निवेश आय और लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर टैक्स
45[विनिधान आय और दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ पर कर
115ड़. जहां ऐसे किसी निर्धारिती की, जो अनिवासी भारतीय हो, आय में–
(क) विनिधान से आय या विनिर्दिष्ट आस्ति से भिन्न आस्ति के दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों से आय;
(ख) दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों से आय,
सम्मिलित है, वहां उसके द्वारा संदेय कर निम्नलिखित का योग होगा--
(i) कुल आय में सम्मिलित खंड (क) में निर्दिष्ट विनिधान आय, यदि कोर्इ है, की बाबत आय पर बीस प्रतिशत की दर से संगणित आय-कर राशि;
(ii) कुल आय में सम्मिलित खंड (ख) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर दस प्रतिशत की दर से संगणित आय-कर राशि; और
(iii) आय-कर की वह राशि जो दशा में प्रभार्य होती यदि उसकी कुल आय में से खंड (क) और (ख) में निर्दिष्ट आय की राशि घटा दी जाती।]
45. वित्त अधिनियम, 1997 द्वारा 1.4.1998 से प्रतिस्थापित। इससे पूर्व वित्त अधिनियम, 1985 द्वारा 1.4.1986 से संशोधित धारा 115ड़ निम्न प्रकार थी :
"115ड़ (1) जहां निर्धारिती की, जो अनिवासी भारतीय है, कुल आय विनिधान आय से या दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ की आय से या दोनों से मिलकर बनती है वहां उसके द्वारा अपनी कुल आय पर संदेय कर, ऐसी कुल आय पर ऐसी आय के बीस प्रतिशत की दर से परिकलित आय कर की रकम होगी।
(2) जहां निर्धारिती की, जो अनिवासी भारतीय है, कुल आय में उपधारा (1) में उल्लिखित प्रकार की आय सम्मिलित है, वहां उसके द्वारा अपनी कुल आय पर संदेय कर होगा–
(i) उपधारा (1) में उल्लिखित प्रकृति की उस आय पर जो कुल आय में सम्मिलित की गर्इ है, उस उपधारा के उपबंधों के अनुसार उसके द्वारा संदेय आयकर राशि;
(ii) ऐसी कुल आय पर, जो उपधारा (1) में उल्लिखित प्रकृति की आय की रकम घटाकर आए, प्रभार्य आयकर राशि मानो इस प्रकार घटाकर आर्इ कुल आय उसकी कुल आय हो।
[वित्त अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित रूप में]

