आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा 10

आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है

धारा

धारा संख्या

10

अध्याय शीर्षक

अध्याय III - आय जो कुल आय का हिस्सा नहीं है

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2019 (सं.2)

आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है

आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है

अध्याय 3

आय जो कुल आय का भाग नहीं है

आय जो कुल आय के अंतर्गत नहीं आती है

10. किसी व्यक्ति की किसी पूर्ववर्ष की कुल आय संगणित करने में निम्नलिखित खंडों में से किसी में आने वाली कोर्इ आय सम्मिलित नहीं की जाएगी–

(1) कृषि आय;

(2) धारा 64 की उपधारा(2) के उपबंधों के अंतर्गत रहते हुए, हिंदू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य के रूप में किसी व्यष्टि द्वारा प्राप्त कोर्इ राशि जहां ऐसी कोर्इ राशि का कुटुम्ब की आय में से भुगतान किया गया हो या किसी अविभाज्य संपदा की दशा में, जहां ऐसी राशि का कुटुम्ब की संपदा की आय में से भुगतान किया गया हो;

(2क) किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी ऐसी फर्म का भागीदार है जिसका उस रूप में पृथक्त: निर्धारण किया जाता है, फर्म की कुल आय में उसका अंश।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, उस रूप में पृथक्त: निर्धारित किसी फर्म की कुल आय में किसी भागीदार का अंश किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, वह रकम होगा जिसका फर्म की कुल आय से वही अनुपात है जो भागीदारी विलेख के अनुसार, फर्म के लाभों में उसके अंश की रकम का ऐसे लाभों से है;

(3) [***]

(4) (i) किसी अनिवासी की दशा में, कोर्इ ऐसी आय, जो उन प्रतिभूतियों या बंधपत्रों पर ब्याज के रूप में हुर्इ हो, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे, जिसके अंतर्गत ऐसे बंधपत्रों के मोचन पर प्रीमियम के रूप में होने वाली आय है:

परन्तु केन्द्रीय सरकार इस उपखंड के प्रयोजनार्थ 1 जून, 2002 को या उसके पश्चात् ऐसी प्रतिभूतियों या बंधपत्रों को उल्लिखित नहीं करेगी;

(ii) किसी व्यष्टि की दशा में, कोर्इ ऐसी आय, जो भारत में किसी बैंक में अनिवासी (विदेशी) खाते में विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार, उसके खाते में जमा धन पर ब्याज के रूप में हुर्इ हो :

परन्तु यह तब जब कि ऐसा व्यष्टि, उक्त अधिनियम की धारा 2 के 9[खंड ()] में परिभाषित भारत के बाहर निवासी व्यक्ति है, अथवा वह व्यक्ति है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक ने पूर्वोक्त खाता रखने की अनुमति दी है;

(4ख) भारत के ऐसे नागरिक या भारतीय उद्भव के ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो अनिवासी है, कोर्इ ऐसी आय, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा 1 जून, 2002 से पहले पुरोधृत ऐसे बचत-पत्रों पर ब्याज से हुर्इ हो, जो वह सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे :

परन्तु यह तब जब कि उस व्यष्टि ने ऐसे बचत-पत्रों के लिए भारत में बाहर के किसी देश से विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसार, संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में अभिदाय भेजा है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() कोर्इ व्यक्ति भारतीय उद्भव का समझा जाएगा यदि वह या उसके माता-पिता या पितामह-पितामही, मातामह-मातामही में से कोर्इ अविभाजित भारत में जन्मा था;

() ''संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा'' का अर्थ है ऐसी विदेशी मुद्रा जो उस समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रयोजनों के लिए संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा मानी जाती है;

9क[(4ग) 17 सितंबर, 2018 से प्रारंभ होने वाली और 31 मार्च, 2019 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान, धारा 194ठग की उपधारा (2) के खंड (iक) में यथानिर्दिष्ट रुपए में अंकित मूल्य के बंधपत्र के निर्गमन द्वारा भारत के बाहर किसी स्रोत से उधार ली गर्इ धनराशियों के संबंध में किसी ऐसे अनिवासी को, जो कोर्इ कंपनी नहीं है या भारतीय कंपनी या कारबार न्यास द्वारा किसी विदेशी कंपनी को ब्याज के रूप में संदेय कोर्इ आय।]

वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.4.2020 से धारा 10 के खंड (4ग) के पश्चात् निम्नलिखित खंड (4घ) अंत:स्थापित किया जाएगा:

(4घ) किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में अवस्थित किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्चेंज में धारा 47 के खंड (viiकख) में निर्दिष्ट किसी पूंजी आस्ति के अंतरण के परिणामस्वरूप किसी विनिर्दिष्ट निधि को व्युत्पन्न या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त की गर्इ कोर्इ आय और जहां ऐसे संव्यवहार के लिए प्रतिफल को संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में, किसी अनिवासी द्वारा धारित यूनिटों के संबंध में व्युत्पन्न या उद्भूत या प्राप्त ऐसी आय की सीमा तक संदत्त किया गया है या संदेय है।

स्पष्टीकरण.—इस खंड के प्रयोजनों के लिए,—

() "संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा" पद से ऐसी विदेशी मुद्रा अभिप्रेत है, जिसे तत्समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) और तद्धीन बनाए गए नियमों में प्रयोजनों के लिए संपरिवर्तनीय विदेशी मुद्रा के रूप में माना जाता है;

() "प्रबंधक" पद का वही अर्थ होगा, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (वैकल्पिक विनिधान निधि) विनियम, 2012 के विनियम (2) के उपविनियम (1) के खंड () में उसका है;

() "विनिर्दिष्ट निधि" पद से किसी न्यास या कंपनी या सीमित दायित्व भागीदारी या किसी निगम निकाय के रूप में भारत में स्थापित या निगमित ऐसी निधि अभिप्रेत है,—

(i) जिसे प्रवर्ग 3 की वैकल्पिक विनिधान निधि के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र मंजूर किया गया है और जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड़ (वैकल्पिक विनिधान निधि) विनियम, 2012 के अधीन विनियमित है;

(ii) जो किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में अवस्थित है;

(iii) जिसके किसी प्रायोजक या प्रबंधक द्वारा धारित यूनिटों से भिन्न सभी यूनिट अनिवासियों द्वारा धारण किए जा रहे हैं;

() "प्रायोजक" पद का वही अर्थ होगा, जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (वैकल्पित विनिधान निधि) विनियम, 2012 के विनियम 2 के उपविनियम (1) के खंड () में उसका है;

(ड.) "न्यास" पद से भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन स्थापित कोर्इ न्यास अभिप्रेत है;

() "यूनिट" पद से किसी विनिधानकर्ता का किसी निधि में कोर्इ फायदाग्राही हित अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत शेयर या भागीदारी हित भी है;

(5) किसी व्यष्टि की दशा में–

() उसे भारत में किसी स्थान के लिए छुट्टी पर जाने के संबंध में अपने और अपने कुटुम्ब के लिए अपने नियोजक से;

() उसे सेवानिवृत्त होने के बाद या सेवा की समाप्ति के बाद भारत में किसी स्थान पर जाने के संबंध में अपने और अपने कुटुम्ब के लिए अपने नियोजक या पूर्व नियोजक से,

ऐसी शर्तों के (जिनके अंतर्गत यात्राओं की संख्या और उस रकम के बारे में जो प्रति व्यक्ति छूट प्राप्त होगी, शर्तें भी हैं) अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों को मंजूर की गर्इ यात्रा रियायत या सहायता को ध्यान में रखते हुए, विहित की जाएं, प्राप्त या उसे देय किसी यात्रा रियायत या सहायता का मूल्य:

परन्तु इस खंड के अधीन छूट प्राप्त रकम किसी भी मामले में, ऐसी यात्रा के प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत व्यय की रकम से अधिक नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी व्यष्टि के संबंध में, ''कुटुम्ब'' का अर्थ है :–

(i) व्यष्टि का पति या पत्नी और संतान; और

(ii) व्यष्टि के माता-पिता, भार्इ और बहन या उनमें से कोर्इ जो व्यष्टि पर पूरी तरह या मुख्य रूप से आश्रित है;

(5क) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया।]

(5ख) [वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया।]

(6) ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत का नागरिक नहीं है–

(i) [* * *]

(ii) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे किसी विदेशी राज्य के राजदूतावास, उच्चायोग, दूतावास, आयोग, वाणिज्यिक दूतावास या व्यापार प्रतिनिधि के पदधारी के रूप में, चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो, या किसी पदधारी के कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप में, उसके द्वारा ऐसी हैसियत से सेवा के लिए प्राप्त हो :

परन्तु ऐसे पारिश्रमिक को, जो उसे भारत में किसी विदेशी राज्य की सरकार के व्यापार आयुक्त या अन्य शासकीय प्रतिनिधि के रूप में (जो उस पद को उस हैसियत में अवैतनिक रूप में धारण न करता हो) या उन पदधारियों में से किसी के कर्मचारिवृंद के सदस्य के रूप में प्राप्त हो वैसी ही छूट प्राप्त होगी जैसी कि यथास्थिति सरकार के तत्समान पदधारियों के या उनके कर्मचारिवृंद के सदस्यों, यदि कोर्इ हों, को संबंधित देश में वैसे प्रयोजनों के लिए निवासी है, और जिसे उस देश में उसी प्रकार की छूट प्राप्त है:

परन्तु यह और कि ऐसे कर्मचारिवृंद के सदस्य उस देश की जनता है जिसका प्रतिनिधित्व किया जा रहा है और ऐसे कर्मचारिवृंद के सदस्य से अन्यथा किसी रूप में किसी कारबार या वृत्ति या नियोजन में नहीं लगे हुए हैं;

(iii) से (v) [उपखंड (ii) को उपखंड (ii) से (v) के स्थान पर वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से प्रतिस्थापित किया गया;]

(vi) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे किसी विदेशी उद्यम के कर्मचारी के रूप में भारत में उसके रहने के दौरान उसके द्वारा की गर्इ सेवाओं के लिए प्राप्त हो किन्तु यह तब जब कि निम्नलिखित शर्तें पूरी हों,–

() ऐसा विदेशी उद्यम भारत में किसी व्यापार या कारबार में नहीं लगा हुआ है;

() भारत में उसका रहना उस पूर्ववर्ष में कुल मिलाकर नब्बे दिन की कालावधि से अधिक नहीं है; और

() ऐसे पारिश्रमिक की, नियोजक की ऐसी आय में से जो इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य हो, कटौती नहीं की जा सकती;

(viक) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(vii) [वित्त अधिनियम, 1993 द्वारा 1.4.1993 से लोप किया गया;]

(viiक) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(viii) ''वेतन'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य कोर्इ आय, जो किसी ऐसे व्यष्टि को जो अनिवासी है किसी विदेशी पोत में अपने नियोजन के संबंध में की गर्इ सेवाओं के लिए पारिश्रमिक के रूप में उसे प्राप्त या देय हो जबकि भारत में उसका रहना पूर्ववर्ष में कुल मिलाकर नब्बे दिन की अवधि से अधिक नहीं;

(ix) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(x) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(xi) ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे भारत में अपने रहने के दौरान किसी विदेशी राज्य की सरकार के कर्मचारी के रूप में निम्नलिखित के किसी स्थापन कार्यालय में या निम्नलिखित के स्वामित्वाधीन किसी उपक्रम में अपने प्रशिक्षण के संबंध में प्राप्त हो,–

(i) सरकार; या

(ii) कोर्इ कंपनी जिसकी सारी समादत्त शेयर पूंजी केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किन्हीं राज्य सरकारों द्वारा या भागत: केन्द्रीय सरकार और भागत: एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा धारित है; या

(iii) कोर्इ कंपनी जो मद (ii) में उल्लिखित किसी कंपनी की समनुषंगी है; या

(iv) कोर्इ निगम जो केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित किया गया है; या

(v) कोर्इ सोसाइटी जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी तत्समान विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है और जिसका वित्त पोषण पूरी तरह से केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किन्हीं राज्य सरकारों द्वारा या भागत: केन्द्रीय सरकार और भागत:, एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है;

(6क) जहां किसी विदेशी कंपनी की दशा में जिसे उस विदेशी कंपनी द्वारा सरकार या किसी भारतीय समुत्थान से 31 मार्च, 1976 के पश्चात् किन्तु 1 जून, 2002 से पूर्व किए गए किसी करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान के स्वामिस्व या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस के रूप में आय व्युत्पन्न होती है और–

() जहां ऐसा करार भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है वहां ऐसा करार उस नीति के अनुसार है; और

() किसी अन्य दशा में, ऐसा करार केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है,

ऐसी आय पर कर, करार के निबंधनों के अधीन, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा केन्द्रीय सरकार को संदेय है इस प्रकार संदत्त कर।

स्पष्टीकरण.–इस खंड और खंड (6ख) के प्रयोजनों के लिए–

() ''तकनीकी सेवाओं के लिए फीस'' का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vii) के स्पष्टीकरण 2 में है;

() ''विदेशी कंपनी'' का वही अर्थ है जो धारा 80ख में है;

() ''स्वामिस्व'' का वही अर्थ है जो धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (vi) के स्पष्टीकरण 2 में है;

(6ख)जहां किसी अनिवासी को (जो कंपनी नहीं है) या किसी विदेशी कंपनी की दशा में, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी विदेशी राज्य की सरकार या किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन से 1 जून, 2002 से पूर्व किए गए करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान से कोर्इ ऐसी आय व्युत्पन्न होती है (जो वेतन, स्वामिस्व या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस के रूप में नहीं है), ऐसी आय पर कर सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा उस करार के या केन्द्रीय सरकार द्वारा उस तारीख से पूर्व अनुमोदित किसी अन्य संबंधित करार के निबंधनों के अधीन केन्द्रीय सरकार को संदेय है, इस प्रकार संदत्त कर;

(6खख) जहां किसी विदेशी राज्य की सरकार या किसी विदेशी उद्यम की दशा में, जिसे किसी ऐसी भारतीय कंपनी के, जो वायुयान के प्रचालन के कारबार में लगी हुर्इ है, 31 मार्च, 1997 के बाद किंतु 1 अप्रैल, 1999 से पूर्व या 31 मार्च, 2007 के बाद किए गए और इस संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित करार के अधीन वायुयान या वायुयान इंजन के पट्टे पर अर्जित किए जाने के प्रतिफल के रूप में आय व्युत्पन्न होती है (जो पट्टे पर लिए गए वायुयान के प्रचालन के संबंध में फालतू पुर्जे, सुविधाएं या सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए संदाय से भिन्न है) तथा ऐसी आय पर कर ऐसी भारतीय कंपनी द्वारा उस करार के निबंधनों के अधीन केन्द्रीय सरकार को संदेय है, वहां इस प्रकार संदत्त कर।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''विदेशी उद्यम'' पद से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अनिवासी है;

(6ग) ऐसी विदेशी कंपनी को, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में उल्लिखित करे भारत की सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं में भारत में या भारत से बाहर सेवाएं प्रदान करने के लिए उस सरकार के साथ हुए किसी करार के अनुसरण में, प्राप्त तकनीकी सेवाओं के लिए स्वामिस्व या फीस के रूप में उत्पन्न कोर्इ आय;

10[(6घ) किसी अनिवासी को, जो कोर्इ कंपनी या कोर्इ विदेशी कंपनी नहीं है, भारत में या भारत से बाहर राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन को प्रदान की जाने वाली तकनीकी सेवाओं से रायल्टी या उनके लिए फीस के माध्यम से उद्भूत होने वाली कोर्इ आय;]

(7) कोर्इ भी ऐसे भत्ते या परिलब्धियां, जो भारत के बाहर सेवा करने के लिए सरकार द्वारा भारत के किसी नागरिक को भारत के बाहर भुगतान या इस प्रकार अनुज्ञात की गर्इ हों;

(8) ऐसे व्यष्टि की दशा में, जिसको केन्द्रीय सरकार और किसी विदेशी राज्य की सरकार द्वारा किए गए करार के अनुसार (जिसके निबंधनों में इस खंड द्वारा दी गर्इ छूट के लिए उपबंध है) किन्हीं सहकारी तकनीकी सहायता कार्यक्रमों और परियोजनाओं के संबंध में भारत में कर्तव्य सौंपे गए हैं–

() ऐसा पारिश्रमिक, जो उसे ऐसे कर्तव्यों के लिए उस विदेशी राज्य की सरकार से प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: प्राप्त हो; और

() ऐसे व्यष्टि की अन्य आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसकी बाबत ऐसे व्यष्टि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश की सरकार को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे;

(8क) किसी परामर्शी के मामले में–

() अभिकरण और विदेशी सरकार के बीच तकनीकी सहायता अनुदान करार के अधीन किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन [जिसे इस खंड में और खंड (8ख) में अभिकरण कहा गया है] को उपलब्ध करार्इ गर्इ निधियों में से उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त कोर्इ पारिश्रमिक या फीस; और

() कोर्इ अन्य रकम जो उसे भारत के बाहर उद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में उद्भूत या उत्पन्न न समझी जाए, जिसके संबंध में ऐसे परामर्शी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश की सरकार को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में, ''परामर्शी'' का अर्थ है,–

(i) कोर्इ व्यष्टि जो भारत का नागरिक नहीं है या जो भारत का नागरिक है किंतु भारत में साधारणत: निवासी नहीं है; या

(ii) कोर्इ अन्य व्यक्ति जो अनिवासी है,

और जिसे किसी तकनीकी सहायता कार्यक्रम या परियोजना के संबंध में भारत में तकनीकी सेवाएं देने के लिए अभिकरण द्वारा लगाया गया है, परंतु यह तब जबकि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाएं, अर्थात् :–

(1) तकनीकी सहायता ऐसे करार के अनुसार है जो केन्द्रीय सरकार या अभिकरण द्वारा किया गया है, और

(2) परामर्शी को लगाए जाने से संबंधित करार का विहित प्राधिकारी ने इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदन कर दिया है;

(8ख) किसी व्यष्टि की दशा में, जिसको केन्द्रीय सरकार और अभिकरण द्वारा किए गए किसी करार के अनुसार किसी तकनीकी सहायता कार्यक्रम और परियोजना के संबंध में भारत में कर्तव्य सौंपे जाते हैं,–

() ऐसा पारिश्रमिक जो उसे ऐसे कर्तव्यों के लिए खंड (8क) में निर्दिष्ट किसी परामर्शी से प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: प्राप्त हो; और

() ऐसे व्यष्टि की कोर्इ अन्य आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसके संबंध में ऐसे व्यष्टि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने उद्भव देश को कोर्इ आयकर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे परंतु यह तब जब कि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाएं अर्थात् :–

(i) ऐसा व्यष्टि खंड (8क)में निर्दिष्ट परामर्शी का कर्मचारी है और जो भारत का नागरिक नहीं है या जो भारत का नागरिक तो है किंतु भारत में साधारणत: निवासी नहीं है; और

(ii) ऐसे व्यष्टि की सेवा की संविदा का विहित प्राधिकारी ने उसकी सेवा के आरंभ के पूर्व अनुमोदन कर दिया है;

(9) किसी ऐसे व्यष्टि के जैसा, यथास्थिति, खंड (8) या खंड (8क) या (8ख) में निर्दिष्ट है कुटुम्ब के किसी सदस्य की जो उसके साथ भारत में आया हो, ऐसी आय जो भारत के बाहर प्रोद्भूत या उत्पन्न हो और भारत में प्रोद्भूत या उत्पन्न हुर्इ न समझी जाए और जिसकी बाबत ऐसे सदस्य से यह अपेक्षा की जाती है कि यथास्थिति, उस विदेशी राज्य की सरकार या ऐसे सदस्य के उद्भव देश को कोर्इ आय-कर या सामाजिक सुरक्षा कर का संदाय करे;

(10) (i)कोर्इ ऐसा मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान जो, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार के संशोधित पेंशन नियमों के या केन्द्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के अधीन या संघ की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या संघ के अधीन रक्षा से संबंधित पदों या सिविल पदों के धारकों को (जो सदस्य या धारक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उक्त नियमों से शासित होते हैं) या अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों को या राज्य की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या राज्य के अंतर्गत सिविल पदों के धारण करने वालों या किसी स्थानीय प्राधिकारी के कर्मचारियों को लागू किसी समरूप स्कीम के अधीन प्राप्त किया गया हो या निवृत्ति उपदान का संदाय, जो रक्षा सेवाओं के सदस्यों को लागू पेंशन संहिता या विनियमों के अधीन प्राप्त किया गया हो;

(ii) कोर्इ ऐसा उपदान जो उपदान संदाय अधिनियम, 1972 (1972 का 39) के अधीन प्राप्त किया गया हो उस परिभाषा तक जहां तक वह उस अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (2) और (3) के उपबंधों के अनुसार, परिकलित रकम से अधिक नहीं है;

(iii) कोर्इ अन्य उपदान जो किसी कर्मचारी द्वारा अपने सेवानिवृत्त होने पर या ऐसे सेवानिवृत्त होने के पूर्व असमर्थ हो जाने पर या अपने नियोजन के पर्यवसान पर प्राप्त किया गया हो या कोर्इ ऐसा उपदान जो उसकी विधवा बच्चों या आश्रितों द्वारा उसकी मृत्यु पर प्राप्त किया गया हो, दोनों दशाओं में, उस मात्रा तक जहां तक वह संपूरित सेवा के हर एक वर्ष के लिए आठ मास के वेतन से अधिक हो जिसका परिकलन उस मास के, जिसमें ऐसी घटना घटती है, ठीक पूर्ववर्ती दस मास के औसत वेतन के आधार पर, ऐसी सीमा के अधीन रहते हुए किया जाए, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस सरकार के कर्मचारियों को इस निमित्त लागू सीमा को ध्यान में रखते हुए, विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां इस खंड के उल्लिखित उपदान किसी कर्मचारी द्वारा एक से अधिक नियोजक से एक ही पूर्ववर्ष में प्राप्त किए जाते हैं वहां इस खंड के अंतर्गत आय-कर की छूट प्राप्त कुल रकम इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी :

परन्तु यह और कि जहां ऐसा एक या अधिक उपदान किसी एक या अधिक पूर्ववर्ती वर्षों में प्राप्त किया गया था और ऐसे एक या अधिक उपदान की रकम को पूरी तरह से भागत: ऐसे पूर्ववर्ष या वर्षों की निर्धारिती की कुल आय में शामिल नहीं किया गया था, वहां इस खंड के अंतर्गत आय-कर से छूट प्राप्त रकम इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी जो ऐसे पूर्ववर्ष या वर्षों की कुल आय में शामिल न की गर्इ, यथास्थिति, रकम या कुल रकम को घटाने पर आती है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में और खंड (10कक) में ''वेतन'' का वही अर्थ है जो चौथी अनुसूची के भाग क के नियम 2 के खण्ड () में है;

(10क) (i)कोर्इ ऐसा संदाय जो केन्द्रीय सरकार के सिविल पेंशन (संराशीकरण) नियम के अंतर्गत या संघ की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या संघ के अंतर्गत रक्षा से संबंधित पदों या सिविल पदों को धारण करने वालों को (जो सदस्य या धारक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उक्त नियमों से शासित होते हैं) या अखिल भारतीय सेवा के सदस्यों को या रक्षा सेवाओं के सदस्यों को या किसी राज्य की सिविल सेवाओं के सदस्यों को या राज्य के अंतर्गत सिविल पदों के धारकों को या किसी स्थानीय प्राधिकारी के कर्मचारियों को या किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित निगम के कर्मचारियों को लागू किसी समरूप स्कीम के अधीन;

(ii) कोर्इ ऐसा भुगतान, जो किसी अन्य नियोजक की किसी स्कीम के अंतर्गत प्राप्त पेंशन के संराशीकरण के रूप में किया गया हो उस परिमाण तक जो निम्नलिखित से अधिक न हो–

() उस स्थिति में, जिसमें कर्मचारी कोर्इ उपदान प्राप्त करता है उस पेंशन के, जिसे प्राप्त करने का वह सामान्यत: हकदार है, एक तिहार्इ का संराशित मूल्य; और

() किसी अन्य स्थिति में, ऐसी पेंशन का आधा संराशित मूल्य,

और ऐसे संराशित मूल्य का अवधारण प्राप्तिकर्ता की आयु, उसके स्वास्थ्य की स्थिति, ब्याज की दर तथा शासकीय मान्यताप्राप्त मरण सारणियों को ध्यान में रखकर किया गया हो;

(iii) कोर्इ ऐसा भुगतान, जो खंड (23ककख) के अधीन निधि में से प्राप्त पेंशन के संराशीकरण के रूप में किया गया है;

(10कक)(i)कोर्इ ऐसा भुगतान, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति चाहे अधिवर्षिता पर या अन्यथा के समय उसके खाते में जमा अर्जित छुट्टी की अवधि के संबंध में छुट्टी वेतन के समतुल्य नकद के रूप में प्राप्त किया गया हो;

(ii) उपखंड (i)में उल्लिखित प्रकृति का कोर्इ ऐसा संदाय जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के कर्मचारी से भिन्न किसी कर्मचारी को चाहे अधिवर्षिता पर या अन्यथा उसके सेवानिवृत्त होने के समय उसके खाते में जमा अर्जित छुट्टी की दस मास से अनधिक अवधि के संबंध में प्राप्त किया गया हो, उस कर्मचारी द्वारा अपनी चाहे अधिवर्षिता पर या अन्यथा अपनी सेवानिवृत्ति के ठीक पहले दस माह की अवधि के दौरान लिए गए औसत वेतन के आधार पर ऐसी सीमा के अध्यधीन परिकलित किया गया हो, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस सरकार के कर्मचारियों को इस संबंध में लागू सीमा को ध्यान में रखते हुए, इस बाबत विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां ऐसे कोर्इ भुगतान किसी कर्मचारी द्वारा एक ही पूर्ववर्ष में एक से अधिक नियोजक द्वारा प्राप्त किए जाते हैं वहां इस उपखंड के अंतर्गत आय-कर से छूट की कुल रकम इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी :

परन्तु यह और कि जहां ऐसा भुगतान या ऐसे भुगतान किन्हीं एक या अधिक पूर्ववर्ती पूर्ववर्षों में भी प्राप्त किए गए हों और ऐसे भुगतान या भुगतानों की संपूर्ण रकम या उसका कोर्इ भाग ऐसे पूर्ववर्ष या पूर्ववर्षों की निर्धारिती की कुल आय में शामिल नहीं किया गया हो, वहां इस उपखंड के अधीन आयकर से छूट की कुल रकम इस प्रकार विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक नहीं होगी जो यथास्थिति, वह रकम या उन रकमों का योग घटा कर आए, जो किसी पूर्ववर्ष या पूर्ववर्षों की कुल आय में सम्मिलित नहीं है।

स्पष्टीकरण.–उपखंड (ii)के प्रयोजनों के लिए–

किसी कर्मचारी की अर्जित छुट्टी का हक उस नियोजक की जिसकी सेवा से वह सेवानिवृत्त हुआ है, की गर्इ वास्तविक सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए तीस दिन से अधिक नहीं होगा।

(10ख) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत या तदधीन जारी किए गए नियमों, आदेशों या अधिसूचनाओं के अंतर्गत या किन्हीं स्थायी आदेशों के अंतर्गत या किसी अधिनिर्णय या सेवा की संविदा के अंतर्गत या अन्यथा किसी कर्मकार द्वारा उसकी छंटनी के समय प्राप्त प्रतिकर :

परन्तु इस खंड के अंतर्गत छूट प्राप्त रकम,–

(i) वह रकम, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च के खंड () के उपबंधों के अनुसार परिकलित की गर्इ है; या

(ii) पचास हजार रुपए से अन्यून ऐसी रकम, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे,

इनमें से जो भी कम हो, से अधिक नहीं होगी :

परन्तु यह और कि पूर्ववर्ती परंतुक किसी कर्मकार द्वारा किसी ऐसी स्कीम के अंतर्गत प्राप्त किसी प्रतिकार के संबंध में लागू नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार जिन उपक्रमों में ऐसी स्कीम लागू होती है के कर्मकारों को विशेष संरक्षण देने की आवश्यकता को और अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इस संबंध में अनुमोदित करे।

स्पष्टीकरण.इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() किसी कर्मकार द्वारा उस उपक्रम के जिसमें वह नियोजित है बंद किए जाने के समय प्राप्त प्रतिकर उसकी छंटनी के समय प्राप्त होने वाला प्रतिकर समझा जाएगा;

() किसी कर्मचारी द्वारा उस उपक्रम के जिसमें वह नियोजित है के संबंध में नियोजक से नए नियोजक को उस उपक्रम के स्वामित्व या प्रबंध के अंतरण के समय (चाहे करार द्वारा या किसी विधि के लागू होने से) प्राप्त प्रतिकर उसकी छंटनी के समय प्राप्त प्रतिकर समझा जाएगा, यदि,–

(i) कर्मकार की सेवा ऐसे अंतरण के कारण विच्छिन्न हुर्इ है; या

(ii) ऐसे अंतरण के पश्चात् उस कर्मकार को लागू होने वाली सेवा की शर्तें और निबंधन अंतरण के ठीक पहले उसको लागू शर्तों और निबंधनों की अपेक्षा किसी बात में कम अनुकूल हैं; या

(iii) ऐसे अंतरण के निबंधनों के अधीन या अन्यथा नया नियोजक उस कर्मकार को उसकी छंटनी के मामले में, इस आधार पर प्रतिकर संदाय करने के लिए विधिक रूप से दायी नहीं है कि उसकी सेवा निरन्तर है और अंतरण से विच्छिन्न नहीं हुर्इ है;

() ''नियोजक'' और ''कर्मकार'' शब्दों के वही अर्थ हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में उनके हैं;

(10खख)भोपाल गैस विभीषिका (दावा कार्यवाही) अधिनियम, 1985 (1985 का 21) और उसके अंतर्गत बनार्इ किसी स्कीम के अंतर्गत किया गया कोर्इ भुगतान, भोपाल गैस विभीषिका के संबंध में, किसी निर्धारिती को किए गए भुगतान को छोड़कर, उस विस्तार तक जिस तक ऐसे निर्धारिती को ऐसी विभीषिका से हुर्इ हानि या नुकसान के कारण इस अधिनियम के अंतर्गत कटौती अनुज्ञात की गर्इ है;

(10खग)किसी व्यष्टि या उसके विधिक वारिस को किसी आपदा के संबंध में प्रतिकर के रूप में केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी से प्राप्त या प्राप्य कोर्इ राशि, उस सीमा तक, प्राप्त या प्राप्य राशि को छोड़कर, जिसकी ऐसे व्यष्टि या उसके विधिक वारिस को ऐसी आपदा से हुर्इ हानि या नुकसान के मद्दे इस अधिनियम के अधीन कोर्इ कटौती अनुज्ञात की गर्इ है।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "आपदा" पद का वही अर्थ है, जो उसका आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (2005 का 53) की धारा 2 के खंड () में है;

(10ग) (i) किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी; या

(ii) किसी अन्य कंपनी; या

(iii) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम के अंतर्गत स्थापित किसी प्राधिकरण; या

(iv) किसी स्थानीय प्राधिकारी; या

(v) किसी सहकारी सोसाइटी; या

(vi) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, 1956 (1956 का 3) की धारा 3 के अंतर्गत विश्वविद्यालय घोषित की गर्इ किसी संस्था; या

(vii) प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 (1961 का 59) की धारा 3 के खंड (छ) के अर्थ में किसी भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान; या

(viiक) किसी राज्य सरकार; या

(viiख) केन्द्रीय सरकार; या

(viiग) पूरे भारत या किसी राज्य या किन्हीं राज्यों में महत्व रखने वाली ऐसी संस्था, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;

(viii) ऐसे प्रबंध संस्थान, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में, अधिसूचन द्वारा, इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे,

के किसी कर्मचारी द्वारा अपनी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या अपनी सेवा की समाप्ति पर, स्वेच्छया सेवानिवृत्ति की किसी स्कीम या स्कीमों का उपखंड (i) में निर्दिष्ट पब्लिक सैक्टर कंपनी के मामले में, स्वेच्छया पृथक्करण स्कीम के अनुसार प्राप्त या प्राप्य कोर्इ रकम उस परिमाण तक जो पांच लाख रुपए से अधिक नहीं है :

परन्तु यथास्थिति, उक्त कंपनियों या प्राधिकारियों या सोसाइटियों या विश्व- विद्यालयों, अथवा उपखंड (vii) और उपखंड (viii) में निर्दिष्ट संस्थानों की, ऐसी रकम के भुगतान को शासित करने वाली स्कीमें ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार, (जिनके अंतर्गत, अन्य बातों के साथ-साथ, आर्थिक सुदृढ़ता का मापदंड भी सम्मिलित है) बनार्इ जाएंगी, जो विहित किए जाएं :

परन्तु यह और कि जहां किसी कर्मचारी को किसी निर्धारण वर्ष के लिए इस खंड के अंतर्गत छूट दी गर्इ है, वहां उसे उसके अधीन किसी अन्य निर्धारण वर्ष के संबंध में छूट नहीं दी जाएगी:

परंतु यह भी कि जहां निर्धारिती को उसकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति या सेवा की समाप्ति या स्वैच्छिक पृथक्करण पर प्राप्त की गर्इ या प्राप्य किसी राशि की बाबत किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 89 के अधीन कोर्इ राहत अनुज्ञात की गर्इ है, वहां इस खंड के अधीन ऐसे, या किसी अन्य, निर्धारण वर्ष के संबंध में उसे कोर्इ छूट अनुज्ञात नहीं की जाएगी;

(10गग) ऐसे कर्मचारी की दशा में, जो ऐसा कोर्इ व्यष्टि है जो परिलब्धि की प्रकृति की ऐसी आय प्राप्त कर रहा है जिसका कि धारा 17 के खंड (2) के अर्थांतर्गत धन संबंधी संदाय किए जाने के रूप में उपबंध नहीं है, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 200 में किसी बात के होते हुए भी ऐसे कर्मचारी की ओर से नियोजक के विकल्प पर उसके नियोजक द्वारा ऐसी आय पर वास्तव में संदत्त कर;

(10घ) जीवन बीमा पालिसी के अधीन प्राप्त कोर्इ राशि, जिसके अंतर्गत ऐसी पालिसी पर बोनस के रूप में आबंटित राशि भी है, जो,–

() धारा 80घघ की उपधारा (3) या धारा 80घघक की उपधारा (3) के अधीन प्राप्त किसी राशि से भिन्न है; या

() किसी की-मैन बीमा पालिसी के अधीन प्राप्त किसी राशि से भिन्न है; या

() ऐसी किसी बीमा पालिसी, जो 1 अप्रैल, 2003 को या उसके पश्चात् किंतु 31 मार्च, 2012 को या उसके पूर्व जारी की गर्इ हो, जिसके लिए पालिसी की अवधि के दौरान किसी वर्ष में संदेय प्रीमियम, वास्तविक बीमा पूंजी राशि के बीस प्रतिशत से अधिक है, के अधीन प्राप्त किसी राशि से भिन्न है; या

() 1 अप्रैल, 2012 को या उसके पश्चात् जारी की गर्इ किसी ऐसी बीमा पालिसी के अधीन प्राप्त कोर्इ राशि, जिसकी बाबत पालिसी की अवधि के दौरान किन्हीं वर्षों के लिए संदेय प्रीमियम वास्तविक बीमा पूंजी राशि के दस प्रतिशत से अधिक है;

परंतु उपखंड () और () के उपबंध किसी व्यक्ति की मृत्यु पर प्राप्त की गर्इ किसी राशि के संबंध में लागू नहीं होंगे :

परंतु यह और कि उपखंड () के अधीन वास्तविक बीमा पूंजी राशि की संगणना करने के प्रयोजन के लिए यथास्थिति, धारा 80ग की उपधारा (3) के स्पष्टीकरण या धारा 88 की उपधारा (2क) के स्पष्टीकरण को प्रभावी बनाया जाएगा :

परंतु यह भी कि जहां 1 अप्रैल, 2013 को या उसके पश्चात् जारी की गर्इ पालिसी ऐसे किसी व्यक्ति के जीवन बीमा के लिए है, जो,–

(i) धारा 80प में यथानिर्दिष्ट नि:शक्त व्यक्ति या गंभीर नि:शक्त व्यक्ति है; या

(ii) धारा 80घघख के अधीन बनाए गए नियमों में यथा विनिर्दिष्ट रोग या व्याधि से पीड़ित है,

वहां इस उपखंड के उपबंधों का प्रभाव यह होगा मानो "दस प्रतिशत" शब्दों के स्थान पर, "पन्द्रह प्रतिशत" शब्द रख दिए गए हैं।

स्पष्टीकरण 1–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "की-मैन बीमा पालिसी" से ऐसी जीवन बीमा पालिसी अभिप्रेत है, जो किसी व्यक्ति द्वारा, किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति के जीवन पर, जो प्रथम वर्णित व्यक्ति का कर्मचारी है या था या प्रथम वर्णित व्यक्ति के कारबार से किसी भी रीति से संबंधित है या था, कोर्इ जीवन बीमा पालिसी अभिप्रेत है; और इसके अंतर्गत ऐसी पालिसी भी है जो ऐसे किसी व्यष्टि को पालिसी की अवधि के दौरान किसी समय प्रतिफल सहित या उसके बिना, समनुदिष्ट की गर्इ है

स्पष्टीकरण 2.–उपखंड () के प्रयोजनों के लिए, "वास्तविक बीमा पूंजी राशि" पद का वही अर्थ है, जो धारा 80ग की उपधारा (3क) के स्पष्टीकरण में उसका है;

(11) कोर्इ संदाय जो ऐसी किसी भविष्य निधि में से किया गया हो जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित और उसके द्वारा राजपत्र में इस संबंध में अधिसूचित किसी अन्य भविष्य निधि में से किया गया हो;

(11क) सरकारी बचत बैंक अधिनियम, 1873 (1873 का 5) के अधीन बनाया गया सुकन्या समृद्धि खाता नियम, 2014 के अनुसार खोले गए खाते से कोर्इ संदाय;

(12) कोर्इ ऐसा संचित अतिशेष जो किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले कर्मचारी को देय हो तथा संदेय हो जाए, उस परिमाण तक जो चौथी अनुसूची के भाग क के नियम 8में उपबंधित है;

(12क) धारा 80गगघ में निर्दिष्ट पेंशन स्कीम से अपना खाता बंद करने या उससे बाहर निकलने का विकल्प देने पर किसी 11[निर्धारिती] को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली न्यास उस परिमाण तक, जहां तक यह उसके खाता बंद करने या स्कीम छोड़ने के विकल्प के समय उसे संदेय कुल रकम के 11क[चालीस] प्रतिशत से अधिक नहीं है;

12[(12ख) राष्ट्रीय पेंशन स्कीम न्यास से किसी कर्मचारी को धारा 80गगघ में निर्दिष्ट पेंशन स्कीम के अधीन, पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2013 और उसके अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन विनिर्दिष्ट निबंधनों और शर्तों के अनुसार उसके खाते से आंशिक रूप से रकम निकाले जाने पर कोर्इ संदाय, उस परिमाण तक, जो उसके द्वारा किए गए अभिदायों की रकम के पच्चीस प्रतिशत से अधिक न हो;]

(13) किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि में से ऐसा संदाय जो–

(i) किसी हिताधिकारी की मृत्यु पर किया गया हो; अथवा

(ii) किसी कर्मचारी को, उल्लिखित आयु का हो जाने पर या उसके पश्चात् निवृत्ति पर या ऐसी निवृत्ति से पूर्व अशक्त हो जाने पर, वार्षिकी के बदले में उसके संराशीकरण के रूप में किया गया हो; अथवा

(iii) किसी हिताधिकारी की मृत्यु पर अभिदायों के प्रतिदाय के तौर पर किया गया हो, अथवा

(iv) किसी कर्मचारी को, उस दशा में, जिसमें उसने वह सेवा, जिसके संबंध में निधि स्थापित की है, उल्लिखित आयु का हो जाने या उसके पश्चात् निवृत्त होने या ऐसे निवृत्त होने से पूर्व अशक्त हो जाने से छोड़ी है, अभिदायों के प्रतिदाय के तौर पर किया गया हो, उस परिमाण तक जिस तक कि ऐसा भुगतान इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किए गए अभिदायों और उन पर के ब्याज से अधिक नहीं होता है; अथवा;

(v) धारा 80गगघ में विनिर्दिष्ट और केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित राष्ट्रीय पेंशन स्कीम के अधीन कर्मचारी के खाते में अंतरण के माध्यम से;

(13क) कोर्इ ऐसा विशेष भत्ता जो किसी निर्धारिती द्वारा उसके अधिभोग में निवास-स्थान के संबंध में किराए के (चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो) भुगतान पर वास्तव में हुए व्यय की पूर्ति के लिए उस निर्धारिती को उसके नियोजक द्वारा उल्लिखित रूप से दिया गया हो उस परिमाण तक जिस तक कि वह उस क्षेत्र या स्थान को, जिसमें ऐसी जगह स्थित है और अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए विहित किया जाए।

स्पष्टीकरण.–शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस खंड की कोर्इ बात किसी दशा में लागू नहीं होगी जिसमें–

() निर्धारिती के अधिभोग में के निवास स्थान का वह स्वामी है; या

() निर्धारिती ने अपने अधिभोग में निवास स्थान की बाबत किराए के (चाहे वह किसी भी नाम से जाना जाता हो) भुगतान पर वास्तव में व्यय उपगत नहीं किया है;

(14) (i) उन व्ययों की, जो लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में संपूर्णत:, आवश्यकत: और अनन्यत: उपगत किए गए हों, पूर्ति के लिए विनिर्दिष्ट रूप से दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता या फायदा, जो धारा 17 के खंड (2) के अर्थ में परिलब्धि की प्रकृति का नहीं है और जो विहित किया जाए उस परिमाण तक जिस तक ऐसे व्यय उस प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत किए जाते हैं;

(ii) निर्धारिती को, उस स्थान पर जहां वह लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्य सामान्यतया करता है या जहां वह सामान्यतया निवास करता है, उसके व्यक्तिगत खर्चे को चुकाने के लिए या बढ़े हुए निर्वाह व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ ऐसा भत्ता, उस मात्रा तक जो विहित किया जाए:

परन्तु उपखंड (ii) की कोर्इ बात, निर्धारिती को उसके पद या नियोजन से संबंधित विशेष प्रकृति के कर्तव्यों का पालन करने के लिए उसे पारिश्रमिक देने या प्रतिकर देने के लिए मंजूर व्यक्तिगत भत्ते की प्रकृति के किसी भत्ते को तब तक लागू नहीं होगी जब तक ऐसा भत्ता उसकी तैनाती के स्थान या निवास-स्थान से संबंधित न हो;

(14क) [***]

(15) (i) ऐसी प्रतिभूतियों, बंधपत्रों, वार्षिकी पत्रों, बचत पत्रों, केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए अन्य पत्रों और निक्षेपों पर ब्याज के रूप में आय उनके मोचन पर प्रीमियम या उन पर अन्य भुगतान, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों और निबंधनों के अध्यधीन, जो उक्त अधिसूचना में उल्लिखित किए जाएं, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;

(iiख) व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में, ऐसे पूंजी विनिधान बंधपत्र पर ब्याज जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे:

परन्तु केन्द्रीय सरकार इस उपखंड के प्रयोजनार्थ 1 जून, 2002 को या उसके बाद ऐसे पूंजी विनिधान बंधपत्रों को विनिर्दिष्ट नहीं करेगी;

(iiग) व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में, ऐसे राहत बंधपत्र पर ब्याज, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;

(iiघ) ऐसे बंधपत्रों पर ब्याज, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उल्लिखित करे, जो निम्नलिखित से उत्पन्न हो–

() अनिवासी भारतीय, जो बंधपत्रों का स्वामी व्यष्टि है; या

() कोर्इ व्यष्टि जो किसी अनिवासी भारतीय के नामनिर्देशिती या उत्तरजीवी होने के आधार पर बंधपत्रों का स्वामी है; या

() कोर्इ व्यष्टि, जिसे अनिवासी भारतीय द्वारा बंधपत्र का दान किया गया है :

परन्तु यह तब जबकि पूर्वोक्त बंधपत्र अनिवासी भारतीय द्वारा विदेशी मुद्रा में क्रय किए गए हों और ऐसे बंधपत्रों के संबंध में प्राप्त ब्याज और मूलधन को, चाहे उनकी परिपक्वता पर या अन्यथा, भारत के बाहर ले जाने की अनुमति नहीं है :

परन्तु यह और कि जहां कोर्इ व्यष्टि, जो किसी ऐसे पूर्ववर्ष में, जिसमें बंधपत्रों को अर्जित किया गया है, अनिवासी भारतीय है, किसी पश्चात्वर्ती वर्ष में भारत का निवासी बन जाता है, वहां इस उपबंध के उपखंड ऐसे व्यष्टि के संबंध में लागू होते रहेंगे :

परन्तु यह भी कि ऐसे मामलों में जहां बंधपत्रों के परिपक्व होने के पहले किसी पूर्ववर्ष में बंधपत्रों को ऐसे व्यष्टि द्वारा भुना लिया जाता है, जो ऐसा करने का हकदार है, वहां इस उपखंड के उपबंध ऐसे पूर्ववर्ष से सुसंगत निर्धारण वर्ष के संबंध में ऐसे व्यष्टि को लागू नहीं होंगे :

परन्तु यह भी कि केन्द्रीय सरकार इस उपखंड के प्रयोजनार्थ 1 जून, 2002 को या उसके बाद ऐसे बंधपत्रों को विनिर्दिष्ट नहीं करेगी।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ''अनिवासी भारतीय'' अभिव्यक्ति का वही अर्थ है जो उसका धारा 115ग के खंड () में है;

(iii) सीलोन मानेटरी लॉ ऐक्ट, 1949 के अधीन गठित सेंट्रल बैंक ऑफ सीलोन के निर्गमन विभाग द्वारा धारित प्रतिभूतियों पर ब्याज;

(iiiक) भारत के बाहर किसी देश में निगमित और उस देश में केन्द्रीय बैंककारी कृत्य करने के लिए प्राधिकृत बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमोदन से किसी अनुसूचित बैंक में किए गए जमा पर उस बैंक को देय ब्याज।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ''अनुसूचित बैंक'' का वही अर्थ है जो धारा 36 की उपधारा (1) के खंड (viiक) के स्पष्टीकरण के खंड (ii) में उसका है;

(iiiख) नोर्डिक इन्वेस्टमेंट बैंक को, जो डेनमार्क, फिनलैंड, आर्इसलैंड, नोर्वे तथा स्वीडन की सरकारों द्वारा गठित एक बहुआयामी वित्तीय संस्था है, केन्द्रीय सरकार द्वारा उस बैंक के साथ तारीख 25 नवंबर, 1986 को किए गए समझौता ज्ञापन के निबंधनों के अनुसार केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित परियोजना के लिए इसके द्वारा दिए गए उधार पर देय ब्याज;

(iiiग) यूरोपीयन इन्वेस्टमेंट बैंक को, 25 नवंबर, 1993 को केंद्रीय सरकार द्वारा उस बैंक के साथ किए गए वित्तीय सहयोग संबंधी आधारभूत करार के अनुसरण में उसके द्वारा दिए गए उधार पर संदेय ब्याज;

(iv) ऐसा ब्याज जो–

() सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उन धनराशियों के लिए, जो उसने 1 जून, 2001 से पूर्व भारत के बाहर स्रोतों से उधार ली हों या उन ऋणों पर जिनकी उस पर 1 जून, 2001 से पूर्व भारत के बाहर स्रोतों की देनदारी हो, देय हो;

() भारत में किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा उन धनराशियों पर देय हो, जो उसने विदेश में ही किसी ऐसी वित्तीय संस्था के साथ, जैसी केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस संबंध में अनुमोदित की जाए, 1 जून, 2001 से पूर्व किए गए किसी उधार करार के अधीन उधार ली हो;

() भारत में किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा किसी ऐसी धनराशियों या ऋण पर संदेय हो जो उसने भारत के बाहर कच्चे माल या संघटक या पूंजी संयंत्रा और मशीनरी के क्रय के संबंध में विदेश में 1 जून, 2001 से पहले उधार ली है या प्राप्त की है जो उस सीमा तक जिस तक ऐसा ब्याज, जो उस रकम से अधिक नहीं है जो उधार या ऋण के और इसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखकर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो।

स्पष्टीकरण 1–इस मद के प्रयोजनों के लिए ''पूंजी संयंत्रा और मशीनरी के क्रय'' के अंतर्गत किसी भाड़े पर क्रय करने के लिए किसी करार के अंतर्गत ऐसे पूंजी संयंत्रा और मशीनरी के क्रय के विक्रय के साथ पट्टा करार भी है।

स्पष्टीकरण 2 - शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषणा की जाती है कि भारत के बाहर से किसी पोत के क्रय की बाबत पोत विघटन के कारबार में लगे किसी उपक्रम द्वारा भारत के बाहर संदेय आवधिक ब्याज, भारत के बाहर किसी क्रय की बाबत विदेश में उपगत ऋण पर संदेय ब्याज समझा जाएगा;

(घ) औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) द्वारा स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, या भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) के अंतर्गत स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक या भारतीय निर्यात-आयात बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 28) के अंतर्गत स्थापित भारतीय निर्यात-आयात बैंक या राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक या भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 के अंतर्गत स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक या भारतीय औद्योगिक प्रत्यय और निवेश निगम [जो भारतीय कंपनी अधिनियम, 1913 (1913 का 7) के अंतर्गत बनाया गया है और पंजीकृत कम्पनी है] द्वारा किन्हीं ऐसी रकमों पर संदेय है जो उसने भारत के बाहर स्रोतों से 1 जून, 2001 से पूर्व उधार ली हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जो उधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखकर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो;

(ड़) भारत में स्थापित किसी अन्य वित्त संस्था द्वारा या किसी बैंकिंग कम्पनी द्वारा जिसको बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है (जिसमें वह बैंक या बैंकिंग संस्था भी है जिसके लिए उस अधिनियम की धारा 51 में उल्लेख किया गया है) उन रकमों पर संदेय हो जिन्हें उसने भारत के बाहर स्रोतों से 1 जून, 2001 से पूर्व केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत उधार लिया हो जहां रकम या तो भारत में औद्योगिक उपक्रमों को भारत के बाहर कच्चा माल या पूंजी संयंत्रा और मशीनरी के क्रय के अथवा ऐसे किसी माल के आयात करने के प्रयोजन के लिए जिसका आयात करना केन्द्रीय सरकार लोकहित में आवश्यक समझे, उधार ली हो, उसी सीमा तक, जिस तक ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिसको उधार और इसके प्रतिसंदाय की शर्तों को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित की गर्इ है;

() भारत में के किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा उन रकमों पर संदेय हो जो भारत के बाहर के स्रोतों से 1 जून, 2001 से पूर्व केन्द्रीय सरकार द्वारा औद्योगिक विकास की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत विदेशी करेन्सी में उधार ली हो, उस सीमा तक जिस तक ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिनका आधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को देखते हुए, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणित किया गया हो;

(चक) किसी अनुसूचित बैंक द्वारा किसी अनिवासी को या किसी ऐसे व्यक्ति को जो धारा 6 की उपधारा (6) के अर्थ में साधारण रूप से निवासी नहीं है विदेशी मुद्रा में निक्षेपों पर वहां प्रतिसंदेय हो, जहां बैंक द्वारा किए गए ऐसे निक्षेपों को स्वीकार करना भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित किया गया हो।

स्पष्टीकरण.–इस मद के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित बैंक" पद से, भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित कोर्इ समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित कोर्इ तत्स्थानी नया बैंक या ऐसा कोर्इ अन्य बैंक अभिप्रेत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की दूसरी अनुसूची में सम्मिलित बैंक है, किंतु इसके अंतर्गत कोर्इ सहकारी बैंक नहीं है;

() भारत में बनार्इ गर्इ और पंजीकृत किसी पब्लिक कंपनी द्वारा जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण के या क्रय के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करना है, और जो ऐसी कंपनी है जो धारा 36 की उपधारा (1) के उपखंड (viii) के अंतर्गत कटौती के लिए पात्रा है, उन रकमों पर प्रतिसंदेय है जिन्हें उसने भारत के बाहर के स्रोतों से केन्द्रीय सरकार द्वारा 1 जून, 2003 से पूर्व अनुमोदित उधार करार के अंतर्गत, विदेशी करेन्सी में उधार लिया हो, उस सीमा तक जिस तक कि ऐसा ब्याज, ब्याज की उस रकम से अधिक नहीं है जिसकी उधार और उसके प्रतिसंदाय की शर्तों को देखते हुए केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित दर पर संगणना की गर्इ हो।

स्पष्टीकरण.–मद (), (चक) और () के प्रयोजनों के लिए ''विदेशी करेन्सी'' पद का वही अर्थ है जो उसका विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) में है;

() किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी द्वारा बंध पत्रा या डिबेंचरों के संबंध में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए प्रतिसंदेय हो, जिनमें यह शर्त सम्मिलित है कि ऐसे बंधपत्रों या डिबेंचरों का धारक अपना नाम और धृति उस कंपनी में पंजीकृत कराएगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;

() सरकार द्वारा ऐसे निक्षेपों पर संदेय हो, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या पब्लिक सेक्टर कंपनी के किसी कर्मचारी द्वारा जैसी केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त बनाए, स्कीम के अनुसार अपनी सेवानिवृत्ति पर चाहे, अधिवर्षिता पर हो या अन्यथा, अपने शोध्य धन से किए गए हों।

स्पष्टीकरण 1.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ''औद्योगिक उपक्रम'' पद से कोर्इ ऐसा उपक्रम अभिप्रेत है जो निम्नलिखित में लगा हुआ है, अर्थात् :

() माल का विनिर्माण या, प्रसंस्करण; अथवा

(कक) कम्प्यूटर साफ्टवेयर का विनिर्माण या किसी डिस्क, टेप, विछिद्रित मीडिया या किसी अन्य सूचना युक्ति पर कार्यक्रम की रिकार्डिंग; अथवा

() विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति का उत्पादन या वितरण का कारबार; अथवा

(खक) दूर संचार सेवाएं उपलब्ध कराने का कारबार; अथवा

() खनन; अथवा

() पोतों का सन्निर्माण; अथवा

(घक) पोत विघटन का कारबार, या

() पोतों या विमानों का प्रचालन या रेल प्रणालियों का सन्निर्माण या प्रचालन।

स्पष्टीकरण 1क.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ''ब्याज'' पद के अंतर्गत उधार के विलंबित संदाय पर या व्यतिक्रम पर संदत्त किया गया ब्याज सम्मिलित नहीं होगा यदि ऐसा ब्याज, ऐसे ऋण की शर्तों के अनुसार संदेय ब्याज की दर से दो प्रतिशत वार्षिक अधिक है।

स्पष्टीकरण 2.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''ब्याज'' पद के अंतर्गत करेन्सी के उतार चढ़ाव के मद्दे हैजिंग लेन-देन प्रभार सम्मिलित हैं;

(v) () कल्याण आयुक्त, भोपाल गैस पीड़ित, भोपाल द्वारा रिजर्व बैंक के एस जी एल खाता सं. एस एल/डी एच 048 में धारित प्रतिभूतियों पर ब्याज;

() भारतीय रिजर्व बैंक या किसी पब्लिक सेक्टर बैंक में, जैसा केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे, भोपाल गैस रिसाव आपदा के पीड़ितों के फायदों के लिए ऐसे खाते में धारित निक्षेप पर ब्याज चाहे वे भूतलक्षी रूप में हो या भविष्यलक्षी रूप में हो किन्तु इस संबंध में किसी भी दशा में 1 अप्रैल, 1994 से पहले न हो।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए, ''पब्लिक सेक्टर बैंक'' पद का वही अर्थ होगा जो इसका खंड (23घ) के स्पष्टीकरण  में है;

(vi) केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित स्वर्ण जमा स्कीम, 1999 के अधीन जारी किए गए स्वर्ण जमा बंधपत्रों या स्वर्ण मुद्रीकरण स्कीम, 2015 के अधीन जारी निक्षेप प्रमाणपत्रों पर ब्याज;

(vii) ऐसे बंधपत्रों पर ब्याज–

() जिन्हें किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा या किसी राज्य पूलकृत वित्त इकार्इ (स्टेट पूल्ड फाइनेंस एन्टिटी) द्वारा जारी किया जाए; और

() जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए।

स्पष्टीकरण–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए, "राज्य पूलकृत वित्त इकार्इ" पद से ऐसी इकार्इ अभिप्रेत है, जो केन्द्रीय सरकार के शहरी विकास मंत्रालय द्वारा अधिसूचित पूलकृत वित्त विकास स्कीम संबंधी दिशानिर्देशों के अनुसार स्थापित की जाती है;

(viii) किसी अनिवासी द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो मामूली तौर पर भारत में निवासी नहीं है, विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 की धारा 2 के खण्ड () में निर्दिष्ट अपतट बैंककारी यूनिट में 1 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात् किए गए निक्षेप पर प्राप्त ब्याज के रूप में कोर्इ आय;

वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.4.2020 से धारा 10 के खंड (15) के उपखंड (viii) के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड (ix) अंत:स्थापित किया जाएगा:

(ix) किसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र में अवस्थित किसी इकार्इ द्वारा किसी अनिवासी को, उसके द्वारा 1 सितंबर, 2019 को या उसके पश्चात् उधार ली गर्इ रकम के संबंध में संदेय ब्याज के रूप में कोर्इ आय:

स्पष्टीकरण—इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए,—

() "अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र" का वही अर्थ होगा, जो उसका विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड () में है;

() "इकार्इ" का वही अर्थ होगा, जो उसका विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड (यग) में है;

(15क) ऐसा कोर्इ संदाय जो वायुयान के प्रचालन के कारबार में लगी किसी भारतीय कम्पनी द्वारा किसी विदेशी राज्य की सरकार या विदेशी उद्यम से जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित करार और जो 1 अप्रैल, 1997 और 31 मार्च, 1999 के बीच किया गया करार नहीं है के अधीन पट्टे पर वायुयान या वायुयान इंजन (पट्टे पर दिए गए वायुयान के प्रचालन के संबंध में पुर्जे, सुविधाएं या सेवाएं प्रदान करने के लिए संदाय से भिन्न) अर्जित करने के लिए किया गया है :

परन्तु इस खंड की कोर्इ बात 1 अप्रैल, 2007 को या उसके पश्चात् किए गए ऐसे किसी करार को लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''विदेशी उद्यम'' पद से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अनिवासी है;

(16) शिक्षा खर्च को पूरा करने के लिए प्रदान की गर्इ छात्रावृत्तियां;

(17)निम्नलिखित के रूप में कोर्इ आय अर्थात्–

(i) कोर्इ ऐसा दैनिक भत्ता जो किसी व्यक्ति द्वारा संसद या किसी विधानमंडल की या उसकी किसी समिति की सदस्यता के कारण प्राप्त किया गया है;

(ii) कोर्इ ऐसा भत्ता जो किसी व्यक्ति द्वारा संसद की सदस्यता के कारण संसद सदस्य (निर्वाचन क्षेत्रा भत्ता) नियम, 1986 के अंतर्गत प्राप्त किया गया है;

(iii) कोर्इ निर्वाचन क्षेत्रा भत्ता, जो किसी व्यक्ति द्वारा किसी राज्य विधान-मंडल द्वारा बनाए गए किसी अधिनियम या नियम के अधीन उस राज्य विधान-मंडल की उसकी सदस्यता के कारण प्राप्त किया गया है;

(17क)निम्नलिखित रूप में किया गया कोर्इ संदाय चाहे वह नकदी रूप में हो या वस्तु के रूप में–

(i) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा लोक हित में संस्थित अथवा किसी अन्य निकाय द्वारा संस्थित और केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अनुमोदित पुरस्कार के अनुसरण में; या

(ii) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा ऐसे प्रयोजनों के लिए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में लोक हित में अनुमोदित किए जाएं, पारितोषिक रूप में किया गया संदाय;

(18) निम्नलिखित रूप में कोर्इ आय–

(i) ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राप्त पेंशन जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा में रहा है और ''परमवीर चक्र'' या ''महावीर चक्र'' या "वीर चक्र" अथवा अन्य कोर्इ वीरता पुरस्कार जो केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे;

(ii) उपखंड (i) में उल्लिखित किसी व्यक्ति के परिवार के सदस्य द्वारा प्राप्त कुटुम्ब पेंशन।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''कुटुम्ब'' पद का वही अर्थ होगा जो इसके खंड (5) के स्पष्टीकरण में है;

(18क) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(19) संघ के सशस्त्रा बलों के (जिसके अंतर्गत अर्द्धसैनिक बल भी हैं), किसी सदस्य की यथास्थिति विधवा या उसके बच्चों या नामनिर्दिष्ट वारिसों द्वारा प्राप्त कुटुंब पेंशन, जहां ऐसे सदस्य की मृत्यु युद्ध संबंधी कर्तव्यों के दौरान ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए हुर्इ हो, जो विहित की जाएं;

(19क)किसी शासक के अधिभोगाधीन किसी महल का वार्षिक मूल्य जो ऐसा महल है जिसके वार्षिक मूल्य को, संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ के पहले, यथास्थिति, विलयित राज्य (कराधान रियायत) आदेश, 1949 के या भाग ख राज्य (कराधान रियायत) आदेश, 1950 के या जम्मू-कश्मीर (कराधान रियायत) आदेश, 1958 के उपबंधों के आधार पर आयकर से छूट प्राप्त थी:

परन्तु एक अप्रैल, 1972 से आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए ऐसे शासक के अधिभोगाधीन प्रत्येक महल का वार्षिक मूल्य, सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान आयकर से छूट प्राप्त होगा;

(20) किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी आय जो ''गृह सम्पत्ति से आय'', ''पूंजी अभिलाभ'' या ''अन्य स्रोतों से आय'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य है या उसके द्वारा चलाए गए व्यापार या कारबार से होने वाली ऐसी आय जो किसी वस्तु के प्रदाय या सेवा से (जो जल या विद्युत नहीं है) अपनी ही अधिकारिता वाले क्षेत्रा के भीतर या अपनी अधिकारिता वाले क्षेत्रा के भीतर या बाहर जल या विद्युत के प्रदाय से प्रोद्भूत या उद्भूत होता है।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनार्थ, ''स्थानीय प्राधिकारी'' पद से अभिप्रेत है–

(i) ऐसी पंचायत जो संविधान के अनुच्छेद 243 के खंड () में निर्दिष्ट है; या

(ii) ऐसी नगरपालिका जो संविधान के अनुच्छेद 243त के खंड () में निर्दिष्ट है; या

(iii) नगरपालिका समिति और जिला बोर्ड,

जो नगरपालिका या स्थानीय निधि के नियंत्राण या प्रबंध के लिए विधिक रूप से हकदार है या जिसे सरकार द्वारा ऐसा कार्य सौंपा गया है; या

(iv) छावनी बोर्ड जो छावनी अधिनियम, 1924 (1924 का 2) की धारा 3 में परिभाषित है;

(20क) [* * *]

(21) धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) या खंड (iii) के प्रयोजन के लिए तत्समय अनुमोदित किसी अनुसंधान संगम की कोर्इ आय :

परन्तु यह तब जबकि अनुसंधान संगम–

() अपनी आय का, उन उद्देश्यों के लिए जिनके लिए उसकी स्थापना की गर्इ है, पूर्णतया और अनन्य रूप से उपयोग करता है या उपयोग करने के लिए संचय करता है और धारा 11 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध, ऐसे संचय के संबंध में निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए लागू होंगे, अर्थात् :–

(i) उपधारा (2) में,–

(1) ''उपधारा (1) के स्पष्टीकरण के साथ पठित उस उपधारा के खंड () या खंड () में उल्लिखित'' शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों का लोप किया जाएगा;

(2) ''पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों में'' शब्दों के स्थान पर ''वैज्ञानिक अनुसंधान या सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान या सांख्यिकीय अनुसंधानके प्रयोजनों के लिए'' शब्द रखे जाएंगे;

(3) उसके खंड () में ''निर्धारण अधिकारी'' के संदर्भ में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ii) या खंड (iii) में उल्लिखित ''विहित प्राधिकारी'' के संदर्भ में है;

(ii) उपधारा (3) में, खंड (क) में, ''पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों'' शब्दों के स्थान पर ''वैज्ञानिक अनुसंधान या सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान या सांख्यिकीय अनुसंधान के प्रयोजनों'' शब्द रखे जाएंगे; और

() अपनी निधियों का जो निम्नलिखित से भिन्न है, अर्थात् :–

(i) अनुसंधान संगम द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां जहां ऐसी आस्तियां 1 जून, 1973 को संगम की निधि की सम्पत्ति का भाग थीं;

(ii) 1 मार्च, 1983 के पूर्व अनुसंधान संगम द्वारा अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कम्पनी या निगम द्वारा या उसकी पुरोधृत डिबेंचर हैं);

(iii) अनुसंधान संगम को आबंटित बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि जो उपखंड (i) में उल्लिखित निधि की सम्पत्ति का भाग है;

(iv) आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी अन्य वस्तु के रूप में जो बोर्ड राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से विनिर्दिष्ट करे, प्राप्त किए गए और रखे गए स्वैच्छिक अंशदान,

पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित एक या अधिक रूपों या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करता है:

परन्तु यह और कि नकद रूप में स्वैच्छिक अंशदान या इस खंड के पहले परन्तुक के खंड () में उल्लिखित प्रकृति के स्वैच्छिक अंशदान से भिन्न स्वैच्छिक अंशदान के संबंध में इस खंड के अधीन छूट से इंकार नहीं किया जाएगा किंतु यह इस शर्त के अधीन होगा कि ऐसा स्वैच्छिक अंशदान अनुसंधान संगम द्वारा पूर्ववर्ष के अंत से, जिसमें ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 1992 से, इनमें जो भी पश्चात्वर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात्, धारा 11 की उपधारा (5) में विशेषत: उल्लिखित रूप या पद्धतियों से अन्यथा किसी रूप या पद्धतियों से धारित नहीं किया जाता:

परन्तु यह भी कि इस खंड की कोर्इ बात, अनुसंधान संगम की ऐसी किसी आय के बारे में, जो कारबार के लाभ या अभिलाभ है, तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि वह कारबार उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक न हो और उसके द्वारा ऐसे कारबार के बारे में पृथक् लेखा बहियां नहीं रखी जातीं:

परन्तु यह भी कि जहां अनुसंधान संगम केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है और तत्पश्चात् सरकार का यह समाधान हो जाता है कि–

(i) अनुसंधान संगम ने अपनी आय का उपयोग पहले परन्तुक के खंड () में के उपबंधों के अनुसार नहीं किया है; या

(ii) अनुसंधान संगम ने अपनी निधियों का पहले परन्तुक के खंड (ख) में के उपबंधों के अनुसार निवेश या निक्षेप नहीं किया है; या

(iii) अनुसंधान संगम के क्रियाकलाप प्रामाणिक नहीं हैं; या

(iv) अनुसंधान संगम के क्रियाकलाप ऐसी सभी या किन्हीं शर्तों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं जिनके अधीन ऐसा संगम अनुमोदित किया गया था,

वहां वह, संबंधित संगम को प्रस्तावित अनुमोदन वापस लेने के लिए कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देने के बाद किसी भी समय आदेश द्वारा अनुमोदन वापस ले सकेगी और ऐसा अनुमोदन वापस लेने संबंधी आदेश की प्रति ऐसे संगम को और निर्धारण अधिकारी को भेज सकेगी;

(22) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(22क) [वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1999 से लोप किया गया;]

(22ख) केवल समाचारों के संग्रहण और वितरण के लिए भारत में स्थापित किसी ऐसी समाचार एजेंसी की आय जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विशेषत: उल्लिखित करे:

परन्तु यह तब जबकि समाचार एजेंसी केवल समाचारों के संग्रहण और वितरण के लिए अपनी आय का उपयोग करती है या उपयोग करने के लिए संचय करती है और अपनी आय का किसी भी रीति से अपने सदस्यों को वितरण नहीं करती है:

परन्तु यह और कि इस खंड के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी की गर्इ कोर्इ अधिसूचना, किसी एक समय पर, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए जो तीन निर्धारण वर्षों से (जिनमें उस तारीख के, जिसको ऐसी अधिसूचना जारी की जाती है, पूर्व प्रारंभ होने वाला निर्धारण वर्ष या होने वाले निर्धारण वर्ष सम्मिलित हैं) अधिक न हों, जैसा अधिसूचना में विशेषत: विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रभावी होगी:

परन्तु यह भी कि जहां समाचार एजेंसी को केन्द्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट कर दिया गया है और तत्पश्चात् उस सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी समाचार एजेंसी ने अपनी आय का उपयोग या संचयन या वितरण पहले परन्तुक के उपबंधों के अनुसार नहीं किया है तो वह, कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् किसी भी समय, अधिसूचना विखंडित कर सकेगी और ऐसी अधिसूचना को विखंडित करने संबंधी आदेश की एक प्रति ऐसी एजेंसी और निर्धारण अधिकारी को भेज सकेगी;

(23) [वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया।]

(23क) भारत में स्थापित ऐसे संगम या संस्था की आय जिसका उद्देश्य, विधि, चिकित्सा, लेखाकर्म, इंजीनियरी या स्थापत्यकला की वृत्ति या ऐसी अन्य वृत्ति का जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे, नियंत्राण पर्यवेक्षण, विनियमन या प्रोत्साहन हो, (जो ''गृह संपत्ति से आय'' शीर्ष के अंतर्गत प्रभार्य आय का किन्हीं उल्लिखित सेवाओं को करने से प्राप्त आय या उसके निवेश से उत्पन्न ब्याज या लाभों के रूप में आय से भिन्न हों) :

परन्तु यह तब जबकि–

(i) वह संगम या संस्था अपनी आय को केवल उन उद्देश्यों में ही जिनके लिए वह स्थापित की गर्इ है, प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त करने के लिए उसे संचित करती है; और

(ii) वह संगम या संस्था केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस खंड के प्रयोजन के लिए तत्समय अनुमोदित है:

परन्तु यह और कि जहां संगम या संस्था केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दी गर्इ है और तत्पश्चात् उस सरकार का यह समाधान हो जाता है कि–

(i) ऐसे संगम या संस्था ने अपनी आय का उपयोग या संचयन पहले परन्तुक के उपबंधों के अनुसार नहीं किया है; या

(ii) ऐसे संगम या संस्था के क्रियाकलाप उन सभी या किन्हीं शर्तों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं, जिनके अधीन ऐसे संगम या संस्था का अनुमोदन किया गया था,

वहां वह, संबंधित संगम या संस्था को प्रस्तावित अनुमोदन वापस लेने के संबंध में कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देने के बाद किसी भी समय आदेश द्वारा अनुमोदन वापस ले सकेगी और अनुमोदन वापस लेने संबंधी आदेश की प्रति ऐसे संगम या संस्था और निर्धारण अधिकारी को भेज सकेगी;

(23कक)संघ के सशस्त्रा बलों द्वारा ऐसे बलों के भूतपूर्व और वर्तमान सदस्यों के या उनके आश्रितों के कल्याण के लिए स्थापित रेजिमेंट निधि के या असार्वजनिक निधि के संबंध में किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त कोर्इ आय;

(23ककक) कर्मचारियों या उनके आश्रितों के कल्याण के लिए ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो राजपत्रा में बोर्ड द्वारा अधिसूचित किए जाएं, स्थापित निधि की ओर से किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त कोर्इ आय और जिस निधि के ऐसे कर्मचारी सदस्य हैं, यदि ऐसी निधि निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है, अर्थात्:–

() निधि–

(i) अपनी आय का पूर्णत: या अनन्यत: केवल उन उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त करने के लिए उसे संचित करती है; और

(ii) धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों में अपनी निधियों तथा अभिदायों तथा इसके द्वारा प्राप्त राशियों का निवेश करती है;

() इस संबंध में बनाए गए नियमों के अनुसार निधि प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा अनुमोदित की जाती है:

परन्तु ऐसे किसी अनुमोदन का किसी एक समय ज्यादा से ज्यादा तीन निर्धारण वर्षों के लिए, जो अनुमोदन आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रभाव होगा;

(23ककख) किसी पेंशन स्कीम के अधीन 1 अगस्त, 1996 को या उसके पश्चात् भारतीय जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता द्वारा स्थापित किसी निधि चाहे, वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, की कोर्इ आय–

(i) जिसमें ऐसी निधि से पेंशन प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति द्वारा अभिदाय किया जाता है;

(ii) जिसे यथास्थिति, बीमा नियंत्राक या बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित किया जाता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''बीमा नियंत्राक'' का वही अर्थ है जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (5ख) में है;

(23ख) सार्वजनिक पूर्त न्यास के रूप में या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या भारत के किसी भाग में, प्रवृत्त इस अधिनियम के तत्समान किसी विधि के अधीन और केवल खादी या ग्रामोद्योग या दोनों के विकास के लिए अस्तित्व में है और जो लाभ के प्रयोजनार्थ नहीं है, गठित किसी संस्था की आय उस विस्तार तक जहां तक ऐसी आय खादी के उत्पादन, विक्रय या विपणन या ग्रामोद्योग के उत्पादों से मानी जा सकती है:

परन्तु यह तब जबकि–

(i) वह संस्था अपनी आय को केवल खादी या ग्रामोद्योग या दोनों के विकास के लिए ही प्रयुक्त करती है या प्रयुक्त किए जाने के लिए संचित करती है; और

(ii) वह संस्था इस खंड के प्रयोजन के लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग द्वारा तत्समय अनुमोदित है:

परन्तु यह और कि आयोग एक बार में उस वित्तीय वर्ष से, जिसमें अनुमोदन किया जाता है, ठीक बाद के निर्धारण वर्ष से प्रारंभ होने वाले तीन निर्धारण वर्षों से अधिक के लिए अनुमोदन नहीं देगा :

परन्तु यह भी कि जहां संस्था खादी और ग्रामोद्योग आयोग द्वारा अनुमोदित कर दी गर्इ है और तत्पश्चात् उस आयोग का यह समाधान हो जाता है कि–

(i) संस्था ने अपनी आय का उपयोग या संचयन पहले परन्तुक के उपबंधों के अनुसार नहीं किया है; या

(ii) ऐसी संस्था के क्रियाकलाप ऐसी सभी या किन्हीं शर्तों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं, जिनके अधीन ऐसी संस्था का अनुमोदन किया गया था,

वहां वह, संबंधित संस्था को प्रस्तावित अनुमोदन वापस लेने के संबंध में कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देने के बाद किसी भी समय आदेश द्वारा अनुमोदन वापस ले सकेगा और अनुमोदन वापस लेने संबंधी आदेश की प्रति ऐसी संस्था और निर्धारण अधिकारी को भेज सकेगा।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

(i) ''खादी और ग्रामोद्योग आयोग'' से खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 61) के अधीन स्थापित खादी और ग्रामोद्योग आयोग अभिप्रेत है;

(ii) ''खादी'' और ''ग्रामोद्योग'' के वही अर्थ हैं जो उनके उस अधिनियम में हैं;

(23खख) किसी राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन किसी राज्य में, खादी या ग्रामोद्योग के विकास के लिए उस राज्य में स्थापित प्राधिकरण (चाहे खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के नाम से ज्ञात हो या किसी अन्य नाम से की आय)।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''खादी'' और ''ग्रामोद्योग'' का क्रमश: वही अर्थ है जो उनका खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 61) में है;

(23खखक) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित, गठित या नियुक्त किसी निकाय या प्राधिकरण की आय (चाहे वह निगम निकाय या एकल निगम हो या नहीं) जिसमें निम्नलिखित में से एक या अधिक के प्रशासन के लिए उपबंध किया गया है, अर्थात् सार्वजनिक धार्मिक या पूर्त न्यास या विन्यास (जिसके अन्तर्गत मठ, मन्दिर, गुरुद्वारा, वक्फ, गिरजाघर, सेनेगाग, अगियारी या सार्वजनिक धार्मिक उपासना के अन्य स्थान हैं) या सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन इस प्रकार धार्मिक या पूर्त प्रयोजनों के लिए पंजीकृत सोसाइटी :

परन्तु इस खंड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह उसमें उल्लिखित किसी न्यास, विन्यास या सोसायटी की आय को कर से छूट देती है;

(23खखख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की कोर्इ आय, जो ऐसी स्कीम के अंतर्गत, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे, उसकी निधियों में से किए गए विनिधानों से ब्याज, लाभांश, या पूंजी अभिलाभों के रूप में भारत में प्राप्त हुर्इ है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''यूरोपीय आर्थिक समुदाय'' से 25 मार्च, 1957 की रोम संधि द्वारा स्थापित यूरोपीय आर्थिक समुदाय अभिप्रेत है;

(23खखग) दक्षिण एशियार्इ क्षेत्राीय सहयोग संगम के चार्टर द्वारा 8 दिसम्बर, 1985 को स्थापित दक्षिण एशियार्इ क्षेत्राीय सहयोग संगम के सदस्य देशों के राज्य या सरकार के अध्यक्षों द्वारा 21 दिसम्बर, 1991 को जारी कोलम्बो घोषणा द्वारा स्थापित क्षेत्राीय परियोजनाओं के लिए सार्क निधि की कोर्इ आय;

(23खखघ) 1 अप्रैल, 2001 को प्रारंभ होकर और 31 मार्च, 2011 को समाप्त होने वाले निर्धारण वर्षों से सुसंगत दस पूर्ववर्षों के लिए सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन ''एसोसार्इ सचिवालय'' के रूप में रजिस्ट्रीकृत सर्वोच्च संपरीक्षा संस्थाओं के एशियार्इ संगठन के सचिवालय की कोर्इ आय;

(23खखड़) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण की आय;

(23खखच) पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम लिमिटेड, जो कंपनी अधिनियम, 1956 के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है, की कोर्इ आय :

परंतु पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम लिमिटेड की कुल रकम की संगणना करने में,–

(i) 1 अप्रैल, 2006 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष की कुल आय के बीस प्रतिशत;

(ii) 1 अप्रैल, 2007 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष की कुल आय के चालीस प्रतिशत;

(iii) 1 अप्रैल, 2008 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष की कुल आय के साठ प्रतिशत;

(iv) 1 अप्रैल, 2009 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष की कुल आय के अस्सी प्रतिशत;

(v) 1 अप्रैल, 2010 को आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष और किसी अन्य पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्ष या वर्षों की कुल आय के सौ प्रतिशत,

तक की आय ऐसी कुल आय में सम्मिलित की जाएगी;

(23खखछ) विद्युत अधिनियम, 2003 (2003 का 36) की धारा 76 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय विद्युत विनियामक आयोग की कोर्इ आय;

(23खखज) प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) अधिनियम, 1990 (1990 का 25) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रसार भारती (भारतीय प्रसारण निगम) की कोर्इ आय;

(23ग) किसी व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित की ओर से प्राप्त कोर्इ आय–

(i) प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सहायता कोष; या

(ii) प्रधानमंत्री कोष (लोक कला विकास); या

(iii) प्रधानमंत्री विद्यार्थी सहायता कोष; या

(iiiक) राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव प्रतिष्ठान; या

(iiiकक) केंद्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ भारत कोष; या

(iiiककक) केंद्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ गंगा निधि; या;

13[(iiiकककक) धारा 80छ की उपधारा (2) के खंड (क) के उपखंड (iiiजच) में यथानिर्दिष्ट किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्रा में मुख्यमंत्राी सहायता निधि या उप राज्यपाल सहायता निधि; या]

(iiiकख) केवल शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए, विद्यमान कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था जो पूर्णत: या अंशत: सरकार द्वारा पोषित है; या

(iiiकग) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने वाला अस्पताल या अन्य संस्था, जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए है और जो पूर्णत: या सारत: सरकार द्वारा वित्तपोषित है; या

स्पष्टीकरण–उपखंड (iiiकख) और उपखंड (iiiकग) के प्रयोजनों के लिए, उनमें निर्दिष्ट किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था, अस्पताल या अन्य संस्था को किसी पूर्ववर्ष के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित समझा जाएगा, यदि ऐसे विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था, अस्पताल या अन्य संस्था को, सरकारी अनुदान उस सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान, यथास्थिति, उस विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था, अस्पताल या अन्य संस्था की कुल प्राप्तियों की, जिनके अंतर्गत कोर्इ स्वैच्छिक अभिदाय भी हैं, ऐसी प्रतिशतता से, जो विहित की जाए, अधिक है।

(iiiकघ) कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था जो केवल शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए है यदि ऐसे विश्वविद्यालय या संस्था की समग्र वार्षिक प्राप्तियां, वार्षिक प्राप्तियों की रकम जो विहित की जाए, से अधिक नहीं है; या

(iiiकड़) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने वाला अस्पताल या अन्य संस्था, जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए, यदि ऐसे अस्पताल या संस्था की समग्र वार्षिक प्राप्तियां, वार्षिक प्राप्तियों की रकम जो विहित की जाए, से अधिक नहीं है;

(iv) पूर्त प्रयोजनों के लिए स्थापित कोर्इ अन्य निधि या संस्था, जिसे विहित प्राधिकारी उस निधि या संस्था के उद्देश्य को और संपूर्ण भारत में या किसी संपूर्ण राज्य या राज्यों में उसके महत्व को ध्यान में रखते हुए अनुमोदित करे; या

(v) कोर्इ न्यास (जिसके अन्तर्गत कोर्इ विधिक बाध्यता भी है) या संस्था जो पूर्णत: सार्वजनिक धार्मिक प्रयोजनों के लिए है अथवा पूर्णत: सार्वजनिक धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए है, जिसे विहित प्राधिकारी उस रीति को ध्यान में रखते हुए अनुमोदित करे जिससे उस न्यास या संस्था के कामकाज का प्रशासन या पर्यवेक्षण यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि उसको प्रोद्भूत होने वाली आय उसके उद्देश्यों के लिए उचित रूप से प्रयोग की जाती है;

(vi) केवल शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए न कि लाभ के प्रयोजनों के लिए विद्यमान कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्थान जो उनसे भिन्न है जिन्हें उपखंड (iiiकख)या उपखंड (iiiकघ)में वर्णित किया गया है और जिसे विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया जाए; या

(viक) बीमारी या मानसिक दोष से ग्रस्त व्यक्तियों के दाखिले और उपचार के लिए अस्पताल या अन्य संस्था या आरोग्य स्थापन के दौरान व्यक्तियों के या चिकित्सीय देखभाल या पुनर्वासन की अपेक्षा करने वाले व्यक्तियों के दाखिले और उपचार करने के लिए है जो केवल परोपकार के प्रयोजनार्थ विद्यमान है न कि लाभ के प्रयोजन के लिए, जो उनसे भिन्न है जिन्हें उपखंड (iiiकग) या उपखंड (iiiकड़) में वर्णित किया गया है और विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया जाए:

परन्तु यह कि उपखंड (iv)या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में उल्लिखित निधि या न्यास या संस्था या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड(vi) या उपखंड (viक)  के अधीन छूट देने या उसे जारी रखने के प्रयोजन के लिए विहित प्राधिकारी को विहित फार्म और रीति में आवेदन करेगी :

परन्तु यह और कि विहित प्राधिकारी, उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अन्तर्गत किसी निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था को अनुमोदित करने से पूर्व, यथास्थिति, निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था से ऐसे दस्तावेज (जिनके अंतर्गत संपरीक्षित वार्षिक लेखा भी है) या जानकारी मंगा सकेगा जिन्हें वह, यथास्थिति, ऐसी निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था के क्रियाकलापों की प्रामाणिकता के बारे में अपना समाधान करने के लिए 13क[आवश्यक समझे और, यथास्थिति, ऐसी निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था द्वारा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसी अपेक्षाओं का अनुपालन, जो उसके उद्देश्यों की पूर्ति के प्रयोजनों के लिए सारवान है और विहित प्राधिकारी] ऐसी जांच भी कर सकेगा जो वह इस संबंध में आवश्यक समझे:

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में उल्लिखित निधि या न्यास या संस्था या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था–

() अपनी आय का उन उद्देश्यों के लिए, जिनके लिए उसकी स्थापना की गर्इ है, पूर्णत: और अनन्यत: उपयोग करती है या उपयोग करने के लिए संचयन करती है और उस दशा में जहां 1 अप्रैल, 2002 को या उसके पश्चात् उसकी आय का पंद्रह प्रतिशत या उससे अधिक का संचयन हो जाता है, वहां उसकी आय के पंद्रह प्रतिशत से अधिक रकम के संचयन की अवधि किसी भी दशा में पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी; और

() अपनी निधियों का, जो निम्नलिखित से भिन्न हैं, अर्थात्:–

(i) निधि, न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था द्वारा धारित कोर्इ आस्तियां, जहां ऐसी आस्तियां 1 जून, 1973 को निधि, न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था की संपत्ति का भाग थी;

(iक) कोर्इ आस्ति, किसी पब्लिक कंपनी के साधारण शेयर होने के कारण किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था द्वारा धारित है, जहां ऐसी आस्तियां किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था की सम्पत्ति का 1 जून, 1998 को भाग थी;

(ii) निधि, न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था द्वारा 1 मार्च, 1983 के पूर्व अर्जित कोर्इ आस्तियां (जो किसी कंपनी या निगम द्वारा या उसकी ओर से पुरोधृत डिबेंचर हैं);

(iii) निधि, न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था को आबंटित बोनस शेयरों के रूप में ऐसे शेयरों की कोर्इ अनुवृद्धि जो उपखंड (i) और उपखंड (iक) में उल्लिखित सम्पत्ति का भाग है;

(iv) आभूषण, फर्नीचर या ऐसी किसी वस्तु के रूप में जो बोर्ड, राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, प्राप्त किए गए और रखे गए स्वैच्छिक अभिदाय,

पूर्ववर्ष के दौरान किसी अवधि के लिए धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा निवेश या निक्षेप नहीं करती है:

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv)या उपखंड (v) के अंतर्गत कोर्इ निधियों के 1 अप्रैल, 1989 के पूर्व धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा किए गए निवेशों और निक्षेपों के संबंध में छूट से इंकार नहीं किया जाएगा, यदि ऐसी निधियां 30 मार्च, 1993 के पश्चात् इस प्रकार निवेश की हुर्इ या निक्षिप्त नहीं बनी रहती हैं:

परन्तु यह भी कि उपखंड (vi) या उपखंड (viक)के अंतर्गत, निधियों के 1 जून, 1998 के पूर्व धारा 11 की उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट एक या अधिक रूप या पद्धतियों से अन्यथा किए गए निवेशों और निक्षेपों के संबंध में छूट से इंकार नहीं किया जाएगा, यदि ऐसी निधियां 30 मार्च, 2001 के पश्चात् इस प्रकार निवेश की हुर्इ और निक्षिप्त नहीं बनी रहती है:

परन्तु यह भी कि नकद रूप में स्वैच्छिक अभिदाय या इस उपखंड के तीसरे परंतुक में खंड () में उल्लिखित प्रकृति के स्वैच्छिक अभिदाय से भिन्न स्वैच्छिक अभिदाय के संबंध में उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अंतर्गत छूट से इंकार नहीं किया जाएगा किंतु यह इस शर्त के अधीन होगा कि ऐसा स्वैच्छिक अभिदाय न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या किसी अन्य चिकित्सीय संस्था द्वारा उस पूर्ववर्ष के अंत से जिसमें ऐसी आस्ति अर्जित की जाती है या 31 मार्च, 1992 से, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् धारा 11 की उपधारा (5) में विशेष रूप से उल्लिखित रूप या पद्धतियों से भिन्न किसी रूप या पद्धति से धारित नहीं किया जाता है:

परन्तु यह भी कि उपखण्ड (iv) या उपखण्ड (v) या उपखंड (vi)या उपखंड (viक) की कोर्इ बात, निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था की किसी ऐसी आय के बारे में, जो कारबार के लाभ या अभिलाभ हैं; तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि यह कारबार उसके उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आनुषंगिक नहीं है और इसके द्वारा ऐसे कारबार के बारे में पृथक् लेखा बहियां नहीं रखी जाती:

परन्तु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार द्वारा उस तारीख से पूर्व जिसको कराधान विधि (संशोधन) विधेयक, 2006 को राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त होती है,] जारी की गर्इ कोर्इ अधिसूचना, किसी एक समय में ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होंगे, (जिसके अन्तर्गत ऐसी अधिसूचना जारी की जाने की तारीख के पूर्व प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष भी है या हैं) प्रभावी होगी जो अधिसूचना में उल्लिखित किए जाएं :

परन्तु यह भी कि जहाँ पहले परन्तुक के अधीन कोर्इ आवेदन कराधान विधि (संशोधन) विधेयक, 2006 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की तारीख को या उसके पश्चात् किया जाता है वहां उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अधीन प्रत्येक अधिसूचना उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अधीन प्रत्येक अधिसूचना या उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अधीन अनुमोदन या आवेदन को नामंजूर करने वाला कोर्इ आदेश उस मास के अंत से जिसमें ऐसा आवेदन प्राप्त हुआ था, बारह मास की अवधि के भीतर, यथास्थिति, निकाली जाएगी या प्रदान किया जाएगा या पारित किया जाएगा :

परन्तु यह भी कि जहां उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट निधि या न्यास या संस्था या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था की कुल आय, उक्त खंडों के उपबंधों को प्रभावी किए बिना, उस अधिकतम रकम से अधिक है जो किसी पूर्ववर्ष में कर से प्रभार्य नहीं है वहां ऐसा न्यास या संस्था या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था उस वर्ष की बाबत कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था उस वर्ष की बाबत अपने लेखाओं की संपरीक्षा धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे स्पष्टीकरण में परिभाषित किसी संपरीक्षक से कराएगी और सुसंगत निर्धारण वर्ष की आय की विवरणी के साथ ऐसी संपरीक्षा की विहित प्ररूप में ऐसे संपरीक्षक द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित और सत्यापित रिपोर्ट देंगे और उसमें ऐसी विशिष्टियां वर्णित करेंगे जो विहित की जाएं:

परन्तु यह भी कि धारा 80छ की उपधारा (2) के खण्ड () के निबंधनों के अनुसार निधि या संस्था द्वारा प्राप्त दान की कोर्इ रकम जिसके संबंध में आय और व्यय के लेखे उस धारा की उपधारा (5ग) के खंड (v) के अधीन विहित प्राधिकारी को उस खंड में विनिर्दिष्ट रीति में नहीं दिए गए हैं, या जिसे गुजरात में भूकम्प पीड़ितों को राहत देने से भिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग किया गया है और जो धारा 80छ की उपधारा (5ग) के निबंधनों के अनुसार अनुपयोगी बनी रहती है और 31 मार्च, 2004 को या इससे पूर्व प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत निधियों को अन्तरित नहीं की जाती है तो वह पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी तदनुसार कर से प्रभारित होगी:

14[परंतु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था की आय में से धारा 12कक के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी न्यास या संस्था के पास जमा की गर्इ या संदत्त किसी रकम को, जो ऐसा स्वैच्छिक अभिदाय है जिसे इस विनिर्दिष्ट निदेश के साथ किया गया है कि वह न्यास या संस्था की समग्र निधि का भाग बनेगा, उन उद्देश्यों के प्रति आय के उपयोग के रूप में नहीं समझा जाएगा, जिनके लिए, यथास्थिति, ऐसी निधि या संस्था या न्यास या विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्था या अस्पताल या अन्य चिकित्सीय संस्था को स्थापित किया गया है:]

14क[परंतु यह भी कि तीसरे परंतुक की मद () के अधीन आवेदन की रकम का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए धारा 40 के खंड () के उपखंड (iक) और धारा 40क की उपधारा (3) और उपधारा (3क) के उपबंध, आवश्यक परिवर्तनों सहित ऐसे लागू होंगे जैसे वे ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना करने में लागू होते हैं:]

परन्तु यह भी कि जहां उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट निधि या न्यास या संस्था या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था अपनी आय का प्राप्त होने वाले वर्ष के दौरान उपयोग नहीं करती और उसका संचय करती है, वहां ऐसे संचय में से धारा 12कक के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी न्यास या संस्था को अथवा उपखंड (iv) या उपखंड (v) या उपखंड (vi) या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी निधि या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था को किया गया कोर्इ संदाय या क्रेडिट उन उद्देश्यों के लिए आय का उपयोग नहीं माना जाएगा जिनके लिए, यथास्थिति, ऐसी निधि या न्यास या संस्था या विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्था या अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था स्थापित की गर्इ है :

परन्तु यह भी कि जहां उपखंड (iv) में निर्दिष्ट निधि या संस्था या उपखंड (v) में निर्दिष्ट न्यास या संस्था यथास्थिति केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाता है या विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित की जाती है या उपखंड (vi) में निर्दिष्ट कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट कोर्इ अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित की जाती है और तत्पश्चात् सरकार या विहित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि–

(i) ऐसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था ने–

() अपनी आय का तीसरे परन्तुक के खंड () के उपबंधों के अनुसार उपयोग नहीं किया है; या

() अपनी निधियों का तीसरे परन्तुक के खंड () के उपबंधों के अनुसार निवेश या निक्षेप नहीं किया है; या

14ख[(ii) ऐसी निधि या संस्था या न्यास का किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था के क्रियाकलाप

() प्रमाणित नहीं है; या

() ऐसी सभी या किन्हीं शर्तों के अनुसार नहीं किए जा रहे हैं, जिनके अधीन उसे अधिसूचित या अनुमोदित किया गया था; या

(iii) ऐसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था ने तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि की किसी अपेक्षा का अनुपालन नहीं किया है और ऐसे आदेश, निदेश या डिक्री के संबंध में, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, जिसके द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ऐसा अनुपालन हुआ है, या तो विवाद नहीं किया गया है या उसने अंतिमता प्राप्त कर ली है,]

वहां वह संबंधित निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था को प्रस्तावित कार्रवार्इ के विरुद्ध कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देने के बाद किसी भी समय आदेश द्वारा यथास्थिति अधिसूचना को विखंडित कर सकेगी या कर सकेगा अथवा अनुमोदन को वापस ले सकेगी या ले सकेगा और अधिसूचना को विखंडित करने या अनुमोदन वापस लेने संबंधी आदेश की एक प्रति ऐसी निधि या संस्था या न्यास या किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या किसी अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था को और निर्धारण अधिकारी को भेज सकेगी या भेज सकेगा:

परंतु यह भी कि यदि पहले परंतुक में निर्दिष्ट निधि या न्यास या संस्था या कोर्इ विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्था या कोर्इ अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्था, 1 जून, 2006 को या उसके पश्चात् छूट देने या उसके बनाए रखने के प्रयोजनों के लिए कोर्इ आवेदन करती है, तो ऐसा आवेदन उस सुसंगत निर्धारण वर्ष के, जिससे छूट की र्इप्सा की गर्इ है, सितम्बर के तीसवें दिन को या उससे पूर्व किया जाएगा:

परंतु यह भी कि धारा 115खखग में निर्दिष्ट किसी अनाम संदान को, जिस पर उक्त धारा के उपबंधों के अनुसार कर संदेय है, कुल आय में सम्मिलित किया जाएगा:

परंतु यह भी कि ऐसे सभी लंबित आवेदन, जिनके संबंध में, उपखंड (iv) या उपखंड (v) के अधीन 1 जून, 2007 से पूर्व कोर्इ अधिसूचना जारी नहीं की गर्इ है, उस दिन को विहित प्राधिकारी को अंतरित हो जाएंगे और विहित प्राधिकारी ऐसे आवेदनों पर, उन उपखंडों के अधीन उस प्रक्रम से कार्यवाही करेगा जिस प्रक्रम पर वे उस दिन को थे;

परंतु यह भी कि उपखंड (iv) या उपखंड (v) में निर्दिष्ट न्यास या संस्था की आय को पूर्ववर्ष की उसकी कुल आय में सम्मिलित किया जाएगा, यदि धारा 2 के खंड (15) के पहले परंतुक के उपबंध ऐसे न्यास या संस्था को उक्त पूर्ववर्ष में लागू हो जाते हैं, चाहे ऐसे न्यास या संस्था के संबंध में किया गया अनुमोदन वापस ले लिया गया हो या नहीं अथवा जारी की गर्इ अधिसूचना विखंडित कर दी गर्इ हो या नहीं :

परन्तु यह भी कि जहां उपखंड (iv) में निर्दिष्ट निधि या संस्था या उपखंड (v) में निर्दिष्ट न्यास या संस्था को, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया है या विहित प्राधिकारी द्वारा विहित किया गया है अथवा उपखंड (vi) में निर्दिष्ट किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या उपखंड (viक) में निर्दिष्ट किसी अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्था को विहित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया गया है और वह अधिसूचना या अनुमोदन किसी पूर्ववर्ष के लिए प्रवृत्त है, वहां इस धारा के [उसके उपखंड (1) से भिन्न] किसी अन्य उपबंध में अंतर्विष्ट कोर्इ बात, यथास्थिति, उस निधि या न्यास या संस्था या विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्था या अस्पताल या अन्य आयुर्विज्ञान संस्था की ओर से उस पूर्ववर्ष के लिए प्राप्त किसी आय को उसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति की कुल आय से अपवर्जित करने के लिए प्रवर्तित होगी।

स्पष्टीकरण–इस खंड में, जहां किसी आय को उपयोजित किया जाना या संचित किया जाना अपेक्षित है, वहां ऐसे प्रयोजन के लिए आय का अवधारण ऐसी किसी आस्ति की बाबत, जिसके अर्जन का दावा इस खंड के अधीन उसी या किसी अन्य पूर्ववर्ष में आय के उपयोजन के रूप में किया गया है, किसी कटौती या मोक के बिना अवक्षयण के रूप में या अन्यथा किया जाएगा;

(23घ) निम्नलिखित की कोर्इ आय–

(i) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन या तद्धीन बनाए गए विनियमों के अधीन रजिस्ट्रीकृत पारस्परिक निधि;

(ii) किसी पब्लिक सेक्टर बैंक या किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा स्थापित या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्राधिकृत और जो ऐसी शर्तों के अधीन है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्रा में इस संबंध में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, ऐसी अन्य पारस्परिक निधि।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

() ''पब्लिक सेक्टर बैंक'' पद से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 'अन्य पब्लिक सेक्टर बैंक' के प्रवर्ग में सम्मिलित कोर्इ बैंक अभिप्रेत है;

() ''लोक वित्तीय संस्था'' पद का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क में है;

() ''भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड'' पद का वही अर्थ है जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड ()में है;

(23घक) प्रतिभूतिकरण के क्रियाकलाप से किसी प्रतिभूतिकरण न्यास की कोर्इ आय।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() "प्रतिभूतिकरण" का वही अर्थ होगा, जो–

(i) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (लोक प्रस्थापना और प्रतिभूतिकृत ऋण लिखतों का सूचीबद्धकरण) विनियम, 2008 के विनियम 2 के उपविनियम (1) के खंड () में उसका है; या

(iक)वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में उसका है; या

(ii) भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए मानक आस्ति प्रतिभूतिकरण संबंधी मार्गदर्शक सिद्धांतों के अधीन उसका है;

() "प्रतिभूतिकरण न्यास" का वही अर्थ होगा जो धारा 115नगक के नीचे दिए गए स्पष्टीकरणमें उसका है;

(23ड़) [वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया]

(23ड़क)भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज द्वारा संयुक्त रूप से या पृथक् रूप से स्थापित ऐसे विनिधानकर्ता संरक्षण निधि की मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों और उनके सदस्यों से प्राप्त अभिदायों के रूप में कोर्इ आय जो केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे :

परन्तु जहां ऐसी कोर्इ रकम जो निधि में जमा है और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर से प्रभारित नहीं की गर्इ है किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज के साथ पूर्णत: या भागत: बांटी जाती है वहां इस प्रकार बांटी गर्इ सम्पूर्ण रकम ऐसे पूर्ववर्ष की आय समझी जाएगी जिसमें ऐसी रकम इस प्रकार बांटी जाती है और तदनुसार आय-कर से प्रभार्य होगी;

(23ड़ख) 1 अप्रैल, 2002 से आरंभ होने वाले और 31 मार्च, 2007 को समाप्त होने वाले निर्धारण वर्षों से सुसंगत पांच पूर्ववर्षों के लिए ऐसे छोटे उद्योग क्रेडिट प्रत्याभूति निधि न्यास की, जो भारत सरकार द्वारा तथा भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक द्वारा बनाया गया न्यास है, कोर्इ आय;

(23ड़ग) भारत में वस्तु एक्सचेन्जों द्वारा, संयुक्त रूप से या पृथक रूप से, स्थापित ऐसा निवेशक संरक्षा निधि के जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, वस्तु एक्सचेन्जों और उसके सदस्यों से अभिदाय के रूप में प्राप्त कोर्इ आय :

परन्तु जहां कोर्इ ऐसी रकम जो निधि में जमा है और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर से प्रभारित नहीं की गर्इ है, किसी वस्तु एक्सचेन्ज के साथ पूर्णत: या भागत: बांटी जाती है, वहां इस प्रकार बांटी गर्इ संपूर्ण रकम ऐसे पूर्ववर्ष की आय समझी जायेगी जिसमें ऐसी रकम इस प्रकार बांटी जाती है और तदनुसार वह आय-कर से प्रभार्य होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "वस्तु एक्सचेन्ज" से अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) की धारा 2 के खंड (ञञ) में यथा परिभाषित "रजिस्ट्रीकृत संगम" अभिप्रेत है;

(23ड़घ) किसी निक्षेपागार द्वारा विनियमों के अनुसार गठित ऐसी विनिधानकर्ता संरक्षण निधि के, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, निक्षेपागार से प्राप्त अभिदायों के रूप में कोर्इ आय :

परंतु जहां निधि के जमा खाते में पड़ी और जिस पर किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर प्रभारित नहीं किया गया है, किसी रकम को पूर्णत: या भागत: किसी निक्षेपागार के साथ बांटा जाता है तो इस प्रकार बांटी गर्इ संपूर्ण रकम को उस पूर्ववर्ष की आय समझा जाएगा जिसमें ऐसी रकम को इस प्रकार बांटा जाता है और तदनुसार वह आय-कर से प्रभार्य होगी।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

(i) "निक्षेपागार" का वही अर्थ होगा जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में उसका है;

(ii) "विनियम" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;

(23ड़ड़) मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम द्वारा ऐसे विनियमों के अनुसार, जो केंद्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी स्थापित ऐसी आंतरिक समझौता प्रत्याभूति निधि की कोर्इ विनिर्दिष्ट आय:

परंतु जहां निधि के जमा खाते में पड़ी और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय-कर प्रभारित न की गर्इ किसी रकम को पूर्णत: या भागत: किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति के साथ बांटा जाता है, वहां इस प्रकार बांटी गर्इ संपूर्ण रकम को उस पूर्ववर्ष की आय समझा जाएगा जिसमें ऐसी रकम को इस प्रकार बांटा जाता है और तद्नुसार वह आय-कर से प्रभार्य होगी।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

(i) ''मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम'' का वही अर्थ होगा जो उसका भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) के अधीन बनाए गए प्रतिभूति संविदा (विनियमन) (स्टाक एक्सचेंज और समाशोधन निगम) विनियम, 2012 के विनियम 2 के उपविनियम (1) के खंड () में है;

(ii) '' विनियमों'' से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) और प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) के अधीन बनाए गए प्रतिभूति संविदा (विनियमन) (स्टाक एक्सचेंज और समाशोधन निगम) विनियम, 2012 अभिप्रेत है;

(iii) ''विनिर्दिष्ट आय'' से,–

() विनिर्दिष्ट व्यक्तियों से प्राप्त अभिदाय द्वारा आय अभिप्रेत है;

() मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम द्वारा अधिरोपित और आंतरिक समझौता प्रत्याभूति निधि जमा शास्तियों के रूप में आय अभिप्रेत है;

() निधि द्वारा किए गए विनिधान से आय;

(iv) ''विनिर्दिष्ट व्यक्ति'' से,-

() कोर्इ ऐसा मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम अभिप्रेत है जो आंतरिक समझौता प्रत्याभूति निधि स्थापित और अनुरक्षित करता है; और

() कोर्इ ऐसा मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज अभिप्रेत है, जो ऐसे मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम में एक शेयरधारक है या आंतरिक समझौता प्रत्याभूति निधि में अभिदाता है; और

() आंतरिक समझौता प्रत्याभूति निधि में अभिदाय करने वाला कोर्इ समाशोधन सदस्य अभिप्रेत है;

(23च) किसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कंपनी द्वारा किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में साधारण शेयरों के रूप में किए गए निवेश से लाभांश या दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के रूप में आय :

परंतु यह तब जबकि ऐसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कम्पनी इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार विहित प्राधिकारी द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित की जाती है और विहित शर्तों को पूरी करती है :

परन्तु यह और कि विहित प्राधिकारी द्वारा कोर्इ अनुमोदन किसी एक बार में, ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए प्रभावी होगा, जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं है, जो अनुमोदन आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए :

परन्तु यह भी कि इस खंड की कोर्इ बात 31 मार्च, 1999 के पश्चात् किए गए किसी निवेश के संबंध में लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() ''जोखिम पूंजी निधि'' से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है जो मुख्यत: विहित मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार किसी जोखिम पूंजी उपक्रम के साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेशों के लिए न्यासियों द्वारा धन एकित्रात करने के लिए स्थापित किया गया है;

() ''जोखिम पूंजी कंपनी'' से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी उपक्रम की साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेश किया है;

() ''जोखिम पूंजी उपक्रम'' से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है जिसके शेयर भारत में किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं और जो विद्युत या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन या वितरण करने के कारबार में लगी हुर्इ है या किसी अवसंरचना सुविधा को विकसित करने, बनाए रखने और दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने के कारबार में लगी हुर्इ हैं या ऐसी वस्तुओं या चीजों के (जिसके अंतर्गत कम्प्यूटर साफ्टवेयर भी है) जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस संबंध में अधिसूचित की जाएं, निर्माण या उत्पादन में लगी हुर्इ हैं; और

() ''अवसंरचनात्मक सुविधा'' से कोर्इ सड़क, राजमार्ग, पुल, विमानपत्तन, पत्तन, रेल प्रणाली, जल प्रदाय परियोजना, सिंचार्इ परियोजना, सफार्इ या मलव्ययन प्रणाली या उसी प्रकार की कोर्इ अन्य सार्वजनिक सुविधा अभिप्रेत है जो राजपत्रा में इस संबंध में बोर्ड द्वारा अधिसूचित की जाए और जिससे धारा 80झक की उपधारा (4क) में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करती है;

(23चक) धारा 115ण में निर्दिष्ट लाभांशों से भिन्न लाभांशों या किसी जोखिम पूंजी निधि के या किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में साधारण शेयरों के माध्यम से किए गए निवेशों से किसी जोखिम पूंजी कंपनी दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के माध्यम से आय :

परन्तु ऐसी जोखिम पूंजी निधि या जोखिम पूंजी कंपनी इस संबंध में बनाए गए नियमों के अनुसार केन्द्रीय सरकार द्वारा इसे किए गए आवेदन पर, इस खंड के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित की जाती है और जो विहित शर्तों को पूरा करती है :

परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया गया कोर्इ अनुमोदन एक ही बार में ऐसे निर्धारण वर्ष या वर्षों के लिए प्रभावी होगा जो तीन निर्धारण वर्षों से अधिक नहीं होंगे, जो अनुमोदन आदेश में विशेष रूप से उल्लिखित किया जाए :

परन्तु यह भी कि इस खंड में की कोर्इ बात 31 मार्च, 2000 के पश्चात् किए गए किसी विनिधान की बाबत लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

() ''जोखिम पूंजी निधि'' से ऐसी निधि अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन कार्य कर रही है जो मुख्यत: विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी को साधारण शेयर अर्जित करने के रूप में निवेशों के लिए न्यासियों द्वारा धन एकित्रात करने के लिए स्थापित की गर्इ है;

() ''जोखिम पूंजी कंपनी'' से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसने विहित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार जोखिम पूंजी उपक्रम के साधारण शेयरों को अर्जित करने के रूप में निवेश किया है; और

() ''जोखिम पूंजी उपक्रम'' से ऐसी देशी कंपनी अभिप्रेत है जिसके शेयर भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं है और जो–

(i) () सॉफ्टवेयर;

() सूचना प्रौद्योगिकी;

() फार्मास्यूटिकल सेक्टर में मूल औषधियों के उत्पादन;

() जैव-प्रौद्योगिकी;

() कृषि या सहबद्ध सेक्टर; या

() ऐसे अन्य सेक्टर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इन निमित्त अधिसूचित किया जाए; या

के कारबार में लगी हुर्इ है; या

(ii) किसी वस्तु या पदार्थ के उत्पादन या विनिर्माण जिसके लिए पेटेंट, राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला या विज्ञान या प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा अनुमोदित किसी अन्य वैज्ञानिक अनुसंधान संस्था को दिया गया है;

(23चख) किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में निवेश से जोखिम पूंजी कंपनी या जोखिम पूंजी निधि की आय।

परंतु यह कि इस खंड में अंतर्विष्ट कोर्इ बात, किसी जोखिम पूंजी कंपनी या जोखिम पूंजी निधि की किसी आय के संबंध में, जो 1 अप्रैल, 2016 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष की, धारा 115पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड (क) में विनिर्दिष्ट एक विनिधान निधि है, लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए–

() ''जोखिम पूंजी कंपनी'' से ऐसी कोर्इ कंपनी अभिप्रेत है जिसे–

(अ) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (जोखिम पूंजी निधि) विनियम, 1996 (जिसे इसमें इसके पश्चात् जोखिम पूंजी निधि विनियम कहा गया है) के अधीन जोखिम पूंजी निधि के रूप में तारीख 21 मर्इ, 2012 के पूर्व रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्रा दिया गया है और विनियमित किया जाता है; या

() भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (आनुकल्पिक विनिधान निधि) विनियम, 2012 (जिसे इसमें इसके पश्चात् आनुकल्पिक विनिधान निधि विनियम कहा गया है) के अधीन आनुकल्पिक विनिधान निधि के प्रवर्ग 1 के उपप्रवर्ग के रूप में जोखिम पूंजी निधि के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है और विनियमित किया जाता है और जो निम्नलिखित शर्तें पूरी करती है, अर्थात् :–

(i) यह किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं है;

(ii) इसने अपनी विनिधानयोग्य निधिओं के कम से कम दो-तिहार्इ का असूचीबद्ध साधारण शेयरों या जोखिम पूंजी उपक्रम की साधारण सहबद्ध लिखतों में विनिधान किया है; और

(iii) इसने ऐसे किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में विनिधान नहीं किया है, जिसमें उसका निदेशक या कोर्इ सारवान् शेयर धारक (जो उसकी साधारण शेयर पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक साधारण शेयरों का हिताधिकारी स्वामी है) व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से ऐसे जोखिम पूंजी उपक्रम की समादत्त साधारण शेयर पूंजी के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक के साधारण शेयर धारण करता है;

() ''जोखिम पूंजी निधि'' से ऐसी कोर्इ निधि अभिप्रेत है,–

() जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अधीन ऐसे रजिस्ट्रीकृत न्यास विलेख के अधीन चलार्इ जा रही है, जिसे–

(I) तारीख 21 मर्इ, 2012 के पूर्व जोखिम पूंजी निधि विनियम के अधीन जोखिम पूंजी निधि के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्रा दिया गया है और विनियमित किया जाता है; या

(II) जोखिम पूंजी निधि विनियम के अधीन प्रवर्ग 1 के आनुकल्पिक विनिधान निधि के उपप्रवर्ग के रूप में जोखिम पूंजी निधि के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है और जो निम्नलिखित शर्तें पूरी करती है, अर्थात् :–

(i) इसने अपनी विनिधानयोग्य निधिओं के कम से कम दो-तिहार्इ का असूचीबद्ध साधारण शेयरों या जोखिम पूंजी उपक्रम की साधारण सहबद्ध लिखतों में विनिधान किया है;

(ii) इसने ऐसे किसी जोखिम पूंजी उपक्रम में विनिधान नहीं किया है, जिसमें उसका न्यासी या व्यवस्थापक व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से ऐसे जोखिम पूंजी उपक्रम की समादत्त साधारण शेयर पूंजी के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक के साधारण शेयर धारण करता है; और

(iii) उसके द्वारा निर्गमित यूनिटें, यदि कोर्इ हैं, किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं; या

() भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट द्वारा बनार्इ गर्इ जोखिम पूंजी स्कीम के रूप में चलार्इ जा रही है;

() ''जोखिम पूंजी उपक्रम'' से–

(i) जोखिम पूंजी निधि विनियम के विनियम 2 के खंड (ढ) में यथापरिभाषित कोर्इ जोखिम पूंजी उपक्रम; या

(ii) आनुकल्पिक विनिधान निधि विनियम के विनियम 2 के उपविनियम (1) के खंड (कक) में यथापरिभाषित कोर्इ जोखिम पूंजी उपक्रम,

अभिप्रेत है।

(23चखक) शीर्ष ''कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ'' के अधीन प्रभार्य आय से भिन्न किसी विनिधान निधि की कोर्इ आय;

(23चखख) धारा 115पख में निर्दिष्ट किसी यूनिट धारक को प्रोद्भूत या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त कोर्इ आय, जो उस आय का वह अनुपात है, जो उसी प्रकृति का है जैसी ''कारबार या वृत्ति के लाभों और अभिलाभों'' के शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय है।

स्पष्टीकरण - खंड (23चखक) और (23चखख) के प्रयोजनों के लिए ''विनिधान निधि'' पद का वही अर्थ होगा जो उसका धारा 115पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड (क) में है;

(23चग) किसी कारबार न्यास की कोर्इ आय–

() किसी विशेष प्रयोजन एकक से प्राप्त या प्राप्य ब्याज;

() धारा 115ण की उपधारा (7) में निर्दिष्ट लाभांश,

के रूप में

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विशेष प्रयोजन एकक" पद से ऐसी कोर्इ भारतीय कंपनी अभिप्रेत है, जिसमें कारबार न्यास नियंत्राणकारी हित और शेयरधारिता या हित की ऐसी कोर्इ विनिर्दिष्ट प्रतिशतता धारण करता है, जो उन विनियमों द्वारा, जिनके अधीन ऐसे न्यास को रजिस्ट्रीकरण मंजूर किया गया है, अपेक्षित किया जाए;

(23चगक) किसी ऐसे कारबार न्यास, जो एक भू-संपदा विनिधान न्यास है, की ऐसे कारबार न्यास के प्रत्यक्षत: स्वामित्वाधीन किसी भू-संपदा आस्ति को किराए या पट्टे या भाटक पर देने से प्राप्त कोर्इ आय।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''भू-संपदा आस्ति'' पद का वही अर्थ होगा, जो उसका भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (भू-संपदा विनिधान न्यास) विनियम, 2014 के विनियम 2 के उपविनियम (1) के खंड (यञ) में है;

(23चघ) धारा 115पक में निर्दिष्ट ऐसी कोर्इ वितरित आय, जो किसी यूनिट धारक द्वारा कारबार न्यास से प्राप्त की गर्इ हो, जो आय का वह अनुपात नहीं है, जो उसी प्रकृति की है, जैसी खंड (23चग) के उपखंड () में या खंड (23चगक) में निर्दिष्ट की गर्इ है;

(23छ) [वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा 1.4.2007 से लोप किया गया]

(24) कोर्इ आय जो निम्नलिखित ''गृह सम्पत्ति से आय'' और ''अन्य स्रोतों से आय'' शीर्षकों के अंतर्गत प्रभार्य हो–

() व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (1926 का 16) के अर्थ में ऐसी किसी पंजीकृत संघ की, जो मुख्यत: कर्मकारों और नियोजकों या कर्मकारों के बीच के संबंधों को विनियमित करने के प्रयोजन के लिए बनाया गया है;

() उपखंड ()में निर्दिष्ट पंजीकृत संघों का संगम;

(25)(i) उन प्रतिभूतियों पर ब्याज जो किसी ऐसी भविष्य निधि द्वारा जिसको भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) लागू होता है धारित है या उसकी सम्पत्ति है या उस निधि के ऐसे कोर्इ पूंजी अभिलाभ, जो ऐसी प्रतिभूतियों के विक्रय, विनिमय या अन्तरण से उत्पन्न हो;

(ii) कोर्इ ऐसी आय जो किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;

(iii) कोर्इ ऐसी आय जो किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;

(iv) कोर्इ ऐसी आय जो किसी अनुमोदित उपदान निधि की ओर से न्यासियों द्वारा प्राप्त की गर्इ हो;

(v) कोर्इ आय जो–

() कोयला खान भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1948 (1948 का 46) के अंतर्गत गठित न्यासी बोर्ड द्वारा उस अधिनियम की धारा 3छ के अधीन स्थापित निक्षेप सहबद्ध बीमा निधि की ओर से प्राप्त की गर्इ हो; या

() कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 19) के अंतर्गत गठित न्यासी बोर्ड द्वारा उस अधिनियम की धारा 6ग के अंतर्गत स्थापित निक्षेप सहबद्ध बीमा निधि की ओर से प्राप्त की गर्इ हो;

(25क) कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के उपबंधों के अंतर्गत स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निधि की कोर्इ आय;

(26) संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25)में यथा परिभाषित अनुसूचित जनजाति के ऐसे सदस्य की दशा में जो संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 से संलग्न सारणी के भाग 1 या भाग 2 में विनिर्दिष्ट उल्लिखित किसी क्षेत्रा में या अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों में जैसा कि वह पूर्वोत्तर क्षेत्रा (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ होने के ठीक पूर्व विधान था के अधीन असम के राज्यपाल द्वारा जारी की गर्इ अधिसूचना सं. टीएडी/आर/35/50/109, तारीख 23 फरवरी, 1951 के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में निवास कर रहा है या जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्रा में कोर्इ ऐसी आय जो उसको–

()पूर्वोक्त क्षेत्रों या राज्यों में किसी स्रोत से प्रोदभूत या उदभूत होती है; या

() प्रतिभूतियों पर लाभांश या ब्याज के रूप में प्रोदभूत या उदभूत होती है;

(26क) कोर्इ ऐसी आय जो किसी व्यक्ति को 1 अप्रैल, 1989 के पूर्व प्रारम्भ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में लद्दाख जिले में या भारत के बाहर किसी स्रोत से प्रोदभूत या उदभूत हो, उस दशा में जिसमें ऐसा व्यक्ति उस पूर्ववर्ष में उक्त जिले में निवासी हो :

परन्तु यह खंड किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि वह 1962 के अप्रैल के प्रथम दिन को आरम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष में उस जिले में निवासी न रहा हो।

स्पष्टीकरण 1 .–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह लद्दाख जिले में निवासी है, यदि वह धारा 6 की, यथास्थिति, उपधारा (1) *या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (4) की अपेक्षाओं को इन उपान्तरणों के अधीन रहते हुए पूरा करता है कि–

(i) उन उपधाराओं में भारत के संदर्भों में ऐसा अर्थ लगाया जाएगा मानो वह उक्त जिले के संदर्भ में हो; और

(ii) उपधारा (3) के खंड (i) में भारतीय कंपनी के संदर्भ में ऐसा अर्थ लगाया जाएगा मानो वह ऐसी कंपनी के संदर्भ में है जो जम्मू-कश्मीर राज्य में तत्समय लागू किसी विधि के अधीन बनार्इ गर्इ और पंजीकृत है और उसका पंजीकृत कार्यालय उस वर्ष उस जिले में है।

स्पष्टीकरण 2.–इस खंड में लद्दाख जिले के संदर्भ में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह 30 जून, 1979 को उक्त जिले में सम्मिलित क्षेत्रों के संदर्भ में है;

(26कक)[* * *]

(26ककक) ऐसे किसी व्यष्टि की दशा में, जो सिक्किमी है, जो उसे–

() सिक्किम राज्य में किसी स्रोत से; या

() लाभांश या प्रतिभूतियों पर ब्याज के रूप में,

प्रोद्भूत या उद्भूत कोर्इ आय :

परंतु इस खंड की कोर्इ बात ऐसी किसी सिक्किमी स्त्राी को लागू नहीं होगी जो 1 अप्रैल, 2008 को या उसके पश्चात् ऐसे किसी व्यष्टि से विवाह करती है जो सिक्किमी नहीं है।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''सिक्किमी'' से,–

(i) ऐसा कोर्इ व्यष्टि अभिप्रेत होगा, जिसका नाम 26 अपै्रल, 1975 के ठीक पूर्व सिक्किम प्रजा नियम, 1961 के साथ पठित सिक्किम प्रजा विनियम, 1961 के अधीन रखे गए रजिस्टर में (जिसे इसके पश्चात् ''सिक्किम प्रजा रजिस्टर'' कहा गया है) अभिलिखित किया जाता है; या

(ii) ऐसा कोर्इ व्यष्टि अभिप्रेत होगा, जिसका नाम भारत सरकार के आदेश सं. 26030/36/90-आर्इ.सी.आर्इ., तारीख 7 अगस्त, 1990 और तारीख 8 अप्रैल, 1991 के सम संख्यांक के आदेश के आधार पर सिक्किम प्रजा रजिस्टर में सम्मिलित किया जाता है; या

(iii) ऐसा कोर्इ अन्य व्यष्टि अभिप्रेत होगा, जिसका नाम सिक्किम प्रजा रजिस्टर में नहीं है किन्तु संदेह से परे यह सिठ्ठ हो गया है कि ऐसे व्यष्टि के पिता या पति या पितामह या उसी पिता से भार्इ का नाम उस रजिस्टर में अभिलिखित किया गया है;

(26ककख) कृषि उत्पाद के विपणन को विनियमित करने के प्रयोजनार्थ तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन गठित किसी कृषि उत्पाद विपणन समिति या बोर्ड की आय;

(26ख) किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी निगम की या किसी अन्य निकाय, संस्था या संगम की आय (जो सरकार द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित निकाय, संस्था या संगम है) जहां ऐसा निगम या अन्य निकाय या संस्था या संगम अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों या पिछड़े वर्गों के या उनमें से किन्हीं दो के या सभी के सदस्यों के हितों के प्रोन्नयन के लिए संस्थापित किया गया है, या बनाया गया है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() ''अनुसूचित जातियां'' और ''अनुसूचित जनजातियां'' का वही अर्थ है जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25)में है;

() ''पिछड़े वर्गों'' से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भिन्न, नागरिकों के ऐसे वर्ग अभिप्रेत हैं, जो यथास्थिति,–

(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा; या

(ii) किसी राज्य सरकार द्वारा,

समय-समय पर, अधिसूचित किए जाएं;

(26खख) किसी अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के हितों के प्रोन्नयन करने के लिए केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित किसी निगम की आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजन के लिए ''अल्पसंख्यक समुदाय'' से ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय अभिप्रेत है जो इस संबंध में राजपत्रा में केन्द्रीय सरकार द्वारा उस रूप में अधिसूचित है;

(26खखख) ऐसे भूतपूर्व सैनिकों के, जो भारत के नागरिक हैं, कल्याण और आर्थिक उत्थान के लिए किसी केंद्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी निगम की कोर्इ आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''भूतपूर्व सैनिक'' से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने संविधान के प्रारंभ से पूर्व संघ के सशस्त्रा बलों या भारतीय राज्यों के सशस्त्रा बलों में (किन्तु असम राइफल्स, रक्षा सुरक्षा कोर, सामान्य रिजर्व इंजीनियरिंग बल, लोक सहायक सेना, जम्मू-कश्मीर मिलिशिया और राज्यक्षेत्राीय सेना को छोड़कर) किसी भी पंक्ति में, चाहे योधक या गैर-योधक रूप में, अनुप्रमाणन के पश्चात् कम से कम छह मास की निरंतर अवधि के लिए सेवा की है और उसे कदाचार या अदक्षता के कारण पदच्युति या सेवोन्मुक्ति से भिन्न किसी रूप में निर्मुक्त किया गया है और किसी मृत या असमर्थ भूतपूर्व सैनिक की दशा में जिसके अंतर्गत उसकी पत्नी, बच्चे, पिता, माता, अवयस्क भार्इ, विधवा पुत्राी और विधवा बहन भी है, जो ऐसे भूतपूर्व सैनिक की मृत्यु या असमर्थता से ठीक पूर्व उस पर पूरी तरह आश्रित हो;

(27)खंड (26ख) में उल्लिखित अनुसूचित जातियों के या अनुसूचित जनजातियों के या दोनों के सदस्यों के हितों का प्रोन्नयन करने के लिए बनार्इ किसी सहकारी सोसाइटी की कोर्इ आय :

परन्तु यह तब जबकि सहकारी सोसाइटी के सदस्य वैसे ही प्रयोजनों के लिए बनार्इ गर्इ अन्य सहकारी सोसाइटियां ही हों, और सोसाइटी का वित्त, सरकार और ऐसी अन्य सोसाइटियों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है;

(28) [* * *]

(29) [वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.2003 से लोप किया गया]।

(29क) निम्नलिखित को प्रोदभूत या उद्भूत कोर्इ आय–

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में कॉफी अधिनियम, 1942 (1942 का 7) की धारा 4 के अधीन गठित कॉफी बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में रबड़ बोर्ड अधिनियम, 1947 (1947 का 24) की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन गठित रबड़ बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1962 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) की धारा 4 के अधीन स्थापित चाय बोर्ड या किसी ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1975 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में तम्बाकू बोर्ड अधिनियम, 1975 (1975 का 4) के अधीन गठित तम्बाकू बोर्ड या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1972 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष में सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1972 (1972 का 13) की धारा 4 के अधीन स्थापित सामुद्रिक उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

()1 अप्रैल, 1985 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास अधिनियम, 1985 (1986 का 2) की धारा 4 के अधीन स्थापित कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष जिसमें प्राधिकरण का गठन किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() 1 अप्रैल, 1986 को या इसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ती वर्ष में मसाला बोर्ड अधिनियम, 1986 (1986 का 10) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित मसाला बोर्ड या ऐसे पूर्ववर्ती वर्ष में जिसमें ऐसा बोर्ड गठित किया गया था, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो;

() कयर उद्योग अधिनियम, 1953 (1953 का 45) की धारा 4 के अधीन स्थापित कयर बोर्ड;

(30) ऐसे निर्धारिती की दशा में, जो भारत में चाय उत्पादन या इसके निर्माण में लगा हुआ है चाय की झाड़ियों के पुन:रोपण या प्रतिस्थापन अथवा चाय की खेती के लिए प्रयुक्त क्षेत्रों को पुनरुज्जीवित या समेकित करने की ऐसी स्कीम के अधीन जो केन्द्रीय सरकार राजपत्रा में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट चाय बोर्ड से या उसके माध्यम से प्राप्त सहायिकी की रकम :

परन्तु जब तक जबकि निर्धारिती संबंधित निर्धारण वर्ष की आय की अपनी विवरणी के साथ, या ऐसी अतिरिक्त कालावधि के भीतर जो निर्धारण अधिकारी अनुज्ञात करे पूर्ववर्ष के दौरान निर्धारिती को दी गर्इ ऐसी सहायिकी की रकम की बाबत चाय बोर्ड का प्रमाणपत्रा निर्धारण अधिकारी को प्रस्तुत करता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में ''चाय बोर्ड'' से चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) की धारा 4 के अधीन स्थापित चाय बोर्ड अभिप्रेत है;

(31) ऐसे निर्धारिती की दशा में जो भारत के रबड़, कॉफी, इलायची या ऐसी अन्य वस्तु के, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस संबंध में विशेषत: उल्लेख करे, उत्पादन और निर्माण का कारबार करता है, रबड़ के पौधों, कॉफी के पौधों, इलायची के पौधों या ऐसी अन्य वस्तु का उत्पादन करने के लिए पौधों के पुन:रोपण या प्रतिस्थापन की अथवा रबड़, कॉफी, इलायची या ऐसी अन्य वस्तु की खेती करने के लिए प्रयुक्त क्षेत्रों को पुनरुज्जीवित या समेकित करने की ऐसी स्कीम के अंतर्गत जो केन्द्रीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विशेष रूप से उल्लेख करे, सम्बद्ध बोर्ड या किसी माध्यम से प्राप्त साहायिकी की रकम :

परन्तु यह तब जबकि निर्धारिती, संबंधित निर्धारण वर्ष की आय की अपनी विवरणी के साथ या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर जो निर्धारण अधिकारी अनुज्ञात करे, पूर्ववर्ष के दौरान निर्धारिती को दी गर्इ ऐसी सहायिकी की रकम के बारे में संबद्ध बोर्ड का प्रमाण पत्र निर्धारण अधिकारी को प्रस्तुत करता है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड में, ''संबद्ध बोर्ड'' से निम्नलिखित अभिप्रेत है :–

(i) रबड़ के संबंध में रबड़ अधिनियम, 1947 (1947 का 24) की धारा 4 के अंतर्गत गठित बोर्ड,

(ii) कॉफी के संबंध में, कॉफी अधिनियम, 1942 (1942 का 7) की धारा 4 के अंतर्गत गठित कॉफी बोर्ड,

(iii) इलायची के संबंध में, मसाला बोर्ड अधिनियम, 1986 (1986 का 10) की धारा 3 के अधीन गठित मसाला बोर्ड,

(iv) इस खंड के अंतर्गत विनिर्दिष्ट किसी अन्य वस्तु के संबंध में, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अंतर्गत स्थापित कोर्इ बोर्ड या अन्य प्राधिकरण जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे;

(32) धारा 64 की उपधारा (1क) में उल्लिखित किसी निर्धारिती की दशा में, उस उपधारा के अंतर्गत उसकी कुल आय में सम्मिलित किए जाने योग्य कोर्इ आय, उस सीमा तक जिस तक ऐसी आय ऐसी प्रत्येक अवयस्क संतान के बारे में, जिसकी आय इस प्रकार सम्मिलित किए जाने योग्य है, एक हजार पांच सौ रुपए से अधिक नहीं;

(33) किसी पूंजी आस्ति के अंतरण से, जो भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की अनुसूची 1 में निर्दिष्ट स्कीम, 1964 की एक यूनिट है और जहां ऐसी आस्ति का अंतरण 1 अप्रैल, 2002 को या उसके पश्चात् हुआ हैं, उद्भूत कोर्इ आय ;

(34) धारा 115ण में निर्दिष्ट लाभांशों के रूप में कोर्इ आय:

परंतु इस खंड की कोर्इ बात धारा 115खखघक के उपबंधों के अनुसार कर से प्रभार्य लाभांश द्वारा किसी आय को लागू नहीं होगी।

(34क) धारा 115थक में यथानिर्दिष्ट कंपनी द्वारा, शेयरों के 14ग[***] क्रय द्वारा वापस लेने के मद्दे किसी निर्धारिती को, जो शेयर धारक है, उद्भूत कोर्इ आय;

(35) () खंड (23घ) के अधीन विनिर्दिष्ट पारस्परिक निधि की यूनिटों की बाबत प्राप्त आय ; या

() विनिर्दिष्ट उपक्रम के प्रशासक से यूनिटों की बाबत प्राप्त आय ; या

() विनिर्दिष्ट कंपनी से यूनिटों की बाबत प्राप्त आय,

के रूप में कोर्इ आय :

परंतु यह खंड, यथास्थिति, विनिर्दिष्ट उपक्रम के प्रशासक या विनिर्दिष्ट कंपनी या पारस्परिक निधि की यूनिटों के अंतरण से उद्भूत किसी आय को लागू नहीं होगा।

स्पष्टीकरण– इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

() "प्रशासक" से भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की धारा 2 के खंड () में निर्दिष्ट प्रशासक अभिप्रेत है ;

() "विनिर्दिष्ट कंपनी" से भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उपक्रम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 (2002 का 58) की धारा 2 के खंड () में निर्दिष्ट कोर्इ कंपनी अभिप्रेत है ;

(35क) किसी प्रतिभूतिकरण न्यास से किसी व्यक्ति द्वारा, जो उक्त न्यास का विनिधानकर्ता है, धारा 115नक में निर्दिष्ट वितरित आय के रूप में प्राप्त कोर्इ आय :

परंतु इस खंड में अंतर्विष्ट कोर्इ बात, उक्त धारा में निर्दिष्ट वितरित आय के माध्यम से, 1 जून, 2016 को या उसके पश्चात्, प्राप्त किसी आय को लागू नहीं होगी।

स्पष्टीकरण– इस खंड के प्रयोजनों के लिए "विनिधानकर्ता" और "प्रतिभूतिकरण न्यास" पदों का वही अर्थ होगा जो धारा 115नगक के नीचे दिए गए स्पष्टीकरण में क्रमश: उनका है;

(36) किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के, जो 1 मार्च, 2003 को या उसके पश्चात् और 1 मार्च, 2004 से पूर्व क्रय की गर्इ कंपनी में कोर्इ पात्र साधारण शेयर हैं, और जो बारह मास या उससे अधिक की अवधि के लिए धारित की गर्इ है, अंतरण से उद्भूत कोर्इ आय।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "पात्र साधारण शेयर" से अभिप्रेत है–

(i) किसी कंपनी में कोर्इ साधारण शेयर जो 1 मार्च, 2003 को स्टाक एक्सचेंज, मुंबर्इ के बी.एस.र्इ. सूचकांक-500 का एक संघटक है और ऐसे साधारण शेयर के क्रय और विक्रय के संव्यवहारों को भारत में मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में किया गया है;

(ii) किसी कंपनी में कोर्इ साधारण शेयर जो 1 मार्च, 2003 को या उसके पश्चात् जारी पब्लिक इश्यू के माध्यम से आबंटित किया गया है और भारत में 1 मार्च, 2004 से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध है और ऐसे शेयर के विक्रय के संव्यवहार को भारत में मान्यताप्राप्त किसी स्टाक एक्सचेंज में किया गया है;

(37) किसी निर्धारिती की दशा में, जो कोर्इ व्यष्टि या कोर्इ हिन्दू अविभक्त कुटुंब है, कृषि भूमि के अंतरण से उद्भूत 'पूंजी अभिलाभ' शीर्ष के अधीन प्रभार्य कोर्इ आय, जहां–

(i) ऐसी भूमि धारा 2 के खंड (14) के उपखंड (iii) की मद (क) या मद (ख) में निर्दिष्ट किसी क्षेत्र में स्थित है;

(ii) ऐसी भूमि, अंतरण की तारीख के ठीक पहले के दो वर्ष की अवधि के दौरान ऐसे हिन्दू अविभक्त कुटुंब या व्यष्टि या उसके माता-पिता में से किसी के द्वारा कृषि प्रयोजनों के लिए उपयोग की जा रही थी;

(iii) ऐसा अंतरण किसी विधि के अधीन अनिवार्य अर्जन के रूप में है या ऐसा कोर्इ अंतरण है जिसके लिए प्रतिफल का अवधारण या अनुमोदन केन्द्रीय सरकार या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया गया है;

(iv) ऐसी आय ऐसे अंतरण के लिए प्रतिकर या प्रतिफल से हुर्इ है, जो ऐसे निर्धारिती द्वारा 1 अप्रैल, 2004 को या उसके पश्चात् प्राप्त किया गया है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "प्रतिकर या प्रतिफल" पद के अंतर्गत किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा बढ़ाया गया या और बढ़ाया गया प्रतिकर या प्रतिफल भी आता है ;

15[(37क) किसी निर्धारिती, जो एक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब है और जो 2 जून, 2014 को ऐसी विनिर्दिष्ट पूंजी आस्ति का स्वामी है और आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2014 (2014 का आंध्र प्रदेश अधिनियम 11) और उक्त अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों, विनियमों और स्कीमों के उपबंधों के अधीन बनार्इ गर्इ आंध्र प्रदेश राजधानी नगर लैंड पूलिंग स्कीम (तैयार करना और कार्यान्वयन) नियम, 2015 के अंतर्गत आने वाली लैंड पूलिंग स्कीम (जिसे इसमें इसके पश्चात् "स्कीम" कहा गया है) के अधीन ऐसी विनिर्दिष्ट पूंजी आस्ति का अंतरण करता है, को विनिर्दिष्ट पूंजी आस्ति के अंतरण की बाबत उद्भूत होने वाली कोर्इ आय जो "पूंजी अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य है।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विनिर्दिष्ट पूंजी आस्ति" से अभिप्रेत है,–

() 2 जून, 2014 को निर्धारिती के स्वामित्वाधीन भूमि या भवन या दोनों और जिसे स्कीम के अधीन अंतरित कर दिया गया है; या

() खंड (क) में निर्दिष्ट भूमि या भवन या दोनों की बाबत निर्धारिती को स्कीम के अधीन जारी लैंड पूलिंग स्वामित्व प्रमाणपत्र; या

() स्कीम के अनुसार उपखंड (क) में निर्दिष्ट भूमि या भवन या दोनों के बदले में निर्धारिती द्वारा प्राप्त, यथास्थिति, पुन:गठित भूखंड या भूमि, यदि इस प्रकार प्राप्त, यथास्थिति, ऐसा भूखंड या भूमि का उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति से दो वर्ष के भीतर अंतरण कर दिया जाता है, जिसमें ऐसे भूखंड या भूमि का कब्जा उसे सौंपा गया था;]

(38) किसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के, जो किसी कंपनी में कोर्इ साधारण शेयर या किसी साधारण शेयरोन्मुख निधि की कोर्इ यूनिट या किसी कारबार न्यास की कोर्इ यूनिट है, अंतरण से होने वाली आय, जहां–

() किसी साधारण शेयर या यूनिट के विक्रय का संव्यवहार उस तारीख को या उसके पश्चात् होता है, जिसको वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 2004 का अध्याय 7 प्रवृत्त होता; और

() ऐसा संव्यवहार उस अध्याय के अधीन प्रतिभूति संव्यवहार कर से प्रभार्य है:

परंतु किसी कंपनी के दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ के रूप में हुर्इ आय को धारा 115ञख के अधीन बही लाभ और संदेय आय-कर की संगणना करने के लिए हिसाब में लिया जाएगा:

परंतु यह भी कि उपखंड () में अंतर्विष्ट कोर्इ बात किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र में अवस्थित किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में किए गए संव्यवहार को और जहां ऐसे संव्यवहार के लिए प्रतिफल विदेशी मुद्रा में संदत्त किया जाता है या संदेय है, लागू नहीं होगी।

16[परंतु यह भी कि इस खंड में अंतर्विष्ट कोर्इ बात, दीर्घकालिक पूंजी आस्ति, जो किसी कंपनी में साधारण शेयर है, के अंतरण से उद्भूत होने वाली किसी आय को लागू नहीं होगी यदि ऐसे साधारण शेयर का, इस निमित्त केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित अर्जन से भिé अर्जन का संव्यवहार, 1 अक्तूबर, 2004 को या उसके पश्चात् किया गया है और ऐसा संव्यवहार वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 2004 (2004 का 23) के अध्याय 7 के अधीन प्रतिभूति संव्यवहार कर से प्रभार्य नहीं है।]

16क[परंतु यह भी कि इस खंड में अंतर्विष्ट कोर्इ बात, ऐसी दीर्घकालिक पूंजी आस्ति के, जो किसी कंपनी या किसी साधारण शेयरोन्मुख निधि की किसी यूनिट या किसी कारबार न्यास की किसी यूनिट में इक्विटी शेयर है, 1 अप्रैल, 2018 को या उसके पश्चात् किए गए अंतरण से होने वाली किसी आय को लागू नहीं होंगी]

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए,

() "साम्य उन्मुख निधि" से कोर्इ निधि अभिप्रेत है–

(i) जहां विनिधानीय निधियों में देशी कंपनियों के साम्य शेयरों के माध्यम से ऐसी निधि के कुल आगमों के पैंसठ प्रतिशत से अधिक के विस्तार तक विनिधान किया गया है; और

(ii) जिसकी स्थापना खंड (23घ) के अधीन विनिर्दिष्ट पारस्परिक निधि के अधीन की गर्इ है:

परंतु निधि साधारण शेयरधृति की प्रतिशतता की संगणना आरंभिक और अंतिम संख्या के मासिक औसत की वार्षिक औसत के प्रति निर्देश से की जाएगी;

() "अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र" का वही अर्थ होगा जो उसका विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 (2005 का 28) की धारा 2 के खंड () में है;

() "मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज" का वही अर्थ होगा जो उसका धारा 43 की* उपधारा (5) के स्पष्टीकरण 1 के खंड (ii) में है ।

(39) केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित व्यक्ति या व्यक्तियों को भारत में हुर्इ किसी अंतरराष्ट्रीय खेल कूद प्रतियोगिता से होने वाली विनिर्दिष्ट आय, यदि ऐसी अंतरराष्ट्रीय खेल कूद प्रतियोगिता–

() ऐसी प्रतियोगिता से संबंधित अंतरराष्ट्रीय खेल कूद को विनियमित करने वाले अंतरराष्ट्रीय निकाय द्वारा अनुमोदित हो;

() दो से अधिक देशों में खेली गर्इ हो;

() इस खंड के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित हो।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनार्थ, "विनिर्दिष्ट आय" से अंतरराष्ट्रीय खेल कूद प्रतियोगिता से होने वाली ऐसी प्रकृति की और उस सीमा तक की आय अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अधिसूचित करे।

(40) ऐसी किसी भारतीय कंपनी से, जो विद्युत के उत्पादन, पारेषण या वितरण के कारबार में लगी हुर्इ उसकी नियंत्री कंपनी है, किसी समनुंषगी कंपनी की अनुदान के रूप में या अन्यथा प्राप्त कोर्इ आय, यदि ऐसी प्राप्ति विद्युत उत्पादन के विद्यमान कारबार की पुन:संचना या पुनरुज्जीवन के संबंध में शोध्य राशियों के निपटारे के लिए है :

परन्तु इस खंड के उपबंध उस दशा में लागू होंगे यदि विद्युत उत्पादन के किसी विद्यमान कारबार की पुन:संचना या पुनरुज्जीवन धारा 80झक की उपधारा (4) के खंड (v) के उपखंड () के अधीन अधिसूचित भारतीय कंपनी को कारबार के अंतरण के रूप में हुआ है;

(41) ऐसी किसी पूंजी आस्ति के, जो विद्युत उत्पादन, पारेषण या वितरण के कारबार में लगे हुए किसी उपक्रम की आस्ति है, अंतरण से हुर्इ कोर्इ आय, जहां ऐसा अंतरण धारा 80झक की उपधारा (4) के खंड (v) के उपखंड () के अधीन अधिसूचित भारतीय कंपनी को तारीख 31 मार्च, 2006 को या उसके पूर्व किया जाता है;

(42) किसी ऐसे निकाय या प्राधिकरण को, जिसे–

() केंद्रीय सरकार द्वारा दो या अधिक देशों के साथ की गर्इ किसी संधि या किए गए किसी करार या केंद्रीय सरकार द्वारा हस्ताक्षरित किसी कन्वेशन के अधीन स्थापित या गठित या नियुक्त किया गया है;

() लाभ के प्रयोजनों के लिए स्थापित या गठित या नियुक्त नहीं किया गया है;

() केंद्रीय सरकार द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचित किया गया है,

उद्भूत होने वाली कोर्इ विनिर्दिष्ट आय।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विनिर्दिष्ट आय" से, इस खंड में निर्दिष्ट निकाय या प्राधिकरण को उद्भूत होने वाली ऐसी प्रकृति की और ऐसी सीमा तक की, जो केंद्रीय सरकार इस निमित्त अधिसूचित करे, आय अभिप्रेत है;

(43) किसी व्यष्टि को धारा 47 के खंड (xvi) में निर्दिष्ट प्रतिवर्ती बंधक के संव्यवहार में ऋण के रूप में, चाहे वह एकमुश्त हो या किस्त में हो, प्राप्त कोर्इ राशि;

(44) किसी व्यक्ति को भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) के उपबंधों के अधीन 27 फरवरी, 2008 को स्थापित नर्इ पेंशन प्रणाली न्यास के लिए या उसकी ओर से प्राप्त कोर्इ आय;

(45) संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सेवानिवृत्त अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या सेवानिवृत्त सदस्य को केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित रूप में संदत्त कोई भत्ता या परिलब्धि;

(46) ऐसे किसी निकाय या प्राधिकरण या बोर्ड या न्यास या आयोग (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) 17[या उसका कोर्इ वर्ग] को-

() जो सर्वसाधारण के फायदे के लिए किसी क्रियाकलाप को विनियमित या प्रशासित करने के उद्देश्य से किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित या गठित किया गया है या केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा गठित किया गया है ;

() जो किसी वाणिज्यिक क्रियाकलाप में नहीं लगा हुआ है ; और

() जो इस खंड के प्रयोजनों के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया गया है, प्रोद्भूत होने वाली कोई विनिर्दिष्ट आय ।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विनिर्दिष्ट आय" से इस खंड में निर्दिष्ट किसी निकाय या प्राधिकरण या बोर्ड या न्यास या आयोग (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) 17[या उसका कोर्इ वर्ग] को ऐसी प्रकृति की और उस सीमा तक प्रोद्भूत होने वाली आय अभिप्रेत है, जो केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ;

(47) ऐसे दिशानिर्देशों के अनुसार, जो विहित किए जाएं, स्थापित किसी अवसंरचना ऋण निधि की कोई आय जिसे केंद्रीय सरकार द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचित किया जाए

(48) भारत में किसी व्यक्ति को कच्चे तेल के या किसी ऐसे अन्य माल के विक्रय अथवा ऐसी सेवाएं प्रदान करने के मद्दे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाएं, किसी विदेशी कंपनी द्वारा भारतीय करेंसी में भारत में प्राप्त कोर्इ आय :

परंतु

(i) विदेशी कंपनी द्वारा भारत में ऐसी आय, केंद्रीय सरकार द्वारा किए गए या केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी करार या ठहराव के अनुसरण में प्राप्त हुर्इ है;

(ii) राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए, विदेशी कंपनी को और करार या ठहराव को केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किया गया है; और

(iii) विदेशी कंपनी भारत में ऐसी आय को प्राप्त करने से भिन्न किसी क्रियाकलाप में नहीं लगी हुर्इ है।

(48क) भारत में किसी सुविधा में अपरिष्कृत तेल के भंडारण या भारत में किसी निवासी व्यक्ति को उससे परिष्कृत तेल के विक्रय के मद्दे किसी विदेशी कंपनी को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली कोर्इ आय :

परंतु यह तब जब,–

(i) विदेशी कंपनी द्वारा भंडारण और विक्रय केंद्रीय सरकार द्वारा किए गए या केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित करार या ठहराव के अनुसरण में हैं;

(ii) राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए, इस निमित्त विदेशी कंपनी और करार या व्यवस्था केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाते हैं।

18[(48ख) किसी विदेशी कंपनी को, 19[खंड (48क) में, यथास्थिति, निर्दिष्ट करार या ठहराव के अवसान के पश्चात् या उसमें उल्लिखित निबंधनो के अनुसार उक्त करार या ठहराव के पर्यवसान पर] भारत में सुविधा से ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाएं, अपरिष्कृत तेल के बचे हुए स्टाक, यदि कोर्इ हो, के विक्रय के मद्दे प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली कोर्इ आय;]

(49) राष्ट्रीय वित्तीय होल्ंिडग कंपनी लिमिटेड, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित कंपनी है, की 1 अप्रैल, 2014 को या उसके पूर्व आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष से सुसंगत किसी पूर्ववर्ष की आय;

(50) उस तारीख को या उसके पश्चात् जिसको वित्त अधिनियम, 2016 के अध्याय 8 के उपबंध प्रवृत होते हैं, किसी विनिर्दिष्ट सेवा से उद्भूत कोर्इ आय और इस अध्याय के अधीन समकरण उद्ग्रहण से प्रभार्य ।

स्पष्टीकरण - इस खंड के प्रयोजनों के लिए, "विनिर्दिष्ट सेवा" का वही अर्थ होगा जो उसका वित्त अधिनियम, 2016 के अध्याय 8 की धारा 161 के खंड (i) में है।

 

9. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2013 से भूतलक्षी प्रभाव से शब्द "खंड ()" के स्थान पर प्रतिस्थापित।

9क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.4.2019 से अंत:स्थापित।

10. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।

11. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2019 से ''कर्मचारी'' शब्द के स्थान पर प्रतिस्थापित।

11क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.4.2020 से "चालीस" के स्थान पर "साठ" शब्द प्रतिस्थापित किया जाएगा।

12. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंतस्थापित।

'खंड' पढ़ा जाना चाहिए।

13. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.1998 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

13क. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.9.2019 से "आवश्यक समझे और विहित प्राधिकारी" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

14. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित। इससे पूर्व बारहवां परन्तुक वित्त अधिनियम 2001 द्वारा 1.4.2002 से अंत:स्थापित। लेकिन बाद में वित्त अधिनियम 2002, द्वारा 1.4.2002 से लोप किया गया।

*खंड (1) आदि के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

14क. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2019 से अंत:स्थापित ।

14ख. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 1.9.2019 से प्रतिस्थापित ।

14ग. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा 5.7.2019 से "(जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नही हैं)" शब्दों का लोप किया गया।

15. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2015 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।

16. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।

16क. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2019 से अंत:स्थापित ।

17. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।

18. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से अंत:स्थापित।

19. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा 1.4.2019 से ''खंड (48क) मे निर्दिष्ट करार या ठहराव के अवसान के पश्चात्'' शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

* खंड होना चाहिये।

 

 

 

[वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2019 द्वारा संशोधित रूप में]

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