कतिपय मामलों में उपयोजन न करने के लिए सामान्य परिवर्जन रोधी नियम से संबंधित अध्याय ।
128. (1) अध्याय ॥ के उपबंध निम्नलिखित पर लागू नहीं होंगे -
| (क) | | एक ठहराव, जहां ठहराव के सभी पक्षों को संबंधित कर वर्ष में कुल कर लाभ तीन करोड़ रुपये की राशि से अधिक नहीं है |
| (ख) | | एक विदेशी संस्थागत निवेशक, - |
| (i) | | जो अधिनियम के अधीन निर्धारिती है; |
| (ii) | | जिसने धारा 159 में निर्दिष्ट समझौते का लाभ नहीं उठाया है, और |
| (iii) | | जिसने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) के अधीन बनाए गये भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (विदेशी संस्थागत निवेशक) विनियम, 1995 के अनुसार, ऐसे निवेशों के संबंध में सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति से सूचीबद्ध प्रतिभूतियों, या गैर-सूचीबद्ध प्रतिभूतियों में निवेश किया है, |
| (ग) | | एक व्यक्ति, एक अनिवासी होने के नाते, उसके द्वारा विदेशी व्युत्पन्न लिखतों के माध्यम से या अन्यथा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, एक विदेशी संस्थागत निवेशक में किए गए निवेश के संबंध मैं, |
| 1[(घ) | | किसी भी व्यक्ति को ऐसे निवेशों के हस्तांतरण से होने वाली या उत्पन होने वाली, या हुई या उत्पन हुई मानी जाने वाली, या प्राप्त हुई या प्राप्त हुई मानी जाने वाली कोई भी आय, जो उस व्यक्ति द्वारा 1 अप्रैल, 2017 से पहले किये गए थे।] |
2[(2) अध्याय XI के उपबंद किसी भी व्यवस्था पर लागू होंगे, चाहे वह इस व्यवस्था से प्रापत कर संबंधी लाभ के संबंध में 1 अप्रैल, 2017 को या उसके बाद की तारीख को की गई हो, सिवाय उस आय के जो ऐसे निवेशों के हस्तांतरण से प्रपत होती है या उत्तपन होती है, या किसी व्यक्ति को प्रपत होती है या प्रपत होने का अनुमान लगाया जाता है जो ऐसे वयक्ति द्वारा 1 अप्रैल, 2017 से पहले किये गए थे ।]
(3) इस नियम के प्रयोजनों के लिए, -
| (क) | | "विदेशी संस्थागत निवेशक " का अर्थ धारा 210 (6) (क) में इसे समनुदेशित किया गया अर्थ होगा; |
| (ख) | | "विदेशी व्युत्पन्न लिखत " का वही अर्थ होगा जो इसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (15 का 1992) के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (विदेशी संस्थागत निवेशक) विनियम, 1995 में समनुदेशित किया गया है ; |
| (ग) | | "भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड" का वही अर्थ होगा जो इसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (15 का 1992) की धारा 2 (1) (क) में समनुदेशित किया गया है ; |
| (घ) | | 'कर लाभ ", जैसा कि धारा 184 (11) में परिभाषित किया गया है और अध्याय || के अनुसार गणना की गई है, निम्नलिखित के संदर्भ में होगी- |
| (i) | | धारा 184 (11) (क) से (ङ), कर की रकम और |
| (ii) | | धारा 184 (11) (च), वह कर जो प्रभार्य होता यदि उसमें संदर्भित हानि में वृद्धि कुल आय होती । |