धारा 11 और 12 को लागू किए जाने संबंधी शर्तें
62[63[धारा 11 और 12 को लागू किए जाने संबंधी शर्तें]
6412क. 65[(1)] 66धारा 11 और धारा 12 के उपबंध किसी न्यास या संस्था की आय के संबंध में लागू नहीं होंगे जब तक कि निम्नलिखित शर्तें पूरी न की जाएं, अर्थात् :–
(क) आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने विहित फार्म67 और विहित रीति में 68[***] आयुक्त को 1 जुलार्इ, 1973 को या उसके पूर्व या न्यास के सृजन अथवा संस्था की स्थापना की तारीख से एक वर्ष की कालावधि समाप्त होने के पूर्व 69[इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो और ऐसा न्यास या संस्था धारा 12कक के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो] न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया है :
70[परन्तु जहां न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन पूर्वोक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किया जाता है वहां धारा 11 और धारा 12 के उपबंध ऐसे न्यास या संस्था की आय के संबंध में,–
(i) यदि 71[* * *] आयुक्त का ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे यह समाधान हो जाता है कि आय प्राप्त करने वाला व्यक्ति पूर्वोक्त कालावधि की समाप्ति के पूर्व72 आवेदन करने से पर्याप्त कारणों से निवारित रहा था तो न्यास के सृजन या संस्था की स्थापना की तारीख से;
(ii) यदि 73[* * *] आयुक्त का इस प्रकार समाधान नहीं होता है तो उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें आवेदन किया जाता है, प्रथम दिन से लागू होंगे:]
74[परंतु यह और कि इस खंड के उपबंध 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किए गए किसी आवेदन के संबंध में लागू नहीं होंगे;]
74[(कक) आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् आयुक्त को विहित प्ररूप और रीति में आवेदन किया है और ऐसा न्यास या संस्था धारा 12कक के अधीन रजिस्ट्रीकृत है;]
(ख) धारा 11 और धारा 12 के उपबंधों को लागू किए बिना जहां उस न्यास या संस्था की इस अधिनियम के अधीन यथा संगणित सकल आय किसी पूर्व वर्ष में 75[उस अधिकतम रकम से अधिक है, जो किसी पूर्ववर्ष में आय-कर से प्रभार्य है], वहां उस न्यास या संस्था के उस वर्ष के लेखे धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे स्पष्टीकरण में यथा-परिभाषित लेखापाल द्वारा संपरीक्षित किए गए हैं और आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति ने सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए आय की विवरणी के साथ ऐसी संपरीक्षा की विहित फार्म76 में रिपोर्ट, जो ऐसे लेखापाल द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित और सत्यापित है और जिसमें ऐसी विशिष्टियां उपवर्णित हैं, जो विहित की जाएं, प्रस्तुत की है।]
(ग) 77[***]
78[(2) जहां कोर्इ आवेदन 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किया गया है वहां धारा 11 और धारा 12 के उपबंध उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें ऐसा आवेदन किया जाता है, ठीक बाद के निर्धारण वर्ष से ऐसे न्यास या संस्था की आय के संबंध में लागू होंगे।]
62. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1989 द्वारा 1.4.1989 से पुन: पुर:स्थापित। इससे पूर्व, धारा 12क का प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा उसी तारीख से लोप किया गया था। मूल धारा 12क वित्त अधिनियम, 1972 द्वारा 1.4.1973 से अंत:स्थापित की गर्इ थी।
63. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से "न्यासों के रजिस्ट्रीकरण की शर्तें" शीर्ष के स्थान पर प्रतिस्थापित।
64. देखिए परिपत्र सं. 143, तारीख 20.8.1974 और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, तारीख 9.2.1978 का अनुदेश। ब्यौरे के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
65. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से अंत:स्थापित।
66. सुसंगत केस लाज़ के लिए देखिए टैक्समैन्स मास्टर गाइड टु इन्कम टैक्स ऐक्ट।
67. पूर्त/धार्मिक न्यास के रजिस्ट्रीकरण के लिए और साथ में दिए जाने वाले आवश्यक दस्तावेजों के लिए देखिए नियम 17क और फार्म सं. 10क - वे दस्तावेज हैं; 1. न्यास/संस्था सृजित करने वाले लिखत की मूल प्रति अर्थात् न्यास लेख उसकी एक प्रति के साथ, जहां न्यास/संस्था किसी लिखत के अधीन सृजित की गर्इ हो। आयुक्त द्वारा मूल प्रति के बदले में प्रमाणित प्रति भी स्वीकार की जा सकती है। 2. न्यास/संस्था सृजित करने के साक्ष्य में दस्तावेज, उसकी एक प्रति सहित, जहां न्यास/संस्था का सृजन लिखत के अधीन न हुआ हो। 3. जब न्यास/संस्था रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किए जाने वाले वित्तीय वर्ष के पहले पूर्ववर्ष (वर्षों) में अस्तित्व में हो तो आवेदन के साथ पूर्ववर्षों से संबंधित न्यास/संस्था के लेखाओं की दो प्रतियां, जो आवेदन किए जाने वाले वर्ष के ठीक पूर्व तीन वर्षों से अधिक पुरानी न हो, दी जाएगी।
68. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से "मुख्य आयुक्त या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व, कोट किए गए शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 द्वारा अंत:स्थापित किए गए थे।
69. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1996 द्वारा 1.4.1997 से "इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
70. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1991 द्वारा 1.10.1991 से निम्नलिखित के स्थान पर प्रतिस्थापित :
"परन्तु मुख्य आयुक्त या आयुक्त, अपने विवेकाधिकार से, उपरोक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किसी न्यास या संस्था के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन स्वीकार कर सकेगा;"
71. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से "मुख्य आयुक्त या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व, कोट किए गए शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित किए गए थे।
72. "कालावधि की समाप्ति के पूर्व" पद के अर्थ के लिए देखिए टैक्समैन्स डायरेक्ट टैक्सेज़ मैनुअल, खंड 3.
73. वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.6.1999 से "मुख्य आयुक्त या" शब्दों का लोप किया गया। इससे पूर्व, कोट किए गए शब्द प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1988 से अंत:स्थापित किए गए थे।
74. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से अंत:स्थापित।
75. कराधान विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2006 से भूतलक्षी प्रभाव से "पचास हजार रुपए से अधिक है" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व कोट किए गए शब्दों का वित्त अधिनियम, 1994 द्वारा 1.4.1995 से संशोधित किया गया था।
76. न्यास/संस्था के मामले में संपरीक्षा रिपोर्ट के लिए देखिए नियम 17ख और फार्म सं. 10ख.
77. वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2002 से लोप किया गया। लोप किए जाने से पूर्व, वित्त अधिनियम, 2001 द्वारा 1.4.2002 से यथा अंत:स्थापित खंड (ग) इस प्रकार था :
'(ग) धारा 11 और धारा 12 के उपबंधों को लागू किए बिना जहां न्यास या संस्था की इस अधिनियम के अधीन यथा संगणित कुल आय किसी पूर्ववर्ष में एक करोड़ रुपए से अधिक हो जाती है, वहां न्यास या संस्था ने,–
(i) धारा 139 की उपधारा (4क) के अधीन आय की विवरणी देने के लिए नियत तारीख के पूर्व किसी स्थानीय समाचार पत्र में अपने लेखे प्रकाशित किए हैं; और
(ii) ऐसी विवरणी के साथ ऐसे समाचार पत्र की एक प्रति दी है।'
78. वित्त अधिनियम, 2007 द्वारा 1.6.2007 से अंत:स्थापित।
[वित्त अधिनियम, 2011 द्वारा संशोधित रूप में]

