निर्धारण
57143. 58-62[(1) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना के उत्तर में कोर्इ विवरणी दी गर्इ है, वहां ऐसी विवरणी पर कार्यवाही निम्नलिखित रीति से की जाएगी, अर्थात् :–
(क) कुल आय या हानि की संगणना निम्नलिखित समायोजन किए जाने के पश्चात् की जाएगी, अर्थात् :-
(i) विवरणी में कोर्इ गणित संबंधी गलती ; या
(ii) कोर्इ गलत दावा, यदि ऐसा गलत दावा विवरणी में की किसी सूचना से प्रकट होता है ; या
(ख) कर और ब्याज की, यदि कोर्इ हो, संगणना खंड (क) के अधीन संगणित कुल आय के आधार पर की जाएगी ;
(ग) निर्धारिती द्वारा संदेय राशि या उसे देय प्रतिदाय की रकम का अवधारण खंड (ख) के अधीन संगणित कर और ब्याज, यदि कोर्इ हो, का स्रोत पर काटे गए किसी कर, स्रोत पर संगृहीत किसी कर, संदत्त किसी अग्रिम कर, धारा 90 या धारा 90क के अधीन किसी करार के अंतर्गत अनुज्ञेय किसी राहत या धारा 91 के अधीन अनुज्ञेय किसी राहत, अध्याय 8 के भाग क के अधीन अनुज्ञेय किसी रिबेट, स्वत:निर्धारण के आधार पर संदत किसी कर और कर अथवा ब्याज के रूप में अन्यथा संदत्त किसी रकम से समायोजन करने के पश्चात् किया जाएगा ;
(घ) एक संसूचना खंड (ग) के अधीन निर्धारिती द्वारा संदाय किए जाने के लिए अवधारित राशि या उसे देय प्रतिदाय की रकम विनिर्दिष्ट करते हुए तैयार की जाएगी या बनार्र्इ जाएगी और निर्धारिती को भेजी जाएगी ; और
(ड़) खंड (ग) के अधीन अवधारण के अनुसरण में निर्धारिती को देय प्रतिदाय की रकम निर्धारिती को अनुदत्त की जाएगी :
परंतु यह कि संसूचना निर्धारिती को ऐसे मामले में भी भेजी जाएगी जहां निर्धरिती द्वारा विवरणी में घोषित हानि समायोजित कर दी गर्इ है किन्तु उसके द्वारा कोर्इ कर या ब्याज संदेय नहीं है या उसे कोर्इ प्रतिदाय देय नहीं है :
परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन कोर्इ संसूचना उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें विवरणी दी गर्इ है, अंत से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी।
स्पष्टीकरण. - इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,–
(क) "विवरणी में की किसी सूचना से प्रकट गलत दावा" से विवरणी का, किसी प्रविष्टि के आधार पर, ऐसा दावा अभिप्रेत है,–
(i) जो किसी ऐसी मद के संबंध में है जो ऐसी विवरणी में की उसी मद या किसी अन्य मद की किसी अन्य प्रविष्टि से असंगत है ;
(ii) जिसकी बाबत ऐसी प्रविष्टि को सिद्ध करने के लिए दी जाने के लिए अपेक्षित सूचना इस अधिनियम के अधीन उस रूप में नहीं दी गर्इ है ; या
(iii) जो किसी कटौती की बाबत है जहां ऐसी कटौती उस विनिर्दिष्ट कानूनी सीमा से अधिक हो जाती है जो धन राशि या प्रतिशत या अनुपात या उसके भाग के रूप में व्यक्त की जा सकती है ;
(ख) विवरणी की अभिस्वीकृति उस दशा में संसूचना समझी जाएगी जहां खंड (ग) के अधीन निर्धारिती द्वारा कोर्इ राशि संदेय नहीं है या उसे प्रतिदेय नहीं है और जहां खंड (क) के अधीन कोर्इ समायोजन नहीं किया गया है।
(1क) उपधारा (1) के अधीन विवरणियों पर कार्यवाही करने के प्रयोजनों के लिए, बोर्ड उक्त उपधारा के अधीन अपेक्षित रूप में निर्धारिती द्वारा संदेय कर या उसे देय प्रतिदाय का शीघ्रतापूर्वक अवधारण करने की दृष्टि से विवरणियों पर केन्द्रीकृत रूप में कार्यवाही करने के लिए स्कीम बना सकेगा।
(1ख) जैसा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1क) के अधीन बनार्इ गर्इ स्कीम को प्रभावी रूप देने के प्रयोजन के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी की विवरणियों पर कार्यवाही किए जाने के संबंध में इस अधिनियम के कोर्इ उपबंध लागू नहीं होंगे या ऐसे उपवादों, उपांतरणों और अनुकूलनों के साथ लागू होंगे जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं; बहरहाल ऐसा कोर्इ निदेश 31 मार्च, 63[2010] के पश्चात् जारी नहीं किया जाएगा।
(1ग) उपधारा (1ख) के अधीन जारी की गर्इ प्रत्येक अधिसूचना, उपधारा (1क) के अधीन बनार्इ गर्इ स्कीम के साथ, अधिसूचना के जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी।]
64[(2) जहां विवरणी धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन किसी सूचना के जवाब में दी गर्इ है, वहां निर्धारण अधिकारी,–
(i) जहां उसका यह विश्वास करने का कारण है कि विवरणी में दी गर्इ किसी हानि, छूट, कटौती, मोक या अनुतोष का कोर्इ दावा अनुज्ञेय नहीं है, वहां वह निर्धारिती को एक सूचना तामील करेगा जिसमें हानि, छूट, कटौती, मोक या अनुतोष के ऐसे दावे की विशिष्टियां विनिर्दिष्ट की जाएंगी और उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट की जाने वाली किसी तारीख को उसमें विनिर्दिष्ट कोर्इ साक्ष्य या विशिष्टियां, जिन पर निर्धारिती अपने दावे के समर्थन में निर्भर करता है, पेश करे या करवाए :
65[परन्तु इस खंड के अधीन कोर्इ सूचना 1 जून, 2003 को या उसके पश्चात् निर्धारिती पर तामील नहीं की जाएगी;]
(ii) खंड (i) में किसी बात के होते हुए भी, यदि वह यह सुनिश्चित करना आवश्यक या समीचीन समझता है कि निर्धारिती ने कम आय का विवरण नहीं दिया है या आधिक्य हानि संगणित नहीं की है या किसी रीति में कम दर संदत्त नहीं किया है, तो वह निर्धारिती को एक सूचना तामिल करेगा जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उसमें विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख को उसके कार्यालय में या तो उपर्स्थित हो या वह ऐसे साक्ष्य को, जिस पर निर्धारिती उस विवरणी के समर्थन में निर्भर करता है, वहां पेश करे या करवाए :
66[परंतु यह कि खंड (ii) के अधीन निर्धारिती पर किसी सूचना की तामील उस वित्तीय वर्ष के अंत से जिसमें विवरणी पेश की जाती है, छह मास के अवसान के पश्चात् नहीं की जाएगी।]
67[(3) ऐसी सूचना में,–
(i) जो उपधारा (2) के खंड (i) के अधीन जारी की गर्इ है, विनिर्दिष्ट दिन को या ऐसे साक्ष्य की सुनवार्इ को यथाशक्य पश्चात् और ऐसी विशिष्टियों को ध्यान में रखते हुए, जिन्हें निर्धारिती पेश करे, निर्धारण अधिकारी, लिखित आदेश द्वारा, ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट दावे या दावों को मंजूर या नामंजूर करेगा और तदनुसार कुल आय या हानि का अवधारण करते हुए निर्धारण करेगा, और ऐसे निर्धारण के आधार पर निर्धारिती द्वारा संदेय राशि का अवधारण करेगा;
(ii) जो उपधारा (2) के खंड (ii) के अधीन जारी की गर्इ है, अथवा विनिर्दिष्ट दिन को या ऐसे साक्ष्य की, जिन्हें निर्धारिती पेश करे और ऐसे अन्य साक्ष्य की यथाशक्य पश्चात्, जिसकी निर्धारण अधिकारी विनिर्दिष्ट मुद्दों पर अपेक्षा करे, सुनवार्इ और सभी सुसंगत तथ्यसामग्री को ध्यान में रखने के पश्चात्, जो उसने एकत्रित की है; निर्धारण अधिकारी, लिखित आदेश द्वारा, निर्धारिती की कुल आय या हानि का निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा संदेय राशि या उसको देय किसी रकम के प्रतिदाय की राशि का अवधारण करेगा :]
68[परन्तु यह कि–
(क) धारा 10 के खंड (21) में निर्दिष्ट वैज्ञानिक अनुसंधान संगम की दशा में;
(ख) धारा 10 के खंड (22ख) में निर्दिष्ट समाचार एजेंसी की दशा में;
(ग) धारा 10 के खंड (23क) में निर्दिष्ट संगम या संस्था की दशा में;
(घ) धारा 10 के खंड (23ख) में निर्दिष्ट संस्था की दशा में;
(ड़) धारा 10 के खंड (23ग) के उपखंड (iv) में निर्दिष्ट निधि या संस्था या उपखंड (v) में निर्दिष्ट न्यास या संस्था या उपखंड (vi) में निर्दिष्ट कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट कोर्इ अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्थान की दशा में,
जिससे धारा 139 की उपधारा (4ग) के अधीन आय की विवरणी प्रस्तुत करने की अपेक्षा की गर्इ है, ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम, समाचार एजेंसी, संगम या संस्था या निधि या न्यास या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था की कुल आय या हानि के निर्धारण करने का कोर्इ आदेश निर्धारण अधिकारी द्वारा धारा 10 के उपबंधों को प्रभावी किए बिना, तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि–
(i) निर्धारण अधिकारी ने, जहां उसकी राय में ऐसा उल्लंघन हुआ है, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी को, ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम, समाचार एजेंसी, संगम या संस्था या निधि या न्यास या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था द्वारा, धारा 10 के यथास्थिति, खंड (21) या खंड (22ख) या खंड (23क) या खंड (23ख) या खंड (23ग) के उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के उपबंधों का उल्लंघन होने की सूचना न दी हो; और
(ii) ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान संगम या अन्य संगम 69[या निधि या न्यास] या संस्था या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था को प्रदत्त अनुमोदन वापस न ले लिया गया हो या ऐसी समाचार एजेंसी या निधि या न्यास या संस्था की बाबत जारी की गर्इ अधिसूचना का विखंडन न कर दिया गया हो:]
70[परंतु यह और कि जहां निर्धारण अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) और खंड (iii) में निर्दिष्ट विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या अन्य संस्था के क्रियाकलाप उन सभी शर्तों या उनमें से किन्हीं के अनुसार नहीं चलाए जा रहे हैं जिनके अधीन रहते हुए ऐसे विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या अन्य संस्था का अनुमोदन किया गया था वहां, वह, संबद्ध विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या अन्य संस्था को प्रस्तावित अनुमोदन वापस लिए जाने के संबंध में कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर दिए जाने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार को अनुमोदन वापस लेने की सिफारिश करेगा और वह सरकार आदेश द्वारा अनुमोदन वापस ले सकेगी तथा आदेश की प्रति संबद्ध विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या अन्य संस्था और निर्धारण अधिकारी को अग्रेषित करेगी।]
71[(4) जहां इस धारा की उपधारा (3) या धारा 144 के अधीन नियमित निर्धारण किया जाता है, वहां,–
(क) उपधारा (1) के अधीन निर्धारिती द्वारा संदत्त कोर्इ कर या ब्याज ऐसे नियमित निर्धारण के मद्दे दिया गया समझा जाएगा;
(ख) यदि नियमित निर्धारण पर कोर्इ प्रतिदाय शोध्य नहीं है, या उपधारा (1) के अधीन लौटार्इ गर्इ रकम नियमित निर्धारण पर प्रतिदेय रकम से अधिक है, तो इस प्रकार लौटार्इ गर्इ संपूर्ण या अधिक रकम निर्धारिती द्वारा संदेय कर समझी जाएगी, और इस अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे।
(5) 72[वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया।]]
73[* * *]
55क. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित। इससे पहले धारा 143 कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से वित्त अधिनियम, 1974 द्वारा 1.4.1975 से, वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1976 से, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1980 द्वारा 1.4.1980 से और वित्त अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से यथा संशोधित की गर्इ थी।
56. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 के प्रारम्भ से पूर्व यथा विद्यमान धारा 143 के उपबंध, आय-कर (कठिनाइयों का निवारण) आदेश, 1989 के अनुसार 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ हुए निर्धारण वर्ष और उससे पहले के किसी निर्धारण वर्ष के निर्धारण के संबंध में लागू होंगे।
57. परिपत्र सं. 201, तारीख 5.7.1976, अनुदेश सं. 1395, तारीख 15.5.1981 [स्रोत : लोक लेखा समिति की 114वीं रिपोर्ट [1982-83], पृष्ठ 16-17], परिपत्र सं. 230, तारीख 27.10.1977। सी.डी.टी.ए.सी. की तारीख 17.8.1967 को हुर्इ 12वीं बैठक के कार्यवृत के सुसंगत उद्धरण, परिपत्र सं. 18 (XL-37), तारीख 28.4 1955, परिपत्र सं. 125, तारीख 26.11.1973, परिपत्र सं. 36(XL-52), तारीख 19.11.1958, परिपत्र सं.50(XL-43), तारीख 28.12.1956, पत्र [एफ. सं. 91/41/67/आर्इटीजे(25)], तारीख 3.7.1967, पत्र [एफ. सं. 81/27/65-आर्इ.टी.(बी)], तारीख 18.5.1965, परिपत्र सं. 14(XL-35), तारीख 11.4.1955, परिपत्र सं. 1942 का 3, तारीख 16.1.1942, परिपत्र सं. 601, तारीख 4.6.1991, अनुदेश सं. 574, तारीख 27.7.1993 और परिपत्र सं. 4/2003, तारीख 14.5.2003, अनुदेश सं. 2/2008, तारीख 22.2.2008, अनुदेश सं. 6/2008, तारीख 18.6.2008, अनुदेश सं. 11/2008, तारीख 5.9.2008, अनुदेश सं. 12/2008, तारीख 5.9.2008 और अनुदेश सं. 17/2008, तारीख 26.11.2008 भी देखिए। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट। सुसंगत केस लॉज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
58-62. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2008 से उपधारा (1) के स्थान पर उपधारा (1) से (1ग) प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से, वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1993 से और वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से और वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.6.2001 से यथा-संशोधित उपधारा (1) निम्न प्रकार थी :
"(1) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन सूचना के उत्तर में कोर्इ विवरणी दी गर्इ है, वहां,–
(i) यदि यह पाया जाता है कि स्वत: निर्धारण पर स्रोत पर काटे गए किसी कर, दिए गए किसी अग्रिम कर, संदत्त किसी कर तथा कर या ब्याज के रूप में अन्यथा संदत्त किसी रकम के समायोजन के पश्चात् ऐसी विवरणी के आधार पर कोर्इ कर या ब्याज शोध्य है, तो उपधारा (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना59, इस प्रकार संदेय राशि को बताते हुए सूचना निर्धारिती को भेजी जाएगी और ऐसी सूचना धारा 156 के अधीन जारी की गर्इ मांग की सूचना समझी जाएगी और तदनुसार इस अधिनियम के सभी उपबंध लागू होंगे; और
(ii) यदि किसी विवरणी के आधार पर कोर्इ प्रतिदाय शोध्य है, तो उसे निर्धारिती को अनुदत्त किया जाएगा और इस आशय की संसूचना, निर्धारिती को दी जाएगी :
परन्तु इस उपधारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, विवरणी की अभिस्वीकृति इस उपधारा के अधीन वहां से संसूचना समझी जाएगी जहां निर्धारिती द्वारा या तो कोर्इ राशि संदेय नहीं है, या उसे कोर्इ प्रतिदेय शोध्य नहीं है :
परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन कोर्इ संसूचना उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति से एक वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी, जिसमें विवरणी दी जाती है :
परन्तु यह भी कि जहां विवरणी 1 अप्रैल, 1999 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष में पहली बार निर्धारणीय आय की बाबत दी जाती है वहां ऐसी संसूचना 31 मार्च, 2002 तक किसी भी समय भेजी जा सकेगी।"
इससे पूर्व उपधारा (1) का वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया। इससे पूर्व उपधारा (1क) प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अतं:स्थापित की गर्इ थी और बाद में प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से , वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से और वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित की गर्इ थी।
इससे पूर्व उपधारा (1ख) वित्त अधिनियम, 1990 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित की गर्इ थी और बाद में उसका वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया था।
63. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.2009 से "2009" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
64. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 और वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से संशोधित उपधारा (2), इस प्रकार थी :
"(2) जहां धारा 139 के अधीन या धारा 142 की उपधारा (1) के अधीन सूचना के जवाब में विवरणी दी गर्इ है वहां निर्धारण अधिकारी, यदि वह यह सुनिश्चित करना आवश्यक या समीचीन समझता है कि निर्धारिती ने अपनी आय कम नहीं बतार्इ है, या अधिक हानि संगणित नहीं की है, या किसी भी रीति से कम कर संदत्त नहीं किया है, निर्धारिती पर एक सूचना तामील करेगा और उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट तारीख को या तो स्वयं उसके कार्यालय में हाजिर हो या कोर्इ साक्ष्य पेश करे या करवायें जिस पर वह विवरणी की पुष्टि में निर्भर कर सकता है:
परन्तु उस मास के अंत से, जिसमें विवरणी दी जाती है, बारह मास की समाप्ति के पश्चात् निर्धारिती पर इस उपधारा के अधीन कोर्इ सूचना तामील नहीं की जाएगी।"
65. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से अंत:स्थापित।
66. वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा 1.4.2008 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से यथा अंत:स्थापित परन्तुक इस प्रकार था :
"परन्तु यह कि खंड (ii) के अधीन निर्धारिती पर किसी सूचना की तामील उस मास के अंत से, जिसमें विवरणी पेश की जाती है, बारह मास के अवसान के पश्चात् नहीं की जाएगी।"
67. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1998 से संशोधित उपधारा (3) इस प्रकार थी :
"(3) ऐसे साक्ष्य पर सुनवार्इ के पश्चात् जो निर्धारिती पेश करे और ऐसे अन्य साक्ष्य देने के पश्चात् जो निर्धारण अधिकारी विनिर्दिष्ट मुद्दों पर अपेक्षित करें और सब सुसंगत सामग्री को जो उसने एकत्र की है, हिसाब में लेने के पश्चात्, उपधारा (2) के अधीन जारी सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को अथवा उसके पश्चात् यथाशीघ्र, निर्धारण अधिकारी लिखित आदेश द्वारा निर्धारिती के कुल लाभ और हानि का निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर उसके द्वारा संदेय राशि अवधारित करेगा या उसे देय कोर्इ राशि वापस लौटायेगा।"
68. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से अंत:स्थापित।
69. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से अंत:स्थापित।
70. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
71. प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित।
72. लोप से पूर्व, उपधारा (5), जो प्रत्यक्ष कर विधि (दूसरा संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से अंत:स्थापित की गर्इ थी, निम्न प्रकार थी :
"(5) प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 (1988 का 4) द्वारा संशोधन से ठीक पूर्व विद्यमान इस धारा के उपबंध 1 अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के अथवा उससे पूर्व के किसी भी निर्धारण वर्ष के निर्धारण को या के संबंध में लागू होंगे या इस धारा में इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उन उपबंधों के प्रति निर्देश है, जो तत्समय प्रवृत्त थे और सुसंगत निर्धारण वर्ष को लागू होते थे।"
73. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से लोप किया गया। लोप से पूर्व वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से यथा अंत:स्थापित तथा बाद में वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.6.1994 से यथा संशोधित स्पष्टीकरण निम्न प्रकार था :
"स्पष्टीकरण.–उपधारा (1) या उपधारा (1ख) के अधीन निर्धारिती को भेजी गर्इ सूचना धारा 246 और धारा 264 के प्रयोजनों के लिए आदेश समझी जाएगी।"
[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा संशोधित रूप में]

