परिपत्र सं. 12/2019 : 'फर्मों का मूल्यांकन' मूल्यांकन करने के दौरान निर्धारण अधिकारियों द्वारा विचाराधीन रखे गए महत्वपूर्ण कुछ मुद्दे— संबंधित
परिपत्र सं.
परिपत्र सं. 12/2019
परिपत्र की तिथि
19/06/2019
दस्तावेज़ अपलोड की तिथि
19/06/2019
परिपत्र सं. 12/2019
भारत सरकार
वित्त मंत्रालय
राजस्व विभाग
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड
नार्थ ब्लॉक, नर्इ दिल्ली दिनांक 19 जून, 2019
विषय : 'फर्मों का मूल्यांकन' मूल्यांकन करने के दौरान निर्धारण अधिकारियों द्वारा विचाराधीन रखे गए महत्वपूर्ण कुछ मुद्दे— संबंधित
भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने आयकर अधिनियम, 1961 ('अधिनियम') के अंतर्गत और 2017 की इसकी रिपोर्ट सं. 7 में 'फर्मों के मूल्यांकन' से संबंधित लेखांकन प्रदर्शन किया व कुछ सुझाव दिए ताकि भविष्य में इन मामलों में मूल्यांकन निर्धारण अधिकारियों (एओ) द्वारा और अधिक प्रभावी तरीके से संभाला जा सके। अपनी रिपोर्ट में सीएंडजी द्वारा दी गर्इ विभिन्न सिफारिशों पर बोर्ड द्वारा विधिवत रूप से विचार किया गया है। इन मामलों में बनाए जा रहे मूल्यांकन की गुणवत्ता को बढ़ानें और समितियों की गलतियों के कार्यक्षेत्र को कम करने के लिए बोर्ड की इच्छा है कि निर्धारण अधिकारियों को फर्मों के मामले में निर्धारण करने के दौरान निम्नलिखित मुद्दों पर विचार करना चाहिए।
(i) फर्म के हाथों व्यय जैसेकि सांझेदारों को दी गर्इ पूंजी, कार्यरत सांझेदारों आदि को देययोग्य पारिश्रमिक संबंधित सांझेदारों के हाथों करयोग्य है। इसलिए, फर्म के मामले में निर्धारण करने के दौरान, फर्म के सांझेदार की आयकर विवरणी के साथ ऐसी राशि की क्रास वैरिफिकेशन वांछनीय होगी और एक फर्म और इसके सांझेदारों की कर विवरणी के बीच किसी विसंगति को अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार संभाला जाना चाहिए। आगे, निर्धारण अधिकारी को निर्धारण प्रक्रिया की अवधि के दौरान सांझेदारी दस्तावेज की प्रति के लिए स्थिरता से मांग की जानी चाहिए और सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए ताकि किसी गैर-कार्यकारी सहभागी को पारिश्रमिक के भुगतान के दृष्टांत या सांझेदारी दस्तावेज की तिथि से पहले की अवधि के लिए पारिश्रमिक भुगतान, लेकिन छूट के तौर पर दावा, को पहचाना जा सके और इन संज्ञानों को निर्धारण में लिया जा सके।
(ii) धारा 40(ख)(iv), एक फर्म के सांझेदारों के हित की स्वीकार्यता के लिए निम्नलिखित तीन शर्तों को अनुबंधित करता है :
क) भुगतान सांझेदारी दस्तावेज की शर्तों के अनुसार होना चाहिए और
ख) यह ऐसी सांझेदारी दस्तावेज की तिथि के बाद आने वाली किसी अवधि से संबंधित होनी चाहिए
ग) यह प्रति वर्ष बारह प्रतिशत के साधारण ब्याज की दर पर आंकी गर्इ राशि से अधिक नहीं होना चाहिए
ऐसे उदाहरणों को नोटिस किया गया है कि जहां सांझेदारी दस्तावेज में ब्याज बारह प्रतिशत से कम था फिर भी इसे निर्धारण अधिकारी द्वारा बारह प्रतिशत की दर पर स्वीकृत किया गया। ऐसी गलती से बचा जाना चाहिए। आगे, यदि सांझेदारी दस्तावेज में निर्धारित दर बारह प्रतिशत से अधिक हो तो अतिरिक्त राशि को निर्धारण में अस्वीकृत किया जाना चाहिए। निर्धारण अधिकारी को यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि ब्याज का भुगतान सांझेदारी दस्तावेज द्वारा प्राधिकृत है या नहीं। आगे, अधिनियम की धारा 40(ख)(iv) के लिए सांझेदारों को देययोग्य ब्याज की गणना करने के दौरान निर्धारण अधिकारी ब्याज यानी पूंजी का शुरूआती शेष, पूंजी का अंतिम शेष, निश्चित पूंजी या चालू पूंजी आदि, की गणना के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाते हैं। इस संबंध में, अधिनियम की धारा 40(ख)(iv) निर्दिष्ट करती है कि सांझेदारों को ब्याज का भुगतान सांझेदार दस्तावेज द्वारा और उसके अनुसार प्राधिकृत किया जाना चाहिए। इसलिए, मूल्यांकन करते समय निर्धारण अधिकारी को एक सांझेदार को दिए जाने वाली पूंजी पर ब्याज की गणना के लिए सांझेदारी दस्तावेज की शर्तों को संदर्भित करना चाहिए।
(iii) अधिनियम की धारा 40(ख) के वाक्यांश (ii) और (v) निर्धारित करती है कि एक कार्यरत सांझेदार को पारिश्रमिक का भुगतान सांझेदारी दस्तावेज द्वारा प्राधिकृत होना चाहिए, चाहे सांझेदारी दस्तावेज की शर्तों के अनुसार हो, सांझेदारी दस्तावेज के बाद की अवधि से संबंधित होना चाहिए और उसमें निर्धारित अधिकतम राशि से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि, यह नोटिस किया गया है कि कुछ मूल्यांकनों में, निर्धारण अधिकारी ने इसके माध्यम से कार्यरत सांझेदारों को पारिश्रमिक पर व्यय की स्वीकृति नहीं दी थी चाहे सांझेदारी दस्तावेज द्वारा प्राधिकृत हो या उसमें निर्दिष्ट राशि के अतिरिक्त थी। गलतियां दुबारा होने से रोकने के लिए और अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सख्ती से व्यय की स्वीकृति के लिए निर्धारण अधिकारी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिनियम की धारा 40(ख)(v) के अंतर्गत दावा सांझेदारी दस्तावेज के पूर्ण सत्यापन के बाद ही स्वीकृत होगा। आगे, पारिश्रमिक जो अधिनियम की धारा 40(ख)(v) के अंतर्गत कार्यरत् सांझेदार के लिए स्वीकृत है, की गणना के दौरान अधिनियम की धारा 40(ख) के वाक्यांश (ii) और (v) में शब्द "सांझेदारी दस्तावेज की शर्तों के अनुसार" सूचित करता है कि पारिश्रमिक अनपेक्षित या अनिर्णित नहीं होना चाहिए। इसलिए, सभी स्थितियों में, सांझेदारी दस्तावेज को कार्यरत सहभागी को देययोग्य पारिश्रमिक के निर्धारण के आधार पर बनाया जाना चाहिए। आगे, उन स्थितियों में जहां पारिश्रमिक या तो सांझेदारी दस्तावेज में ऐसे निर्दिष्ट हो या उसमें इंगित विधि के अनुसार आंका गया हो, अधिनियम की धारा 40(ख)(v) के अंतर्गत स्वीकृत राशि से कम हो तो इसे सांझेदारी दस्तावेज के आधार पर आंकी गर्इ संख्या तक सीमित किया जाएगा।
(iv) अधिनियम की धारा 40(ख)(v) के अंतर्गत कार्यरत सांझेदारों को देययोग्य पारिश्रमिक की गणना के दौरान पारिश्रमिक एक विशेष कुल राशि जो 'बही लाभ' के आंकड़ों पर आधारित है, से अधिक नहीं होना चाहिए। अधिनियम की धारा 40(ख) के स्पष्टीकरण 3 में सहभागियों के पारिश्रमिक के निर्धारण के लिए 'बही लाभ' की परिभाषा शामिल है और मुहैया कराती है कि 'बही लाभ' का अर्थ शुद्ध लाभ होगा जैसाकि अध्याय IV-घ में निर्दिष्ट तरीके में आंके गए प्रासंगिक पिछले वर्ष के लिए लाभ व हानि खाते में दर्शाया गया है जिसे फर्म के सभी सांझेदारों को दिए गए या देययोग्य पारिश्रमिक की कुल राशि द्वारा बढ़ाया गया है यदि ऐसी राशि को शुद्ध लाभ की गणना के दौरान काटा गया हो। इसलिए, अधिनियम की धारा 40(ख)(v) के लिए 'बही लाभ' की गणना के दौरान सभी आय जैसे पूंजी प्राप्ति, ब्याज, किराया आय, अन्य स्रोतों से आय आदि जो शीर्षक व्यापार या पेशे के लाभ या हानि के अंतर्गत न आती हो, को बाहर किया जाना चाहिए।
(v) निर्धारण अधिकारी को जब भी आवश्यक हो फर्मों के मूल्यांकन में अधिनियम के अध्याय XVI के प्रावधानों को लागू करने की सलाह दी जाती है। इस पर विचार किया जा सकता है कि अधिनियम की धारा 185 के अंतर्गत, अधिनियम की धारा 184 के प्रावधानों के साथ फर्म और इसके सहभागियों द्वारा किसी गैर-अनुपालन व्यय की अस्वीकृति का परिणाम हो सकता है जैसे पारिश्रमिक, ब्याज आदि जो सांझेदारों को देययोग्य है जिसे अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत अन्यथा स्वीकार किया गया है।
(vi) यह भी ध्यान में आ चुका है कि कुछ फर्में पारिश्रमिक, वेतन, ब्याज जो सहभागियों को देययोग्य है, आदि के लिए व्यय का दावा न करके अधिनियम की धारा 80झक के अंतर्गत कटौती हेतु योग्य लाभ को बढ़ानें का प्रयास कर रहीं है। ऐसी स्थिति में, निर्धारण अधिकारी ऐसी अधिनियम की धारा 80झक की उप-धारा (10) के प्रावधानों के परिपेक्ष्य में इन लेनदेनों की जांच कर सकते हैं जो निर्धारण अधिकारी को गतिविधि/व्यापार जो अत्यधिक लाभ का कारण है, से संबंधित लाभों को छोड़ने के बाद योग्य व्यापार के लाभ की पुर्नगणना हेतु निर्धारण अधिकारी को सशक्त करती है।
(vii) हानियों को अग्रेषित और समायोजित करने का दावा करने वाली फर्म की स्थिति में निर्धारण करते समय निर्धारण अधिकारी से अधिनियम की धारा 78 के प्रावधानों पर विचार करने के ऐसे दावों को सत्यापित करने के लिए अनुरोध है जो फर्म के कानून या उत्तराधिकार के परिवर्तन की स्थिति में ऐसे अग्रेषण या समायोजन को अस्वीकृत करता हो।
(viii) कर अंकेक्षण रिपोर्ट में अपूर्ण सूचना की प्रस्तुति के लिए कर लेखा परीक्षक के विरूद्ध संभावित कार्यवाही और निर्धारण अधिकारी द्वारा कर अंकेक्षण रिपोर्ट में सूचना का प्रभावी उपयोग से संबंधित मुद्दों के संबंध में, इस बात पर जोर दिया जाता है कि पूर्व में दिए गए निर्देश यानी सीबीडीटी की निर्देश सं. 09/2008 दिनांक 31.07.2008 क्षेत्रीय प्राधिकारियों द्वारा अति सफलतापूर्वक अनुसरित की जानी चाहिए।
2. एतद्द्वारा स्पष्ट किया जाता है कि यह परिपत्र सीमित संवीक्षा मामलों के लिए भी लागू होगा यदि निर्धारिती एक पंजीकृत फर्म हो
3. इस परिपत्र को सभी संबधित व्यक्तियों के ध्यान में लाया जा सकता है
4. हिंदी संस्करण का अनुसरण होगा
हस्ता/—
राजा राजेश्वरी आर.
अवर सचिव (आर्इटीए.II), सीबीडीटी
(एफ.नं. 225/54/2014/आर्इटीए-II)
निम्न को प्रति :
1. अध्यक्ष, सीबीडीटी और सभी सदस्य, सीबीडीटी
2. समस्त प्रधान सीसीआर्इटी/प्रधान डीजीआर्इटी
3. समस्त जेएस/सीआइटी, सीबीडीटी
4. अपर सीआर्इटी, डाटाबेस सेल विभागीय वेबसाइट पर अपलोड करने के लिए
5. Incometaxindia.gov.in व पब्लिक डोमेन पर अपलोड करने के लिए वेब मैनेजर
6. आर्इटीसीसी, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (3 प्रतियां)
हस्ता/—
राजा राजेश्वरी आर.
अवर सचिव (आर्इटीए.II), सीबीडीटी

