिए प्रभारित न होने वाले पूंजी अभिलाभ की रकम अपवर्जित की जा सके; और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, इसे लागू होंगे और इस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि की 36[गणना उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें निर्धारण किया गया था, अंत से की जाएगी]।]

(10ख) 37[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

(10ग) 38[प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से लोप किया गया।]

39[(11) जहां किसी वर्ष के लिए निर्धारण में, ऐसी किसी मूल आस्ति को जो धारा 54ज में निर्दिष्ट है, अंतरण से उद्भूत होने वाला पूंजी अभिलाभ, कर से प्रभार्य है और उस धारा के अधीन बढ़ार्इ गर्इ अवधि के भीतर निर्धारिती, उस धारा में निर्दिष्ट नर्इ आस्ति अर्जित करता है, या इस प्रकार बढ़ार्इ गर्इ अवधि के भीतर ऐसे पूंजी अभिलाभ की रकम का निक्षेप या विनिधान, जो भी हो, करता है, वहां निर्धारण अधिकारी आदेश का संशोधन करेगा जिससे कि धारा 54ज में निर्दिष्ट धाराओं में से किसी के अधीन कर से न प्रभार्य पूंजी अभिलाभ की रकम अलग की जा सके; और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसे लागू होंगे तथा धारा 154 की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की अवधि की गणना उस पूर्ववर्ष के, जिसमें निर्धारिती द्वारा प्रतिकर प्राप्त किया गया था, अंत से की जाएगी।]

40[(12) जहां 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व प्रारंभ होने वाले किसी वर्ष के लिए निर्धारण में किसी आय की बाबत, जो धारा 80ण में निर्दिष्ट स्वामिस्व, कमीशन, फीस या किसी वैसे ही संदाय के रूप में संपूर्ण आय है, या उसका कोर्इ भाग है, उस धारा के अधीन कटौती इस धारा पर अनुज्ञात नहीं की गर्इ है कि ऐसी आय भारत में, संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में प्राप्त नहीं की गर्इ है, अथवा भारत के बाहर संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में प्राप्त की जाने पर भारत के बाहर संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में संपरिवर्तित की जाने पर निर्धारिती द्वारा या उसकी ओर से विदेशी मुद्रा में संदाय और संव्यवहार के विनियमन के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार भारत में नहीं लार्इ गर्इ है तथा तत्पश्चात् ऐसी आय या उसका कोर्इ भाग पूर्वोक्त रीति से भारत में प्राप्त किया गया है, या प्राप्त किया जाता है अथवा लाया गया है या लाया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी निर्धारण आदेश का संशोधन करेगा जिसमें कि, ऐसी आय या उसके किसी भाग की बाबत जो भारत में इस प्रकार प्राप्त किया जाता है या लाया जाता है, धारा 80ण के अधीन कटौती अनुज्ञात की जा सके; और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसे लागू होंगे तथा उस धारा की उपधारा (7) में दी गर्इ चार वर्ष की अवधि की गणना उस पूर्ववर्ष के, जिसमें ऐसी आय भारत में इस प्रकार प्राप्त की जाती है, या लार्इ जाती है अंत से की जाएगी; तथापि, चार वर्ष की अवधि की संगणना करते समय 1 अप्रैल, 1988 से 30 सितम्बर, 1991 तक की अवधि छोड़ दी जाएगी।]

41[(13) जहां किसी वर्ष के निर्धारण में, धारा 80जजख या धारा 80जजग या धारा 80जजघ या धारा 80जजड़ या धारा 80ण या धारा 80द या धारा 80दद या धारा 80ददक के अधीन कटौती इस आधार पर अनुज्ञात नहीं की गर्इ कि ऐसी भारत में संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में प्राप्त नहीं की गर्इ है अथवा भारत के बाहर संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में प्राप्त करने पर अथवा भारत के बाहर संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में संपरिवर्तित किए जाने पर ऐसी आय भारतीय रिज़र्व बैंक या ऐसे अन्य प्राधिकारी के अनुमोदन से, जो विदेशी मुद्रा में संदायों और संव्यवहारों को विनियमित करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्राधिकृत है, निर्धारिती द्वारा या उसकी ओर से, भारत में नहीं लार्इ गर्इ है और बाद में ऐसी आय या उसका कोर्इ भाग उपरोक्त रीति से भारत में प्राप्त किया गया है या प्राप्त किया जाता है या लाया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी निर्धारण आदेश में संशोधन करेगा ताकि ऐसी आय उसके भाग की बाबत जो भारत में प्राप्त किया जाए या लाया जाए, यथास्थिति, धारा 80जजख या धारा 80जजग या धारा 80जजघ या धारा 80जजड़ या धारा 80ण या धारा 80द या धारा 80दद या धारा 80ददक, के अधीन कटौती अनुज्ञात की जा सके; और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसके संबंध में लागू होंगे और चार वर्ष की अवधि उस पूर्ववर्ष के अंत से गिनी जाएगी जिसमें ऐसी आय भारत में प्राप्त हो या लार्इ जाए।]

42[(14) जहां किसी पूर्ववर्ष के लिए निर्धारण में या किसी पूर्ववर्ष के लिए धारा 143 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना या समझी गर्इ सूचना में, धारा 199 के उपबंधों के अनुसार कटौती किए गए कर के लिए क्रेडिट इस आधार पर नहीं दिया गया है कि धारा 203 के अधीन दिया गया प्रमाणपत्र विवरणी के साथ फाइल नहीं किया गया था और तत्पश्चात् ऐसा प्रमाणपत्र निर्धारण अधिकारी के समक्ष उस निर्धारण वर्ष के अंत से, जिसमें ऐसी आय निर्धारणीय है, दो वर्ष के भीतर पेश कर दिया जाता हैं, वहां निर्धारण अधिकारी, यथास्थिति, निर्धारण आदेश या धारा 143 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना या समझी गर्इ सूचना को संशोधित करेगा और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसको लागू होंगे :

परंतु इस उपधारा की कोर्इ बात तब तक लागू नहीं होगी जब तक उस आय को, जिससे कर की कटौती की गर्इ है, सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती द्वारा फाइल की गर्इ आय बही विवरणी में प्रकट न कर दी जाए।

(15) जहां किसी वर्ष के लिए निर्धारण में, किसी पूंजी आस्ति के, जो भूमि या भवन या दोनों है, अंतरण से होने वाले पूंजी अभिलाभ की संगणना, धारा 50ग की उपधारा (1) के अनुसार स्टाम्प शुल्क का संदाय करने के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार के किसी प्राधिकारी द्वारा अपनाए जाने वाले या निर्धारित किए जाने वाले मूल्य के रूप में अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत होने वाले प्रतिफल के पूर्ण मूल्य को लेकर की जाती है और बाद में, उस धारा की उपधारा (2) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट किसी अपील या पुनरीक्षण या निर्देश में ऐसा मूल्य पुनरीक्षित किया जाता है, वहां निर्धारण अधिकारी, निर्धारण के आदेश को संशोधित करेगा, जिससे कि ऐसी अपील या पुनरीक्षण या निर्देश में इस प्रकार पुनरीक्षित मूल्य के रूप में प्रतिफल के पूर्ण मूल्य को लेकर पूंजी अभिलाभ की संगणना की जा सके; और धारा 154 के उपबंध, जहां तक संभव हो, उसको लागू होंगे तथा चार वर्ष की अवधि की गणना उस पूर्व वर्ष की समाप्ति से की जाएगी, जिसमें मूल्य का पुनरीक्षण करने संबंधी आदेश उस अपील या पुनरीक्षण या निर्देश में पारित किया गया था।]

42क[(16) जहां किसी वर्ष से संबंधित निर्धारण में, किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से, जो किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में अंतरण है या ऐसा अंतरण है जिसके लिए प्रतिफल केंद्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अवधारित या अनुमोदित किया गया था, प्रोद्भूत पूंजी अभिलाभ की संगणना आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप प्राप्त या उद्भूत हुए समझे जाने वाले प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के रूप में, यथास्थिति, धारा 45 की उपधारा (5) के खंड () में निर्दिष्ट प्रतिकर या प्रतिफल को या खंड (ख) में निर्दिष्ट वर्धित या अतिरिक्त वर्धित प्रतिकर या प्रतिफल के मूल्य को लेकर की जाती है और बाद में उस प्रतिकर या प्रतिफल को किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा कम कर दिया जाता है वहां निर्धारण अधिकारी निर्धारण को आदेश को संशोधित करेगा जिससे कि उस न्यायालय, अधिकरण या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा इस प्रकार कम किए गए प्रतिकर या प्रतिफल को प्रतिफल के पूर्ण मूल्य के रूप में लेकर पूंजी अभिलाभ की संगणना की जा सके और धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सके, उसको लागू होंगे तथा चार वर्ष की अवधि की संगणना उस पूर्ववर्ष के अंत से, की जाएगी जिसमें कि प्रतिकर को कम करने वाला आदेश न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया था।

(17) जहां किसी निर्धारण वर्ष में किसी निर्धारिती को किसी पेटेंट की बाबत धारा 80ददख के अधीन कोर्इ कटौती अनुज्ञात की गर्इ है और बाद में पेटेंट अधिनियम, 1970 (1970 का 39) के अधीन नियंत्रक या उच्च नयायालय के आदेश द्वारा,–

(i) पेटेंट प्रतिसंहृत किया गया था, या

(ii) निर्धारिती के नाम को उस पेटेंट की बाबत पेटेंटधारी के रूप में पेटेंट रजिस्टर से निकाल दिया गया था,

वहां उस अवधि के लिए, जिसके दौरान पेटेंट प्रतिसंहृत कर दिया गया था या उस अवधि के लिए जिसके लिए निर्धारिती का नाम उस पेटेंट की बाबत पेटेंटधारी के रूप में निकाल दिया गया था, स्वामिस्व के रूप में होने वाली आय से कटौती गलत तौर पर अनुज्ञात की गर्इ समझी जाएगी और निर्धारण अधिकारी, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कुल आय की पुन:संगणना कर सकेगा और आवश्यक संशोधन कर सकेगा, तथा धारा 154 के उपबंध, जहां तक हो सकें उसको लागू होंगे उस धारा की उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट चार वर्ष की कालावधि की गणना उस पूर्ववर्ष के, अंत से की जाएगी जिसमें पेटेंट अधिनियम, 1970 (1970 का 39) की, यथास्थिति, धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट नियंत्रक या उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट उच्च न्यायालय का ऐसा आदेश पारित किया गया था।]

43[स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–

() ''अतिरिक्त प्रतिकर'' का वही अर्थ होगा जो धारा 54 की उपधारा (2) के स्पष्टीकरण के खंड (1) में है;

() ऐसी किसी पूंजी आस्ति के संबंध में जिसके लिए प्रतिफल केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अवधारित या अनुमोदित किया जाता है ''अतिरिक्त प्रतिफल'' से अभिप्रेत है, किसी न्यायालय, अभिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ऐसे अंतरण के लिए वर्धित प्रतिफल की रकम और प्रतिफल की रकम के बीच अंतर जो तब संदेय होता जब ऐसी वृद्धि न की गर्इ होती।]

 

91. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से ''जहां किसी फर्म में किसी भागीदार के किसी संपूरित निर्धारण की बाबत'' के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व इस पद का प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा उसी तारीख से संशोधन किया गया था।

91क. "संपूरित निर्धारण" पद के अर्थ के लिए, देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.

92. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से अंत:स्थापित।

93. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।

94. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

95. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से "उस तारीख से जिसमें उस फर्म की दशा में अंतिम आदेश पारित किया गया था" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

96. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से अंत:स्थापित।

97. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से अंत:स्थापित।

98. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से "आय-कर" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

99. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से "उस तारीख से, जिसमें यथास्थिति उस संगम या निकाय की दशा में अंतिम आदेश पारित किया गया था" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

1. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया।

2. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित।

3. वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1975 से अंत:स्थापित।

4. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

5. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से "उस तारीख से, जिसको आदेश पारित किया गया था" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

6. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित।

7. ''सरकारी कंपनी'' की परिभाषा के लिए, देखिए पूर्व पृष्ठ 1.25 पर पाद टिप्पण 57.

8. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।

9. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

10. कराधान विधि (संशोधन और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1988 से ''धारा 32 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

11. ''अन्यथा अंतरण'' पद के अर्थ के लिए, देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.

12. ''सरकारी कंपनी'' की परिभाषा के लिए, देखिये पूर्व पृष्ठ 1.25 पर पाद टिप्पण 57.

13. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

14. वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से अंत:स्थापित।

15. ''सरकारी कंपनी'' की परिभाषा के लिए, देखिये पूर्व पृष्ठ 1.25 पर पाद टिप्पण 57.

16. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

17. वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1965 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

18. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से पुन: पुर:स्थापित। इससे पहले प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1992 से इसका लोप किया गया था। मूल उपधारा (5) वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1981 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।

19. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से 'आय-कर' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

20. लोप से पहले उपधारा (6) प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से यथा संशोधित की गयी थी।

21. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

22. वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से 'अधिकर' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

23. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से ''उस तारीख से, जिसमें उस कंपनी के मामले में अंतिम आदेश पारित किया गया था'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

24. लोप से पहले उपधारा (7क) वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से यथा अंत:स्थापित और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से यथा संशोधित की गयी थी।

25. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से अंत:स्थापित।

26. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''आय-कर'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

27. लोप से पहले उपधारा (8) वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव में अन्त:स्थापित की गर्इ थी और वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से, वित्त अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से, वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

28. लोप से पहले उपधारा (8क) वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित की गर्इ थी और वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से, वित्त अधिनियम, 1986 द्वारा 1.4.1987 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

29. लोप से पहले उपधारा (9) वित्त अधिनियम, 1973 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

30. लोप से पहले उपधारा (9क) वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित की गर्इ थी और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

31. लोप से पहले उपधारा (10) वित्त अधिनियम, 1973 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

32. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से अंत:स्थापित।

33. वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से ''पूंजी आस्ति, जो अल्पकालिक पूंजी आस्ति न हो'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

34. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से 'आय-कर' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

35. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

36. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से ''गणना निर्धारण की तारीख से की जाएगी'' शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

37. लोप से पहले उपधारा (10ख) वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1978 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी।

38. लोप से पहले धारा (10ग) वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से तथा प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1987 से संशोधित की गर्इ थी।

39. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से अंत:स्थापित। इससे पहले उपधारा (11) का वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से लोप किया गया था। मूल उपधारा वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।

40. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से अंत:स्थापित। इससे पहले उपधारा (12) का वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से लोप किया गया था। मूल उपधारा वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1974 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।

41. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से अंत:स्थापित। इससे पहले मूल उपधारा (13) वित्त अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1975 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और बाद में इसका प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से लोप कर दिया गया था।

42. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से उपधारा (14) और (15) अंत:स्थापित।

42क. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.4.2004 से उपधारा (16) और (17) अंत:स्थापित।

43. वित्त अधिनियम, 1978 द्वारा 1.4.1974 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

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