धारा 11 कुछ मामलों में लागू करने के लिए नहीं
33[कतिपय दशाओं में धारा 11 का लागू न होना
3413. (1) धारा 11 35[या धारा 12] की किसी बात का इस प्रकार से प्रभाव नहीं होगा जिससे उस व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में से, जो उसे प्राप्त करता है, निम्नलिखित अपवर्जित हो जाए :–
(क) प्राइवेट धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास के अधीन धारित सम्पत्ति से होने वाली आय36 का कोर्इ भाग जो सार्वजनिक फायदे के लिए प्रवृत्त नहीं होता है;
(ख) पूर्त प्रयोजनों के लिए किसी न्यास की या किसी पूर्त संस्था की दशा में, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् सृजित किया गया या स्थापित की गर्इ है, उसकी कोर्इ आय यदि वह न्यास या संस्था किसी विशिष्ट धार्मिक समुदाय या जाति के फायदे के लिए सृजित किया गया या स्थापित की गर्इ है;
(खख) 37[* * *]
(ग) पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास अथवा पूर्त या धार्मिक संस्था की दशा में, उसकी कोर्इ आय–
(i) यदि वह न्यास या संस्था इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् सृजित किया गया या स्थापित की गर्इ है और न्यास के निबंधनों अथवा संस्था को शासित करने वाले नियमों के अधीन ऐसी आय के किसी भाग का प्रवर्तन; या
(ii) यदि ऐसी आय के किसी भाग का या न्यास या संस्था की (वह चाहे जब सृजित किया गया था स्थापित की गर्इ हो), किसी सम्पत्ति का पूर्ववर्ष के दौरान उपयोजन या प्रयोग,
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए होता है जो उपधारा (3) में निर्दिष्ट है :
परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृजित या स्थापित न्यास या संस्था की दशा में उपखंड (ii) के उपबंध ऐसी आय के किसी भाग या न्यास या संस्था की किसी सम्पत्ति के उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के फायदे के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपयोजन या प्रयोग को लागू नहीं होंगे, यदि ऐसा उपयोजन या प्रयोग न्यास के आज्ञापक निबंधन या संस्था को शासित करने वाले आज्ञापक नियम के अनुपालन के रूप में हो :
परन्तु यह और कि धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास, धार्मिक संस्था की दशा में, (वह चाहे जब सृजित किया गया या स्थापित की गर्इ हो) या इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृजित या स्थापित पूर्त प्रयोजनों के लिए न्यास या पूर्त संस्था की दशा में उपखंड (ii) के उपबंध ऐसी आय के किसी भाग या न्यास या संस्था की किसी सम्पत्ति के उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के फायदे के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपयोजन या प्रयोग को वहां तक लागू नहीं होंगे जहां तक ऐसा उपयोजन या प्रयोग 1 जून, 1970 से पहले की किसी कालावधि के संबंध में हो;
38[(घ) 39पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यास अथवा पूर्त या धार्मिक संस्था की दशा में, उसकी कोर्इ आय, यदि पूर्ववर्ष के दौरान किसी कालावधि में–
(i) न्यास या संस्था की निधियां40 28 फरवरी, 1983 के पश्चात् धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों से भिन्न किसी स्वरूप या पद्धति में विनिहित40 या निक्षिप्त40 की जाती हैं; या
(ii) न्यास या संस्था की निधियां40 1 मार्च, 1983 के पहले धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों से भिन्न किसी स्वरूप या पद्धति में विनिहित40 या निक्षिप्त40 की जाती है और 30 नवम्बर, 1983 के पश्चात् इस प्रकार विनिहित या निक्षिप्त बनी रहती हैं; या
(iii) न्यास या संस्था द्वारा 30 नवम्बर, 1983 के पश्चात् किसी कंपनी में [जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कंपनी41 या किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम नहीं है] कोर्इ शेयर धारित किए जाते हैं :
परन्तु इस खंड की कोर्इ बात निम्नलिखित के संबंध में लागू नहीं होगी–
(i) किसी न्यास या संस्था द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां, जहां ऐसी आस्तियां, 1 जून, 1973 को न्यास या संस्था की संपत्ति का भाग है 42[* * *];
43[(iक) न्यास या संस्था को दिए गए बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि, जो खंड (i) में उल्लिखित संपत्ति का भाग है;]
(ii) न्यास या संस्था द्वारा 1 मार्च, 1983 के पहले अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कंपनी या निगम द्वारा या उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचर हैं);
44[(iiक) कोर्इ आस्ति, जो धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट किसी स्वरूप या पद्धति का विनिधान या निक्षेप नहीं है, जहां ऐसी आस्ति किसी न्यास या संस्था द्वारा उस पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 45[1993] से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों से भिन्न किसी स्वरूप या पद्धति से धारित नहीं की जाती है;]
(iii) कारबार के लाभ और अभिलाभ के रूप में कोर्इ निधियां, जो 1 अप्रैल, 1984 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पश्चातवर्ती निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष के लाभ और अभिलाभ हैं।
स्पष्टीकरण.–जहां न्यास या संस्था के कारबार के लाभ और अभिलाभ के अतिरिक्त कोर्इ अन्य आय है वहां इस परन्तुक के खंड (iii) के उपबंध तब तक लागू नहीं होंगे जब तक न्यास या संस्था ऐसे कारबार की बाबत पृथक लेखा बहियां नहीं रखती है।]
46[स्पष्टीकरण.–खंड (ग) के उपखंड (ii) के प्रयोजनों के लिए यह अवधारित करने में कि क्या किसी न्यास या संस्था की आय का कोर्इ भाग या सम्पत्ति पूर्ववर्ष के दौरान, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के फायदे के लिए प्रयोग में लाया गया है या उपयोजित किया गया है, जहां तक ऐसा प्रयोग या उपयोजन 1 जुलार्इ, 1972 के पूर्व की किसी कालावधि के संबंध में है, वित्त अधिनियम, 1972 की [धारा 7 के खंड (क) के उपखंड (ii) से भिन्न] धारा 7 द्वारा इस धारा में किए गए संशोधनों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा।]
(2) उपधारा (1) के खंड (ग) 47[और खंड (घ)] के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, न्यास या संस्था की आय या सम्पत्ति48 अथवा ऐसी आय या सम्पत्ति का कोर्इ भाग उस खंड के प्रयोजनों के लिए उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति के फायदे के लिए उपयोजित या प्रयुक्त समझा जाएगा :–
(क) यदि न्यास या संस्था की आय या सम्पत्ति48 का कोर्इ भाग पूर्ववर्ष के दौरान किसी कालावधि के लिए, पर्याप्त प्रतिभूति बिना, या पर्याप्त ब्याज के बिना, या दोनों के बिना, उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति को उधार48 दिया जाता है या उसके पास उधार48 बना रहता है;
(ख) यदि न्यास या संस्था की कोर्इ भूमि, भवन या अन्य सम्पत्ति48 पूर्ववर्ष के दौरान किसी कालावधि के लिए, पर्याप्त किराया या अन्य प्रतिकर प्रभारित किए बिना, उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा उपयोग के लिए उपलब्ध की जाती है या बनी रहती है;
(ग) यदि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को, उस व्यक्ति द्वारा की गर्इ ऐसे न्यास या संस्था की सेवाओं के लिए वेतन, भत्ते या अन्य रूप में कोर्इ रकम न्यास या संस्था के साधनों में से पूर्ववर्ष से अदा की जाती है और इस प्रकार अदा की गर्इ रकम उससे अधिक है जो ऐसी सेवाओं के लिए युक्तियुक्त रूप में अदा की जा सकती है;
(घ) यदि न्यास या संस्था की सेवाएं उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को, पर्याप्त पारिश्रमिक या अन्य प्रतिकर के बिना, पूर्ववर्ष के दौरान उपलभ्य की जाती है;
(ड़) यदि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति से कोर्इ शेयर, प्रतिभूति या अन्य सम्पत्ति, पर्याप्त से अधिक प्रतिफल के लिए न्यास या संस्था द्वारा या उसकी ओर से पूर्ववर्ष के दौरान खरीदी जाती है;
(च) यदि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को कोर्इ शेयर, प्रतिभूति या अन्य सम्पत्ति पर्याप्त से कम प्रतिफल के लिए न्यास या संस्था द्वारा या उसकी ओर से पूर्ववर्ष के दौरान बेची जाती है;
49[(छ) यदि न्यास या संस्था की कोर्इ आय या संपत्ति उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के पक्ष में पूर्ववर्ष के दौरान आयोजित की जाती है :
परन्तु यह खंड उस दशा में लागू नहीं होगा जहां इस प्रकार आयोजित आय या यथास्थिति सम्पत्ति का मूल्य या सम्पत्ति की आय और मूल्य का योग एक हजार रुपए से अधिक नहीं है;]
(ज) यदि न्यास या संस्था की कोर्इ निधियां50 पूर्ववर्ष के दौरान किसी कालावधि के लिए (जो कालावधि 1 जनवरी, 1971 से पूर्व की न होगी) किसी ऐसे किसी समुत्थान50 में विनिहित50 की जाती हैं या बनी रहती हैं जिसमें उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोर्इ व्यक्ति सारवान हित रखता हो।
(3) उपधारा (1) के खंड (ग) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति निम्नलिखित हैं, अर्थात् :–
(क) न्यास का निर्माता या संस्था का संप्रवर्तक;
(ख) कोर्इ व्यक्ति जिसने उस न्यास या संस्था में पर्याप्त अभिदाय किया है, 51[अर्थात् कोर्इ व्यक्ति जिसका सुसंगत पूर्ववर्ष के अंत तक कुल अभिदाय 52[पचास] हजार रुपए से अधिक है;]
(ग) जहां ऐसा निर्माता, संप्रवर्तक या व्यक्ति हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है वहां, उस कुटुम्ब का कोर्इ सदस्य;
53[(गग) न्यास का न्यासी या संस्था का प्रबंधक (चाहे जिस नाम से जाना जाए);]
(घ) यथा पूर्वोक्त किसी निर्माता, संप्रवर्तक, व्यक्ति, 54[सदस्य, न्यासी या प्रबंधक] का कोर्इ नातेदार;
(ड़) कोर्इ समुत्थान जिसमें खंड (क), (ख), (ग) 55[, (गग)] और (घ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से कोर्इ सारवान हित रखता है।
(4) उपधारा (1) के खंड (ग) में किसी बात के होते हुए भी 56[किंतु इस उपधारा के खंड (घ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना] जहां किसी ऐसे समुत्थान में जिसमें उपधारा (3) में निर्दिष्ट व्यक्ति का सारवान् हित हो, न्यास या संस्था की विनिहित निधियों का योग उस समुत्थान की पूंजी57 के पांच प्रतिशत से अधिक न हो, वहां किसी ऐसी आय के संबंध में, जो उस आय से भिन्न हो जो न्यास या संस्था को ऐसे विनिधान से हासिल हो, धारा 11 58[या धारा 12] के अधीन छूट से केवल इस कारण इन्कार नहीं किया जाएगा कि न्यास या संस्था की 59[निधियां] ऐसे समुत्थान में विनिहित की गर्इं जिसमें ऐसे व्यक्ति का सारवान् हित है।
60[(5) उपधारा (1) के खंड (घ) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोर्इ आस्तियां (जो किसी कंपनी या निगम द्वारा या उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचर हैं) किसी न्यास या संस्था द्वारा 28 फरवरी, 1983 के पश्चात् किंतु 25 जुलार्इ, 1991 के पूर्व अर्जित की जाती हैं, वहां न्यास या संस्था को ऐसी आस्तियों से प्राप्त आय से भिन्न किसी आय के संबंध में धारा 11 या धारा 12 के अधीन छूट से केवल इस कारण इंकार नहीं किया जाएगा कि न्यास या संस्था की निधियां, ऐसी आस्ति में विनिहित की गर्इ हैं यदि ऐसी निधियां ऐसी आस्तियों में 31 मार्च, 1992 के पश्चात् इस प्रकार विनिहित नहीं बनी रहती हैं।]
61[(6) उपधारा (1) और (2) में उल्लिखित किसी बात के होते हुए भी किंतु धारा 12 की उपधारा (2) में उल्लिखित उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कोर्इ शैक्षिक या चिकित्सीय संस्था या अस्पताल चलाने वाले किसी पूर्त या धार्मिक न्यास की दशा में, धारा 11 या धारा 12 के अधीन छूट से धारा 12 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट आय से भिन्न किसी आय के संबंध में केवल इस कारण से इन्कार नहीं किया जाएगा कि ऐसे न्यास ने उपधारा (3) के खंड (क) या खंड (ख) या खंड (ग) या खंड (गग) या खंड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों को शैक्षिक या चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध करार्इ हैं।]
62[स्पष्टीकरण 1.– धारा 11, 12, 12क और इस धारा के प्रयोजनों के लिए ''न्यास'' के अंतर्गत कोर्इ अन्य विधिक बाध्यता भी है और इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यष्टि के संबंध में ''नातेदार'' से अभिप्रेत है–
(i) उस व्यष्टि का पति या पत्नी;
(ii) उस व्यष्टि का भार्इ या बहिन;
(iii) उस व्यष्टि के पति या पत्नी का भार्इ या बहिन;
(iv) उस व्यष्टि का पारम्परिक पूर्व पुरुष या वंशज;
(v) उस व्यष्टि के पति या पत्नी का पारम्परिक पूर्व पुरुष या वंशज;
(vi) उपखंड (ii), उपखंड (iii), उपखंड (iv) या उपखंड (v) में निर्दिष्ट व्यष्टि का पति या पत्नी;
(vii) उस व्यष्टि के या उस व्यष्टि के पति या पत्नी के भार्इ या बहिन का पारम्परिक वंशज।]
स्पष्टीकरण 2.–किसी ऐसे न्यास या संस्था के बारे में, जो अनुसूचित जातियों, पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जनजातियों या स्त्रियों और बच्चों के फायदे के लिए सृजित किया गया या स्थापित की गर्इ हो, यह नहीं समझा जाएगा कि वह उपधारा (1) के खंड (ख) के अर्थ में धार्मिक समुदाय या जाति के फायदे के लिए सृजित या स्थापित न्यास या संस्था है।
स्पष्टीकरण 3.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसका समुत्थान में सारवान् हित है, यदि,–
(i) उस दशा में, जब समुत्थान कंपनी हो, बीस प्रतिशत से अन्यून मतदान शक्ति रखने वाले उसके शेयर (जो लाभों में भाग लेने के अतिरिक्त अधिकार के सहित या उससे रहित होते हुए लाभांश की नियत दर के हकदार शेयर न हों) पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय उस व्यक्ति द्वारा अथवा भागत: उस व्यक्ति द्वारा और भागत: उपधारा (3) में निर्दिष्ट अन्य व्यक्तियों में से एक या अधिक द्वारा फायदाप्रद रूप में धारित हों;
(ii) किसी अन्य समुत्थान की दशा में, वह व्यक्ति अथवा वह व्यक्ति और उपधारा (3) में निर्दिष्ट अन्य व्यक्तियों में से एक या अधिक व्यक्ति परस्पर मिलकर, पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय ऐसे समुत्थान के लाभों के बीस प्रतिशत से अन्यून के फायदाप्रद रूप से हकदार हो या हों।]
33. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से पुन: पुर:स्थापित। इससे पूर्व प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा उसी तारीख से इसका लोप किया गया था। मूल धारा 13 वित्त अधिनियम, 1970 द्वारा 1.4.1971 से प्रतिस्थापित की गर्इ थी और इसके प्रतिस्थापन के पूर्व, इसका वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से और वित्त अधिनियम, 1963 द्वारा 1.4.1962 से भूतलक्षी प्रभाव से संशोधन किया गया था।
34. तारीख 13.4.1982 का परिपत्र सं. 335 और तारीख 15.3.1991 का परिपत्र सं. 596 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
35. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।
36. "आय" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
37. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1984 से लोप किया गया। कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1997 से यथा अंत:स्थापित मूल खंड (खख) निम्नानुसार था:
"(खख) निर्धनों की राहत, शिक्षा या चिकित्सा राहत के लिए ऐसे पूर्त न्यास या संस्था के मामले में, जो कारबार करता है, ऐसे कारबार से व्युत्पन्न कोर्इ आय, जब तक कि कारबार न्यास या संस्था के प्राथमिक प्रयोजन का वास्तविक रूप पालन करने के अनुक्रम में नहीं किया जाता है;"
38. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से प्रतिस्थापित। मूल खंड कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1977 से अंत:स्थापित किया गया था। बाद में वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1977 द्वारा 1.4.1978 से और वित्त अधिनियम, 1982 द्वारा 1.4.1982 से इसका संशोधन किया गया था।
39. परिपत्र सं. 596, तारीख 15.3.1991 भी देखें। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
40. "निधियां", "विनिहित" और "निक्षिप्त" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.
41. "सरकारी कंपनी" की परिभाषा के लिए देखिए पूर्व पृष्ठ 1.25 पाद टिप्पण 46 ।
42. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1983 से भूतलक्षी प्रभाव से "और ऐसी आस्तियां न्यास या संस्था द्वारा क्रय नहीं की गर्इ हैं या इसके द्वारा किसी अन्य आस्ति के संपरिवर्तन द्वारा या बदले में अर्जित नहीं की गर्इ हैं" शब्दों का लोप किया गया।
43. यथोक्त द्वारा अंत:स्थापित।
44. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1983 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
45. वित्त अधिनियम, 1992 द्वारा 1.4.1992 से "1992" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
46. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।
47. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
48. "सम्पत्ति" और "उधार" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैनुअल, खंड 3.
49. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से प्रतिस्थापित।
50. "निधियां", "विनिहित" और "ऐसे किसी समुत्थान" पदों के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
51. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1977 से अंत:स्थापित।
52. वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से "पच्चीस" के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व, कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1984 द्वारा 1.4.1985 से "पांच" के स्थान पर "पच्चीस" प्रतिस्थापित किए गए थे।
53. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।
54. यथोक्त द्वारा "या सदस्य" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
55. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।
56. वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से अंत:स्थापित।
57. "पूंजी" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज मैन्युअल, खंड 3.
58. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित।
59. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1971 द्वारा 1.4.1971 से "धनराशियां" के स्थान पर प्रतिस्थापित।
60. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.4.1983 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित। मूल उपधारा कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1976 से अंत:स्थापित की गर्इ थी और वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से उसका लोप किया गया था।
61. वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा 1.4.2001 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व उपधारा (6) का वित्त अधिनियम, 1983 द्वारा 1.4.1983 से लोप किया गया था। मूल उपधारा (6) कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा 1.4.1977 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।
62. वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से प्रतिस्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित रूप में]

