आकलन/कर निर्धारण
92143. 93[(1) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना के उत्तर में कोर्इ विवरणी दी गर्इ है, वहां–
(i) यदि यह पाया जाता है कि स्वत: निर्धारण पर स्रोत पर काटे गए किसी कर, दिए गए किसी अग्रिम कर, संदत्त किसी कर तथा कर या ब्याज के रूप में अन्यथा संदत्त किसी रकम के समायोजन के पश्चात् ऐसी विवरणी के आधार पर कोर्इ कर या ब्याज शोध्य है, तो उपधारा (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना94, इस प्रकार संदेय राशि को बताते हुए सूचना निर्धारिती को भेजी जाएगी और ऐसी सूचना धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझी जाएगी और तदनुसार इस अधिनियम के सभी उपबंध लागू होंगे; और
(ii) यदि किसी विवरणी के आधार पर कोर्इ प्रतिदाय शोध्य है, तो उसे निर्धारिती को अनुदत्त किया जाएगा और इस आशय की संसूचना, निर्धारिती को दी जाएगी :
परन्तु इस उपधारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, विवरणी की अभिस्वीकृति इस उपधारा के अधीन वहां से संसूचना समझी जाएगी जहां निर्धारिती द्वारा या तो कोर्इ राशि संदेय नहीं है, या उसे कोर्इ प्रतिदेय शोध्य नहीं है :
परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन कोर्इ संसूचना 95[उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति से एक वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी, जिसमें विवरणी दी जाती है :]
96[परन्तु यह भी कि जहां विवरणी 1 अप्रैल, 1999 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष में पहली बार निर्धारणीय आय की बाबत दी जाती है वहां ऐसी संसूचना 31 मार्च, 2002 तक किसी भी समय भेजी जा सकेगी।]
(1क) 97[वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया।]
(1ख) 98[वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया।]
99[(2) जहां विवरणी धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना के जवाब में दी गर्इ है, वहां निर्धारण अधिकारी,–
(i) जहां उसका यह विश्वास करने का कारण है कि विवरणी में दी गर्इ किसी हानि, छूट, कटौती, मोक या अनुतोष का कोर्इ दावा अनुज्ञेय नहीं है, वहां वह निर्धारिती को एक सूचना तामील करेगा जिसमें हानि, छूट, कटौती, मोक या अनुतोष के ऐसे दावे की विशिष्टियां विनिर्दिष्ट की जाएंगी और उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट की जाने वाली किसी तारीख को उसमें विनिर्दिष्ट कोर्इ साक्ष्य या विशिष्टियां, जिन पर निर्धारिती अपने दावे के समर्थन में निर्भर करता है, पेश करे या करवाए :
99क[परन्तु इस खंड के अधीन कोर्इ सूचना 1 जून, 2003 को या उसके पश्चात् निर्धारिती पर तामील नहीं की जाएगी;]
(ii) खंड (i) में किसी बात के होते हुए भी, यदि वह यह सुनिश्चित करना आवश्यक या समीचीन समझता है कि निर्धारिती ने कम आय का विवरण नहीं दिया है या आधिक्य हानि संगणित नहीं की है या किसी रीति में कम दर संदत्त नहीं किया है, तो वह निर्धारिती को एक सूचना तामिल करेगा जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उसमें विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख को उसके कार्यालय में या तो उपर्स्थित हो या वह ऐसे साक्ष्य को, जिस पर निर्धारिती उस विवरणी के समर्थन में निर्भर करता है, वहां पेश करे या करवाए :
परन्तु यह कि 99ख[खंड (ii)] के अधीन निर्धारिती पर किसी सूचना की तामील उस मास के अंत से, जिसमें विवरणी पेश की जाती है, बारह मास के अवसान के पश्चात् नहीं की जाएगी।]
1[(3) ऐसी सूचना में,–
(i) जो उपधारा (2) के खंड (i) के अधीन जारी की गर्इ है, विनिर्दिष्ट दिन को या ऐसे साक्ष्य की सुनवार्इ को यथाशक्य पश्चात् और ऐसी विशिष्टियों को ध्यान में रखते हुए, जिन्हें निर्धारिती पेश करे, निर्धारण अधिकारी, लिखित आदेश द्वारा, ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट दावे या दावों को मंजूर या नामंजूर करेगा और तदनुसार कुल आय या हानि का अवधारण करते हुए निर्धारण करेगा, और ऐसे निर्धारण के आधार पर निर्धारिती द्वारा संदेय राशि का अवधारण करेगा;
(ii) जो उपधारा (2) के खंड (ii) के अधीन जारी की गर्इ है, अथवा विनिर्दिष्ट दिन को या ऐसे साक्ष्य की, जिन्हें निर्धारिती पेश करे और ऐसे अन्य साक्ष्य की यथाशक्य पश्चात्, जिसकी निर्धारण अधिकारी विनिर्दिष्ट मुद्दों पर अपेक्षा करे, सुनवार्इ और सभी सुसंगत तथ्यसामग्री को ध्यान में रखने के पश्चात्, जो उसने एकत्रित की है; निर्धारण अधिकारी, लिखित आदेश द्वारा, निर्धारिती की कुल आय या हानि का निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा संदेय राशि या उसको देय किसी रकम के प्रतिदाय की राशि का अवधारण करेगा :]
2[परन्तु यह कि–
(क) धारा 10 के खंड (21) में निर्दिष्ट वैज्ञानिक अनुसंधान संगम की दशा में;
(ख) धारा 10 के खंड (22ख) में निर्दिष्ट समाचार एजेंसी की दशा में;
(ग) धारा 10 के खंड (23क) में निर्दिष्ट संगम या संस्था की दशा में;
(घ) धारा 10 के खंड (23ख) में निर्दिष्ट संस्था की दशा में;
(ड़) धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) में निर्दिष्ट निधि या संस्था या उपखंड (v) में निर्दिष्ट न्यास या संस्था या उपखंड (vi) में निर्दिष्ट कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट कोर्इ अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्थान की दशा में,
जिससे धारा 139 की उपधारा (4ग) के अधीन आय की विवरणी प्रस्तुत करने की अपेक्षा की गर्इ है, ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम, समाचार एजेंसी, संगम या संस्था या निधि या न्यास या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था की कुल आय या हानि के निर्धारण करने का कोर्इ आदेश निर्धारण अधिकारी द्वारा धारा 10 के उपबंधों को प्रभावी किए बिना, तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि–
(i) निर्धारण अधिकारी ने, जहां उसकी राय में ऐसा उल्लंघन हुआ है, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी को, ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम, समाचार एजेंसी, संगम या संस्था या निधि या न्यास या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था द्वारा, धारा 10 के यथास्थिति, खंड (21) या खंड (22ख) या खंड (23क) या खंड (23ख) या खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के उपबंधों का उल्लंघन होने की सूचना न दी हो; और
(ii) ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम या अन्य संगम या संस्था या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था को प्रदत्त अनुमोदन वापस न ले लिया गया हो या ऐसी समाचार एजेंसी या निधि या न्यास या संस्था की बाबत जारी की गर्इ अधिसूचना का विखंडन न कर दिया गया हो।]
3[(4) जहां इस धारा की उपधारा (3) या धारा 144 के अधीन नियमित निर्धारण किया जाता है, वहां,–
(क) उपधारा (1) के अधीन निर्धारिती द्वारा संदत्त कोर्इ कर या ब्याज ऐसे नियमित निर्धारण के मद्दे दिया गया समझा जाएगा;
(ख) यदि नियमित निर्धारण पर कोर्इ प्रतिदाय शोध्य नहीं है, या उपधारा (1) के अधीन लौटार्इ गर्इ रकम नियमित निर्धारण पर प्रतिदेय रकम से अधिक है, तो इस प्रकार लौटार्इ गर्इ संपूर्ण या अधिक रकम निर्धारिती द्वारा संदेय कर समझी जाएगी, और इस अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे।
(5) 4[वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया।]]
5[* * *]
90. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। धारा 143, जो कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित की गर्इ थी और बाद में वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1975 से, वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1980 से और वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से संशोधित की गर्इ थी, इस प्रकार थी :
"143. निर्धारण–(1)(क) जहां धारा 139 के अधीन विवरणी दी गर्इ है वहां निर्धारण अधिकारी, निर्धारिती की उपस्थिति या विवरणी की पुष्टि में कोर्इ साक्ष्य पेश करने की अपेक्षा किए बिना, विवरणी और उसके साथ संलग्न लेखाओं और दस्तावेजों, यदि कोर्इ हैं, के संदर्भ में खंड (ख) के उपखंड (iv) में उल्लिखित समायोजनों के प्रयोजनों के लिए, और पिछले वर्षों के निर्धारण अभिलेखों के संदर्भ में भी, यदि कोर्इ है, विवरणी में घोषित आय या हानि में ऐसे समायोजन करने के पश्चात्, जो खंड (ख) के अधीन किए जाने अपेक्षित हैं, निर्धारिती की कुल आय या हानि निर्धारित कर सकेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर निर्धारिती द्वारा संदेय या उसे वापस संदेय राशि तय कर सकेगा।
(ख) खंड (क) के अधीन निर्धारिती की कुल आय या हानि का निर्धारण करते समय निर्धारण अधिकारी विवरणी में घोषित आय या हानि में निम्नलिखित समायोजन करेगा, अर्थात्, वह–
(i) खंड (क) में उल्लिखित विवरणी, लेखाओं और दस्तावेजों में गणितीय गलती ठीक करेगा;
(ii) [* * *]
(iii) [* * *]
(iv) धारा 32 की उपधारा (2) में उल्लिखित मोक को, धारा 32क की उपधारा (3) के खंड (ii) या धारा 33 की उपधारा (2) के खंड (ii) या धारा 33क की उपधारा (2) के खंड (ii) या धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (i) या धारा 35क की उपधारा (1) या धारा 35घ की उपधारा (1) या धारा 35ड़ की उपधारा (1) या धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (ix) के प्रथम परन्तुक में उल्लिखित कटौती को, धारा 72 की उपधारा (1) या धारा 73 की उपधारा (2) या धारा 74 की उपधारा (1) या उपधारा (3) या धारा 74क की उपधारा (3) के अधीन अग्रनीत कोर्इ हानि और धारा 80ञ की उपधारा (3) में उल्लिखित कमी को, जो इससे पूर्व के निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए नियमित निर्धारण में, यदि कोर्इ है, प्रत्येक मामले में संगणित की जाएं, उचित प्रभावी रूप देगा।
(2) जहां धारा 139 के अधीन विवरणी दी गर्इ है, और–
(क) उपधारा (1) के अधीन निर्धारण किए जाने पर निर्धारिती, ऐसे निर्धारण के परिणामस्वरूप जारी की गर्इ मांग की सूचना की तामील की तारीख से एक मास के भीतर, निर्धारण पर आपत्ति करते हुए, निर्धारण अधिकारी के पास आवेदन करता है, या
(ख) चाहे उपधारा (1) के अधीन निर्धारण किया गया हो या नहीं, निर्धारण अधिकारी निर्धारिती की उपस्थिति और इस बारे में साक्ष्य पेश करने की उपेक्षा करके विवरणी की शुद्धता और पूर्णता को सत्यापित करना आवश्यक या समीचीन समझता है,
वहां निर्धारण अधिकारी निर्धारिती पर सूचना तामील करेगा और उसमें उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट तारीख को या तो निर्धारण अधिकारी के कार्यालय में स्वयं हाजिर हो या कोर्इ साक्ष्य पेश करे या करवाए जिस पर निर्धारिती विवरणी के समर्थन में निर्भर करता हो :
परन्तु यह कि उस दशा में, जहां उपधारा (1) के अधीन निर्धारण किया जा चुका है इस उपधारा के अधीन सूचना वहां के सिवाय जहां ऐसी सूचना खण्ड (क) के अधीन निर्धारिती के आवेदन के अनुसरण में है, निर्धारण अधिकारी द्वारा तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक ऐसी सूचना जारी करने के लिए उपायुक्त का पूर्व अनुमोदन न ले लिया जाए :
परन्तु यह और कि उस दशा में जहां उपधारा (1) के अधीन किए गए निर्धारण पर निर्धारिती ने खण्ड (क) के अधीन आवेदन देकर आपत्ति प्रकट की है, वहां निर्धारिती को इस उपधारा के अधीन निर्धारण के अनुसरण में मांगी गर्इ पूरी या आंशिक कर राशि की बाबत व्यतिक्रमी नहीं समझा जाएगा, जिस पर निर्धारिती ने विवाद किया है, क्योंकि ऐसी रकम उपधारा (1) के खंड (ख) के उपखंड (i) में उल्लिखित किसी समायोजन से संबंधित नहीं है, और इसके अतिरिक्त्त ऐसी विवादित रकम की बाबत धारा 220 की उपधारा (2) के अधीन कोर्इ ब्याज प्रभार्य नहीं होगा।
(3) उपधारा (2) के अधीन जारी की गर्इ सूचना में विनिर्दिष्ट दिन को अथवा ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात्, जो निर्धारिती पेश करे और अन्य ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो निर्धारण अधिकारी विनिर्दिष्ट मुद्दों पर अपेक्षित करे, और एकत्र की गर्इ सभी सुसंगत सामग्री को ध्यान में रखने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र,–
(क) जहां उपधारा (1) के अधीन कोर्इ निर्धारण नहीं किया गया है, वहां निर्धारण अधिकारी, लिखित आदेश द्वारा, निर्धारिती की कुल आय या हानि का निर्धारण कर करेगा, और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा देय या उसे प्रतिदेय राशि अवधारित करेगा।
(ख) जहां उपधारा (1) के अधीन निर्धारण किया गया है, यदि ऐसे निर्धारण पर निर्धारिती द्वारा उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन आवेदन करके आक्षेप किया गया है या निर्धारण अधिकारी की यह राय है कि ऐसा निर्धारण तात्विक रूप से गलत, अपर्याप्त और अधूरा है तो निर्धारण अधिकारी लिखित आदेश द्वारा निर्धारिती की कुल आय या हानि का नए सिरे से निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा संदेय या उसको प्रतिदेय राशि अवधारित करेगा।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–
(1) उपधारा (1) के अधीन निर्धारण तात्विक रूप से गलत अपर्याप्त या अधूरा समझा जाएगा, यदि–
(क) उपधारा (1) के अधीन अवधारित कुल आय की रकम उस कुल आय की रकम से अधिक या कम है, जिस पर इस अधिनियम के अधीन निर्धारिती पर उचित रूप से कर प्रभार्य है; या
(ख) उपधारा (1) के अधीन अवधारित संदेय कर राशि निर्धारिती द्वारा इस अधिनियम के अधीन उचित रूप से संदेय कर राशि से अधिक या कम है; या
(ग) उपधारा (1) के अधीन अवधारित हानि की राशि उचित संगणना पर इस अधिनियम के अधीन अवधारणीय हानि की राशि यदि कोर्इ है, से अधिक या कम है; या
(घ) उपधारा (1) के अधीन अवधारित किसी अवक्षयण मोक, विकास रिबेट या किसी अन्य मोक या कटौती की राशि इस अधिनियम के अधीन उचित रूप से अनुज्ञेय, यथास्थिति, अवक्षयण मोक, विकास रिबेट या अन्य मोक या कटौती की राशि से अधिक या कम है; या
(ड़) उपधारा (1) के अधीन अवधारित वापसी की राशि उचित संगणना पर इस अधिनियम के अधीन शोध्य प्रतिदेय राशि से अधिक या कम है; या
(च) वह हैसियत, जिसमें निर्धारिती का निर्धारण उपधारा (1) के अधीन किया गया है, उस हैसियत से भिन्न है जिसमें निर्धारिती का इस अधिनियम के अधीन उचित रूप से निर्धारणीय है;
(2) निर्धारिती के संबंध में "हैसियत" से एक व्यक्ति, हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब या धारा 2 के खंड (31) में उल्लिखित व्यक्तियों के किसी अन्य प्रवर्ग के रूप में निर्धारिती का वर्गीकरण और जहां निर्धारिती एक फर्म है वहां एक रजिस्टर्ड फर्म या अरजिस्टर्ड फर्म के रूप में उसका वर्गीकरण अभिप्रेत है।"
91. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 के प्रारम्भ से पूर्व यथा विद्यमान धारा 143 के उपबंध, आय-कर (कठिनाइयों का निवारण) आदेश, 1989 के अनुसार 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ हुए निर्धारण वर्ष और उससे पहले के किसी निर्धारण वर्ष के निर्धारण के संबंध में लागू होंगे।
92. परिपत्र सं. 201, तारीख 5.7.1976, अनुदेश सं. 1395, तारीख 15.5.1981 [स्रोत : लोक लेखा समिति की 114वीं रिपोर्ट [1982-83], पृष्ठ 16-17], परिपत्र सं. 230, तारीख 27.10.1977। सी.डी.टी.ए.सी. की तारीख 17.8.1967 को हुर्इ 12वीं बैठक के कार्यवृत के सुसंगत उद्धरण, परिपत्र सं. 1[सी.सं. 9(17)-आर्इटी/50], तारीख 24.4.1950, परिपत्र सं. 18 (XL-37), तारीख 28.4.1955, परिपत्र सं. 125, तारीख 26.11.1973, परिपत्र सं. 36(XL-52), तारीख 19.11.1958, परिपत्र सं. 50(XL-43), तारीख 28.12.1956, पत्र [एफ. सं. 91/41/67/आर्इटीजे(25)], तारीख 3.7.1967, पत्र [एफ. सं. 81/27/65-आर्इ.टी.(बी)], तारीख 18.5.1965, परिपत्र सं. 14(XL-35), तारीख 11.4.1955, परिपत्र सं. 1942 का 3, तारीख 16.1.1942, परिपत्र सं. 601, तारीख 4.6.1991, परिपत्र सं. 689, तारीख 24.8.1994, अनुदेश सं. 1617, तारीख 18.5.1985, अनुदेश सं. 574, तारीख 27.7.1993 और प्रेस विज्ञप्ति तारीख 12.3.1996 भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
93. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से और वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से संशोधित उपधारा (1) निम्न प्रकार थी :
"(1) (क) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना के उत्तर में विवरणी दी गर्इ है वहां–
(i) यदि स्रोत पर किसी कर की कटौती का, संदत्त किसी अग्रिम कर का और कर या ब्याज से अन्यथा संदत्त किसी रकम का समायोजन करने के पश्चात् कोर्इ कर या ब्याज ऐसी विवरणी के आधार पर देय पाया जाता है तो, उपधारा (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस प्रकार संदेय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए निर्धारिती को सूचना भेजी जाएगी और ऐसी सूचना को धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझा जाएगा और इस अधिनियम के सभी उपबंध तदनुसार लागू होंगे; और
(ii) यदि ऐसी विवरणी के आधार पर कोर्इ प्रतिदाय देय है, तो वह निर्धारिती को मंजूर किया जाएगा :
परन्तु निर्धारिती द्वारा संदेय या उसे प्रतिदेय कर या ब्याज की संगणना करने में, विवरणी में घोषित आय या हानि में निम्नलिखित समायोजन किए जाएंगे, अर्थात् :–
(i) विवरणी, उसके साथ के लेखाओं या दस्तावेजों में गणित संबंधी गलतियों को ठीक किया जाएगा;
(ii) किसी अग्रनीत हानि, कटौती, मोक या राहत को, जो ऐसी विवरणी, लेखाओं या दस्तावेजों में उपलब्ध जानकारी के आधार पर, प्रथमदृष्ट्या अनुज्ञेय है किंतु जिसका विवरणी में दावा नहीं किया गया है, अनुज्ञात किया जाएगा;
(iii) किसी अग्रनीत हानि, विवरणी में दावा की गर्इ कटौती, मोक या अनुतोष को, जो ऐसी विवरणी, लेखाओं या दस्तावेजों में उपलब्ध जानकारी के आधार पर, प्रथमदृष्ट्या, अननुज्ञेय है, अनुज्ञात नहीं किया जाएगा।
परन्तु यह और कि निर्धारिती को कोर्इ संसूचना इस बात के होते हुए भी भेजी जाएगी कि पहले परन्तुक के अधीन समायोजन किया गया है या नहीं और चाहे उससे कोर्इ कर या ब्याज शोध्य न हो:
परन्तु यह भी कि इस खंड के अधीन संसूचना उस निर्धारण वर्ष के अंत से जिसमें आय प्रथम बार निर्धारणीय थी, दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी।
(ख) जहां इस धारा की उपधारा (3) या धारा 144 या धारा 147 या धारा 154 या धारा 155 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किए गए किसी आदेश के अथवा धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी ऐसे समझौता आदेश के, जो किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से संबंधित है और खंड (क) में निर्दिष्ट विवरणी के दाखिल किए जाने के पश्चात् पारित किया जाता है, परिणामस्वरूप किसी अग्रनीत हानि, विवरणी में दावा की गर्इ कटौती, मोक या राहत में कोर्इ परिवर्तन होता है, और उसके परिणामस्वरूप–
(i) यदि कोर्इ कर या ब्याज देय पाया जाता है, तो इस प्रकार संदेय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए निर्धारिती को संसूचना भेजी जाएगी और ऐसी संसूचना को धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझा जाएगा और इस अधिनियम के सभी उपबंध तदनुसार लागू होंगे, और
(ii) यदि कोर्इ प्रतिदाय शोध्य है, वह निर्धारिती को मंजूर किया जाएगा :
परन्तु इस खंड के अधीन देय किसी कर या ब्याज की संसूचना उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें कोर्इ ऐसा आदेश पारित किया गया था, अंत से चार वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी।"
(ग) जहां निर्धारिती व्यक्तियों के संगम या व्यष्टि-निकाय का सदस्य है और उपधारा (1) के खंड (क) के पहले परंतुक के अधीन, यथास्थिति संगम या निकाय द्वारा दी गर्इ विवरणी में घोषित आय या हानि में किए गए समायोजनों के परिणामस्वरूप या इस धारा की उपधारा (3) या धारा 144 या धारा 147 या धारा 154 या धारा 155 या धारा 185 की उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (5) या धारा 186 की उपधारा (1) या उपधारा (2) या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किए गए किसी आदेश या धारा 245घ की उपधारा (4) के अधीन किए गए परिनिर्धारण के किसी ऐसे आदेश के, जो खंड (क) में विनिर्दिष्ट विवरणी के फाइल किए जाने के पश्चात् पारित किया गया है, परिणामस्वरूप यथास्थिति संगम या निकाय की आय या हानि में उसके शेयर में या विवरणी में दी गर्इ आय में उसके शेयर के सम्मिलित किए जाने की रीति में कोर्इ फेरफार है; वहां–
(i) यदि कोर्इ कर या ब्याज शोध्य पाया जाता है तो निर्धारिती को एक संसूचना इस प्रकार संदेय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए भेजी जाएगी और ऐसी संसूचना धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझी जाएगी तथा इस अधिनियम के सभी उपबंध तद्नुसार लागू होंगे; और
(ii) यदि कोर्इ प्रतिदाय शोध्य है तो वह निर्धारिती को दिया जाएगा :
परन्तु इस खंड के अधीन शोध्य किसी कर या ब्याज की कोर्इ संसूचना, उस वित्तीय वर्ष के जिसमें कोर्इ ऐसे समायोजन किए गए थे, या कोर्इ ऐसा आदेश पारित किया गया था, अंत से चार वर्ष की समाप्ति के बाद नहीं भेजी जाएगी।"
94. "उपधारा (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना" पद के अर्थ के लिए देखिये टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.
95. वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से "उस निर्धारण वर्ष की समाप्ति से दो वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी जिसमें आय पहली बार निर्धारणीय थी।" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
96. यथोक्त द्वारा तीसरा परन्तुक अंत:स्थापित।
97. लोप से पहले, प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से यथा अंत:स्थापित और बाद में प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से और वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से यथासंशोधित उपधारा (1क) इस प्रकार थी :
"(1क) (क) जहां उपधारा (1) के खंड (क) के पहले परंतुक के अधीन किए गए समायोजनों के परिणामस्वरूप–
(i) किसी व्यक्ति द्वारा विवरणी में घोषित आय बढ़ जाती है; या
(ii) ऐसे व्यक्ति द्वारा विवरणी में घोषित हानि कम हो जाती है या आय में संपरिवर्तित हो जाती है,
वहां निर्धारण अधिकारी,–
(अ) ऐसी दशा में जहां इस खंड के उपखंड (i) के अधीन आय बढ़ने से ऐसे व्यक्ति की कुल आय बढ़ जाती है वहां इस प्रकार बढ़ी हुर्इ कुल आय पर कर और ऐसे कर के, तब प्रभार्य होता मानो ऐसी कुल आय में से समायोजनों की रकम घटा दी गर्इ हो, बीच के अंतर पर बीस प्रतिशत की दर पर अतिरिक्त आय-कर परिकलित करके उपधारा (1) के अधीन संदेय कर की रकम को और बढ़ा देगा और उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) के अधीन भेजी जाने वाली संसूचना में अतिरिक्त कर विनिर्दिष्ट कर करेगा;
(आ) ऐसी दशा में जहां इस प्रकार घोषित हानि इस खंड के उपखंड (ii) के अधीन कम हो जाती है या पूर्वोक्त समायोजनों के प्रभाव से वह हानि आय में संपरिवर्तित हो जाती है वहां उस कर के, जो समायोजनों की रकम पर प्रभार्य होता, मानो वह ऐसे व्यक्ति की कुल आय हो, बीस प्रतिशत के बराबर राशि (जिसे इसमें इसके पश्चात् अतिरिक्त आय-कर कहा गया है), परिकलित करेगा और इस प्रकार परिकलित अतिरिक्त आय-कर को उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) के अधीन भेजी जाने वाली संसूचना में विनिर्दिष्ट करेगा;
(इ) जहां कोर्इ प्रतिदाय उपधारा (1) के अधीन शोध्य है वहां ऐसे प्रतिदाय की रकम में से, यथास्थिति, उपखंड (अ) या उपखंड (आ) के अधीन परिकलित अतिरिक्त आय-कर के बराबर रकम को घटा देगा।
(ख) जहां इस धारा की उपधारा (3) या धारा 154 या धारा 250 या धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 या धारा 263 या धारा 264 के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप वह रकम, जिस पर अतिरिक्त आय-कर खंड (क) के अधीन संदेय है, यथास्थिति, बढ़ा दी गर्इ है या घटा दी गर्इ है, वहां अतिरिक्त आय-कर तदनुसार बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा; और–
(i) ऐसे मामले में, जहां अतिरिक्त आय-कर बढ़ा दिया गया है निर्धारण अधिकारी धारा 156 के अधीन मांग की एक सूचना निर्धारिती पर तामील करेगा;
(ii) ऐसे मामले में, जहां अतिरिक्त आय-कर घटा दिया गया है, संदत्त की गर्इ अधिक रकम का, यदि कोर्इ हो, प्रतिदाय किया जाएगा।"
98. लोप से पहले, उपधारा (1ख), जो वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित की गर्इ थी, निम्न प्रकार थी :
"(1ख) जहां निर्धारिती इस धारा की उपधारा (1) के अधीन संसूचना जारी किए जाने या प्रतिदाय, यदि कोर्इ हो, मंजूर किए जाने के पश्चात्, धारा 139 की उपधारा (5) के अधीन पुनरीक्षित विवरणी देता है वहां इस धारा की उपधारा (1) और उपधारा (1क) के उपबंध ऐसी पुनरीक्षित विवरणी के संबंध में लागू होंगे तथा–
(i) किसी आय-कर, अतिरिक्त आय-कर या ब्याज के लिए पहले भेजी गर्इ संसूचना को उक्त पुनरीक्षित विवरणी के आधार पर संशोधित किया जाएगा और जहां उक्त संसूचना में विनिर्दिष्ट आय-कर, अतिरिक्त आय-कर या ब्याज के रूप में संदेय किसी रकम का निर्धारिती द्वारा पहले ही संदाय कर दिया गया है वहां, यदि ऐसे संशोधन का यह प्रभाव है कि–
(क) पहले संदत्त रकम में वृद्धि हो जाती है तो, इस खंड के अधीन संशोधित संसूचना, निर्धारिती द्वारा संदेय अधिक रकम विनिर्दिष्ट करते हुए, उसे भेजी जाएगी और ऐसी संसूचना धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की संसूचना समझी जाएगी और इस अधिनियम के सभी उपबंध तदनुसार लागू होंगे;
(ख) पहले संदत्त रकम में कमी हो जाती है तो, संदत्त अधिक रकम का निर्धारिती को प्रतिदाय किया जाएगा;
(ii) पहले मंजूर की गर्इ प्रतिदाय की रकम में उक्त पुनरीक्षित विवरणी के आधार पर वृद्धि या कमी की जाएगी और जहां पहले मंजूर की गर्इ प्रतिदाय की रकम में,–
(क) वृद्धि की जाती है वहां निर्धारिती को शोध्य प्रतिदाय की अधिक रकम ही उसे संदत्त की जाएगी;
(ख) कमी की जाती है वहां इस प्रकार प्रतिदत्त अधिक रकम निर्धारिती द्वारा संदेय कर समझी जाएगी और एक संसूचना इस प्रकार संदेय रकम बताते हुए निर्धारिती को भेजी जाएगी तथा ऐसी संसूचना धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझी जाएगी और इस अधिनियम के सभी उपबंध तदनुसार लागू होंगे :
परन्तु वह निर्धारिती, जिसने इस धारा की उपधारा (1) के अधीन संसूचना की उस पर तामील किए जाने के पश्चात् धारा 139 की उपधारा (5) के अधीन पुनरीक्षित विवरणी दी है, उपधारा (1) के खंड (क) के पहले परंतुक के अधीन किए गए और उक्त संसूचना में विनिर्दिष्ट समायोजनों के संबंध में अतिरिक्त आय-कर का संदाय करने का दायी होगा चाहे उसने पुनरीक्षित विवरणी में उक्त समायोजन किए हों या नहीं।"
99. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 और वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से संशोधित उपधारा (2), इस प्रकार थी :
"(2) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन सूचना के जवाब में विवरणी दी गर्इ है वहां निर्धारण अधिकारी, यदि वह यह सुनिश्चित करना आवश्यक या समीचीन समझता है कि निर्धारिती ने अपनी आय कम नहीं बतार्इ है, या अधिक हानि संगणित नहीं की है, या किसी भी रीति से कम कर संदत्त नहीं किया है, निर्धारिती पर एक सूचना तामील करेगा और उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट तारीख को या तो स्वयं उसके कार्यालय में हाजिर हो या कोर्इ साक्ष्य पेश करे या करवायें जिस पर वह विवरणी की पुष्टि में निर्भर कर सकता है:
परन्तु उस मास के अंत से, जिसमें विवरणी दी जाती है, बारह मास की समाप्ति के पश्चात् निर्धारिती पर इस उपधारा के अधीन कोर्इ सूचना तामील नहीं की जाएगी।"
99क. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से अंत:स्थापित।
99ख. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से "इस उपधारा" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
1. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1998 से संशोधित उपधारा (3) इस प्रकार थी :
"(3) ऐसे साक्ष्य पर सुनवार्इ के पश्चात् जो निर्धारिती पेश करे और ऐसे अन्य साक्ष्य देने के पश्चात् जो निर्धारण अधिकारी विनिर्दिष्ट मुद्दों पर अपेक्षित करें और सब सुसंगत सामग्री को जो उसने एकत्र की है, हिसाब में लेने के पश्चात्, उपधारा (2) के अधीन जारी सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को अथवा उसके पश्चात् यथाशीघ्र, निर्धारण अधिकारी लिखित आदेश द्वारा निर्धारिती के कुल लाभ और हानि का निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा संदेय राशि अवधारित करेगा या उसे देय कोर्इ राशि वापस लौटायेगा।"
2. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित।
3. प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
4. लोप से पूर्व, उपधारा (5), जो प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित की गर्इ थी, निम्न प्रकार थी :
"(5) प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 (1988 का 4) द्वारा संशोधन से ठीक पूर्व विद्यमान इस धारा के उपबंध 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के अथवा उससे पूर्व के किसी भी निर्धारण वर्ष के निर्धारण को या के संबंध में लागू होंगे या इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उन उपबंधों के प्रति निर्देश है, जो तत्समय प्रवृत्त थे और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू होते थे।"
5. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया। लोप से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से यथा अंत:स्थापित तथा बाद में वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.6.1994 से यथा संशोधित स्पष्टीकरण निम्न प्रकार था :
"स्पष्टीकरण.–उपधारा (1) या उपधारा (1ख) के अधीन निर्धारिती को भेजी गर्इ सूचना धारा 246 और धारा 264 के प्रयोजनों के लिए आदेश समझी जाएगी।"
[वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा संशोधित रूप में]

