परिपत्र सं. 03/2017 : वित्त अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के लिए व्याख्यात्मक टिप्पणी
परिपत्र सं.
परिपत्र सं. 03/2017
परिपत्र की तिथि
20/01/2017
दस्तावेज़ अपलोड की तिथि
20/01/2017
परिपत्र सं. 3/2017
एफ. सं. 370142/20/2016-टीपीएल
भारत सरकार
वित्त मंत्रालय
राजस्व विभाग
(केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड)
******
दिनांक, 20 जनवरी, 2017
वित्त अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के लिए व्याख्यात्मक टिप्पणी
परिपत्र
आयकर अधिनियम
वित्त अधिनियम, 2016 - वित्त अधिनियम, 2016 के प्रावधानों हेतु व्याख्यात्मक टिप्पणी
परिपत्र सं. - 3/2017, दिनांक 20 जनवरी, 2017
एक नजर में संशोधन
| धारा/अनुसूची | विवरण/परिच्छेद संख्या |
| वित्त अधिनियम, 2016 | |
| प्रथम अनुसूची | दर संरचना, 3.1 - 3.4 |
| अध्याय III | आयकर अधिनियम, 1961 |
| 2 | कर लगाना जहां धर्मांर्थ संस्थान मौजूद न हो अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान में रूपांतरित हो गया हो, 11.1-11.4 इसके निवेशकों को श्रेणी-I और श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष द्वारा भुगतान के संबंध में स्रोत पर कर कटौती प्रावधानों का व्यवस्थितिकरण, 12.1-12.6 दीर्घकालीन पूंजीगत परिसंपत्तियों के तौर पर समझे जाने के लिए असूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों की संघटन की अवधि, 15.1-15.3 स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, 2015 का कर उपचार, 23.1-23.3 आयकर अधिनियम की धारा 56 का व्यवस्थितिकरण, 24.1-24.3 आय की परिभाषा द्वारा विशिष्ट उद्देश्य के लिए संस्थापित कोष के लिए केंद्र सरकार सब्सिडी अथवा अनुदान अथवा नगद सहायता आदि की छूट, 44.1-44.3 विभिन्न प्रक्रिया और कागज रहित मूल्यांकन के स्वचालन के लिए कानूनी ढ़ाँचा मुहैया कराना |
| 6 | भारत में निवासी होने के लिए संघटित विदेशी कंपनी की स्थिति में अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का कार्यान्वयन के लिए समर्थकारी प्रावधान, 4.1-4.8 |
| 9 | "विशेष अधिसूचित क्षेत्र" में डायमंड ट्रेडिंग से संबंधित कुछ गतिविधियों के संबंध में छूट, 6.1-6.5 |
| 9क | विदेशी कोष के लिए विशेष कराधान व्यवस्था की शर्तों का संशोधन |
| 10 | भंडारण द्वारा विदेशी कंपनी की आय की छूट और सामरिक निधियों के भाग के तौर पर सुरक्षित क्रूड ऑयल की बिक्री, 5.1-5.4 व्यापारिक न्यास हेतु एक एसपीवी द्वारा किए गए वितरण पर लाभांश वितरण कर (डीडीटी) से छूट, 8.1-8.4 स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, 2015 का कर उपचार, 23.1-23.3, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र हेतु कर पहल, 27.1-27.9 राष्ट्रीय पेंशन योजना के कर उपचार का युक्तिकरण, प्राधिकृत भविष्य निधि और पेंशन कोष 31.1-31.4 |
| 10कक | कटौती और छूट की चरणबद्धता 34.1-34.3 |
| 17 | राष्ट्रीय पेंशन योजना के कर उपचार का युक्तिकरण, प्राधिकृत भविष्य निधि और पेंशन कोष 31.1-31.4 |
| 24 | ब्याज की कटौती के दावे के लिए स्वयं खरीदी गए गृह संपत्ति के अधिग्रहण और निर्माण के लिए समयवधि में वृद्धि, 51.1-51.3 |
| 25क | अज्ञात किराये और बकाया किराये के कराधान से संबंधित प्रावधानों का सरलीकरण और युक्तिकरण |
| 28 | गैर-प्रतिस्पर्धी शुल्क का कराधान और पेशे की स्थिति में विशेष अधिकार, 47.1-47.2 |
| 32 | विद्युत क्षेत्र के लिए धारा 32(1)(iiक) के अंतर्गत प्रारंभिक अतिरिक्त मूल्यह्रास के लाभ का विस्तारण, 35.1-35.3 कटौती और छूट की चरणबद्धता 34.1-34.3 |
| 32कग | धारा 23कग के अंतर्गत कर पहल के कार्यक्षेत्र का व्यवस्थितीकरण, 42.1-42.4 |
| 35 | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 35कखक | स्पेक्ट्रम की खरीद के लिए स्पेक्ट्रम शुल्क का ऋण परिशोधन, 36.1-36.4 |
| 35कग | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 35कघ | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 35गगग | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 35गगघ | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 36 | गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की स्थिति में क्षीण और संदेहात्मक ऋण के प्रावधान के संबंध में कटौती, 41.1-41.3 |
| 43ख | रेलवे को किए गए कुछ भुगतान सहित धारा 43ख के कार्यक्षेत्र का विस्तारण, 45.1-45.3 |
| 44कख | पेशे से आय वाले व्यक्तियों के लिए लेखांकन के लिए प्रारंभिक सीमा में विस्तारण, 39.1-39.3 |
| 44कघ | व्यापार से आय रखने वाले व्यक्तियों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना के लिए प्रारंभिक सीमा में बढ़ोत्तरी, 40.1-40.6 |
| 44कघक | पेशे से आय रखने वाले व्यक्तियों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना की प्रस्तावना, 38.1-38.5 |
| 47 | संप्रभु स्वर्ण बांड योजना, 2015 के लिए प्रावधान, 19.1-19.3 |
| 48 | संप्रभु स्वर्ण बांड योजना, 2015 के लिए प्रावधान, 19.1-19.3, रूपए मुद्रीकरण बांड हेतु कर लाभ के लिए प्रावधान, 20.1-20.2 |
| 50ग | धारा 50ग का युक्तिकरण यदि बिक्री प्रतिफल अचल संपत्ति के पंजीकरण की तिथि से पहले किए गए समझौते के अंतर्गत निश्चित हो, 29.1-29.4 |
| 54ड़ड़ | स्टार्ट अप के लिए कर पहल, 16.1-16.7 |
| 54छख | स्टार्ट अप के लिए कर पहल, 16.1-16.7 |
| 55 | गैर-प्रतिस्पर्धी शुल्क का कराधान और पेशे की स्थिति में विशेष अधिकार, 47.1-47.2 |
| 56 | आयकर अधिनियम की धारा 56 के अंतर्गत युक्तिकरण, 24.1-24.3 |
| 80 | आयकर अधिनियम की धारा 73क के अंतर्गत ऐसी हानि को अग्रेषित और पृथक करने के लिए समय-सीमा, 48.1-48.4 |
| 80गगघ | राष्ट्रीय पेंशन योजना के कर उपचार का युक्तिकरण, प्राधिकृत भविष्य निधि और पारितोषिक कोष, 31.1-31.4 |
| 80ड़ड़ | सभी के लिए घर को प्रोत्साहित करने के लिए पहल, 17.1-17.4 |
| 80छछ | धारा 80छछ के अंतर्गत दिए गए किराये के संबंध में स्वीकृत कटौती की सीमा का युक्तिकरण, 22.1-22.3 |
| 80झक | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 80झकख | स्टार्ट अप के लिए कर पहल, 16.1-16.7; कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 80झकग | स्टार्ट अप के लिए कर पहल, 16.1-16.7 |
| 80झख | कटौती और छूट की चरणबद्धता, 34.1-34.3 |
| 80झखक | सभी के लिए घर को प्रोत्साहित करने के लिए पहल, 17.1-17.4 |
| 80ञञकक | रोजगार पैदा करने के लिए कर प्रोत्साहन 18.1-18.5 |
| 87क | धारा 87क के अंतर्गत स्वीकृत आयकर में छूट की सीमा का युक्तिकरण |
| 92गक | कुछ मामलों में स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण अधिकारी हेतु समय-सीमा का विस्तार, 64.1- 64.3 |
| 92घ | बीर्इपीएस कार्य योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मास्टर फाइल, 13.1-13.10 |
| 111क | अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र हेतु कर पहल, 27.1-27.8 |
| 112 | धारा 112(1)(ग) के लिए शब्द 'असूचीबद्ध प्रतिभूतियों' की परिभाषा से संबंधित स्पष्टीकरण, 28.1-28.3 |
| 115खक | वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान विशेष मामलों में आयकर की वसूली और "अग्रिम कर" की गणना, "वेतन" से स्रोत पर आयकर की कटौती की दरें, 3.3.1-3.3.6 |
| 115खखघक | लाभांश के रूप में आय के कराधान का युक्तिकरण, 14.1-14.5 |
| 115खखड़ | अघोषित समझी गर्इ आय के समक्ष हानि को पृथक करने से संबंधित स्पष्टीकरण, 46.1-46.3 |
| 115खखच | 'पेटेंट' से आय का कराधान, 37.1-37.4 |
| 115ञख | 01.04.2015 से पहले की अवधि के लिए विदेशी कंपनियों पर न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) की प्रयोज्यता, 26.1-26.5; अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र हेतु कर पहल, 27.1-27.6; |
| 115ञज | भारत में निवासी होने के लिए संघटित विदेशी कंपनी की स्थिति में अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के क्रियान्वयन के लिए प्रावधानों का समर्थीकरण |
| 115-ण | अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र हेतु कर पहल, 27.1-27.6 |
| 115थक | शेयरधारकों के लिए वितरित आय पर कर, 9.1-9.6 |
| 115नक | प्रतिभूतिकरण न्यास तथा इसके निवेशकों के लिए नर्इ कराधान व्यवस्था, 10.1-10.5 |
| 115नग | प्रतिभूतिकरण न्यास तथा इसके निवेशकों के लिए नर्इ कराधान व्यवस्था, 10.1-10.5 |
| 115नगक | प्रतिभूतिकरण न्यास तथा इसके निवेशकों के लिए नर्इ कराधान व्यवस्था, 10.1-10.5 |
| 115नघ | कर लगाना जहां धर्मांर्थ संस्थान मौजूद न हो अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान में रूपांतरित हो गया हो, 11.1-11.4 |
| 115नड़ | कर लगाना जहां धर्मांर्थ संस्थान मौजूद न हो अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान में रूपांतरित हो गया हो, 11.1-11.4 |
| 115नच | कर लगाना जहां धर्मांर्थ संस्थान मौजूद न हो अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान में रूपांतरित हो गया हो, 11.1-11.4 |
| 115पक | व्यापारिक न्यास हेतु एक एसपीवी द्वारा किए गए वितरण पर लाभांश वितरण कर (डीडीटी) से छूट, 8.1-8.4 |
| 119 | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.14 |
| 124 | निर्धारण अधिकारी के क्षेत्राधिकार का धारण, 65.1-65.3 |
| 133ग | सूचना के इलैक्ट्रानिक प्रसंस्करण के कार्यक्षेत्र का विस्तार और सक्षम करने के लिए कानूनी ढ़ांचा, 66.1-66.6 |
| 139 | आयकर अधिनियम की धारा 73क के अंतर्गत ऐसी हानि को अग्रेषित और पृथक करने के लिए समय-सीमा, 48.1-48.4 |
| 143 | विभिन्न प्रक्रियाओं की स्वचालन के लिए कानूनी तंत्र मुहैया कराना और कागजरहित मूल्यांकन, 54.1-54.7 |
| 147 | सूचना के इलैक्ट्रानिक प्रसंस्करण के कार्यक्षेत्र का विस्तार और सक्षम करने के लिए कानूनी ढ़ांचा, 66.1-66.6 |
| 153 | मूल्यांकन, पुर्नमूल्यांकन और पुर्नगणना के लिए समय-सीमा का युक्तिकरण, 57.1-57.7 |
| 153ख | खोज के मामलों में मूल्यांकन के लिए समय-सीमा का युक्तिकरण, 58.1-58.3 |
| 192क | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194खख | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194ग | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194घ | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194घक | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194ड़ड़ | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194छ | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194ज | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194ट | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194टक | स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण, 49.1-49.2 |
| 194टखक | व्यापारिक न्यास हेतु एक एसपीवी द्वारा किए गए वितरण पर लाभांश वितरण कर (डीडीटी) से छूट, 8.1-8.4 |
| 194टखख | इसके निवेशकों को श्रेणी-I और श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष द्वारा भुगतान के संबंध में स्रोत पर कर कटौती प्रावधानों का युक्तिकरण, 12.1-12.6 |
| 194टखग | प्रतिभूतिकरण न्यास और इसके निवेशकों के लिए नर्इ कराधान व्यवस्था, 10.1-10.5 |
| 197 | इसके निवेशकों को श्रेणी-I और श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष द्वारा भुगतान के संबंध में स्रोत पर कर कटौती प्रावधानों का युक्तिकरण, 12.1-12.6 |
| 197क | किराया भुगतानों के लिए प्रपत्र 15छ/15ज को दाखिल करने को सक्षमीकरण, 50.1-50.4 |
| 206कक | कुछ गैर-निवासियों हेतु धारा 206कक के अन्तर्गत पैन की प्रस्तुति की अनिवार्यता से छूट, 43.1-43.3 |
| 206ग | वाहन, उत्पाद की बिक्री अथवा सेवाओं पर स्रोत पर कर कटौती, 33.1-33.6 |
| 211 | धारा 211 के अंतर्गत अनुसूचित अग्रिम कर भुगतान का युक्तिकरण और धारा 234ग के अंतर्गत ब्याज को वसूलना, 59.1-59.6 |
| 220 | धारा 273क, 273कक अथवा 220(2क) के अंतर्गत निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन जमा के लिए समय सीमा मुहैया कराना, 53.1-53.8 |
| 234ग | धारा 211 के अंतर्गत अनुसूचित अग्रिम कर भुगतान का युक्तिकरण और धारा 234ग के अंतर्गत ब्याज को वसूलना, 59.1-59.6 |
| 244क | प्रतिदाय पर ब्याज का भुगतान, 60.1-60.5 |
| 249 | नर्इ धारा को शामिल कर कुछ मामलों में जुर्माने और अभियोजन से रक्षा, 67.1-67.7 |
| 252 | अपीलीय न्यायाधिकरण से संबंधित प्रावधानों का युक्तिकरण, 61.1-61.13 |
| 253 | अपीलीय न्यायाधिकरण से संबंधित प्रावधानों का युक्तिकरण, 61.1-61.13, जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.14 |
| 254 | अपीलीय न्यायाधिकरण से संबंधित प्रावधानों का युक्तिकरण, 61.1-61.13 |
| 255 | अपीलीय न्यायाधिकरण से संबंधित प्रावधानों का युक्तिकरण, 61.1-61.13 |
| 270क | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.15 |
| 270कक | नर्इ धारा को शामिल कर कुछ मामलों में जुर्माने और अभियोजन से रक्षा, 67.1-67.7 |
| 271 | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.15 |
| 271क | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.15 |
| 271कक | बीर्इपीएस कार्रवार्इ योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मुख्य फाइल , 13.1-13.10; जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.15 |
| 271ककक | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.16.3 |
| 271छख | बीर्इपीएस कार्रवार्इ योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मुख्य फाइल, 13.1-13.10 |
| 272क | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.17.5 |
| 273क | धारा 273क, 273कक अथवा 220(2क) के अंतर्गत निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन जमा के लिए समय सीमा उपलब्ध कराना, 53.1-53.8; जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.14 |
| 273ख | बीर्इपीएस कार्रवार्इ योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मुख्य फाइल , 13.1-13.10 |
| 273कक | धारा 273क, 273कक अथवा 220(2क) के अंतर्गत निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन जमा के लिए समय सीमा देना, 53.1-53.8 |
| 276ग | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.14 |
| 279 | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.14 |
| 281ख | धारा 281ख के अंतर्गत बैंक गांरटी के लिए प्रावधान, 63.1-63.8 |
| 282क | विभिन्न प्रक्रियाओं की स्वचालन के लिए कानूनी तंत्र मुहैया कराना और कागजरहित मूल्यांकन, 54.1-54.7 |
| 286 | बीर्इपीएस कार्रवार्इ योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मुख्य फाइल , 13.1-13.10 |
| 288 | जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण, 62.1-62.17.5 |
| अध्याय VIII | समकरण उदग्रहण, 32.1-32.8 |
| अध्याय X | प्रत्यक्ष कर विवाद समाधान योजना, 2016, 68.1-68.10 |
1. प्रस्तावना
1.1 वित्त अधिनियम, 2016 (तत्पश्चात् 'अधिनियम' के तौर पर संदर्भित), संसद द्वारा पारितानुसार, 14 मर्इ, 2016 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुर्इ तथा 2016 की अधिनियम सं. 28 के तौर पर अधिनियमित किया गया है। यह परिपत्र प्रत्यक्ष करों से संबंधित अधिनियम के प्रावधानों के अवयवों को स्पष्ट करता है।
2. अधिनियम द्वारा किए गए परिवर्तन
2.1 अधिनियम में शामिल है—
(i) निर्धारण वर्ष 2017-18 के लिए आयकर की दरें तथा उसके आधार पर आयकर की दरें जो कर को स्रोत पर काटा जाना है तथा अग्रिम कर का भुगतान वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान किया जाना है, निर्दिष्ट करें;
(ii) आयकर अधिनियम, 1961 ('आयकर अधिनियम') की संशोधित धारायें 2, 6, 9, 9क, 10, 10कक, 17, 24, 25क, 28, 32, 32कग, 35, 35कग, 35कघ, 35गगग, 35गगघ, 36, 43ख, 44कख, 44कघ, 47, 48, 50ग, 54छख, 55, 56, 80, 80गगघ, 80छछ, 80झक, 80झकग, 80झख, 80झखक, 87क, 92गक, 92घ, 111क, 112, 115खखड़, 115ञख, 115ण, 115थक, 115नक, 15नग, 115नघ, 115नड़, 115नच, 115पक, 119, 124, 133ग, 139, 143, 147, 153, 153ख, 192क, 194खख, 194ग, 194घ, 194घक, 194ड़ड़, 194छ, 194ज, 194ट, 194ठ, 194ठक, 194ठखक,194ठखख, 197, 197क, 206कक, 206ग, 211, 220, 234ग, 244क, 249, 252, 253, 254, 255, 271, 271क, 271कक, 277ककक, 272क, 273क, 273ख, 273कक, 276ग, 281ख, 282क और 288;
(iii) आयकर अधिनियम की धाराएं 80ड़ड़, 80ञञकक और 153ख के लिए प्रतिस्थानिक नर्इ धाराएं;
(iv) आयकर अधिनियम, 1961 में शामिल नर्इ धाराएं 35कखक, 44कघक, 54ड़ड़, 80झकग, 80झखक, 115खक, 115खखघक, 115खखच, 115नगक, 194ठखग, 270क, 270कक, 271छख और 286;
(v) आयकर अधिनियम में धारा 115ञज सन्निहित शामिल अध्याय XII-खग;
(vi) र्इ-कॉमर्स लेनदेनों पर समकरण, अध्याय VIII द्वारा प्रस्तुत;
(vii) मुकद्मेबाजी को कम करने और इसके बकाया को तुरंत देने के लिए सरकार को सक्षम करने के लिए प्रत्यक्ष कर विवाद समाधान योजना, 2016, अध्याय X द्वारा प्रस्तुत।
3. दर ढ़ांचा
3.1 निर्धारण वर्ष 2016-17 के लिए कर हेतु आय देयता के संबंध में आयकर की दरें
3.1.1 निर्धारण वर्ष 2016-17 के लिए कर हेतु देयता की समस्त निर्धारिती श्रेणियों की आय के संबंध में आयकर की दरें अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग I में निर्दिष्ट की गर्इ हैं। यह दरें वही दरें हैं जैसी वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान कुछ मामलों में देययोग्य कर की वसूली तथा "वेतन" से स्रोत पर कर कटौती, "अग्रिम कर" की गणना के प्रयोजन के लिए वित्त अधिनियम, 2015 हेतु प्रथम अनुसूची के भाग III में निर्धारित हैं।
कथित भाग I में निर्दिष्ट दरों के प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं :
3.1.2 व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार (एचयूएफ), व्यक्तियों का संघ, व्यक्ति अथवा कृत्रिम विधिक व्यक्ति की निकाय
प्रथम अनुसूची के भाग I के पैराग्राफ क की आयकर की दरों के संबंध में निम्नानुसार व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का संघ, व्यक्ति अथवा कृत्रिम विधिक व्यक्ति की निकाय (सहकारी सोसाइटी, फर्म, स्थानीय प्राधिकारी तथा कंपनी को छोड़कर) को निर्दिष्ट करता है
| कर हेतु प्रभारिेत आय | आयकर की दरें | ||
| व्यक्ति (भारत में वरिष्ठ नागरिक अति वरिष्ठ नागरिक को छोड़कर), एचयूएफ, व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों की निकाय तथा कृत्रिम विधिक व्यक्ति | व्यक्ति, भारत में निवासी, जिसकी आय साठ वर्ष अथवा उससे अधिक की है लेकिन अस्सी वर्षों से कम है (वरिष्ठ नागरिक) | निवासी व्यक्ति, भारत में निवासी, जो अस्सी वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के हैं (अति वरिष्ठ नागरिक) | |
| रू. 2,50,000 तक | शून्य | शून्य | शून्य |
| रू. 2,50,001 - रू. 3,00,000 | 10 प्रतिशत | ||
| रू. 3,00,001 - रू. 5,00,000 | 10 प्रतिशत | ||
| रू. 5,00,001 - रू. 10,00,000 | 20 प्रतिशत | 20 प्रतिशत | 20 प्रतिशत |
| रू. 10,00,000 से अधिक | 30 प्रतिशत | 30 प्रतिशत | 30 प्रतिशत |
ऐसी आंके गए आयकर की राशि एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाले व्यक्ति की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी। हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगा।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर कहा जाता है।
शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी
उदाहरण के लिए, यदि साठ वर्ष की आयु से कम के एक व्यक्ति की आय रू. 1,01,00,000 है तथा आंका गया आयकर रू. 28,55,000 है तो ऐसे कर के बारह प्रतिशत की दर पर आयकर पर अधिभार रू. 3,42,600 है। यद्यपि अधिभार सहित कुल आयकर सीमांत राहत को उपलब्ध कराए बिना रू. 31,97,600 है। सीमांत राहत को मुहैया कराने पर, अधिभार सहित आयकर रू. 29,55,000 होगा। तब दो प्रतिशत का शिक्षा उपकर रू. 29,55,000 पर आंका जाना है जो रू. 59,100 समझा जाएगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को भी अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर कहा जाता है जो आयकर की वर्तमान स्थिति में रू. 29,55,000 है जो रू. 29,550 के आस-पास होगा। यद्यपि, आंके गए कर की राशि रू. 29,55,000 है, दो प्रतिशत का शिक्षा उपकर रू. 59,100 है, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा रू. 29,550 है। इस मामले में कुल अधिभारत रू. 88,650 (अर्थात् रू. 59,100 + 29,550) होगा। ऐसे अधिभार के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.1.3 सहकारी संस्थाएं
प्रत्येक सहकारी संस्था के संबंध में, आयकर की दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग I के पैराग्राफ ख में निर्दिष्ट किया गया है। दरें निम्नानुसार हैं :-
| कर हेतु वसूलनीय राशि | कर |
| रू. 10,000 तक | 10 प्रतिशत |
| रू. 10,001-रू. 20,000 | 20 प्रतिशत |
| रू. 20,000 से अधिक | 30 प्रतिशत |
ऐसी आंकी गर्इ राशि को एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाली सहकारी संस्था की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा। हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक हैं, की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल आय से अधिक नहीं होगी।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक शिक्षा उपकर के तौर पर पहचाने जाने वाले अतिरिक्त अधिभार द्वारा और बढ़ाया जाएगा।
शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.1.4 फर्म
प्रत्येक फर्म की स्थिति में, तीस प्रतिशत आयकर की दर को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग I पैराग्राफ ग में निर्दिष्ट किया गया है।
ऐसी आंके गए आयकर की राशि एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाली फर्म की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी। हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक हैं की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगा।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर कहा जाता है।
शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.1.5 स्थानीय प्राधिकरण
प्रत्येक स्थानीय निकायों के संबंध में, आयकर की दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग I के पैराग्राफ घ में तीस प्रतिशत पर निर्दिष्ट किया गया है।
ऐसी आंके गए आयकर की राशि एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाले स्थानीय प्राधिकरण की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी। हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगा।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर कहा जाता है।
शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.1.6 कंपनियां - कंपनी की स्थिति में, आयकर की दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग I के पैराग्राफ ड़ में निर्दिष्ट किया गया है।
घरेलू कंपनी की स्थिति में, आयकर की दर कुल आय का तीस प्रतिशत है। आंके गए कर को सात प्रतिशत अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जहां ऐसी घरेलू कंपनी की कुल आय एक करोड़ रूपए से अधिक हो लेकिन दस करोड़ रूपए से अधिक न हो। दस प्रतिशत पर की दर पर अधिभार लगाया जाएगा यदि कंपनी की कुल आय दस करोड़ रूपए से अधिक हो।
घरेलू कंपनी को छोड़कर कंपनी की स्थिति में, 31.3.1961 के पश्चात् किंतु 1.4.1976 से पूर्व किए गए अनुमोदित समझौते के अंतर्गत सरकार अथवा भारतीय कंपनी द्वारा प्राप्त रॉयल्टी पचास प्रतिशत पर कराधान होगी। उसी प्रकार, 29.2.1964 के पश्चात् किंतु 1.4.1976 से पूर्व किए गए अनुमोदित समझौते के अंतर्गत सरकार अथवा भारतीय कंपनी द्वारा ऐसी कंपनी से प्राप्त तकनीकी सेवा के लिए शुल्क पर पचास प्रतिशत का कर लगाया जाएगा। ऐसी कंपनी की कुल आय के शेष पर कर दर चालीस प्रतिशत होगी। आंका गया कर दो प्रतिशत के अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जहां ऐसी कंपनी की कुल आय एक करोड़ रूपए से अधिक है किंतु दस करोड़ से अधिक न हो। पाच प्रतिशत की दर पर अधिभार लगाया जाएगा यदि घरेलू कंपनी कंपनी को छोड़कर कंपनी की कुल आय दस करोड़ रूपए से अधिक होती है।
हालांकि, सीमांत राहत यह सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक कंपनी की स्थिति में स्वीकृत होगी कि—
(i) एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक न हो,
(ii) दस करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि, जो दस करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में दस करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक न हो,
आयकर पर शिक्षा उपकर प्रत्येक कंपनी की स्थिति में अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। साथ ही, ऐसे कर तथा अधिभार की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित आंके गए कर की राशि के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर कहा जाता है। शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.2 वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान कुछ आय से स्रोत पर आयकर की कटौती की दरें
3.2.1 प्रत्येक मामले में जिसमें आयकर अधिनियम की धारा 193, 194, 194क, 194ख, 194खख, 194घ, 194ठखक, 194ठखख, 194ठखग तथा 195 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रभावी दरों पर कर कटौती की जानी है, वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान स्रोत पर आयकर की कटौती के लिए दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग II में निर्दिष्ट किया गया हैं। वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान स्रोत पर आयकर की कटौती के लिए दरें वही रहेगी जैसी वित्त अधिनियम, 2015 की प्रथम अनुसूची के भाग II में निर्दिष्ट हैं। निवासी (कंपनी को छोड़कर) को दिए गए बीमा कमीशन के रूप में आय के रूप में भुगतान की स्थिति को छोड़कर, दर दस प्रतिशत की तुलना में ऐसी आय की पांच प्रतिशत होगी।
3.2.2 अधिभार
निम्नलिखित मामलों में स्रोत पर कर कटौती नीचे दिए गए संभव संकेत के उद्देश्यों के लिए अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी:
(i) प्रत्येक गैर-निवासी व्यक्ति (कंपनी को छोड़कर) की स्थिति में, अधिभार की दर,
(क) व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार, व्यक्तियों के संघ, व्यक्तियों की निकाय अथवा कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति की स्थिति में ऐसे कर का पंद्रह प्रतिशत;
(ख) फर्म अथवा सहकारी संस्था की स्थिति में बारह प्रतिशत जहां ऐसी आय अथवा कुल आय को दिया गया हो अथवा दिए जाने की संभावना हो तथा एक करोड़ से जमा पर कटौती का विषय हो।
(ii) विदेशी कंपनियों को किए गए भुगतान की स्थिति में, अधिभार की दर ऐसे आयकर का दो प्रतिशत है जहां ऐसी दी गर्इ अथवा दी जाने वाली आय तथा कटौती के अनुसार कुल राशि एक करोड़ रूपए से अधिक हो किंतु दस करोड़ रूपए से अधिक न हो। यदि जहां ऐसी आय अथवा ऐसी आय की कुल राशि का भुगतान विदेशी कंपनी को किया हो अथवा किया जाना हो तथा कटौती के अनुसार दस करोड़ रूपए से अधिक हो, तो अधिभार की दर पांच प्रतिशत है।
(iii) स्रोत पर कर कटौती पर कोर्इ अधिभार एक निवासी, हिंदु अविभाजित परिवार, व्यक्तियों के संघ, व्यक्तियों की निकाय, कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति, सहकारी संस्था, स्थानीय प्राधिकारी, अथवा एक व्यक्ति के तौर पर फर्म अथवा एक घरेलू कंपनी की स्थिति में नहीं लगाया जाएगा।
3.2.3 शिक्षा उपकर -
आयकर पर शिक्षा उपकर आयकर और अधिभार, यदि हो, के दो प्रतिशत की संयुक्त दर के लिए लगाया जाना जारी रहेगा। उदाहरण के लिए, विदेशी कंपनी की आय की राशि रू. 1,20,00,000/- हो और कर ऐसी विदेशी कंपनी से कटौती 10 प्रतिशत की दर से रू. 12,00,000/- हो तो ऐसे कर पर दो प्रतिशत की दर पर अधिभार रू. 24,000/- होगा, कर कटौती तथा अधिभार पर शिक्षा उपकर (रू. 12,00,000 + रू. 24,000/- = रू. 12,24,000/- ) रू. 24,480 होगी।
इसके अतिरिक्त, काटे गए कर की राशि तथा अधिभार को अतिरिक्त अधिभार द्वारा आगे बढ़ाया जाएगा जिसे ऐसे समस्त मामलों में एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा अधिभार कहा जाएगा। इसलिए, पूर्व उदाहरण में, जहां काटे गए कर की राशि रू. 12,00,000 है तो अधिभार रू. 24,000 है, कथित माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर रू. 12,24,000 पर एक प्रतिशत की दर से आंका जाएगा जो रू. 12,240 समझा जाएगा। इसलिए इस मामले में कुल अधिभार रू. 36,720 (अर्थात् 24,480 रू. 12,240) होगा
3.3 वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान विशेष परिस्थतियो में आयकर वसूली तथा "अग्रिम कर" की गणना, "वेतन" से स्रोत पर आयकर कटौती के लिए दरें
3.3.1 वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान अग्रिम कर की गणना तथा 'वेतन' द्वारा स्रोत पर आयकर कटौती के लिए दरें अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग III में निर्दिष्ट की गर्इ है। यह दरें उन मामलों में वर्तमान आय पर वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान आयकर वसूली के लिए भी प्रयोज्नीय हैं जहां त्वरित मूल्याकंन किया जाना है, उदाहरण गैर-निवासियों हेतु भारत में उत्पन्न शिपिंग लाभ का अनंतिम मूल्यांकन, उस वित्त वर्ष के दौरान अनुकूलता के लिए भारत छोड़ने वाले व्यक्तियों को मूल्यांकन, व्यक्तियों का मूल्यांकन जिसके कर परिहार के लिए उचित स्थानांतरण करना आपेक्षित हो, अल्प अवधि आदि के लिए बनार्इ गर्इ निकाय का मूल्यांकन आदि। दरें निम्नानुसार हैं :
3.3.2 व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों का निकाय अथवा कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति
प्रथम अनुसूची के भाग III का पैराग्राफ क व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों की निकाय अथवा कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति (सहकारी संस्था, फर्म, स्थानीय प्राधिकारी तथा कंपनी को छोड़कर) की स्थिति में आयकर की दरों को निर्दिष्ट करता हैं। मूल छूट सीमा, कर की दरों और विभिन्न श्रेणियों के लिए आयकर की स्लैब वही रहेंगी जैसी वित्त वर्ष 2015-16 में थी। वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान कर की दरें निम्नानुसार है। :—
| कर हेतु प्रभारित आय | आयकर की दरें | ||
| व्यक्ति (वरिष्ठ नागरिक अति वरिष्ठ नागरिक को छोड़कर), एचयूएफ, व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों की निकाय तथा कृत्रिम विधिक व्यक्ति | व्यक्ति, भारत में निवासी, जिसकी आयु साठ वर्ष अथवा उससे अधिक की है लेकिन अस्सी वर्षों से कम है (वरिष्ठ नागरिक) | व्यक्ति, भारत में निवासी, जो अस्सी वर्ष अथवा उससे अधिक आयु का है (अति वरिष्ठ नागरिक) | |
| रू. 2,50,000 तक | शून्य | शून्य | शून्य |
| रू. 2,50,001 - रू. 3,00,000 | 10 प्रतिशत | ||
| रू. 3,00,001 - रू. 5,00,000 | 10 प्रतिशत | ||
| रू. 5,00,001 - रू. 10,00,000 | 20 प्रतिशत | 20 प्रतिशत | 20 प्रतिशत |
| रू. 10,00,000 से अधिक | 30 प्रतिशत | 30 प्रतिशत | 30 प्रतिशत |
ऐसे आंके गए आयकर की राशि ऐसे आयकर के पंद्रह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी यदि व्यक्ति की स्थिति में ऐसा आयकर वित्त वर्ष 2015-16 के लिए बारह प्रतिशत की दर के समक्ष एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाले व्यक्तियों की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर बढ़ार्इ जाएगी।
हालांकि, एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि आय जो एक करोड़ रूपए से अधिक हो, की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगी।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर कहा जाता है। शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.3.3 सहकारी संस्थाएं
प्रत्येक सहकारी संस्थाओं के संबंध में, आयकर की दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग III के पैराग्राफ ख में निर्दिष्ट किया गया है। दरें निम्नानुसार है :-
| कर हेतु वसूलनीय राशि | दर |
| रू. 10,000 तक | 10 प्रतिशत |
| रू. 10,001-रू. 20,000 | 20 प्रतिशत |
| रू. 20,000 से अधिक | 30 प्रतिशत |
ऐसी आंकी गर्इ राशि को एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाली सहकारी संस्था की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ाया जाना जारी रहेगा जाएगा।
हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य राशि राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है, की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल आय से अधिक नहीं होगी।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक शिक्षा उपकर के तौर पर पहचाने जाने वाले अतिरिक्त अधिभार द्वारा और बढ़ाया जाएगा।
3.3.4 फर्म
प्रत्येक फर्म की स्थिति में, तीस प्रतिशत आयकर की दर को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग III पैराग्राफ ग में निर्दिष्ट किया गया है।
ऐसी आंके गए आयकर की राशि एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाली फर्म की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी।
हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक हैं की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगा।
आयकर पर शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर दो प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। इसके अतिरिक्त, आंके गए कर की राशि को अतिरिक्त अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जिसे अधिभार सहित ऐसे आयकर के एक प्रतिशत की दर पर आयकर पर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर कहा जाता हैं। शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नही होगी।
3.3.5 स्थानीय प्राधिकरण
प्रत्येक स्थानीय निकाय के संबंध में, आयकर की दर को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग III के पैराग्राफ घ में तीस प्रतिशत पर निर्दिष्ट किया गया है।
ऐसी आंके गए आयकर की राशि एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय वाले स्थानीय प्राधिकरण की स्थिति में ऐसे आयकर के बारह प्रतिशत की दर पर अधिभार द्वारा बढ़ार्इ जाएगी।
हालांकि, सीमांत राहत उपलब्ध होगी जिससे एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल आय पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक नहीं होगा।
आयकर पर शिक्षा उपकर और आयकर माध्यमिक और उच्च शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर क्रमश: दो प्रतिशत तथा एक प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नही। होगी।
3.3.6 कंपनियां
प्रत्येक कंपनी की स्थिति में, आयकर की दरों को अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग III के पैराग्राफ ड़ में निर्दिष्ट किया गया है। घरेलू कंपनी की स्थिति में, आयकर की दर कुल आय का उन्नतीस प्रतिशत है। यदि पिछले वर्ष 2014-15 में कंपनी का कुल कारोबार अथवा सकल प्राप्ति पांच करोड़ रूपए से अधिक न हो और अन्य सभी मामलों में, आयकर की दर कुल आय का तीस प्रतिशत हो।
उत्पाद अथवा वस्तु के विनिर्माण अथवा उत्पादन के एकमात्र व्यापार में संलग्न नर्इ घरेलू कंपनी को स्थापित करने के लिए राहत पहुंचाने के लिए एक नर्इ धारा 115खक को यह मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है कि 1 अप्रैल, 2017 को अथवा उसके बाद प्रारंभ किसी पिछले प्रासंगिक वर्ष के लिए एक घरेलू कंपनी की कुल आय के संबंध में देययोग्य आयकर कंपनी के विकल्प पर 25 प्रतिशत की दर पर आंकी जाएगी यदि, —
(i) कंपनी को 1 मार्च, 2016 को अथवा उसके बाद स्थापित तथा पंजीकृत किया गया हो;
(ii) कंपनी उत्पाद अथवा वस्तु के विनिर्माण अथवा उत्पादन के व्यापार में संलग्न हो और किसी अन्य व्यापार में संलग्न न हो;
(iii) कंपनी ने इसकी कुल आय की गणना के दौरान धारा 10कक के अंतर्गत किसी लाभ, संवृद्ध मूल्यह्रास का लाभ, अतिरिक्त मूल्यह्रास का लाभ, निवेश भत्ता, वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय और धारा 80ञञकक को प्रावधानों को छोड़कर अध्याय VI-क के भाग ग के अंतर्गत कुछ आय संबंधो में किसी कटौती का दावा नहीं किया है।
(iv) विकल्प आय की विवरणी की प्रस्तुति की देय तिथि से पहले निर्धारित तरीके में प्रस्तुत किया जाता है।
आंके गए कर सात प्रतिशत के अधिकर द्वारा बढ़ाया जाएगा जहां ऐसी घरेलू कंपनी की कुल आय एक करोड़ रूपए से अधिक है लेकिन दस करोड़ से अधिक नहीं। बारह प्रतिशत की दर पर अधिकर लगाया जाना जारी रहेगा यदि कंपनी की कुल आय दस करोड़ से अधिक होती है।
घरेलू कंपनी को छोड़कर कंपनी की स्थिति में, 31.03.1961 के पश्चात् किंतु 1.4.1976 से पूर्व किए गए अनुमोदित समझौते के अंतर्गत सरकार अथवा भारतीय कंपनी द्वारा प्राप्त रॉयल्टी पचास प्रतिशत पर कराधान होगी। उसी प्रकार, 29.02.1964 के पश्चात् किंतु 01.04.1976 से पूर्व किए गए अनुमोदित समझौते के अंतर्गत सरकार अथवा भारतीय कंपनी द्वारा ऐसी कंपनी से प्राप्त तकनीकी सेवा के लिए शुल्क पर पचास प्रतिशत का कर लगाया जाएगा। ऐसी कंपनी की कुल आय के शेष पर कर दर चालीस प्रतिशत होगी। आंका गया कर दो प्रतिशत के अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा जहां ऐसी कंपनी की कुल आय एक करोड़ रूपए से अधिक है किंतु दस करोड़ से अधिक न हो। पाच प्रतिशत की दर पर अधिभार लगाया जाएगा यदि घरेलू कंपनी कंपनी को छोड़कर कंपनी की कुल आय दस करोड़ रूपए से अधिक होती है।
हालांकि, सीमांत राहत यह सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक कंपनी की स्थिति में स्वीकृत होगी कि
(i) एक करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि राशि जो एक करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में एक करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक न हो,
(ii) दस करोड़ रूपए से अधिक की कुल आय पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि, राशि जो दस करोड़ रूपए से अधिक है की राशि की तुलना में दस करोड़ रूपए की कुल राशि पर आयकर तथा अधिभार के तौर पर देययोग्य कुल राशि से अधिक न हो।
आयकर पर शिक्षा उपकर और आयकर माध्यमिक और उच्च शिक्षा उपकर अधिभार सहित आंके गए कर की राशि पर क्रमश: दो प्रतिशत तथा एक प्रतिशत की दर पर लगाया जाना जारी रहेगा। शिक्षा उपकर तथा माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा उपकर के संबंध में कोर्इ सीमांत राहत उपलब्ध नहीं होगी।
3.4 अतिरिक्त आयकर पर अधिभार
जहां आयकर अधिनियम की धारा 115ण अथवा धारा 115 धक अथवा धारा 115द की उप-धारा (2) अथवा धारा 115नक अथवा धारा 115नघ के अंतर्गत अतिरिक्त आयकर दिया जाना है, अर्थात् कुछ न्यासों को अभिवृद्ध आय पर अथवा इसके निवेशकों को प्रतिभूतिकरण न्यास द्वारा आय के वितरण पर अथवा इसके इकार्इ धारकों को म्यूचुअल फंड द्वारा आय के वितरण पर अथवा शेयरधारक द्वारा शेयरों की पुन: खरीद पर कंपनी द्वारा आय के वितरण अथवा घरेलू कंपनियों द्वारा लाभांश के वितरण पर, ऐसा देययोग्य अतिरिक्त कर ऐसे कर के बारह प्रतिशत के अधिभार द्वारा बढ़ाया जाएगा।
4. भारत में निवासित होने वाली विदेशी कंपनी की स्थिति में अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के क्रियान्वयन के लिए समर्थकारी प्रावधान
4.1 आयकर अधिनियम की धारा 6 को उन स्थितियों के लिए मुहैया कराया गया है जिसमें भारत में निवासी व्यक्तियों की विभिन्न श्रेणियों में निर्धारित होता है। धारा 6(3) किसी पिछले वर्ष में भारत में निवासी के तौर पर समझे जाने वाली कंपनी के लिए पूरी होने वाली शर्तों के साथ व्यवहार करता है। वित्त अधिनियम, 2015 द्वारा धारा 6(3) के संशोधन से पहले, एक कंपनी को किसी पिछले वर्ष में भारत में निवासी होना कहा जाएगा यदि यह भारतीय कंपनी थी और उस वर्ष के दौरान इसके मामलों का नियंत्रण और प्रबंधन भारत में पूरी तरह से स्थित था।
4.2 वित्त अधिनियम, 2015 उक्त प्रावधानों को संशोधित करती है जिससे मुहैया कराया जा सके कि एक कंपनी किसी पिछले वर्ष में भारत में निवासी होना समझा जाएगा यदि यह भारतीय कंपनी हो अथवा उस वर्ष में प्रभावी प्रबंधन को स्थान (पीओर्इएम) भारत में हो। पीओर्इएम को परिभाषित करने का अर्थ था कि एक स्थान जहां प्रमुख प्रबंधन और वाणिज्यिक निर्णय जो पूर्ण के रूप में व्यापार करने के लिए आवश्यक है, कृत्रिम अर्थ में है।
4.3 निवासीय नियम पर आधारित पीओर्इएम के क्रियान्वयन के संदर्भ में, कंपनी, जो भारत से बाहर निगमित है और पहले भारत में कर हेतु मूल्यांकित नहीं हुर्इ है, हेतु आयकर अधिनियम के वर्तमान प्रावधानों की प्रयोज्यता से संबंधित कुछ मामले उठाए जा चुके हैं। विशेषकर, अग्रिम कर भुगतान, टीडीएस प्रावधानों की प्रयोज्यता, कुल आय की गणना, हानि का पृथकीकरण और स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण व्यवस्था की प्रयोज्यता का तरीका से संबंधित आयकर के विशिष्ट प्रावधानों की प्रयोज्यता से संबंधित मुद्दे। इन प्रावधानों की अनुपालन अनिवार्यता है जिसे ऐसी कंपनी के निगमन के राष्ट्र के कर कानूनों के अंतर्गत ऐसी किसी अनिवार्यता की गैर-मौजूदगी के कारण प्रासंगिक समय में कपनी द्वारा किया गया होता। इसी प्रकार मूल्यह्रास की गणना का मुद्दा भी उठता है जब इसे पहले के वर्षों में यह आयकर अधिनियम के अंतर्गत गणना के अनुसार नहीं किया गया है।
4.4 रेखांकित समस्या भी इस तथ्य के कारण उत्पन्न हुर्इ कि एक कंपनी भारत में अनिवासित विदेशी होने का दावा कर सकती है लेकिन मूल्यांकन की अवधि में, यह भारत में तथ्य के तौर पर पीओर्इएम पर आधारित निवासी होने के तौर पर संघटित होती है। यह निर्धारण पिछले वर्ष की समाप्ति के बाद निर्धारित होगा और कर्इ प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं करने के लिए कंपनी हेतु संभव नहीं हो सकता। हितधारकों द्वारा प्रतिनिधित्व भी किया गया है कि पीओर्इएम का क्रियान्वयन वर्ष द्वारा स्थगित है, जिसके द्वारा दिशानिर्देशों से संबंधित समय स्पष्टीकरण और आयकर अधिनियम के अन्य प्रावधानों की प्रयोज्यता स्थापित होगा।
4.5 निवास के पीओर्इएम आधारित नियम के क्रियान्वयन के संबंध में स्पष्टीकरण प्रदान करने के लिए और हितधारकों की चिंताओं को संबोधित करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 6 के लिए संशोधन और वित्त अधिनियम, 2015 की धारा 4 बनार्इ गर्इ है। ये संशोधन किए गए हैं जिससे एक वर्ष में निवास आधारित पीओर्इएम की प्रयोज्यता का स्थगन और पीओर्इएम पर आधारित अधिनिवास का निर्धारण 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा। आगे, धारा 115ञज सहित एक नया अध्याय XII-खग को आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है। आयकर अधिनियम की धारा 115ञज के प्रावधान निम्नानुसार हैं :
(क) एक कंपनी, जिसे भारत से बाहर निगमित किया गया है और भारत में कर के लिए पहले मूल्यांकिन नहीं हुर्इ है, के लिए परिवर्तकाल तंत्र मुहैया कराना। केंद्र सरकार को उसके अनुसार अपवाद, संशोधन और अनुकूलन को अधिसूचित करने के लिए सशक्त किया गया है जिसके अनुसार आय की गणना, अनवशोषित मूल्यह्रास का उपचार, पृथकीकरण अथवा अग्रेषण और हानि का पृथकीकरण, कर के परिहार से संबंधित विशेष प्रावधान और करों के संग्रहण और वसूली से संबंधित आयकर अधिनियम के प्रावधान उन मामलों में लागू होंगे जहां एक विदेशी कंपनी को पहली बार के लिए भारत में इसके पीओर्इएम के कारण भारत में निवासी होने के तौर पर कहा जाता है और कथित कंपनी जो पहले कभी भारत में निवासी नहीं हो।
(ख) बशर्ते कि यह परिवर्तनकाल प्रावधान एक मूल्यांकन प्रक्रिया में पीओर्इएम के निर्धारण की तिथि तक किसी बाद के वर्ष को भी कवर करती हो। हालांकि, परिवर्तनकाल को एक बार पूरा होने पर आयकर अधिनियम के सामान्य प्रावधान लागू होंगे।
(ग) बशर्ते कि अधिसूचना में, प्रक्रियात्मक शर्तों, जिसके अनुसार यह अनुकूलन लागू होगा, सहित कुछ शर्तें मुहैया करार्इ जा सकती है और शर्तों का अनुपालन न करने पर, ऐसी अधिसूचना का लाभ विदेशी कंपनी के लिए उपलब्ध नहीं होगा।
(घ) बशर्ते कि केंद्र सरकार द्वारा इस अधिकार के प्रयोग में जारी प्रत्येक अधिसूचना संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष प्रस्तुत होगी।
4.6 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
5. भंडारण से विदेशी कंपनी की आय की छूट और रणनीतिक आरक्षण के भाग के तौर पर क्रूड ऑयल भंडारण
5.1 आयकर अधिनियम की धारा 5 को कुल आय के कार्यक्षेत्र के लिए मुहैया कराया गया है। गैर-निवासी की स्थिति में, आय के कराधान तभी होगा यदि आय भारत में उपार्जित अथवा अर्जित हो अथवा इसे भारत में उपार्जित अथवा अर्जित समझा जाए। आयकर अधिनियम की धारा 9 को उन परिस्थितियों के लिए उपलब्ध कराया गया है जिसमें आय भारत में उत्पन्न अथवा उपार्जित समझी जाती है। भारत में उपार्जित अथवा अर्जित समझे जाने वाली आय के लिए उपलब्ध करार्इ गर्इ एक परिस्थिति भारत में संबंधित व्यापार के द्वारा अथवा के माध्यम से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होती है।
5.2 रणनीतिक आरक्षण के भाग के तौर पर कच्चे तेल के भंडारण के लिए भूमिगत भंडारण सुविधा का स्थापन तथा अनुरक्षण भारत के राष्ट्रीय हित में है और भारतीय तेल कंपनियों के लिए मूल्य निश्चितता को सुनिश्चित करती है। ऐसी सुविधा की भरपाई लागत अत्यधिक बोझ पर जोर देता है। सरकार ने भारत से बाहर कच्चे तेल के भंडारण और विक्रय करने वाली विदेशी राष्ट्र तेल कंपनियां (एनओसी) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) सहित निजी कंपनियों की भागीदारी के माध्यम से वित्तीय बोझ के पर्याप्त भाग को पूरा करने की संभावना को खोजा है। हालांकि, एनओसी/एमएनसी द्वारा कच्चे तेल का भंडारण और भारत में इसकी बिक्री इन उद्यमों के लिए कर देयता को विकसित करती है।
5.3 भारत में अपने कच्चे तेल का भंडारण के लिए एनओसी और एमएनसी को प्रोत्साहित करने के लिए कराधान की शर्तों में तटस्था के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 10 के प्रावधान को यह संशोधित करने के लिए मुहैया कराया गया है कि भारत में सुविधा में कच्चे तेल के भंडारण के कारण विदेशी कंपनी हेतु अर्जित अथवा उपार्जित कोर्इ आय और भारत में निवासित किसी व्यक्ति के लिए वहां से कच्चे तेल की बिक्री कुल आय में शामिल नहीं होगी यदि -
(i) विदेशी कंपनी द्वारा ऐसा भंडारण और बिक्री केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित अथवा केंद्र सरकार द्वारा किए गए समझौते अथवा व्यवस्था के अनुसार है; और
(ii) राष्ट्रीय हित के संबंध में, विदेशी कंपनी और समझौता अथवा व्यवस्था इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित हो।
5.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2016 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2016-17 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
6. "विशेष अधिसूचित क्षेत्र" में डायमंड ट्रेडिंग से संबंधित कुछ गतिविधि के संबंध में छूट
6.1 आयकर अधिनियम की धारा 5 को कुल आय के कार्यक्षेत्र के लिए मुहैया कराया गया है। गैर-निवासी व्यक्ति की स्थिति में, भारत में आय का कराधान केवल तभी होगा यदि आय भारत में अर्जित अथवा उपार्जित होती है अथवा भारत में प्राप्त होना समझी जाती है। आयकर अधिनियम की धारा 9 उन परिस्थितियों को मुहैया कराती है जिसके अंतर्गत आय भारत में अर्जित अथवा उपार्जित होना समझी जाती है। भारत में अर्जित अथवा उपार्जित समझे जाने वाली आय के लिए उपलब्ध करार्इ गर्इ परिस्थितियां हैं यदि कोर्इ आय भारत में व्यापारिक संबंध से अथवा के माध्यम से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होती है।
6.2 एक "विशेष अधिसूचित क्षेत्र" (एसएनजेड) को भारत के लिए विदेशी खनन कंपनियों (एमएमसी) द्वारा संचालन के कार्य की सुविधा के लिए और दुनिया की प्रमुख हीरा खनन कंपनियों द्वारा भारत में कठोर हीरे के व्यापार की सुविधा के लिए बनाया गया था। एमएमसी की गतिविधियां केवल कठोर हीरे को प्रदर्शित करना है भले ही भारत में वास्तविक बिक्री न हुर्इ हो जो एमएमसी की भारत में व्यापारिक संबंध के सृजन का कारण हो सकती है। यह संभावित कर अनावरण भारत में इन गतिविधियों को करने की इच्छुक खनन कंपनियों के लिए चिंता का विषय बना गया है।
6.3 विशष अधिसूचित क्षेत्र में न कटे हुए हीरे (किसी छँटार्इ अथवा बिक्री के बिना) की गतिविधि करने के लिए एफएमसी को सुविधा देने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 9 को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया हीरे के खनन के व्यापार में संलग्न एक विदेशी कंपनी की स्थिति में कोर्इ आय उन गतिविधियों से अथवा के माध्यम से भारत में अर्जित अथवा उपार्जित होना समझी जाएगी जो इस संबंध में आधिकारिक राजपत्र में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित विशेष क्षेत्र में न कटे हुए और गैर-मिश्रित हीरे के प्रदर्शन को पुष्ट करता है।
6.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2016 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2016-17 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
7. विदेशी कोष के लिए विशेष कराधान व्यवस्था की शर्तों में संशोधन धारा 9क
7.1 आयकर अधिनियम की धारा 9क को विदेशी कोष के संबंध में विशेष व्यवस्था के लिए मुहैया कराया गया है। यह मुहैया कराता है कि एक पात्र निवेश कोष की स्थिति में, ऐसे कोष की ओर से व्यवहार करने वाले पात्र कोष प्रबंधन के माध्यम से की जा रही कोष प्रबंधन गतिविधियां कथित कोष के भारत में व्यापारिक संबंध संस्थापित नहीं करेगा। आगे, पात्र निवेशित कोष केवल इसलिए भारत में निवासी होना नहीं कहा जाएगा क्योंकि इस संबंध में पात्र कोष प्रबंधक गतिविधियां भारत में स्थित है। धारा 9क के अंतर्गत लाभ इस धारा की उप-धारा (3), (4) और (5) में मुहैया करार्इ गर्इ शर्तों के अनुसार उपलब्ध है।
7.2 धारा 9क की उप-धारा (3) को कोष की पात्रता के लिए शर्तों हेतु मुहैया कराया गया है। ये शर्तें अन्य विषयों के साथ-साथ निवासित कोष, कोष आकार, निवेशक आधार, निवेश विविधता और सहमति कीमत पर कोष प्रबंधन हेतु पारिश्रमिक का भुगतान। कोष के निवास के संबंध में, शर्तें यह है कि कोष उस राष्ट्र अथवा क्षेत्र का निवासी होना है जिसके साथ भारत ने दोहरा कराधान परिहार समझौता (डीटीएए) अथवा कर सूचना विनिमय समझौता (टीआर्इर्इए) किया है।
7.3 कोष की गतिविधियों के संबंध में, एक प्रतिबंध है कि कोष भारत में अथवा भारत द्वारा किसी व्यापार को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा अथवा नियंत्रित अथवा प्रबंधित नहीं करेगा और ना तो किसी गतिविधि में शामिल होगा जो भारत में व्यापारिक संबंध को संस्थापित करे और ना ही किसी व्यक्ति को इस संबंध में संस्थापित करेगा जिसकीे गतिविधियां इस संबंध में पात्र कोष प्रबंधक द्वारा की जा रही गतिविधियों को छोडकर भारत में व्यापारिक संबंध संस्थापित करता हो।
7.4 हितधारकों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया था कि ऐसे कर्इ उदाहरण हैं कि जहां एक कोष राष्ट्र के घरेलू कर कानूनों अथवा कानूनी ढ़ांचे के कारण राष्ट्र के कर निवास के तौर पर योग्य न हो सके। इन कोषों का वैश्विक ढ़ांचा निगमन के उनक राष्ट्र के लागू होने वाले कानून तथा नियामक ढ़ांचे पर आधारित हो गया था और एक विशेष राष्ट्र में किए गए निवेश के संबंध में संशोधित नहीं किया जा सकता। लग्जमबर्ग से यूएसए और एसआर्इसीएवी (असीमित संग्रहण निवेश योजना) द्वारा बड़ी पेंशन कोष अथवा आपसी कोष का उदाहरण को उद्धृत किया गया था। यह निर्दिष्ट किया गया है कि भारत कर्इ राष्ट्रों के साथ समझौते के अंतर्गत लागू होने वाली डीटीएए अथवा टीआर्इर्इए के अंतर्गत कोष से संबंधित सूचना को एकत्रित करने में सक्षम होगा। सूचना उन व्यक्तियों के संबंध में विनियमित की जा सकती है जो राष्ट्र के निवासी न हों। आगे यह निर्दिष्ट किया गया था कि भारत में अथवा भारत द्वारा व्यापारिक अथवा नियंत्रक कोष प्रबंधक व्यापार को करने वाले कोष पर प्रतिबंध से संबंधित शर्तें कोष के लिए संचालन की लचीलता को प्रतिबंधित करती हैं और ध्यान भारत में की गर्इ गतिविधियों के प्रकार पर होना चाहिए।
7.5 व्यवस्था का युक्तिकरण करने के लिए और उद्योग की चिंताओं को संबोधित करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 9क को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि धारा 9क के लिए पात्र निवेशित कोष का अर्थ इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित एक निर्दिट क्षेत्र अथवा राष्ट्र में भारत के बाहर संस्थापित अथवा निगमित अथवा पंजीकृत एक कोष होगा। इसे इसलिए भी मुहैया कराया गया है कि भारत में अथवा भारत के द्वारा किसी व्यापार को नियंत्रित अथवा प्रबंधित न करने वाले कोष की शर्तें केवल भारत में गतिविधियों के संदर्भ में ही प्रतिबंधित होंगे।
7.6 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
8. व्यापारिक न्यास हेतु एक एसपीवी द्वारा किए गए वितरण पर लाभांश वितरण कर (डीडीटी) से छूट
8.1 आयकर अधिनियम में सेबी द्वारा नियमित रियल एस्टेट निवेश कोष (आरर्इआर्इटी) और अवसंरचना निवेश कोष (इनविट) वाले व्यापारिक न्यासों के कराधान के संबंध में विशिष्ट कराधान व्यवस्था शामिल है। इस व्यवस्था के अंतर्गत, व्यापारिक न्यासों के हस्तक्षेप के कारण बहु कराधान को बचाया जाता है। सेबी नियामकों के अंतर्गत, ये व्यापारिक न्यास या तो प्रत्यक्ष रूप से या विशेष उद्देश्य साधन (एसपीवी) के माध्यम से आय उपार्जन संपत्ति को संघटित कर सकते हैं। एसपीवी एक कंपनी अथवा एक एलएलपी हो सकती है। सेबी नियामक के अंर्तगत, एसपीवी को पारिभाषित करने का अर्थ कोर्इ कंपनी अथवा एलएलपी जिसमें आरर्इआर्इटी नियंत्रक ब्याज जो पूंजीगत इक्विटी शेयर अथवा ब्याज के पचास प्रतिशत से कम न हो, को संघटित करता हो अथवा संघटित करने की इच्छा रखता हो। एसपीवी परिसंपत्तियों में संपत्ति के कम से कम 80 प्रतिशत को संघटित करना चाहिए और एसपीवी में निवेश न करें। मौजूदा कर व्यवस्था मुहैया कराती है कि आरर्इआर्इटी के मामले में, आरर्इआर्इटी को कंपनी के तौर पर एसपीवी द्वारा दिए गए ब्याज के रूप में आय हस्तक्षेप की अनुमति देता है यानि इसे आरर्इआर्इटी के स्तर पर करारोपित नहीं किया जाता लेकिन आरर्इआर्इटी के संबंधित निवेशकों को एक कंपनी के हाथों किया जाता है। आरर्इआर्इटी द्वारा प्रत्यक्ष रूप से संघटित परिसंपत्तियों से किराया आय भी निकासी की अनुमति देता है। एसपीवी के माध्यम से संघटित परिसंपत्तियों के संबंध में, यदि एसपीवी उस कंपनी को छोड़कर एक कंपनी है जो सामान्य निगमित कर का भुगतान करती है और उसके बाद जब आय शेयरधारक के तौर पर आरर्इआर्इटी को वितरित की जाती है तो यह आयकर अधिनियम की धारा 115-ण के अंतर्गत लाभांश वितरित कर (डीडीटी) भुगतान करता है जिसे एसपीवी द्वारा दिया जाता है और उसके बाद आय आरर्इआर्इटी अथवा उसके निवेशकों दोनों के हाथों छूट प्राप्त होती है। इनविट की स्थिति में, एक समान व्यवस्था केवल एक अपवाद के साथ है कि प्रत्यक्ष रूप से उपार्जित संघटित इनविट आय के लिए निकासी नहीं है जैसे सामान्यत ऐसी बड़ी अवसंरचना परियोजना न्यास में प्रत्यक्ष रूप से संघटित नहीं होती लेकिन एसपीवी के माध्यम से संघटित होती है। प्रायोजक (न्यास को स्थापित करेन वाला व्यक्ति) के स्थिति में एक प्रोत्साहन के समय, व्यापारिक न्यास की इकार्इयों के लिए एसपीवी में इसके शेयरधारकों के विनिमय के समय उत्पन्न पूंजीगत प्राप्ति दोनों सामान्य प्रावधानों और मैट की प्रयोज्यता से आस्थगित है। ऐसी प्राप्ति इकार्इयों की वास्तविक बिक्री के बाद ही करारोपित हो सकती है।
8.2 हितधारकों द्वारा यह मुद्दा उठाया गया है कि एसपीवी के स्तर पर लाभांश वितरण कर के उदग्रहण जब यह व्यापारिक न्यास को इसकी वर्तमान आय को वितरित करता है, व्यापारिक न्यास अवसंरचना कर को अक्षम बनाता है और निवेशक के लिए विवरणी दर को विपरीत रूप से प्रभावित करता है। यह और अधिक है, जैसा दोनों सेबी नियामकों तथा व्यापारिक न्यास के अंतर्गत हैं तथा व्यापारिक न्यास निवेशकों को उनकी संचालित आय के 90 प्रतिशत को वितरीत करने के लिए बाध्य है, जबकि सामान्य रियल एस्टेट कंपनी की स्थिति में, लाभांश के ऐसे वार्षिक वितरण की आवश्यकता नहीं है। यह भी निर्दिष्ट किया गया है कि डीडीटी और संबद्ध कर अक्षमता के कारण यह पहल अभी तक नहीं की जा सकी है।
8.3 व्यापारिक न्यास (आरर्इआर्इटी और इनविट) और उनके निवेशकों के लिए कराधान व्यवस्था को आगे युक्तिकृत करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 10, 115-ण, 115पक अथवा 194ठखक के प्रावधानों को विशेष व्यवस्था और लाभांश वितरण कर से छूट को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है। कथित विशेष व्यवस्था के प्रमुख पहलू निम्न प्रकार से हैं :
(क) व्यापारिक न्यास को एसपीवी द्वारा किए गए वितरणों के संबंध में डीडीटी के उदग्रहण से छूट;
(ख) व्यापारिक न्यास तथा इसके निवेशक द्वारा प्राप्त ऐसे लाभांश न्यास अथवा निवेशकों के हाथों करयोग्य होंगे;
(ग) डीडीटी के उदग्रहण से छूट केवल उन मामलों में होगी जहां व्यापारिक न्यास एसपीवी की शेयर पूंजी के 100 प्रतिशत को रखता है या उसे छोड़कर समस्त शेयर पूंजी रखता है जो इसे प्रभावी करने के लिए किसी सरकार अथवा किसी कानून की विशिष्ट अनिवार्यता के भाग के तौर पर अथवा सरकार अथवा सरकार निकाय द्वारा संघटित किसी अन्य उद्यम द्वारा संघटित होना आवश्यक हो;
(घ) डीडीटी के उदग्रहण से छूट उस तिथि के बाद वर्तमान आय में से दिए गए लाभांश के संबंध में ही होगा जब व्यापारिक न्यास एसपीवी में उक्त (ग) में संदर्भित शेयरधारन को प्राप्त करता है। इस तिथि तक एकत्रित और वर्तमान प्रोफाइल में से दिए गए लाभांश डीडीटी के उदग्रहण के लिए उत्तरदायी होगा जैसा और जब इन लाभों में से कोर्इ लाभांश या तो व्यापारिक न्यास अथवा किसी अन्य हितधारक को कंपनी द्वारा वितरित होता है।
8.4 प्रयोज्यता : धारा 115-ण अथवा 194ठखक हेतु संशोधन क्रमश: 1 जून, 2016 से लागू होगा। धारा 10 अथवा 115पक हेतु संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
9. शेयरधारक को वितरित आय पर कर
9.1 आयकर अधिनियम की धारा 115थक को एक कंपनी द्वारा असूचीबद्ध शेयरों की पुन: खरीद के कारण वितरित आय के 20 प्रतिशत की दर पर अतिरिक्त आयकर के उदग्रहण के लिए मुहैया किया गया है। अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले धारा में परिभाषितानुसार वितरित आय का अर्थ शेयरों की पुन: खरीद पर कंपनी द्वारा दिए गए प्रतिफल है जैसा राशि, जो ऐसे शेयरों के लिए कंपनी द्वारा प्राप्त की गर्इ थी, को कम करके। पुन: खरीद परिभाषित किया गया था जिसका अर्थ है कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 77क के प्रावधानों के अनुसार कंपनी के इसके स्वयं के शेयरों की खरीद।
9.2 कंपनी अधिनियम, 1956 अथवा कंपनी अधिनियम, 2013 के विभिन्न प्रावधानों के अंतर्गत कंपनी द्वारा की गर्इ पुन: खरीद को प्रभावी करने और ऐसे लेनदेन के लिए धारा 115थक के प्रावधानों को लागू करने के संबंध में संदेह उत्पन्न हुआ। स्पष्टता की कमी का एक मुद्दा कंपनी द्वारा पुन खरीदे जा रहे शेयरों के निगर्मन के समय कंपनी द्वारा प्राप्त प्रतिफल के निर्धारण के संबंध में भी हुआ था। ऐसी स्थितियां हैं जहां किश्तों में कंपनी द्वारा शेयर जारी किए जा सकते हैं, विभिन्न प्रतिफल के लिए, किसी भी समय अथवा समामेलन, विलय अथवा डिमर्जर के अंतर्गत दूसरी कंपनी के मौजूदा शेयरों के स्थान पर जारी किये जा सकते हैं।
9.3 धारा 115थक के लिए, यह आय के वितरण के प्रकार के तौर पर पुन: खरीद का प्रभाव, जो कंपनियाँ जिसके अंतर्गत यह किया गया है, से संबंधित कानूनों के विशेष प्रावधान को छोड़कर प्रासंगिक हैं। आगे, कंपनी द्वारा प्राप्त प्रतिफल के निर्धारण के तरीके में स्पष्टता की कमी परिहार्य विवाद का नतीजा होगा और शेयरों की पुन: खरीद द्वारा अनुसरित कर तटस्थ व्यापार पुर्नसंगठन के अंतर्गत विशेष रूप से प्रतिफल की अनुपातिक दरों की कर पंचायत अवसर में भी प्रस्तुत होगी।
9.4 स्पष्टता देने के लिए और उक्त मुद्दे पर किसी अस्पष्टता को दूर करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 115थक को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि इस धारा के प्रावधान कंपनियों से संबंधित कानून के प्रावधानों के अनुसार कंपनी द्वारा किए गए असूचीबद्ध शेयर की किसी पुन: खरीद के लिए लागू होंगे और कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 77क हेतु आवश्यक रूप से प्रतिबंधित नहीं है। आगे यह भी मुहैया कराया गया है कि वितरित आय की गणना के लिए, पुन: खरीदे जा रहे शेयरों के संबंध में कंपनी द्वारा प्राप्त राशि निर्धारित तरीके में निर्धारित की जाएगी।
9.5 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी हुए
10. प्रतिभूतिकरण न्यास और इसके निवेशकों के लिए नर्इ कराधान व्यवस्था
10.1 प्रतिभूतिकरण न्यास और ऐसे न्यायों के निवेशकों के संबंध में एक विशेष कराधान व्यवस्था धारा 115नक, 115नख और 115नग सहित आयकर अधिनियम के अध्याय - XII-ड़क में शामिल किया गया था। व्यवस्था मुहैया कराती है कि प्रतिभूतिकरण न्यास द्वारा इसके निवेशकों को दिए जाने वाले अतिरिक्त कर के उदग्रहण के अनुसार होगा। वितरण कर 25 प्रतिशत की दर पर दिया जाना था यदि वितरण व्यक्ति अथवा एययूएफ को किया जाता है अथवा 30 प्रतिशत की दर पर किया जाना था यदि वितरण अन्य को किया जाना था। आगे, कोर्इ वितरित कर नहीं लगाया जाना था यदि वितरण मुक्त उद्यम हेतु किया गया था। वितरित कर के उदग्रहण के परिणामस्वरूप, प्रतिभूतिकरण न्यास से प्राप्त, निवेशक की आय आयकर अधिनियम की धारा 10(35क) के अंतर्गत मुक्त थी और प्रतिभूतिकरण न्यास की आय स्वयं आयकर अधिनियम की धारा 10(23घक) के अंतर्गत मुक्त है।
10.2 मौजूदा व्यवस्था पुनर्निमाण कंपनियों द्वारा स्थापित न्यासों को कवर नहीं करता अथवा प्रतिभूतिकरण कंपनियां कवर नहीं होती यद्यपि ऐसे न्यास प्रतिभूतिकरण गतिविधि में भी संलग्न थी। ये कंपनियां प्रतिभूतिकरण और वित्तीय परिसंपत्ति पुर्ननिर्माण और प्रतिभूति ब्याज प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (एसएआरएफएर्इएसआर्इ अधिनियम) के लिए बनार्इ गर्इ है और इनकी गतिविधियां भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआर्इ) द्वारा नियमित होती है। आगे, वितरित कर के रूप में अंतिम उदग्रहण निवेशकों के लिए कर अनेपयुक्त था विशेषकर बैंक और वित्तीय संस्थान। प्रतिभूतिकरण न्यास द्वारा प्राप्त आय के संबंध में व्यय की अस्वीकृति कराधान की प्रभावी दर को बढ़ाता है। गैर-निवासी और निवासी निवेश उनके विशिष्ट कर स्थिति के लाभ को लेने में भी असमर्थ थे।
10.3 प्रतिभूतिकरण न्यास और इसके निवेशकों के लिए कर व्यवस्था का युक्तिकरण करने के लिए और उपचार की कर स्वीकृति मुहैया कराने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 2, धारा 10, धारा 115नक, 115नग और 197 में स्पष्टीकरण को संशोधित किया गया है और धारा 115नगक और 194ठखग को निम्नलिख्ति पहलू वाली नर्इ व्यवस्था द्वारा प्रतिभूतिकरण न्यास के लिए मौजूदा विशेष व्यवस्था को संस्थापित करने के लिए आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है।
(i) नर्इ व्यवस्था सेबी (लोक अधिकारी और प्रतिभूतिकृत ऋण साधन की सूचीकरण) नियामक, 2008 के अंतर्गत एसपीवी के तौर पर प्रतिभूतिकरण न्यास हेतु अथवा एसपीवी जैसा आरबीआर्इ द्वारा जारी मानक परिसंपत्तियों के प्रतिभतियों पर दिशानिर्देश में जारी होती है अथवा प्रतिभूतिकरण कंपनी द्वारा स्थापना के तौर पर अथवा एसएआरएफएर्इएसआर्इ अधिनियम के अनुसार पुर्ननिर्माण कंपनी हेतु लागू होगा।
(ii) प्रतिभूतिकरण न्यास की आय मुक्त होना जारी रहेगी। हालांकि, प्रतिभूतिकरण न्यास से निवेशक की आय के संबंध में छूट उपलब्ध नहीं होगी और प्रतिभूतिकरण न्यास से कोर्इ आय निवेशकों के हाथों करयोग्य होगी।
(iii) प्रतिभूतिकरण न्यास से उपार्जित अथवा अर्जित आय उसी तरीके और उसी सीमा तक में निवेशकों के हाथों करयोग्य होगी जैसे यह आधारभूत परिसंपत्ति में प्रत्यक्ष रूप से किए गए निवेश में हुआ होता नाकि न्यास के माध्यम से।
(iv) शामिल नर्इ धारा 194ठखग के अंतर्गत स्रोत पर कर कटौती 25 प्रतिशत की दर पर प्रतिभूतिकरण न्यास द्वारा प्रभावित होगी यदि निवासी निवेशकों को भुगतान होता है जो व्यक्ति अथवा एचयूएफ हो और अन्य की स्थिति में 30 प्रतिशत। गैर-निवासी निवेशकों को भुगतान की स्थिति में, कटौती प्रभावी दर पर होगी
(v) कर प्रमाणपत्र की कम अथवा शून्य कटौती को प्राप्त करने के लिए निवेशकों के लिए सुविधा उपलब्ध होगी और
(vi) न्यास निवेशकों को इसकी आय के प्रकार और अनुपात से संबंधित विच्छेद और निर्धारित आयकर प्राधिकारी को भी मुहैया करेगा।
10.4 आगे, यह भी मुहैया कराया गया है कि अधिनियम द्वारा उक्त संशोधन से पहले मौजूदा वितरित कर की व्यवस्था 1 जून, 2016 से प्रभावी प्रतिभूतिकरण न्यास द्वारा किए गए वितरण की स्थिति में लागू होना बंद होगा।
10.5 प्रयोज्यता : धारा 2, 115नक और 197 हेतु संशोधन और धारा 194ठखग का समावेशन 1 जून, 2016 से प्रभावी होगा। धारा 115नगक हेतु संशोधन 1 अप्रैल 2017 से प्रभावी होगा और तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी निर्धारण वर्ष के संबंध में लागू होगा।
11. कर का उदग्रहण जहां धर्मांर्थ संस्थान मौजूद नहीं है या गैर-धर्मांर्थ संगठन में परिवर्तनीय नहीं है
11.1 आयकर अधिनियम की धारा 2(24) एक विशेष तरीके में "आय" को परिभाषित करता है। एक धर्मांर्थ न्यास अथवा संस्थान अथवा कोष द्वारा प्राप्त स्वैच्छिक अंशदान आय की परिभाषा में शामिल होता है। आयकर अधिनियम की धारा 11 और 12 को कथित धाराओं में शामिल विभिन्न शर्तों के अनुसार न्यास अथवा स्वैच्छिक अंशदानों के अंतर्गत संघटित किसी संपत्ति से प्राप्त आय के संबंध में न्यास अथवा संस्थानों हेतु छूट के लिए मुहैया कराया गया है। छूट को देने के लिए प्राथमिक शर्त है कि न्यास के अंतर्गत संघटित संपत्ति से प्राप्त आय धर्मांर्थ उद्देश्यों के लिए लागू होना चाहिए और जहां ऐसी आय पिछले वर्ष के दौरान लागू न की जा सके, इसे निर्धारित विधियों में संघटित और निवेशित किया जाना है और धारा में उपलब्ध करार्इ गर्इ विभिन्न शर्तों के अनुसार ऐसे उद्देश्यों के लिए लागू होगी। यदि संघटित आय निर्दिष्ट समय के अंदर कथित धारा में उपलब्ध करार्इ गर्इ शर्तों के अनुसार लागू न हो तो ऐसी आय न्यास अथवा संस्थान की करयोग्य आय होना समझी जाती है। धारा 12कक को न्यास अथवा संस्थान के पंजीकरण के लिए मुहैया किया गया है जो धारा 11 और 12 के लाभ को प्राप्त करने के उनको सक्षम कर सके। इसे उन परिस्थितियों के लिए भी मुहैया कराया गया है जिसके अंतर्गत पंजीकरण को निरस्त किया जा सकता है। आयकर अधिनियम की धारा 13 उन परिस्थितियों के लिए मुहैया करार्इ गर्इ है जिसके अंतर्गत पूर्ण अथवा आय के भाग के संबंध में धारा 11 अथवा 12 के अंतर्गत छूट न्यास अथवा संस्थान उपलब्ध नहीं होगी।
11.2 धर्मांर्थ गतिविधि चलाने वाली एक संस्था अथवा एक कंपनी अथवा एक न्यास अथवा एक संस्थान स्वेच्छा से इसकी गतिविधियां समाप्त कर सकती और भंग अथवा अन्य धर्मांर्थ अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान के साथ विलय हो सकता है अथवा यह एक गैर-धर्मांर्थ संस्थान में रूपांतरित हो सकती है। ऐसी स्थिति में, मौजूदा कानून कोर्इ स्पष्टीकरण मुहैया नहीं करता है कि किस प्रकार ऐसे धर्मांर्थ संस्थान के परिसंपत्ति को संभाला जाए। धारा 11 के प्रावधानों के अंतर्गत, आयकर अधिनियम में प्रावधान की आय की कुछ राशि कुछ शर्तों की विफलता पर कर हेतु लार्इ जा सकती है। हालांकि आयकर अधिनियम में ऐसा कोर्इ प्रावधान नहीं है जो यह सुनिश्चित करें कि न्यास का कोष और परिसंपत्ति समय के साथ बढ़ती है, धर्मांर्थ उद्देश्य के लिए प्रयुक्त होने के वादे के साथ, धर्मांर्थ उद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाना जारी रहेगा और किसी अन्य उद्देश्य के लिए प्रयोग नहीं किया है। स्पष्ट प्रावधान की अनुपस्थिति में, धर्मांर्थ संस्थानों के लिए हमेशा संभव था कि वह गैर-धर्मांर्थ संस्थान को परिसंपत्ति का स्थानांतरण कर सके। इसलिए, इसे सुनश्चित करने की जरूरत थी कि संवृद्धि के रूप में समय के साथ प्रदत्त अधिकारों का और कानून में अंतर को नियंत्रित करने के लिए दुरूपयोग नहीं किया गया है जो किसी कर परिणाम के साथ गैर-धर्मांर्थ संगठन में कवर न होने वाली छूट के माध्यम से कोष/संपत्ति को रखने वाले धर्मांर्थ न्यासों को स्वीकृति देता है।
11.3 सुनिश्चित करने के लिए कि न्यास अथवा संस्थान द्वारा उठाए गए छूट का इच्छित लाभ का उद्देश्य पूरा कर लिया है, अधिनियम में एक विशेष प्रावधान को निकासी कर के रूप में उदग्रहण को अधिरोपित करने के लिए आवश्यक है जो तब लगता है जब संगठन गैर-धर्मांर्थ संगठन में परिवर्तित हो गया हो अथवा गैर-धर्मांर्थ संस्थान के साथ विलय हो गया हो अथवा भिन्न उद्देश्य के साथ धर्मांर्थ संस्थान में विलय हुआ हो अथवा अन्य धर्मांर्थ संगठन हेतु स्थानांतरण न किया हो ।
11.4 तद्नुसार, धारा 115नघ, 115नड़ और 115नच सहित एक नया अध्याय XII-ड़ख को आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है। यह अध्याय एक गैर-धर्मांर्थ संस्थान को इसके विघटन पर एक धर्मांर्थ संगठन की परिसंपत्ति के द्वारा स्थानांतरण अथवा किसी गैर-धर्मांर्थ रूप के साथ विलय अथवा में रूपांतरण की स्थिति में अतिरिक्त आयकर के उदग्रहण के लिए विशिष्ट प्रावधान शामिल है। इस व्यवस्था के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं :
(i) न्यास अथवा संस्थान की आय (संवृद्ध आय) में वृद्धि फार्म में न्यास अथवा संस्थान के रूपांतरण पर करयोग्य होगी जो धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकरण के लिए अथवा समकक्ष वस्तु वाले एक उद्यम में विलय पर पात्र नहीं है और धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकरण अथवा धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकृत किसी धर्मांर्थ संस्थान हेतु विलय पर परिसम्पत्ति के गैर-वितरण पर अथवा विलय के महीने की समाप्ति से बारह महीने की अवधि के अंदर धारा 10(23ग) के अंतर्गत अनुमोदन पर करयोग्य होगी।
(ii) संवृद्ध आय कुल परिसंपत्ति की उचित बाजार कीमत (एफएमवी) की कुल राशि होगी जैसा निर्दिष्ट तिथि के अनुसार देयता द्वारा सीमित है। मूल्यांकन की विधि नियमों में निर्धारित होनी है। हालांकि, संवृद्ध आय की गणना के लिए, निम्नलिखित परिसंपत्ति और संबंधित देयता, यदि हो, शामिल नहीं होगी।
(क) कोर्इ संपत्ति जिसे कृषि से होने वाली आय से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया गया है;
(ख) धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकरण की तिथि हेतु न्यास अथवा संस्थान के प्रतिष्ठान अथवा सृजन की तिथि से अवधि के दौरान प्राप्त कोर्इ संपत्ति, यदि धारा 11 और 12 के लाभ कथित अवधि के दौरान स्वीकृत नहीं थे। हालांकि, जहां न्यास अथवा संस्थान को धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकरण के आधार पर किसी पिछले वर्ष के लिए धारा 11 और 12 के अंतर्गत लाभ स्वीकृत किया गया है तो शामिल न होने वाली परिसंपत्ति वह होगी जो न्यास अथवा संस्थान ऐसे पिछले वर्ष के पहले की शुरूआत में था।
(ग) कोर्इ परिसंपत्ति जिसे निर्दिष्ट समय के अंदर किसी अन्य धर्मांर्थ संगठन को स्थानांतरित किया गया हो।
(iii) संवृद्ध आय का कराधान अधिकतम सीमांत दर पर होगा।
(iv) यह उदग्रहण उद्यम के हाथों कर हेतु वसूलनीय किसी राशि के अतिरिक्त होगा।
(v) यह कर अंतिम कर होगा जिसके लिए किसी न्यास अथवा संस्थान अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोर्इ ऋण नहीं लिया जा सकता और किसी अन्य कर की तरह यह लगाया जाएगा भले ही न्यास अथवा संस्थान के पास प्रासंगिक पिछले वर्ष में कर हेतु वसूलनीय कोर्इ अन्य आय न हो।
(vi) कर निर्दिष्ट अवधि के भीतर दिया जाना है। निर्दिष्ट अवधि के अंदर कर के भुगतान न करने पर, प्रति माह अथवा उसके भाग पर एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज गैर-भुगतान की अवधि के लिए लागू होगा।
(vii) कर और ब्याज की वसूली के लिए, प्रमुख अधिकारी अथवा न्यासी और न्यास अथवा संस्थान को गलती करने वाले निर्धारिती के तौर पर समझा जाएगा और करों की वसूली से संबंधित सभी प्रावधान लागू होंगे। आगे, न्यास, जो धर्मांर्थ संगठन नहीं है, के निर्धारिती का प्राप्तकर्ता कर और ब्याज के गैर-भुगतान की स्थिति में गलती करने वाले निर्धारिती के तौर पर संघटित हाने के लिए उत्तरदायी होगा। हालांकि, प्राप्तकर्ता देयता प्राप्त निर्धारिती की सीमा तक सीमित होगा।
11.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होगा।
12. श्रेणी-I और श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष द्वारा इसके निवेशकों को भुगतान से संबंधित स्रोत पर कर कटौती का युक्तिकरण
12.1 सेबी के साथ पंजीकृत श्रेणी-I और श्रेणी-II वैकल्पिक निवेश कोष (निवेश कोष) के संबंध में एक विशेष कराधान व्यवस्था को वित्त अधिनियम, 2015 द्वारा शामिल किया गया था। विशेष कराधान व्यवस्था उन निवेश कोषों के संबंध में स्थिति कर निकासी को सुनिश्चित करता है जो एकत्रीकरण निवेश साधन है। विशेष व्यवस्था आयकर अधिनियम की धारा 10(23चखक), 10(23चखख), 115पख और 194ठखख में शामिल है। इस व्यवस्था के अंतर्गत, निवेशगता कोष (व्यापारिक आय के प्रकार के तौर पर नहीं) की आय निवेशित कोष के हाथों मुक्त है लेकिन निवेशित कोष (आय को छोड़कर जो निवेशित कोष के स्तर पर करारोपित है) से निवेशक द्वारा प्राप्त आय निवेशक के हाथों करयोग्य है। निवेशकों के हाथों कराधान उसी तरीके में होगा और उसी अनुपात में होगा जैसा यह होता कि निवेशक ने ऐसी आय को प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया था और नाकि निवेशित कोष के माध्यम से।
12.2 अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले आयकर अधिनियम की धारा 194ठखख मुहैया कराता है कि इसके निवेशक को निवेशित कोष द्वारा दिए गए अथवा भुगतान की गर्इ किसी आय के संबंध में स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) आय के 10 प्रतिशत की दर पर निवेशित कोष द्वारा किया जाएगा। आयकर अधिनियम की धारा 197 के अंतर्गत कम दर पर कर की कटौती के लिए प्रमाणपत्र हेतु सुविधा और कोर्इ कटौती नहीं की सुविधा उसमें गिनी हुर्इ धाराओं के संबंध में उपलब्ध थी, यदि निर्धारिती अधिकारी संतुष्ट है कि प्राप्तकर्ता की कुल आय ऐसे प्रमाणपत्र के निगर्मन को न्यायसंगत ठहराता है, धारा 194ठखख इस प्रावधान में शामिल नहीं था।
12.3 मौजूदा टीडीएस व्यवस्था ने कुछ कठिनार्इयां उत्पन्न की थी। गैर-निवासी निवेशक कराधान की कम अथवा शून्य दर के लाभ का दावा करने में सक्षम नहीं है जो उसके लिए दोहरे कराधान परिहार समझौते (डीटीएए) के अंतर्गत उपलब्ध है और 10 प्रतिशत की दर पर कर की कटौती अनिवार्य रूप से की गर्इ थी भले ही डीटीएए अथवा आयकर अधिनियम के अंतर्गत आय भारत में करयोग्य न हो। किसी निवेशक के लिए धारा 194ठखख के अंतर्गत की गर्इ कटौती के संबंध में कम अथवा शून्य दर पर टीडीएस के लिए प्रमाणपत्र की मांग करने वाले निर्धारण अधिकारी के पास जाने की कोर्इ सुविधा नहीं थी।
12.4 इसके निवेशकों को निवेश द्वारा किए गए भुगतान के संबंध में टीडीएस व्यवस्था के युक्तिकरण के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 194ठखख को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि निवेशक को भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति वहां दस प्रतिशत की दर पर धारा 194ठखख के अंतर्गत आयकर की कटौती करेगा जहां अदाता निवासी है और प्रभावी दर पर जहां अदाता गैर-निवासी (कंपनी के तौर पर नहीं) और विदेशी कंपनी है। हालांकि, यह भी मुहैया कराया गया है कि जहां अदाता गैर-निवासी हो (कंपनी को छोड़कर) अथवा विदेशी कंपनी हो, तो उस आय के संबंध में कोर्इ कटौती नहीं की जाएगी जो आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कर हेतु वसूलनीय है।
12.5 आगे, आयकर अधिनियम की धारा 197 उन धाराओं की सूची में धारा 194ठखख को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया है जिसके लिए कम दर पर अथवा कर की शून्य दर पर कटौती के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त किया जा सकता है। परिणामी संशोधन आयकर अधिनियम की धारा 2(37क) में शामिल "प्रभावी दरों" की परिभाषा हेतु भी किया गया है, ताकि इसमें धारा 194ठखख को शामिल किया जा सके।
12.6 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे।
13. बीर्इपीएस कार्य योजना - राष्ट्र दर राष्ट्र रिपोर्ट और मास्टर फाइल
13.1 आयकर अधिनियम की धारा 92 से 92च तक मूल्यनिर्धारण व्यवस्था के स्थानांतरण से संबंधित प्रावधान शामिल है। धारा 92घ के प्रावधानों के अंतर्गत, अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन और निर्दिष्ट घरेलू लेनदेन से संबंधित निर्धारित सूचना और दस्तावेज के रख रखाव की आवश्यकता है।
13.2 बीर्इपीएस कार्य योजना का कार्य 13 पर ओर्इसीडी रिपोर्ट को स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण दस्तावेजीकरण के संशोधित मानकों और आय, प्राप्ति, कर भुगतान की राष्ट्र दर राष्ट्र सूचना और आर्थिक गतिविधि के कुछ परिमाप के लिए टैम्पलेट हेतु मुहैया कराया गया है। बीर्इपीएस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गर्इ है कि राष्ट्र को स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण दस्तावेजीकरण के लिए मानकीकृत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। तीन स्तरीय ढ़ांचे में निम्न शामिल हैं :
(i) सभी बहुराष्ट्रीय उद्यमों (एमएनर्इ) समूह सदस्यों के लिए प्रासंगिक मानकीकृत सूचना सहित एक मास्टर फाइल
(ii) एक लोकल फाइल विशेषरूप से स्थानीय करदाता के वस्तुगत लेनदेन को निर्दिष्ट करते हुए; और
(iii) एमएनर्इ समूह के भीतर आर्थिक गतिविधि के स्थल के कुछ सूचक के साथ दी गर्इ एमएनर्इ आय और कर के वैश्विक आवंटन से संबंधित कुछ सूचना सहित राष्ट्र दर राष्ट्र (सीबीसी) रिपोर्ट
13.3 निर्दिष्ट रिपोर्ट जिसे साथ लिया गया, यह तीन दस्तावेज (राष्ट्र-दर-राष्ट्र रिपोर्ट, मास्टर फाइल और लोकल फाइल) की करदाता द्वारा मूल्यनिर्धारण स्थितियों के निरंतर रूप से स्थानांतरण के साथ स्पष्ट करना है और कर प्रशासन को निर्धारिती स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण जोखिम हेतु महत्वपूर्ण सूचना को मुहैया कराना होगा। यह उसके बारे में निर्धारण करने कर प्रशासकों की मदद करेगा जहां उनके संसाधन सबसे प्रभावी रूप से नियोजित हो सकते हैं और यदि लेखांकन किया जाता है तो प्रारंभ और लक्ष्य लेखांकन पूछताछों के लिए सूचना मुहैया करें।
13.4 राष्ट्र-दर-राष्ट्र रिपोर्ट में एमएनर्इ को वार्षिक रूप से हर उस कर क्षेत्राधिकार जिसमें वह व्यापार करते हैं, राजस्व की राशि, आयकर और दिए गए आयकर और संचित राशि के समक्ष लाभ के लिए रिपोर्ट देने की आवश्यकता पड़ती है। इसमें एमएनर्इ को अपने कुल रोजगार, पूंजी संचित अर्जन और विशेष कर क्षेत्राधिकार में व्यापार करने वाले समूह के साथ प्रत्येक उद्यम की पहचान की आवश्यकता है और संलग्न प्रत्येक व्यापारिक गतिविधि के संकेत को मुहैया कराना है। सीबीसी रिपोर्ट को इसके निवासी के राष्ट्र में निर्धारित प्राधिकारी हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय समूह के मुख्य उद्यम द्वारा जमा कराना होगा। यह रिपोर्ट समूह के समेकित वित्तीय विवरण पर आधारित होनी है।
13.5 मुख्य फाइल इसके वैश्विक व्यापार संचालन के प्रकार, इसकी समग्र स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण नीतियां और आय की वैश्विक आवंटन और महत्वपूर्ण स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण जोखिम की उपस्थिति के मूल्यांकन में कर सहायकों की सहायता के लिए आर्थिक गतिविधियों सहित एमएनर्इ समूह के व्यापार के दृष्टिकोण को मुहैया कराने के लिए है। सामान्य रूप से मुख्य फाइल वैश्विक अर्थव्यवस्था, कानूनी, वित्तीय और कर संदर्भ में एमएनर्इ समूह के स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण अभ्यासों में स्थित करने के लिए उच्च स्तरीय दृष्टिकोण को मुहैया कराने का इरादा रखता है। मुख्य फाइल में सूचना शामिल है जो विशेष राष्ट्र में स्थित एक विशेष उद्यम द्वारा किए लेनदेन के लिए सीमित नहीं हो सकता। उस हिसाब से मुख्य फाइल में सूचना मौजूदा नियमित स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण दस्तावेजीकरण की तुलना में अधिक व्यापक होगी। मुख्य फाइल उस राष्ट्र के कर प्राधिकारियों को प्रत्येक उद्यम द्वारा प्रस्तुत की जाएगी जिसमें वह संचालन करती है।
13.6 अंतर्राष्ट्रीय आम राय को कार्यान्वित करने के लिए, सीबीसी प्रतिवेदन के संबंध में एक विशिष्ट प्रतिवेदी व्यवस्था और साथ ही मुख्य फाइल मुहैया करार्इ गर्इ है। इस व्यवस्था के आवश्यक पहलुओं को धारा 92घ, 271कक और 273ख को संशोधित करके आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है और नर्इ धारा 271छख और 286 को शामिल किया गया है। शेष पहलू नियमों के द्वारा निर्धारित होंगे। सीबीसी सूचना अनिवार्यता से संबंधित पहलू और इससे संबंधित मामले आयकर अधिनियम के संशोधन के माध्यम से शामिल हैं जो इस प्रकार हैं :
(i) सूचना प्रावधान निर्धारित होने वाले शुरूआती सीमा से ऊपर के समेकित राजस्व वाले एक अंतर्राष्ट्रीय समूह के संबंध में लागू होंगे।
(ii) एक अंतर्राष्ट्रीय समूह की प्रमुख कंपनी, यदि यह भारत में निवासित हो उसे उस वित्त वर्ष (पिछले वर्ष) हेतु प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के लिए आय की विवरणी की प्रस्तुति की तिथि को अथवा उससे पहले निर्धारित प्राधिकारी को समूह के संबंध में रिपोर्ट को प्रस्तुत करना आवश्यक होगा जिसके लिए रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है।
(iii) प्रमुख उद्यम एक उद्यम होगा जिसे प्रयोग हो रहे कानूनों के अंतर्गत समेकित वित्तीय विवरण को तैयार करना आवश्यक होगा अथवा एक ऐसे विवरण को तैयार करना आवश्यक हो गया होता जिसके भारत में प्राधिकृत शेयर बाजार पर सूचीबद्ध किए गए समूह के किसी उद्यम की इक्विटी शेयर थे।
(iv) मुख्य उद्यम, जो भारत में निवासी नहीं है, वाले एक अंतर्राष्ट्रीय समूह के भारत में प्रत्येक संघटक अंतर्राष्ट्रीय समूह जिससे यह संबंधित है की मूल कंपनी के अधिवास के राष्ट्र अथवा क्षेत्र से संबंधित सूचना मुहैया कराएगा। यह सूचना निर्धारित सूचना को अथवा उससे पहले निर्धारित प्राधिकारी को प्रस्तुत की जाएगी।
(v) रिपोर्ट प्राधिकृत तरीके और निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत की जाएगी और राजस्व, आयकर के समक्ष लाभ व हानि, दिए गए और उपार्जित आयकर की राशि, पूंजी का विवरण, संचित कमार्इ, कर्मचारियों की संख्या, नगद को छोड़कर अमूर्त परिसंपत्ति अथवा प्रत्येक निर्वाचक आवासीय स्थिति, प्रकार के विवरण के साथ हर देश अथवा क्षेत्र के संबंध में नगद और मुख्य व्यापार की गतिविधि का विवरण और अन्य कोर्इ सूचना जिसे निर्धारित किया जा सके। यह कार्य योजना 13 पर ओर्इसीडी बीर्इपीएस रिपोर्ट में उपलब्ध करार्इ गर्इ टैम्पलेट पर आधारित किया जाएगा।
(vi) एक अंतर्राष्ट्रीय समूह से संबंधित भारत में एक उद्यम निर्धारित प्राधिकारी को सीबीसी रिपोर्ट को प्रस्तुत करना आवश्यक होगा यदि समूह की मूल उद्यम निवासी हो :-
(क) उस राष्ट्र में जिसके साथ भारत ने सीबीसी रिपोर्ट के आदान-प्रदान के लिए समझौता नहीं किया है; या
(ख) ऐसा राष्ट्र भारत के साथ सूचना का आदान-प्रदान नहीं करता भले ही समझौता हुआ हो; या
(ग) इस तथ्य को निर्धारित प्राधिकारी द्वारा उद्यम को सूचित किया गया हो
(vii) यदि भारत में उसी समूह के एक से अधिक उद्यम हो तो समूह उस उद्यम को नामांकित (निर्धारित प्राधिकारी को लिखित में सूचना के अंतर्गत) कर सकते है जो समूह की ओर से रिपोर्ट को प्रस्तुत करेगा। यह उद्यम तब रिपोर्ट को प्रस्तुत करेगा।
(viii) यदि अंतर्राष्ट्रीय समूह, मूल उद्यम वाला जो भारत में निवासित नहीं है, ने उस क्षेत्राधिकार के साथ इसकी रिपोर्ट को दाखिल करने के लिए एक वैकल्पिक उद्यम को नामित किया था जिसमें वैकल्पिक उद्यम निवासी है तो भारत में संचालित हो रहे ऐसे समूह के उद्यम रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं होगा यदि रिपोर्ट को भारतीय कर प्राधिकारियों द्वारा ऐसी रिपोट के विनिमय के समझौते के अंतर्गत प्राप्त किया जा सकता है।
(ix) निर्धारित प्राधिकारी सटीकता को जांचने के लिए रिपोर्ट की प्रस्तुति करने वाले उद्यम द्वारा ऐसे दस्तावेज और सूचना की मांग कर सकते हैं जिसे नोटिस में निर्दिष्ट किया जा सके। उद्यम को नोटिस की प्राप्ति से तीस दिनों के अंदर और अग्रिम अवधि यदि निर्धारित प्राधिकारी द्वारा बढ़ार्इ गर्इ हो, के अंदर जमा करना आवश्यक होगा लेकिन तिथि का विस्तारण 30 दिनों से अधिक नहीं होगा।
(x) एक उद्यम जो इसे प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है, द्वारा रिपोर्ट की गैर-प्रस्तुति के लिए निम्नलिखित श्रेणीबद्ध जुर्माना ढ़ांचा लागू होगा :
(क) यदि चूक एक महीने से अधिक न हो, रू. 5,000/- प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना
(ख) यदि चूक एक महीने से अधिक हो, एक महीने से अधिक की अवधि के लिए रू. 15,000/- प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना
(ग) या तो (क) के अंतर्गत अथवा (ख) के अंतर्गत जुर्माना लगाने वाले आदेश को तामील करने के बाद भी जारी रहने वाली कोर्इ चूक तो आदेश को तामील करने की तिथि के बाद जारी रहने वाली चूक के लिए जुर्माना रू. 50,000/- प्रति दिन होगा।
(xi) निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष समय-सीमा के अंदर सूचना की जमा न करने की स्थिति में, जब मांगी जाए, रू. 5,000/- प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना वसूला जाएगा। इसी प्रकार यदि चूक जुर्माना आदेश को तामील करने के बाद भी जारी रहती है तो जुर्माना आदेश को तामील करने के बाद की चूक के लिए भी प्रतिदिन रू. 50,000/- के हिसाब से जुर्माना वसूला जाएगा।
(xii) यदि उद्यम ने रिपोर्ट में किसी गलत सूचना को उपलब्ध कराया है और
(क) उद्यम रिपोर्ट की प्रस्तुति के समय असत्यता को जानता हो लेकिन निर्धारित प्राधिकारी को इसके बारे में सूचित न किया हो; अथवा
(ख) उद्यम रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के बाद त्रुटि पाता है और निर्धारित प्राधिकारी को सूचित करने में विफल रहता है और ऐसी खोज के पंद्रह दिनों अंदर सही रिपोर्ट प्रस्तुत करता है; या
(ग) उद्यम निर्धारित प्राधिकारी के नोटिस के जवाब में गलत सूचना अथवा दस्तावेज प्रस्तुत करता है तो आयकर अधिनियम की धारा 271छख के अंतर्गत रू. 5,00,000/- का जुर्माना लगाया जाएगा।
(xiii) उद्यम उक्त निर्दिष्ट जुर्माने के गैर-उदग्रहण के लिए उपयुक्त कारण प्रतिरक्षा का प्रस्ताव दे सकते हैं।
शेष पहलू नियमों के माध्यम से निर्धारित किया जाएगा।
13.7 मुख्य फाइल के रख रखाव के संबंध में किए गए संशोधन और उसकी प्रस्तुति है :
(क) एक अंतर्राष्ट्रीय समूह के घटक के तौर पर उद्यम, अंतर्राष्ट्रीय लेनदेनों से संबंधित सूचना के अतिरिक्त, ऐसी सूचना और दस्तावेज को भी अनुरक्षित रखेगा जिसे नियमों में निर्धारित किया जा सकता है।
(ख) सूचना और दस्तावेज ऐसी अवधि जिसे निर्धारित किया जा सके के अंदर निर्धारित प्राधिकारी को भी प्रस्तुत की जाएगी और प्रस्तुत करने का तरीका नियमों में भी उपलब्ध कराया जाएगा।
(ग) निर्धारित प्राधिकारी को सूचना और दस्तावेज की गैर-प्रस्तुति के लिए, रू. 5,00,000/- का जुर्माना भी लगाया जाएगा। हालांकि, जुर्माने के उदग्रहण के समक्ष प्रतिरक्षा का उपयुक्त कारण उद्यम के लिए भी उपलब्ध होगा।
13.8 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
14. लाभांश के रूप में आय के कराधान का युक्तिकरण
14.1 आयकर अधिनियम की धारा 10 के वाक्यांश (34) में शामिल प्रावधान, अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले, मुहैया करता है कि लाभांश जो धारा 115-ण के अंतर्गत लाभांश डीडीटी की हानि होती है, शेयरधारक के हाथों मुक्त है। धारा 115-ण निर्दिष्ट करती है कि लाभांश लाभांश की घोषणा करने वाली कंपनी के हाथों वितरण के समय पंद्रह प्रतिशत की दर पर ही करारोपित हैं। यह करदाताओं के बीच अधिक असमानता उत्पन्न करता है चूंकि वह जो उच्च लाभांश आय 15 प्रतिशत की दर पर कर के अनुसार हैं जबकि उनके हाथों ऐसी आय 30 प्रतिशत की दर पर कर हेतु वसूलनीय हो गर्इ है।
14.2 लाभांश के रूप में आय हेतु मुहैया कराया गया कर उपचार के युक्तिकरण को देखते हुए, धारा 115खखघक को यह उपलब्ध कराने के लिए आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है कि दस लाख रूपए से अधिक के लाभांश के रूप में कोर्इ आय दस प्रतिशत की दर से व्यक्ति, एचयूएफ अथवा फर्म जो भारत में निवासी है, की स्थिति में कर हेतु वसूलनीय होगी। लाभांश आय का कराधान सकल आधार पर होगा और किसी व्यय अथवा भत्ते अथवा हानि का पृथकीकरण कथित आय की गणना में स्वीकृत नहीं होगा।
14.3 लाभांश आय का कराधान सकल आय पर होगा और किसी व्यय अथवा भत्ते अथवा हानि का पृथकीकरण के लिए कोर्इ कटौती लाभांश के रूप में आय की गणना में स्वीकृत नहीं होगी।
14.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
15. दीर्घकालीन पूंजीगत परिसंपत्तियों के तौर पर समझे जाने वाले गैरसूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों के संघटन की अवधि
15.1 आयकर अधिनियम की धारा 2 के वाक्यांश (29क) "दीर्घकालीन पूंजीगत परिसंपत्ति" को परिभाषित करते हैं अर्थात एक पूंजीगत परिसंपत्ति जो अल्प-अवधि की पूंजीगत परिसंपत्ति नहीं है। धारा 2 के वाक्यांश (42क) अल्प अवधि पूंजीगत परिसंपत्ति को परिभाषित करता है अर्थात् इसके स्थानांतरण की तिथि के तुरंत बाद के अधिक से अधिक छत्तीस महीनों के लिए निर्धारिती द्वारा संघटित पूंजीगत परिसंपत्ति। वाक्यांश (42क) हेतु पहले परंतुक, अन्य विषयों के साथ-साथ को कंपनी के सूचीबद्ध शेयरों सहित कुछ प्रतिभूतियों के लिए बारह माह के संघटन की कम की हुर्इ अवधि के लिए मुहैया कराया है।
15.2 एक कंपनी के असूचीबद्ध शेयरों की संघटन अवधि को कम करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 2 को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि एक कंपनी के असूचीबद्ध शेयरों की स्थिति में, संघटन की अवधि दीर्घावधि पूंजीगत परिसंपत्ति के तौर पर समझे जाने वाले इन शेयरों के लिए छत्तीस महीनों के स्थान पर चौबीस महीने होगी।
15.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
16 स्टार्ट अप के लिए कर प्रोत्साहन
16.1 स्टार्ट अप को गति देने और उनके व्यापार के शुरूआती चरण में उनको वृद्धि देने के लिए नवीनीकरण, विकास, परिनियोजन अथवा नए उत्पादों का वाणिज्यिकीकरण को शामिल करते हुए व्यापार से तकनीक और बौद्धिक संपत्ति द्वारा दी जा रही सेवा अथवा प्रसंस्करण से पात्र स्टार्ट अप द्वारा लिए जा रहे लाभ तथा प्राप्ति के सौ प्रतिशत की कटौती को मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है। ऐसे व्यापार से प्राप्त लाभ की सौ प्रतिशत कटौती का लाभ कुछ शर्तों को पूरा करने के अनुसार 01.04.2019 से पहले स्थापित एक कंपनी अथवा सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) के तौर पर एक पात्र स्टार्ट अप हेतु उपलब्ध होगी।
16.2 राष्ट्र में स्टार्ट अप इको सिस्टम को प्रोत्साहित करने के लिए, कोषों के कोष को स्थापित करने के लिए "स्टार्ट अप इंडिया एक्शन प्लान" में उल्लिखित किया था। कोषों के कोष में निवेश के लिए कर पहल को मुहैया कराने को देखते हुए, आयकर अधिनियम में धारा 54ड़ड़ को शामिल किया गया है ताकि पूंजीगत प्राप्ति से छूट मुहैया की जा सके यदि दीर्घकालीन पूंजीगत प्राप्ति उन शर्तों के अनुसार अधिसूचित कोष की इकार्इयों में निर्धारिती द्वारा निवेशित होती है कि राशि तीन वर्षों के लिए निवेशित रहती है ऐसा न कर पाने पर छूट को हटाया जाएगा। अधिसूचित कोषों की इकार्इयों में निवेश रू. 50 लाख तक स्वीकृत होगी।
16.3 आयकर अधिनियम की धारा 54छख में शामिल प्रावधान, अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले, अन्य विषयों के साथ-साथ एक आवासीय संपत्ति के स्थानांतरण के कारण उत्पन्न प्राप्ति के संबंध में दीर्घकालीन पूंजीगत परिसपत्ति पर कर से छूट मुहैया करता है, यदि ऐसी पूंजीगत परिसंपत्ति कंपनी के शेयरों के अंशदान में निवेशित होती है जो उसमें निर्दिष्ट अन्य शर्तों के अनुसार सूक्ष्म छोटे और मध्यम उद्यम अधिनियम, 2006 के अंतर्गत छोटे अथवा मध्यम उद्यम होने के तौर पर योग्य होता है।
16.4 ऐसी कंपनी के शेयरों में निवेश करने के लिए आवासीय संपत्ति को बेचकर स्टार्ट अप कंपनी को स्थापित करने के इच्छुक व्यक्ति अथवा एचयूएफ को राहत देने के उद्देश्य से आयकर अधिनियम की धारा 54छख को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि एक आवासीय संपत्ति के स्थानांतरण के कारण उत्पन्न दीर्घकालीन पूंजीगत परिसंपत्ति कर हेतु वसूलनीय नहीं होगी यदि ऐसी पूंजीगत प्राप्ति एक ऐसी कंपनी के शेयरों के अंशदान में निवेशित होती है जो शर्तों के अनुसार योग्य स्टार्ट अप होती है जिसमें कि व्यक्ति अथवा एययूएफ कंपनी के पचास प्रतिशत शेयरों को रखता हो और ऐसी कंपनी निवेशक द्वारा विवरणी को भरने की देय तिथि से पहले नर्इ परिसंपत्ति की खरीद के लिए शेयरों में निवेशित राशि का प्रयोग करती है।
16.5 आगे, अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले धारा 54छख अपेक्षा करता है कि कंपनी को नए संयंत्र और मशीनरी के तौर पर नर्इ संपत्ति को खरीदने में पूंजी निवेश करनी चाहिए लेकिन इसमें अन्य विषयों के साथ-साथ कम्प्यूटर या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर शामिल नहीं है।
16.6 स्टार्ट अप पर उक्तकथित शर्तों की घटना से बचने के लिए जहाँ मूल परिसंपत्ति आधार से कम्प्यूटर या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर व्यापारिक गतिविधि के कारण हो, आयकर अधिनियम की धारा 54छख को आगे संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि अभिव्यक्ति "नर्इ परिसंपत्ति" में अंत-अनुसचिविय अंत मंत्रालयी प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा ऐसी प्रमाणित तकनीक वाले स्टार्ट अप की स्थिति में कम्प्यूटर या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर शमिल हो जिसे आधिकारिक राजपत्र में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो।
16.7 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
17. सभी के लिए घरों को प्रोत्साहित करने के लिए पहल
17.1 "सभी के लिए घर" के विस्तृत उद्देश्य के भाग के तौर पर प्रोत्साहन सस्ते घर के क्षेत्र को देखते हुए, घर की परियोजना को विकसित करने और बनाने के लिए निर्धारिती के लाभ की सौ प्रतिशत कटौती के लिए मुहैया कराया गया है यदि गृह परियोजना कुछ शर्तों के अनुसार 31 मार्च 2019 से पहले सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित होता है जिसमें, अन्य विषयों के साथ-साथ, शामिल हैं :
(i) परियोजना अनुमोदन की तिथि से तीन वर्षों की अवधि के अंदर पूरा किया गया हो
(ii) परियोजना कम से कम 1000 वर्ग मीटर के परिमाप वाली भूमि के प्लाट पर होना चाहिए जहां परियोजना दिल्ली, मुंबर्इ, चेन्नर्इ व कोलकाता अथवा इन चार महानगरों की नगर निगम सीमा से वायुमार्ग द्वारा 25 किलोमीटर के अंदर हो और अन्य किसी क्षेत्र में यह 2000 वर्ग मीटर से कम न हो और जहां कथित क्षेत्र में आवासीय र्इकार्इ का निर्माण क्षेत्र क्रमश: तीस वर्ग मीटर और साठ वर्ग मीटर से कम न हो और साथ ही भूमि पर ऐसे प्लाट पर परियोजना केवल हाउंसिग परियोजना ही हो
(iii) जहां आवासीय इकार्इ एक व्यक्ति को आवंटित की जाती है , ऐसी कोर्इ इकार्इ उसे अथवा उसके परिवार के किसी सदस्य आदि को आवंटिन नहीं होगी
17.2 आयकर अधिनियम की धारा 80ड़ड़ में शामिल प्रावधान, अधिनियम द्वारा इसके प्रतिस्थापन से पहले, अन्य विषयों के साथ-साथ, एक आवासीय गृह संपत्ति के अधिग्रहण के लिए एक व्यक्ति द्वारा ऋण पर दिए गए ब्याज के संबंध में एक लाख रूपए तक की कटौती मुहैया करता है। यह लाभ 1 अप्रैल 2014 और 1 अप्रैल, 2015 को प्रारंभ होने वाले दो निर्धारण वर्षों के लिए उपलब्ध था।
17.3 'सभी के लिए घर' को मुहैया कराने के सरकार के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए आयकर अधिनियम 80ड़ड़ को वित्तीय संस्थान से आवासीय गृह संपत्ति के अधिग्रहण के लिए लिए गए ऋण पर ब्याज के संबंध में रू. 50,000 की अतिरिक्त कटौती को मुहैया कराकर गृह ऋण का लाभ उठाकर पहला घर खरीदने वाले का प्रोत्साहन संस्थापित किया गया है। यह प्रोत्साहन उसके संबंध में पचास लाख रूपए से कम की राशि की गृह संपत्ति के लिए विस्तारित किया गया है जिसके संबंध में अधिक से अधिक पैंतीस लाख रूपए की राशि का ऋण 1 अप्रैल, 2016 से 31 मार्च, 2017 की अवधि के दौरान मंजूर किया गया है। आगे, कटौती का यह लाभ ऋण के जारी रहने तक पुर्नभुगतान तक विस्तारित किया जाता है। धारा 80ड़ड़ के अंतर्गत यह कटौती स्वयं ली गर्इ संपत्ति हेतु लिए गए ऋण पर देययोग्य ब्याज के लिए आयकर अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत उपलब्ध दो लाख रूपए की कटौती के अतिरिक्त होगी।
17.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
18. रोजगार पैदा करने के लिए कर प्रोत्साहन
18.1 आयकर अधिनियम की धारा 80ञञकक के प्रावधान, तीन वर्षों के लिए एक फैक्ट्री में नए नियमित कामगारों को दिए गए अतिरिक्त पारिश्रमिक के तीस प्रतिशत की कटौती के लिए मुहैया कराए गए अधिनियम द्वारा इसके प्रतिस्थापन से पहले। फैक्ट्री, जहां 'कामगार' पिछले वर्ष में कम से कम तीन सौ दिनों के लिए नियोजित होता है, में उत्पाद के विनिर्माण के व्यापार हेतु प्रावधान लागू हैं। आगे, लाभ केवल तब ही मौजूद हैं यदि बाद के बर्ष के अंतिम दिन पर नियोजित कामगार की कुल संख्या में कम से कम दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो।
18.2 रोजगार पैदा करने को प्रोत्साहित करने को देखते हुए और सभी क्षेत्रों के लिए प्रोत्साहन मुहैया करने के लिए, धारा 80ञञकक को मुहैया कराने के लिए संस्थापित किया गया है कि कथित प्रावधानों के अंतर्गत कटौती उस किसी कर्मचारी पर व्यय की गर्इ लागत के संबंध में उपलब्ध होगी जिनकी कुल पारिश्रमिक प्रतिमाह पच्चीस हजार से कम अथवा उसके बराबर हो। हालांकि, उन कर्मचारियों पर किए गए व्यय के संबंध में कोर्इ कटौती स्वीकृत नहीं होगी जिसके लिए 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम' 1952 के अनुसार अधिसूचित कर्मचरी पेंशन' के अंतर्गत पूर्ण अंशदान सरकार द्वारा दिया जाता है।
18.3 आगे, वित्त वर्ष में कर्मचारी की न्यूनतम संख्या के लिए मानदंडों को 300 दिनों से 240दिनों तक के लिए राहत दी गर्इ है। इस संबंध में, यह ध्यान दिया जा सकता है कि रोजगार के न्यूनतम दिनों के लिए मानदंड को उस निर्धारिती के लिए 150 दिनों तक छूट दी गर्इ है जो कराधान कानून (संशोधन) अधिनियम, 2016 द्वारा परिधान के विनिर्माण के व्यापार में संलग्न है। प्रति वर्ष कर्मचारियों की संख्या में दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की मौजूदा स्थिति समाप्त कर दी गर्इ है जिससे कर्मचारियों की संख्या में कोर्इ बढ़ोत्तरी नए प्रावधानों के अंतर्गत कटौती के लिए योग्य होगी।
18.4 यह भी मुहैया कराया जाता है कि नए व्यापार के पहले वर्ष में, पिछले वर्ष के दौरान नियोजित कर्मचारियों को दिए गए अथवा दिए जाने वाले सभी पारिश्रमिकों का पैंतीस प्रतिशत कटौती के तौर पर स्वीकृत होगा।
18.5 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
19. संप्रभु स्वर्ण बांड योजना, 2015 हेतु कर लाभ के लिए प्रावधान
19.1 भारत सरकार ने वास्तविक स्वर्ण के लिए मांग को कम करने के उद्देश्य से संप्रभु स्वर्ण बांड योजना को प्रारंभ किया है जिससे सोने के आयात के कारण विदेशी विनिमय के उत्प्रवाह को कम किया जा सके। स्वर्ण बांड वास्तविक स्वर्ण के प्रतिस्थापन के लिए विधि है और उन व्यक्तिगत निवेशक को सुरक्षा प्रदान करता है जिन्होंने सामाजिक बाध्यता को पूरा करने के लिए सोने में निवेश किया है। तद्नुसार वास्तविक स्वर्ण और संप्रभु स्वर्ण बांड के बीच कर उपचार में समता मुहैया कराने को देखते हुए, आयकर अधिनियम की धार 47 को संशेाधित किया है जिससे योजना के अंतर्गत संप्रभु स्वर्ण बांड की कोर्इ छूट व्यक्ति द्वारा स्थानांतरण के तौर पर नहीं समझी जाएगी और इसलिए पूंजीगत प्राप्ति पर कर से छूट मिलेगी।
19.2 आगे, आयकर अधिनियम की धारा 48 को भी संशोधित किया गया है जिससे सभी निर्धारितियों को संप्रभु स्वर्ण बांड के स्थानांतरण से उत्पन्न दीर्घकालीन पूंजीगत प्राप्ति हेतु सूचीकरण लाभों को मुहैया किया जा सके।
19.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन क्रमश: 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
20. रूपए मूल्यवर्ग बांड के लिए कर लाभों को प्रावधान
20.1 भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत से बाहर कोष बढ़ाने के लिए भारतीय निगमितियों को सक्षम करने के उपाय के रूप में भारत से बाहर रूपए मूल्यवर्ग बांड को जारी किया। तद्नुसार, गैर-निवासी निवेशक जो मुद्रा अस्थिरता का जोखिम उठा सकते हैं, को राहत पहुंचाने के लिए यह मुहैया कराने हेतु आयकर अधिनियम की धारा 48 को संशोधित किया गया है कि विदेशी मुद्रा जिसमें निवेश किया जाता है, के समक्ष प्रतिदान की तिथि और जारी करने की तिथि के बीच रूपए के अभिमूल्यन की स्थिति में उत्पन्न, पूंजीगत परिसंपत्ति, पूंजीगत प्राप्ति पर कर से मुक्त होगी।
20.2 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
21. म्युचूअल फंड की 'योजना' के अंतर्गत 'योजना' का समेकन
21.1 आयकर अधिनियम की धारा 47 के वाक्यांश (xvii) के प्रावधानों के अंतर्गत, म्युचूअल फंड की समेकित योजना में, इकार्इ अथवा इकार्इयों के तौर पर पूंजीगत परिसंपत्ति के उसको आवंटन के विचार में किए गए, एक म्युचल फंड की समेकित योजना में उसके द्वारा संघटित, इकार्इ अथवा इकार्इयों के तौर पर, पूंजीगत परिसंपत्ति के इकार्इ धारक द्वारा कोर्इ स्थानांतरण कर हेतु वसूला नहीं जाएगा।
21.2 भारतीय प्रतिभूति नियामक बोर्ड (सेबी) ने योजना के अंतर्गत म्युचुअल फंड के प्रतिफल के लिए दिशानिर्देश जारी किए है। म्युचुअल फंड योजना में विभिन्न योजनाओं के विलयन अथवा समेकन हेतु म्युुचुअल फंड के विलयन अथवा समेकन पर उपलब्ध, छूट देने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 47 को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि म्युचुअल फंड की उस योजना की समेकित योजना में पूंजीगत परिसंपत्ति, इकार्इ अथवा इकार्इयों के तौर पर, के उसे आवंटन के प्रतिफल में किए गए इकार्इ अथवा इकार्इयों, एक म्युचुअल फंड योजना की समेकित योजना में उसके द्वारा संघटित, पूंजीगत परिसंपत्ति, इकार्इ अथवा इकार्इयां, द्वारा कए स्थानांतरण पूंजीगत परिसंपत्ति के उद्देश्य के लिए समेकित स्थानांतरण नहीं होगा और इसलिए कर हेतु वसूलनीय नहीं होगा।
21.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
22. धारा 80छछ के अंतर्गत किए गए किराये के संबंध में स्वीकृत कटौती की सीमा का युक्तिकरण
22.1 अधिनियम द्वारा संशोधन से पहले आयकर अधिनियम की धारा 80छछ में शामिल प्रावधान अपने स्वयं के निवास के उद्देश्य के लिए उसके द्वारा लिए गए सुसज्जित अथवा असुज्जित आवास के संबंध में किराये के भुगतान के लिए उसकी कुल आय के दस प्रतिशत के अतिरिक्त एक व्यक्ति द्वारा किए गए व्यय की कटौती के लिए मुहैया कराया गया है यदि वह नियोजक द्वारा स्वीकृत गृह किराया भत्ते को स्वीकृत नहीं करता, इस सीमा तक ऐसा अतिरिक्त व्यय उसमें निर्दिष्ट अन्य शर्तों के अनुसार वर्ष के लिए उसकी कुल आय के पच्चीस प्रतिशत अथवा दो हजार रूपए प्रति माह, जो भी कम हो, से अधिक न हो।
22.2 व्यक्तिगत करदाताओं को राहत देने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 80छछ को कटौती की अधिकतम सीमा को दो हजार रूपए प्रतिमाह से पांच हजार रूपए प्रतिमाह तक बढ़ाने के लिए संशोधित किया गया है।
22.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
23 स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, 2015 का कर उपचार
23.1 धारा 10 के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, स्वर्ण जमा योजना, 1999 के अंतर्गत जारी स्वर्ण जमा बांड पर ब्याज मुक्त है। आगे, यह बांड पूंजीगत परिसंपत्ति की परिभाषा से मुक्त है और इसलिए उसके स्थानांतरण पर पूंजीगत प्राप्ति पर कर से छूट है।
23.2 स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, 2015 भारत सरकार द्वारा तबसे प्रारंभ की जा चुकी है। योजना के इसी कर लाभ को विस्तारित करने को देखते हुए जैसे यह स्वर्ण जमा योजना, 1999 हेतु विस्तारित है, आयकर अधिनियम की धारा 2 के वाक्यांश (14) को संशोधित किया गया है जिससे पूंजीगत परिंसपत्ति की परिभाषा द्वारा केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, 2015 के अंतर्गत जारी जमा प्रमाणपत्र, को बाहर रखा जा सके और इसलिए इसे पूंजीगत परिसंपत्ति पर कर से मुक्त रखा जा सके। आगे, आयकर अधिनियम की धारा 10 को भी संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि योजना के अंतर्गत जारी जमा प्रमाणपत्र पर ब्याज कर से मुक्त होगा।
23.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप से 1 अप्रैल, 2016 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
24. आयकर अधिनियम की धारा 56 का युक्तिकरण
24.1 अधिनियम द्वारा संशोधन से पूर्व आयकर अधिनियम की धारा 56 की उप-धारा (2) के वाक्यांश (vii) में शामिल प्रावधान अन्य स्रोत से आय की वसूलनीयता के लिए मुहैया कराए गए है यदि रू. 50,000 के अतिरिक्त प्रतिफल के साथ अथवा उसके बिना कोर्इ राशि, अचल संपत्ति अथवा अन्य संपत्ति एक व्यक्ति अथवा एक एचयूएफ के तौर पर एक निर्धारिती द्वारा प्राप्त होती है। प्रावधान वहां भी लागू होंगे जहां कंपनी के शेयर एक कंपनी के डिमर्जर अथवा समामेलन के परिणामस्वरूप प्राप्त होते हैं। ऐसा लेनदेन वसूलनीय नहीं है जहां प्राप्तकर्ता एक फर्म अथवा एक कंपनी हो।
24.2 निर्धारितियों की विभिन्न श्रेणियों के बीच कर उपचार में समानता लाने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 56 की उप-धारा 2 के वाक्यांश (vii) को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि एक कंपनी के डिमर्जर अथवा समामेलन के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति अथवा एचयूएफ द्वारा किसी शेयर पर धारा 56 की उप-धारा (2) के वाक्यांश (vii) के प्रावधान नहीं लगेंगे।
24.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
25. धारा 87क के अंतर्गत स्वीकृत आयकर में छूट की सीमा का युक्तिकरण
25.1 अधिनियम द्वारा संशोधन से पहले आयकर अधिनियम की धारा 87क में शामिल प्रावधानों को भारत में निवासी व्यक्ति के लिए आयकर की राशि से दो सौ रूपए अथवा आयकर के सौ प्रतिशत, जो भी कम हो, के समान राशि की छूट के लिए मुहैया किया गया है जिनकी कुल आय पांच लाख रूपए से कम न हो
25.2 न्यून आय श्रेणी में निवासी व्यक्तियों को राहत देने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 87क को संशोधित किया गया है जिससे मौजूदा दो हजार रूपए से पांच हजार रूपए तक इस प्रावधान के अंतर्गत उपलब्ध छूट की अधिकतम राशि को बढ़ाया जा सके।
25.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
26. 01.04.2015 से पहले की अवधि के लिए विदेशी कंपनियों पर न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) की प्रयोज्यता
26.1 आयकर अधिनियम की धारा 115ञख की उप-धारा (1) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि एक कपंनी की स्थिति में, यदि कर आयकर अधिनियम के अंतर्गत आंके गए अनुसार कुल आय पर देययोग्य हो, अपने बही लाभ के 18 प्रतिशत और 1/2 प्रतिशत से कम होती है तो ऐसा बही लाभ निर्धारिती की कुल आय होने के तौर पर समझा जाएगा और प्रासंगिक पिछले वर्ष के लिए निर्धारिती द्वारा देययोग्य कर इसके बही लाभ का 18 व 1/2 प्रतिशत होगा।
26.2 उन विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआर्इआर्इ) के लिए इस प्रावधन के लागू करने से संबंधित पहले भी चिंता व्यक्त की गर्इ थी कि जिसका भारत में स्थार्इ संस्थापन (पीर्इ) नहीं है। इस मुद्दे को संबोधित करने को देखते हुए, वित्त अधिनियम, 2015 के माध्यम से, धारा 115ञख के प्रावधानों को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया था कि विदेशी कंपनी की स्थिति में आयकर अधिनियम की धारा 115ञख में निर्दिष्ट दर की तुलना में न्यून दर पर वसूलनीय कोर्इ आय बही लाभ से कम होगी और तत्स्थानी व्यय को वापस शामिल किया जाएगा। हालांकि जबसे यह संशोधन भावी हुए थे, निर्धारण वर्ष 2016-17 से प्रभावी, 2016-17 से पहले के निर्धारण वर्ष के लिए निगर्मन संशोधित किया जाना बाकी हैं।
26.3 न्यायाधीश ए.पी. शाह की अध्यक्षता में प्रत्यक्ष कर मामलों पर एक समिति, मामले पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, इस तथ्य के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक/विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफआर्इआर्इ/एफपीआर्इ) हेतु न्यूनतम वैकल्पिक कर (एमएटी) के उदग्रहण को स्पष्ट करने के लिए धारा 115ञख के संशोधन के लिए सिफारिश की है कि एफआर्इआर्इ और एफपीआर्इ के सामान्य रूप से भारत में व्यापार का स्थान नहीं है।
26.4 समिति की सिफारिशों को देखते हुए और विदेशी कंपनियों के कराधान में निश्चितता प्रदान कराने को देखते हुए, आयकर अधिनियम की धारा 115ञख को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि प्रभावी तिथि 01.04.2001 से, धारा 115ञख के प्रावधान एक विदेशी कंपनी हेतु प्रयोज्य नहीं होंगे यदि -
(i) निर्धारिती एक राष्ट्र का निवासी है अथवा एक निर्दिष्ट क्षेत्र जिसके साथ भारत ने धारा 90 की उप-धारा (1) में संदर्भित एक समझौता किया है अथवा केंद्र सरकार ने धारा 90क की उप-धारा (1) कोर्इ समझौता किया है और निर्धारिती के पास ऐसे समझौते के प्रावधानों के अनुसार भारत में स्थार्इ संस्थापन नहीं है; अथवा
(ii) निर्धारिती एक राष्ट्र का निवासी है जिसके साथ उक्त वाक्यांश (i) में संदर्भित रूप का समझौता नहीं किया है और निर्धारिती को कंपनियों से संबंधित फिलहाल के लिए किसी कानून के अंतर्गत पंजीकरण की मांग की आवश्यकता नहीं है।
26.5 प्रयोज्यता : यह संशोधन पूर्वव्यापी रूप से 1 अप्रैल, 2001 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2001-02 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
27. अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र हेतु कर प्रोत्साहन
27.1 आयकर अधिनियम की धारा 10 के वाक्यांश (38) के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, र्इक्विटी ओरिएंटिड कोष अथवा व्यापारिक न्यास की इक्विटी शेयर अथवा यूनिट्स से अर्जित दीर्घकालीन पूंजीगत प्राप्ति के रूप में आय मुक्त है जहां प्रतिभूति लेनदेन कर का भुगतान किया हो।
27.2 अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र की विश्वस्तरीय सेवा हब में वृद्धि के प्रोत्साहन को देखते हुए, आयकर अधिनियम की धारा 10 को संशोधित किया गया है जिससे अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र में स्थित मान्यताप्राप्त शेयर बाजार पर विदेशी मुद्रा में किए गए लेनदेन से अर्जित आय हेतु पूंजीगत प्राप्ति पर कर से छूट के लिए मुहैया कराया जा सके भले ही प्रतिभूति लेनदेन कर ऐसे लेनदेनों के संबंध में न दिया गया हो। इसी प्रकार के लेनदेन अल्प अवधि के पूंजीगत प्राप्ति पर कर की कम दर के लिए मुहैया कराने हेतु आयकर अधिनियम की धारा 111क हेतु संशोधन किया गया है।
27.3 आयकर अधिनियम की धारा 115ञख के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, कंपनी की स्थिति में, यदि कुल आय पर देययोग्य कर जिसे आयकर अधिनियम के अंतर्गत आंका गया हो, इसके बही लाभ के 18 और 1 1/2 प्रतिशत से कम है तो ऐसा बही लाभ निर्धारिती की कुल आय होने के तौर पर समझा जाएगा और प्रासंगिक पिछले वर्ष के लिए निर्धारिती द्वारा देययोग्य एमएटी ऐसे बही लाभ का 18 और 1 1/2 प्रतिशत होगा।
27.4 अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र हेतु प्रतिस्पर्धी कर व्यवस्था मुहैया कराने को देखते हुए आयकर अधिनियम की धारा 115ञख को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि कंपनी की स्थिति में, अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र में स्थित इकार्इ के तौर पर और परिवर्तनीय विदेशी विनिमय में इसकी प्राप्ति नौ प्रतिशत की दर पर वसूलनीय होगी।
27.5 आयकर अधिनियम की धारा 115-ण को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि वितरित लाभ पर कोर्इ कर ऐसा लाभांश प्राप्त करने वाले व्यक्ति अथवा कंपनी के हाथों, इसकी वर्तमान आय में से 1 अप्रैल, 2017 को अथवा उसके बाद लाभांश के रूप में (चाहे अंतरिम हो अथवा अन्यथा) ऐसी कंपनी द्वारा घोषित, वितरित अथवा दी गर्इ किसी राशि पर किसी निर्धारण वर्ष के लिए, परिवर्तनीय विदेशी विनिमय में ही प्राप्त आय, अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र में स्थित एक इकार्इ के तौर पर कंपनी की कुल आय के संबंध में नहीं वसूला जाएगा।
27.6 प्रतिभूति लेनदेन कर और वस्तु लेनदेन कर से संबंधित मौजूदा प्रावधान क्रमश: करयोग्य प्रतिभूति और वस्तु में लेनदेन पर कर के उदग्रहण के लिए मुहैया कराया गया है। वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 की धारा 113क को प्रतिस्थापित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि अध्याय VII के प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय वित्त सेवा केंद्र में स्थित मान्यताप्राप्त शेयर बाजार पर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए करयोग्य प्रतिभूति लेनदेनों के लिए लागू होगा जहां ऐसे लेनदेन के लिए प्रतिफल विदेशी मुद्रा में दी जाती है अथवा देययोग्य है, इस प्रकार से प्रतिभूति लेनदेन कर द्वारा ऐसे लेनदेन से छूट मिलती है।
27.7 आगे, वित्त अधिनियम, 2013 का अध्याय VII में धारा 132क को शामिल किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि अध्याय VII के प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद की इकार्इ में स्थित प्राधिकृत संघ पर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए कराधान वस्तु लेनदेन हेतु लागू नहीं होगा जहां ऐसे लेनदेन के लिए प्रतिफल विदेशी मुद्रा में दी जाती है अथवा देययोग्य है, इस प्रकार से वस्तु लेनदेन कर द्वारा ऐसे लेनदेन से छूट मिलती है।
27.8 प्रयोज्यता : वित्त (सं.2) अधिनियम, 2004 की धारा 113क और वित्त अधिनियम, 2013 हेतु धारा 132क की प्रविष्टि 1 जून, 2016 से प्रभावी होगी। धारा 10, 111क, 115ञख और 115-ण हेतु संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से प्रभावी होंगे और निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी निर्धारण वर्ष के संबंध में लागू होगा।
28. धारा 112(1)(ग) के उद्देश्य के लिए शब्द 'असूचीबद्ध प्रतिभूतियों' की परिभाषा से संबंधित स्पष्टीकरण
28.1 आयकर अधिनियम की धारा 112 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (ग) के मौजूदा प्रावधान प्रतिभूतियों, चाहे सूचीबद्ध हो या असूचीबद्ध, के स्थानांतरण से उत्पन्न दीर्घकालीन पूंजीगत प्राप्ति के दस प्रतिशत की दर से कर की दर के लिए मुहैया कराया गया है। कथित प्रावधान के लिए अभिव्यक्ति "प्रतिभूति" का वही अर्थ है जैसा प्रतिभूति अनुबंध (नियामक) अधिनियम, 1956 (1956 की 32) ('एससीआरए') की धारा 2 के वाक्यांश (ज) में है। न्यायालय द्वारा दृष्टिकोण अपनाया गया है कि निजी कंपनी के शेयर 'प्रतिभूति' नहीं है।
28.2 जहां तक कराधान की स्थिति को स्पष्ट करने का संबंध है, आयकर अधिनियम की धारा 112 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (ग) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि कंपनी के शेयर के तौर पर पूंजीगत परिसंपत्ति ऐसी कंपनी नहीं जिसमें जनता वास्तविक रूप से हितार्थी है, के स्थानांतरण से उत्पन्न दीर्घकालीन पूंजीगत प्राप्ति 10 प्रतिशत की दर पर कर हेतु वसूलीनय होगी।
28.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
29. धारा 50ग का युक्तिकरण यदि बिक्री प्रतिफल अचल संपत्ति के पंजीकरण की तिथि से पहले किए गए समझौते के अंतर्गत निश्चित होता है
29.1 आयकर अधिनियम की धारा 50ग मुहैया कराता है कि भूमि अथवा भवन अथवा दोनों के तौर पर पूंजीगत परिसंपत्ति के स्थानांतरण की स्थिति में, स्टांप ड्यूटी के भुगतान के लिए स्टांप मूल्यांकन प्राधिकारी द्वारा मूल्यांकित अथवा अपनार्इ गर्इ राशि पूंजीगत प्राप्ति के भुगतान के लिए प्रतिफल की पूर्ण राशि के तौर पर ली जाएगी। यह प्रावधान वहां कोर्इ राहत नहीं देगा जहां विक्रेता ने अचल संपत्ति के स्थानांतरण की वास्तविक तिथि से काफी पहले संपत्ति को बेचने के लिए समझौता किया हो और बिक्री प्रतिफल ऐसे समझौत मे निश्चित होती है जहां समकक्ष प्रावधान आयकर अधिनियम मी धारा 43ग में प्रावधान के समान मौजूद है यानि अचल संपत्ति को कारोबारी माल के तौर पर बेचा जाता है।
29.2 आयकर अधिनियम की धारा 50ग को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि जहां समझौते की तिथि अचल संपत्ति के स्थानांतरण के लिए प्रतिफल की राशि को निश्चित करती है और पंजीकरण की तिथि समान नहीं है तो समझौते की तिथि पर स्टांप ड्यूटी राशि प्रतिफल की पूर्ण राशि की गणना के लिए ली जा सकती है। आगे यह मुहैया किया जाता है कि यह प्रावधान केवल उन मामलों में लागू होंगे जहां उसमें संदर्भित अथवा उसके भाग में संदर्भित प्रतिफल की राशि एक अकांउट पेर्इ चेक अथवा अकाउंट पेयी बैंक ड्राफ्ट के रूप में दिया गया हो अथवा ऐसी अचल संपत्ति के स्थानांतरण के लिए समझौते की तिथि को अथवा उससे पहले बैंक खाते के माध्यम से दिया गया हो।
29.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
30. सीमित देयता भागीदारी में कंपनी के रूपांतरण का युक्तिकरण (एलएलपी)
30.1 अधिनियम द्वारा संशोधन से पहले आयकर अधिनियम की धारा 47 के वाक्यांश (xiiiख) को मुहैया कराया गया है कि निजी सीमित अथवा असूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनी के सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) का रूपांतरण स्थानांतरण के तौर पर नहीं समझे जाऐंगे यदि कुछ शर्तें पूरी की जाती हैं, जो अन्य विषयों के साथ-साथ शर्त को शामिल करती है कि कंपनी की बाद के तीन वर्षों में सकल प्राप्ति, कारोबार अथवा कुल बिक्री साठ लाख रूपए से अधिक नहीं थी।
30.2 आयकर अधिनियम की धारा 47 के वाक्यांश (xiiiख) को संशोधित किया गया है कि जिससे मुहैया किया जा सके कि, कर-तटस्थ रूपांतरण का लाभ लेने के लिए, मौजूदा शर्तों के अतिरिक्त, पिछले वर्ष जिसमें रूपांतरण हुआ, के बाद कि किन्हीं तीन वर्षों में कंपनी के बही खातों में कुल परिसंपत्ति की राशि पांच करोड़ रूपए से अधिक नहीं होनी चाहिए।
30.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
31. राष्ट्रीय पेंशन योजना, मान्यताप्राप्त भविष्य निधि और सेवानिवृत्ति कोष के कर उपचार का युक्तिकरण
31.1 अधिनियम द्वारा इसके संशोधन से पहले आयकर अधिनियम की धारा 80गगघ के प्रावधान मुहैया कराता है कि खाता बंद करने पर अथवा पेंशन योजना से बाहर होने वाले कर्मचारी को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली द्वारा कोर्इ भुगतान कर हेतु वसूलनीय होगा।
31.2 आयकर अधिनियम की धारा 10 में एक नया वाक्यांश (12क) शामिल किया गया है और आयकर अधिनियम की धारा 80गगघ को संशोधित किया गया है ताकि मुहैया किया जा सके कि धारा 80गगघ हेतु संदर्भित पेंशन योजना को चुनने अथवा समाप्ति के कारण कर्मचारी को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली द्वारा कोर्इ भुगतान, सीमा तक यह योजना को उसके द्वारा चुनने अथवा समाप्ति के समय उसको दी गर्इ कुल राशि के चालीस प्रतिशत से अधिक न हो, कर से मुक्त होगा। हालांकि, नामांकित व्यक्ति द्वारा प्राप्त पूर्ण राशि निर्धारिती की मृत्यु पर कर से मुक्त होगी।
31.3 प्राधिकृत भविष्य निधि और सेवानिवृत्ति कोष कर्मचारी द्वारा उपलब्ध करार्इ गर्इ सामाजिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक विकल्प है। प्राधिकृत भविष्य निधि, जो कर्मचारी के वेतन का बारह प्रतिशत से अधिक है, में कर्मचारी भागीदारी के ऋण हेतु कर्मचारी द्वारा किए गए अंशदान अधिनियम की चौथी अनुसूची के भाग क के अंतर्गत, कर्मचारी के हाथों कर के लिए उत्तरदायी है। हालांकि, कर्मचारी द्वारा किए गए अंशदान के लिए कोर्इ मौद्रिक सीमा नहीं है। चौथी अनुसूची के भाग क को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया था कि प्राधिकृत भविष्य निधि में कर्मचारी के खाते में एक कर्मचारी द्वारा कर-मुक्त अंशदान पर एक लाख और पचास हजार रूपए के उच्च्तम मौद्रिक सीमा को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया था। आगे, धारा 17 के अंतर्गत, निर्धारिती के हाथों रियायत में कर्मचारी द्वारा अनुमोदित सेवानिवृत्ति कोष हेतु एक लाख रूपए से अधिक का कोर्इ अंशदान की राशि शामिल है। दोनों अनुमोदित सेवानिवृत्ति कोष और प्राधिकृत भविष्य निधि के लिए कर-मुक्त कर्मचारी के बीच समानता लाने के लिए, धारा 17 को कर लगाए बिना एक लाख और पचास हजार रूपए के लिए कर्मचारी अंशदान की सीमा को बढ़ाने के लिए संशोधित किया गया है।
31.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
32. समकरण उदग्रहण
32.1 यदि स्थार्इ प्रतिस्थापन (पीर्इ) सिद्धांत डिजिटल क्षेत्र में संचालित नर्इ अर्थव्यवस्था में प्रभावी रहते हैं तो पुरानी अर्थव्यवस्था जैसे व्यापार का स्थान, स्थल और स्थिरता के लिए विकसित किए गए सैद्धांतिक पीर्इ नियामकों को नर्इ डिजिटल वास्तविकता के साथ स्वीकार करना होगा।
32.2 इस संबंध में, मूल कटौती और लाभ स्थानांतरण (बीर्इपीएस) परियोजना की कार्य योजना 1 के अंतर्गत आर्थिक समन्वय और विकास संगठन (ओर्इसीडी) ने प्रत्यक्ष कर चुनौतियों से निपटने के लिए कर्इ विकल्प सुझाए हैं। विकल्प अन्य विषयों के साथ-साथ में विदेशी र्इ-कॉमर्स प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए डिजिटल उत्पाद अथवा सेवाओं के लिए कुछ भुगतानों पर अंतिम कर कटौती को अधिरोपित करने के लिए विकल्प शामिल हैं। ओर्इसीडी द्वारा उपलब्ध कराए गए सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद सीबीडीटी द्वारा बनार्इ गर्इ र्इ-कॉमर्स पर समिति ने भारत में डिजिटल लेनदेन के कराधान के लिए अंतिम कर कटौती विकल्प को बनाने में समकरण लाने की सिफारिश की।
32.3 उक्त को देखते हुए, "समकरण उदग्रहण" नामक एक अध्याय को अधिनियम के माध्यम से लाया गया था जिससे यह मुहैया किया जा सके कि निर्दिष्ट सेवाओं के लिए प्रतिफल की राशि का 6 प्रतिशत के समान उदग्रहण भारत में निवासियों जो व्यापार अथवा कारोबार करते है अथवा द्वारा भारत में स्थार्इ प्रतिष्ठान (पीर्इ) रखने वाले गैर-निवासियों द्वारा अथवा भारत में स्थार्इ प्रतिष्ठान रखने वाले गैर-निवासियों द्वारा प्राप्त हुर्इ अथवा प्राप्तनीय है।
32.4 आगे, डिजिटल क्षेत्र में छोटे कारोबारियों के बोझ को कम करने के लिए, यह भी मुहैया किया गया है कि ऐसा उदग्रहण नहीं लगाया जाएगा यदि भारत में स्थार्इ प्रतिष्ठान रखने वाले गैर-निवासियों द्वारा अथवा भारत में निवासी व्यक्ति द्वारा एक गैर-निवासी व्यक्ति से प्राप्त हुर्इ अथवा प्राप्तनीय निर्दिष्ट सेवाओं के लिए प्रतिफल की कुल राशि किसी पिछले वर्ष में एक लाख रूपए से अधिक न हो।
32.5 दोहरे कराधान से बचने के लिए, आगे यह भी मुहैया कराया जाता है कि निर्दिष्ट सेवाओं जिस पर समकरण उदग्रहण वसूला जाता है, से उत्पन्न किसी आय के लिए आयकर अधिनियम की धारा 10 के अंतर्गत छूट है।
32.6 इस अध्याय के प्रावधानों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए, आगे यह मुहैया किया जाता है कि इस अध्याय के अंतर्गत वसूलनीय निर्दिष्ट सेवाओं के लिए निर्धारिती द्वारा किए गए व्यय केंद्र सरकार के ऋण के समकरण उदग्रहण को जमा करने और कटौती हेतु निर्धारिती की विफलता की स्थिति में कटौती के तौर पर स्वीकृत नहीं होगी।
32.7 प्रयोज्यता यह मुहैया किया गया था कि यह अध्याय आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होने की तिथि से प्रभावी होगा। इसी प्रकार, अधिसूचना सं. 37(एसओ 1904र्इ), दिनांक 27 मर्इ, 2016 के द्वारा केंद्र सरकार ने 1 जून, 2016 को उस तिथि के रूप में चुना है जबसे इस अध्याय के प्रावधान प्रभावी होंगे।
33. वाहन, उत्पाद की बिक्री अथवा सेवाओं पर स्रोत पर कर संग्रहण (टीसीएस)
33.1 आयकर अधिनियम की धारा 206ग के मौजूदा प्रावधान, अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराते हैं कि विक्रेता निर्दिष्ट मदों जैसे मानवीय प्रयोग के लिए शराब, तेंदु पत्तियां, कबाड़, कोयले अथवा लिग्नाइट अथवा लौह अयस्क के तौर पर खनिज, बुलियन आदि की बिक्री के समय विक्रेता से निर्दिष्ट दर पर स्रोत पर कर संग्रहण करेगा यदि दो लाख रूपए से अधिक नगद हुआ।
33.2 उत्पाद तथा सेवाओं की बिक्री में नगद लेनदेन को कम करने के लिए और व्यापारिक प्रणाली में बेहिसाब राशि को प्रवाह को रोकने के लिए और टैक्स नेट में उच्च राशि का लेनदेन करने के लिए यह मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 206ग की उप-धारा (1घ) को संशेाधित किया गया है कि विक्रेता किसी उत्पाद (बुलियन और आभूषण के अलावा) के नगद में बिक्री पर और दो लाख रूपए से अधिक की सेवा (उस भुगतान को छोड़कर जिस पर कर अध्याय XVII-ख के अंतर्गत स्रोत पर काटा जाता है) देने पर खरीददार से एक प्रतिशत की दर पर कर वसूलेगा और नर्इ उप-धारा (1च) को यह मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 206ग में शामिल किया गया कि विक्रेता जो दस लाख रूपए से अधिक के मोटर वाहन की बिक्री के लिए प्रतिफल प्राप्त करता है, विक्रेता से कर के तौर पर बिक्री प्रतिफल का एक प्रतिशत वसूलेगा।
33.3 आगे, नर्इ उप-धारा (1ड़) को आयकर अधिनियम की धारा 206 में यह मुहैया कराने के लिए शामिल किया गया था कि किसी उत्पाद (बुलियन और आभूषण के अलावा) की बिक्री या सेवा के संबंध में टीसीएस से संबंधित धारा 206ग की उप-धारा (1घ) के प्रावधान उन विक्रेताओं की कुछ श्रेणियों के लिए लागू नहीं होगा जो ऐसी शर्तों को पूरा करते हैं जिसे निर्धारित किया जा सके।
33.4 इसके अतिरिक्त, बोर्ड ने परिपत्र सं. 22/2016 दिनांक 8 जून, 2016 और परिपत्र सं. 24/2016 दिनांक 24 जून, 2016 को कार्यक्षेत्र, प्रयोज्नीयता और धारा 206ग के संशोधित प्रावधान की स्थिति में अनुसरित होने वाली प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए जारी किया है।
33.5 प्रयोज्नीयता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी हुआ।
34. कटौती और छूट की चरणबद्धता
34.1 वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण 2015 में सूचित किया है कि निगमित कर की दर छूट और घोषणाओं की तत्स्थानी चरणबद्धता के साथ अगले चार वर्षों में 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक कम की जाएगी। तद्नुसार, सरकार ने कुछ मार्गदर्शक सिद्धांतों और प्रस्तावित चरणबद्ध योजनाओं पर आधारित चरणबद्ध तरीके में इस निर्णय को कार्यान्वित किया है। तद्नुसार, प्रस्तावित चरणबद्ध तरीके पर हितधारकों के प्रतिउत्तर पर विचार करते हुए, आयकर अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित पहल आयकर अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों को संशोधित कर तालिका 1 और तालिका 2 में नीचे सारणीबद्ध तरीके में दिया गया है
तालिका - 1
| क्र.सं. | धारा | संशोधन से पहले आयकर अधिनियम में उपलब्ध प्रोत्साहन | आयकर अधिनियम 2016 द्वारा आयकर अधिनियम के संशोधन के माध्यम से प्रोत्साहन की चरणबद्धता |
| 1 | 10कक - विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसर्इजेड) में नर्इ प्रतिस्थापित इकार्इयों के संबंध में विशेष प्रावधान | उत्पाद अथवा वस्तु अथवा सेवाओं के निर्यात से प्राप्त लाभ के लिए एसर्इजेड में इकार्इयों के लिए लाभ से जुड़ी कटौतियां | कोर्इ कटौती 1 अप्रैल, 2020 (पिछले वर्ष 2020-21 से) को अथवा उसके बाद उत्पाद अथवा वस्तु के विनिर्माण अथवा उत्पाद किए जाने अथवा सेवा दिए जाने वाली इकार्इयों के लिए उपलब्ध नहीं होगी |
| 2 | 35कग-योग्य परियोजनाओं या योजनाओं पर व्यय | कुछ योग्य सामाजिक विकास परियोजनाएं अथवा योजनाओं पर एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अथवा एक स्थानीय प्राधिकारी अथवा एक अनुमोदित संस्थान अथवा संस्था आदि को किसी राशि के भुगतान के रूप में किए गए व्यय के लिए कटौती | कोर्इ कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 और उसके बाद के वर्ष) से उपलब्ध नहीं होगी |
| 3 | 35गगघ-कुशल विकास पर व्यय परियोजना | एक कंपनी द्वारा किसी अधिसूचित कुशल विकास परियोजना पर किए गए किसी व्यय (किसी भूमि अथवा भवन की लागत के रूप में व्यय के तौर पर नहीं) पर 150 प्रतिशत की भारित कटौती | कटौती 01.04.2020 (यानी पिछले वर्ष 2020-21 से) से 100 प्रतिशत तक प्रतिबंधित होगी |
| 4 | 35गगग-अधिसूचित कृषि विस्तारण परियोजना पर व्यय | अधिसूचित कृषि विस्तारण परियोजना पर किए गए किसी व्यय के 150 प्रतिशत की भारित कटौती | कटौती 01.04.2020 (यानी पिछले वर्ष 2020-21 से) से 100 प्रतिशत तक प्रतिबंधित होगी |
5 |
धारा 80झक : 80झकख, और 80झख - निम्न द्वारा प्राप्त लाभ के संबंध में कटौती क) अवसंरचना का विकास, संचालन और रखरखाव ख) विशेष आर्थिक क्षेत्र (80झकख) की विकास सुविधा (80-झक) ग) खनिज तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन [(80-झख(9)] |
धारा 80झक, 80झकख और 80झख में संदर्भित औद्योगिक उपक्रम अथवा उद्यम द्वारा किए गए पात्र व्यापार में निर्दिष्ट अवधि के लिए 100 प्रतिशत लाभ से जुड़ी कटौतियां |
कोर्इ कटौती उपलब्ध नहीं होगी यदि निर्दिष्ट गतिविधि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 और उसके बाद के वर्ष) से प्रारंभ होती है |
34.2 प्रयोज्यता : तालिका 1 में निर्दिष्ट संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होंगे और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होंगे।
तालिका - 2
| क्र.सं. | धारा | अधिनियम 2016 द्वारा संशोधन से पहले आयकर अधिनियम में उपलब्ध प्रोत्साहन | अधिनियम 2016 द्वारा आयकर अधिनियम के संशोधन के माध्यम से प्रोत्साहन की चरणबद्धता |
1 |
आयकर नियम 1962 के नियम 5 के साथ पठित 32 - बढ़ा हुआ मूल्यहस |
बढ़ा हुआ मूल्यहस निवेश के लिए प्रोत्साहन देने के लिए कुछ औद्योगिक क्षेत्रों को मुहैया किया है। आयकर अधिनियम के अंतर्गत मूल्यहस परिसंपत्तियों के कुछ खंड के संबंध में 100 प्रतिशत तक उपलब्ध है |
आयकर नियम, 1962 के नियम 5 के साथ पठित नया परिशिष्ट I यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि आयकर अधिनियम के अंतर्गत मूल्यहस की उच्चतम दर प्रभावी तिथि (यानी पिछले वर्ष 2017-18 और उसके बाद के वर्ष से) 01.04.2017 से 40 प्रतिशत तक सीमित होगी नर्इ दर परिसंपत्तियों के प्रासंगिक खंड में आने वाले सभी परिसंपत्तियों (चाहे नर्इ हो या पुरानी) के लिए लागू होगी |
2 |
35(1)(ii) - वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय |
एक अनुमोदित वैज्ञानिक अनुसंधान संघ जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान करना है, को दी गर्इ किसी राशि के 175 प्रतिशत की सीमा तक व्यापारिक आय से भारित कटौती। इसी प्रकार की कटौती भी उपलब्ध होगी यदि एक राशि अनुमोदित विश्वविद्यालय, कॉलेज अथवा अन्य संस्थान को दिया जाता है यदि ऐसी राशि वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए प्रयोग की जाती है |
भारित कटौती 01.04.2017 से 31.03.2020 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से पिछले वर्ष 2019-20) 150 प्रतिशत तक सीमित होगी और कटौती 01.04.2020 (यानी पिछले वर्ष 2020-21 से 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
3 |
35(1)(iiक) - वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय |
अनुमोदित वैज्ञानिक अनुसंधान कंपनी को अंशदान के तौर पर दी गर्इ किसी राशि के 125 प्रतिशत की सीमा तक व्यापारिक आय से भारित कटौती |
कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से) से 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
4 |
35(1)(iii) - वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय |
सामाजिक विज्ञान अथवा सांख्यकीय अनुसंधान में अनुसंधान के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले अनुमोदित अनुसंधान संघ अथवा विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज अथवा अन्य संस्थान को 125 प्रतिशत की सीमा तक व्यापारिक आय से भारित कटौती |
कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से) से 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
5 |
35(2कक) - वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय |
अनुमोदित वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यक्रम के उद्देश्य के लिए भारतीय प्रयोगशाला अथवा एक विश्वविद्यालय अथवा एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान को दी गर्इ किसी राशि के 200 प्रतिशत की सीमा तक व्यापारिक आय से भारित कटौती |
भारित कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 से 31.03.2020 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से पिछले वर्ष 2019-20) के 150 प्रतिशत तक सीमित होगी कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2020-21 से) से 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
6 |
35(2कख) - वैज्ञानिक अनुसंधान पर व्यय |
अनुमोदित आंतरिक अनुसंधान और विकास सुविधा पर वैज्ञानिक अनुसंधान पर अनुसूची-XI में निर्दिष्ट नकारात्मक सूची में दिखने वाली किसी कुछ मदों को छोड़कर किसी उत्पाद अथवा मद के विनिर्माण अथवा उत्पादन के व्यापार में अथवा जैव-प्रौद्योगिकी के व्यापार में संलग्न एक कंपनी द्वारा किए गए व्यय (किसी भूमि अथवा भवन की लागत के रूप में व्यय के तौर पर नहीं) के 200 प्रतिशत की भारित कटौती |
भारित कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 से 31.03.2020 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से पिछले वर्ष 2019-20) के 150 प्रतिशत तक सीमित होगी कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2020-21 से) से 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
7 |
35कघ - निर्दिष्ट व्यापार के संबंध में कटौती |
कृषि उत्पादन के भंडारण के लिए कोल्ड चेन सुविधा, वेयरहाउसिंग सुविधा, सस्ती गृह परियोजना, उर्वरक के उत्पादन और अस्पताल निर्माण की स्थिति में पूंजीगत परिसंपत्ति (भूमि, साख और वित्तीय परिसंपत्तियों पर व्यय) के 150 प्रतिशत की भारित कटौती |
कृषि उत्पादन के भंडारण के लिए कोल्ड चेन सुविधा, वेयरहाउसिंग सुविधा, अस्पताल, सस्ती गृह परियोजना, उर्वरक के उत्पादन की स्थिति में कटौती प्रभावी तिथि 01.04.2017 (यानी पिछले वर्ष 2017-18 से) से पूंजीगत व्यय के 100 प्रतिशत तक सीमित होगी |
34.3 प्रयोज्यता : तालिका 2 में निर्दिष्ट संशोधन 1 अप्रैल, 2018 से लागू होंगे और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2018-19 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होंगे।
35. विद्युत क्षेत्र के लिए धारा 32(1)(iiक) के अंतर्गत अतिरिक्त प्रारंभिक मूल्यह्रास के लाभ का विस्तारण
35.1 आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 32(1)(iiक) के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत 20 प्रतिशत का अतिरिक्त मूल्यह्रास विद्युत के उत्पादन और वितरण के व्यापार में लगे कुछ निर्धारितयों द्वारा प्राप्त और प्रतिष्ठापित नए संयंत्र और मशीनरी की लागत के संबंध में स्वीकृत है। यह मूल्यह्रास स्वीकृति अधिनियम की धारा 32(1)(ii) के अंतर्गत सामान्य मूल्यह्रास के लिए स्वीकृत कटौती के अतिरिक्त है। अतिरिक्त मूल्यह्रास का यह लाभ विद्युत के हस्तांतरण के व्यापार में लगे हुए निर्धारितियों द्वारा अधिष्ठापित नर्इ मशीनरी या संयंत्र पर उपलब्ध नहीं है।
35.2 विद्युत क्षेत्र के युक्तिकरण के लिए, अधिनियम की धारा 32(1)(iiक) को संशोधित किया गया है जिससे प्रदान किया जा सके कि विद्युत के हस्तांतरण के व्यापार में लगे कुछ निर्धारित पिछले वर्ष में अधिष्ठापित या प्राप्त नर्इ मशीनरी और संयंत्र की वास्तविक लागत के 20 प्रतिशत की दर पर अतिरिक्त मूल्यह्रास की भी स्वीकृति होगी।
35.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
36. स्पैक्ट्रम की खरीद के लिए स्पैक्ट्रम शुल्क की ऋणमुक्ति
36.1 सरकार ने अभी स्पेक्ट्रम की नीलामी के लिए स्पेक्ट्रम शुल्क की शुरूआत की है और ब्याज के साथ या तो एकमुश्त या किश्त के रूप में दी जाने वाली स्पेक्ट्रम हेतु अधिकार प्राप्त करने के लिए भुगतान की स्वीकृति दी है। स्पेक्ट्रम के संबंध में उक्त निर्दिष्ट भुगतान (एकमुश्त या किश्त) के कर उपचार में अनिश्चितता है यानी चाहे स्पेक्ट्रम अमूर्त संपत्ति हो और दी गर्इ स्पेक्ट्रम शुल्क आयकर अधिनियम की धारा 32 के अंतर्गत मूल्यह्रास के लिए योग्य हो अथवा यह दूरसंचार व्यापार को संचालित करने के लिए लार्इसेंस के रूप में हो और आयकर अधिनियम की धारा 35कखख के अंतर्गत कटौती के लिए पात्र हो।
36.2 स्पष्टता प्रदान करने के लिए और भविष्य में किसी मुकद्मेबाजी और विवाद से बचने के लिए, अधिनियम द्वारा आयकर अधिनियम में नर्इ धारा 35कखक को मुहैया कराने के लिए शामिल किया गया है कि स्पेक्ट्रम को प्रयोग करने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए दिया गया शुल्क उस अवधि पर परिशोधित होना है जिसके लिए स्पेक्ट्रम को प्रयोग करने का अधिकार दिया गया है। स्पेक्ट्रम शुल्क का निम्नलिखित ब्यौरेवार विवरण मुहैया करता है कि :-
(i) स्पेक्ट्रम शुल्क का भुगतान कर दूरसंचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम के प्रयोग के किसी अधिकार को प्राप्त करने के लिए किया गया और निर्धारिती द्वारा वास्तविक रूप से दिया गया अथवा ऐसे तरीके में निर्धारिती द्वारा देययोग्य कोर्इ पूंजीगत व्यय जिसे निर्धारित किया जा सके, उस अवधि पर समान किश्तों में कटौती के तौर पर स्वीकृत होगा जिसके लिए स्पेक्ट्रम को प्रयोग करने का अधिकार प्रभावी रहता है।
(ii) जहां स्पेक्ट्रम स्थानांतरित होता है और स्थानांतरण का लाभ शेष अस्वीकृत व्यय से कम होता है तो स्थानांतरण के लाभ को कम करके शेष अस्वीकृत व्यय के समान कटौती उस वर्ष में स्वीकृत होगा जिसमें स्पेक्ट्रम को स्थानांतरित किया गया हो।
(iii) जहां स्पेक्ट्रम स्थानांतरित होता है और स्थानांतरण का लाभ शेष अस्वीकृत व्यय से कम होता है तो अतिरिक्त राशि उस पिछले वर्ष में व्यापार के लाभ और प्राप्ति के तौर पर कर हेतु वसूलनीय होगा जिसमें स्पेक्ट्रम को स्थानांतरित किया गया हो।
(iv) अस्वीकृत व्यय यदि जहां स्पेक्ट्रम का भाग स्थानांतरित होता है, अमूर्त होगा
(v) एकीकरण की योजना के अंतर्गत, यदि समामेल करने वाली कंपनी समामेली कंपनी, भारतीय कंपनी के तौर पर, के स्पेक्ट्रम को बेचती और स्थानांतरित करती हो तो इस धारा के प्रावधान समामेली कंपनी के लिए लागू होंगे जैसे वह समामेलन कंपनी के लिए लागू हुए थे यदि बाद में स्पेक्ट्रम को स्थानांत न किया गया हो।
36.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
37. 'पेटेंट' से आय का कराधान
37.1 स्थानीय अनुसंधान व विकास गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए और भारत को वैश्विक आरएंडडी हब बनाने के लिए, सरकार ने पेटेंट से आय के लिए रियायती कराधान व्यवस्था को रखने का निर्णय लिया है। रियायती करधान व्यवस्था का उद्देश्य मौजूदा पेटेंट को बनाए रखने और व्यवसायीकरण के लिए कंपनियों हेतु अतिरिक्त प्रोत्साहन और नर्इ नवीकृत पेटेंट उत्पादों का विकास मुहैया करता है। यह कंपनियों को भारत में विकास, विनिर्माण और पेटेंट दोहन से संबंधित अति महत्व नौकरियों को खोजने में प्रोत्साहित करेगा। आर्थिक समन्वय और विकास संगठन (ओर्इसीडी) ने सुझाया है कि, कार्य योजना 5 के अंतर्गत मूल कटौती और लाभ स्थानांतरण (बीर्इपीएस) परियोजना में, संपर्क दृष्टिकोण जो निर्धारित करता है कि बौद्धिक संपदा (आर्इपी) के अन्वेषण से उत्पन्न आय उत्तरदायी और उस क्षेत्राधिकार में कर लगाया जाना चाहिए जहां केवल कानून स्वामित्व के क्षेत्राधिकार की बजाय वास्तविक अनुसंधान व विकास (आरएंडडी) गतिविधियां होती हैं।
37.2 तद्नुसार, आयकर अधिनियम में नई धारा 115खखच को रियायती कर व्यवस्था मुहैया कराने के लिए शामिल किया गया है। यह मुहैया किया गया है कि जहां योग्य निर्धारिती आय की कुल आय में भारत में विकसित और पंजीकृत पेटेंट के संबंध में रॉयल्टी के रूप में कोर्इ आय शामिल हो तो ऐसी रायल्टी की कुल राशि पर दस प्रतिशत (साथ ही प्रयोज्य अधिभार और अधिकर) की दर पर करयोग्य होगी। ऐसी रॉयल्टी आय के संबध में कोर्इ व्यय या भत्ता आयकर अधिनियम के अंतर्गत स्वीकृत नहीं होगा। आगे यह भी मुहैया कराया जाता है कि यह रियायती कर व्यवस्था वैकल्पिक है और योग्य निर्धारिती आयकर अधिनियम की धारा 139(1) के अंतर्गत आय की विवरणी की प्रस्तुति की देय तिथि को अथवा उससे पहले निर्धारित तरीके में इस धारा के अंतर्गत कराधान के लिए विकल्प का प्रयोग कर सकता है। यह भी मुहैया किया गया है कि जहां एक पात्र निर्धारिती इस धारा के प्रावधानों के अनुसार किसी पिछले वर्ष के लिए रायल्टी के रूप में आय की घोषणा करता है लेकिन ऐसी आय को इस धारा के प्रावधानों के अनुसार के वितरित ऐसे पिछले वर्ष के उत्तरवर्ती पिछले वर्ष हेतु प्रासंगिक पांच निरंतर वर्षों के लिए ऐसी आय की घोषणा नहीं करता तो पिछले वर्ष, जिसमें लाभ इस धारा के प्रावधानों के अनुसार घोषित न किया गया हो, हेतु प्रासंगिक निर्धारण वर्ष हेतु उत्तरगामी पांच निर्धारण वर्षों के लिए इस धारा के प्रावधानों के लाभ का दावा करने के लिए योग्य नहीं होगा।
37.3 इस रियायती कर व्यवस्था के उद्देश्य के लिए एक पात्र निर्धारिती का अर्थ भारत में रहने वाला वह व्यक्ति है जो खोज का पहला खोजकर्ता है और जिसका नाम पेटेंट अधिनियम, 1970 के अनुसार पेटेंटी के तौर पर पंजीकृत पटेंट पर प्रविष्ट किया है और ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, खोज का सही और पहले खोजकर्ता के तौर पर, शामिल है जहां उस पेटेंट के संबंध में पेटेंट अधिनियम, 1970 के अंतर्गत पेटेंटी के तौर पर एक से अधिक व्यक्ति पंजीकृत है। आगे आयकर अधिनियम की धारा 115ञख हेतु किए गए संशोधन यह भी मुहैया कराता है कि धारा 115खखच के अंतर्गत कर हेतु वसूलनीय रॉयल्टी के रूप में आय की राशि और संबंधित व्यय आयकर अधिनियम की धारा 115ञख के अंतर्गत बही लाभ की गणना के लिए विचारनीय नहीं होगा।
37.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
38. पेशे से आय रखने वाले व्यक्तियों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना की प्रस्तावना
38.1 कराधान की मौजूदा योजना केवल कुछ योग्य व्यापार में संलग्न कुछ पात्र व्यक्तियों के लिए सरलीकृत कराधान योजना के लिए मुहैया करार्इ गर्इ है और नाकि पेशेवर आय को प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के लिए। प्रकल्पित कराधान योजना के युक्तिकरण के लिए और पेशे से आय रखने वाले छोटे करदाताओं के अनुपालन बोझ को कम करने के लिए और व्यापार करने में सुविधा के लिए, आयकर अधिनियम को पेशेवरों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है।
38.2 तद्नुसार, एक नर्इ धारा 44कघक को एक निर्धारिती, जो कानूनी, चिकित्सा, इंजीनियरिंग या वास्तुकला पेशे या लेखांकन के पेशे या तकनीकी सलाहकार या आंतरिक साज सजावट या कोर्इ अन्य पेशे जैसा आधिकारिक राजपत्र में बोर्ड द्वारा अधिसूचित है और जिसकी कुल प्राप्ति पिछले वर्ष में पचास लाख रूपए से अधिक नहीं है, कुल प्राप्ति के पचास प्रतिशत के समान राशि, जो भी स्थिति हो, निर्धारिती द्वारा अर्जित उक्तकथित राशि से अधिक हो, जैसे धारा 44कक की उप-धारा (1) में संदर्भित किसी पेशे में संलग्न है, की आय का आंकलन के लिए मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम में शामिल किया गया है। योजना ऐसे आवासीय निर्धारिती के लिए भी लागू होगी जो व्यक्ति, हिंदु अविभाजित परिवार या सहभागी फर्म है लेकिन सीमित देयता भागीदारी फर्म नहीं है।
38.3 योजना के अंतर्गत, निर्धारिती को आयकर अधिनियम की धारा 30 से 38 के अंतर्गत कटौती की स्वीकृत दी गर्इ है समझा जाएगा। तद्नुसार, निर्धारिती के पेशे के उद्देश्य के लिए प्रयुक्त किसी परिसंपत्ति की अधोलिखित राशि आंके जा चुकी के तौर पर समझी जाएगी भले ही निर्धारिती दावा कर चुका और प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के लिए मूल्यह्रास के संबंध में कटौती की वास्तविक स्वीकृत दी जा चुकी हो।
38.4 यह भी मुहैया किया गया है कि निर्धारिती को धारा 44कक की उप-धारा (1) के अंतर्गत बही खातों को अनुरक्षित रखना और ऐसी आय के संबंध में धारा 44कख के अंतर्गत अंकेक्षित खातों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं है जबत निर्धारिती ने दावा किया हो कि उक्तकथित पेशे से लाभ और प्राप्ति धारा 44कघक की उप-धारा (1) के अंतर्गत उसकी आय होने के तौर पर समझी गर्इ लाभ तथा प्राप्ति से कम हो और उसकी आय अधिकतम राशि जो आयकर हेतु वसूलनीय नहीं है, से अधिक हो।
38.5 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
39. पेशे से आय रखने वाले व्यक्ति के लेखांकन के लिए प्रारंभिक सीमा में बढ़ोत्तरी
39.1 आयकर अधिनियम की धारा 44कख के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि एक पेशा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंकेक्षित खातों को प्राप्त करना आवश्यक है यदि पिछले वर्ष में कुल प्राप्तियां पच्चीस लाख रूपए से अधिक होती है।
39.2 अनुपालन बोझ को कम करने के लिए धारा 44कख को पेशे करने वाले व्यक्तियों के लिए अंकेक्षित खातों को प्राप्त करने की कुल प्राप्ति की प्रारंभिक सीमा को पच्चीस लाख रूपए से पचास लाख रूपए तक बढ़ाने के लिए संशोधित किया गया है।
39.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
40. व्यापारिक आय रखने वाले व्यक्तियों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना के लिए प्रारंभिक सीमा में बढ़ोत्तरी
40.1 आयकर अधिनियम की धारा 44कघ के मौजूदा प्रावधानों को एक पात्र व्यापार के लिए प्रकल्पित कराधान योजना के लिए मुहैया करा गया है। जहां एक पात्र निर्धारिती अधिक से अधिक एक करोड़ का कुल करोबार या कुल प्राप्ति वाले पात्र व्यापार में संलग्न निर्धारिती की स्थिति में कुल कारोबार या कुल प्राप्ति, अथवा जो भी स्थिति हो, के आठ प्रतिशत के समान राशि, उक्तकथित राशि से अधिक की राशि शीर्षक "व्यापारी अथवा पेशे के लाभ और प्राप्ति" के अंतर्गत कर हेतु वसूलनीय ऐसे व्यापार के लाभ तथा प्राप्ति के तौर पर समझी जाएगी। योजना के अंतर्गत, निर्धारिती को आयकर अधिनियम की धारा 30 से 38 के अंतर्गत कटौती को स्वीकृत किए गए के तौर पर समझा जाएगा। आगे, पात्र निर्धारिती अधिक से अधिक एक करोड़ रूपए के कुल करोबार या कुल प्राप्तियों के आठ प्रतिशत की आय समझे जाने वाली से कम आय की सूचना दे सकता है बशर्ते वह आयकर अधिनियम की धारा 44कक के अनुसार बही खातों को अनुरक्षित रखता हो।
40.2 छोटे करदाताओं के अनुपालन बोझ को कम करने के लिए और व्यापार करने की सुविधा देने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 44कघ को "पात्र व्यापार" की परिभाषा में निर्दिष्ट एक करोड़ रूपए की प्रारंभिक सीमा को दो करोड़ तक बढ़ाने के लिए संशोधित किया गया है।
40.3 यह भी मुहैया कराया गया है कि धारा 40 के वाक्यांश (ख) के अनुसार सहभागी को दिए गए वेतन, पारिश्रमिक, ब्याज आदि के रूप में व्यय धारा 44कघ के अंतर्गत आय की गणना के दौरान कटौतीपूर्ण नहीं होगा चूंकि कथित धारा 40 किसी व्यय के भत्ते के लिए अनिवार्य नहीं होता लेकिन राशि की कटौती पर प्रतिबंध डालता है, अन्यथा धारा 30 से 38 के अंतर्गत स्वीकृत है।
40.4 आगे यह मुहैया कराया गया है कि जहां एक पात्र निर्धारिती इस धारा के प्रावधानों के अनुसार किसी पिछले वर्ष के लिए लाभ की घोषणा करता है और वह इस धारा के प्रावधानों के विपरीत ऐसे पिछले वर्ष के बाद के पिछले वर्ष हेतु किसी भी प्रासंगिक पांच निरंतर निर्धारण वर्षों के लिए लाभ की घोषणा करता है तो वह पिछले वर्ष जिसमें लाभ इस धारा के प्रावधानों के अनुसार घोषित न किया गया हो, हेतु प्रांसगिक निर्धारण वर्ष के बाद के पांच निर्धारण वर्षों के लिए इस धारा के प्रावधानों के लाभ का दावा करने के लिए योग्य नहीं होगा। उदाहरण के लिए, एक योग्य निर्धारिती निर्धारण वर्ष 2017-18 के लिए धारा 44कघ के अंतर्गत प्रकल्पित आधार पर करारोपित होने की घोषणा की जाती है और रू. 1 करोड़ के करोबार पर रू. 8 लाख की आय का प्रस्ताव देता है। निर्धारण वर्ष 2018-19 के लिए और निर्धारण वर्ष 2019-20 के लिए भी वह धारा 44कघ के प्रावधानों के अनुसार आय का प्रस्ताव देता है। इस मामले में चूंकि उसने निर्धारण वर्ष 2017-18 के बाद पांच निरंतर निर्धारण वर्षों के लिए धारा 44कघ के प्रावधानों के अनुसार आय प्रस्तावित नहीं की है इसलिए वह अगले पांच निर्धारण वर्षों यानी निर्धारण वर्ष 2021-22 से 2025-26 के लिए धारा 44कघ के लाभ का दावा करने के लिए योग्य नहीं होगा।
40.5 आगे चूंकि प्रकल्पित कराधान योजना की कारोबार सीमा को दो करोड़ रूपए के लिए बढ़ाया गया है, आगे यह मुहैया कराया जाता है कि पात्र निर्धारिती को अग्रिम कर का भुगतान करना आवश्यक होगा। हालांकि, उसके मामले में अनुपालन को कम से कम रखने के लिए, यह प्रस्तावित किया जाता है कि वह वित्त वर्ष के 15 मार्च तक अग्रिम कर का भुगतान कर सकता है। धारा 44कख क की प्रयोज्यता को भी प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 20 जून, 2016 के द्वारा भी स्पष्ट किया गया है।
प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
41. गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों की स्थिति में डूबते और संदेहास्पद ऋण के प्रावधानों के संबंध में कटौती
41.1 आयकर अधिनियम की धारा 36 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (viiक) के उप-वाक्यांश (ग) के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, सार्वजनिक वित्त संस्थानों के लाभ की गणना में, राज्य वित्त निगम और राष्ट्र औद्योगिक निवेश निगम एक कटौती, उक्तकथित वाक्यांश और अध्याय VI-क के अंतर्गत किसी कटौती को करने से पहले आंकी गर्इ कुल आय के अधिक से अधिक पांच प्रतिशत की राशि हेतु सीमित, डूबते और संदेहास्पद ऋण के लिए किसी प्रावधान के संबंध में स्वीकृत है।
41.2 तथ्य पर विचार करते हुए कि गैर-वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी सोसाइटी के विभिन्न क्षेत्रों के लिए वित्तीय ऋण में संलग्न है, धारा 36 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (viiक) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया कराया जा सके कि कुल आय के पांच प्रतिशत की सीमा के लिए डूबते और संदेहास्पद ऋणों के प्रावधानों के कारण कुल आय (इस वाक्यांश और अध्याय - VI-क के अंतर्गत किसी कटौती को करने से पहले) से कटौती एनबीएफसी के लिए उपलब्ध होगी
41.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
42. धारा 32कग के अंतर्गत कर प्रोत्साहन के कार्यक्षेत्र का युक्तिकरण
42.1 आयकर अधिनियम की धारा 32कग में उप-धारा (1क) के मौजूदा प्रावधान को इस शर्तों के अनुसार किसी उत्पाद अथवा वस्तु के विनिर्माण अथवा उत्पादन में संलग्न एक कंपनी द्वारा पिछले वर्ष में रू. 25 करोड़ से अधिक की नर्इ परिसंपत्ति (संयंत्र और मशीनरी) में किए गए निवेश पर 15 प्रतिशत की दर पर निवेश भत्ते के लिए मुहैया कराया गया है कि अधिग्रहण और अधिष्ठापन उसी पिछले वर्ष में किया जाना है। यह कर प्रोत्साहन 31.03.2017 तक उपलब्ध है।
42.2 अधिग्रहण और अधिष्ठापन की द्वि शर्तें उन मामलों में वास्तविक परिश्रम का कारण हैं जिसमें प्राप्त की जा रही परिसंपत्ति को उसी पिछले वर्ष में अधिष्ठापित नहीं किया जा सकता।
42.3 आयकर अधिनियम की धारा 32कग की उप-धारा (1क) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया कराया जा सके कि अभिग्रहण के संयंत्र और मशीनरी की निर्दिष्ट कीमत को पिछले वर्ष में बनाया जाना है। हालांकि, अधिष्ठापन 15 प्रतिशत के निवेश भत्ते के लाभ का फायदा लेने के लिए 31.03.2017 तक किया जा सकता है। आगे यह मुहैया किया गया है कि जहां नर्इ परिसंपत्ति के अधिष्ठापन अधिग्रहण के वर्ष को छोड़कर किसी वर्ष में है तो इस उप-धारा के अंतर्गत कटौती उस वर्ष में स्वीकृत होगी जिसमें नर्इ परिसंपत्ति अधिष्ठापित होती है।
42.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
43. कुछ गैर-निवासियों को धारा 206कक के अंतर्गत पैन प्रस्तुति की मांग से छूट
43.1 आयकर अधिनियम की धारा 206कक के मौजूदा प्रावधान, अन्य विषयों के साथ-साथ, मुहैया कराते हैं कि कोर्इ व्यक्ति जो किसी राशि अथवा आय अथवा मूल्य जिस पर कर आयकर अधिनियम के अध्याय XVIIख के अंतर्गत कटौतीयोग्य है ,को प्राप्त करने का हकदार है, ऐसे कर की कटौती करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को अपनी स्थार्इ खाता संख्या प्रस्तुत करेगा जिसके विफल रहने पर आयकर अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों में निर्दिष्ट दर पर या प्रभावी दर पर या बीस प्रतिशत की दर पर, जो भी अधिक हो, कर काटा जाएगा। धारा 206कक के प्रावधान दीर्घ-कालीन बांड पर ब्याज के भुगतान के संबंध में अपवाद के साथ गैर-निवासियों के लिए भी लागू होगा जैसा धारा 194ठग में संदर्भित है।
43.2 अनुपालन बोझ को कम करने के लिए, आयकर अधिनियम की कथित धारा 206कक को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि इस धारा के प्रावधान ऐसी शर्तों के अनुसार जिसे निर्धारित किया जा सके, बांड पर ब्याज को छोड़कर किसी अन्य भुगतान के संबंध में विदेशी कंपनी या गैर-निवासी, एक कंपनी के तौर पर नहीं, के लिए लागू नहीं होगा।
43.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी हुआ।
44. आय की परिभाषा द्वारा विशिष्ट उद्देश्य के लिए स्थापित कॉपर्स फंड के लिए केंद्र सरकार की सब्सिडी या अनुदान या नगद सहायता आदि की छूट
44.1 वित्त अधिनियम, 2015 ने आयकर अधिनियम की धारा 2 के वाक्यांश (24) के अंतर्गत आय की परिभाषा को संशोधित किया था जिससे मुहैया किया जा सके कि सब्सिडी या अनुदान या प्रतिपूर्ति, जिसे आयकर अधिनियम की धारा 43 के वाक्यांश (1) हेतु स्पष्टीकरण 10 के प्रावधानों के अनुसार सहायता की वास्तविक लागत के निर्धारण में विचार में लिया जाता है, को छोड़कर निर्धारिती को नगद या किसी अन्य प्रकार से केंद्र सरकार या राज्य सरकार या किसी प्राधिकरण या निकाय या एजेंसी द्वारा सब्सिडी या अनुदान या नगद प्रोत्साहन या शुल्क वापसी या छूट या रियायत या प्रतिपूर्ति (किसी भी नाम से बुलाया जा सकता है) के रूप में शामिल होगी।
44.2 कुछ सरकारी योजनाओं को संचालित करने के लिए विशेष रूप से बनाए गए न्यास या किसी अन्य उद्यम के बजटीय समर्थन के लिए केंद्र सरकार द्वारा मुहैया करार्इ गर्इ अनुदान या नगद सहायता या सब्सिडी आदि के परिणामस्वरूप न्यास या अन्य किसी उद्यम के हाथों करारोपित होगी। इसलिए, आयकर अधिनियम की धारा 24 की उप-धारा (2) के वाक्यांश (xvii) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा संस्थापित न्याय या संस्थान के कोष के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी गर्इ सब्सिडी या अनुदान आय का अभिन्न हिस्सा नहीं होगा।
44.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
45. रेलवे को किए गए कुछ भुगतानों को शामिल करते हुए धारा 43ख के कार्यक्षेत्र की वृद्धि
45.1 आयकर अधिनियम की धारा 43ख के मौजूदा प्रावधान, अन्य विषयों के साथ-साथ, मुहैया कराते हैं कि कर, उपकर, शुल्क या फीस, भविष्य निधि के लिए कर्मचारी का अंशदान आदि के रूप में देययोग्य कोर्इ राशि उस पिछले वर्ष में कटौती के तौर पर स्वीकृत है जिसमें ऐसी राशि के लिए देयता उत्पन्न हुर्इ थी (प्रासंगिक पिछला वर्ष) यदि इसे एक व्यक्ति द्वारा अनुसरित होने वाली लेखांकन की विधि के बावजूद आय की विवरणी की प्रस्तुति की देय तिथि को अथवा उससे पहले वास्तविक रूप से दिया जाता है।
45.2 रेलवे की परिसंपत्ति के प्रयोग के लिए रेलवे के प्रति शेष भुगतान की शीघ्रता को सुनिश्चितता को देखते हुए, आयकर अधिनियम की धारा 43ख को संशोधित किया गया है जिससे इसकी सीमा के अंदर रेलवे परिसंपत्तियों के प्रयोग के लिए भारतीय रेलवे को किए गए भुगतान को शामिल करने के लिए इसके क्षेत्र को बढ़ाया जा सके।
45.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
46. समझे जाने वाली अघोषित आय के समक्ष हानि के पृथकीकरण से संबंधित स्पष्टीकरण
46.1 आयकर अधिनियम की धारा 115खखड़ अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराती है कि धारा 68 अथवा धारा 69 अथवा धारा 69क अथवा धारा 69ख अथवा धारा 69ग अथवा धारा 69घ से संबंधित आय तीस प्रतिशत की दर पर करयोग्य है और आगे मुहैया किया जाता है कि कथित धारा के संदर्भ में आय से संबंधित किसी व्यय या भत्ते के संबंध में कोर्इ कटौती स्वीकार्य नहीं होगी।
46.2 वर्तमान में, आयकर अधिनियम की धारा 115खखड़ के संदर्भ में आय के समक्ष हानि को पृथक करने के मुद्दे पर अनिश्चितता है। मामले को न्यायिक फोरम तक लाया गया है और कुछ मामलों में न्यायालय का मानना है कि हानियां धारा 115खखड़ में संदर्भित आय के समक्ष पृथक नहीं की जाएगी। हालांकि, आयकर अधिनियम की धारा 115खखड़ की वर्तमान भाषा इच्छित इरादे को सूचित नहीं करती और मामले के परिणामस्वरूप मुकद्मेबाजी है। अनावश्यक मुकद्मेबाजी से बचने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 115खखड़ की उप-धारा (2) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिसे स्पष्ट रूप से मुहैया किया जा सके कि किसी हानि का पृथकीकरण धारा 68 अथवा धारा 69 अथवा धारा 69क अथवा धारा 69ख अथवा धारा 69ग अथवा धारा 69घ के अंतर्गत आय के संबंध में स्वीकार्य नहीं होगा।
46.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
47. पेशे के मामले में विशेष अधिकार और गैर-प्रतिस्पर्धी शुल्क का कराधान
47.1 आयकर अधिनियम की धारा 28 के वाक्यांश (vक) के मौजूदा प्रावधान में किसी व्यापार के संबंध में की गर्इ गतिविधि को न करने के लिए एक समझौते के अंतर्गत नगद या किसी अन्य प्रकार में प्राप्त या प्राप्तनीय किसी राशि "व्यापार या पेशे के लाभ या प्राप्ति" के कार्यक्षेत्र के भीतर या तकनीकी जानकारी को सांझा न करना, पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, लार्इसेंस, फ्रैंचाइजी या इसी प्रकार के अन्य व्यापार या वाणिज्यिक अधिकार या सूचना या तकनीक के उत्पाद के विनिर्माण या प्रसंस्करण या सेवाओं के लिए प्रावधान शामिल है और व्यापारिक आय के तौर पर कर हेतु वसूलनीय है। आगे, प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि किसी व्यापार को करने के अधिकार या किसी उत्पाद या वस्तु के विनिर्माण, उत्पादन या प्रसंस्करण के अधिकार के हस्तांतरण के लिए प्राप्ति, जो "पूंजीगत प्राप्ति" शीर्षक के अंतर्गत वसूलनीय हैं, लाभ और प्राप्ति के तौर पर करयोग्य नहीं होगी। आयकर अधिनियम की धारा 45 के अंतर्गत, किसी व्यापारिक या वाणिज्यिक अधिकारों के स्थानांतरण में से उत्पन्न कोर्इ पूंजीगत प्राप्ति शीर्षक "पूंजीगत प्राप्ति" के अंतर्गत करयोग्य है। "पूंजी प्राप्ति" की राशि आयकर अधिनियम की धारा 48 के अनुसार आंकी जाती है। इसके लिए, 'अधिग्रहण की लागत' और 'उन्नयन की लागत' धारा 55 के अंतर्गत परिभाषित हैं। हालांकि, व्यवसाय करने के संबंध में प्राप्त/प्राप्त होने वाली गैर-प्रतिस्पर्धी शुल्क इन प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आता। आयकर अधिनियम की धारा 28 के वाक्यांश (vक) को संशोधित किया गया है जिससे किसी व्यवसाय को न करने के संबंध में प्राप्त/प्राप्तनीय (जो आवर्ती प्रकार का है) गैर-प्रतिस्पर्धी शुल्क को लाया जा सके, आयकर अधिनियम की धारा 28 के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत यानी व्यापार या पेशे के लाभ या प्राप्ति की अनुदेश धारा। आगे, आयकर अधिनियम की धारा 28 के वाक्यांश (vक) के प्रावधान को स्पष्ट करने के लिए मुहैया कराया गया है कि किसी व्यवसाय, जो शीर्षक "पूंजीगत प्राप्ति" के अंतर्गत कर हेतु वसूलनीय है, को करने का अधिकार के स्थानांतरण के लिए प्राप्तियां व्यापार या व्यवसाय के लाभ या प्राप्ति के तौर पर करयोग्य नहीं होगी। परिणामस्वरूप, धारा 55 के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि कोर्इ व्यवसाय करने के अधिकार के स्थानांतरण में से उत्पन्न पूंजीगत प्राप्तियों पर "पूंजीगत प्राप्तियों" पर कार्य करने के लिए 'अधिग्रहण की लागत' और 'उन्नयन की लागत' को मुहैया किया जा सके।
47.2 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
48. आयकर अधिनियम की धारा 73क के अंतर्गत ऐसी हानि के पृथकीकरण और अग्रेषण के लिए समय सीमा
48.1 आयकर अधिनियम की धारा 73क के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि कोर्इ हानि, धारा 35कघ के संदर्भ में किसी निर्दिष्ट व्यापार के संबंध में आंकी गर्इ, किसी अन्य निर्दिष्ट व्यापार के लाभ और प्राप्ति, यदि हो, के समक्ष पृथक नहीं की जाएगी। आगे, आयकर अधिनियम की धारा 80 अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया करता है कि एक हानि जिसे धारा 130 की उप-धारा (3) के प्रावधानों के अनुसार दाखिल किया जाता है, धारा 72 की उप-धारा (1) या धारा 73 की उप-धारा (2) या उप-धारा (1) या उप-धारा (3) या धारा 74 या उप-धारा 74क के अंतर्गत अग्रेषित और पृथक नहीं किया जाएगा।
48.2 आयकर अधिनियम की योजना के अनुसार, यह हानि स्वीकृत होगी यदि विवरणी निर्दिष्ट समय, यानी आयकर अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित अन्य हानियों के लिए धारा 80 में मुहैया कराए गए अनुसार आय की विवरण को दाखिल करने की नियत तिथि तक, के अंदर दाखिल होती है।
48.3 तद्नुसार, आयकर अधिनियम की धारा 80 को संशोधित किया गया है कि जिससे मुहैया किया जा सके कि आयकर अधिनियम की धारा 73क के अनुसार निर्धारित हानि के अग्रेषण या पृथकीकरण की स्वीकृत नहीं होगी यदि ऐसी हानि को धारा 139 की उप-धारा (3) के प्रावधानों के अनुसार दाखिल विवरणी के अनुसार निर्धारित नहीं किया गया है। इसी महत्वपूर्ण संशोधन धारा 139 में भी किए गए हैं जिससे उस उप-धारा में धारा 73क की उप-धारा (2) का संदर्भ दिया जा सके।
48.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2016 से लागू है और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2016-17 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
49. स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) प्रावधानों का युक्तिकरण
49.1 स्रोत पर कर कटौती की योजना के अंतर्गत जैसा आयकर अधिनियम में मुहैया कराया गया है किसी व्यक्ति को किसी निर्दिष्ट राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को निर्धारित दरों पर स्रोत पर कर कटौती और निर्दिष्ट समय के अंदर केंद्र सरकार को जमा करना आवश्यक है। हालांकि, कोर्इ कटौती करने की आवश्यकता नहीं है अगर भुगतान निर्धारित प्रारंभिक सीमा से अधिक नहीं होता। दरों और टीडीएस प्रावधानों के मूल के युक्तिकरण के लिए, स्रोत पर कर कटौती और स्रोत पर कर कटौती की दरों के लिए मौजूदा प्रारंभिक सीमा अधिनियम के माध्यम से आयकर अधिनियम की संबधित धाराओ को संशोधित करके युक्तिकृत है जैसा क्रमश: तालिका 3 और तालिका 4 में दर्शाया गया है।
तालिका-3
| वर्तमान धारा | शीर्षक | वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा संशोधन से पहले प्रारंभिक सीमा (रू. में) | वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा में किए गए संशोधन के अनुसार संशोधित प्रारंभिक सीमा (रू. में) |
| 192क | एक कर्मचारी को शेष संचित शेष का भुगतान | 30,000 | 50,000 |
| 194खख | घुड़ दौड़ से जीत | 5,000 | 10,000 |
| 194ग | ठेकेदार को भुगतान | 75,000 की कुल वार्षिक सीमा | 1,00,000 की कुल वार्षिक सीमा |
| 194ठक | कुछ अचल संपत्ति के अधिग्रहण पर मुआवजे का भुगतान | 2,00,000 | 2,50,000 |
| 194घ | बीमा कमीशन | 20,000 | 15,000 |
| 194छ | लाटरी टिकट की बिक्री पर कमीशन | 1,000 | 15,000 |
| 194ज | कमीशन या दलाली | 5,000 | 15,000 |
तालिका-4
| वर्तमान धारा | शीर्षक | वित्त अधिनियम, 2016 द्वारा संशोधन से पहले टीडीएस की दर (%) | वित्त अधिनियम, 2016 से पहले किए गए संशोधन के अनुसार टीडीएस की संशोधित दर (%) |
| 192घक | जीवन बीमा पॉलिसी के संबंध में भुगतान | 2 प्रतिशत | 1 प्रतिशत |
| 194ड़ड़ | एनएसएस जमा के संबंध में भुगतान | 20 प्रतिशत | 10 प्रतिशत |
| 194घ | कंपनी को छोड़कर व्यक्तियों की स्थिति में बीमा कमीशन | प्रभावी दर (10 प्रतिशत ) | 5 प्रतिशत* |
| 194छ | लाटरी टिकट की बिक्री पर कमीशन | 10 प्रतिशत | 5 प्रतिशत |
| 194ज | कमीशन या दलाली | 10 प्रतिशत | 5 प्रतिशत |
49.2 आयकर अधिनियम के निम्नलिखित प्रावधान जो संचालन में नहीं है तालिका 5 में ब्यौरेवार आयकर अधिनियम में छूटे हुए हैं।
तालिका - 5
| वर्तमान धारा | शीर्षक | वित्त अधिनियम, 2016 के द्वारा किए गए संशोधन |
| 194ट | र्इकार्इयों के संबंध में आय | प्रभावी तिथि 01.06.2016 से छूटा |
| 194ठ | पूंजीगत प्राप्ति के अधिग्रहण पर मुआवजे का भुगतान | प्रभावी तिथि 01.06.2016 से छूटा |
49.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे
50. किराया भुगतान के लिए प्रपत्र 15छ/15ज के दाखिलीकरण का समर्थीकरण
50.1 आयकर अधिनियम की धारा 194-झ के प्रावधानों को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रारंभिक सीमा से बाहर किराये के रूप में भुगतान के लिए स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) के लिए मुहैया कराया गया है। मौजूदा प्रावधान इस धारा के अंतर्गत कर की कटौती के लिए प्रति वित्त वर्ष रू. 1,80,000/- की प्रारंभिक सीमा को मुहैया कराते है। इस धारा के अंतर्गत कर की कटौती के लिए उच्च प्रारंभिक सीमा को मुहैया कराने के बावजूद, ऐसे मामले हो सकते हैं जहां किराया भुगतान सहित कुल आय के प्राप्तकर्ता पर देययोग्य कर शून्य हो।
50.2 आयकर अधिनियम की धारा 197क के मौजूदा प्रावधान अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराते हैं कि कर को नहीं काटा जाएगा, अगर कुछ भुगतान, जिन पर कर कटौतीयोग्य हो, की प्राप्ति आदाता को यह घोषित करते हुए निर्धारित प्रपत्र सं. 15छ/15ज में स्व-घोषणा प्रस्तुत करता है कि प्रासंगिक पिछले वर्ष की कुल अनुमानित आय पर कर शून्य होगा।
50.3 ऐसे मामलों में अनुपालन बोझ को कम करने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 197क के प्रावधानों को संशोधित किया गया है जिससे उपलब्ध कराया जा सके कि आयकर अधिनियम की धारा 194-झ में संदर्भित भुगतानों की प्राप्तियां आयकर अधिनियम की धारा 197क के प्रावधानों के अनुसार स्रोत पर कर की गैर-कटौती के लिए प्रपत्र सं. 15ज/15छ में स्व-घोषणा को दाखिल करने के लिए भी योग्य होगा।
50.4 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे।
51. ब्याज की कटौती का दावा करने के लिए खुद की खरीदी गृह संपत्ति की प्राप्ति या निर्माण के लिए समयावधि की बढ़ोत्तरी
51.1 आयकर अधिनियम की धारा 24 के वाक्यांश (ख) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि गृह संपत्ति की प्राप्ति या निर्माण के लिए उधार ली गर्इ राशि पर देययोग्य कर गृह संपत्ति से आय की गणना के दौरान काटा जाएगा। कथित वाक्यांश हेतु द्वितीय परंतुक मुहैया कराता है कि दो लाख रूपए की राशि स्वीकृत होगी जहां आयकर अधिनियम (स्व सत्यापित गृह संपत्ति) की धारा 23 की उप-धारा (2) में संदर्भित एक गृह संपत्ति को 1 अप्रैल, 1999 को अथवा उसके बाद उधार ली गर्इ राशि के साथ प्राप्त या निर्माण किया गया है और ऐसी प्राप्ति या निर्माण वित्त वर्ष जिसमें पूंजी को उधार लिया गया है, की समाप्ति से तीन वर्षों के अंदर पूरा किया गया हो।
51.2 इस तथ्य को देखते हुए कि सामान्य रूप से गृह परियोजनाएं पूरा होने मे अधिक समय लेती है, आयकर अधिनियम की धारा 24 के वाक्यांश (ख) हेतु द्वितीय परंतुक को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि स्वयं खरीदी गर्इ गृह संपत्ति की प्राप्ति या निर्माण के लिए उधार ली गर्इ पूंजी पर दिए गए ब्याज के कारण कथित परंतुक के अंतर्गत कटौती उपलब्ध होगी यदि निर्माण या प्राप्ति उस वित्त वर्ष के अंत से पांच वर्षों में पूरा होता है जिसमें पूंजी उधार ली गर्इ थी।
51.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
52. अप्राप्त किराये और बकाया किराये के कराधान से संबंधित प्रावधानों का सरलीकरण और युक्तिकरण
52.1 आयकर अधिनियम की धारा 25क, 25कक और 25ख के मौजूदा प्रावधान कटौती के रूप में अप्राप्त स्वीकृत किराये के कराधान के विशेष प्रावधानों से संबंधित है जब बाद में क्रमश: प्राप्त अप्राप्त किराया और प्राप्त किराये का बकाया वसूला जाता है। कुछ कटौतियां उसमें उपलब्ध हैं।
52.2 उक्त प्रावधानों को युक्तिकृत करने और किराये के बकाये और अप्राप्त किराये का कर उपचार में एकरूपता लाने के लिए, इन प्रावधानों को आयकर अधिनियम की एक नर्इ धारा 25क के अंतर्गत विलीन किया गया है और यह मुहैया किया गया है कि बकाया में प्राप्त किराये की राशि या अप्राप्त किराये की राशि के एक निर्धारिती द्वारा बाद में प्राप्ति उस वित्त वर्ष में आयकर हेतु वसूली जाएगी जिसमें ऐसा किराया मिला या प्राप्त होता है, चाहे निर्धारिती उस वित्त वर्ष में संपत्ति का मालिक हो या नहीं। यह भी मुहैया किया जाता है कि बकाया किराये या अप्राप्त किराये जिसे निर्धारिती द्वारा बाद में अप्राप्त किया जाता है का तीस प्रतिशत कटौती के तौर पर स्वीकार्य होगा।
52.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
53. आयकर अधिनियम की धारा 273क, 273कक या 220(2क) के अंतर्गत निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन को जमा करने के लिए समय सीमा प्रदान करना
53.1 आयकर अधिनियम की धारा 220 की उप-धारा (2) को हर महीने या उस अवधि जिसके दौरान चूक जारी रहती है, के महीने के भाग के लिए 1 प्रतिशत की दर पर ब्याज लगाने के लिए मुहैया किया गया है। कथित धारा अन्य विषयों के साथ-साथ की उप-धारा (2क) कथित धारा की उप-धारा (2) के अंतर्गत देय या देययोग्य ब्याज की राशि को कम करने या छूट देने के लिए प्रधान मुख्य आयुक्त, मुख्य आयुक्त, प्रधान आयुक्त या आयुक्त को सक्षम करता है।
53.2 आयकर अधिनियम की धारा 273क की उप-धारा (4) अन्य विषयों के साथ-साथ प्रदान करती है कि निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन पर प्रधान आयुक्त या आयुक्त कुछ परिस्थतियों में देययोग्य राशि की वसूली के लिए किसी कार्यवाही को रोक या तय या निर्धारिती द्वारा देययोग्य किसी जुर्माने की राशि को कम या छूट दे सकते हैं।
53.3 आयकर अधिनियम की धारा 273कक अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराती है कि प्रधान आयुक्त या आयुक्त को जुर्माने से प्रतिरक्षा मिल सकती है, यदि जुर्माना कार्यवाही उस व्यक्ति की स्थिति में प्रारंभ की गर्इ हो जिसने निपटान आयोग के समक्ष निपटान के लिए आवदेन किया हो और निपटान के लिए कार्यवाही को आयकर अधिनियम की धारा 245जक में शामिल परिस्थितियों के अंतर्गत कम किया गया था।
53.4 मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत आयकर अधिनियम की किसी भी धारा 220 या धारा 272क या 273कक के अंतर्गत आदेश को पारित करने से संबंधित कोर्इ समय सीमा मुहैया नहीं की गर्इ है। आगे, इन प्रावधानों विशेष रूप से अधिदेश नहीं करते कि निर्धारिती को प्राधिकारी द्वारा ऐसे आवदेन की अस्वीकृत किए जाने की स्थिति में सुनवार्इ का अवसर दिया जाए। इसलिए, प्रावधानों का युक्तिकरण करने और विशिष्ट समय सीमा मुहैया कराने के लिए, मौजूदा प्रावधानों के लिए संशोधन किया गया है।
53.5 उक्त को देखते हुए, आयकर अधिनियम की धारा 220 को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि एक निर्धारिती के आवेदन को स्वीकार या अस्वीकार करने का आदेश उस महीने के अंत से बारह महीने की अवधि के अंदर संबंधित प्रधान मुख्य आयुक्त, मुख्य आयुक्त, प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा पारित किया जाएगा जिसमें ऐसा आवेदन प्राप्त हुआ है।
53.6 उसी आधार पर, आयकर अधिनियम की धारा 273क और धारा 273कक को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि एक निर्धारिती के आवेदन को स्वीकार या अस्वीकार करने का आदेश उस महीने के अंत से बारह महीने की अवधि के अंदर प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा पारित किया जाएगा जिसमें ऐसा आवेदन प्राप्त हुआ है।
53.7 आगे, यह भी मुहैया कराया जाता है कि आयकर अधिनियम की धार 220 या 273क, 273कक के आवेदन को अस्वीकार करने का कोर्इ आदेश निर्धारिती को सुनवार्इ का आदेश दिए बिना पारित नहीं किया जाएगा। हालांकि, 1 जून, 2016 को लंबित आदेश के संबंध में, कथित धाराओं के अंतर्गत आदेश 31 मर्इ, 2017 को या उससे पहले पारित किया जाएगा।
53.8 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे
54. विभिन्न प्रक्रियाओं और कागजरहित मूल्यांकन के स्वचालन के लिए कानूनी ढ़ांचा मुहैया कराना
54.1 दक्षता को बढ़ाने के लिए और अनुपालन को कम करने के लिए, कानूनी उपायों की श्रेणी को कागज रहित मूल्यांकन के लिए उपयुक्त कानूनी ढ़ांचे को मुहैया कराने के लिए बनार्इ गर्इ है।
54.2 आयकर अधिनियम की धारा 282क की मौजूदा उप-धारा (1) मुहैया कराती है कि जहां एक नोटिस या अन्य दस्तावेज को अधिनियम के अंतर्गत किसी आयकर प्राधिकारी द्वारा जारी किया जाना आवश्यक हो तो ऐसे नोटिस या दस्तावेज को हस्तलिपि में उस प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए।
54.3 आयकर अधिनियम की धारा 282क की उप-धारा (1) को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि आयकर अधिनियम के अंतर्गत आयकर प्राधिकारी द्वारा जारी किए जाने के लिए आवश्यक दस्तावेजों और नोटिस ऐसी प्रक्रिया जिसे निर्धारित किया जा सके के अनुसार कागजी रूप में या इलैक्ट्रानिक रूप में ऐसे प्राधिकारी द्वारा जारी किए जा सकते हैं।
54.4 आयकर अधिनियम की धारा 143 की मौजूदा उप-धारा (2) मुहैया कराती है कि यदि निर्धारण अधिकारी समझता हो कि यह आवश्यक है और सुनिश्चित करना लाभकारी है कि निर्धारिती ने आय को अनुभव नहीं किया है और अतिरिक्त हानि को नहीं आंका है या किसी तरीके में कर का कम भुगतान नहीं किया है तो वह निर्धारिती को किसी प्रमाण जिस पर निर्धारिती वापसी के समर्थन पर भरोसा कर सके, के निर्दिष्ट तिथि पर प्रस्तुत करने के लिए या प्रस्तुत करने के कारण के लिए नोटिस जारी करेगा।
54.5 आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (2) के अंतर्गत समय से जारी कारण बताओ नोटिस को सुनिश्चित करने के लिए, कथित उप-धारा को मुहैया कराने के लिए संस्थापित किया गया है कि कथित उप-धारा के अंतर्गत नोटिस को निर्धारण अधिकारी या प्राधिकृत आयकर प्राधिकरण द्वारा निर्धारिती को तामील किया जा सकता है, या तो निर्धारण अधिकारी कार्यालय में उपस्थित होने के लिए या किसी प्रमाण जिस पर निर्धारिती विवरणी के समर्थन में भरोसा कर सके, के निर्धारण अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत या प्रस्तुत करने के कारण के लिए।
54.6 आयकर अधिनियम की धारा 2 के मौजूदा प्रावधान को भी इलैक्ट्रानिक विधि के माध्यम से तिथि और दस्तावेजों और डाटा के संप्रेषण को शामिल करने के लिए शब्द "सुनवार्इ" को परिभाषित करने के लिए नए वाक्यांश (23ग) को शामिल करते हुए संशोधित किया गया है।
54.7 प्रयोज्यता : ये संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे।
55. आय की विवरणी का दाखिलीकरण
55.1 आयकर अधिनियम की धारा 139 की उप-धारा (1) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि उसमें संदर्भित प्रत्येक व्यक्ति देय तिथि को अथवा उससे पहले आय की विवरणी को दाखिल कर सकते हैं। कथित धारा के छठें प्रावधान मुहैया कराते है कि प्रत्येक व्यक्ति, व्यक्ति या हिंदु अविभाजित परिवार या व्यक्तियों के संघ या व्यक्ति की निकाय, चाहे निगमित हो या नही या कोर्इ कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति के तौर पर, यदि उसकी कुल आय या कोर्इ अन्य व्यक्ति जिसके संबंध में वह पिछले वर्ष के दौरान किसी अधिनियम के अंतर्गत मूल्यांकित है, आयकर अधिनियम की धारा 10क या धारा 10ख या धारा 10खक या अध्याय VI-क के प्रावधानों को बिना प्रभावी किए, उस राशि से अधिक होता है जो आय हेतु वसूलनीय हैं, देय तिथि को या उससे पहले विवरणी को प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी होगा।
55.2 आयकर अधिनियम की धारा 139 की उप-धारा (4) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि वह व्यक्ति जिसने आयकर अधिनियम की धारा 142 की उप-धारा (1) के अंतर्गत जारी नोटिस के अंतर्गत अनुमत समय के अंदर या उप-धारा (1) के अंतर्गत उसको दिए गए समय के अंदर विवरणी प्रस्तुत न की हो तो वह प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के अंत से एक वर्ष के खत्म होने से पहले या निर्धारण के पूरा होने से पहले, जो भी पहले हो, किसी भी समय किसी पिछले वर्ष के लिए विवरणी को प्रस्तुत कर सकता है।
55.3 आयकर अधिनियम की धारा 139 की उप-धारा (5) मुहैया कराता है कि यदि कोर्इ व्यक्ति, उप-धारा (1) के अंतर्गत प्रस्तुति पर, या आयकर अधिनियम की धारा 142 की उप-धारा (1) के अंतर्गत जारी नोटिस के अनुसरण में, उसमें कोर्इ गलती या गलत ब्यौरा प्राप्त करता है तो प्रासंगिक निर्धारण वर्ष या निर्धारण की समाप्ति, जो भी पहले हो, के अंत से एक वर्ष से पहले किसी भी समय संशोधित विवरणी को प्रस्तुत कर सकता है।
55.4 आयकर अधिनियम की धारा 139 की उप-धारा (9) के लिए स्पष्टीकरण का वाक्यांश (कक) मुहैया कराता है कि आय की विवरणी को त्रुटि के तौर पर समझा जाएगा जबतक आयकर अधिनियम की धारा 140क के प्रावधानों के अनुसार देययोग्य ब्याज, यदि हो, के साथ स्व मूल्यांकन कर को विवरणी की प्रस्तुति की तिथि को या उससे पहले दिया गया हो।
55.5 विवरणी को दाखिल करने के लिए, कार्यवाही को पूरा करने और करदाता पर अनुचित अनुपालन बोझ के बिना राजस्व के युक्तिकरण अनुमत समय की प्राप्ति के लिए और अनुपालन माहौल को प्रोत्साहित करने के लिए, आयकर अधिनियम के उक्त प्रावधानों को संशोधित किया गया है।
55.6 आयकर अधिनियम की धारा 139 की उप-धारा (1) के लिए छठे प्रावधान को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया है कि यदि एक व्यक्ति पिछले वर्ष के दौरान ऐसी आय प्राप्त करता है जो आयकर अधिनियम की धारा 10 के वाक्यांश (38) के अंतर्गत मुक्त है और आयकर अधिनियम की धारा 10 के कथित वाक्यांश को प्रभावी करे बिना ऐसे व्यक्ति की आय अधिकतम राशि जो कर हेतु वसूलनीय नहीं है, नियत तिथि के अंतर्गत पिछले वर्ष के लिए आय की विवरणी को दाखिल करने के लिए भी उत्तरदायी है।
55.7 उक्तकथित धारा की उप-धारा (4) को मुहैया कराने के लिए संस्थापित किया गया है कि कोर्इ व्यक्ति जिसने उप-धारा (1) के अंतर्गत उसको अनुमत समय के अंदर विवरणी को प्रस्तुत नहीं किया है, प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के अंत से पहले किसी भी समय या निर्धारण के पूरा होने से पहले, जो भी पहले हो, के लिए विवरणी प्रस्तुत कर सकता है।
55.8 उक्तकथित धारा की उप-धारा (5) को संस्थापित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि यदि कोर्इ व्यक्ति, उप-धारा (1) के अंतर्गत या उप-धारा (4) के अंतर्गत विवरणी को प्रस्तुत करने वाला या धारा 142 की उप-धारा (1) के अंतर्गत जारी नोटिस के प्रतिउत्तर में प्रस्तुत विवरणी में, उसमें कोर्इ गलत विवरण या त्रुटि पाता है तो वह प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के अंत से एक साल की समाप्ति से पहले या निर्धारण के पूरा होने से पहले, जो भी पहले हो, किसी भी समय संशोधित विवरणी प्रस्तुत कर सकता है।
55.9 उक्तकथित धारा की उप-धारा (9) के लिए स्पष्टीकरण के वाक्यांश (कक) को यह मुहैया कराने के लिए छोड़ा गया है कि एक विवरणी जो अन्यथा वैध है, केवल इसलिए गलत नहीं समझी जाएगी क्योंकि आयकर अधिनियम की धारा 140क के प्रावधानों के अनुसार देययोग्य स्व-मूल्यांकन कर और ब्याज का भुगतान विवरणी की प्रस्तुति की तिथि को या उससे पहले नहीं किया गया है।
55.10 प्रयोज्यता : धारा 139 की उप-धारा (3) के लिए संशोधन 1 अप्रैल, 2016 से पूर्वव्यापी रूप से प्रभावी है और तद्नुसार मूल्यांकन निर्धारण वर्ष 2016-17 और उत्तरगामी निर्धारण वर्ष के संबंध में लागू होगा। धारा 139 की उप-धारा (1), (4), (5) और (9) के लिए संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से प्रभावी होगा और तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी वर्षों के संबंध में लागू होगा।
56. निर्धारण से पहले अनिवार्य होने वाली आयकर अधिनियम की धारा 143(1) के अंतर्गत प्रसंस्करण
56.1 आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (1घ) के मौजूदा प्रावधान के अंतर्गत, विवरणी का प्रसंस्करण वहाँ आवश्यक नहीं है जहां कथित धारा की उप-धारा (2) के अंतर्गत निर्धारिती को नोटिस जारी किया गया हो।
56.2 उक्तकथित धारा की उप-धारा (1घ) को यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि जहां एक नोटिस को आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (2) के अंतर्गत जारी किया गया हो तो विवरणी का प्रसंस्करण वित्त वर्ष जिसमें विवरणी प्रस्तुत की जाती है, के अंत से एक वर्ष की समाप्ति से पहले आवश्यक नहीं होगा। हालांकि, आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (3) के अंतर्गत आदेश के निगर्मन से पहले विवरणी को संसोधित करना आवश्यक है।
56.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
57. मूल्यांकन, पुर्नमूल्यांकन और पुर्नगणना के लिए समय सीमा का युक्तिकरण
57.1 मूल्यांकन कार्यवाही की समाप्ति के लिए मौजूदा सांविधिक समय सीमा मूल्यांकन वर्ष जिसमें आय पहली बार मूल्यांकित हुर्इ थी, के अंत से दो वर्ष है। यह आपेक्षित है कि अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही अधिक तेजी से समाप्त होती है चूंकि विभाग के अंतर्गत प्रक्रिया का अंकरूपण कार्यभार को संभालने में इसकी दक्षता को बढ़ाता है। केवल उन प्रावधानों को बनाए रख आयकर अधिनियम की मौजूदा धारा 153 के प्रावधानों को सरल करने के लिए जो आयकर अधिनियम के वर्तमान प्रावधानों के लिए प्रासंगिक है, आयकर अधिनियम की धारा 153 को मौजूदा समय सीमा से समय सीमा में निम्नलिखित परिवर्तन के साथ मौजूदा धारा को प्रतिस्थापित कर संशोधित किया गया है।
(i) अवधि, धारा 143 या धारा 144 के अंतर्गत मूल्यांकन को पूरा करने के लिए, को निर्धारण वर्ष जिसमें आय पहले मूल्यांकित हुर्इ, के अंत से मौजूदा दो वर्ष से इक्कीस महीने परिवर्तित किया गया है;
(ii) धारा 147 के अंतर्गत मूल्यांकन की समाप्ति की अवधि को वित्त वर्ष जिसमें धारा 148 के अंतर्गत नोटिस तामील हुआ, के अंत से मौजूदा एक वर्ष को नौ महीने तक घटाया गया
(iii) धारा 254 या धारा 263 या धारा 264 के अंतर्गत एक आदेश के अनुसार नए निर्धारण की समाप्ति के लिए अवधि, मूल्यांकन की निरस्ती या समाप्ति, को वित्त वर्ष जिसमें प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा धारा 254 के अंतर्गत आदेश प्राप्त हुआ या धारा 263 या धारा 264 के अंतर्गत प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा आदेश पारित हुआ, के अंत से मौजूदा एक वर्ष को नौ महीने तक परिवर्तित किया गया।
57.2 आगे यह मुहैया कराया जाता है कि आदेश को प्रभावी करने के लिए अवधि, आयकर अधिनियम की धारा 250 या 254 या 260 या 262 या 263 या 264 के अंतर्गत या आयकर अधिनियम की धारा 245घ की उप-धारा (4) के अंतर्गत निपटान आयोग के आदेश, जहां नए मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन करने को छोड़कर पूर्णता या आंशिक रूप से प्रभावी किया जा सके, माह जिसमें आदेश प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रमुख आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त या पारित हुआ, जो भी मामला हो, से तीन महीने होगी। यह भी मुहैया किया गया है कि यदि जहां उक्तकथित अवधि के अंदर ऐसे आदेश को प्रभावी करना निर्धारण अधिकारी के लिए संभव न हो तो उसके नियंत्रण से परे कारण के लिए, प्रधान आयुक्त या आयुक्त निर्धारण अधिकारी से लिखित में ऐसे कारण को प्राप्त करने पर, यदि वह संतुष्ट हो, कथित आदेश को प्रभावी करने के लिए छह महीने के अतिरिक्त समय की स्वीकृति दे सकते हैं। हालांकि, 1 जून, 2016 के अनुसार लंबित मामलों के संबंध में, ऐसे आदेश को पारित करने के लिए समय सीमा को 31.03.2017 तक विस्तारित किया गया है।
57.3 यह भी मुहैया किया जाता है कि जहां निर्धारण, पुर्ननिर्धारण अथवा पुर्नगणना आयकर अधिनियम की धारा 250, 254, 260, 262, 263 या धारा 264 मे शामिल किसी खोज या निर्देश को प्रभावी करने के लिए या उसके परिणामस्वरूप या आयकर अधिनियम के अंतर्गत संदर्भ या अपील के रूप को छोड़कर किसी प्रक्रिया के अंतर्गत न्यायलीय में की आदेश निर्धारिती या किसी व्यक्ति को दिया जाता है तो ऐसा मूल्यांकन, पुर्नमूल्यांकन या पुर्नगणना उस महीने जिसमें ऐसा आदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त होता है, के अंत से बारह महीने के अंत को अथवा उससे पहले की जाएगी। हालांकि, 01.06.2016 के अनुसार लंबित मामलों के लिए, आपेक्षित कार्यवाही करने के लिए समय सीमा 31.3.2017 है या उस माह जिसमें ऐसा आदेश प्राप्त हुआ, के अंत से 12 महीने है, जो भी बाद में हो।
57.4 जहां एक मूल्यांकन आयकर अधिनियम की धारा 147 के अंतर्गत फर्म पर किए गए मूल्यांकन के परिणामस्वरूप फर्म के सहभागी पर किया जाता है तो ऐसा मूल्यांकन उस महीने जिसमें ऐसा आदेश प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा किया जाता है, के अंत से बारह महीने में या उससे पहले किया जाएगा। हालांकि, 01.6.2016 के अनुसार लंबित मामलों के लिए, आवश्यक कार्यवाही करने के लिए समय सीमा 31.3.2017 है या उस माह जिसमें ऐसा आदेश पारित हुआ, के अंत से 12 महीने है, जो भी बाद में हो।
57.5 इसी प्रकार, निर्धारण अधिकारी द्वारा मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन की समाप्ति के लिए समय-सीमा में महत्वपूर्ण परिवर्तन आयकर अधिनियम की धारा 92गक की उप-धारा (3क) में संशोधन द्वारा कुछ मामलों में स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण अधिकारी को प्रदान की गर्इ समय सीमा के विस्तार के अनुसार किया गया है।
57.6 आयकर अधिनियम की धारा 153 के प्रावधान जैसा यह अधिनियम द्वारा उनके संशोधन से तुरंत पहले मौजूद होते है, लागू होंगे और 1 जून, 2016 से पहले किए गए मूल्यांकन, पुर्नमूल्यांकन या पुर्नगणना के किसी आदेश के संबंध में लागू होंगे।
57.7 प्रयोज्यता : ये संशोधन 1 जून, 2016 से पूर्वव्यापी रूप से प्रभावी होंगे
58. खोज मामलों में मूल्यांकन के लिए समय सीमा का युक्तिकरण
58.1 आयकर अधिनियम की धारा 153क या धारा 153ग के अंतर्गत किए गए मूल्यांकन के खत्म करने के लिए समय सीमा अन्य मामलों के लिए उपलब्ध करार्इ गर्इ नर्इ समय सीमा के संबंध में इसे लाने के लिए संशोधित की गर्इ है। केवल उन प्रावधानों को बनाए रखे आयकर अधिनियम की मौजूदा धारा 153ख के प्रावधानों को सरल बनाने के लिए जो अधिनियम के वर्तमान प्रावधानों के प्रासंगिक है, आयकर अधिनियम को निम्नानुसार मौजूदा समय सीमा द्वारा समय सीमा में निम्नलिखित परिवर्तनों के साथ संस्थापित किया गया है :
(i) आयकर अधिनियम की धारा 153क के अंतर्गत मूल्यांकन की समाप्ति के लिए सीमा, आयकर अधिनियम की धारा 153क की उप-धारा (1) के वाक्यांश (ख) हेतु संदर्भित छः मूल्यांकन वर्षों के अंतर्गत आने वाले हर निर्धारण वर्ष के संबंध में और पिछले वर्ष जिसमें ऐसी खोज आयकर अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत की जाती है या मांग आयकर अधिनियम की धारा 132क के अंतर्गत की जाती है, हेतु प्रासंगिक निर्धारण वर्ष के संबंध में वित्त वर्ष जिसमें आयकर अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत खोज के लिए अंतिम प्राधिकारण या आयकर अधिनियम की धारा 132क के अंतर्गत मांग की गर्इ थी, के अंत को दो वर्षों से इक्कीस महीनों तक परिवर्तित किया गया है।
(ii) आयकर अधिनियम की धारा 153ग में संदर्भित अन्य व्यक्ति की स्थिति में मूल्यांकन की समाप्ति के लिए सीमा को वित्त वर्ष जिसमें आयकर अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत खोज के लिए अंतिम प्राधिकरण या आयकर अधिनियम की धारा 132क के अंतर्गत मांग वित्त वर्ष बही खातों या दस्तावेजों या जब्त परिसंपत्ति या मांग अन्य व्यक्ति पर क्षेत्राधिकार रखने वाले निर्धारण अधिकारी को आयकर अधिनियम की धारा 153ग के अंतर्गत सौंपा जाता है, के अंत से नौ महीने (मौजूदा एक वर्ष से परिवर्तित) या कार्यान्वित किया गया था, जो भी बाद में हो, के अंत से मौजूदा दो वर्षों से इक्कीस महीने तक परिवर्तित किया गया है।
58.2 आयकर अधिनियम की धारा 153ख के प्रावधानों जैसा यह अधिनियम द्वारा इनके संशोधन से तुरंत पहले मौजूद है, लागू होंगे और 1 जून, 2016 से पहले किए गए मूल्यांकन, पुर्नमूल्यांकन या पुर्नगणना के किसी आदेश के संबंध में लागू होंगे।
58.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से पूर्वव्यापी रूप से प्रभावी होंगे
59. आयकर अधिनियम की धारा 234ग के अंतर्गत ब्याज वसूली और धारा 21 के अंतर्गत अग्रिम कर भुगतान अनुसूची का युक्तिकरण
59.1 आयकर अधिनियम की धारा 211 की उप-धारा (1) के प्रभावी प्रावधानों के अनुसार, कंपनी के लिए अग्रिम कर भुगतान अनुसूची क्रमश: 15 जून, 15 सिंतबर, 15 दिसम्बर और 15 मार्च तक दी जाने वाली वर्तमान आय पर देययोग्य कर का पंद्रह प्रतिशत, पंतालीस प्रतिशत, सत्तर प्रतिशत और सौ प्रतिशत है। अन्य निर्धारितियों के लिए, अग्रिम कर भुगतान अनुसूची क्रमश: 15 सिंतबर, 15 दिंसबर और 15 मार्च तक दी जाने वाली वर्तमान आय पर देययोग्य कर का तीस प्रतिशत, साठ प्रतिशत और सौ प्रतिशत है।
59.2 इस तथ्य को साथ रखते हुए व्यय प्रबंधन आयोग की सिफारिशों पर आधारित अधिकतर अग्रिम कर को अब इलैक्ट्रानिक रूप से दिया जाता है अग्रिम कर के लिए अनुसूची को आयकर अधिनियम की धारा 211 के प्रावधानों को संशोधित कर युक्तीकृत किया गया है और वही अग्रिम कर अनुसूची को योग्य व्यापार के संबंध में योग्य निर्धारिती को छोड़कर सभी निर्धारितियों के लिए निर्धारित किया गया है जैसा आयकर अधिनियम की धारा 44कघ में संदर्भित है। भुगतान अनुसूची में संशोधन अधिक सटीकता के साथ वित्त वर्ष के दौरान राजस्व एकत्रीकरण की पूर्वानुमान की सुविधा देगा।
59.3 आगे यह मुहैया कराया जाता है कि प्रकल्पित आधार पर व्यापार के लाभ या प्राप्ति की गणना के लिए चुनी गर्इ आयकर अधिनियम की धारा 44कघ हेतु संदर्भित पात्र व्यापार के संबंध में योग्य निर्धारिती को वित्त वर्ष के 15 मार्च को या उससे पहले एक किश्त में पूरी राशि के अग्रिम कर का भुगतान करना आवश्यक है।
59.4 महत्वपूर्ण संशोधन आयकर अधिनियम की धारा 234ग के लिए भी किए गए हैं जो आयकर अधिनियम की धारा 211 में किए गए संशोधनों के संबंध में इसे लाने के लिए अग्रिम कर के स्थगिकरण के लिए ब्याज की प्रभार्यता के लिए मुहैया की गर्इ है।
59.5 यह भी मुहैया कराया जाता है कि आयकर अधिनियम की धारा 234ग के अंतर्गत ब्याज उसमें निर्दिष्ट शर्तों को पूरा करने के अनुसार पहली बार के लिए शीर्षक "व्यापारिक या पेशे के लाभ और प्राप्ति" के अंतर्गत आय रखने वाले निर्धारिती की स्थिति में वसूलनीय नहीं होगी।
59.6 प्रयोज्यता : ये संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होगी
60. प्रतिदाय पर ब्याज का भुगतान
60.1 आयकर अधिनियम की धारा 244क अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराती है कि एक निर्धारिती अग्रिम कर के अतिरिक्त भुगतान, स्रोत पर कर कटौती या संग्रहण पर ब्याज के लिए हकदार है। यह भी मुहैया कराता है कि अवधि जिसके लिए ब्याज कर के ऐसे अतिरिक्त भुगतान पर दिया जाता है निर्धारण वर्ष के 1 अप्रैल से प्रारंभ होता है और तिथि जिस पर प्रतिदाय स्वीकृत होता है, पर समाप्त होता है।
60.2 आयकर अधिनियम की धारा 244क की देय तिथि के अंतर्गत विवरणी को दाखिल करने को सुनिश्चित करने के लिए यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि यदि जहां विवरणी देय तिथि के बाद दाखिल होती है तो प्रतिदाय पर ब्याज की स्वीकृति की अवधि विवरणी को दाखिल करने कीे तिथि से प्रारंभ हो सकती है।
60.3 निष्पक्षता और इक्विटी के हित में, आगे यह मुहैया कराया जाता है कि एक निर्धारिती उस तिथि के लिए विवरणी को दाखिल करने या कर के भुगतान की तिथि से प्रारंभ अवधि, जो भी बाद में हो, के लिए स्व: मूल्यांकन के प्रतिदाय पर ब्याज हेतु पात्र होगी जो प्रतिदाय स्वीकृत होता है। देय करों के समक्ष प्राप्त भुगतानों के समायोजन के आदेश को निर्धारित करने के लिए, पहले से दिए गए कर यानी टीडीएस, टीसीएस और अग्रिम कर पहले समायोजित होंगे।
60.4 यह भी मुहैया किया जाता है कि जहां एक प्रतिदाय आयकर अधिनियम की धारा 153 की उप-धारा (5) के अंतर्गत निर्धारित समय सीमा के पार लंबित होता है तो निर्धारिती प्रतिदाय स्वीकृत का हकदार होता है , के लिए आयकर अधिनियम की धारा 153 की उप-धारा (5) के अंतर्गत स्वीकृत समय की समाप्ति की निम्नलिखित तिथि से प्रारंभ होने वाली अवधि के लिए तीन प्रतिशत प्रति वर्ष की दर पर आंके गए ऐसे प्रतिदाय की राशि पर अतिरिक्त ब्याज प्राप्त करने के लिए हकदार होगा, आयकर अधिनियम की धारा 244क की उप-धारा (1) के अंतर्गत देययोग्य ब्याज के अतिरिक्त। यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि जहां विस्तार आयकर अधिनियम की धारा 153 की उप-धारा (5) के लागू परंतुक द्वारा प्रधान आयुक्त या आयुक्त द्वारा स्वीकृत होती है तो अतिरिक्त ब्याज, यदि हो, की अवधि ऐसी विस्तारित अवधि की समाप्ति से प्रारंभ होगी।
60.5 प्रयोज्यता :यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होगी।
61. अपीलीय न्यायाधिकरण से संबंधित प्रावधानों का युक्तिकरण
61.1 आयकर अधिनियम की धारा 252 की उप-धारा (3), उप-धारा (4क) और उप-धारा (5) के मौजूदा वाक्यांश (ख) को अपीलीय न्यायाधिकरण के वरिष्ठ उपाध्यक्ष की नियुक्ति तथा अधिकारों के लिए मुहैया किया गया है।
61.2 इस तथ्य को देखते हुए कि न्यायाधिकरण में वरिष्ठ उपाध्यक्ष के पद के साथ संबद्ध वेतनमान में भिन्नता या कोर्इ न्यायेतर या प्रशासनिक कार्यवाही नहीं है "वरिष्ठ उपाध्यक्ष" के संदर्भ को आयकर अधिनियम की धारा 252 के उक्त प्रावधानों से छोड़ा गया है।
61.3 आयकर अधिनियम की धारा 253 की उप-धारा (2क) मुहैया कराती है कि प्रधान आयुक्त या आयुक्त, आयकर अधिनियम की धारा 144ग की उप-धारा (5) के अंतर्गत विवाद समाधान पैनल (डीआरपी) द्वारा जारी किसी ऐेसे निर्देश के लिए आपत्ति दर्ज करता है जिसके अनुसार निर्धारण अधिकारी ने मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन को पूरा करने के लिए आदेश पारित किया है, ऐसे आदेश के समक्ष अपीलीय न्यायाधिकरण को अपील करने के लिए निर्धारण अधिकारी को निर्देश दे सकता है।
61.4 आगे, आयकर अधिनियम की धारा 253 की उप-धारा (3क) मुहैया कराती है कि उप-धारा (2क) के अंतर्गत हर अपील तिथि जिस पर विरूद्धात्मक अपील किए जाने का आदेश, आदेश आयकर अधिनियम की धारा 144ग की उप-धारा (5) के निर्देशों के अनुसार निर्धारण अधिकारी द्वारा पारित होता है, से साठ दिनों के अंतर्गत दाखिल होगी।
61.5 मुकद्मेबाजी को कम करने के सरकार के निर्णय के आधार पर, आयकर अधिनियम की धारा 253 की उप-धारों (2क) और (3क) को डीआरपी के आदेश के विरूद्ध निर्धारण अधिकारी द्वारा अपील को दाखिल करने से दूर करने के लिए आदेश में खत्म किया गया है। कथित प्रावधान की उप-धारा (3क) और (4) में परिणामी संशोधन किए गए हैं।
61.6 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे।
61.7 यह भी मुहैया कराया जाता है कि जहां विभाग आयकर अधिनियम (जैसे यह अधिनियम द्वारा किए गए संशोधन के समक्ष मौजूद है) की धारा 253 की उप-धारा (2क) के डीआरपी निर्देशों के विरूद्ध अपील में पहले से है तो कोर्इ शुल्क देययोग्य नहीं होगा।
61.8 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी है।
61.9 आयकर अधिनियम की धारा 254 की उप-धारा(2) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि अपीलीय न्यायाधिकरण आदेश की तिथि से चार वर्षों के भीतर किसी समय अपने आदेश में रिकार्ड से उपस्थित होने वाली किसी गलती को संशोधित कर सकते हैं।
61.10 आर्इटीएटी के आदेश के लिए निश्चितता लाने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 254 की उप-धारा (2) को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि अपीलीय न्यायाधिकरण माह जिसमें आदेश पारित हुआ, के अंत से छह महीनों के भीतर किसी भी समय इसके आदेश से उत्पन्न होने वाली किसी त्रुटि को संशोधित कर सकते हैं।
61.11 आयकर अधिनियम की धारा 255 की उप-धारा (3) के मौजूदा प्रावधान अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराते हैं कि एक एकल सदस्य पीठ किसी मामले का निपटान कर सकती है जो उस निर्धारिती से संबंधित है निर्धारण अधिकारी द्वारा आंकी गर्इ जिसकी कुल आय पंद्रह लाख रूपए से अधिक नहीं है।
61.12 आर्इटीएटी के समक्ष अपील दाखिल करने के लिए मौद्रिक सीमा में नवीनतम बढ़ोत्तरी को देखते हुए और आर्इटीएटी के स्तर पर विवाद समाधान की प्रक्रिया को शीघ्र निपटाने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 255 की उप-धारा (3) के प्रावधान को संशोधित किया गया है जिससे मुहैया किया जा सके कि एक एकल सदस्य पीठ उन मामलों का निपटान कर सकती है जहां कुल आय जैसा निर्धारण अधिकारी द्वारा आंकी जाती है, पचास लाख रूपए से अधिक नहीं होती।
61.13 प्रयोज्यता : ये धारा 254 और 255 हेतु संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होगा।
62. जुर्माना प्रावधानों का युक्तिकरण
62.1 मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, आय के गलत विवरणों की प्रस्तुति या आय के विवरण को छुपाने के कारण आयकर अधिनियम की धारा 271(1)(ग) के अंतर्गत जुर्माना लगाया जाता है। युक्तिकरण के लिए और जुर्माना प्रावधानों में निष्पक्षतावाद, निश्चितता और स्पष्टता लाने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 271 को 1 अप्रैल, 2017 और उत्तरगामी वर्षों को अथवा उसके बाद प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारण के संबंध में गैर-प्रयोज्य किया गया है और जुर्माना 1 अप्रैल, 2017 से प्रभावी आयकर अधिनियम में शामिल नर्इ धारा 270क के अंतर्गत वसूलनीय है। आयकर अधिनियम की धारा 270क आय की सूचना न देने और गलत सूचना देने के पर जुर्माना लगेगा।
62.2 आयकर अधिनियम की धारा 270क की उप-धारा (1) मुहैया कराती है कि अधिनियम के अंतर्गत किसी प्रक्रिया की अवधि के दौरान निर्धारण अधिकारी, आयुक्त (अपील) या प्रधान आयुक्त या आयुक्त जुर्माना लगा सकते हैं यदि एक व्यक्ति ने अपनी आय की सूचना न दी हो।
62.3 यह मुहैया कराता है कि एक व्यक्ति अपनी आय की सूचना न देने वाला समझा जाएगा यदि—
(क) मूल्यांकित आय आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (1) के वाक्यांश(क) के अंतर्गत मूल्यांकित विवरणी में अधिकतम राशि से अधिक हो;
(ख) मूल्यांकित आय कर हेतु न वसूले जाने वाली अधिकतम राशि से अधिक हो, जहां आय की कोर्इ विवरणी प्रस्तुत न की गर्इ हो;
(ग) मूल्यांकित आय ऐसे पुर्नमूल्यांकन से तुरंत पहले मूल्यांकित या पुर्नमूल्यांकित आय से अधिक हो
(घ) आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख या 115´ञग के प्रावधानों के अनुसार मूल्यांकित या पुर्नमूल्यांकित समझे जाने वाली कुल आय की राशि आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (क) के अंतर्गत मूल्यांकित आय में निर्धारित समझे जाने वाली कुल आय से अधिक हो
(ड़) आयकर अधिनियम की धारा 115 ´ञख या 115´ञग के प्रावधानों के अनुुसार समझे जाने वाली कुल आय कर हेतु वसूली न जाने वाली अधिकतम राशि से अधिक हो, जहां किसी आय की राशि को दाखिल न किया गया हो
(च) आयकर अधिनियम की धारा धारा 115 ´ञख या 115´ञग के प्रावधानों के अनुुसार समझे पुर्नमूल्यांकित समझे जाने वाली कुल आय की राशि ऐसे पुर्नमूल्यांकन से तुरंत पहले मूल्यांकित या पुर्नमूल्यांकित समझे जाने वाली कुल आ से अधिक हो;
(छ) मूल्यांकित या पुर्नमूल्यांकित आय का ऐसी हानि को आय में रूपांतरित करने या हानि को कम करने का प्रभाव हो
62.4 आय संबंधी सूचना न देने की राशि उसमें चर्चितानुसार विभिन्न परिदृश्यों में आंकी जाएगी। यदि जहां विवरणी प्रस्तुत की जाती है और निर्धारण पहली बार किया जाता है तो सभी व्यक्तियों की स्थिति में आय संबंधी राशि जिसकी सूचना नहीं दी गर्इ है आयकर अधिनियम की धारा 143(1)(क) के अंतर्गत निर्धारित आय और मूल्यांकित आय के बीच का अंतर होगा। यदि जहां कोर्इ विवरणी प्रस्तुत न की गर्इ हो और विवरणी पहली बार प्रस्तुत की जाती है तो आय संबंधी राशि जिसकी सूचना न दी गर्इ हो निम्न होगी :
(i) एक कंपनी के लिए, फर्म या स्थानीय प्राधिकारी, निर्धारिती आय;
(ii) कंपनी, फर्म या स्थानीय प्राधिकारी को छोड़कर, एक व्यक्ति के लिए मूल्यांकित आय और अधिकतम आय के बीच का अंतर कर हेतु वसूलनीय नहीं है।
62.5 किसी व्यक्ति की स्थिति में, जहां आय पहली बार के लिए प्रसंस्कृत नहीं की जाती, आय जिसकी सूचना न दी गर्इ हो, की राशि ऐसे आदेश के तुरंत बाद के आदेश में निर्धारित या मूल्यांकित आय और ऐसे आदेश में निर्धारित या मूल्यांकित आय के बीच का अंतर होगी ।
62.6 आगे यह मुहैया कराया जाता है कि जहां प्रतिवेदी आय एक मामले में जहां आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख या धारा 115´ञग के प्रावधानों के अनुसार समझे जाने वाली कुल आय के निर्धारण में से उत्पन्न होती है, प्रतिवेदी आय के अंतर्गत कुल राशि निम्नलिखित तरीके के अनुसार निर्धारित की जाएगी -
(क-ख) + (ग-घ)
जहां
क = आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख या धारा 115´ञग में शामिल प्रावधानों को छोड़कर प्रावधानों के अनुसार मूल्यांकित कुल आय (यहां सामान्य प्रावधानों के तौर पर जाना जा सकता है)
ख = कुल आय जो वसूलनीय होती सामान्य प्रावधानों के अनुसार निर्धारित कुल आय थी जिसे प्रतिवेदी आय के अंतर्गत राशि द्वारा कम किया गया है
ग = आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख या धारा 115´गञ में शामिल प्रावधानों के अनुसार निर्धारित कुल आय
घ = कुल आय जो वसूलनीय होती आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख या धारा 115´ञग में शामिल प्रावधानों के अनुसार निर्धारित कुल आय थी जिसे प्रतिवेदी आय के अंतर्गत राशि द्वारा कम किया गया है
हालांकि, जहां किसी मुद्दे पर आय जिसकी सूचना न दी गर्इ हो की राशि आयकर अधिनियम की धारा 115´ञख में शामिल प्रावधानों के अंतर्गत या सामान्य प्रावधानों के अंतर्गत विचारनीय होती है, ऐसी राशि मद घ के अंतर्गत राशि को निर्धारित करने के दौरान आंकी गर्इ कुल आय से कम नहीं होगी।
62.7 यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि जहां एक निर्धारण या पुर्ननिर्धारण का विवरणी में घोषित हानि को कम करने पर या उस हानि को आय में रूपांतरित करने पर प्रभाव हो तो ऐसी आय जिसकी सूचना न दी गर्इ हो की राशि दावे की गर्इ हानि और आय या हानि, जो भी स्थिति हो, मूल्यांकित या पुर्नमूल्यांकित, के बीच का अंतर होगी।
62.8 मामले में आय जिसकी सूचना न दी गर्इ हो की गणना जहां किसी प्राप्ति , जमा या निवेश का स्रोत पहले के वर्ष से जुड़ा है तो आयकर अधिनियम की धारा 271 की उप-धारा (1) के मौजूदा स्पष्टीकरण 2 पर आधारित होगा।
62.9 यह भी मुहैया कराया गया है कि इस धारा के अंतर्गत आय की सूचना न देना निम्नलिखित मामलों में शामिल नहीं होगी;
(i) जहां निर्धारिती एक स्पष्टीकरण देता है और आयकर प्राधिकारी संतुष्ट हो कि स्पष्टीकरण सही है और सभी वस्तुगत तथ्यों को प्रकट किया गया है;
(ii) जहां ऐसी आय की सूचना न देना एक अनुमान के आधार पर निर्धारित हो यदि खाते सही हो और पूरे हो लेकिन नियोजित विधि ऐसी हो कि आय को पूर्ण रूप से उसमें से नहीं काटा जा सकता;
(iii) जहां निर्धारिती के पास, अपने आप, निगर्मन पर अस्वीकृति या अतिरिक्त न्यूनतम रिया का अनुमान हो और अपनी आय की गणना में ऐसी राशि को शामिल करता हो और वृद्धि अथवा अस्वीकृति हेतु समस्त तथ्यगत विषयों को प्रकट करता हो;
(iv) जहां निर्धारिती आयकर अधिनियम की धारा 92घ के अंतर्गत निर्धारितानुसार सूचना और दस्तावेजों को अनुरक्षित रखता था, आयकर अधिनियम के अध्याय X के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन की घोषणा और लेनदेन से संबंधित सभी विषयगत तथ्यों को प्रकट करता था;
(v) जहां अघोषित आय खोज संचालन का कारण हो और जुर्माना आयकर अधिनियम की धारा 271ककख के अंतर्गत वसूलनीय हो।
62.10 जुर्माने की दर की आय जिसकी सूचना दी गर्इ हो पर देययोग्य कर का पचास प्रतिशत होगी। हालांकि, जहां निर्धारिती द्वारा आय की गलत सूचना के परिणामस्वरूप आय की सूचना देने की स्थिति में, व्यक्ति आय की ऐसी गलत सूचना पर दययोग्य कर के दो सौ प्रतिशत की दर पर जुर्माने के लिए उत्तरदायी होगा। आय की गलत सूचना के मामले निम्नानुसार निर्दिष्ट किए गए हैं :
(i) तथ्यों की गलत बयानी या अवरोध;
(ii) बही खातों में निवेशों की गैर-रिकॉर्डिंग;
(iii) प्रमाण द्वारा पुष्ट न होने वाले व्यय का दावा;
(iv) बही खातों में गलत प्रविष्टि की रिकॉर्डिंग;
(v) कुल आय को प्रभावित करने वाले बही खातों में किसी प्राप्ति को रिकॉर्ड करने में विफलता;
(vi) आयकर अधिनियम के अध्याय X के अंतर्गत कोर्इ अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन या समझे जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन की सूचना देने में विफलता।
62.11 विभिन्न परिस्थितियों में असूचित आय पर देययोग्य कर को निम्नानुसार मुहैया कराया गया है :-
(क) जहां कोर्इ आय प्रस्तुत न की गर्इ हो और आय पहली बार मूल्यांकित की गर्इ हो तो अधिकतम राशि द्वारा बढ़ार्इ गर्इ असूचित आय पर आंके गए कर की राशि कर हेतु वसूलनीय नहीं है यदि इसे कुल आय पर दिया गया था।
(ख) हानि के प्रसंस्करण में या तुरंत बाद के आदेश, जो भी स्थिति हो, पर प्रतिवेदी आय पर आंके गए कर की राशि में निर्धारित किया जाए जैसे इसे कुल आय में आंका था।
(ग) किसी अन्य मामले में, असूचित आय जिसे आयकर अधिनियम की धारा 143(1)(क) के अंतर्गत निर्धारित कुल आय या आदेश के तुरंत बाद में निर्धारित/पुर्नमूल्यांकित/पुन: आंकी गर्इ कुल आय के अंतर्गत आंके गए कर के बीच अंतर जैसे कि यह कुल आय और आयकर अधिनियम की धारा 143(1)(क) के अंतर्गत आंके गए कर था या तुरंत बाद के आदेश में निर्धारित/पुर्नमूल्यांकित/पुन: आंकी गर्इ कुल आय जैसी यह कुल आय थी
62.12 यह भी मुहैया कराया गया है कि एक राशि की कोर्इ वृद्धि या अस्वीकृति जुर्माने के अधिरोपण का आधार नहीं होगी यदि ऐसी वृद्धि या अस्वीकृति उसी या किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए व्यक्ति की स्थिति में जुर्माने के अधिरोपण का अभिन्न अंग बनती है।
62.13 परिणामी संशोधन आयकर अधिनियम की नर्इ शामिल की गर्इ धारा 270क के संदर्भ में मुहैया कराने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 119, 253, 271क, 271कक, 273क, 276ग और 279 में किए गए है।
62.14 प्रयोज्यता : ये संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होंगे और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
62.15 आयकर अधिनियम की धारा 270क के प्रावधान नीचे दिए गए उदाहरणों के माध्यम से वर्णित हैं:
उदाहरण 1. फर्म के मामले 30 प्रतिशत की दर पर कर हेतु उत्तरदायी है।
| (आंकड़े रू. लाख में) | |
| वापस की गर्इ कुल आय | 100 |
| आयकर अधिनियम की धारा 143(1)(क) के अंतर्गत निर्धारित कुल आय | 110 |
| आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के अंतर्गत मूल्यांकित कुल आय | 150 |
| आयकर अधिनियम की धारा 147 के अंतर्गत पुनः निर्धारित कुल आय | 180 |
विचार करते हुए कि आयकर अधिनियम की धारा 270क की उप-धारा (6) के अंतर्गत उक्तानुसार योग्य मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन में की गर्इ कोर्इ भी वृद्धि या अस्वीकृति नही की गर्इ है, जुर्माना निम्नानुसार आंका जाएगा
| आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के अंतर्गत मूल्यांकन | आयकर अधिनियम की धारा 147 के अंतर्गत पुर्नमूल्यांकन | |
| आय की असूचना | (150-110) = 40 | (180-150) = 30 |
| असूचित आय पर देययोग्य कर | 40 का 30 प्रतिशत = 12 | 30 का 30 प्रतिशत = 9 |
| लगने वाला जुर्माना* | 12 का 50 प्रतिशत = 6 | 9 का 50 प्रतिशत = 4.5 |
*विचारनीय असूचित आय गलतबयानी का कारण नहीं है
उदाहरण 2. 60 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति की स्थिति में और आय की कोर्इ विवरणी निम्न के तौर पर स्लैब दरों पर कर हेतु प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी किया गया है : 2,50,000 तक - शून्य, 2,50,000-5,00,000 - 10 प्रतिशत, 5,00,000-10,00,000-20 प्रतिशत, आय > 10,00,000-30 प्रतिशत
| (आंकड़े रू. में) | |
| आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के अंतर्गत निर्धारित कुल आय | 10,00,000 |
| असूचित आय | 10,00,000-2,50,000*=7,50,000 |
| असूचित आय जिसे अधिकतम राशि जो कर हेतु वसूलनीय नहीं है, द्वारा बढ़ाया गया है | 7,50,000 + 2,50,000 = 10,00,000 |
| देययोग्य कर | 2,50,000 का 10 प्रतिशत = 5,00,000 का 20 प्रतिशत = 1,25,000 |
| देययोग्य जुर्माना** | 1,25,000 का 50 प्रतिशत = 62,500 |
* अधिकतम राशि जो कर हेतु वसूलनीय नहीं है
* असूचित आय पर विचार करते हुए आय गैर-प्रतिवेदन के कारण नहीं है
उदाहरण 3. यह मामला एक कंपनी का है जो 30 प्रतिशत की दर पर कर हेतु उत्तरदायी है :
| (आंकड़े रू. लाख में) | |
| विवरणी कुल आय (हानि) | (-)100 |
| आयकर अधिनियम की धारा 143(1)(क) के अंतर्गत निर्धारित कुल आय (हानि) | (-)90 |
| आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के अंतर्गत निर्धारित कुल आय (हानि) | (-)40 |
| आयकर अधिनियम की धारा 147 के अंतर्गत पुर्ननिर्धारित कुल आय | 20 |
आयकर अधिनियम की धारा 270क की उप-धारा (6) के अंतर्गत उक्त योग्यतानुसार मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन में न की गर्इ किसी भी वृद्धि या अस्वीकृति पर विचार करते हुए, जुर्माना निम्नानुसार आंका जाएगा
| आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के अंतर्गत मूल्यांकन | आयकर अधिनियम की धारा 147 के अंतर्गत पुर्नमूल्यांकन | |
| असूचित आय | (-)40 घटा (-)90 = 50 | 20 घटा (-)40 = 60 |
| असूचित आय पर देययोग्य कर | 50 का 30 प्रतिशत = 15 | 60 का 30 प्रतिशत = 18 |
| * देययोग्य जुर्माना | 15 का 50 प्रतिशत = 7.5 | 18 का 50 प्रतिशत = 9 |
*असूचित आय पर विचार करते हुए यह गलतबयानी का कारण नहीं है
62.16 आयकर अधिनियम की धारा 271ककख का संशोधन
62.16.1 आयकर अधिनियम की धारा 271ककख की उप-धारा (1) के वाक्यांश (ग) के मौजूदा प्रावधान मुहैया कराते हैं कि एक मामला आयकर अधिनियम की धारा 271ककख की कथित उप-धारा के वाक्यांश (क) तथा (ख) के प्रावधानों के अंतर्गत कवर नहीं हैं, एक राशि का जुर्माना तीस प्रतिशत से कम नहीं होगा लेकिन जो पिछले निर्दिष्ट वर्ष की अघोषित आय के नब्बे प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, उस मामले में लगार्इ जाएगी जहां खोज 1 जुलार्इ, 2012 को या उसके बाद आयकर अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत प्रारंभ किया गया हो।
62.16.2 जुर्माने की दर को युक्तिकृत करने के लिए और आयकर अधिनियम की धारा 271ककख की उप-धारा (1) के वाक्यांश (ग) ऐसी आय के साठ प्रतिशत की एक समान दर पर ऐसी अघोषित आय पर जुर्माने को लगाने के लिए मुहैया कराने हेतु संशोधित की गर्इ है।
62.16.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
62.17 आयकर अधिनियम की धारा 272क का संशोधन
62.17.1 आयकर अधिनियम की धारा 272क की उप-धारा (1) के मौजूदा प्रावधान को आयकर अधिनियम के अंतर्गत आयकर प्राधिकारी द्वारा उठाए गए प्रश्नों के उत्तर के लिए ऐसी चूक या विफलता के लिए दस हजार रूपए के जुर्माने के उदग्रहण के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 131 की उप-धारा (1) के अंतर्गत आपेक्षितानुसार बही या दस्तावेजों की प्रस्तुति या प्रमाण देने के लिए ध्यान देने हेतु विफलता या आयकर अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही के दौरान कानूनी रूप से आपेक्षित किसी विवरण पर हस्ताक्षर करने से मना करने के लिए मुहैया करार्इ गर्इ है।
67.17.2 आयकर अधिनियम की धारा 272क की उप-धारा (1) के कथित प्रावधानों को आयकर अधिनियम की धारा 142 की उप-धारा (2क) के अंतर्गत जारी निर्देशों के अनुसार विफलता या आयकर अधिनियम की धारा 143 की उपधारा (2) या आयकर अधिनियम की धारा 142 की उप-धारा (1) के अंतर्गत जारी नोटिस के अनुसार प्रत्येक चूक या विफलता के लिए दस हजार रूपए के जुर्माने के उदग्रहण को आगे शामिल करने के लिए संशोधित किया गया है।
62.17.3 आगे, आयकर अधिनियम की धारा 272क की उप-धारा (3) को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि उक्त संदर्भित विफलता की स्थिति में जुर्माना ऐसे नोटिस या निर्देश को जारी करने वाले आयकर प्राधिकारी द्वारा लगाया जाएगा।
62.17.4 आयकर अधिनियम की धारा 288 हेतु परिणामी संशोधनों को धारा 288 की उप-धारा (4) के वाक्यांश (ख) हेतु आयकर अधिनियम की धारा 272क की उप-धारा (1) में नर्इ शामिल किए गए वाक्यांश (घ) का संदर्भ करने के लिए किया गया है।
62.17.5 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
63. आयकर अधिनियम की धारा 281ख के अंतर्गत बैंक गारंटी के लिए प्रावधान
63.1 आयकर अधिनियम की धारा 281ख के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत, निर्धारण अधिकारी उसमें निर्दिष्ट आयकर प्राधिकारियों के पूर्व अनुमोदन से छह महीने की अवधि के लिए मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन प्रक्रिया की लंबिता के दौरान निर्धारिती की किसी संपत्ति को अंनतिम रूप से संलग्न कर सकते हैं यदि वह मानता हो कि राजस्व के हितों की सुरक्षा करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। संपत्ति की ऐसी संलग्नता मूल्यांकन आदेश के बाद साठ दिना या दो वर्षों की अधिकतम अवधि, जो भी पहले हो, के लिए विस्तारनीय है।
63.2 आयकर सरलीकरण समिति (र्इश्वर समिति) ने सिफारिश की थी कि संपत्ति से अनंतिम रूप से संलग्नता कुछ शर्तों के पूरा करने के अनुसार बैंक गारंटी द्वारा प्रतिस्थापित की जा सकती है। इस सिफारिश पर विचार करते हुए, आयकर अधिनियम की धारा 281ख को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि निर्धारण अधिकारी उक्तकथित धारा की उप-धारा (1) के अंतर्गत की गर्इ संपत्ति के अनंतिम संलग्नता को वापस लेगा यदि जहां निर्धारिती अनुसूचित बैंक द्वारा बैंक गारंटी प्रस्तुत करता है, ऐसी राशि के लिए जो अनंतिम रूप से संलग्न संपत्ति की उचित बाजार कीमत से कम न हो या ऐसी राशि के लिए जो राजस्व के हितों की सुरक्षा के लिए उपयुक्त हो
63.3 यह भी निर्धारित करने के लिए मुहैया किया जाता है कि संपत्ति की उचित बाजार कीमत, निर्धारण अधिकारी मूल्यांकन अधिकारी का संदर्भ ले सकता है जिसे ऐसे संदर्भ के प्राप्त होने की तिथि से तीस दिनों की अवधि के अंदर निर्धारण अधिकारी को संपत्ति के अनुमानित रिपोर्ट को जमा करना आवश्यक होगा।
63.4 समय सीमा में बैंक गारंटी के स्थान पर संपत्ति का संलग्नता के खंडन को सुनिश्चित करने के लिए, यह मुहैया किया गया है कि संलग्नता को खंडित करने का आदेश ऐसी गारंटी की प्रात्ति के पंद्रह दिनों के अंदर निर्धारण अधिकारी द्वारा किया जाएगा और यदि जहां संदर्भ ऐसी गारंटी के पंतालीस दिनों के अंदर मूल्यांकन अधिकारी को किया जाता है।
63.5 आगे यह मुहैया कराया जाता है कि जहां कारण बताओ नोटिस देययोग्य राशि को निर्दिष्ट करते हुए निर्धारिती को तामील किया जाता है और निर्धारिती नोटिस में निर्दिष्ट समय के अंदर ऐसी राशि का भुगतान करने में विफल रहता है तो निर्धारण अधिकारी कथित राशि को वसूलने के लिए बैंक गारंटी, पूर्णता या आंशिक रूप से, रद्द कर सकता है।
63.6 यदि जहां निर्धारिती बैंक गारंटी को नवीकृत करने में विफल रहता है या ऐसी गांरटी की समाप्ति से पहले पंद्रह दिनों के समान राशि के लिए अनुसूचित बैंक से नर्इ गारंटी को प्रस्तुत करने में विफल रहता है तो निर्धारण अधिकारी राजस्व के हित में बैंक गारंटी को रद्द कर सकते हैं। बैंक गारंटी को रद्द कर वसूल राशि मौजूदा मांग जो देययोग्य है, के समक्ष समायोजित की जाएगी और शेष राशि, यदि हो, भारतीय रिजर्व बैंक या भारतीय स्टेट बैंक या इसकी सहायक शाखा या अन्य कोर्इ बैंक जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45 की उप-धारा (1) के प्रावधानों के अंतर्गत अपने एजेंट के तौर नियुक्त बैंक, जहां प्रधान आयुक्त या आयुक्त का कार्यालय स्थित है, की शाखा में प्रधान आयुक्त या आयुक्त के निजी जमा खाते में जमा की जा सकती है
63.7 यदि जहां निर्धारण अधिकारी संतुष्ट हो कि बैंक गारंटी राजस्व के हितों की सुरक्षा के लिए अब आवश्यक नहीं है तो, वह गारंटी को तत्काल जारी कर सकता है।
63.8 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी है।
64. कुछ मामलों में स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण अधिकारी हेतु समय सीमा का विस्तार
64.1 आयकर अधिनियम की धारा 92गक की उप-धारा (3क) के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, स्थानांतरण मूल्यनिर्धारण अधिकारी (टीपीओ) को उस तिथि से साठ दिन पहले अपने आदेश को पारित करना होगा जिस पर निर्धारण करने की सीमा समाप्त होती है। यह भी ध्यान दिया जाता है कि विदेशी क्षेत्राधिकार से सूचना की मांग टीपीओ द्वारा सहमति कीमत के निर्धारण के लिए आवश्यक बन जाती है और कभी कभी टीपीओ के समक्ष कार्यवाही न्यायालय आदेश द्वारा भी लंबित हो सकती है।
64.2 इसलिए, आयकर अधिनियम की धारा 92गक की उप-धारा (3क) के प्रावधानों को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि जहां निर्धारण मूल्यांकन किसी न्यायालय द्वारा लंबित होती है या जहां सूचना के आदान-प्रदान के लिए संदर्भ सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया गया हो तो समय जिसके लिए मूल्यांकन प्रक्रियाएं स्थगित की गर्इ थी या सूचना की प्राप्ति के लिया गया समय, जो भी मामला हो, को छोड़ने के बाद एक आदेश देने के लिए स्थानांतरण मूल्यांकन अधिकारी के पास उपलब्ध समय साठ दिनों से कम होता है तो ऐसी शेष अवधि साठ दिनों तक ही विस्तारित होगी।
64.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी है।
65. निर्धारण अधिकारी के क्षेत्राधिकार का ग्रहण
65.1 आयकर अधिनियम की धारा 124 की मौजूदा उप-धारा (3) अन्य विषयों के साथ-साथ मुहैया कराती है कि कोर्इ व्यक्ति निर्धारण अधिकारी के क्षेत्राधिकार के प्रश्न को उठाने का हकदार नहीं होगा यदि जहां विवरणी को तिथि जिस पर उसे आयकर अधिनियम की धारा 142 या आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (2) या मूल्यांकन के पूरा होने के बाद, जो भी पहले हो, से एक महीने के अंत के बाद आयकर अधिनियम की धारा 139 के अंतर्गत दाखिल किया जाता है। वर्तमान में, यह प्रावधान आयकर अधिनियम की धारा 153क या आयकर अधिनियम की धारा 153ग के अंतर्गत जारी नोटिस को विशेषरूप से संदर्भित नहीं करता जो मूल्यांकन से संबंधित है यदि जहां एक खोज और जब्ती कार्यवाही की गर्इ हो को मामले ऐसे मुद्दों से संबंधित हो
65.2 ऐसे उदाहरण सामने आए हैं कि जिसमें ऐसे मामलों में निर्धारण अधिकारी का क्षेत्राधिकार अपीलीय स्तर पर अपीलीय स्तर पर प्रश्नों को उठाया गया हो, इस तथ्य के बावजूद कि आयकर अधिनियम की धारा 153क या 153ग के अंतर्गत पारित आदेश आयकर अधिनियम की धारा 143(3) के साथ पढ़ा जाता है। ऐसे मामलों में किसी अस्पष्टता को हटाने के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 124 की उप-धारा (3) के प्रावधान को विशेषरूप से यह मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि उन मामलों में जहां खोज आयकर अधिनियम की धारा 132 के अंतर्गत की जाती है या बही खाते, अन्य दस्तावेज या अन्य परिसंपत्ति आयकर अधिनियम की धारा 132क के अंतर्गत आवश्यक होती है तो कोर्इ व्यक्ति उस तिथि से एक महीने के अंत के बाद एक निर्धारण अधिकारी के क्षेत्राधिकार प्रश्न उठाने का हकदार होगा जिस तिथि पर उसे आयकर अधिनियम की धारा 153क की उप-धारा (1) या आयकर अधिनियम की धारा 153ग की उप-धारा (2) के अंतर्गत या मूल्याकन के पूरा होने के बाद, जो भी पहले हो, नोटिस जारी किया गया हो ।
65.3 प्रयोज्यता : यह संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी है।
66. सूचना के इलैक्ट्रानिक प्रसंस्करण के कार्यक्षेत्र को सक्षम करने और विस्तृत करने के लिए वैधानिक ढ़ांचा
66.1 आयकर अधिनियम की धारा 133ग के मौजूदा प्रावधान उसके अधिकार में सूचना के सत्यापन के लिए सूचना और दस्तावेजों को मांगने के लिए नोटिस जारी करने हेतु निर्धारित आयकर प्राधिकारी को सशक्त कर सकते हैं।
66.2 प्राप्त हुर्इ सूचना और दस्तावेजों के तुरंत सत्यापन और विश्लेषण के लिए, आयकर अधिनियम की धारा 133ग के प्रावधानों को मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि जिससे ऐसे प्राप्त सूचना और दस्तावेजों के प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त विधायी समर्थन मुहैया किया जा सके और आवश्यक कार्यवाही, यदि हो, के लिए निर्धारण अधिकारी हेतु उसका उपलब्ध नतीजा दिया जा सके।
66.3 आयकर अधिनियम की धारा 147 का स्पष्टीकरण 2 को ऐसी प्राप्त सूचना के आधार पर निर्धारण अधिकारी द्वारा मामलों को दुबारा खोलने के लिए संशोधित किया गया है।
66.4 आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (1) के वाक्यांश (क) मुहैया कराता है कि एक दाखिल विवरणी को प्रसंस्कृत किया जाना है और कुल आय या हानि एक गलत दावे के कारण या विवरणी में किसी अंकगणितीय संबंधी गलती के कारण समायोजन करने के बाद आंकी जानी है यदि ऐसा गलत दावा विवरणी में किसी सूचना द्वारा उत्पन्न होता है।
66.5 विभाग के पास उपलब्ध सूचना और विवरणी के बीच अंतर को तुरंत हटाने के लिए, समायोजन जिसे आयकर अधिनियम की धारा 143 की उप-धारा (1) के अंतर्गत विवरणी के प्रसंस्करण के समय किया गया, का कार्यक्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। यह भी मुहैया किया गया है कि ऐसा समायोजन निर्धारिती द्वारा दाखिल अंकेक्षण रिपोर्ट, निर्धारिती के पहले के वर्षों की विवरणी, 26कध विवरण, प्रपत्र 16 और प्रपत्र 16क के रूप में विभाग के पास उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित हो सकता है। हालांकि, ऐसे समायोजन करने से पहले, सामान्य न्याय के हित में, सूचना निर्धारिती को या तो लिखित में या इलैक्ट्रानिक विधि में दी जाएगी जिसमें उससे ऐसे समायोजन के लिए उत्तर देना आवश्यक होगा। प्राप्त उत्तर, यदि हो, किसी समायोजन को करने से पहले विधिवत रूप से विचार होगा। हालांकि, यदि कोर्इ उत्तर ऐसी सूचना के निगर्मन के तीस दिनों के अंदर प्राप्त नहीं होता है तो प्रसंस्करण समायोजन को शामिल करते हुए निष्पादित किया जाएगा।
66.6 प्रयोज्यता : धारा 133 और 147 के संशोधन 1 जून, 2016 से प्रभावी होंगे। धारा 143 हेतु संशोधन 1 अप्रैल 2017 से प्रभावी है और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी निर्धारण वर्षों के संबंध में लागू होंंगे।
67. आयकर अधिनियम की नर्इ धारा 270कक को शामिल करके कुछ मामलों में जुर्माने और अभियोजन से प्रतिरक्षा
67.1 कुछ मामलों में जुर्माने और अभियोजन से प्रतिरक्षा मुहैया कराने के लिए, आयकर अधिनियम में एक नर्इ धारा 270कक को शामिल किया गया है जिसके अंतर्गत एक निर्धारिती आयकर अधिनियम की धारा 270क के अंतर्गत जुर्माने के अधिरोपण से प्रतिरक्षा की स्वीकृति के लिए निर्धारण अधिकारी को आवेदन कर सकता है और आयकर अधिनियम की धारा 276ग या धारा 276गग के अंतर्गत कार्यवाही की सूचना दे सकता हैं बशर्ते कि वह ऐसे मांग पत्र में निर्दिष्ट अवधि के अंदर मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन के आदेश के अनुसार कर और ब्याज दे और ऐसे निर्धारण आदेश को वरीयता न दें। निर्धारिती महीने जिसमें मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन प्राप्त हुआ हो, के अंत से एक महीने के अंदर ऐसे तरीके या प्रारूप में ऐसा आवेदन कर सकता है जिसे मूल्यांकित किया जा सके।
67.2 यह भी मुहैया कराया जाता है कि निर्धारण अधिकारी, आयकर अधिनियम की धारा 249 की उप-धारा (2) में निर्दिष्टानुसार अपील को दाखिल करने की अवधि के समाप्त होने के बाद, आयकर अधिनियम की धारा 276ग या धारा 276गग के अंतर्गत जुर्माना और प्रक्रिया की सूचना से प्रतिरक्षा दे सकते है, यदि आयकर अधिनियम की धारा 270क के अंतर्गत जुर्माना कार्यवाही निम्नलिखित कारण से प्रारंभ न की गर्इ हो, अर्थात्
(क) तथ्यों की गलत बयानी या दबाव;
(ख) बही खातों में निवेश को रिकॉर्ड करने में असफलता;
(ग) किसी प्रमाण द्वारा प्रतिस्थापित न होने वाले व्यय का दावा;
(घ) बही खातों में किसी गलत प्रविष्टि की रिकॉर्डिंग;
(ड़) कुल आय को प्रभावित करने वाले बही खातों में किसी प्राप्ति को रिकॉर्ड करने में विफलता; अथवा
(च) किसी अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन में रिपोर्ट करने में विफलता या एक अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन समझे जाने वाला कोर्इ लेनदेन या कोर्इ निर्दिष्ट घरेलू लेनदेन जिसके लिए आयकर अधिनियम के अध्याय X के प्रावधान लागू होते हों।
67.3 निर्धारण अधिकारी महीने जिसमें ऐसा आवेदन प्राप्त होता है, के अंत से एक महीने की अवधि के अंदर ऐसे आवेदन को स्वीकृत या अस्वीकृत करने का आदेश पारित करेगा। हालांकि, सामान्य न्याय के हित में, आवेदन को अस्वीकृत करने वाला कोर्इ आदेश निर्धारण अधिकारी द्वारा पारित नहीं होगा जबतक निर्धारिती को सुनवार्इ का अवसर न दिया जाए। कथित धारा के अंतर्गत निर्धारण अधिकारी का आदेश अंतिम होगा।
67.4 आगे, आयकर अधिनियम की धारा 346क के अंतर्गत कोर्इ अपील या आयकर अधिनियम की धारा 264 के अंतर्गत संशोधन उप-धारा (1) के वाक्यांश (क) हेतु संदर्भित मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन के आदेश के समक्ष स्वीकार्य होगा, यदि जहां एक आदेश आयकर अधिनियम की धारा 270कक के अंतर्गत आवेदन को स्वीकृत करने के लिए किया गया हो।
67.5 आयकर अधिनियम की धारा 249 की उप-धारा (2) के वाक्यांश (ख) मुहैया कराती है कि आयुक्त (अपील) के समक्ष अपील एक मूल्यांकन आदेश से संबंधित मांग पत्र की प्राप्ति के तीस दिनों के अंदर किया जा सकता है।
67.6 आयकर अधिनियम की धारा 270कक को शामिल करने के आधार पर, आयकर अधिनियम की धारा 249 के प्रावधान को भी मुहैया कराने के लिए संशोधित किया गया है कि यदि जहां निर्धारिती जुर्माने और अभियोजन से प्रतिरक्षा की मांग करते हुए आयकर अधिनियम की धारा 270कक के अंतर्गत आवेदन करता है तो तिथि जिस पर ऐसा आवेदन तिथि जिस पर आवेदन को अस्वीकृत करने का आदेश निर्धारिती को दिया जाता है, से किया जाता है, से प्रारंभ करते हुए अवधि उक्तकथित तीस दिनों की अवधि की गणना से बाहर होगी। कथित संशोधन आयकर अधिनियम की धारा 270कक को शामिल करने के लिए परिणामी है।
67.7 प्रयोज्यता : ये संशोधन 1 अप्रैल, 2017 से लागू होगा और तद्नुसार, निर्धारण वर्ष 2017-18 और उत्तरगामी मूल्यांकन वर्षों के संबंध में लागू होगा।
68. प्रत्यक्ष कर विवाद समाधान योजना, 2016
68.1 मुकद्मेबाजी प्रत्यक्ष करों में प्रमुख चिंता का विषय हो गया है। बड़ी संख्या में अटके हुए मामलों को कम करने और सरकार को इसके देयता को जल्द से जल्द जारी करने के लिए 'प्रत्यक्ष कर विवाद समाधान योजना, 2016' को कर बकाए और निर्दिष्ट कर के संबंध में लाया गया है। योजना के प्रमुख पहलू निम्नानुसार हैं:
(1) योजना "कर बकाए" के लिए लागू है जो आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम, 1957 ('संपत्ति कर अधिनियम') के अंतर्गत निर्धारित कर, ब्याज या जुर्माने की राशि के तौर पर परिभाषित है, जिसके संबंध में अपील 29 फरवरी, 2016 के अनुसार आयकर आयुक्त (अपील) या संपत्ति कर आयुक्त (अपील) के समक्ष लंबित है।
(2) लंबित अपील मूल्यांकन आदेश या जुर्माना आदेश के समक्ष की जा सकती है।
(3) योजना के अंतर्गत घोषणा मूल्यांकन की तिथि तक प्रयोज्य दर साथ ही ब्याज पर कर का भुगतान करना आवश्यक है। हालांकि दस लाख रूपए से अधिक के विवादित कर की स्थिति में, लागू होने वाली न्यूनतम जुर्माने का पच्चीस प्रतिशत को भी दिया जाना आवश्यक है।
(4) यदि लंबित अपील एक जुर्माना आदेश के समक्ष हो तो न्यूनतम जुर्माने का पच्चीस प्रतिशत मूल्यांकन या पुर्नमूल्यांकन के कारण देययोग्य कर और ब्याज के साथ देययोग्य है।
(5) ऐसी घोषणा के परिणामस्वरूप, विवादित आय के संबंध में अपील और आयुक्त (अपील) के समक्ष लंबित विवादित संपत्ति निरस्त होने के तौर पर समझी जाएगी।
68.2 उक्त के अतिरिक्त, योजना मुहैया कराती है कि व्यक्ति ऐसे संशोधन और एक विवाद, जिसके संबध में यह 29.02.2016 (निर्दिष्ट कर के तौर पर संदर्भित) के अनुसार लंबित है, के अधिनियमन की तिथि से पहले की अवधि के लिए आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम, जो भी मामला हो, में पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ किए गए संशोधन द्वारा मान्यकृत है या उसके परिणामस्वरूप निर्धारित किसी कर के संबंध में घोषणा भी कर सकता है। योजना के लाभ का फायदा लेने के लिए, ऐसे घोषणाकर्ता को घोषणा करने से पहले आयुक्त (अपील) या न्यायाधिकरण या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के समक्ष ऐसे निर्दिष्ट कर के विरूद्ध दाखिल किसी रिट याचिका या किसी अपील को निरस्त करना चाहिए और ऐसी निरस्ती के प्रमाण को भी प्रस्तुत करना चाहिए। आगे, मध्यस्ता, सुलह या बीच बचाव के लिए घोषणाकर्ता द्वारा कोर्इ कार्यवाही की जाती है या उसे भारत द्वारा किए गए समझौते या किसी कानून के अंतर्गत कोर्इ नोटिस दिया जाता है, चाहे निवेश की सुरक्षा के लिए हो या अन्यथा, तो वह इस योजना के अंतर्गत लाभ का दावा करने के लिए ऐसे नोटिस या दावे को निरस्त करेगा।
68.3 निर्दिष्ट कर के संबंध में घोषणा करने वाला व्यक्ति निर्धारित प्रारूप और निर्दिष्ट तरीके में निर्दिष्ट कर के संबंध में किसी उपचार या दावे की मांग या लक्ष्य के लिए घोषणा करेगा, अधिकार छोड़ते हुए, चाहे प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, एक समझौते के अंतर्गत या कानून द्वारा किसी कानून, इक्विटी में, के अतंर्गत उसके लिए अन्यथा भी उपलब्ध है जिसे भारत के बाहर के देश या क्षेत्र के साथ भारत द्वारा किया गया हो। कोर्इ अपीलीय प्राधिकारी या मध्यस्त या समझौताकार या बीच बचाव करने वाला घोषणा, जिसके संबंध में एक आदेश नामित प्राधिकारी द्वारा दिया जाता है या दिए जाने वाली निर्धारित राशि के भुगतान के संबंध में, में निर्दिष्ट कर से संबंधित मुद्दे को जारी करने के निर्णय हेतु कार्यवाही करेगा।
68.4 जहां घोषणाकर्ता योजना में संदर्भित कोई भी शर्तों का उल्लघन करता है या घोषणा में प्रस्तुत होने वाला कोर्इ विषय वस्तु विवरण किसी भी स्तर पर गलत पाया जाता है तो इसे समझा जाएगा कि इस योजना के अंतर्गत कभी घोषणा की ही नहीं गर्इ और आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम, जिसके अंतर्गत घोषणाकर्ता के विरूद्ध कार्यवाही लंबित थी या लंबित है, के अंतर्गत सारे परिणामों को प्राप्त कर लिया गया है के तौर पर समझा जाएगा।
68.5 योजना के अंतर्गत घोषणाकर्ता आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के लिए किसी संस्था से अभियोजनी के होने से प्रतिरक्षा प्राप्त करेगा। निर्दिष्ट कर की स्थिति में घोषणाकर्ता आयकर या संपत्ति कर अधिनियम के अंतर्गत जुर्माने के अधिरोपण से प्रतिरक्षा भी प्राप्त करेगा। हालांकि, यदि जुर्माने से प्रतिरक्षा कर बकाया वह राशि है जो योजना के अनुसार देययोग्य जुर्माने से अधिक है। योजना निर्दिष्ट कर के संबंध में आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम के अंतर्गत ब्याज की छूट भी मुहैया कराती है। हालांकि, कर बकाए में ब्याज की छूट उस सीमा तक है जहां ब्याज योजना में संदर्भित ब्याज की राशि से अधिक है।
68.6 निम्नलिखित मामलों में एक व्यक्ति योजना के लिए योग्य नहीं होगा :
(i) मामले जहां किए गए संस्थागत अभियोजन की प्रक्रिया को 29.02.2016 को या उससे पहले किया गया था, निर्धारिती ने इसकी सूचना दी थी और अभियोजन प्रक्रियाएं घोषणा को दाखिल करने की तिथि से पहले संस्थापित की गर्इ थी
(ii) खोज या सर्वेक्षण जहां घोषणा कर बकाया के संबंध में हो
(iii) अघोषित विदेशी आय और परिसंपत्ति से संबंधित मामले
(iv) आयकर अधिनियम की धारा 90 या 90क के अंतर्गत दोहरे कराधान परिहार समझौते के अंतर्गत प्राप्त सूचना पर आधारित मामले जहां घोषणा कर बकाए के संबंध में हो
(v) विशेष न्यायालय अधिनियम, 1992 के अंतर्गत अधिसूचित व्यक्ति
(vi) मादक दवा व मनोवैज्ञानिक पदार्थ अधिनियम, भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम या विदेशी विनिमय संरक्षण और तस्करी गतिविधि अधिनियम रोकथाम अधिनियम,1974 के अंतर्गत आने वाले मामले
68.7 योजना के अंतर्गत एक घोषणा ऐसे निर्धारित प्रारूप और ऐसे तरीके जो निर्धारित है, में आयुक्त तक के पद के नामित प्राधिकारी को किया जाना है। नामित प्राधिकारी, घोषणा की प्राप्ति की तिथि से साठ दिनों के अंदर, घोषणाकर्ता द्वारा देययोग्य राशि को निर्धारित करेगा। घोषणाकर्ता ऐसे आदेश को पारित करने के तीस दिनों के अंदर ऐसी राशि का भुगतान करेगा और ऐसी राशि के भुगतान के प्रमाण को प्रस्तुत करेगा। एक घोषणा के अनुसार दी गर्इ राशि किसी परिस्थति के अंतर्गत प्रतिदाय है।
68.8 नामित प्राधिकारी के आदेश द्वारा कवर कोर्इ भी मामला आयकर अधिनियम या संपत्ति कर अधिनियम के अंतर्गत अन्य कार्यवाही में पुन नहीं खोला जाएगा। नामित प्राधिकारी योजना में मुहैया करार्इ गर्इ शर्तों के अनुसार घोषणा में आने वाले मामलों के संबंध में दो अधिनियमों के अंतर्गत किसी अपराध के लिए अभियोजन हेतु किसी कार्यवाही को करने से प्रतिरक्षा प्रदान करेगा।
68.9 इस योजना में शामिल कुछ भी उसको छोड़कर जिसके संबंध में घोषणा की गर्इ है, किसी प्रक्रिया पर किसी लाभ, रियायत या प्रतिरक्षा को प्रदत्त करते हुए नहीं समझा जाएगा।
68.10 प्रयोज्यता : योजना 1 जून, 2016 से प्रभावी है
(नीरज कुमार)
अवर सचिव, भारत सरकार
दिनांक 20.01.2017
(एफ.नं. 370142/20/2016-टीपीएल)
निम्न को प्रति :
1- एफएम हेतु पीएस/एफएम हेतु ओएसडी/एमओएस (आर) हेतु ओएसडी
2- सचिव (राजस्व) हेतु पीएस/एफएम हेतु सलाहकार का ओएसडी
3- अध्यक्ष, सदस्य और अवर सचिव तथा उससे ऊपर के पद के सीबीडीटी में अन्य समस्त अधिकारी
4- समस्त मुख्य आयुक्त आयकर महानिदेशक - अपने क्षेत्रों/प्रभारों में समस्त अधिकारियों के बीच वितरित करने के अनुरोध के साथ
5- आयकर महानिदेशक (अंतर्राष्ट्रीय कराधान)/ आयकर महानिदेशक (पद्धति)/ आयकर महानिदेशक (सर्तकता)/ आयकर महानिदेशक (प्रशा.)/ आयकर महानिदेशक (राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी)/ आयकर महानिदेशक (एलएंडआर)
6- सीबीडीटी के मीडिया समन्वयक और आधिकारिक प्रवक्ता
7- आयकर निदेशक (आर्इटी)/आयकर निदेशक (आरएसएंडपीआर)/आयकर निदेशक (अंकेक्षण)/आयकर निदेशक (सर्तकता)/आयकर निदेशक (पद्धति)/आयकर निदेशक (पद्धति)/आयकर निदेशक (ओएंडएमएस)/आयकर निदेशक (विशेष अन्वे.)
8- भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (30 प्रतियां)
9- संयुक्त सचिव और कानूनी सलाहकार, विधि और न्याय मंत्रालय, नर्इ दिल्ली
10- भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान, आर्इपी एस्टेट, नर्इ दिल्ली
11- सामान्य मेलिंग सूची के अनुसार समस्त चैंबर्स ऑफ कॉमर्स
(नीरज कुमार)
अवर सचिव, भारत सरकार

