आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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परिपत्र सं.

परिपत्र सं. 3/2018

परिपत्र की तिथि

11/07/2018

दस्तावेज़ अपलोड की तिथि

11/07/2018

 परिपत्र सं. 3/2018

परिपत्र सं. 3/2018

एफ.नं. 279/विविध 142/2007-आर्इटीजे (पीटी.)

भारत सरकार

वित्त मंत्रालय

राजस्व विभाग

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

नर्इ दिल्ली, 11 जुलार्इ, 2018

 

विषय : आयकर अपीलीय न्यायाधिकर, उच्च न्यायालयों के समक्ष विभाग द्वारा अपील को दाखिल करने और उच्चतम न्यायालय के समक्ष एसएलपी/अपील के लिए मौद्रिक सीमा का संशोधन - मुकद्मेबाजी को कम करने के उपाय - संबंधित

 

बोर्ड की 2015 की निर्देश सं. 21 दिनांक 10.12.2015, जिसमें आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण, उच्च न्यायालय के समक्ष विभागीय अपील (आयकर मामलों में) और उच्च्तम न्यायालय के समक्ष एसएलपी/अपील दाखिल करने के लिए मौद्रिक सीमा तथा अन्य शर्तों को निर्दिष्ट किया गया था, के लिए संदर्भ आमंत्रित हैं।

2. उक्त परिपत्र के अधिक्रमण में, बोर्ड द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि मौद्रिक सीमा तथा नीचे निर्दिष्ट शर्तों को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के समक्ष एसएलपी/अपील तथा आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण तथा उच्च न्यायालय के समक्ष अपील योग्यता के आधार पर की जा सकती हैं।

3. अब से, अपील/एसएलपी को उन मामलों में दाखिल नहीं किया जाएगा जहां कर प्रभाव नीचे दिए गए अनुसार मौद्रिक सीमा से अधिक न हो :-

क्र.सं. आयकर मामलों में अपील/एसएलपी मौद्रिक सीमा (रू.)
1. अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष 20,00,000
2. उच्च न्यायालय के समक्ष 50,00,000
3. उच्चतम न्यायालय के समक्ष 1,00,00,000

यह स्पष्ट किया जाता है कि अपील को केवल इसलिए ही नहीं दाखिल करना चाहिए क्योंकि प्रभावी कर उक्त निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक है। ऐसे मामलों में अपील को दाखिलीकरण मामले की पात्रता के आधार पर निर्णित होना है।

4. इस उद्देश्य के लिए, "प्रभावी कर" का अर्थ कुल मूल्यांकित आय पर कर तथा ऐसे कर के बीच का अंतर है जो वसूलनीय होता जब ऐसी कुल आय को मुद्दे, जिसके विरूद्ध अपील की जानी है (तत्पश्चात् "विवादित मुद्दे के तौर पर संदर्भित"), के संबधं में आय की राशि द्वारा घटाया गया था। आगे, 'प्रभावी कर' में लागू होने वाले अधिभार और अधिकर शामिल होंगे। हालांकि कर में आगे से कोर्इ ब्याज शामिल नहीं होगा केवल तब छोड़कर जब ब्याज को वसूला जाना स्वयं विवाद में हो। यदि ब्याज को वसूलने का मुद्दा विवादित हो तो ब्याज की राशि कर प्रभावी होगी। यदि प्रतिदाय हानि को कम किया जाता है अथवा आय के तौर पर मूल्यांकित किया जाता हैं तो कर प्रभाव में विवादित वृद्धि पर काल्पनिक कर शामिल होगा। जुर्माना आदेश की स्थिति में, कर प्रभाव का अर्थ विरूद्धात्मक अपील किए जाने वाले आदेश में जुर्माने को हटाना अथवा कम करने होगा।

5. निर्धारण अधिकारी प्रत्येक निर्धारिती के मामले में विवादित मुद्दो के संबध में प्रत्येक निर्धारण वर्ष के लिए अलग से प्रभावी कर की गणना करेगा। निर्धारिती के मामलें में, यदि विवादित मुद्दे एक से अधिक निर्धारण वर्ष में उत्पन्न होते हैं तो अपील, ऐसे निर्धारण वर्ष अथवा वर्षों के संबंध में की जा सकती हैं जिसमें विवादित मुद्दे के संबंध में प्रभावी कर पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक होता है। कोर्इ अपील उस निर्धारण वर्ष अथवा वर्षों के संबंध में नहीं की जाएगी जिसमें प्रभावी कर पैरा 3 में निर्दिष्ट मौदिक्र सीमा से कम हो। अन्य शब्दों में, अब से, अपील प्रासंगिक निर्धारण वर्ष में प्रभावी कर के संदर्भ में ही की जा सकती है। हालांकि, किसी उच्च न्यायालय अथवा अपीलीय प्राधिकारी के समग्र आदेश, जिसमें एक से अधिक निर्धारण वर्ष तथा एक से अधिक निर्धारण वर्ष में सामान्य मुद्दे शामिल हैं, की स्थिति में, अपील ऐसे समस्त निर्धारण वर्षों के संबंध में की जाएगी भलें ही 'प्रभावी कर' किसी भी वर्ष (वर्षों) में निर्धारित मौद्रिक सीमा से कम हो, यदि उस वर्ष (वर्षों) के संबध में अपील करने का निर्णय लिया जाता हो जिसमें 'प्रभावी कर' निर्धारित मौद्रिक सीमा से अधिक हो। यदि समग्र आदेश/निर्णय में एक से अधिक निर्धारिती शामिल हो तो प्रत्येक निर्धारिती के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाएगा।

6. आगे, जहां आय की गणना 'प्रभावी कर' को निर्धारित करने के लिए धारा 115ञख या धारा 115ञग के प्रावधानों के अंतर्गत की जाती है तो निर्धारित की गर्इ कुल आय पर कर निम्नलिखित सूत्र के अनुसार आंका जाएगा -

(क-ख) + (ग-घ)

जहां,

क = धारा 115ञख या धारा 115ञग (यहां सामान्य प्रावधानों के तौर पर ज्ञात) में शामिल प्रावधानों को छोड़कर अन्य प्रावधानों के अनुसार आंकी गर्इ कुल आय

ख = कुल आय जो वसूलनीय होती सामान्य प्रावधानों के अनुसार मूल्यांकित कुल आय को सामान्य प्रावधानों के अंतर्गत विवादित मुद्दों की राशि द्वारा कम किया गया था

ग = धारा 115ञख या धारा 115ञग में शामिल प्रावधानों के अनुसार निर्धारित कुल आय

घ = कुल आय जो वसूलनीय होती धारा 115ञख या धारा 115ञग में शामिल प्रावधानों के अनुसार मूल्यांकित कुल आय को कथित प्रावधानों के अंतर्गत विवादित मुद्दों की राशि द्वारा कम किया गया था

हालांकि, जहां विवादित मुद्दों की राशि दोनों धारा 115ञख या धारा 115ञग में शामिल प्रावधानों के अंतर्गत और सामान्य प्रावधानों के अंतर्गत विचारनीय है, ऐसी राशि मद घ के अंतर्गत राशि को निर्धारित करने के दौरान कुल आय से कम नहीं की जाएगी।

7. यदि जहां न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय के समक्ष अपील प्रभावी कर के कारण उक्त निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम होने के कारण दाखिल नहीं की जा सकती हो तो प्रधान आयकर आयुक्त/आयकर आयुक्त विशेष रूप से रिकार्ड करेगा कि "यद्यपि निर्णय स्वीकार्य नहीं है, अपील केवल इस विचार पर नहीं की जा रही कि प्रभावी कर इस परिपत्र में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम हैं"। आगे, ऐसे मामलों में, कोर्इ प्रकल्पना नहीं होगी कि आयकर विभाग विवादित मुद्दे पर निर्णय से संतुष्ट नहीं हुआ है। आयकर विभाग किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए उसी निर्धारिती अथवा उसी के लिए किसी अन्य निर्धारिती की स्थिति में अथवा किसी अन्य निर्धारण वर्ष की स्थिति में विवादित मुद्दे के समक्ष अपील के दाखिलीकरण से अलग नहीं होगा, यदि कर प्रभाव निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से अधिक होता हैं।

8. पहले भीं, बोर्ड के संज्ञान में ऐसे कर्इ मामले आ चुके हैं जिसमें एक निर्धारिती ने इस आधार पर ही न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय से राहत का दावा किया कि विभाग ने किसी दूसरे निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती अथवा उसी अथवा अन्य निर्धारण वर्ष के लिए किसी अन्य निर्धारिती ने न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय का निर्णय उसी विवादित मुद्दे पर अपील न करके निसंदेह स्वीकार कर लिया। विभागीय प्रतिनिधि/अधिवक्ता को न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय के ध्यान में लाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए कि ऐसे मामलों में अपील नहीं की गर्इ या केवल इसलिए अनुमति नहीं की गर्इ थी कि प्रभावी कर निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम था और इसलिए, ऐसा कोर्इ अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए कि उसमे प्रस्तुत निर्णय विभाग को स्वीकार्य था। तद्नुसार, उन्हें न्यायाधिकरण अथवा न्यायालय को यह समझाना चाहिए कि ऐसे मामले का कोर्इ पूर्व उदाहरण नहीं है और साथ ही न्यायाधिकरण/न्यायालय के संज्ञान में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 268क की उप-धारा (4) के प्रावधानों को भी लाया जाना चाहिए जिनको निम्नानुसार पढ़ा जा सकता है :

"(4) ऐसी अपील या संदर्भ की सुनवार्इ करने वाले अपीलार्थी न्यायाधिकरण या न्यायालय के उप-धारा (1) के अंतर्गत या परिस्थिति जिसके अंतर्गत ऐसी अपील या संदर्भ के लिए आवेदन किसी मामले में किया गया था या नहीं किया गया था, के अंतर्गत जारी आदेशों, निर्देशों या आज्ञा का सम्मान होगा"

9. इसलिए इस परिपत्र के कारण अपील दाखिल न करने का प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता हैं, प्रधान आयकर आयुक्त/आयकर आयुक्त कार्यालय में न्यायिक पुस्तिका आसान क्षतिपूर्ति के लिए प्रणालीगत तरीके से संभाली जानी चाहिए।

10. निम्नलिखित मुद्दे से संबंधित विरूद्धात्मक निर्णय का तब भी पात्रता के आधार पर विरोध करना चाहिए कि अपरिहार्य प्रभावी कर उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा से कम है अथवा कोर्इ कर प्रभाव नहीं है :

(क) जहां अधिनियम अथवा नियम के प्रावधानों की सवैधानिक वैधता चुनौती के तहत हो अथवा

(ख) जहां बोर्ड के आदेश, अधिसूचना, निर्देश अथवा परिपत्र को गैर-कानूनी अथवा अधिकार क्षेत्र से बाहर होने तौर पर रखा गया हो अथवा

(ग) जहां विभाग द्वारा मामले में राजस्व जांच आपत्ति को स्वीकृत किया गया हो अथवा

(घ) जहां संयोजन अज्ञात विदेशी परिसंपत्तियों/बैंक खाते से संबंधित हो

11. उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट मौद्रिक सीमा आयकर को छोड़कर रिट मामले तथा प्रत्यक्ष कर मामलों हेतु लागू नहीं होंगे। अन्य प्रत्यक्ष कर मामलों में अपील का दाखिलीकरण कानून एवं नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों द्वारा शासित होना जारी रहेगा। आगे, जहां कर प्रभाव अनिर्धारणीय हो अथवा शामिल न हो, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12क/12कक के अंतर्गत न्यास अथवा संस्थानों के पंजीकरण आदि के मामले उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट सीमा द्वारा अपील का दखिलीकरण शासित नहीं होगा तथा ऐसे मामले में अपील दाखिलीकरण का निर्णय को विशेष मामले की पात्रता के आधार पर लिया जा सकता हैं।

12. यह स्पष्ट किया जाता है कि आर्इटीएटी के समक्ष अपील दाखिल करने के लिए रू. 20 लाख की मौद्रिक सीमा अधिनियम की धारा 253(4) के अंतर्गत प्रत्याक्षेप के समान होगी। इस मौद्रिक सीमा से कम प्रत्याक्षेप, पहले से दाखिल, निरस्त किया जाएगा/बाध्य नहीं किया गया, के तौर पर अपनाया जाना चाहिए। मौद्रिक सीमा से नीचे प्रत्याक्षेप को दाखिल करना अब से विचारनीय नहीं हो सकता। इसी प्रकार, क्रमश: रू. 50 लाख और रू. 1 करोड़ की मौद्रिक सीमा से नीचे उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील/उच्च न्यायालय और एसएलपी को संदर्भ निरस्त किया गया/बाध्य नहीं किया गया के तौर पर खारिज करने के लिए अपनाया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय के समक्ष संदर्भ और इन सीमाओं से नीचे एसएलपी/अपील अब विचारनीय नहीं हो सकती।

13. यह परिपत्र उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय/न्यायाधिकरण में अब से किए जाने वाले एसएलपी/अपील/प्रत्याक्षेप/संदर्भ के लिए लागू होगी और यह लंबित एसएलपी/अपील/प्रत्याक्षेप/संदर्भों के लिए भी पहले की तरह लागू होगी। उक्त पैरा 3 में निर्दिष्ट कर सीमाओं से नीचे लंबित अपील को निरस्त किया जा सकता है/बाध्य नहीं किया जाएगा।

14. उक्त को सभी संबंधि के ध्यान में लाया जा सकता है।

15. आयकर अधिनियम 1961 की धारा 268क के अंतर्गत निगर्मन

16. हिंदी संस्करण का अनुसरण होगा

 

(नीतिका बंसल)

निदेशक (आर्इटीजे),

सीबीडीटी, नर्इ दिल्ली

 

निम्न को प्रति :

  1. अध्यक्ष, सदस्य तथा अवर सचिव तथा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड में उससे ऊपर के पद के अन्य समस्त अधिकारी

  2. समस्त अधिकारियों के ध्यान में लाने के अनुरोध के साथ समस्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त तथा समस्त आयकर महानिदेशक

  3. अतिरिक्त महानिदेशक (पीआर, पीपी एंड ओएल), मयूर भवन, नर्इ दिल्ली सामान्य मेलिंग सूची के अनुसार वितरण के लिए तथा त्रैमासिक कर बुलेटिन प्रकाशन के लिए

  4. भारतीय नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक

  5. अतिरिक्त महानिदेशक (सर्तकता), मयूर भवन, नर्इ दिल्ली

  6. संयुक्त सचिव एवं कानूनी सलाहकार, विधि एवं न्याय मंत्रालय, नर्इ दिल्ली

  7. समस्त आयकर महानिदेशालय तथा आयकर महानिदेशक (राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी), नागपुर

  8. आर्इटीसीसी (3 प्रतियां)

  9. अतिरिक्त महानिदेशक (पद्धति)-4, विभागीय वेबसाइट पर अपलोडिंग के लिए

10. irsofficersonline.gov.in पर अपलोडिंग के लिए डाटाबेस प्रकोष्ठ

11. एनजेआरएस पर अपलोड करने के लिए njrs_support@nsdl.co.in

12. अनुवाद के लिए हिन्दी प्रकोष्ठ

13. गार्ड फाइल

 

निदेशक (आर्इटीजे),

सीबीडीटी, नर्इ दिल्ली