आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 132ख

जब्त या बुलाया संपत्ति का आवेदन

धारा

धारा संख्या

132ख

अध्याय शीर्षक

अध्याय XIII - आयकर प्राधिकरण

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2005

जब्त या बुलाया संपत्ति का आवेदन

जब्त या बुलाया संपत्ति का आवेदन

20[अभिगृहीत या अध्यपेक्षित आस्तियों का उपयोजन

132ख. (1) धारा 132 के अधीन अभिगृहीत या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षित आस्तियों को निम्नलिखित रीति में बरता जा सकेगा, अर्थात् :–

(i) इस अधिनियम, धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), व्यय-कर अधिनियम, 1987 (1987 का 35), दान कर अधिनियम, 1958 (1958 का 18) और ब्याज-कर अधिनियम, 1974 (1974 का 45) के अधीन विद्यमान किसी दायित्व की रकम और 20क[धारा 153क और उस पूर्ववर्ष से, जिसमें, यथास्थिति, तलाशी आरंभ की जाती है, या अध्यपेक्षा की जाती है या ब्लाक अवधि के लिए अध्याय 14ख के अधीन निर्धारण के पूरा होने पर दायित्व की रकम का अवधारण किया जाता है, सुसंगत वर्ष के निर्धारण के अधीन] निर्धारण के पूरा होने पर अवधारित दायित्व की रकम (जिसमें ऐसे निर्धारण के संबंध में उदगृहीत कोर्इ शास्ति या संदेय ब्याज सम्मिलित है) तथा जिनके बारे में ऐसा व्यक्ति व्यतिक्रमी है या व्यतिक्रमी समझा जाता है, ऐसी आस्तियों से वसूल की जा सकेगी :

परन्तु जहां 20ख[संबंधित व्यक्ति उस मास के, जिसमें आस्ति अभिगृहीत की गर्इ थी, अंत से तीस दिन के भीतर निर्धारण अधिकारी को आस्ति के उन्मोचन के लिए आवेदन करता है और] ऐसी किसी आस्ति के अर्जन की प्रकृति और स्रोत के बारे में निर्धारण अधिकारी को उसके समाधानप्रद रूप में स्पष्ट कर दिया जाता है, वहां इस खंड में निर्दिष्ट किसी विद्यमान दायित्व की रकम की वसूली ऐसी आस्ति में से की जा सकेगी और आस्ति का शेष भाग, यदि कोर्इ है, मुख्य आयुक्त या आयुक्त के पूर्व अनुमोदन से ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाएगा जिसकी अभिरक्षा से वे आस्तियां अभिगृहीत की गर्इ थीं :

परन्तु यह और कि ऐसी आस्ति या उसका कोर्इ भाग, जो पहले परन्तुक में निर्दिष्ट है, उस तारीख से, जिसको, यथास्थिति, धारा 132 के अधीन तलाशी के लिए या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षा के लिए अंतिम प्राधिकार निष्पादित किया गया था, एक सौ बीस दिन की अवधि के भीतर दे दिया जाएगा;

(ii) यदि आस्तियां मात्र धन या भागत: धन और भागत: अन्य आस्तियों के रूप में हैं, तो निर्धारण अधिकारी ऐसे धन का उपयोग खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों के निर्वहन में कर सकेगा और निर्धारिती इस प्रकार उपयोग किए धन की सीमा तक ऐसे दायित्व से उन्मोचित हो जाएगा ;

(iii) धन से भिन्न आस्तियों का उपयोग खंड (i) में निर्दिष्ट ऐसे किसी दायित्व के उन्मोचन के लिए भी किया जा सकेगा जो अनुन्मोचित रह जाए और इस प्रयोजन के लिए आस्तियां करस्थम् के अधीन समझी जाएंगी मानो ऐसा करस्थम्, यथास्थिति, निर्धारण अधिकारी या कर वसूली अधिकारी द्वारा धारा 226 की उपधारा (5) के अधीन मुख्य आयुक्त या आयुक्त के प्राधिकार से प्रभावी किया गया था और, यथास्थिति, निर्धारण अधिकारी या कर वसूली अधिकारी, ऐसे दायित्वों की रकम को ऐसी आस्तियों के विक्रय द्वारा वसूल कर सकेगा और ऐसा विक्रय तीसरी अनुसूची में अधिकथित रीति से किया जाएगा।

(2) उपधारा (1) में की कोर्इ बात इस अधिनियम में अधिकथित किसी अन्य ढंग से पूर्वोक्त दायित्वों की रकम की वसूली को प्रवारित नहीं करेगी।

(3) ऐसी कोर्इ आस्तियां या उनके आगम, जो उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों के उन्मोचन के पश्चात् शेष बचे रहते हैं, तुरंत उस व्यक्ति को सौंप दिए या संदत्त कर दिए जाएंगे जिसकी अभिरक्षा से वे आस्तियां अभिगृहीत की गर्इ थीं।

(4) () केंद्रीय सरकार, उतनी रकम पर 20ग[छह] आठ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज का संदाय करेगी, जितने से धारा 132 के अधीन अभिगृहीत या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षित धन का, जो उपधारा (1) के खंड (i) के प्रथम परंतुक के अधीन दी गर्इ धन की रकम को, यदि कोर्इ हो, घटा कर आए, और उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट विद्यमान दायित्व के उन्मोचन के लिए बेची गर्इ आस्तियों के आगमों का, यदि कोर्इ हों, योग, इस धारा की उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों को पूरा करने के लिए अपेक्षित रकम के योग के अधिक है।

() ऐसा ब्याज उस तारीख से, जिसको धारा 132 के अधीन तलाशी के लिए या धारा 132क के अधीन अध्यपेक्षा के लिए अंतिम प्राधिकार निष्पादित किया गया था, एक सौ बीस दिन की कालावधि की समाप्ति से ठीक बाद की तारीख से 20घ[धारा 153क के अधीन या] अध्याय 14ख के अधीन निर्धारण के पूरा होने की तारीख तक चलेगा।

स्पष्टीकरण–इस धारा में,–

(i) "ब्लाक अवधि" का वही अर्थ है जो उसका धारा 158ख के खंड (क) में है ;

(ii) "तलाशी या अध्यपेक्षा के लिए प्राधिकार का निष्पादन" का वही अर्थ है जो उसका धारा 158खड़ के स्पष्टीकरण 2 में है।]

 

20. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.6.2002 से प्रतिस्थापित। नियम 112ग देखिए। प्रतिस्थापन से पूर्व, आय-कर (संशोधन) अधिनियम, 1965 द्वारा 12.3.1965 से धारा 132क के रूप में अंत:स्थापित और कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.10.1975 से धारा 132ख के रूप में पुनर्संख्यांकित और बाद में कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.10.1967 से, वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1972 से कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.10.1984 से तथा प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988/1.4.1989 से यथा संशोधित, धारा 132ख इस प्रकार थी :

"132ख. प्रतिधारित आस्तियों का उपयोजन.–(1) धारा 132 की उपधारा (5) के अधीन प्रतिधारित आस्तियों पर निम्नलिखित रीति में कार्रवार्इ की जा सकेगी, अर्थात् :–

(i) उक्त उपधारा के खंड (iii) में निर्दिष्ट विद्यमान दायित्व की रकम और उन पूर्ववर्षों से, जिनसे उस उपधारा के खंड (i) में निर्दिष्ट आय (जिसमें ऐसे निर्धारण या पुनर्निर्धारण के संबंध में उद्गृहीत शास्ति या संदेय ब्याज सम्मिलित है) संबंधित है तथा जिनके बारे में उसने व्यतिक्रम किया है या वह व्यतिक्रम करने वाला समझा जाता है, सुसंगत सभी निर्धारण वर्षों के लिए नियमित निर्धारण या पुनर्निर्धारण के पूरे होने पर अवधारित दायित्व की रकम, ऐसी आस्तियों से वसूल की जा सकेगी।

(ii) यदि आस्तियां, मात्र धन या भागत: धन और भागत: अन्य आस्तियों के रूप में हैं तो निर्धारण अधिकारी ऐसे धन का उपयोजन खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों के निर्वहन में कर सकेगा और निर्धारिती इस प्रकार उपयोजित धन की मात्रा तक दायित्व से मुक्त हो जाएगा।

(iii) धन से भिन्न आस्तियों का उपयोजन भी खंड (i) में निर्दिष्ट किसी ऐसे दायित्व के निवर्हन के लिए किया जा सकेगा जो अनुन्मोचित रह जाएं और इस प्रयोजन के लिए आस्तियां करस्थम् के अधीन समझी जाएंगी मानो ऐसा करस्थम यथास्थिति, निर्धारण अधिकारी या कर वसूली अधिकारी द्वारा 226 की उपधारा (5) के अधीन मुख्य आयुक्त या आयुक्त के प्राधिकार से प्रभावी किया गया था, और यथास्थिति निर्धारण अधिकारी या कर वसूली अधिकारी ऐसे दायित्वों की रकम को ऐसी आस्तियों के विक्रय द्वारा वसूल कर सकेगा और ऐसा विक्रय तीसरी अनुसूची में अभिकथित रीति से किया जाएगा।

(2) उपधारा (1) की कोर्इ बात इस अधिनियम में अधिकथित किसी अन्य ढंग से पूर्वोक्त दायित्वों की रकम की वसूली को प्रभारित नहीं करेगी।

(3) कोर्इ आस्तियां या उनके आगम जो उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों के निर्वहन के पश्चात् बाकी रहते हैं, तत्काल उस व्यक्ति को दे दिए या संदत्त कर दिए जाएंगे जिसकी अभिरक्षा से वे आस्तियां अभिगृहीत की गर्इ थीं।

(4) (क) केन्द्रीय सरकार, उतनी रकम पर, जितनी से धारा 132 के अधीन प्रतिधारित धन और उस धारा की उपधारा (5) के खंड (iii) में निर्दिष्ट विद्यमान दायित्व के निर्वहन के लिए बेची गर्इ आस्तियों के आगम, की रकम यदि कोर्इ हो इस धारा की उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट दायित्वों को पूरा करने के लिए अपेक्षित रकमों के योग से, अधिक है पंद्रह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज संदत्त करेगी।

(ख) ऐसा ब्याज धारा 132 की उपधारा (5) के अधीन आदेश की तारीख से छह माह की कालावधि की समाप्ति के ठीक बाद की तारीख से उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट नियमित निर्धारण या पुनर्निर्धारण की तारीख तक या, यथास्थिति, ऐसे निर्धारणों या पुनर्निर्धारणों की अंतिम तारीख तक चलेगा।''

20क. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से "ब्लाक अवधि के लिए अध्याय 14ख के अधीन" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

20ख. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।

20ग. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2003 द्वारा 8.9.2003 से ''आठ'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

20घ. वित्त अधिनियम, 2003 द्वारा 1.6.2003 से अंत:स्थापित।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2005 तथा विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित रूप में]

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