आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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हस्ताक्षर तिथि

2014

लागू होना

07/07/2014

कोलंबिया गणराज्य के बीच करार

भारत का राजपत्र

असाधारण

भाग-II-खण्ड-3-उप-खण्ड (ii)

प्राधिकार से प्रकाशित

सं. 1943

नर्इ दिल्ली, मंगलवार, सितम्बर 23, 2014/आश्विन 1, 1936

वित्त मंत्रालय

(राजस्व विभाग)

अधिसूचना

नर्इ दिल्ली, 23 सितम्बर, 2014

(आयकर)

का. आ. 2465 (अ)-जबकि, आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार एवं वित्तीय अपवंचन की रोकथाम के लिए भारत गणराज्य की सरकार और कोलम्बिया की सरकार के बीच एक करार (जिसे इसके पश्चात् करार कहा जाएगा) पर 13 मर्इ, 2011 को भारत में हस्ताक्षर किए गए थे;

2. और जबकि, उक्त करार को लागू करने की तारीख 07 जुलार्इ, 2014 है, जो उक्त करार के अनुच्छेद 30 के पैरा 2 के अनुसार उक्त करार को लागू करने के लिए संबंधित कानूनों के तहत यथा अपेक्षित प्रक्रियाएं पूरी करने संबंधी अधिसूचनाओं में से बाद की अधिसूचना की तारीख है;

3. और जबकि, उक्त करार के अनुच्छेद 30 के पैराग्राफ 3 के उप पैरा (क) में प्रावधान है कि भारत में उक्त करार के उपबंध करार लागू होने वाले कलैंण्डर वर्ष के तुरन्त बाद आने वाले वित्तीय वर्ष के अप्रैल माह के प्रथम दिन या इसके बाद व्युत्पन्न आय की राशि पर लागू होंगे और यह करार के लागू होने की तारीख से सभी मामलों में होंगे;

4.  इसलिए अब, आयकर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 90 की उप धारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केन्द्रीय सरकार एतद् द्वारा निर्देश देती है कि उक्त करार के सभी उपबंध, जो इसके बाद संलग्न अनुबंध में दिए गए हैं, भारत संघ में लागू होंगे।

[अधिसूचना सं. 44/2014/फा. सं. 501/3/99-एफटीडी-II]

रजत बंसल, संयुक्त सचिव

आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार और

राजस्व अपवंचन को रोकने के लिए

भारत गणराज्य की सरकार

और

कोलम्बिया गणराज्य

के बीच करार

भारत गणराज्य की सरकार और कोलम्बिया गणराज्य, आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार और राजस्व अपवंचन को रोकने के लिए तथा दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की दृष्टि से एक करार निष्पन्न करने की इच्छा से, निम्नानुसार सहमत हुर्इ है:

I. कराकर का सीमाक्षेत्र

अनुच्छेद-1

शामिल व्यक्ति

यह करार उन व्यक्तियों पर लागू होगा जो संविदाकारी राज्यों में से किसी एक अथवा दोनों के निवासी हैं।

अनुच्छेद-2

शामिल कर

1. यह करार किसी संविदाकारी राज्य अथवा इसके राजनैतिक उप-प्रभागों अथवा राज्यक्षेत्रीय अथवा स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा आय पर लगाए गए करों के संबंध में लागू होगा, चाहे वे किसी भी तरह से लगाए जाएं।

2. चल अथवा अचल सम्पत्ति के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर लगाए गए करों और उद्यमों द्वारा प्रदत्त मजदूरी अथवा वेतनों की कुल राशियों पर करों सहित कुल आय अथवा आय के तत्वों पर लगाए गए सभी करों को आय पर लगाए गए करों के रूप में माना जाएगा।

3. जिन मौजूदा करों पर यह करार लागू होगा, वे विशेष रूप से इस प्रकार हैं:-

(क)  भारत में, आयकर जिसमें उस पर लगने वाला अधिभार भी शामिल है;

(जिसे इसके बाद ''भारतीय कर'' कहा जाएगा);

(ख)  कोलम्बिया के मामले में, आय और अनुपूरक कर;

(जिसे इसके बाद ''कोलम्बियन कर'' कहा जाएगा)।

4. यह करार किसी भी समरूप अथवा तत्वत: समान करों पर भी लागू होगा जो करार पर हस्ताक्षर किए जाने की तारीख के पश्चात् विद्यमान करों के अतिरिक्त अथवा उनके स्थान पर लगाए जाएंगे। संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी किन्हीं भी महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संबंध में एक दूसरे को अधिसूचित करेंगे जो उनके अपने-अपने कराधान कानूनों में किए गए हों।

II. परिभाषाएं

अनुच्छेद-3

सामान्य परिभाषाएं

1. इस करार के प्रयोजनार्थ जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो:

(क) ''भारत'' शब्द से अभिप्रेत है - भारत का राज्यक्षेत्र और इसमें राज्यक्षेत्रीय समुद्र और उसके ऊपर के वायुमंडलीय क्षेत्र के साथ-साथ कोर्इ भी अन्य समुद्री क्षेत्र शामिल है जिनमें समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिसमय सहित भारतीय कानून तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार भारत के प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकार, अन्य अधिकार तथा क्षेत्राधिकार हैं;

(ख) ''कोलम्बिया'' पद से अभिप्राय है कोलम्बिया गणराज्य और यदि भू-विज्ञानी अर्थ में प्रयोग किया जाए तो इसमें इसके महाद्वीपीय राज्यक्षेत्र, सेन एनड्रेंस का आर्कीपेलेगो, प्राविंडेसिया और सांता केटेलीना, मलपेलो द्वीप और अन्य सभी द्वीप, द्वीपक, मूल-स्थान (कीज) हैड लैंड्स और उससे संबंधित छिछले स्थान (शोल) के अतिरिक्त वायुमंडलीय क्षेत्र और समुद्री क्षेत्र हैं जिस पर प्रयोज्य अंतरराष्ट्रीय संधियों सहित उसके घरेलू कानूनों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार प्रभुसत्ता अथवा प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकार अथवा क्षेत्राधिकार हैं;

(ग) ''एक संविदाकारी राज्य'' तथा ''दूसरा संविदाकारी राज्य'' शब्दों का अर्थ संदर्भ की अपेक्षानुसार भारत गणराज्य अथवा कोलम्बिया गणराज्य हैं;

(घ) ''व्यक्ति'' शब्द पद में कोर्इ व्यष्टि, कोर्इ कम्पनी, व्यक्तियों की कोर्इ संस्था और कोर्इ अन्य सत्ता शामिल है जिसे संबंधित संविदाकारी राज्यों में प्रवृत्त कराधान कानूनों के तहत एक कराधेय इकार्इ के रूप में समझा जाता है;

(ड़) ''कम्पनी'' शब्द से कोर्इ निगमित निकाय अथवा कोर्इ सत्ता अभिप्रेत है जिसे कर प्रयोजनों के लिए एक निगमित निकाय के रूप में माना जाता है;

(च) ''उद्यम'' शब्द किसी प्रकार के कारोबार को करने पर लागू होगा;

(छ) ''एक संविदाकारी राज्य का उद्यम'' तथा ''दूसरे संविदाकारी राज्य का उद्यम'' शब्दों से क्रमश: एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा संचालित कोर्इ उद्यम तथा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा संचालित कोर्इ उद्यम अभिप्रेत है;

(ज) ''अंतरराष्ट्रीय यातायात'' शब्दों से अभिप्रेत है - एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा परिचालित किसी जलयान अथवा वायुयान द्वारा परिवहन, सिवाय उस स्थिति के जब जलयान अथवा वायुयान केवल दूसरे संविदाकारी राज्य के स्थानों के बीच ही चलाया जाता हो;

(झ) ''सक्षम प्राधिकारी'' शब्द से अभिप्रेत है:

(i)  भारत में : वित्त मंत्री, भारत सरकार अथवा उसका प्राधिकृत प्रतिनिधि;

(ii) कोलम्बिया में : मिनिस्टर ऑफ फाइनेंस एंड पब्लिक क्रेडिट अथवा उसका प्राधिकृत प्रतिनिधि;

(ञ) किसी संविदाकारी राज्य के संबंध में ''राष्ट्रिक'' शब्द से अभिप्रेत है:

 (i)  किसी एक संविदाकारी राज्य की राष्ट्रिकता धारण करने वाला कोर्इ व्यक्ति;

(ii)  कोर्इ विधिक व्यक्ति, भागीदारी अथवा संस्था, जिसे अपनी इस तरह की हैसियत किसी संविदाकारी राज्य में प्रवृत्त कानूनों से प्राप्त होती हो;

(ट) ''कर'' शब्द से संदर्भ के अनुसार भारतीय कर अथवा कोलम्बियन कर अभिप्रेत है, परन्तु इसमें ऐसी कोर्इ रकम शामिल नहीं होगी, जो उन करों के संबंध में किसी भूल अथवा चूक के संदर्भ में देय हो, जिन पर यह करार लागू होता हो अथवा उन करों के संबंध में लगाए गए अर्थदंड अथवा जुर्माने का द्योतक हो;

(ठ) ''वित्तीय वर्ष'' शब्द से अभिप्रेत है :

 (i)  भारत के मामले में : एक अप्रैल से आरम्भ होने वाला और 31 मार्च को समाप्त होने वाला वित्तीय वर्ष;

(ii)  कोलम्बिया के मामले में : 1 जनवरी को आरंभ होने वाला और 31 दिसम्बर को समाप्त होने वाला वर्ष।

2. किसी संविदाकारी राज्य द्वारा जहां तक इस करार को लागू किए जाने का प्रश्न है, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उसमें अपरिभाषित किसी शब्द का वही अर्थ होगा जो उन करों के प्रयोजनों के लिए उस राज्य, जिस पर यह करार लागू होता है, के कानूनों के अंतर्गत उस समय होता है और यह अर्थ उस राज्य पर लागू किए जाने वाले कर कानूनों के अंतर्गत लगाए गए अर्थ पर प्रभावी होगा जो उस राज्य के कर कानूनों के अंतर्गत लगाए जाते हैं।

अनुच्छेद-4

निवासी

1. इस करार के प्रयोजनार्थ ''एक संविदाकारी राज्य का निवासी'' शब्द का अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति से है जिस पर उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत उसके अधिवास, निवास, प्रबन्ध-स्थान, निगमन के स्थान अथवा किसी ऐसे ही कारण से कर लगाया जा सकता है और तथापि, इसमें वह राज्य और इसका कोर्इ राजनयिक उप-प्रभाग अथवा स्थानीय प्राधिकरण भी शामिल हो, तथापि इस शब्द में कोर्इ ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं होगा जिस पर केवल उस राज्य में स्थित स्रोतों से होने वाली आय पर उस राज्य में कर लगाया जा सकता है;

2. जहां पैराग्राफ 1 के उपबंधों के कारण यदि कोर्इ व्यक्ति दोनों ही संविदाकारी राज्यों का निवासी हो, वहां उसकी हैसियत निम्नानुसार तय की जाएगी:

क)  उसे केवल उसी राज्य का निवासी माना जाएगा जहां उसे एक स्थायी निवास-गृह उपलब्ध हो; यदि उसे दोनों ही राज्यों में कोर्इ स्थायी निवास-गृह उपलब्ध हो, तो वह उस राज्य का एक निवासी माना जाएगा, जिसके साथ उसके व्यक्तिगत और आर्थिक संबंध घनिष्ठतर हैं (महत्वपूर्ण हितों का केन्द्र);

ख)  यदि उस राज्य का जिसमें उसके महत्वपूर्ण हित निहित हैं, निर्धारण नहीं किया जा सकता हो अथवा यदि उसे दोनों राज्यों में से किसी भी राज्य में कोर्इ स्थायी निवास-गृह उपलब्ध नहीं हो, तो वह उस राज्य का एक निवासी माना जाएगा जिसमें वह आदतन रहता हो;

ग)  यदि वह आदतन दोनों ही राज्यों में रहता हो अथवा उनमें से किसी भी राज्य में नहीं रहता हो, तो वह उस राज्य का निवासी माना जाएगा जिसका वह एक राष्ट्रिक है;

घ)  यदि वह दोनों ही राज्यों का राष्ट्रिक हो अथवा उनमें से किसी भी राज्य का राष्ट्रिक नहीं हो तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी पारस्परिक सहमति द्वारा इस प्रश्न का निर्णय करेंगे।

3. जहाँ इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 के उपबंधों के कारण किसी व्यष्टि से भिन्न कोर्इ व्यक्ति दोनों संविदाकारी राज्यों का निवासी हो, तब संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी पारस्परिक सहमति से इस प्रश्न का समाधान करेंगे। ऐसी किसी सहमति के अभाव में, ऐसे व्यक्ति को करार के अंतर्गत लाभ का फायदा उठाने के प्रयोजनार्थ किसी भी संविदाकारी राज्य का निवासी नहीं माना जाएगा।

अनुच्छेद-5

स्थायी संस्थापन

1. इस करार के प्रयोजनार्थ ''स्थायी संस्थापन'' पद का आशय कारोबार के उस निश्चित स्थान से है, जिसके द्वारा किसी उद्यम का कारोबार सम्पूर्णत: अथवा अंशत: किया जाता है।

2. ''स्थायी संस्थापन'' पद में विशेषतया निम्नलिखित शामिल होंगे :

(क)  प्रबंध का कोर्इ स्थान ;

(ख)  कोर्इ शाखा ;

(ग)  कोर्इ कार्यालय;

(घ)  कोर्इ कारखाना;

(ड़)  कोर्इ कार्यशाला;

(च)  कोर्इ बिक्री केन्द्र;

(छ)  किसी व्यक्ति से संबंधित कोर्इ भाण्डागार, जो दूसरों को भण्डारण सुविधाएं मुहैया कराता हो;

(ज)  कोर्इ फार्म, बागवानी अथवा अन्य स्थान जहां कृषि, वानिकी, बागवानी अथवा इससे संबंधित कार्यकलाप किए जाते हों;

(झ)  कोर्इ खान, तेल अथवा गैस का कुआँ, खदान अथवा प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण का कोर्इ अन्य स्थान;

(ञ)  प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण के लिए प्रयुक्त कोर्इ संस्थापन अथवा ढांचा बशर्ते कि ऐसा कार्यकलाप छह महीने से अधिक अवधि के लिए चले।

3. पद ''स्थायी संस्थापन'' में ये भी शामिल होंगे:-

(क) कोर्इ भवन-स्थल अथवा निर्माण, प्रस्थापन अथवा संयोजन परियोजना अथवा उससे संबंधित पर्यवेक्षी कार्यकलाप यदि ऐसा भवन स्थल, परियोजना अथवा कार्यकलाप छह महीने से अधिक समय तक चले।

(ख) सेवाएं प्रस्तुत करना, जिसमें इस प्रयोजन हेतु उद्यम में लगे हुए कर्मचारियों अथवा अन्य कार्मिकों के माध्यम से किसी उद्यम की परामर्शी सेवाएं शामिल हैं, परन्तु जहां उस स्वरूप के क्रियाकलाप किसी 12 महीने की अवधि के भीतर कुल मिलाकर छह माह से अधिक की अवधि या अवधियों के लिए देश के भीतर जारी रहती हों (उसी अथवा संबद्ध परियोजना हेतु)।

4. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के होते हुए भी ''स्थायी संस्थापन'' पद में निम्नलिखित को शामिल नहीं समझा जाएगा:

(क)  उद्यम से संबंधित माल अथवा पण्य-वस्तुओं के मात्र भण्डारण, प्रदर्शन के प्रयोजनार्थ सुविधाओं का इस्तेमाल करना;

(ख) मात्र भण्डारण, प्रदर्शन के प्रयोजनार्थ उद्यम से संबंधित माल अथवा पण्य वस्तुओं के किसी स्टॉक का रख-रखाव करना;

(ग) किसी अन्य उद्यम द्वारा केवल संसाधित किए जाने के प्रयोजनार्थ उद्यम के माल अथवा पण्य-वस्तुओं के स्टॉक का रख-रखाव करना;

(घ) उद्यम के लिए माल अथवा पण्य-वस्तुओं का केवल क्रय करने के लिए अथवा सूचना एकत्र करने के लिए कारोबार के किसी निश्चित स्थान का रख-रखाव करना;

(ड़) उद्यम के लिए केवल प्रारम्भिक अथवा सहायक स्वरूप के किसी अन्य कार्यकलाप को चलाने के प्रयोजनार्थ कारोबार के लिए निश्चित स्थान का रख-रखाव करना;

(च) उप-पैराग्राफ (क) से (ड़) तक में उल्लिखित केवल किन्हीं कार्य-कलापों के संयोजन के लिए व्यवसाय के किसी निश्चित स्थान का रख-रखाव करना, बशर्ते कि इस संयोजन के परिणामस्वरूप कारोबार के निश्चित स्थान का समस्त कार्यकलाप किसी प्रारम्भिक या सहायक स्वरूप का हो।

5. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंधों के होते हुए भी, जहां स्वतंत्र हैसियत के किसी अभिकर्ता, जिस पर पैराग्राफ 7 लागू होता हो, से भिन्न कोर्इ व्यक्ति अन्य संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम की ओर से एक संविदाकारी राज्य में कार्य करता है, वहां उन कार्यकलापों के संबंध में, जिन्हें उक्त व्यक्ति उद्यम के लिए करता है, प्रथमोल्लिखित संविदाकारी राज्य में उस उद्यम के स्थायी संस्थापन का होना माना जाएगा, यदि ऐसे व्यक्ति को:

(क) उस उद्यम के नाम से उस राज्य में संविदाएं सम्पन्न करने का प्राधिकार प्राप्त हो और वह आदतन उस प्राधिकार का प्रयोग भी करता हो, जब तक कि ऐसे व्यक्ति की गतिविधियां पैराग्राफ 4 में उल्लिखित उन गतिविधियों तक सीमित न हों, जिन्हें यदि वह कारोबार के एक निश्चित स्थान के माध्यम से प्रयोग करता है, को उस पैराग्राफ के उपबंधों के अधीन कारोबार के इस निश्चित स्थान को एक स्थायी संस्थापन नहीं बनाएगा; अथवा

(ख) ऐसा कोर्इ प्राधिकार प्राप्त नहीं हो, किन्तु वह फिर भी आदतन प्रथमोल्लिखित राज्य में ऐसे माल अथवा पण्य-वस्तुओं का स्टॉक रखता हो जिसमें से वह उद्यम की ओर से माल अथवा पण्य-वस्तुओं की नियमित रूप से डिलीवरी करता हो;

(ग) स्वयं, उद्यम के लिए पूर्णतया अथवा लगभग पूर्णतया प्रथमोल्लिखित राज्य में आदतन कार्य का आर्डर प्राप्त करता हो।

6. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के होते हुए भी, एक संविदाकारी राज्य के किसी बीमा उद्यम को पुन: बीमा करने के मामले को छोड़कर, दूसरे संविदाकारी राज्य में एक स्थायी संस्थापन का होना तभी माना जाएगा, यदि वह स्वतंत्र हैसियत वाले किसी एजेंट, जिस पर पैराग्राफ 7 लागू होता हो, से भिन्न किसी दूसरे व्यक्ति के माध्यम से उस अन्य राज्य के क्षेत्र में बीमे का प्रीमियम एकत्र करता है अथवा वहां स्थित जोखिमों का बीमा करता है।

7. किसी उद्यम का किसी संविदाकारी राज्य में मात्र इस कारण कोर्इ स्थायी संस्थापन का होना नहीं माना जाएगा कि वह उस राज्य में किसी दलाल, सामान्य कमीशन एजेंट अथवा स्वतंत्र हैसियत वाले किसी अन्य एजेंट के माध्यम से कारोबार करता है, बशर्ते कि ऐसे व्यक्ति अपने कारोबार का काम सामान्य रूप से कर रहे हों। तथापि, जब ऐसे किसी एजेंट के कार्यकलाप पूर्णत: अथवा लगभग पूर्णत: उस उद्यम की ओर से किए जाते हों,  तो उसे इस पैराग्राफ के अभिप्राय के अंतर्गत स्वतंत्र हैसियत का एजेंट नहीं समझा जाएगा।

8. यह तथ्य कि कोर्इ कम्पनी, जो एक संविदाकारी राज्य की निवासी है, किसी ऐसी कम्पनी को नियंत्रित करती है अथवा किसी ऐसी कम्पनी द्वारा नियंत्रित होती है, जो दूसरे संविदाकारी राज्य की निवासी है अथवा जो उस दूसरे राज्य में (चाहे किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से अथवा अन्यथा) कारोबार करती है, को उन दोनों में से कोर्इ कम्पनी स्वत: ही एक-दूसरे की स्थायी संस्थापन नहीं बन जाएगी।

III. आय का कराधान

अनुच्छेद-6

अचल सम्पत्ति से आय

1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर, (कृषि अथवा वानिकी से प्राप्त आय सहित) उस दूसरे राज्य में कर लगाया जाएगा।

2. ''अचल सम्पत्ति'' पद का अर्थ वही होगा जो उस संविदाकारी राज्य के कानूनों के अंतर्गत उसका अर्थ है, जिसमें विचाराधीन सम्पत्ति स्थित है। इस पद में, किसी भी हालत में, ये शामिल होंगे - अचल सम्पत्ति के अवसाधन के रूप में सम्पत्ति, कृषि और वानिकी में प्रयुक्त पशुधन और उपस्कर, ऐसे अधिकार जिन पर भू-सम्पत्ति संबंधी सामान्य कानून के उपबंध लागू होते हों, अचल सम्पत्ति को भोगने के अधिकार और खनिज भण्डार, स्रोत तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए अथवा दोहन के अधिकार के प्रतिफल के रूप में परिवर्तनीय अथवा नियत अदायगियों के अधिकार, जलयान, नौकाएं और वायुयान अचल सम्पत्ति के रूप में नहीं माने जाएंगे।

3. पैराग्राफ 1 के उपबंध, अचल सम्पत्ति के प्रत्यक्ष उपयोग, उसे किराये पर देने अथवा इसके किसी अन्य प्रकार के प्रयोग से उद्भूत होने वाली आय पर भी लागू होंगे।

4. पैराग्राफ 1 और 3 के उपबंध, किसी उद्यम की अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर तथा स्वतंत्र व्यक्तिगत सेवाओं के निष्पादन के लिए प्रयुक्त अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय पर भी लागू होंगे।

अनुच्छेद-7

कारोबार से लाभ

1. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के लाभों पर केवल उसी राज्य में कर लगाया जाएगा जब तक कि वह उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से उस राज्य में कारोबार नहीं करता हो। यदि उक्त उद्यम उपर्युक्त तरीके से कारोबार करता हो तो उस उद्यम के लाभों पर दूसरे राज्य में भी कर लगाया जा सकता है, किन्तु उसके लाभों के केवल उतने अंश पर ही कर लगेगा जो उस स्थायी संस्थापन को प्राप्त हुए माने जाएंगे।

2. पैराग्राफ 3 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां एक संविदाकारी राज्य का कोर्इ उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता हो, वहां प्रत्येक संविदाकारी राज्य में ऐसे स्थायी संस्थापन के कारण हुए लाभ, वे लाभ माने जाएंगे जिनके होने की संभावना तब होगी जब एक समान या उससे मिलती-जुलती परिस्थितियों में एक समान या मिलते-जुलते कार्यकलापों में लगे हुए कोर्इ और भिन्न उद्यम हो और वे उस उद्यम के साथ पूर्णत: स्वतंत्र रूप से कारोबार करता है जिसका वह एक स्थायी संस्थापन है।

3. किसी स्थायी संस्थापन के लाभों के निर्धारण करने में, उस राज्य के कानूनों के उपबंधों और उसकी सीमाओं के अध्यधीन उन खर्चों की कटौती की अनुमति दी जाएगी, जो उस स्थायी संस्थापन के प्रयोजनार्थ खर्च किए जाते हैं, जिनमें इस प्रकार लगाए गए कार्यकारी एवं सामान्य प्रशासनिक व्यय भी शामिल हैं, भले ही वे उस राज्य में उस राज्य के कर कानूनों के उपबंधों अपेक्षाओं, शर्तों और उनकी परिसीमाओं के अध्यधीन किए गए हों, जिसमें स्थायी संस्थापन स्थित है अथवा अन्यत्र किए गए हों।

4. जहां एक संविदाकारी राज्य में उद्यम के कुल लाभ को उसके विभिन्न भागों में प्रभाजन के आधार पर एक स्थायी संस्थापन को होने वाले लाभ का निर्धारण करने की प्रथा हो, वहां पैराग्राफ 2 की कोर्इ भी बात उस संविदाकारी राज्य में प्रचलित प्रभाजन पद्धति से कर योग्य लाभ का निर्धारण करने से प्रतिबाधित नहीं करेगी, तथापि, प्रभाजन के लिए अपनार्इ गर्इ विधि ऐसी होगी कि उसका परिणाम इस अनुच्छेद में विहित सिद्धांतों के अनुकूल होगा।

5. कोर्इ लाभ, केवल इस कारण से किसी स्थायी संस्थापन को हुआ नहीं माना जाएगा कि उस स्थायी संस्थापन ने उद्यम के लिए माल अथवा पण्य-वस्तुएं खरीदी हैं।

6. पूर्ववर्ती पैराग्राफों के प्रयोजनार्थ स्थायी संस्थापन के कारण हुए लाभों को तब तक वर्षानुवर्ष उसी पद्धति से निर्धारित किया जाता रहेगा, जब तक कि उसके विपरीत कोर्इ ठोस तथा पर्याप्त कारण नहीं हो।

7. जहां लाभों में आय की ऐसी मदें शामिल होती हैं जिनका इस करार के अन्य अनुच्छेदों में अलग से विवेचन किया गया है, वहां उन अनुच्छेदों के उपबंध इस अनुच्छेद के उपबंधों से प्रभावित नहीं होंगे।

अनुच्छेद-8

जहाजरानी और वायु परिवहन

1. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा अन्तरराष्ट्रीय यातायात में जलयानों अथवा वायुयानों के प्रचालन से प्राप्त होने वाले लाभों पर केवल उसी राज्य में कर लगाया जाएगा।

2. इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए ''लाभ'' पद का संदर्भ उस लाभ से होता है जिसे प्रत्यक्ष रूप से अंतरराष्ट्रीय यातायात में जलयान और वायुयान के संचालन से प्राप्त किया जाता है।

3. अंतरराष्ट्रीय यातायात में माल अथवा पण्य के परिवहन के लिए प्रयुक्त कंटेनरों के प्रयोग, रख-रखाव अथवा किराए पर देने से प्राप्त (जिसमें कंटेनरों के परिवहन के लिए ट्रेलर और अन्य उपकरण सहित) किसी परिवहन उपक्रम जो किसी संविदाकारी राज्य का एक निवासी है, द्वारा प्राप्त लाभ, जो कि अंतरराष्ट्रीय परिवहन में उसके जलयान अथवा वायुयान के संचालन के लिए अनुपूरक अथवा आनुषंगिक हैं, केवल उस संविदाकारी राज्य में कराधेय होंगे जब तक कि कंटेनर्स केवल दूसरे संविदाकारी राज्य के भीतर प्रयोग किए जाते हैं।

4. इस अनुच्छेद के प्रयोजनार्थ अंतरराष्ट्रीय यातायात में जलयान अथवा वायुयान के संचालन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े निवेशों पर ब्याज को ऐसे जलयानों अथवा वायुयान के संचालन से प्राप्त लाभ के रूप में माना जाएगा यदि वे ऐसे व्यापार को चलाने के लिए अनिवार्य है और ऐसे ब्याज के संबंध में अनुच्छेद 11 के उपबंध लागू नहीं होंगे।

5. पैराग्राफ 1 के उपबंध किसी पूल में भागीदारी, किसी संयुक्त उद्यम अथवा किसी अन्तरराष्ट्रीय प्रचालन एजेंसी में प्राप्त लाभों पर भी लागू होंगे।

अनुच्छेद-9

सहयोगी उद्यम

1. जहां

(क) एक संविदाकारी राज्य का कोर्इ उद्यम दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के प्रबंध, नियंत्रण अथवा पूंजी में प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: भाग लेता है; अथवा

(ख) वे ही व्यक्ति, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम और दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के प्रबंध, नियंत्रण अथवा पूंजी में प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: भाग लेते हैं;

और दोनों में से किसी भी अवस्था में दोनों उद्यमों के बीच उनके वाणिज्यिक अथवा वित्तीय संबंधों में ऐसी शर्तें रखी अथवा लगार्इ जाती हैं जो उन शर्तों से भिन्न हैं, जो स्वतंत्र उद्यमों के बीच रखी जाएंगी तो ऐसा कोर्इ भी लाभ जो उन शर्तों के नहीं होने की स्थिति में उन उद्यमों में से एक उद्यम को प्राप्त हुआ होता, किन्तु उन शर्तों के कारण इस प्रकार प्राप्त नहीं हुआ, तो वे लाभ उस उद्यम के लाभों में शामिल किए जा सकेंगे और उन पर तद्नुसार कर लगाया जा सकेगा।

2. जहां एक संविदाकारी राज्य उस राज्य के किसी उद्यम के लाभों में उन लाभों को सम्मिलित करता है और तद्नुसार कर लगाता है जिस पर दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया गया है और उसमें सम्मिलित किए गए लाभ ऐसे लाभ हैं जो प्रथमोल्लिखित राज्य के उद्यम को उस स्थिति में प्राप्त हुए होते यदि दोनों उद्यमों के बीच लगार्इ गर्इ शर्तें उस तरह की होतीं तो स्वतंत्र उद्यमों के बीच लगार्इ गर्इ होती, तब वह दूसरा राज्य उन लाभों पर उसमें प्रभारित कर की राशि के बराबर समुचित समायोजन करेगा। इस प्रकार के समायोजन को निश्चित करने में इस करार के अन्य उपबंधों को यथोचित रूप से ध्यान में रखना होगा और यदि आवश्यक हो, तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी एक दूसरे के साथ परामर्श करेंगे।

अनुच्छेद-10

लाभांश

1. एक संविदाकारी राज्य की निवासी किसी कम्पनी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए लाभांश उस दूसरे राज्य में कराधेय होंगे।

2. तथापि, ऐसे लाभांशों पर उस संविदाकारी राज्य में भी और उस राज्य के कानून के अनुसार कर लगाया जा सकेगा जिसका लाभांश अदा करने वाली कम्पनी एक निवासी है, परन्तु यदि लाभांश का हितभागी स्वामी अन्य संविदाकारी राज्य का एक निवासी है तो इस प्रकार प्रभार्य कर लाभांशों की सकल राशि के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। यह पैराग्राफ उन लाभों के संबंध में कम्पनी के कराधान को प्रभावित नहीं करेगा जिसमें से लाभांश अदा किए गए हैं।

3. इस अनुच्छेद में यथा प्रयुक्त ''लाभांश'' पद का अभिप्राय शेयरों अथवा अन्य अधिकारों से प्राप्त आय से है जो लाभ की भागीदारिता के ऋण के दावे न हों, और अन्य निगमित अधिकारों से प्राप्त आय से है जिस पर वही कराधान व्यवस्था लागू होती है जो उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत शेयरों से प्राप्त आय पर लागू होती है, जिसकी वितरण करने वाली कम्पनी एक निवासी है।

4. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होंगे, यदि लाभांशों का हितभागी स्वामी जो एक संविदाकारी राज्य का निवासी होने के कारण दूसरे संविदाकारी राज्य में वहां स्थित एक स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता है, जिसकी लाभांश अदा करने वाली कम्पनी निवासी है अथवा उस दूसरे राज्य में स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं प्रदान करता है और जिस सम्पत्ति के संबंध में लाभांशों की अदायगी की जाती है वहां वह इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध है। ऐसी स्थिति में, अनुच्छेद 7 या अनुच्छेद 14, जैसा भी मामला हो, के उपबंध लागू होंगे।

5. जहां कोर्इ कम्पनी, जो एक संविदाकारी राज्य की निवासी है, दूसरे संविदाकारी राज्य से लाभ अथवा आय प्राप्त करती है, वहाँ दूसरा राज्य कम्पनी द्वारा अदा किए गए लाभांशों पर, किसी भी प्रकार का कर नहीं लगाएगा, जब तक कि ऐसे लाभांश उस दूसरे राज्य के किसी निवासी को अदा किए जाते हों, अथवा जब तक कि जिस सम्पत्ति के बारे में लाभांशों की अदायगी की जाती हो, वह उस दूसरे राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन या किसी नियत स्थान से प्रभावी रूप से संबद्ध हो और न ही कम्पनी के अवितरित लाभों पर कर लगाया जाएगा, चाहे अदा किए गए लाभांश अथवा अवितरित लाभ पूर्णरूप से या आंशिक रूप से उस दूसरे राज्य में उद्भूत होने वाले लाभ अथवा आय के रूप में हों।

अनुच्छेद-11

ब्याज

1. एक संविदाकारी राज्य में उत्पन्न होने वाले तथा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किए गए ब्याज पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

2. तथापि, इस प्रकार के ब्याज पर उस संविदाकारी राज्य में भी और उस राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जा सकेगा जिस राज्य में वह उद्भूत होता है, किन्तु यदि ब्याज का हितभागी स्वामी दूसरे संविदाकारी राज्य का निवासी है तो इस प्रकार प्रभारित कर, ब्याज की सकल रकम के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

3. पैराग्राफ 2 के उपबंधों के होते हुए भी, एक संविदाकारी राज्य में उद्भूत ब्याज निम्नलिखित के द्वारा प्राप्त किया गया हो और हितभागी रूप से अपने स्वामित्व में रखा गया हो :

(क) दूसरे संविदाकारी राज्य की सरकार, उसका कोर्इ राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा कोर्इ स्थानीय या प्रादेशिक प्राधिकरण; अथवा

(ख) (i) भारत के मामले में, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय आयात-निर्यात बैंक; और

(ii) कोलम्बिया के मामले में, बैंकों डी ला रिपब्लिका तथा बैंकोल्डेक्स; अथवा

(ग) कोर्इ अन्य संस्थान, जिस पर संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारियों के बीच समय-समय पर पत्रों के आदान-प्रदान के माध्यम से सहमति हुर्इ हो।

पर उस राज्य में कर नहीं लगाया जाएगा जहां ब्याज उद्भूत होता है।

4. इस अनुच्छेद में यथा-प्रयुक्त ''ब्याज'' शब्द से अभिप्रेत है - प्रत्येक प्रकार के ऋण संबंधी दावों से प्राप्त आय, चाहे वे बंधक द्वारा प्रतिभूत हों अथवा नहीं और चाहे उन्हें ऋण-दाता के लाभ में भागीदारी का कोर्इ अधिकार प्राप्त हो अथवा नहीं हो और विशेष रूप से सरकारी प्रतिभूतियों से, प्राप्त आय और बंधपत्रों अथवा ऋण-पत्रों से प्राप्त आय जिसमें ऐसी प्रतिभूतियों, बंधपत्रों अथवा ऋण-पत्रों से संबंधित प्रीमियम और पुरस्कार के साथ-साथ आय शामिल हों, जिसे उस संविदाकारी राज्य के कानूनों के अंतर्गत ब्याज के रूप में माना जाता है जिसमें आय प्राप्त होती है। विलम्बित अदायगी के लिए अर्थदंड संबंधी प्रभारों को इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए ब्याज नहीं समझा जाएगा।

5. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होंगे, यदि ब्याज का हितभागी स्वामी, संविदाकारी राज्य का निवासी होने से दूसरे संविदाकारी राज्य में, जिसमें ब्याज उद्भूत हुआ हो, उसमें स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता हो अथवा उस दूसरे राज्य में, उसमें स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता हो और जिस ऋण-दावे के बारे में ब्याज अदा किया गया हो वह इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध हो। ऐसे मामले में, अनुच्छेद 7 अथवा अनुच्छेद 14 के उपबंध, जैसा भी मामला हो, लागू होंगे।

6. ब्याज किसी संविदाकारी राज्य में उद्भूत हुआ माना जाएगा, यदि ब्याज अदा करने वाला उस राज्य का निवासी हो। तथापि, जहां ब्याज अदा करने वाले व्यक्ति का, चाहे वह किसी संविदाकारी राज्य का निवासी हो अथवा नहीं किसी संविदाकारी राज्य में एक स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान है और इस संबंध में ऋण जिस पर ब्याज प्रदत्त किया गया था, इस प्रकार का ब्याज इस प्रकार के स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन किया जाता है, तो इस प्रकार का ब्याज उस राज्य में उद्भूत हुआ माना जाएगा जिसमें वह स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान स्थित है।

7. जहां, अदा करने वाले और हितभागी स्वामी अथवा उन दोनों के बीच तथा किसी अन्य व्यक्ति के बीच विशेष संबंध होने के कारण अदा की गर्इ ब्याज की रकम, उस ऋणदावे को ध्यान में रखते हुए जिसके लिए यह रकम अदा की गर्इ है, उस रकम से बढ़ जाती है, जिसके संबंध में इस प्रकार के संबंध नहीं होने की स्थिति में अदा करने वाले और हितभागी स्वामी के बीच सहमति हो गर्इ होती, वहां इस अनुच्छेद के उपबंध अंतिम रूप से वर्णित रकम पर ही लागू होंगे। ऐसे मामले में अदायगियों के आधिक्य भाग पर इस करार के अन्य उपबंधों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संविदाकारी राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जाएगा।

अनुच्छेद-12

रायल्टियों एवं तकनीकी सेवाओं के लिए फीस

1. एक संविदाकारी राज्य में उद्भूत होने वाले और दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा की गर्इ रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस पर उस दूसरे संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

2. तथापि, इस प्रकार की रायल्टियाँ या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस पर उस संविदाकारी राज्य में भी, जिसमें वे उद्भूत हुर्इ हों, उस राज्य के कानूनों के अनुसार कर लगाया जा सकेगा, लेकिन यदि रायल्टियों अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस का हितभागी स्वामी दूसरे संविदाकारी राज्य का निवासी है तो इस प्रकार लगाया गया कर रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस की सकल राशि के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

3. (क) इस अनुच्छेद में यथा-प्रयुक्त ''रायल्टियां'' शब्द का अभिप्राय है - किसी साहित्यिक, कलात्मक अथवा वैज्ञानिक कृति के किसी कापीराइट, जिसमें सिनेमाटोग्राफ फिल्में अथवा रेडियो अथवा दूरदर्शन प्रसारण के लिए फिल्में अथवा टेपें शामिल हैं, किसी पेटेंट, ट्रेडमार्क, डिजाइन अथवा मॉडल, प्लान, गुप्त फार्मूला अथवा किसी औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा वैज्ञानिक उपकरण के प्रयोग हेतु अथवा प्रयोगाधिकार हेतु अथवा औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा वैज्ञानिक अनुभव से संबंधित सूचना के लिए प्रतिफल के रूप में प्राप्त की गर्इ किसी भी प्रकार की अदायगियां।

(ख) इस अनुच्छेद में यथा-प्रयुक्त ''तकनीकी सेवाओं के लिए फीस पद का अभिप्राय है इस करार के अनुच्छेद 14 तथा 15 में उल्लिखित के अतिरिक्त कोर्इ प्रबंध-कार्य या तकनीकी अथवा परामर्शी स्वरूप की सेवाएं अथवा तकनीकी सहायता के प्रतिफल में की गर्इ किसी भी प्रकार की अदायगियां हैं।

4. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध उस स्थिति में लागू नहीं होंगे यदि रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस का हितभागी स्वामी, जो एक संविदाकारी राज्य का निवासी होने के कारण दूसरे संविदाकारी राज्य में, जिसमें रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस उद्भूत होती हैं, वहां पर स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता है अथवा उस दूसरे राज्य में वहां पर स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता है तथा जिस अधिकार अथवा सम्पत्ति के संबंध में रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस अदा की जाती है, वे ऐसे स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान के साथ प्रभावी रूप से सम्बद्ध हैं। ऐसे मामले में यथास्थिति अनुच्छेद 7 अथवा अनुच्छेद 14 के उपबंध, जैसा भी मामला हो, लागू होंगे।

5. (क) एक संविदाकारी राज्य में रायल्टियां तथा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस तब उद्भूत हुर्इ मानी जाएंगी, जब अदाकर्ता स्वयं वह राज्य, एक राजनैतिक उप-प्रभाग, प्रादेशिक या स्थानीय प्राधिकारी अथवा उस राज्य का कोर्इ निवासी हो। तथापि, जहां रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस अदा करने वाले व्यक्ति का, चाहे वह किसी संविदाकारी राज्य का निवासी हो अथवा नहीं, उस संविदाकारी राज्य में ऐसा कोर्इ स्थायी संस्थापन अथवा कोर्इ निश्चित स्थान हो, जिनके संबंध में रायल्टियों अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस अदा करने की जिम्मेदारी निभार्इ गर्इ हो, और ऐसी रायल्टियों या तकनीकी सेवाओं के लिए फीस उस स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन की जाती हो, तब ऐसी रायल्टियों अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस उस राज्य में उद्भूत हुर्इ मानी जाएगी जिसमें वह स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान स्थित है।

(ख) जहां उप-पैराग्राफ (क) के अंतर्गत रायल्टियाँ अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस किसी एक संविदाकारी राज्य में उद्भूत नहीं होती है और रायल्टियाँ प्रयोग, अथवा प्रयोगाधिकार, अधिकार अथवा सम्पत्ति से संबंधित है अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस किसी एक संविदाकारी राज्य में निष्पादित सेवाओं से संबंधित है, तो रायल्टियाँ अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस उस संविदाकारी राज्य में उद्भूत हुर्इ मानी जाएगी।

6. जहां, अदाकर्ता तथा हितभागी स्वामी के बीच अथवा उन दोनों और किसी अन्य व्यक्ति के बीच किसी विशेष प्रकार का संबंध होने के कारण रायल्टियाँ अथवा तकनीकी सेवाओं के लिए फीस प्रयोग, अधिकार अथवा सूचना के संबंध में जिस के लिए वह अदा की जाती है, किसी भी कारण से उस राशि से अधिक हो जाती है जिस पर ऐसे संबंधों की अनुपस्थिति में अदाकर्ता तथा हितभागी स्वामी द्वारा सहमति हो गर्इ होती, वहां इस अनुच्छेद के उपबंध केवल अंतिम वर्णित रकम पर लागू होंगे। ऐसे मामले में, अदायगियों का आधिक्य भाग इस करार के अन्य उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक संविदाकारी राज्य के कानूनों के अनुसार कराधेय होगा।

अनुच्छेद-13

पूंजीगत अभिलाभ

1. अनुच्छेद 6 में उल्लिखित और दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित अचल सम्पत्ति के अंतरण से एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा प्राप्त अभिलाभों पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

2. ऐसी चल संपत्ति के अंतरण से होने वाले अभिलाभ पर, जो एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम की दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित किसी स्थायी संस्थापन की कारोबार संपत्ति का एक हिस्सा है, अथवा किसी निश्चित स्थान से संबंधित ऐसी चल संपत्ति के अंतरण से प्राप्त होने वाले अभिलाभ पर, जो संपत्ति एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को दूसरे संविदाकारी राज्य में स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाओं के प्रयोजनार्थ उपलब्ध है, जिसमें किसी ऐसे स्थायी संस्थापन (अकेले अथवा पूर्ण उद्यम के साथ) अथवा निश्चित स्थान के अंतरण से होने वाले अभिलाभ भी शामिल हैं, उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

3. अन्तरराष्ट्रीय यातायात में चलाए जाने वाले जलयानों अथवा वायुयानों के अंतरण से अथवा इस प्रकार के जलयानों, वायुयानों के परिचालन से संबंधित, चल सम्पत्ति के अंतरण, द्वारा प्राप्त अभिलाभों पर केवल उस संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जिसका कि अंतरणकर्ता निवासी है।

4. किसी कम्पनी के पूंजीगत स्टॉक के शेयरों अथवा अन्य निगमित अधिकारों के अंतरण से किसी संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा प्राप्त अभिलाभों पर जिसकी सम्पत्ति में मुख्यतया प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: कंपनी के स्वामित्व वाली संपत्तियों के समुच्चय मूल्य के 50 प्रतिशत से अधिक, किसी संविदाकारी राज्य में अचल सम्पत्ति स्थित है, पर उस राज्य में कर लगाया जाएगा।

5. किसी कंपनी, जो संविदाकारी राज्य की निवासी है, पर पैराग्राफ 4 में उल्लिखित के अलावा शेयरों के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर उस राज्य में कर लगाया जा सकता है।

6. पैराग्राफ 1, 2, 3, 4 तथा 5 में उल्लिखित सम्पत्ति से भिन्न किसी भी सम्पत्ति के अंतरण से प्राप्त अभिलाभों पर केवल उसी संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा जिसका अंतरणकर्ता एक निवासी है।

अनुच्छेद-14

स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं

1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा व्यावसायिक सेवाओं के निष्पादन अथवा इसी प्रकार के स्वतंत्र स्वरूप वाले अन्य कार्य-कलापों से प्राप्त आय पर केवल उसी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, परन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों को छोड़कर जब ऐसी आय पर दूसरे संविदाकारी राज्य में भी कर लगाया जा सकेगा :

(क) यदि उसका अपने कार्य-कलाप के निष्पादन के प्रयोजनार्थ, दूसरे संविदाकारी राज्य में एक निश्चित स्थान नियमित रूप से उपलब्ध है तो उस मामले में उस दूसरे राज्य में केवल उतनी आय पर ही कर लगाया जा सकेगा जो उस निश्चित स्थान के कारण उद्भूत हुर्इ मानी जा सकती है; अथवा

(ख) यदि दूसरे संविदाकारी राज्य में उसके ठहरने की अवधि या अवधियां संबंधित किसी बारह महीने की अवधि में कुल मिलाकर 183 दिन अथवा उससे अधिक दिन हों, तो उस मामले में, आय के केवल उतने ही भाग पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जो उस दूसरे राज्य में उसके द्वारा निष्पादित कार्य-कलापों से प्राप्त हुर्इ हो।

2. ''व्यावसायिक सेवाएं पद में स्वतंत्र वैज्ञानिक, साहित्यिक, कलात्मक, शैक्षिक अथवा अध्यापन संबंधी कार्य-कलाप तथा चिकित्सकों, वकीलों, इंजीनियरों, वास्तु-विदों, शल्य-चिकित्सकों, दंत चिकित्सकों तथा लेखाकारों के स्वतंत्र कार्य-कलाप शामिल हैं।

अनुच्छेद-15

परावलम्बित वैयक्तिक सेवाएं

1. अनुच्छेद 16, 18, 19, 20 और 21 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा किसी नियोजन के संबंध में प्राप्त वेतनों, मजदूरियों और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में कर लगेगा, जब तक कि नियोजन का निष्पादन दूसरे संविदाकारी राज्य में नहीं किया गया हो। यदि ऐसा नियोजन किया गया है, तो जो पारिश्रमिक वहां से प्राप्त होता है, उस पर उस दूसरे राज्य में कर लग सकेगा।

2. पैराग्राफ 1 के उपबंधों के बावजूद, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए किसी नियोजन के संबंध में प्राप्त पारिश्रमिक पर केवल प्रथमोल्लिखित राज्य में कर लगाया जा सकेगा, यदि :

(क) प्राप्तकर्ता, संबंधित वित्तीय वर्ष में समाप्त अथवा प्रारंभ हुए किसी बारह महीने की ऐसी अवधि अथवा अवधियों के लिए दूसरे राज्य में रह रहा है जो कुल मिलाकर 183 दिनों से अधिक नहीं हैं;

(ख) पारिश्रमिक ऐसे किसी नियोजक द्वारा अथवा उसकी ओर से अदा किया गया है, जो दूसरे राज्य का निवासी नहीं है; और

(ग) पारिश्रमिक ऐसे किसी स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान द्वारा वहन नहीं किया जाता है, जो नियोजक का दूसरे राज्य में हो।

3. इस अनुच्छेद के पूर्ववर्ती उपबंधों के बावजूद, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा अन्तरराष्ट्रीय यातायात में संचालित किसी पोत अथवा वायुयान पर किए गए नियोजन के संबंध में प्राप्त पारिश्रमिक पर, उसी राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

अनुच्छेद-16

निदेशकों की फीस

1. निदेशकों की फीस और इसी तरह की अन्य अदायगियों पर जो एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा किसी कम्पनी, जो दूसरे संविदाकारी राज्य की निवासी है, के निदेशक मंडल के सदस्य अथवा इसी प्रकार के निकाय की हैसियत से प्राप्त की गर्इ हो, पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा।

अनुच्छेद-17

कलाकार और खिलाड़ी

1. अनुच्छेद 14 और 15 के उपबंधों के बावजूद भी, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी द्वारा मनोरंजनकर्ता, जैसे कि कोर्इ थियेटर, चलचित्र, रेडियो या दूरदर्शन कलाकार अथवा किसी संगीतकार अथवा किसी खिलाड़ी के रूप में दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए इस प्रकार के अपने वैयक्तिक कार्य-कलापों से प्राप्त आय पर उस दूसरे राज्य में कर लगाया जा सकेगा। इस पैराग्राफ में उल्लिखित आय में दूसरे संविदाकारी राज्य में उस व्यष्टि की एक कलाकार अथवा खिलाड़ी के रूप में प्रतिष्ठा से संबंधित किए गए किसी निजी कार्यकलाप से उक्त निवासी द्वारा प्राप्त की गर्इ आय शामिल है।

2. जहां किसी मनोरंजनकर्ता अथवा किसी खिलाड़ी द्वारा अपने इस प्रकार की हैसियत में किए गए वैयक्तिक कार्य-कलापों के संबंध में प्राप्त आय स्वयं मनोरंजनकर्ता या खिलाड़ी को प्राप्त नहीं हो, अपितु किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त हो, ऐसी आय पर अनुच्छेद 7, 14 और 15 के उपबंधों के बावजूद, उस संविदाकारी राज्य में कर लगाया जा सकेगा, जिसमें मनोरंजनकर्ता अथवा खिलाड़ी के कार्य-कलाप किए जाते हों।

3. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंध किसी मनोरंजनकर्ता अथवा किसी खिलाड़ी द्वारा, दूसरे संविदाकारी राज्य में निष्पादित कार्य-कलापों से अर्जित आय पर लागू नहीं होंगे यदि दूसरे संविदाकारी राज्य में किए गए कार्य-कलाप एक या दोनों संविदाकारी राज्यों या राजनीतिक उप-प्रभागों या उसके स्थानीय प्राधिकारियों की सार्वजनिक निधियों द्वारा समर्थित हों। ऐसे मामले में उस आय पर केवल उसी संविदाकारी राज्य में कर लगेगा जिसका वह मनोरंजनकर्ता या खिलाड़ी निवासी है।

अनुच्छेद-18

पेंशन

अनुच्छेद 19 के पैराग्राफ 2 के उपबंधों के अध्यधीन, एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को उसके पिछले नियोजन के प्रतिफल के रूप में अदा की गर्इ पेंशन और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में कर लग सकेगा।

अनुच्छेद-19

सरकारी सेवा

1. (क) किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय या प्रादेशिक प्राधिकरण द्वारा किसी व्यष्टि को उस राज्य अथवा उप-प्रभाग अथवा प्राधिकरण के लिए की गर्इ सेवाओं के संबंध में अदा किए गए पेंशन से भिन्न वेतन, मजदूरी तथा इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल उसी राज्य में ही कर लग सकेगा।

(ख) तथापि, ऐसे वेतन, मजदूरी और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक पर केवल दूसरे संविदाकारी राज्य में तभी कर लग सकेगा, यदि सेवाएं उस राज्य में की जाती हैं और व्यष्टि उस राज्य का एक निवासी हो, जो :

(i)  उस राज्य का एक राष्ट्रिक है; अथवा

(ii)  सेवाएं पेश करने के प्रयोजन मात्र के लिए उस राज्य का निवासी नहीं बना हो।

2. (क) किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय अथवा प्रादेशिक प्राधिकरण द्वारा अथवा उनके द्वारा सृजित निधियों में से किसी व्यष्टि को उस राज्य अथवा उप-प्रभाग अथवा प्राधिकरण के लिए प्रदान की गर्इ सेवाओं के संबंध में अदा की गर्इ किसी पेंशन पर केवल उस राज्य में कर लग सकेगा।

(ख) तथापि, ऐसी पेंशन पर केवल दूसरे संविदाकारी राज्य में कर लगेगा, यदि व्यष्टि उस राज्य का निवासी तथा राष्ट्रिक हो।

3. अनुच्छेद 15, 16, 17 और 18 के उपबंध, किसी संविदाकारी राज्य अथवा उसके किसी राजनैतिक उप-प्रभाग अथवा किसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा चलाए गए किसी कारोबार के सिलसिले में प्रदान की गर्इ सेवाओं के संबंध में वेतन, मजदूरी और इसी प्रकार के अन्य पारिश्रमिक तथा पेंशन पर लागू होंगे।

अनुच्छेद-20

प्रोफेसर, अध्यापक और शोधकर्ता

1. कोर्इ प्रोफेसर, अध्यापक या शोधकर्ता जो दूसरे संविदाकारी राज्य में किसी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय अथवा दूसरे राज्य में अन्य मान्यता प्राप्त संस्थान में शिक्षण या शोध कार्य या दोनों के प्रयोजन हेतु उस दूसरे संविदाकारी राज्य की यात्रा करने से तुरन्त पूर्व किसी एक संविदाकारी राज्य का निवासी है अथवा था, तो उसको उस दूसरे राज्य में उसके प्रथम आगमन की तारीख से दो वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए ऐसे शिक्षण या शोध कार्य के लिए प्राप्त पारिश्रमिक पर उस दूसरे राज्य में कर से छूट प्राप्त होगी।

2. यह अनुच्छेद केवल शोध कार्य से प्राप्त होने वाली आय पर उसी स्थिति में लागू होगा यदि व्यष्टि द्वारा ऐसा शोधकार्य सार्वजनिक हित में किया जा रहा हो न कि मुख्य रूप से किन्हीं निजी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के लाभ के लिए।

3. इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को संविदाकारी राज्य का निवासी होना माना जाएगा यदि वह उस वित्तीय वर्ष में अथवा उससे तुरंत पहले वित्तीय वर्ष उस राज्य में निवासी है जिसमें वह दूसरे संविदाकारी राज्य का दौरा करता है।

अनुच्छेद-21

विद्यार्थी

1. कोर्इ विद्यार्थी जो संविदाकारी राज्य का दौरा करने के तुरन्त पहले दूसरे संविदाकारी राज्य का निवासी है अथवा था और जो मात्र अपनी शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ प्रथमोल्लिखित राज्य में उपस्थित है, जो भरण-पोषण शिक्षण अथवा प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ अदायगियाँ प्राप्त करता है, पर उस राज्य में कर नहीं लगाया जाएगा। बशर्ते कि ऐसी अदायगियाँ उस राज्य से बाहर के स्रोतों से उद्भूत होती हों।

2. इस अनुच्छेद के लाभ केवल ऐसी समयावधि तक उपलब्ध होंगे जो ऐसी शिक्षा एवं प्रशिक्षण को पूरा करने के लिए तर्कसंगत हो अथवा प्रथागत रूप से अपेक्षित हो परन्तु किसी भी हाल में किसी व्यष्टि को इस अनुच्छेद के लाभ उस दूसरे राज्य में उसके शिक्षण अथवा प्रशिक्षण के प्रयोजनार्थ उसके प्रथम आगमन की तारीख से लगातार छह वर्षों की अवधि से अधिक नहीं मिलेगा।

अनुच्छेद-22

अन्य आय

1. एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी की आय की ऐसी मदें, जहां-कहीं वे उद्भूत होती हों, जिन पर इस करार के पूर्वोक्त अनुच्छेदों में विचार नहीं किया गया है, केवल उस राज्य में कराधेय होंगी।

2. पैराग्राफ 1 के उपबंध, अनुच्छेद 6 के पैराग्राफ 2 में यथा-परिभाषित अचल सम्पत्ति से प्राप्त आय से भिन्न आय पर लागू नहीं होंगे, यदि ऐसी आय का प्राप्तकर्ता एक संविदाकारी राज्य का निवासी होने के नाते दूसरे संविदाकारी राज्य में वहां स्थित किसी स्थायी संस्थापन के माध्यम से कारोबार करता है अथवा उस दूसरे राज्य में वहां स्थित किसी निश्चित स्थान से स्वतंत्र वैयक्तिक सेवाएं निष्पादित करता है तथा ऐसा अधिकार अथवा सम्पत्ति जिसके संबंध में ऐसी आय अदा की जाती है, ऐसे स्थायी संस्थापन अथवा निश्चित स्थान से प्रभावी रूप से सम्बद्ध है। ऐसे मामले में अनुच्छेद 7 अथवा अनुच्छेद 14 के उपबंध, जैसा भी मामला हो, लागू होंगे।

3. पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंधों के होते हुए भी एक संविदाकारी राज्य के किसी निवासी की आय की मदों, जिन पर इस करार के पूर्ववर्ती अनुच्छेदों में चर्चा नहीं की गर्इ है और जो दूसरे संविदाकारी राज्य में उद्भूत होते हैं, पर उस दूसरे राज्य में भी कर लगाया जा सकता है।

IV. दोहरे कराधान का अपाकरण

अनुच्छेद-23

दोहरे कराधान के अपाकरण की विधि

1. दोहरे कराधान का अपाकरण निम्नानुसार किया जाएगा :

(क) भारत में :

क) जहां भारत का कोर्इ निवासी ऐसी आय प्राप्त करता है जिस पर इस करार के उपबंधों के अनुसार कोलम्बिया में कर लगाया जा सकता है, वहां भारत, उस निवासी की आय पर कर के संबंध में कोलम्बिया में अदा किए गए कर के समकक्ष राशि पर कटौती की अनुमति प्रदान करेगा।

तथापि, ऐसी कटौती, छूट दिए जाने से पहले यथा-संगणित कर, जैसा भी मामला हो, के उस भाग से अधिक नहीं होगी जिसका श्रेय उस आय को हो जिस पर कोलम्बिया में कर लगाया जा सकता है।

(ख) जहां, इस करार के किसी भी उपबंध के अनुसार भारत के किसी निवासी द्वारा प्राप्त की गर्इ आय पर भारत में कर से छूट प्राप्त होती है, वहां भारत फिर भी ऐसी निवासी की शेष आय पर कर की धनराशि की संगणना के समय छूट प्राप्त आय को ध्यान में रखेगा।

2. कोलम्बिया में :

क) जहां कोलम्बिया का कोर्इ निवासी ऐसी आय प्राप्त करता है जिस पर इस करार के उपबंधों के अनुसार भारत में कर लगाया जा सकता है, वहां कोलम्बिया अपने स्वदेशी कानूनों द्वारा लगार्इ गर्इ सीमाओं के भीतर निम्न की अनुमति देगा:-

(i)  उस निवासी की आय पर उस राशि की कर से छूट, जो भारत में अदा किए गए कर के बराबर की राशि हो;

(ii)  लाभांशों के मामले में, लाभांशों की कुल राशि के समान आय कर पर छूट, जिसे भारत में आय कर की दर से गुणांकित है और जो ऐसे लाभों पर अनुप्रयोज्य है, जिसमें से ऐसे लाभांशों को अदा किया जाता है। जब ऐसे लाभांशों पर भारत में कर लगाया जाता है, तो ऐसी छूट को तद्नुरूपी राशि तक बढ़ा दिया जाएगा। तथापि, किसी भी स्थिति में ऐसी छूट ऐसे लाभांशों पर कोलम्बिया में देय आय की कुल राशि से अधिक नहीं हो सकती।

तथापि, ऐसी कटौती, छूट दिए जाने से पहले यथा-संगणित आय पर कर के उस भाग से अधिक नहीं होगी जो आय की उन मदों के कारण हो जिस पर भारत में कर लगाया जा सकता है।

(ख) जहां, इस करार के किसी भी उपबंध के अनुसार कोलम्बिया के किसी निवासी द्वारा प्राप्त की गर्इ आय पर कोलम्बिया में कर से छूट प्राप्त होती है, वहां कोलम्बिया फिर भी ऐसी निवासी की शेष आय पर कर की राशि की संगणना के समय छूट प्राप्त आय को ध्यान में रखेगा।

V. विशेष उपबंध

अनुच्छेद-24

सम-व्यवहार

1. एक संविदाकारी राज्य के राष्ट्रिकों पर दूसरे संविदाकारी राज्य में ऐसा कोर्इ कराधान अथवा तत्संबंधी ऐसी कोर्इ अपेक्षा लागू नहीं की जाएगी जो उस कराधान से और तत्संबंधी अपेक्षाओं से भिन्न अथवा अधिक भारपूर्ण हो, जो उस दूसरे राज्य के राष्ट्रिकों पर विशेषत: निवास के संबंध में उन्हीं परिस्थितियों में लागू होती हो अथवा लागू की जा सकती हो। अनुच्छेद 1 के उपबंधों के होते हुए भी यह उपबंध उन व्यक्तियों पर भी लागू होगा जो एक अथवा दोनों संविदाकारी राज्यों के निवासी नहीं हैं।

2. एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम के दूसरे संविदाकारी राज्य में स्थित स्थायी संस्थापन पर उस दूसरे राज्य में ऐसा कोर्इ कराधान लागू नहीं किया जाएगा जो उस दूसरे राज्य के उद्यमों पर समरूप कार्यकलापों को करने हेतु लागू होने वाले कराधान से अपेक्षाकृत कम अनुकूल हो। इस उपबंध का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि एक संविदाकारी राज्य के लिए यह बाध्यकर है कि वह दूसरे संविदाकारी राज्य के निवासियों को, कराधान प्रयोजनों के लिए उनकी सिविल हैसियत अथवा पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए किसी प्रकार की ऐसी व्यक्तिगत छूट, राहत अथवा कटौतियों की मंजूरी दे जो वह अपने निवासियों को देता है। इस उपबंध का अर्थ किसी संविदाकारी राज्य को दूसरे संविदाकारी राज्य की किसी कंपनी का प्रथमोल्लिखित राज्य में स्थित संस्थापन के लाभों को कर की उस दर पर प्रभारित करने से रोकना नहीं है जो उस दर से अधिक हो, जो प्रथमोल्लिखित संविदाकारी राज्य की ऐसी ही कंपनी के लाभों पर लगाया जाता है और न ही यह अनुच्छेद 7 के पैराग्राफ 3 के उपबंधों के प्रतिकूल है।

3. ऐसे मामले को छोड़कर जहां अनुच्छेद 9 के पैराग्राफ 1, अनुच्छेद 11 के पैराग्राफ 7 या अनुच्छेद 12 के पैराग्राफ 6 के उपबंध लागू होते हैं, एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी को अदा किये गए ब्याज, रायल्टी, तकनीकी सेवाओं के लिए फीस तथा अन्य भुगतान, ऐसे उद्यम के कराधेय लाभों का निर्धारण करने के प्रयोजनार्थ उन्हीं शर्तों के अनुसार कटौती-योग्य होंगे मानो उनका भुगतान प्रथमोल्लिखित राज्य के किसी निवासी को अदा किया गया हो। इसी प्रकार एक संविदाकारी राज्य के किसी उद्यम द्वारा दूसरे संविदाकारी राज्य के निवासी को दिए गए ऋण, ऐसे उद्यम की कराधेय पूंजी को निधारित करने के प्रयोजनार्थ, उन्हीं शर्तों के अधीन कटौती-योग्य होंगे, मानो वे प्रथमोल्लिखित राज्य के किसी निवासी को प्रदान किए गए हों।

4. एक संविदाकारी राज्य के उद्यमों पर, जिसकी पूंजी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण या आंशिक रूप से दूसरे संविदाकारी राज्य के एक या अधिक निवासियों के स्वामित्व में हो या उनके द्वारा नियंत्रित की जाती हो, प्रथमोल्लिखित राज्य में कोर्इ ऐसा कर नहीं लगाया जाएगा या तत्संबंधी कोर्इ ऐसी अपेक्षा नहीं की जाएगी जो उस कराधान से और तत्संबंधी अपेक्षाओं से भिन्न अथवा अधिक भारपूर्ण है, जो प्रथमोल्लिखित राज्य के अन्य इसी प्रकार के उद्यमों पर लागू की जाती है या लागू की जा सकती है।

5. इस अनुच्छेद के उपबंध, अनुच्छेद-2 में उल्लिखित करों पर लागू होंगे।

अनुच्छेद-25

पारस्परिक करार विधि

1. जहां कोर्इ व्यक्ति यह समझता है कि एक अथवा दोनों संविदाकारी राज्यों की कार्रवार्इयों के कारण उस पर इस प्रकार कर लगाया जाता है अथवा लगाया जाएगा जो इस करार के उपबंधों के अनुरूप नहीं है तो वह उन राज्यों के स्वदेशी कानूनों द्वारा उपलब्ध कराए गए उपायों के होते हुए भी अपना मामला उस संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकता है, जिसका कि वह एक निवासी है अथवा यदि उसका मामला अनुच्छेद 24 के पैराग्राफ 1 के अंतर्गत आता है तो वह अपना मामला उस संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकता है जिसका कि वह राष्ट्रिक है। इस मामले को उस कार्रवार्इ की प्रथम अधिसूचना से तीन वर्षों के भीतर अवश्य प्रस्तुत कर दिया जाना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप ऐसा कराधान लगाया गया है जो इस करार के उपबंधों के अनुरूप नहीं है।

2. यदि सक्षम प्राधिकारी को आपत्ति उचित लगे और यदि वह स्वयं किसी संतोषजनक हल पर पहुंचने में असमर्थ हो, तो वह ऐसे कराधान के परिहार की दृष्टि से जो इस करार के अनुरूप नहीं है, दूसरे संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी के साथ पारस्परिक सहमति द्वारा उस मामले को हल करने का प्रयास करेगा। इस प्रकार किए गए किसी करार को संविदाकारी राज्यों के स्वदेशी कानूनों में किन्हीं समय सीमाओं के होते हुए भी क्रियान्वित किया जाएगा।

3. इस करार की व्याख्या करने अथवा इसे लागू करने में कोर्इ कठिनार्इयां अथवा शंकाएं हों, तो संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी उन्हें पारस्परिक सहमति से हल करने का प्रयास करेंगे। वे उन मामलों में भी दोहरे कराधान को दूर करने के लिए परस्पर विचार-विमर्श कर सकते हैं जिनकी इस करार में व्यवस्था नहीं की गर्इ हो।

4. पिछले पैराग्राफों के अभिप्राय से कोर्इ करार करने के प्रयोजनार्थ संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी एक दूसरे के साथ सीधे पत्र-व्यवहार कर सकते हैं।

अनुच्छेद-26

सूचना का आदान-प्रदान

1. संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी ऐसी सूचना (दस्तावेजों अथवा दस्तावेजों की अधिप्रमाणित प्रतियों सहित) का आदान-प्रदान करेंगे जो कि इस करार के उपबंधों को अथवा संविदाकारी राज्यों या उन करों से संबंधित आंतरिक कानूनों के प्रयोजनार्थ कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हैं, जहां तक कि उनके अधीन कराधान व्यवस्था इस करार के प्रतिकूल नहीं हैं। सूचना का आदान-प्रदान अनुच्छेद 1 और 2 द्वारा प्रतिबंधित नहीं है।

2. संविदाकारी राज्य द्वारा पैराग्राफ 1 के अंतर्गत प्राप्त की गर्इ कोर्इ सूचना उस राज्य के आंतरिक कानूनों के अंतर्गत प्राप्त सूचना के समान ही गुप्त समझी जाएगी और उसे केवल उन व्यक्तियों अथवा प्राधिकारियों (न्यायालय और प्रशासनिक निकाय शामिल हैं) को प्रकट किया जाएगा जो पैराग्राफ 1 में उल्लिखित करों के संबंध में करों का निर्धारण या उनकी वसूली करने, उनके प्रवर्तन अथवा अभियोजन के संबंध में अथवा अपीलों का निर्धारण करने या उपर्युक्त की चूक से संबद्ध हो। ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी सूचना का उपयोग केवल ऐसे ही प्रयोजन के लिए करेंगे। वे इस सूचना को सार्वजनिक न्यायालय की कार्यवाहियों अथवा न्यायिक निर्णयों में प्रकट कर सकेंगे। पूर्ववर्ती पैराग्राफों के होते हुए भी एक संविदाकारी राज्य द्वारा प्राप्त की गर्इ सूचना को दूसरे प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जा सकता है, जब ऐसी सूचना को दोनों राज्यों के कानूनों के तहत ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए प्रयोग किया जाता हो और आपूर्तिकर्ता राज्य के सक्षम प्राधिकारी ऐसे प्रयोग को प्राधिकृत करते हों।

3. किसी भी स्थिति में पैराग्राफ 1 और 2 के उपबंधों का अर्थ किसी संविदाकारी राज्य पर निम्नलिखित दायित्व डालना नहीं होगा :

(क)  उस अथवा दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों और प्रशासनिक प्रथा से हट कर प्रशासनिक उपाय करना :

(ख) ऐसी सूचना (जिसमें दस्तावेज अथवा दस्तावेजों की अधिप्रमाणित प्रतियां शामिल हैं) की सप्लार्इ करना जो उस अथवा दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों के अंर्तगत अथवा प्रशासन की सामान्य स्थिति में प्राप्य नहीं है;

(ग) ऐसी सूचना की सप्लार्इ करना जिससे कोर्इ व्यापार, कारोबार, औद्योगिक, वाणिज्यिक अथवा व्यावसायिक, गुप्त अथवा व्यापार प्रक्रिया अथवा सूचना प्रकट होती हो, जिसको प्रकट करना सार्वजनिक नीति के प्रतिकूल हो (आर्डर पब्लिक)।

4. इस अनुच्छेद के अनुसरण में यदि किसी संविदाकारी राज्य द्वारा किसी जानकारी को प्राप्त करने के लिए अनुरोध किया जाता है तो दूसरा संविदाकारी राज्य अनुरोध की गर्इ जानकारी प्राप्त करने के लिए अपनी सूचना एकत्र करने वाले उपायों का उपयोग करेगा, चाहे उस दूसरे राज्य को अपने स्वयं के कर प्रयोजनों के लिए ऐसी सूचना की कोर्इ आवश्यकता न हो। पिछले वाक्य में अन्तर्निहित दायित्व पैराग्राफ 3 की सीमाओं के अधीन है किन्तु किसी भी स्थिति में ऐसी सीमाओं का यह अर्थ नहीं होगा कि संविदाकारी राज्य केवल इसलिए सूचना सप्लार्इ करने से मना करते हैं कि ऐसी सूचना में उसका कोर्इ आंतरिक हित नहीं है।

5. किसी भी स्थिति में पैराग्राफ 3 के उपबंधों का अर्थ केवल इसलिए सूचना की आपूर्ति करने से मना करने के लिए किसी संविदाकारी राज्य को अनुमति देने के लिए नहीं लगाया जाएगा कि सूचना किसी बैंक, अन्य वित्तीय संस्थान, किसी एजेंसी या किसी न्यासी क्षमता में कार्यरत नामिती या व्यक्ति के पास है या यह किसी व्यक्ति के स्वामित्व हित से संबंधित है।

अनुच्छेद-27

करों की वसूली में सहायता

1. संविदाकारी राज्य राजस्व दावों की वसूली में एक दूसरे की सहायता करेंगे। यह सहायता अनुच्छेद 1 और 2 द्वारा प्रतिबंधित नहीं है। संविदाकारी राज्यों के सक्षम प्राधिकारी इस अनुच्छेद के अनुप्रयोग की विधि परस्पर सहमति द्वारा तय कर सकते हैं।

2. इस अनुच्छेद में यथा प्रयुक्त शब्द 'राजस्व दावा' का तात्पर्य संविदाकारी राज्यों अथवा उनके राजनीतिक उप-प्रभागों अथवा स्थानीय प्राधिकारियों की ओर से लगाए गए सभी किस्म के करों और विवरण से है, जहां तक उनके अंतर्गत कराधान इस करार अथवा कोर्इ अन्य साधन जिसके लिए संविदाकारी राज्य पक्ष हैं के साथ-साथ ऐसी राशि से संबंधित ब्याज, प्रशासनिक अर्थ-दंड और वसूली अथवा संरक्षण के संबंध में देय राशि है।

3. जब किसी संविदाकारी राज्य का राजस्व दावा उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत प्रवर्तनीय होता है और यह किसी व्यक्ति द्वारा देय होता है और उस समय उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत इसकी वसूली को रोक नहीं सकता तब उस राजस्व दावे को उस राज्य के सक्षम प्राधिकारी के अनुरोध पर दूसरे संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारियों द्वारा वसूली के प्रयोजनार्थ स्वीकार किया जाएगा। उस राजस्व दावे को उस राज्य द्वारा अपने स्वयं के करों के प्रवर्तन और वसूली, मानो कि राजस्व द्वारा उस दूसरे राज्य का राजस्व दावा था, के लिए प्रयोज्य इसके कानूनों के उपबंधों के अनुसार उस दूसरे संविदाकारी राज्य द्वारा वसूल किया जाएगा।

4. जब किसी संविदाकारी राज्य का राजस्व दावा वह दावा है जिसके संबंध में वह राज्य, अपने कानून के अंतर्गत, इसकी वसूली को सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण के उपाय करता है तब उस राजस्व दावे को उस राज्य के सक्षम प्राधिकारी के अनुरोध पर दूसरे संविदाकारी राज्य के सक्षम प्राधिकारी द्वारा संरक्षण के उपाय करने के प्रयोजनार्थ स्वीकार कर लिया जाएगा। वह दूसरा राज्य उस राजस्व दावे के संबंध में अपने कानूनों, मानो कि राजस्व दावे उस दूसरे राज्य के राजस्व दावे हों, के उपबंधों के अनुसार संरक्षण के उपाय करेगा यहां तक कि जब ऐसे उपायों का प्रयोग किया जाता है, राजस्व दावा प्रथमोल्लिखित राज्य में प्रवर्तनीय नहीं है अथवा उस व्यक्ति द्वारा देय है जिसे उसकी वसूली रोकने का अधिकार है।

5. पैराग्राफ 3 और 4 के उपबंधों के होते हुए भी पैराग्राफ 3 अथवा 4 के प्रयोजनार्थ किसी संविदाकारी राज्य द्वारा स्वीकार किया गया दावा उस राज्य में किसी समय सीमा के अध्यधीन नहीं होगा अथवा उसी रूप में उसे इसके स्वरूप के कारण उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत किसी राजस्व दावे के प्रयोज्य कोर्इ प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। इसके अलावा, पैराग्राफ 3 अथवा 4 के प्रयोजनार्थ किसी संविदाकारी राज्य द्वारा स्वीकार किए गए राजस्व दावे को उस राज्य में दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों के अंतर्गत उस राजस्व दावे को प्रयोज्य कोर्इ प्राथमिकता नहीं होगी।

6. किसी संविदाकारी राज्य के राजस्व दावे के अस्तित्व, वैधता अथवा राशि के संबंध में कार्यवाही को केवल उस राज्य के न्यायालयों अथवा प्रशासनिक निकायों के समक्ष लाया जाएगा। इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ नहीं है जिसका अर्थ दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी न्यायालय अथवा प्रशासनिक निकाय के समक्ष ऐसी कार्यवाही के लिए किसी अधिकार का सृजन करना अथवा प्रदान करना लगाया जाएगा।

7. जहां पैराग्राफ 3 अथवा 4 के तहत किसी संविदाकारी राज्य द्वारा अनुरोध किए जाने के पश्चात् किसी समय और प्रथमोल्लिखित राज्य में संबंधित राजस्व दावे को दूसरे संविदाकारी राज्य में वसूल करने और प्रेषित करने से पहले संबंधित राजस्व दावा वहां निम्नलिखित के संबंध में समाप्त हो जाएगा :

क) पैराग्राफ 3 के अंतर्गत अनुरोध के मामले में, प्रथमोल्लिखित राज्य का कोर्इ राजस्व दावा जो उस राज्य के कानूनों के तहत प्रवर्तनीय है और ऐसे व्यक्ति द्वारा देय है जो उस उस समय उस राज्य के कानूनों के अंतर्गत इसकी वसूली रोक नहीं सकता ; अथवा

ख) पैराग्राफ 4 के अंतर्गत अनुरोध के मामले में, प्रथमोल्लिखित राज्य के राजस्व दावे जिसके संबंध में वह राज्य अपने कानूनों के तहत इसकी वसूली सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संरक्षण के उपाय करता है;

प्रथमोल्लिखित राज्य का सक्षम प्राधिकारी इस तथ्य को दूसरे राज्य के सक्षम प्राधिकारी को तत्काल अधिसूचित करेगा और दूसरे राज्य के विकल्प पर प्रथमोल्लिखित राज्य अपने अनुरोध को या तो आस्थगित करेगा या फिर हटा लेगा।

8. इस अनुच्छेद के किसी भी उपबंध का अर्थ दोनों में से किसी भी संविदाकारी राज्य पर निम्नलिखित के लिए बाध्यता लागू करना नहीं लगाया जाएगा:

क)  उस सविदाकारी राज्य अथवा दूसरे संविदाकारी राज्य के कानूनों और प्रशासनिक प्रथा के असंगत प्रशासनिक उपाय करना;

ख)  ऐसे उपाय करना जो लोक नीति (आर्डर पब्लिक) के विपरीत हों;

ग) सहायता प्रदान करना यदि दूसरे संविदाकारी राज्य ने इसके कानूनों अथवा प्रशासनिक प्रथा के अंतर्गत उपलब्ध वसूली अथवा संरक्षण, जैसा भी मामला हो, के सभी समुचित उपायों को न किया हो;

घ)  उन मामलों में सहायता प्रदान करना जहां उस राज्य के लिए प्रशासनिक बोझ दूसरे संविदाकारी राज्य द्वारा उद्भूत किए जाने वाले लाभ से स्पष्ट रूप से अनुपातहीन हो।

अनुच्छेद-28

लाभों का परिसीमन

1. इस करार के उपबंध किसी भी स्थिति में एक संविदाकारी राज्य को कर परिहार अथवा अपवंचन से संबंधित इसके स्वदेवी कानूनों एवं उपायों के उपबंधों को लागू करने से नहीं रोकेंगे, चाहे वे इस रूप में वर्णित हों अथवा नहीं।

2. एक संविदाकारी राज्य का कोर्इ उद्यम इस करार के लाभों के लिए हकदार नहीं होगा, यदि ऐसे उद्यम के सृजन का मुख्य प्रयोजन अथवा प्रयोजनों में से एक मुख्य प्रयोजन इस करार के अंतर्गत लाभों को प्राप्त करना था जो अन्यथा प्राप्य नहीं होंगे।

3. विधिक सत्ताओं के ऐसे मामले, जिनकी प्रामाणिक कारोबारी गतिविधियाँ नहीं हैं, इस अनुच्छेद के उपबंधों में शामिल होंगे।

अनुच्छेद-29

राजनयिक मिशन के सदस्य एवं कौंसुली पद

इस करार की किसी बात से अंतरराष्ट्रीय कानून के सामान्य नियमों के अंतर्गत अथवा विशेष करारों के उपबंधों के अंतर्गत राजनयिक मिशन के सदस्यों अथवा कौंसुली अधिकारियों के वित्तीय विशेषाधिकारों पर कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ेगा।

VI. अंतिम उपबंध

अनुच्छेद-30

प्रवृत्त होना

1. संविदाकारी राज्य इस करार को लागू करने के लिए अपने-अपने कानूनों के अंतर्गत अपेक्षित प्रक्रियाओं को पूरा करने के संबंध में राजनयिक माध्यमों से लिखित रूप में एक दूसरे को अधिसूचित करेंगे।

2. यह करार इस अनुच्छेद के पैराग्राफ 1 में उल्लिखित अधिसूचनाओं की परवर्ती तारीख को प्रवृत्त होगा।

3. इस करार के उपबंधों का निम्न प्रभाव होगा:-

क) भारत में,

(1)  जिस कैलेन्डर वर्ष में यह करार लागू होता है उसके तत्काल अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष के अप्रैल माह की पहली तारीख को अथवा इसके बाद आरम्भ होने वाले किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त की गर्इ आय के संबंध में;

(2)  अन्य सभी मामलों में, उस तारीख को जिसमें करार प्रवृत्त हुआ हो।

ख) कोलम्बिया में,

(1 ) प्राप्त की गर्इ आय पर करों और व्ययों के रूप में प्रदत्त, जमा की गर्इ अथवा हिसाब में ली गर्इ राशियों के संबंध में करार के प्रवृत्त होने के वर्ष के तुरंत बाद प्रारंभ होने वाले कैलेण्डर वर्ष की जनवरी माह की प्रथम तारीख को;

(2)  अन्य सभी मामलों में, उस तारीख को जिसमें करार प्रवृत्त हुआ हो।

अनुच्छेद-31

समापन

यह करार अनिश्चित समय तक लागू रहेगा जब तक कि किसी संविदाकारी राज्य द्वारा इसे समाप्त नहीं कर दिया जाता।

दोनों में से कोर्इ भी संविदाकारी राज्य इस करार के लागू होने की तारीख से लेकर पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद शुरू होने वाले किसी कैलेण्डर वर्ष की समाप्ति से कम से कम छह महीने पहले राजनयिक माध्यम से समापन का नोटिस देकर करार को समाप्त कर सकता है। ऐसी स्थिति में यह करार निम्न के संबंध में निष्प्रभावी हो जाएगा:

क)  भारत में, जिस कैलेन्डर वर्ष में समापन का नोटिस दिया जाता है उसके अगले अनुवर्ती कैलेन्डर वर्ष की पहली अप्रैल को अथवा उसके बाद किसी वित्तीय वर्ष में प्राप्त की गर्इ आय के संबंध में; और

ख)  कोलम्बिया में,

(i)  जिस कैलेण्डर वर्ष में समापन का नोटिस दिया जाता है उसके अगले अनुवर्ती कैलेण्डर वर्ष के जनवरी माह के प्रथम दिन को प्राप्त की गर्इ आय पर करों और व्यय के रूप में प्रदत्त, जमा की गर्इ अथवा हिसाब में ली गर्इ राशियों के संबंध में;

(ii)  अन्य सभी मामलों में, उस तारीख को जिसको नोटिस दिया गया है।

जिसके साक्ष्य में, इसके लिए विधिवत रूप से प्राधिकृत अधोहस्ताक्षरियों ने इस करार पर हस्ताक्षर किए हैं।

नर्इ दिल्ली में वर्ष दो हजार ग्यारह के मर्इ माह के तेरहवें दिन हिन्दी, स्पेनिश एवं अंग्रेजी भाषाओं में दो-दो मूल प्रतियों में निष्पन्न किया गया और सभी पाठ समान रूप से प्रामाणिक हैं। अर्थ निरूपण में भिन्नता की स्थिति में अंग्रेजी पाठ प्रभावी माना जाएगा।

भारत गणराज्य की
सरकार की ओर से

कोलम्बिया गणराज्य
की ओर से
     
     
     
(सुधीर चन्द्र)   (जुआन एल्फ्रेडो पिंटो सावेदरा)
अध्यक्ष   भारत में कोलम्बिया के राजदूत
केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड    

प्रोतोकोल

आय पर करों के संबंध में दोहरे कराधान के परिहार एवं राजस्व अपवंचन को रोकने के लिए भारत गणराज्य और कोलम्बिया गणराज्य के बीच करार पर आज हस्ताक्षर करने के लिए अधोहस्ताक्षरी निम्नलिखित उपबंधों पर सहमत हुए हैं, जो करार के अभिन्न अंग होंगे:

1. अनुच्छेद 5 के पैराग्राफ 3 के संदर्भ में, यह समझा जाता है कि उस पैराग्राफ में उल्लिखित समय सीमाओं की संगणना करने के प्रयोजनार्थ, अनुच्छेद 9 के अर्थों के भीतर एक उद्यम द्वारा निष्पादित दूसरे उद्यम से संबंधित ऐसी गतिविधियों को उस अवधि से जोड़ा जाएगा जिसके दौरान उद्यम द्वारा गतिविधियां निष्पादित की गर्इ हैं। बशर्ते कि दोनों उद्यमों के कार्यकलाप समान अथवा संबंधित परियोजना के लिए एक जैसे अथवा बहुत कुछ समान हों।

2. कोलम्बिया के मामले में, अनुच्छेद 10 के पैराग्राफ 2 के उपबंधों के होते हुए भी, जब कोलम्बिया की निवासी कोर्इ कंपनी शेयरधारकों (साशियोज ओ एसीओनिसतास) को संवितरित किए गए लाभ पर छूट के कारण आयकर अदा नहीं करती है अथवा लाभ, अनुच्छेद 49 में और कोलम्बिया की कर सांविधि के अनुच्छेद 245 के पैराग्राफ 1 में अंतर्निहित अधिकतम गैर-कर सीमा से अधिक हो जाते हैं तो संवितरित लाभांश पर 15 प्रतिशत से अनधिक की दर पर कोलम्बिया में कर लग सकता है यदि लाभांश का लाभभोगी स्वामी भारत का निवासी शेयर धारक (सोशियो ओ एसियोनिस्ता) है।

3. अनुच्छेद 12 के पैराग्राफ 3 (ख) के संदर्भ में, भारत के मामले में यह समझा जाता है कि पद ''तकनीकी सेवाओं के लिए फीस'' में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 9 के उपबंधों के अनुसरण में तकनीकी अथवा अन्य कार्मिक सेवाओं के प्रावधान के लिए प्रतिफल के रूप में प्राप्त की गर्इ अदायगियां शामिल हैं।

4. यह समझा जाता है कि यदि किसी संविदाकारी राज्य का आंतरिक कानून इस करार के उपबंधों की तुलना में दूसरे संविदाकारी राज्य के किसी निवासी के लिए अधिक लाभकारी है तो प्रथमोल्लिखित राज्य के आंतरिक कानून उस सीमा तक लागू होंगे जिस तक वे उस निवासी को अधिक लाभकारी हैं।

जिसके साक्ष्य में, इसके लिए विधिवत रूप से प्राधिकृत अधोहस्ताक्षरियों ने इस प्रोतोकोल पर हस्ताक्षर किए हैं।

नर्इ दिल्ली में वर्ष दो हजार ग्यारह के मर्इ माह के तेरहवें दिन हिन्दी, स्पेनिश एवं अंग्रेजी भाषाओं में दो-दो मूल प्रतियों में निष्पन्न किया गया और सभी पाठ समान रूप से प्रामाधिक हैं। अर्थ निरूपण में भिन्नता की स्थिति में अंग्रेजी पाठ प्रभावी माना जाएगा।

भारत गणराज्य की
सरकार की ओर से
कोलम्बिया गणराज्य
की ओर से
     
     
     
(सुधीर चन्द्र)   (जुआन एल्फ्रेडो पिंटो सावेदरा)
अध्यक्ष   भारत में कोलम्बिया के राजदूत
केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड    
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