बीमा कारबार
पहली अनुसूची
बीमा कारबार
[धारा 44 देखिये]
क--जीवन बीमा कारबार
जीवन बीमा कारबार के लाभों को पृथक्त: संगणित किया जाना
1. ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो जीवन बीमा कारबार करता है या जिसने पूर्ववर्ष में किसी समय जीवन बीमा कारबार किया है, ऐसे कारबार से व्यक्ति के लाभ और अभिलाभ की संगणना, उसके किसी अन्य कारबार के लाभ या अभिलाभ से पृथक् की जाएगी।
96[जीवन बीमा कारबार के लाभों की संगणना
2. अधिशेष के वार्षिक औसत को, जो निर्धारण वर्ष के प्रारम्भ से पूर्व समाप्त होने वाली अंतिम अन्तर्मूल्यांकन अवधि की बाबत बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के अनुसार किए गए बीमांकिक मूल्यांकन द्वारा प्रकट अधिशेष या कमी को समायोजित करके आए, जीवन बीमा कारबार के लाभ और अभिलाभ समझा जाएगा, जिससे उसमें सम्मिलित किसी अधिशेष या कमी का, जो किसी पूर्वतर अन्तर्मूल्यांकन अवधि में सम्मिलित की गयी थी, उसमें से अपवर्जन हो जाए।]
कटौतियां
3. [वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1977 से लोप किया गया। इससे पूर्व इस नियम का पहले वित्त अधिनियम, 1966 द्वारा 1.4.1966 से और वित्त अधिनियम, 1965 द्वारा 1.4.1965 से संशोधन किया गया था।]
स्रोत पर कटौती द्वारा संदत्त कर का समायोजन
4. जहां किसी वर्ष के लिए जीवन बीमा कारबार के लाभों का निर्धारण बारह मास से अधिक की अन्तर्मूल्यांकन अवधि के लिए मूल्यांकन द्वारा प्रकट अधिशेष के वार्षिक औसत के अनुसार किया जाता है वहां उस वर्ष के लिए संदेय आय-कर की संगणना करने में पूर्ववर्ष में संदत्त आय-कर का मुजरा धारा 199 के अनुसार नहीं किया जाएगा बल्कि ऐसी अवधि के दौरान प्रतिभूतियों पर ब्याज से या अन्य प्रकार से स्रोत पर कटौती के रूप में संदत्त आय-कर के वार्षिक औसत का मुजरा किया जाएगा।
ख–अन्य बीमा कारबार
अन्य बीमा कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना
5. जीवन बीमा से भिन्न किसी कारबार के लाभों और अभिलाभों को 97[बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) या उसके अधीन बनाए गए नियमों या बीमा विनियामक विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के उपबंधों के अनुसार तैयार किए गए लाभ और हानि लेखे में प्रकट किए गये कर और विनियोजनों से पूर्व लाभ माना जाएगा] जो निम्नलिखित समायोजनों के अधीन रहते हुए होगा,--
(क) इस नियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए कोर्इ ऐसा व्यय या मोक 98[जिसके अंतर्गत किसी कर, लाभांश, रिजर्व के उपबंध या किसी अन्य उपबंध के रूप में, जो विहित की जाए, लाभ और हानि लेखा में नामे डाली गर्इ (डेबिट) कोर्इ रकम भी शामिल है] जो धारा 30 से धारा 99[43ख] तक के उपबंधों के अधीन कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना करने के लिए स्वीकार्य नहीं है, पुन: जोड़ दिया जाएगा;
1[(ख) (i) विनिधानों की वसूली में किसी अभिलाभ या हानि को, यथास्थिति, जोड़ा जाएगा या उसकी कटौती की जाएगी, यदि ऐसे अभिलाभ या हानि को लाभ-हानि खाते में जमा या उससे विकलित नहीं किया गया है;
(ii) लाभ-हानि लेखे से विकलित किए गए विनिधान के मूल्य में कमी के किसी उपबंध को वापस जोड़ा जाएगा;]
1क(ग) अनवसित जोखिमों के लिए रिजर्व में अग्रनीत ऐसी रकम, जो इस निमित्त विहित की जाए, कटौती के रूप में अनुज्ञात की जाएगी।
ग–अन्य उपबंध
अनिवासी व्यक्ति के लाभ और अभिलाभ
6. (1) भारत में निवास न करने वाले और केार्इ बीमा कारबार चलाने वाले व्यक्ति की, भारत में शाखाओं के लाभ और अभिलाभ, अधिक विश्वसनीय आधार सामग्री के अभाव में, ऐसे व्यक्ति की विश्व-आय का वह अनुपात माना जा सकेगा जो भारत से प्राप्त उसकी प्रीमियम आय के उसकी कुल प्रीमियम आय से अनुपात के समान हो।
(2) इस नियम के प्रयोजनों के लिए, विश्व-आय की, जहां तक वह भारत में निवास न करने वाले व्यक्ति के जीवन बीमा कारबार से सम्बद्ध है, संगणना उस रीति में की जाएगी जो भारत में चलाए गए जीवन बीमा कारबार के लाभों और अभिलाभों की संगणना करने के लिए इस अधिनियम में दी गर्इ है।
निर्वचन
7. (1) इन नियमों के निर्वचन के लिए–
(i) 2[***];
(ii) ''विनिधानों'' के अंतर्गत प्रतिभूतियां, स्टाक और शेयर भी हैं।
(iii) 3[***];
(iv) ''जीवन बीमा कारबार''4 से बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2 के खंड (11) में परिभाषित जीवन बीमा कारबार अभिप्रेत है;
(v) ''नियम'' से इस अनुसूची में अन्तर्विष्ट नियम अभिप्रेत है।
(2) इन नियमों में बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) या उसके किसी उपबंध के प्रति निर्देशों का, जहां तक उनका संबंध भारतीय जीवन बीमा निगम से है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 435 के साथ पठित उस अधिनियम या उसके उपबंध के प्रति निर्देश हैं।
96. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1977 से प्रतिस्थापित।
97. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.4.2011 से ''वार्षिक लेखाओं से, जिनकी प्रतियों का बीमा नियंत्रक को दिया जाना बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के अधीन अपेक्षित है, प्रकट लाभों का अतिशेष माना जाएगा'' शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
98. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1998 द्वारा 1.4.1989 से भूतलक्षी प्रभाव से अंत:स्थापित।
99. प्रत्यक्ष कर विधि (संशोधन) अधिनियम, 1987 द्वारा 1.4.1989 से ''43क'' के स्थान पर प्रतिस्थापित। इससे पूर्व ''43क'' वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1967 से ''43'' के स्थान पर रखा गया था।
1. वित्त अधिनियम, 2010 द्वारा 1.4.2011 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व, वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2009 द्वारा 1.10.2011 से यथा अंत:स्थापित और वित्त अधिनियम, 1988 द्वारा 1.4.1989 से लोप किया गया खंड (ख) इस प्रकार था :
"(ख) (i) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों के अनुसार विनिधानों की वसूली में कमी या हानि को पूरा करने के लिए लेखाओं में या तो अपलिखित या उपबंधित किसी रकम की बाबत कटौती;
(ii) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों के अनुसार विनिधानों की मूल्य वृद्धि या उनकी वसूली पर अभिलाभों के मद्दे लेखाओं में मुजरा की गर्इ किसी रकम की बाबत वृद्धि;"
1क. ''अनवसित जोखिम के लिए रिजर्व'' में अग्रनीत की जा सकने वाली रकम के लिए विहित सीमा के लिए नियम 6ड़ देखिए (आग और विविध बीमा कारबार की दशा में शुद्ध प्रीमियम का 50 प्रतिशत तथा समुद्री बीमा कारबार की दशा में शुद्ध प्रीमियम का 100 प्रतिशत और जहां बीमा कारबार अग्नि बीमा या इंजीनियरी बीमा से संबंधित है और जिसमें आतंकवाद जोखिमों के बीमा का भी उपबंध है, वहां शुद्ध प्रीमियम का 100 प्रतिशत)।
2. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1977 से लोप किया गया। इससे पूर्व खंड (i) का वित्त (सं. 2) अधिनियम, 1967 द्वारा 1.4.1967 से संशोधन किया गया था।
3. वित्त अधिनियम, 1976 द्वारा 1.4.1977 से लोप किया गया।
4. बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2 के खंड (11) में ''जीवन बीमा कारबार'' की परिभाषा निम्न प्रकार दी गर्इ है :
'(11) ''जीवन बीमा कारबार'' से मानव जीवन के बीमे की संविदाएं करने का कारबार अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत मृत्यु पर (केवल दुर्घटना से हुर्इ मृत्यु को छोड़ कर) या मानव जीवन पर निर्भर किसी भी आकस्मिकता के घटित होने पर धनराशि के संदाय का आश्वासन दिए जाने से संबंधित संविदा तथा मानव जीवन पर निर्भर अवधि के लिए प्रीमियमों के संदाय की शर्त पर की गर्इ कोर्इ संविदा भी है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित भी समझे जाएंगे--
(क) निर्योग्यता तथा दुगुनी या तिगुनी क्षतिपूरक दुर्घटना प्रसुविधाएं प्रदान करना, यदि बीमा संविदा में वैसा उपबंध कर दिया गया हो;
(ख) मानव जीवन पर वार्षिकियां प्रदान करना; और
(ग) अधिवार्षिकी भत्ता तथा वार्षिकियां प्रदान करना जो ऐसी किसी निधि में से संदेय है, जो उन व्यक्तियों की, जो किसी विशिष्ट वृत्ति, व्यापार या नियोजन में लगे हुए हैं या लगाए गए हैं या उनके आश्रितों की सहायता और उनके भरण-पोषण के लिए ही उपयोज्य है;'
5. जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 की धारा 43 के पाठ के लिए देखिए परिशिष्ट।
[वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा संशोधित रूप में]

