आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

मुख्य सामग्री पर जाने के लिए यहां क्लिक करें
सुलभता विकल्प
शब्द आकार
सैचुरेशन
मदद

परिपत्र सं.

परिपत्र सं. 21/2016

परिपत्र की तिथि

27/05/2016

दस्तावेज़ अपलोड की तिथि

27/05/2016

 परिपत्र सं. 21/2016

परिपत्र सं. 21/2016

 

एफ. नं. 197/17/2016-आर्इटीए-I

भारत सरकार

वित्त मंत्रालय

राजस्व विभाग

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

 

नर्इ दिल्ली, 27 मर्इ, 2016

 

विषय : कुछ परिस्थितियों में आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकरण के निरस्तीकरण से संबंधित स्पष्टीकरण - संबंधी

 

आयकर अधिनियम, 1961 ('अधिनियम') की धारा 11 तथा 12 धर्मांर्थ न्यासों अथवा संस्थानों की आय से मुक्त है यदि ऐसी आय धर्मांर्थ उद्देश्य के लिए प्रयोग होती है तथा ऐसा संस्थान अधिनियम की धारा 12कक के अंतर्गत पंजीकृत है।

2. अधिनियम की धारा 2(15) "धर्मांर्थ उद्देश्य" की परिभाषा को मुहैया कराता है। इसमें "जन सामान्य यूटिलिटी के किसी अन्य उद्देश्य की वृद्धि" शामिल हैं बशर्ते वित्तीय विचार के लिए व्यापार, वाणिज्य अथवा कारोबार के रूप में किसी गतिविधि को करना शामिल नहीं है। कथित धारा का द्वितीय परंतुक, वित्त अधिनियम 2010 के द्वारा प्रभावी तिथि 01.04.2009 को आरंभ, मुहैया कराता हैं कि उन मामलों में जहां किसी न्यास अथवा संस्थान की गतिविधि जन सामान्य यूटिलिटी के किसी अन्य उद्देश्य की वृद्धि के रूप में है तथा इसमें व्यापार, वाणिज्य अथवा कारोबार के रूप में कोर्इ गतिविधि शामिल हो, लेकिन ऐसे वाणिज्य गतिविधियों की प्राप्ति की कुल राशि पिछले वर्ष में रू. 25,00,000/- से अधिक नहीं है तो ऐसे न्यास/संस्थान की विचारनीय प्राप्ति ऐसी गतिविधि से विचारनीय प्राप्ति के बावजूद "धर्मांर्थ" के तौर पर समझी जाएगी। हालांकि, इन प्राप्तियों की कुल राशि निर्दिष्ट कमी से अधिक होती हैं तो गतिविधि धर्मांर्थ के तौर पर नहीं मानी जाएगी तथा न्यास/संस्थान की आय उस वर्ष में कर छूट के लिए पात्र नहीं होगी। इसलिए, एक उद्यम, जन सामान्य यूटिलिटी के उद्देश्य की वृद्धि के उद्देश्य से एक वर्ष में धर्मांर्थ संस्थान के तौर पर समझा जा सकता है तथा वाणिज्यिक गतिविधियों से प्राप्ति की कुल राशि पर निर्भर करते हुए अन्य वर्ष में धर्मांर्थ संस्थान के तौर पर नहीं। स्थिति वैसी ही रहेगी जब धारा 2(15) के प्रथम तथा द्वितीय परंतुक वित्त अधिनियम, 2015 के मार्फत प्रभावी तिथि 01-04-2016 को प्रारंभ नए परंतुक द्वारा प्रतिस्थापित होता है, रू. 25,00,000/- की निश्चित सीमा के स्थान पर कुल प्राप्तियों के 20 प्रतिशत के तौर पर कमी की स्थिति को परिवर्तित करते हुए, जैसे यह पहले मौजूद थी।

3. एक वर्ष में निर्दिष्ट कमी के परे प्राप्तियों की अस्थार्इ शेष न्यास अथवा संस्थान को पहले से स्वीकृत पंजीकरण के निरस्तीकरण की आवश्यकता के साथ न्यास अथवा संस्थान की गतिविधि के वास्तविक रूप में परिवर्तन के परिणाम होने में आवश्यक नहीं हो सकता। इसलिए, अधिनियम की धारा 13 को यह मुहैया कराने के लिए यहां नर्इ उप-धारा (8) को अंतनिर्विष्ट करके वित्त अधिनियम, 2012 के मार्फत संशोधित किया गया है कि ऐसा संगठन उस विशेष वर्ष में कर छूट के लाभ प्राप्त नहीं करेगा जिसमें वाणिज्यिक गतिविधियों से इसकी प्राप्ति प्रारंभिक सीमा से अधिक होती हैं चाहे पंजीकरण स्वीकृति निरस्त हुर्इ हो अथवा नहीं। यह संशोधन 1 अप्रैल, 2009 से पूर्वव्यापी रूप में प्रभावी हो गया हैं तथा तद्नुसार निर्धारण वर्ष 2009-10 के संबंध में लागू होंगे।

4. उक्तकथित स्थिति को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि केवल इस आधार पर धर्मांर्थ संस्थान को धारा 12कक के अंतर्गत पहले से स्वीकृत पंजीकरण का निरस्तीकरण हेतु अनिवार्य नहीं होगा कि अधिनियम की धारा 2(15) हेतु परंतुक में निर्दिष्ट कमी संस्थान की गतिविधि के प्रकार में वहां किसी परिवर्तन के तौर पर विशेष वर्ष में विस्तारित होता है। यदि किसी निर्दिष्ट वर्ष में, निर्दिष्ट कमी अधिक होती है तो कर की छूट उस वर्ष में संस्थान हेतु अस्वीकृत होगा जबतक ऐसा निरस्तीकरण अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित आधार पर आवश्यक होता है।

5. वित्त अधिनियम, 2016 के मार्फत अधिनियम में अध्याय XII-ड़ख के प्रारंभ के साथ, कुछ न्यासों तथा संस्थानों की अभिवृद्धि आय पर कर से संबंधित विशेष प्रावधानों को निर्धारित करते हुए 12कक के अंतर्गत स्वीकृत पंजीकरण का निरस्तीकरण धारा 115नघ की उप-धारा (3) द्वारा आघात हो रहे धर्मांर्थ संस्थानों का परिणाम हो सकता है तथा अभिवृद्धि आय पर कर हेतु उत्तरदायी बन जाएगा। न्यायसंगत कारणों के बिना पंजीकरण का निरस्तीकरण, इसलिए, अभिवृद्धि आय पर कर-देयता को लगाने के कारण एक निर्धारिती संस्थान हेतु अतिरिक्त परिश्रम का कारण हो सकता है। क्षेत्रीय प्राधिकारी को, इसलिए, केवल इसलिए धारा 12कक के अंतर्गत स्वीकृत धर्मांर्थ संस्थानों के पंजीकरण को निरस्त करने की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि धारा 2(15) के परंतुक क्रियाशील है। पंजीकरण के निरस्तीकरण के लिए प्रक्रिया इन प्रावधानों की प्रयोज्यता की सावधानीपूर्वक जांच के पश्चात् धारा 12कक(3) तथा 12कक(4) के अनुसार संख्ती से प्रारंभ होना है।

6. उक्त को समस्त संबंधितों के ध्यान में लाया जा सकता है।

 

हस्ता/-

दीपशिखा शर्मा

निदेशक, भारत सरकार

 

  1. अध्यक्ष तथा सदस्य, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

  2. समस्त संयुक्त सचिव/आयकर आयुक्त, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

  3. ओएसडी से राजस्व सचिव

  4. समस्त अधिकारियों के ध्यान में लाने के अनुरोध के साथ समस्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त एवं समस्त आयकर महानिदेशक

  5. प्रधान आयकर महानिदेशक (प्रशिक्षण), राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी, नागपुर

  6. प्रधान आयकर महानिदेशक (पद्धति), एआरए केंद्र, झंडेवालान एक्सटेंशन, नर्इ दिल्ली

  7. प्रधान आयकर महानिदेशक (सर्तकता), नर्इ दिल्ली

  8.एडीजी (पीआर,पीपी एंड ओएल), मयूर भवन, नर्इ दिल्ली, सामान्य मेंलिग सूची के अनुसार वितरण के लिए तथा त्रैमासिक कर बुलिटेन में मुद्रण के लिए

  9. भारतीय नियत्रंक एवं महालेखा परीक्षक

10. आयकर विभाग की वेबसाइट पर अपलोडिंग के लिए अपर महानिदेशक-4 (पद्धति)

11. www.irsofficersonline.gov.in पर अपलोडिंग के लिए डाटाबेस प्रकोष्ठ

12. गार्ड फाइल

 

दीपशिखा शर्मा

निदेशक, भारत सरकार