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धारा 100

शरीर की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार कब मृत्यु कारित करने तक विस्तृत होता है

धारा

धारा संख्या

100

अध्याय शीर्षक

अधिनियम

भारतीय दंड संहिता, 1860

वर्ष

शरीर की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार कब मृत्यु कारित करने तक विस्तृत होता है

शरीर की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार कब मृत्यु कारित करने तक विस्तृत होता है

शरीर की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार कब मृत्यु कारित करने तक विस्तृत होता है

100.शरीर की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार, पिछली धारा में उल्लिखित प्रावधानों के अधीन, हमलावर को स्वैच्छिक रूप से मृत्यु या अन्य कोई क्षति पहुंचाने तक विस्तारित होता है, यदि वह अपराध, जिसके कारण अधिकार का प्रयोग किया जाता है, इसके बाद वर्णित किसी भी प्रकार का हो, अर्थात्:—

पहला - ऐसा हमला जिससे युक्तिसंगत रूप से यह आशंका उत्पन्न हो कि ऐसे हमले के परिणामस्वरूप अन्यथा मृत्यु हो जाएगी;

दूसरा - ऐसा हमला जिससे युक्तिसंगत रूप से यह आशंका उत्पन्न हो कि ऐसे हमले के परिणामस्वरूप अन्यथा गंभीर चोट पहुंचेगी;

तीसरा - बलात्कार करने के इरादे से किया गया हमला;

चौथा - अप्राकृतिक वासना की संतुष्टि के इरादे से किया गया हमला;

पांचवां - अपहरण या व्यपहरण के इरादे से किया गया हमला;

छठा - किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक बनाने के इरादे से किया गया हमला, ऐसी परिस्थितियों में जो उसे यह आशंका पैदा कर सकती हैं कि वह अपनी रिहाई के लिए सार्वजनिक प्राधिकारियों का सहारा नहीं ले सकेगा।

[ सातवां -- तेजाब फेंकने या देने का कार्य अथवा तेजाब फेंकने या देने का प्रयास जिससे उचित रूप से यह आशंका हो सकती है कि ऐसे कार्य का परिणाम अन्यथा गंभीर क्षति होगी। ]


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