आयकर विभाग

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार

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धारा एपीपी द्वितीय

परिशिष्ट दो

धारा

धारा संख्या

एपीपी द्वितीय

अध्याय शीर्षक

अध्याय XXIII - विविध

अधिनियम

आय-कर अधिनियम, 1961

वर्ष

2006

परिशिष्ट दो

परिशिष्ट दो

परिशिष्ट दो

आय-कर नियमों के सुसंगत नियमों का विश्लेषण

धारा 2(1क)/नियम 7 और 8 : ऐसी आय की संगणना जो भागत: कृषि आय है और भागत: कारबार से आय है

नियम 7 में उपबंधित है कि एक संयुक्त कारबार आय को जो भागत: कृषि आय है और भागत: गैर कृषि आय, अलग-अलग करने के लिए किसी कृषि उपज का 'बाजार मूल्य', जो निर्धारिती द्वारा उगार्इ गर्इ है या वस्तु के रूप में किराए के रूप में उसके द्वारा प्राप्त की गर्इ है और या उसके द्वारा कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त की गर्इ है, घटा दिया जाता है। निर्धारिती द्वारा किसान के रूप में या वस्तु के रूप में किराए के प्राप्तिकर्ता के रूप में किए गए किसी खर्च के बाबत किसी और कटौती की अनुमति नहीं दी जा सकती।

जहां कृषि उपज उसके कच्ची अवस्था में बाजार में साधारणत: बेची जाती है, अथवा ऐसी किसी प्रक्रिया को लागू करने के बाद बेची जाती है जो किसान द्वारा या वस्तु के रूप में किराए के प्राप्तिकर्ता द्वारा उसे बाजार ले जाने योग्य बनाने के लिए आमतौर पर प्रयुक्त की जाती है, वहां वह बाजार मूल्य उस औसत कीमत के अनुसार निकाला गया मूल्य होगा जिस पर उसे सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान इस प्रकार बेचा गया है।

जहां कृषि उपज उसकी कच्ची अवस्था में या पूर्वोक्त कोर्इ प्रक्रिया लागू करने के बाद साधारणत: नहीं बेची जाती है वहां बाजार मूल्य निम्नलिखित का योग होगा–

(i) खेतीबाड़ी के व्यय;

(ii) उस क्षेत्रफल के लिए जिसमें वह उगार्इ गर्इ थी, दिया गया भू-राजस्व या किराया; और

(iii) ऐसी रकम जिसे निर्धारण अधिकारी प्रत्येक मामले में सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए युक्तियुक्त लाभ दर्शाने के लिए पाए।

नियम 8 में उपबंधित है कि चाय पत्ती उगाने और चाय बनाने के कारबार की बाबत आय अधिनियम के अधीन संगणित की जाती है मानो वह अनुज्ञेय कटौतियां करने के बाद कारबार से प्राप्त की गर्इ हो। इस प्रकार निकाली गर्इ आय का 40 प्रतिशत भाग कारबार आय के रूप में माना जाता है और शेष 60 प्रतिशत भाग कृषि आय के रूप में।

ऐसी आय की संगणना करते समय उन झाड़ियों के स्थान पर जो पहले से उगाए गए क्षेत्र में मर गर्इ हैं या स्थायी रूप से बेकार हो गर्इ हैं, नर्इ झाड़ियां लगाए जाने की लागत के संबंध में मोक दिया जाएगा, यदि ऐसा क्षेत्र पहले ही छोड़ नहीं दिया गया है। किंतु ऐसी लागत तय करने के लिए किसी सहायता राशि की बाबत कोर्इ कटौती नहीं की जाएगी जो धारा 10 के खंड (30) के उपबंधों के अधीन कुल आय में शामिल नहीं की जा सकती।

धारा 9/नियम 10 : अनिवासियों की दशा में आय की संगणना/अनिवासियों के साथ किए गए संव्यवहारों से होने वाली आय का अवधारण

जहां किसी अनिवासी व्यक्ति को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली आय की वास्तविक रकम, चाहे प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:–

• भारत में किसी कारबार संबंध से या उसके माध्यम से; या

• भारत में किसी संपत्ति से या उसके माध्यम से; या

• भारत में किसी आस्ति/आय के स्रोत से या उसके माध्यम से; या

• ब्याज पर दिए गए और भारत में लाए गए किसी धन से या उसके माध्यम से;

निर्धारण अधिकारी के अनुसार पक्की तौर पर अभिनिश्चित नहीं की जा सकती, वहां ऐसी आय की रकम निम्नलिखित में से किसी भी तरीके से निकाली जा सकती है :

• इस प्रकार प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले कुल आवर्त का प्रतिशत जो निर्धारण अधिकारी उचित समझे; या

• ऐसी रकम जो ऐसे व्यक्ति के कारबार के कुल लाभ और अभिलाभ के उतने अनुपात में है जितना अनुपात इस प्रकार प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाली प्राप्तियों का कारबार की कुल प्राप्ति से है; या

• ऐसी रीति से निकाली गर्इ रकम, जो निर्धारण अधिकारी ठीक समझे।

धारा 92 में उल्लिखित रीति से चलाए गए किसी कारबार से प्राप्त लाभ और अभिलाभ का अवधारण भी ऊपर बतार्इ गर्इ रीति से किया जा सकता है।

ऊपर बतार्इ गर्इ तीन रीतियों में से किसी का सहारा लेने से पूर्व निर्धारण अधिकारी को यह समाधान करना होता है कि निर्धारिती के पास अपेक्षित तथ्य सामग्री नहीं है या अन्यथा भी आय की सही या वास्तविक रकम अभिनिश्चित नहीं की जा सकती। यदि वास्तविक आय भारतीय आय की बाबत रखे गए लेखाओं में प्रकट आय में कुछ समायोजन करके निकाली जा सकती है तो नियम 10 लागू नहीं किया जा सकता।

नियम 10(i)–युक्तियुक्त प्रतिशत निकालने के लिए सुसंगत सामग्री निर्धारिती द्वारा दी जानी होगी। कुछ सुसंगत बातें जो युक्तियुक्त प्रतिशत का प्रयोग करते समय निर्धारण अधिकारी को ध्यान में रखनी चाहिए, वे इस प्रकार हैं : कारबार की प्रकृति; कारबार में अनिवासी द्वारा प्राप्त शुद्ध लाभ की दर; उसी प्रकार के कारबारों में लाभ की सामान्य दर; भारत में चलार्इ गर्इ कारबार संक्रिया की किस्म आदि।

नियम 10(ii)–नियम 10(ii) तभी लागू होता है जब आय कारबार से हो। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए :

• भारतीय आय-कर विधियों के अनुसार कारबार से अनिवासी निर्धारिती की विश्व में होने वाली कुल आय की संगणना।

• कराधेय राज्यक्षेत्रों के भीतर प्रोतभूत या उद्भूत होने वाली प्राप्तियों और कारबार की कुल विश्व प्राप्ति में अनुपात का अवधारण।

• आय-कर का निर्धारण करने के प्रयोजनों के लिए उस अनुपात को लागू करके कारबार के लाभों या अभिलाभों का अवधारण।

इस प्रकार अवधारित आय बिना किसी और मोक के कराधेय होगी।

धारा 10(14)/नियम 2खख : विहित भत्ते जो विहित सीमा तक छूटप्राप्त हैं

धारा 10(14) के अधीन विशेष भत्तों और फायदों पर छूट प्रदान की गर्इ है। खंड (14) को दो भागों में बांटा गया है–

(1) धारा 10 के खंड (14) के उपखंड (i) के अनुसार किसी परिलब्धि की प्रकृति की भत्ते या प्रसुविधा से भिन्न कोर्इ विहित विशेष भत्ता या फायदा, जो लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में पूर्णत:, आवश्यक रूप से और अनन्य रूप से उपगत व्यय पूरे करने के लिए विशेष रूप से दिया गया हो, उस सीमा तक छूट-प्राप्त है जिस तक ऐसे व्यय उस प्रयोजन के लिए वास्तव में उपगत किए जाएं। इस प्रयोजन के लिए विहित भत्तों (जो पूरी तरह छूट प्राप्त हैं) का उल्लेख नियम 2खख(1) में किया गया है। वे भत्ते निम्नलिखित हैं :

• दौरे या स्थानांतरण पर यात्रा खर्च को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, इसमें ऐसे स्थानांतरण के संबंध में निजी चीजों के स्थानांतरण, पैकिंग और ले जाने के संबंध में दी गर्इ कोर्इ धनराशि भी शामिल है।

• ऐसा कोर्इ भत्ता, जो कर्मचारी को दौरे के संबंध में या स्थानांतरण के संबंध में यात्रा की अवधि के लिए अपने सामान्य कार्यस्थल से अनुपस्थित रहने के कारण उसके द्वारा उपगत सामान्य दैनिक खर्च को पूरे करने के लिए दिया गया हो।

• किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों के पालन में आने-जाने के संबंध में उपगत व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, बशर्ते कि नियोजक द्वारा नि:शुल्क परिवहन यान उपलब्ध न कराया हो।

• किसी हैल्पर पर उपगत व्यय पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता, जहां ऐसा हैल्पर किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों का पालन करने के लिए लगाया गया हो।

• शिक्षा और शोध संस्थाओं में शैक्षणिक, शोध और प्रशिक्षणपरक कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता।

• किसी लाभ के पद या नियोजन के कर्तव्यों का पालन करते समय पहनने के लिए वर्दी खरीदने और उसके रखरखाव पर किए गए व्यय को पूरा करने के लिए दिया गया कोर्इ भत्ता।

(2) धारा 10(14) के उपखंड (ii) के अधीन, निर्धारिती को ऐसे स्थान पर जहां लाभ के उसके पद या नियोजन के कर्तव्यों का उसके द्वारा सामान्यतया पालन किया जाता है या ऐसे स्थान पर जहां वह साधारणतया रहता है, उसके निजी खर्च पूरे करने के लिए अथवा रहन-सहन की बढ़ी हुर्इ लागत के लिए उसकी प्रतिपूर्ति करने के लिए दिया गया कोर्इ विहित भत्ता विहित सीमा तक छूट-प्राप्त है। नियम 2खख(2) में ये भत्ते और सीमाएं दी गर्इ हैं जिस तक वे छूट-प्राप्त हैं। ये भत्ते निम्नलिखित हैं :

  भत्ते का नाम/स्थान जहां छूट प्राप्त हैं छूट की सीमा
(i) *विशेष प्रतिकारात्मक (पहाड़ी क्षेत्र) भत्ता या अधिक ऊंचार्इ भत्ता या प्रतिकूल जलवायु भत्ता या हिम क्षेत्र भत्ता या बवंडर भत्ता की प्रकृति का कोर्इ विशेष प्रतिकारात्मक भत्ता–  
  (i) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 1 के 800* रु. प्रतिमास
  स्तंभ 3 में मद 1 के अधीन वर्णित स्थानों पर  
  (ii) जम्मू-कश्मीर का सियाचिन क्षेत्र 7,000* रु. प्रतिमास
  (iii) समुद्री तल से 1000 मीटर या उससे अधिक 300* रु. प्रतिमास
  की ऊंचार्इ वाले अन्य स्थानों पर  
(ii) सीमा क्षेत्र भत्ता या दूरस्थ स्थान भत्ता या कठिन क्षेत्र भत्ता या विक्षुब्ध क्षेत्र भत्ता की प्रकृति का *कोर्इ विशेष प्रतिकारात्मक भत्ता–  
  () नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 1 में वर्णित स्थानों पर 1,300* रु. प्रतिमास
  () भारत के महाद्वीपीय शेल्फ में और भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र के अधिष्ठापन केंद्र 1,100* रु. प्रतिमास
  () नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 3 में वर्णित स्थानों पर 1,050* रु. प्रतिमास
  () नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 4 में वर्णित स्थानों पर 750* रु. प्रतिमास
  () कर्नाटक में जिला शिमोगा में जोग फाल्स 300 रु. प्रतिमास
  () नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 2 के स्तंभ 3 की मद 6 में वर्णित स्थानों पर 200* रु. प्रतिमास
(iii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 3 के स्तंभ 3 में वर्णित राज्यों में *विशेष प्रतिकारात्मक (जनजातीय क्षेत्र/अनुसूचित क्षेत्र/ऐजेन्सी क्षेत्र) भत्ता 200* रु. प्रतिमास
(iv) एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवहन के अनु- ऐसे भत्ते का
  क्रम में किए गए अपने कार्य के दौरान व्यक्तिगत 70 प्रतिशत जो
  व्यय पूरा करने के लिए किसी परिवहन प्रणाली में अधिकतम
  कार्यरत कर्मचारी को दिया गया कोर्इ भत्ता बशर्ते 6000* रु.
  कि ऐसा कर्मचारी दैनिक भत्ता नहीं लेता हो (संपूर्ण भारत में) प्रतिमास हो
(v) बालक शिक्षा भत्ता (संपूर्ण भारत में) प्रति बालक 100* रु. प्रतिमास जो अधिक से अधिक दो बालकों पर मिल सकता है
(vi) कर्मचारी के बालक के होस्टल खर्च को चुकाने के लिए उसे दिया गया कोर्इ भत्ता प्रति बालक 300* रु. प्रतिमास जो अधिक से अधिक दो बालकों पर मिल सकता है
(vii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 7 के स्तंभ 3 में वर्णित स्थानों पर प्रतिकरात्मक फील्ड एरिया भत्ता 2,600** रु. प्रतिमास
(viii) नियम 2खख(2) में सारणी के क्रमांक 8 के स्तंभ 3 में वर्णित स्थानों पर प्रतिकरात्मक मोडिफाइड फील्ड एरिया भत्ता 1,000** रु. प्रतिमास
(ix) 30 दिन से अधिक की अवधि तक अपने स्थायी कार्यस्थल से दूर क्षेत्रों में कार्यरत सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिए गए प्रति-राजद्रोह भत्ता की प्रकृति का कोर्इ विशेष भत्ता (संपूर्ण भारत में) 3,900** रु. प्रतिमास
(x) अपने निवास स्थान और कार्य स्थल के बीच आने-जाने के प्रयोजनार्थ व्यय पूरा करने के लिए कर्मचारी को [(xi) में उल्लिखित कर्मचारी से भिन्न] दिया गया परिवहन भत्ता (संपूर्ण भारत में) 800 रु. प्रतिमास
(xi) अपने निवास स्थान से कार्य स्थल के बीच आने-जाने के प्रयोजन के लिए व्यय को पूरा करने के लिए, ऐसे कर्मचारी को दिया गया परिवहन भत्ता जो नेत्रहीन है या न्यूनतर चरम सीमा की निर्योग्यता में शारीरिक रूप से अपंग है (संपूर्ण भारत में) 1,600 रु. प्रतिमास
(xii) ऐसे किसी कर्मचारी को जो भूमिगत कोयला खानों में प्रतिकूल, अप्राकृतिक जलवायु में काम करता है, दिया गया भूमिगत भत्ता (संपूर्ण भारत में) 800 रु. प्रतिमास
$(xiii) बहुत ऊंचार्इ वाले स्थानों में कार्यरत सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिया गया अधिक ऊंचार्इ क्षेत्र भत्ते के रूप में कोर्इ विशेष भत्ता (प्रतिकूल जलवायु भत्ता)  
  () 9000 से 15000 फुट की ऊंचार्इ के लिए 1,060 रु. प्रतिमास
  () 15000 फुट से अधिक ऊंचार्इ के लिए 1,600 रु. प्रतिमास
$(xiv) विशेष प्रतिकारात्मक अति सक्रिय फील्ड क्षेत्र की प्रकृति को भत्ते के रूप में सशस्त्र बलों के सदस्य को दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता (संपूर्ण भारत में) 4,200 रु. प्रतिमास
£(xv) द्वीप समूह (कार्य) (अंदमान तथा निकोबार और लक्षद्वीप द्वीप समूह) भत्ते की प्रकृति का सशस्त्र बलों के सदस्यों को दिया गया कोर्इ विशेष भत्ता 3,250 रु. प्रतिमास

टिप्पण : जो निर्धारिती उपर्युक्त (vii) और (viii) के अधीन छूट का दावा करता है, वह (ii) में निर्दिष्ट भत्ते की बाबत छूट के लिए हकदार नहीं होगा।

जो निर्धारिती (ix) के अधीन छूट का दावा करता है वह (ii) (विक्षुब्ध क्षेत्र भत्ता) में निर्दिष्ट भत्ते की बाबत छूट के लिए हकदार नहीं होगा।

धारा 32/नियम 5(2) : अवक्षयण : अवक्षयण की ऊंची दर का दावा करने के लिए विहित शर्तें

संयंत्र और मशीनरी की दशा में अवक्षयण की सामान्य दर 25 प्रतिशत है। किंतु यदि निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं तो संयंत्र और मशीनरी को नियम 5(2) के फलस्वरूप (निर्धारण वर्ष 1988-89 से 1991-92 के लिए 50 प्रतिशत) 40 प्रतिशत की दर पर अवक्षयण के योग्य आस्तियों के समूह के भागरूप माना जाएगा :

• यदि नर्इ मशीनरी या संयंत्र किसी चीज या वस्तु (जो ग्यारहवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोर्इ चीज न हो) के विनिर्माण या उत्पादन के कारबार के प्रयोजनों के लिए निर्धारण वर्ष 1988-89 (या किसी पश्चात्वर्ती वर्ष) के सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान लगाया जाए।

• यदि ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा वित्त पोषित प्रयोगशाला में अथवा पब्लिक सेक्टर कंपनी या विश्वविद्यालय या संस्थान जो सचिव, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग द्वारा इस निमित्त मान्यताप्राप्त हो, के स्वामित्वाधीन प्रयोगशाला में विकसित किसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का प्रयोग करके किया जाए अथवा वह उसमें आविष्कृत कोर्इ चीज या वस्तु हो।

• यदि ऐसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का प्रयोग करने या ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन करने का अधिकार ऐसी प्रयोगशाला के स्वामी से या ऐसे स्वामी से हक प्राप्त करने वाले किसी व्यक्ति से अर्जित कर लिया गया हो।

• यदि किसी पूर्ववर्ष के लिए जिसमें उक्त मशीनरी या संयंत्र अर्जित किया जाए, निर्धारिती द्वारा दी गर्इ विवरणी के साथ सचिव, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद का यह प्रमाणपत्र भी लगाया जाएगा कि ऐसी चीज या वस्तु का विनिर्माण या उत्पादन ऐसी प्रौद्योगिकी (जिसके अंतर्गत कोर्इ प्रोसेस भी है) या अन्य तकनीकी ज्ञान का, जिसका विकास ऐसी प्रयोगशाला में किया जाए, प्रयोग करके किया गया है अथवा वह ऐसी चीज या वस्तु है जिसका आविष्कार ऐसी प्रयोगशाला में किया गया है।

धारा 40क(3)/नियम 6घघ : कारबारी नामंजूरी–विहित सीमा से अधिक नकद संदाय–विहित स्थितियां और परिस्थितियां जिनमें भुगतान राशि अधिक है–विहित सीमा चैक से भिन्न रूप में भी की जा सकती है

तारीख 1.4.1996 से यथासंशोधित धारा 40क(3) के अधीन निर्धारिती द्वारा 20,000 रु. से अधिक राशि का कोर्इ भुगतान तभी पूर्ण रूप में कटौती योग्य होगा जब ऐसा भुगतान क्रास चैक द्वारा या क्रास बैंक ड्राफ्ट द्वारा किया जाता है। यदि ऐसा भुगतान किसी अन्य तरीके से किया जाता है तो ऐसे भुगतान का 20 प्रतिशत कटौती के रूप में मंजूर नहीं किया जाएगा। तारीख 1.4.1996 से पूर्व इस उपधारा के अनुसार समग्र रकम पर पूरा वर्जन था यदि भुगतान क्रास चैक या क्रास बैंक ड्राफ्ट से भिन्न रूप में किया गया हो। फिर भी नियम 6घघ(ञ) में, जिस रूप में उस समय विद्यमान था, उन दशाओं में साधारण अपवाद का उपबंध था जिनमें निर्धारिती निर्धारण अधिकारी का यह समाधान कर देता था कि क्रास चैक/ड्राफ्ट द्वारा भुगतान (i) आपवादिक या अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण, अथवा (ii) विहित रीति से भुगतान करने की अव्यवहार्यता के कारण, या (iii) ऐसी प्रमाणिक कठिनार्इ के कारण, जो भुगतान से आदाता को होती, नहीं किया जा सका। नियम 6घघ में इस खंड (ञ) का 25.7.1995 से अब लोप कर दिया गया है और तारीख 1.12.1995 से नियम 6घघ में नए खंड (ञ) से (ठ) अंत:स्थापित किए गए हैं। अब उन स्थितियों के सिवाय जिन्हें नियम 6घघ में खासतौर पर छोड़ दिया गया है, सभी स्थितियों में रकम के 20 प्रतिशत की नामंजूरी निरपवाद लागू होगी। इस नियम के अधीन (जिस रूप में यह नियमों के 21वें संशोधन के पश्चात् 1.12.1995 को विद्यमान था) धारा 40क(3) के अधीन कोर्इ नामंजूरी नहीं दी जाएगी जहां भुगतान निम्नलिखित स्थितियों/परिस्थितियों में किया जाता है :

1. जहां भुगतान बैंककारी या अन्य क्रेडिट संस्थाओं को किया जाए जैसे भारतीय रिजर्व बैंक/भारतीय स्टेट बैंक/अनुसूचित बैंक/पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के वाणिज्यिक बैंक/जीवन बीमा निगम/भारतीय यूनिट ट्रस्ट/आर्इ सी आर्इ सी आर्इ/आर्इ एफ सी आर्इ/आर्इ डी बी आर्इ/सहकारी बैंक या भूमि बंधक बैंक/प्राइमरी एग्रिकलचरल क्रेडिट सोसाइटी/प्राइमरी क्रेडिट सोसाइटी/मद्रास इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेन्ट कारपोरेशन लि., मद्रास/आंध्र प्रदेश इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि., हैदराबाद/केरल स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि., त्रिवेन्द्रम/स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ महाराष्ट्र लि., मुंबर्इ/पब्लिक स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., चंडीगढ़/नेशनल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., नर्इ दिल्ली/मैसूर स्टेट इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट कारपोरेशन लि., बंगलौर, हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेन्ट कारपोरेशन लि., चंडीगढ़/राज्य वित्त निगम।

2. केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को भुगतान, यदि ऐसी सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में कानूनी टेंडर में भुगतान का उपबंध है, जैसे प्रत्यक्ष कर, सीमा शुल्क या उत्पाद शुल्क, विक्रय कर, रेल भाड़ा आदि का भुगतान। इस प्रकार रेल भाड़ा खर्च के लेखे या वेगन बुक कराने के लिए रेल विभाग को किए गए भुगतान की दशा में धारा 40क(3) लागू नहीं होगी–देखिए परिपत्र सं. 34, तारीख 5.3.1970.

3. निर्धारिती द्वारा आदाता को प्रदाय किए गए किसी माल या दी गर्इ सेवाओं के लिए निर्धारिती को देय धन के लिए आदाता के खाते में निर्धारिती द्वारा बही समायोजन द्वारा किए गए भुगतान।

4. बैंककारी प्रणाली से किए गए भुगतान जैसे क्रेडिट पत्र, डाक अंतरण, तार अंतरण, उसी बैंक या एक बैंक और दूसरे बैंक के बीच बही समायोजन और विनिमय पत्र जिनके अंतर्गत बैंक का भुगतान योग्य बनार्इ गर्इ हुंडियां भी हैं।

5. खेतिहर, बुवार्इ करने वाले या उत्पादक को कृषि या वन उपज अथवा वन्य प्राणी उत्पाद (इनमें हड्डियां और खालें भी शामिल हैं) या डेरी या कुक्कुट पालन या मछली या मछली उत्पाद अथवा उद्यान या जलकृषि के उत्पादों के चाहे वे प्रसंस्कृत हों या नहीं मद्दे भुगतान।

6. उत्पादक को उसके उत्पाद खरीदने के लिए भुगतान यदि उनका विनिर्माण या प्रसंस्करण कुटीर उद्योग में बिना विद्युत के किया जाता है।

7. ऐसे व्यक्ति को किए गए भुगतान जो साधारणतया ऐसे गांव में रहता है या कारबार चलाता है जिसमें कोर्इ बैंक नहीं है। किंतु यदि भुगतान बैंक की सुविधा वाले कस्बे में के ग्रामवासी को किया जाता है तो यह अपवाद लागू नहीं होगा।

8. प्रतिवर्ष 7,500 रु. से अनधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को उपदान/छंटनी प्रतिकर आदि जैसी सीमांत प्रसुविधाओं का भुगतान।

9. कर्मचारी को दिया गया वेतन (धारा 192 के अधीन स्रोत पर कटौती के पश्चात्) जब ऐसा कर्मचारी अपने सामान्य कार्यस्थल से भिन्न किसी स्थान पर या पोत पर 15 या अधिक दिन लगातार अस्थायी तौर पर तैनात किया जाता है, और वह ऐसे स्थान या पोत पर किसी बैंक में कोर्इ खाता नहीं रखता।

10. ऐसे दिन किए जाने के लिए अपेक्षित भुगतान जिसको बैंक छुट्टी या हड़ताल के कारण बंद हैं।

11. किसी व्यक्ति द्वारा अपने उस एजेन्ट को किया गया भुगतान जिससे ऐसे व्यक्ति की ओर से माल या सेवा के लिए नकद भुगतान करने की अपेक्षा की जाती है।

12. किसी प्राधिकृत व्यौहारी/मनीचेंजर द्वारा अपने कारबार के सामान्य अनुक्रम में विदेशी करेंसी या यात्री चैक के क्रय पर किया गया भुगतान।

धारा 89/नियम 21क : राहत की - जब वेतन बकाया या अग्रिम आदि के रूप में दिया जाता है - संगणना के नियम

कभी-कभी वेतनभोगी कर्मचारी को वेतन बकाया, उपदान, छुट्टी नकदीकरण और पेंशन के सारांशीकृत मूल्य के रूप में एकमुश्त राशि मिल सकती है। ये भुगतान, जो अतीत में की गर्इ सेवा के संबंध में और उपदान, छुट्टी नकदीकरण और पेंशन के सारांशीकृत मूल्य की दशा में होते हैं, इस तथ्य के कारण हो सकता है कर छूट प्राप्त न हों कि विहित शर्तें और धनीय सीमाएं पूरी नहीं होती हैं। यदि इन एकमुश्त राशियों के भुगतान पर उनकी प्राप्ति वर्ष में कर लगाया जाता है तो उत्तरोत्तर बढ़ती कर दर की वजह से कर का भार बहुत अधिक हो जाएगा। इस भारी कर लगने से होने वाली कठिनार्इ को हल्का करने के लिए अधिनियम में ऐसे एकमुश्त भुगतानों पर कर राहत मंजूर करने के लिए उपबंध किया गया है।

वे मदें जिन पर राहत अनुज्ञेय है–निम्नलिखित मदों पर राहत दी जाती है :

• बकाया के रूप में या अग्रिम रूप में प्राप्त वेतन

• कम से कम पांच वर्ष की सेवा करने के पश्चात् प्राप्त उपदान (बिना छूट का भाग)

• नियोजन समाप्ति के लिए प्रतिकर बशर्ते कि कर्मचारी कम से कम तीन वर्ष की लगातार सेवा कर चुका हो और सेवा का शेष काल कम से कम 3 वर्ष हो

• पेंशन का सारांशीकृत मूल्य (बिना छूट का भाग)

• छुट्टी नकदीकरण (बिना छूट का भाग)।

धारा 57(iiक) के स्पष्टीकरण में निर्दिष्ट कुटुंब पेंशन [देखिए वित्त अधिनियम, 2002 द्वारा 1.4.1996 से भूतलक्षी प्रभाव से यथा संशोधित धारा 89]

बकाया वेतन की प्राप्ति पर या अग्रिम वेतन मिलने पर राहत की गणना किस प्रकार की जाएगी - बकाया वेतन की या अग्रिम वेतन की प्राप्ति पर (जिसे इसमें आगे अतिरिक्त वेतन कहा गया है) राहत की गणना नियम 21क(2) में दी गर्इ रीति से निम्न प्रकार की जाएगी :

1. उस सुसंगत पूर्ववर्ष की, जिसमें अतिरिक्त वेतन प्राप्त हो, कुल आय पर जिसके अंतर्गत अतिरिक्त वेतन भी है, संदेय कर की संगणना कीजिए।

2. उस सुसंगत पूर्ववर्ष की, जिसमें अतिरिक्त वेतन प्राप्त हो, कुल आय पर अतिरिक्त वेतन को छोड़कर, संदेय कर की संगणना कीजिए।

3. (1) और (2) के अनुसार निकली कर की रकम का अन्तर निकालिए।

4. उस पूर्ववर्ष में, जिससे ऐसा वेतन संबंधित है, अतिरिक्त वेतन को निकालने के पश्चात् कुल आय पर कर की संगणना कीजिए।

5. उस पूर्ववर्ष में, जिससे ऐसा वेतन संबंधित है, अतिरिक्त वेतन को निकालने के पश्चात्, कुल आय पर कर की संगणना कीजिए।

6. (4) और (5) के अनुसार निकली कर की रकम का अंतर निकालिए।

7. (3) पर संगणित कर की जितनी राशि (6) के अनुसार संगणित कर से अधिक है वह राशि धारा 89(1) के अधीन स्वीकार्य राहत राशि है। किंतु यदि (3) के अनुसार संगणित कर (6) पर संगणित कर से कम है तो कोर्इ राहत स्वीकार्य नहीं है। ऐसे मामले में निर्धारिती कर्मचारी को राहत के लिए आवेदन नहीं करना चाहिए।

यदि अतिरिक्त वेतन का संबंध एक से अधिक पूर्ववर्षों से है तो वेतन उन पूर्ववर्षों में, जिनके लिए वह है, ऊपर बतार्इ गर्इ रीति से उनमें दिखाया जाएगा।

उपदान की बाबत राहत की संगणना किस प्रकार की जाएगी : धारा 89(1) के अधीन यदि उपदान विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक प्राप्त होता है तो राहत का दावा किया जा सकता है। किंतु यदि कराधेय उपदान पांच वर्ष से कम की गर्इ सेवा की बाबत है तो कोर्इ राहत स्वीकार्य नहीं है। जिन मामलों में राहत मंजूर की जा सकती है उन्हें दो वर्गों में बांटा जा सकता है, अर्थात् () जहां संदेय उपदान 15 या अधिक वर्षों की विगत सेवा की बाबत हो, और () जहां ऐसी अवधि 5 वर्ष या अधिक हो किंतु 15 वर्ष से कम हो। प्रथम वर्ग की स्थिति में राहत की गणना निम्न प्रकार की जाती है :–

1. प्राप्ति वर्ष में उपदान सहित कुल आय पर कर की औसत दर की संगणना कीजिए।

2. ऊपर (1) के अनुसार संगणित कर की औसत दर पर उपदान पर कर ज्ञात कीजिए।

3. एक तिहार्इ उपदान राशि पिछले तीन वर्षों में से हर वर्ष की अन्य आय में जोड़कर कर की औसत दर की संगणना कीजिए।

4. ऊपर (3) में बतार्इ गर्इ रीति से निकाली गर्इ तीन-औसत दरों का औसत ज्ञात कीजिए और उस दर पर उपदान पर कर की संगणना कीजिए।

5. ऊपर (2) के अनुसार संगणित उपदान पर कर और ऊपर (4) के अनुसार कर में जो अंतर आएगा वह धारा 89(1) के अधीन स्वीकार्य राहत होगी।

दूसरे वर्ग के अंतर्गत आने वाले मामलों में राहत उसी तरह संगणित की जाती है जैसे ऊपर बतार्इ गर्इ है। अंतर केवल इतना है कि पूर्व तीन वर्षों की औसत दरों के औसत के बजाय पूर्व दो वर्षों की दरों के औसत की संगणना पूर्व दो वर्षों में से प्रत्येक वर्ष की अन्य आय में राशि एक बटा दो उपदान जोड़कर की जाती है।

नियोजन की समाप्ति पर प्रतिकर संबंधी राहत की संगणना–यदि निर्धारती द्वारा कम से कम तीन वर्ष की लगातार सेवा के पश्चात् अपने नियोजन की समाप्ति पर या उसके संबंध में अपने नियोजक से या पूर्व नियोजक से प्रतिकर प्राप्त किया जाता है और नियोजन की शेष बची अवधि भी तीन वर्ष से कम नहीं है तो राहत की संगणना वैसे ही की जाती है मानो कर्मचारी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि की सेवा की बाबत उपदान दिया गया हो।

पेंशन के सारांशीकरण में भुगतान की बाबत राहत की संगणना–पेंशन सारांशीकरण में विहित सीमाओं से अधिक प्राप्त भुगतान राशि की बाबत राहत का दावा किया जा सकता है। ऐसी राहत की संगणना वैसे ही की जाती है मानो कर्मचारी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि की सेवा की बाबत उपदान दिया गया हो।

अन्य भुगतानों के संबंध में राहत की संगणना–ऊपर उल्लिखित से भिन्न कर्मचारी द्वारा प्राप्त आय के संबंध में, धारा 89(1) के अंतर्गत राहत प्रत्येक व्यक्तिगत मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा प्रदान की जाएगी।

राहत का दावा कैसे किया जाए–सामान्य अनुक्रम में, निर्धारिती को केवल उस पूर्ववर्ष के सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए आय की विवरणी में राहत का दावा करना चाहिए जिसमें एकमुश्त भुगतान प्राप्त हो। इस प्रयोजन के लिए, ब्यौरेवार संगणना वर्णित करते हुए राहत के लिए एकमात्र आवेदन पत्र आय की विवरणी के साथ उपाबद्ध किया जा सकता है। वैकल्पिक रूप में, वह कम दर पर कर की कटौती करने के लिए नियोजक को निदेश देने हेतु आय-कर अधिकारी को भुगतान के किए जाने के पूर्व भी आवेदन कर सकता है।

इस सामान्य प्रक्रिया के अपवाद के रूप में अधिनियम द्वारा उस निर्धारिती को एक विशेष सुविधा दी जाती है जो निम्नलिखित प्रवर्गों में से किसी के अंतर्गत आता हो :

• सरकारी सेवक।

• किसी कंपनी, सहकारी सोसाइटी, स्थानीय प्राधिकारी, विश्वविद्यालय, संस्था, संगम या निकाय का कर्मचारी।

ऐसे किसी निर्धारिती की दशा में, नियोजक द्वारा स्रोत पर कर की कटौती के समय भी राहत की गणना की जा सकती है और उसे अनुज्ञात किया जा सकता है। इस प्रयोजन के लिए, निर्धारिती-कर्मचारी को प्ररूप सं. 10ड़ में विहित विशिष्टियां देनी होंगी।

धारा 139क/नियम 114 : स्थायी खाता संख्यांक

'स्थायी खाता संख्यांक' क्या है

1. स्थायी खाता संख्यांक (इसके पश्चात् इसे 'पैन' कहा गया है) दस अंकों वाला एक वर्ण क्रमांक संख्यांक है, जो आय-कर विभाग के निर्धारण कार्यालय द्वारा लेमिनेटिड कार्ड के रूप में जारी किया जाता है यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए (चाहे वह निर्धारिती हो या नहीं) (i) सभी पत्र व्यवहार, आय-कर विवरणियों, विवरणों आदि में, जो कि व्यक्ति द्वारा आय कर प्राधिकारी को भेजे जाते हैं, कोट करने; तथा (ii) कतिपय विनििष्र्ट वित्तीय संव्यवहार करने के समय इसे कोट करने के प्रयोजन के लिए रखना आवश्यक है।

वे व्यक्ति, जिन्हें अनिवार्यत: पैन प्राप्त करना चाहिए

2. धारा 139क के अंतर्गत नीचे विनिर्दिष्ट व्यक्तियों पर पैन के आबंटन के लिए निर्धारण अधिकारी को आवेदन करने की कानूनी बाध्यता अधिरोपित की गर्इ है।

2.1 वे व्यक्ति जिनकी कराधेय आय है–प्रत्येक व्यक्ति के लिए, जिसकी किसी पूर्ववर्ष के दौरान कुल आय उस अधिकतम रकम से, जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है, अधिक हो जाती है, पैन के लिए आवेदन करना आवश्यक है। इस प्रकार, यदि किसी व्यष्टि/हिन्दु अविभक्त कुटुंब/व्यष्टि निकाय/व्यक्ति संगम की कुल आय उस अधिकतम रकम से, जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है, अधिक हो गर्इ है या अधिक हो जाने की संभावना है, तो उसे पैन के लिए अवश्य आवेदन करना चाहिए।

2.2 वे व्यक्ति, जो कारबार या व्यवसाय कर रहे हैं–ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, जो ऐसा कोर्इ कारबार या व्यवसाय कर रहा है जिसका कुल विक्रय, आवर्त सकल प्राप्तियां 5,00,000 रुपए प्रतिवर्ष की सीमा से अधिक हैं या अधिक होने की संभावना है, पैन के लिए अवश्य आवेदन करना चाहिए। उनके मामलों में, यह प्रश्न कि अधिनियम के अधीन उनकी कोर्इ कराधेन आय है अथवा नहीं, कतर्इ सुसंगत नहीं है।

2.3 पूर्त/धार्मिक न्यास–ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, जिसको ऐसे न्यास या अन्य विधिक बाध्यता के अंतर्गत, जो पूर्णतया या भागत: पूर्त या धार्मिक प्रयोजनों के लिए हो, धारित संपत्ति से आय प्राप्त हो रही हो, और जो ऐसी आय के संबंध में प्रतिनिधिक न्यासी के रूप में निर्धारण के लिए दायी हो, पैन के लिए अवश्य आवेदन करना चाहिए।

2.4 धारा 139क(1क) के अधीन अधिसूचित व्यक्ति–केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे किसी वर्ग या वर्गों के व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जिनके द्वारा इस अधिनियम के अधीन कर संदेय है अथवा कोर्इ कर या शुल्क तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन संदेय है, जिसके अंतर्गत आयातकर्ता और निर्यातकर्ता भी हैं, चाहे उनके द्वारा कोर्इ कर संदेय है अथवा नहीं और ऐसे व्यक्ति ऐसे समय के भीतर जो उस अधिसूचना में उल्लिखित किया जाए, पैन के आबंटन के लिए निर्धारण अधिकारी को आवेदन करेंगे।

इस संबंध में निम्नलिखित व्यक्ति अधिसूचित किए गए हैं :

• निर्यातकर्ता और आयातकर्ता, जिनसे विदेश व्यापार (विकास और विनिमयन) अधिनियम, 1992 की धारा 7 के अधीन निर्यातकर्ता-आयातकर्ता कोड अभिप्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है।

• केन्द्रीय उत्पाद शुल्क निर्धारिती।

• सेनवेट क्रेडिट नियम के अधीन बीजक जारी करने वाले व्यक्ति तथा जिनसे केन्द्रीय उत्पाद शुल्क नियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत कराने की अपेक्षा की जाती है

• सेवा कर निर्धारिती।

• केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम और राज्य की विक्रय कर विधियों के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति।

पैन का स्वप्रेरणा से आबंटन

3. धारा 139क(2) के अधीन निर्धारण अधिकारी को पैरा 2 में वर्णित प्रवर्गों के अंतर्गत आने वाले व्यक्तियों से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति को पैन आबंटित करने के लिए सशक्त बनाया गया है।

किसी अन्य व्यक्ति के अनुरोध पर पैन का आबंटन

4. धारा 139क(3) के अधीन, पैरा 2 और पैरा 3 में वर्णित प्रवर्गों के अधीन न आने वाले किसी व्यक्ति को पैन के आबंटन के लिए निर्धारण अधिकारी को आवेदन अवश्य करना चाहिए। ऐसे मामलों में, निर्धारण अधिकारी के लिए यह आज्ञापक रूप में अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे व्यक्ति को 'तुरंत' पैन आबंटित करे। यह सूचना दी जाती है कि वे व्यक्ति भी, जिनसे आज्ञापक रूप से पैन अभिप्राप्त करना अपेक्षित नहीं है, इस तथ्य को देखते हुए पैन अभिप्राप्त कर सकते हैं कि नियम 114ख से नियम 114घ में व्यक्त कतिपय विनिर्दिष्ट संव्यवहारों को करते समय पैन को कोट करना आवश्यक होता है। यह गलत धारणा विद्यमान है कि यदि कोर्इ व्यक्ति पैन ले लेता हैै तो उसे कानूनी रूप में आय की विवरणी फाइल करनी होती है। अधिनियम के अधीन ऐसी कोर्इ अपेक्षा नहीं है। वास्तव में, यह प्रतीत होता है कि धारा 139क(3) इस उद्देश्य से विनिर्दिष्ट रूप से अंत:स्थापित की गर्इ है कि व्यक्ति अग्रिम रूप में पैन अभिप्राप्त कर सकें जिससे कि वे ऐसी किसी परिस्थिति का सामना कर सकें जो कि उस समय पैदा हो सकती है जब वे ऐसा करे विनिर्दिष्ट वित्तीय संव्यवहार करना चाहें या करें जिसके लिए पैन कोट करना आवश्यक हो। पैन कार्ड किसी भी समय तुरंत प्राप्त नहीं हो सकता। अत: इस कार्ड को अग्रिम में रखना आवश्यक हो जाता है। इसके अतिरिक्त, यह कार्ड अन्य प्रयोजनों के लिए, विशेषतया वरिष्ठ नागरिकों के लिए, जैसे कि रेल की सीट आरक्षण तथा वायुयान की सीट आरक्षण के लिए 'पहचान पत्र' का भी कार्य करता है।

वे व्यक्ति, जिन्हें धारा 139क लागू नहीं होगी

5. नियम 114ग(1) के अधीन, धारा 139क के उपबंध निम्नलिखित व्यक्तियों को लागू नहीं होंगे:

(i) ऐसे व्यक्ति जिनके पास कृषि आय है और ऐसी कोर्इ अन्य आय प्राप्त नहीं कर रहे हैं जो आय-कर से प्रभार्य है।

(ii) अनिवासी अर्थात् वे व्यक्ति जो निवासी नहीं हैं।

अत:, पूर्वोक्त व्यक्तियों पर पैन के लिए आवेदन करने तथा उसे अभिप्राप्त करने की कोर्इ बाध्यता नहीं है।

पैन के आबंटन के लिए आवेदन

6. धारा 139क में यह अनुध्यात है कि (i) उन व्यक्तियों को, जिनके लिए आज्ञापक रूप से पैन अभिप्राप्त करना आवश्यक है और (ii) उन व्यक्तियों को, जो पैन अभिप्राप्त करना चाहते हैं, भले ही उनके लिए आज्ञापक रूप में पैन अभिप्राप्त करना आवश्यक नहीं है, पैन के आबंटन के लिए निर्धारण अधिकारी को आवेदन करना चाहिए। तारीख 1.7.2003 से, आवेदन पैन सर्विस सेंटर पर फाइल किया जा सकता है (पैरा 13 देखिए)।

आवेदन का प्ररूप

7. आवेदन आय-कर (सातवां संशोधन) नियम, 2003 द्वारा 29.5.2003 से यथा प्रतिस्थापित प्ररूप सं. 49क में होना चाहिए। प्ररूप दो प्रतियों में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। व्यष्टियों की दशा में, व्यष्टि की पासपोर्ट आकार की अनुप्रमाणित फोटो अवश्य लगी होनी चाहिए।

आवेदन किसे किया जाए

8. आवेदन उस व्यक्ति पर अधिकारिता रखने वाले निर्धारण अधिकारी को किया जाना चाहिए।

संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज

9. तारीख 29 मर्इ, 2003 से आवेदन के साथ आवेदन की पहचान तथा पते के सबूत के रूप में नीचे वर्णित दस्तावेज अवश्य संलग्न किए जाने चाहिए :

सारणी

क्रम सं. आवेदक पहचान तथा पते के सबूत के रूप में दस्तावेज
(1) (2) (3)
1. व्यष्टि (i) पहचान का सबूत–
    स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र या किसी मान्यताप्राप्त शिक्षा संस्था की डिग्री या निक्षेप खाते या क्रेडिट कार्ड या बैंक खाते या पानी के बिल या राशन कार्ड या संपत्ति कर निर्धारण आदेश या पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र या चालन अनुज्ञप्ति (ड्रार्इविंग लाइसेंस) या यथास्थिति किसी संसद् सदस्य या विधानसभा के सदस्य या नगर निगम पार्षद या राजपत्र अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाणपत्र की प्रति।
    किसी अवयस्क व्यक्ति की दशा में, ऐसे अवयस्क के माता या पिता में से किसी के या संरक्षक के उपर्युक्त दस्तावेजों में से किसी को भी पहचान का सबूत समझा जाएगा।
    (ii) पते का सबूत–
    बिजली के बिल या टेलीफोन के बिल या निक्षेप खाते या क्रेडिट कार्ड या बैंक खाते या राशन कार्ड या नियोजक के प्रमाणपत्र या पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र या संपत्ति कर निर्धारण आदेश या चालन अनुज्ञप्ति (ड्रार्इविंग लाइसेंस) या किराए की रसीद या यथास्थिति किसी संसद् सदस्य या विधानसभा के सदस्य या नगर निगम पार्षद या राजपत्र अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पते के प्रमाणपत्र की प्रति।
    अवयस्क व्यक्ति की दशा में, ऐसे अवयस्क के माता या पिता में से किसी के या संरक्षक के उपर्युक्त दस्तावेजों में से किसी को भी पते का सबूत समझा जाएगा।
2. हिन्दु अविभक्त कुटुंब हिन्दु अविभक्त कुटुंब के कर्त्ता के संबंध में क्रम सं. 1 में उल्लिखित व्यष्टि की दशा में पहचान और पते के सबूत के रूप में लागू किसी दस्तावेज की प्रति।
3. कंपनी कंपनियों के रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र की प्रति।
4. फर्म फर्मों के रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र की प्रति या भागीदारी विलेख की प्रति।
5. व्यक्ति-संगम (न्यास) न्यास विलेख की प्रति या पूर्त (चैरिटी) आयुक्त द्वारा जारी किए रजिस्ट्रीकरण संख्यांक के प्रमाणपत्र की प्रति।
6. (न्यासों से भिन्न) व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय या स्थानीय प्राधिकारी या कृत्रिमविधिक व्यक्ति करार की प्रति या पूर्त (चैरिटी) आयुक्त या सहकारी सोसाइटी के रजिस्ट्रार या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए रजिस्ट्रीकरण संख्यांक के प्रमाणपत्र की प्रति या केन्द्रीय या राज्य सरकार के किसी विभाग से जारी किसी अन्य दस्तावेज, जिससे ऐसे व्यक्ति की पहचान या पता साबित होता हो।

पैन की नर्इ श्रंखला

10. करदाताओं को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए, विभाग द्वारा वर्ष 1996 में नर्इ श्रंखला के अधीन पैन जारी करने के लिए एक स्कीम लार्इ गर्इ है। इस पैन के दस वर्ण क्रमांक है और वह लेमिनेटिड कार्ड के रूप में जारी किया जाता है। उन व्यक्तियों के लिए भी, जिन्होंने नर्इ स्कीम लाए जाने से पूर्व पैन के लिए आवेदन किया था और जिन्हें पैन आबंटित किया गया था, नर्इ श्रंखला के अधीन पैन के लिए आवेदन करना आवश्यक है।

एक व्यक्ति के लिए केवल एक पैन

11. नर्इ श्रंखला के अधीन एक व्यक्ति केवल एक पैन रख सकता है। अधिनियम की धारा 139क(7) में ऐसे व्यक्ति को, जिसे नर्इ श्रंखला के अधीन पैन आबंटित किया जा चुका है, दूसरे पैन के लिए आवेदन करने, अभिप्राप्त करने और कब्जे में रखने से विनिर्दिष्ट रूप से प्रतिषिद्ध किया गया है।

आवेदन करने के लिए समय-सीमा

12. व्यक्तियों के विभिन्न प्रवर्गों के लिए नियम 114 के अधीन विहित समय-सीमा नीचे सारणी के रूप में दी गर्इ है

क्रय सं. व्यक्ति का प्रवर्ग   विहित समय सीमा   प्राधिकारी
1. वे व्यक्ति, जिनकी कुल आय लेखा वर्ष के दौरान उस अधिकतम रकम से अधिक हो जाती है जो आय-कर से प्रभार्य नहीं है (पैरा 2.1 देखिए)   सुसंगत निर्धारण वर्ष की 31 मर्इ   नियम 114(3)(i)
2. वे व्यक्ति, जो ऊपर पैरा (1) के अंतर्गत नहीं आते, किन्तु जिन्हें कारबार या व्यवसाय से (आय) प्राप्त हो रही है जिसका योग किसी लेखा वर्ष के दौरान 5 लाख रुपए से अधिक है या अधिक होने की संभावना है (पैरा 2.2 देखिए)   उक्त लेखा वर्ष की समाप्ति से पूर्व   नियम 114(3)(ii)
3. पूर्त और धार्मिक न्यास (पैरा 2.3 देखिए)   उक्त लेखा वर्ष की समाप्ति से पूर्व   नियम 114(3)(iii)
4. निर्यातकर्ता और आयातकर्ता (पैरा 2.4 देखिए)   कोर्इ निर्यात या आयात करने के पूर्व    
5. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क निर्धारिती (पैरा 2.4 देखिए)   केन्द्रीय उत्पाद शुल्क नियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व   अधिसूचना सं. का. आ. 775(अ) तारीख 29.8.2000
6. सेवा कर निर्धारिती (पैरा 2.4 देखिए)   सेवा कर नियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व    
7. केन्द्रीय/राज्य विक्रय कर अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति (पैरा 2.4 देखिए)   सुसंगत विक्रय कर विधि के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व   अधिसूचना सं. का. आ.1206(अ) तारीख 12.12.2001

तथापि, पैन की नर्इ श्रंखला लाए जाने से, अधिनियम की धारा 139क(4) में यह उपबंधित है कि नर्इ श्रंखला के अधीन पैन के आबंटन के प्रयोजन के लिए बोर्ड अधिसूचना के अधीन वह तारीख विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिससे उक्त अधिसूचना के अंतर्गत आने वाले व्यक्तियों को पैन के लिए आवेदन करना होगा।

अधिसूचना सं. का.आ. 354(अ), तारीख 28.4.1998 और अधिसूचना सं. का.आ. 543(अ), तारीख 3.6.1998 द्वारा यथा संशोधित अधिसूचना सं. का.आ. 123(अ), तारीख 11.2.1998 द्वारा समय-सीमा इस प्रकार है :

निर्धारण वर्ष 1997-98 : 31 अगस्त, 1998
निर्धारण वर्ष 1998-99 : 31 अगस्त, 1998
निर्धारण वर्ष 1999-2000 या कोर्इ : सुसंगत निर्धारण वर्ष की 30 जून
  पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्ष    

चन्द्रकांत कंदलाल शेठ बनाम भारत संघ [2002] 255 आर्इ.टी.आर. 407/125 टैक्समैन 975 (कल.) वाले मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पैन संख्यांक जारी करने तथा पैन कार्ड परिदत्त करने के प्रयोजन के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम होना चाहिए और इसके लिए आवेदन की तारीख से अधिकतम अवधि के रूप में तीन मास की अवधि बतार्इ।

यह विनिश्चिय अब इस तथ्य को देखते हुए अव्यवहारिक बन गया है कि तारीख 1.7.2003 से पैन के आबंटन से संबंधित प्रक्रिया भागत: आउटसोर्स कर दी गर्इ है और इस रूप में सरल बना दी गर्इ है कि व्यक्ति को सामान्यतया पैन कार्ड के लिए आवेदन करने के एक सप्ताह के भीतर वह कार्ड मिल जाता है।

सर्विस सेंटर के माध्यम से पैन अभिप्राप्त करना

13. तारीख 1.7.2003 से पैन सर्विस सेंटर उन विभिन्न शहरों/नगरों में कार्य कर रहे हैं जहां कि आय-कर कार्यालय स्थित हैं। इन सर्विस सेंटरों को पैन के आबंटन से संबंधित आवेदन प्राप्त करने तथा आवेदकों को पेन कार्ड व्यक्तिगत रूप से परिदत्त करने का कार्य भी सौंपा गया है। इन स्पष्टीकरणों में कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं का वर्णन किया गया है :

• आवेदन करने के पन्द्रह दिन के भीतर पैन कार्ड जारी करने के प्रयास किए जाएंगे।

• पैन डाटा में गलती होने की शिकायतों को दस कार्य दिवसों में दूर किया जाएगा और जहां कहीं अपेक्षित हो वहां नए पैन कार्ड जारी किए जाएंगे।

• जो फोटो लगार्इ जाएगी वह रंगीन फोटो (स्टांप आकार 3.5 सेमी. × 2.5 सेमी.) होगी। फोटो केवल उन आवेदकों की दशा में अनिवार्य होगी जो 'व्यष्टि' हैं।

• यदि आवेदक हस्ताक्षर नहीं कर सकता, तो प्ररूप सं. 49क पर उस स्थान पर जहां हस्ताक्षर किए जाने हों, आवेदक के बाएं हाथ के अंगूठे का निशान लेना चाहिए और उसे किसी मजिस्ट्रेट, नोटेरी पब्लिक या किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित कराना चाहिए तथा उस पर शासकीय मुद्रा और मुहर होनी चाहिए।

• महिला आवेदकों को वैवाहिक प्रस्थिति को विचार में लाए बिना, आवेदन में अपने पिता का नाम लिखना चाहिए।

• टेलीफोन नंबर लिखना आवश्यक नहीं है किन्तु यदि उसका उल्लेख किया जाता है तो इससे शीघ्र संपर्क में सहायता मिल सकती है।

• अनिवासियों, अवयस्क, पागल, जड़, कोर्ट आफ वार्ड तथा ऐसे अन्य व्यक्तियों की दशा में, आवेदन अधिनियम की धारा 160 के अधीन उनके प्रतिनिधिक निर्धारिती द्वारा किया जा सकता है।

• सर्विस सेंटर आवेदकों को प्ररूप सं. 49क को सही रूप से भरने में सहायता प्रदान करेंगे किन्तु किसी अपूर्ण या त्रुटिपूर्ण पैन आवेदन प्राप्त नहीं करेंगे।

• आवेदन करते समय सर्विस सेंटर को प्रति आवेदन 60 रुपए सेवा प्रभार नकद रूप में संदत्त किया जाएगा। इस राशि में टेम्पर-प्रूफ पैन कार्ड की लागत भी है।

• विभाग द्वारा आबंटित सभी पेन ओर पैन कार्ड विधिमान्य बने रहेंगे। उन सभी व्यक्तियों के लिए, जिन्हें पैन आबंटित किया जा चुका है, पुन: आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है।

• विभाग द्वारा जारी किए गए पैन कार्ड को धारण करने वाले व्यक्ति आवेदन में विद्यमान कार्ड के ब्यौरे देते हुए तथा, उसके अतिरिक्त, पुराने पैन कार्ड को अभ्यर्पित करके नए टैम्पर-प्रूफ कार्ड के जारी किए जाने के लिए सर्विस सेंटर को नए सिरे से आवेदन कर सकते हैं।

• सर्विस सेंटर (यू.टी.आर्इ.आर्इ.एस.एल.) आवेदक द्वारा प्ररूप सं. 49क में दिए गए पते पर नए पैन कार्ड का परिदान तथा उसकी अभिस्वीकृति सुनिश्चित करेगा।

धारा 139क/नियम 114ख से 114घ : कतिपय विहित संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेजों में स्थायी खाता संख्यांक कोट करना

कानूनी अपेक्षा

1. प्रत्येक व्यक्ति, धारा 139क(5) के अधीन निम्नलिखित दस्तावेजों में उसे आबंटित स्थायी खाता संख्यांक कोट करेगा :

• किसी आय-कर प्राधिकारी को प्रस्तुत की गर्इ सभी विवरणियां।

• किसी आय-कर प्राधिकारी [अर्थात् केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, आय-कर महानिदेशक, आय-कर मुख्य आयुक्त, आय-कर निदेशक, आय-कर आयुक्त, अपर/उप/संयुक्त निदेशक, सहायक निदेशक/सहायक आय-कर आयुक्त, आय-कर अधिकारी, कर वसूली अधिकारी और आय-कर निरीक्षक] के साथ सभी पत्र व्यवहार।

• अधिनियम के अधीन देय किसी रकम के संदाय के लिए सभी चालान।

• ऐसे संव्यवहारों से संबंधित सभी दस्तावेजें जो, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा राजस्व के हित में विहित किए जाएं और उसके द्वारा किए जाएं। [इस पहलू को पैरा 3 में विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया गया है।] धारा 139(6) में यह उपबंधित है कि ऐसे किसी विहित संव्यवहार से संबंधित कोर्इ दस्तावेज प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह सुनिश्चित करेगा कि स्थायी खाता संख्यांक दस्तावेज में सम्यक रूप से कोट किया गया है।

प्रत्येक व्यक्ति से यह भी अपेक्षित है कि वह निर्धारण अधिकारी को अपने पते में या ऐसे कारबार के नाम और प्रकृति में, जिसके आधार पर उसे स्थायी खाता संख्यांक आबंटित किया गया था, हुए किसी परिवर्तन की सूचना देगा।

नियमों के अधीन अपेक्षाएं

2. तारीख 1 अगस्त, 1998 से यथा-संशोधित अधिनियम की धारा 139क(8) में अन्य बातों के साथ-साथ यह उपबंधित है कि बोर्ड निम्नलिखित पहलुओं के लिए उपबंध करने के लिए नियम बना सकेगा :

• उन संव्यवहारों के प्रवर्ग, जिनके संबंध में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उपर्युक्त संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेजों में स्थायी खाता संख्यांक कोट किया जाना चाहिए।

• ऐसे व्यक्तियों का वर्ग या के वर्ग, जिन्हें उपर्युक्त अपेक्षा लागू नहीं होगी।

• वह प्ररूप और रीति, जिसमें वह व्यक्ति अपनी घोषणा करेगा जिसे स्थायी खाता संख्यांक आबंटित नहीं किया गया है।

• वह रीति, जिसमें उक्त संव्यवहारों में स्थायी खाता संख्यांक कोट किया जाएगा।

• वह समय और रीति, जिसमें उक्त संव्यवहार विहित प्राधिकारी को सूचित किए जाने चाहिए।

नियम 114ख से 114घ में उपर्युक्त पहलू आते हैं और वे 1 नवम्बर, 1998 से प्रभावी हुए। इन नियमों को आय-कर (सत्रहवां संशोधन) नियम, 2004 द्वारा तारीख 1 दिसम्बर, 2004 से संशोधित किया गया, जिससे कि–

(i) 'विहित संव्यवहारों' की परिधि को बढ़ाया जा सके,

(ii) जनरल इंडेक्स रजिस्टर संख्यांक के प्रति निर्देश का लोप किया जा सके, जिसके परिणामस्वरूप तारीख 1 दिसम्बर, 2004 से विहित संव्यवहारों से संबंधित दस्तावेजों में स्थायी खाता संख्यांक (और केवल स्थायी खाता संख्यांक) कोट करना आवश्यक है, और

(iii) यह उपबंध किया जा सके कि ऐसा कोर्इ व्यक्ति, जिसके पास स्थायी खाता संख्यांक नहीं है और जो नियम 114ख में विनिर्दिष्ट कोर्इ संव्यवहार करता है, प्ररूप सं. 60 (यथा-संशोधित) में एक घोषणा करेगा जिसमें ऐसे संव्यवहारों की विशिष्टियां देगा।

विहित संव्यवहार

3. आरंभ में, ऐसे मामलों में, जिनमें संव्यवहार 1.11.1998 या 19.6.2002 को या उसके पश्चात् किए गए थे, स्थायी खाता संख्यांक कोट करने के प्रयोजन के लिए कुछ संव्यवहार विहित किए गए थे। तारीख 1.12.2004 से पांच और संव्यवहार इस प्रयोजन के लिए विहित किए गए हैं। इन संव्यवहारों को आगामी पेराओं में स्पष्ट किया गया है :

3.1 1.11.1998 या 19.6.2002 को या उसके पश्चात् किए गए संव्यवहार–निम्नलिखित संव्यवहार विहित किए जाते हैं।

3.1क. संपत्ति संबंधी व्यवहार–पांच लाख रुपए या उससे अधिक मूल्य की जंगम संपत्ति के विक्रय या क्रय से संबंधित संव्यवहार इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट किए गए हैं। प्रकटत: धनीय सीमा अंतरण संबंधी दस्तावेज़ में दर्शाए गए मूल्य के संबंध में लागू होगी। चूंकि 'विक्रय' और 'क्रय' दोनों इसके अंतर्गत आते हैं, इसलिए विक्रेता और क्रेता दोनों को ही अपना स्थायी लेखा संख्यांक कोट करना चाहिए या प्ररूप सं. 60 में घोषणा फाइल करनी चाहिए।

3.1ख. यान संबंधी संव्यवहार–मोटरयान अधिनियम की धारा 2(28) में यथा-परिभाषित किसी मोटर यान के, जिसका उस अधिनियम के अध्याय 4 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा रजिस्ट्रीकृत किया जाना अपेक्षित है, विक्रय या क्रय से संबंधित सभी संव्यवहार इस प्रयोजन के लिए आगे विनिर्दिष्ट हैं। तथापि, उन दुपहिया यानों के, जिनके अंतर्गत मोटर यान के साथ एक अतिरिक्त पहिए वाली अलग की जा सकने वाली बगली कार भी है, विक्रय या क्रय को इनसे बाहर रखा गया है। अत: स्कूटरों, मोपेडों और इसी प्रकार के अन्य यानों के विक्रय/क्रय को स्थायी लेखा संख्यांक कोट करने की अपेक्षा लागू नहीं होती। यहां भी, चूंकि विक्रय और क्रय दोनों विनिर्दिष्ट हैं, इसलिए विक्रेता और क्रेता दोनों को अपना स्थायी लेखा संख्यांक कोट करना चाहिए या प्ररूप सं. 60 में घोषणा फाइल करनी चाहिए।

3.1ग. बैंकों में सावधिक निक्षेप–किसी बैंक (राष्ट्रीयकृत बैंक, अनुसूचित बैंक, सहकारी बैंक आदि) में कालिक निक्षेप (अर्थात् सावधिक निक्षेप) से संबंधित संव्यवहार आगे विनिर्दिष्ट हैं, यदि प्रत्येक अवसर पर उसमें अंतर्वलित रकम 50,000 रुपए से अधिक है। यदि कर-योग्य आय न रखने वाला कोर्इ अवयस्क ऐसा खाता खोलना चाहता है तो उसे संव्यवहार से संबंधित दस्तावेज में (अर्थात् खाता खोलने के लिए आवेदन), यथास्थिति, अपने पिता या माता या संरक्षक का स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए। यदि माता-पिता या संरक्षक के पास स्थायी खाता संख्यांक नहीं है तो प्ररूप सं. 60 में घोषणा फाइल की जा सकती है। तथापि, यदि पिता के पास स्थायी खाता संख्यांक नहीं है किन्तु माता के पास स्थायी खाता संख्यांक है, तो प्ररूप सं. 60 में घोषणा फाइल नहीं की जा सकती। माता का स्थायी खाता संख्यांक कोट किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में भी यही स्थिति लागू होगी जहां पिता के पास स्थायी खाता संख्यांक है किन्तु माता के पास नहीं है। पिता का स्थायी खाता संख्यांक कोट किया जाना चाहिए।

3.1घ. डाकघरों में निक्षेप–डाकघर बचत बैंक के किसी खाते में 50,000 रुपए से अधिक निक्षेप से संबंधित संव्यवहार आगे विनिर्दिष्ट हैं। 'किसी खाते' शब्दों का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि वह खाता, बचत बैंक खाता या कालिक निक्षेप खाता हो सकता है। तथापि, राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्रों, इन्दिरा विकास पत्रों में किए गए विनिधान इसके अंतर्गत नहीं आते चूंकि वे किसी डाकघर बचत बैंक में किए गए निक्षेप नहीं हैं।

3.1ड़. बैंक खाते खोलना–किसी बैंक (राष्ट्रीयकृत बैंक, अनुसूचित बैंक, सहकारी बैंक आदि) में कोर्इ खाता खोलने से संबंधित संव्यवहार आगे विनिर्दिष्ट हैं। इसमें अनुध्यात खाता, चालू खाता, बचत खाता या ओवरड्राफ्ट खाता हो सकता है; पैरा 3.1ग में निर्दिष्ट कालिक निक्षेप इसके अंतर्गत नहीं आते।

यदि कर-योग्य आय न रखने वाला कोर्इ अवयस्क ऐसा खाता खोलना चाहता है तो उसे संव्यवहार से संबंधित दस्तावेज में (अर्थात् खाता खोलने के लिए आवेदन), यथास्थिति, अपने पिता या माता या संरक्षक का स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए। पैरा 3.1ग में स्पष्ट की गर्इ स्थिति इस मामले में भी लागू होगी।

3.1च. नए टेलीफोन कनेक्शन–टेलीफोन कनेक्शन लगाने के लिए (जिसमें सेल्युलर टेलीफोन कनेक्शन भी शामिल हैं) आवेदन किया जाना आगे विनिर्दिष्ट है।

3.1छ. होटल बिल–अगली मद होटलों और रेस्तराओं को उनके बिलों के भुगतान से संबंधित है यदि एक समय में बिलों की रकम 25,000 रुपए से अधिक हो।

3.1ज. शेयर संव्यवहार–प्रतिभूतियों के विक्रय या क्रय के लिए एक लाख रुपए से अधिक मूल्य की संविदाओं से संबंधित संव्यवहार आगे विनिर्दिष्ट हैं। इस प्रयोजन के लिए, 'प्रतिभूति' पद प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम की धारा 2() में परिभाषित है, जो निम्नलिखित रूप में है :

"प्रतिभूति" के अंतर्गत,–

(i) किसी निगमित कंपनी या अन्य निगमित निकाय में या उसके शेयर, स्क्रिप, स्टाक, बंधपत्र, डिबेंचर, डिबेंचर स्टाक या इसी प्रकार की अन्य विपणन प्रतिभूतियां हैं;

(iक) व्युत्पन्नी हैं;

(iख) किसी ऐसी स्कीमों में विनिधानकर्त्ताओं को किसी सामूहिक विनिधान स्कीम द्वारा जारी यूनिटें या कोर्इ अन्य लिखत हैं;

(iग) वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्संरचना तथा प्रतिभूति ब्याज प्रवर्तन अधिनियम, 2002 की धारा 2 के खंड (यछ) में यथापरिभाषित प्रतिभूति रसीद है;

(ii) सरकारी प्रतिभूतियां हैं;

(iiक) ऐसी अन्य लिखतें हैं जो केंद्रीय सरकार द्वारा प्रतिभूति घोषित की जाएं; और

(iii) प्रतिभूतियों में अधिकार या हित हैं।

3.1झ. बैंकों को नकद भुगतान–निम्नलिखित मदें विहित की जाती हैं–

(i) किसी बैंककारी कंपनी से किसी एक दिन के दौरान कुल मिलाकर पचास हजार रुपए या उससे अधिक रकम के बैंक ड्राफ्ट या संदाय आदेश या बैंकर्स चेक क्रय करने के लिए नकद भुगतान।

(ii) किसी बैंककारी कंपनी में किसी एक दिन के दौरान कुल मिलाकर पचास हजार रुपए या उससे अधिक रकम का नकद निक्षेप।

3.1. विदेश यात्रा के लिए नकद भुगतानकिसी विदेश यात्रा के संबंध में एक समय में 25,000 रुपए से अधिक रकम का नकद भुगतान भी विहित किया गया है। इस प्रयोजन के लिए, 'यात्रा के संबंध में नकद भुगतान' के अंतर्गत किराए के लिए या ट्रेवल एजेण्ट या टूर आपरेटर को या विदेशी करेंसी क्रय करने के लिए किया गया नकद भुगतान भी आता है। 'किसी विदेश यात्रा' पद के अंतर्गत निम्नलिखित देशों में की गर्इ यात्रा नहीं आती :–

() केन्द्रीय हज समिति, मुम्बर्इ द्वारा आयोजित हज तीर्थ स्थान की यात्रा के संबंध में सऊदी अरब;

() विदेश मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित कैलाश मानसरोवर तीर्थ स्थान की यात्रा के संबंध में चीन;

() बंगलादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका।

3.2 1.12.2004 को या उसके पश्चात् किए गए संव्यवहार–आय-कर (सत्रहवां संशोधन) नियम, 2004 द्वारा निम्नलिखित संव्यवहार विहित किए गए है :

3.2क क्रेडिट कार्ड जारी करने के लिए आवेदन–यदि कोर्इ व्यक्ति किसी बैंक या किसी बैंककारी संस्था या किसी अन्य कंपनी या संस्था को क्रेडिट कार्ड जारी करने के लिए आवेदन करता है तो उक्त व्यक्ति को ऐसे क्रेडिट कार्ड के जारी करने के लिए किए गए आवेदन में अपना स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए।

3.2ख पारस्परिक निधियों के यूनिटों का क्रय–यदि कोर्इ व्यक्ति किसी पारस्परिक निधि को पचास हजार रुपए या उससे अधिक रकम के उसके यूनिटों का क्रय करने के लिए आवेदन करता है तो उस व्यक्ति को पारस्परिक निधि को किए गए सुसंगत आवेदन में अपना स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए। [यह उल्लेखनीय है कि यह अपेक्षा केवल यूनिटों में निवेश के लिए लागू होगी न कि किसी अन्य प्रयोजन के लिए किसी पारस्परिक निधि में निवेश के लिए।]

3.2ग कंपनियों में शेयरों का अर्जन–यदि कोर्इ व्यक्ति किसी कंपनी को उसके द्वारा जारी किए गए शेयर अर्जित करने के लिए पचास हजार रुपए या अधिक का संदाय करता है तो उस व्यक्ति को सुसंगत आवेदन में अपना स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए। यह उल्लेखनीय है कि वह संदाय किसी कंपनी को सीधे किया जाना चाहिए और ऐसी आकस्मिकता केवल आरंभिक लोक निर्गमों ओर राइट-शेयरों के निर्गम की बाबत ही उद्भूत होगी। जहां संदाय किसी स्टाक ब्रोकर के माध्यम से और शेयरधारक से शेयर अर्जित करने के लिए किया जाता है वहां यह संव्यवहार इस प्रवर्ग के अंतर्गत नहीं आएगा।

3.2घ डिबेंचर/बंधपत्रों का अर्जन–यदि कोर्इ व्यक्ति किसी कंपनी या किसी संस्था को ऐसी कंपनी या संस्था द्वारा जारी डिबेंचरों या बंधपत्रों को अर्जित करने के लिए पचास हजार रुपए या उससे अधिक का संदाय करता है तो उस व्यक्ति को सुसंगत आवेदन में अपना स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए।

3.2ड़ भारतीय रिजर्व बैंक के बंधपत्रों का अर्जन–यदि कोर्इ व्यक्ति भारतीय रिजर्व बैंक को उक्त बैंक द्वारा जारी किए गए बंधपत्रों को अर्जित करने के लिए पचास हजार रुपए या उससे अधिक का संदाय करता है तो उस व्यक्ति को सुसंगत आवेदन में अपना स्थायी खाता संख्यांक कोट करना चाहिए।

स्थायी खाता संख्यांक न रखने वाले व्यक्तियों द्वारा घोषणा फाइल करना

4. आय-कर (सत्रहवां संशोधन) नियम, 2004 द्वारा यथा प्रतिस्थापित नियम 114ख के दूसरे परन्तुक के अधीन कोर्इ व्यक्ति, जिसके पास कोर्इ स्थायी खाता संख्यांक नहीं है और जो पैरा 3 में स्पष्ट किया गया कोर्इ संव्यवहार करता है, प्ररूप सं. 60 में ऐसे संव्यवहार की विशिष्टियां देते हुए एक घोषणा करेगा। यह अपेक्षा केवल उन व्यक्तियों के संबंध में लागू हो सकती है जिनके लिए स्थायी खाता संख्यांक प्राप्त करना आज्ञापक रूप से अपेक्षित नहीं है। हर हालत में यह परन्तुक इस महत्वपूर्ण तथ्य पर जोर देता है कि पैरा 3 में स्पष्ट किया गया कोर्इ भी संव्यवहार स्थायी खाता संख्यांक कोट किए बिना या प्ररूप सं. 60 में घोषणा फाइल किए बिना नहीं किया जा सकता।

ऐसे व्यक्ति जिनकी कृषि आय है

5. नियम 114ग(1)() के अधीन धारा 139क के उपबंध उन व्यक्तियों के लागू नहीं होंगे जिनकी कृषि आय है और आय-कर से प्रभार्य कोर्इ अन्य आय प्राप्त नहीं करते हैं। अत: ऐसे व्यक्तियों के लिए स्थायी खाता संख्यांक प्राप्त करना आज्ञापक रूप से अपेक्षित नहीं है। तथापित उक्त उपबंध के परन्तुक के अधीन ऐसे व्यक्तियों के लिए पैरा 3 में स्पष्ट किए गए संव्यवहारों की बाबत प्ररूप सं. 61 में घोषणा करना आवश्यक है।

अनिवासी

6. नियम 114ग(1)() के अधीन, अधिनियम की धारा 139क के उपबंध धारा 2(30) में निर्दिष्ट अनिवासियों [अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो 'निवासी' नहीं है] को लागू नहीं होंगे। अत: अनिवासियों के लिए स्थायी खाता संख्यांक प्राप्त करना आज्ञापक रूप से अपेक्षित नहीं है। उन्हें पैरा 3 में स्पष्ट किए गए संव्यवहारों की बाबत कोर्इ घोषणा फाइल करने की भी आवश्यकता नहीं है।

सरकारी संव्यवहार

7. नियम 114ग(1)() के अधीन धारा 139क के उपबंध ऐसे संव्यवहारों को लागू नहीं होंगे जिनमें केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारें और कोंसुलर कार्यालय पाने वाले हैं।

अन्य पक्षकार की जिम्मेदारी

8. नियम 114ग के उपनियम (2) के अधीन ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसने पैरा 3 में स्पष्ट किए गए किसी संव्यवहार [विवरण के लिए पैरा 8.1 देखें] से संबंधित कोर्इ दस्तावेज प्राप्त किया है, यह सुनिश्चित किया जाना अपेक्षित है कि संबंधित दस्तावेज में स्थायी खाता संख्यांक कोट किया गया है और यह सत्यापित करना भी कि स्थायी खाता संख्यांक सही है। सत्यापन के लिए स्थायी खाता संख्यांक की एक फोटो प्रति पर जोर दिया जा सकता है।

8.1 नियम 114ग(2) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति–नियम 114ग(2) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति निम्नलिखित हैं :–

() रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रीकरण अधिकारी;

() पैरा 3.1 में निर्दिष्ट रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी;

() पैरा 3.1ग, 3.1झ और 3.2क में निर्दिष्ट किसी बैंक का कोर्इ प्रबंधक या अधिकारी;

() पोस्टमास्टर;

() शेयर दलाल, उपदलाल, शेयर अंतरण एजेंट, किसी इश्यू का बैंककार, न्यास विलेख का न्यासी, इश्यू का रजिस्ट्रार, मरचेंट बैंककार, अवलेखक, पोर्टफोलियो प्रबंधक, विनिधान सलाहकार और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम की धारा 12 के अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसे कोर्इ अन्य मध्यवर्ती;

() टेलीफोन लगाए जाने के लिए उसके द्वारा आवेदन प्राप्त करने वाला कोर्इ प्राधिकारी या कंपनी;

() पैरा 3.1छ या 3.1ञ में निर्दिष्ट बिल जारी करने वाला कोर्इ व्यक्ति;

() जंगम संपत्ति या मोटर यान का क्रय या विक्रय करने वाला कोर्इ व्यक्ति;

() पैरा 3.2क, 3.2ग और 3.2घ में निर्दिष्ट किसी कंपनी का प्रधान अधिकारी;

(ञ) पैरा 3.2क और 3.2घ में निर्दिष्ट किसी संस्था का प्रघान अधिकारी;

() पैरा 3.2ख में निर्दिष्ट किसी पारस्परिक निधि का न्यासी;

() पैरा 3.2ड़ में निर्दिष्ट भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी।

अन्य पक्षकार द्वारा अनुवर्ती कार्रवार्इ

9. आय-कर (सत्रहवां संशोधन) नियम, 2004 द्वारा यथा-प्रतिस्थापित नियम 114घ के अधीन तारीख 1.12.2004 से पैरा 8.1 में उल्लिखित व्यक्ति उस क्षेत्र पर, जिसमें संव्यवहार किया गया है, क्षेत्रीय अधिकारिता रखने वाले आय-कर आयुक्त (केन्द्रीय आसूचना शाखा) को निम्नलिखित दस्तावेज अग्रेषित करेगा :

(i) पैरा 3.1ड़ में स्पष्ट किए गए बैंक खाता खोलने की बाबत घोषणा की प्रतियों के सिवाय प्ररूप सं. 60 में घोषणा की प्रतियां [पैरा 4 देखें]

(ii) प्ररूप सं. 61 में घोषणा की प्रतियां [पैरा 5 देखें]

इन दस्तावेजों का संप्रेषण निम्नलिखित समय अनुसूची के अनुसार दो किस्तों में किया जाना अपेक्षित है :

वह अवधि जिसके दौरान घोषणा प्राप्त की जाती है संप्रेषण के लिए नियत तारीख
• 1 अप्रैल से 30 सितम्बर तक 31 अक्तूबर
• 1 अक्तूबर से 31 मार्च तक 30 अप्रैल

स्रोत पर कर की कटौती (टीडीएस) और स्रोत पर कर के संग्रहण (टीसीएस) के संव्यवहारों को लागू उपबंध

10. स्रोत पर कर की कटौती (टीडीएस) और स्रोत पर कर के संग्रहण (टीसीएस) की बाबत निम्नलिखित उपबंध किए गए हैं।

10.1 कर कटौतीकर्ता/कर संग्रहणकर्ता को स्थायी लेखा संख्यांक सूचित करना–निम्नलिखित स्थितियों में स्थायी लेखा संख्यांक सूचित करना होगा :

10.1क स्रोत पर कर-कटौती संव्यवहारधारा 139क(5क) के अधीन, ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो ऐसी कोर्इ राशि या आय या रकम प्राप्त करता है जिसमें से अध्याय 17ख [धारा 192 से 196घ] के उपबंधों के अधीन कर की कटौती की गर्इ है, ऐसा कर काटने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को अपने स्थायी खाता संख्यांक की सूचना देगा। तारीख 31.3.2005 तक, धारा 139क(5क) के प्रथम परन्तुक के अधीन यह अपेक्षा ऐसे अनिवासियों के संबंध में लागू नहीं होती थी जो निम्नलिखित शर्तों में से कोर्इ शर्त पूरी करते थे:–

(i) उनकी आय में केवल धारा 115कग(4) में उल्लिखित मदें ही सम्मिलित हैं, अर्थात् () सरकार द्वारा विक्रय किए गए और विदेशी करेंसी में क्रय किए गए अधिसूचित बंधपत्रों या लोक सेक्टर कंपनियों के बंधपत्रों से ब्याज, () ग्लोबल डिपास्टरी प्राप्तियों पर लाभांश, और (), () या () में उल्लिखित मदों के अंतरण पर दीघ्रकालिक पूंजी अभिलाभ;

(ii) धारा 115खखक(2) में निर्दिष्ट अनिवासी खिलाड़ी या खेल संगम;

(iii) ऐसे अनिवासी भारतीय जिनकी केवल धारा 115छ में निर्दिष्ट विनिधान आय या दीर्घकालीन पूंजी अभिलाभ या दोनों हैं।

उपर्युक्त परन्तुक का अब 1.4.2005 से लोप किया गया है।

10.1ख स्रोत पर कर-संग्रहणधारा 139क(5्रग) के अधीन, धारा 206ग में निर्दिष्ट प्रत्येक क्रेता या अनुज्ञप्तिधारी या पट्टेदार उस धारा में निर्दिष्ट विक्रेता को अपना स्थायी खाता संख्यांक सूचित करेगा।

10.2 कर-कटौतीकर्ता द्वारा स्थायी खाता संख्यांक कोट करना–धारा 139क(5ख) के अधीन कर-कटौतीकर्ता से ऐसे व्यक्ति का, जिसे स्रोत पर कर काटने के पश्चात् कोर्इ राशि या आय या रकम संदत्त की गर्इ है, स्थायी लेखा संख्यांक निम्नलिखित दस्तावेजों में कोट करने की अपेक्षा की जाती है :

(i) धारा 192(2ग) के अधीन प्रस्तुत किया गया विवरण।

(ii) धारा 203 के अधीन प्रस्तुत किए गए सभी प्रमाणपत्र।

(iii) धारा 206 के अधीन विभाग को प्रस्तुत किए गए सभी विवरण।

यह उपबंध बैंककारी कंपनियों और सहकारी बैंकों की बाबत 1.4.2002 से और अन्य व्यक्तियों की बाबत 1.6.2001 से प्रभावी होगा।

10.3 अपवादधारा 139क(5ख) के दूसरे परन्तुक के अधीन स्थायी लेखा संख्यांक सूचित करने (पैरा 10.1क) और स्थायी खाता संख्यांक कोट करने (पैरा 10.2) की अपेक्षा ऐसे व्यक्ति की दशा में लागू नहीं होगी जिसकी कुल आय, आय-कर से प्रभार्य नहीं है या जिसके लिए स्थायी खाता संख्यांक प्राप्त करना अपेक्षित नहीं है, यदि ऐसा व्यक्ति कर-कटौतीकर्ता को विहित प्ररूप और रीति में प्ररूप 197क में इस आशय की घोषणा प्रस्तुत करता है कि उस पूर्ववर्ष की, जिसमें उसकी कुल आय की संगणना करने में ऐसी आय सम्मिलित की जानी है, उसकी प्राक्कलित कुल आय पर कर शून्य होगा।

10.4 कर संग्रहणकर्ता द्वारा स्थायी खाता संख्यांक कोट करनाधारा 139क(5घ) के अधीन धारा 206ग के अधीन कर का संग्रहण करने वाला प्रत्येक विक्रेता निम्नलिखित दस्तावेजों में प्रत्येक क्रेता या अनुज्ञप्तिधारी या पट्टेदार का स्थायी खाता संख्यांक कोट करेगा :

(i) धारा 206ग(5ग) के अनुसार प्रस्तुत किए गए सभी प्रमाणपत्र।

(ii) धारा 206ग की उपधारा (5क) या उपधारा (5ख) के अधीन विभाग को प्रस्तुत किए गए सभी विवरण।

धारा 203क/नियम 114क : कर कटौती ओर संग्रहण लेखा संख्यांक

कानूनी पृष्ठभूमि

1. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.10.2004 से यथा-प्रतिस्थापित आय-कर अधिनियम की धारा 203क द्वारा यह अपेक्षित है कि अधिनियम के अध्याय 17 (धारा 192 से 196घ और धारा 206ग) के उपबंधों के अनुसार कर की कटौती या कर का संग्रहण करने वाला प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जिसे कोर्इ कर कटौती लेखा संख्यांक (टी.डी.ए.एन.) या कर संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.सी.ए.एन.) आबंटित नहीं किया गया है, ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, निर्धारण अधिकारी को कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) के आबंटन के लिए आवेदन करेगा। पूर्ववर्ती उपबंधों का, जिनके अधीन स्रोत पर कर की कटौती करने वाले व्यक्तियों को कर कटौती लेखा संख्यांक (टी.डी.ए.एन.) अभिप्राप्त करना होता था और स्रोत पर कर संग्रहण करने वाले व्यक्ति को कर संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.सी.ए.एन.) अभिप्राप्त करना होता था, विलयन कर दिया गया है। तारीख 1.10.2004 से प्रथम बार कर की कटौती या कर का संग्रहण करने वाले व्यक्तियों को केवल कर कटौती ओर संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) अभिप्राप्त करना चाहिए।

आय-कर (बीसवां संशोधन) नियम, 2004 द्वारा तारीख 8.12.2004 से यथा-प्रतिस्थापित नियम 114क इस संबंध में निर्देश अधिकथित करता है।

आवेदन का प्ररूप

2. नियम 114(1) में यह अनुबद्ध है कि कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) के आबंटन के लिए आवेदन प्ररूप सं. 49ख में किया जाएगा। आवेदन दो प्रतियों में किया जाएगा।

आवेदन किसे किया जाना चाहिए

3. नियम 114(2) के अधीन आवेदन निम्नलिखित प्राधिकारियों में से किसी एक को किया जाएगा:

• जहां कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) के आबंटन का कार्य मुख्य आयुक्त/आयुक्त द्वारा किसी विशेष निर्धारण अधिकारी को सौंपा गया है वहां आवेदन उस अभिहित निर्धारण अधिकारी को किया जाना है।

• किसी अन्य दशा में आवेदन आवेदक का निर्धारण करने की अधिकारिता रखने वाले निर्धारण अधिकारी को किया जाना है।

आवेदन करने के लिए समय-सीमा

4. नियम 114क(3) आवेदन करने के लिए निम्न प्रकार से समय-सीमा नियत करता है :

  व्यक्ति-प्रवर्ग   आवेदन फाइल करने के लिए नियत तारीख
() जहां किसी व्यक्ति ने 1.10.2004 से पूर्व कर की कटौती या संग्रहण किया है   31.1.2005 को या उसके पूर्व
() जहां किसी व्यक्ति ने 1.10.2004 को या उसके पश्चात् कर की कटौती की है या करता है या कर का संग्रहण किया है या करता है   उस मास के अंत से जिसमें, यथास्थिति, कर की कटौती की गर्इ थी या संग्रहण किया गया था, एक मास के भीतर या 31.1.2005, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो

टिप्पण : मद () केवल उन व्यक्तियों के संबंध में लागू होगी जिन्हें पुरानी व्यवस्था के अधीन पहले से कर कटौती लेखा संख्यांक (टी.डी.ए.एन.) या कर संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.सी.ए.एन.) आबंटित नहीं किए गए हैं चूंकि धारा 203क द्वारा केवल ऐसे व्यक्तियों से कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) के लिए आवेदन करना अपेक्षित है।

कतिपय दस्तावेजों पर कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) कोट करना

5. धारा 203क(2) के अधीन, जहां किसी व्यक्ति को कोर्इ कर कटौती लेखा संख्यांक (टी.डी.ए.एन.) या कर संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.सी.ए.एन.) या कर कटौती और संग्रहण लेखा संख्यांक (टी.डी.सी.ए.एन.) आबंटित किया गया है, वहां ऐसा व्यक्ति निम्नलिखित दस्तावेजों में ऐसा संख्यांक कोट करेगा :

() धारा 200 या धारा 206ग(3) के अधीन यथा-अपेक्षित सरकारी खाते में किसी कर की कटौती या कर के संग्रहण के संदाय के लिए सभी चालानों में;

() धारा 203 या धारा 206ग(5) के अधीन काटे गए कर या संगृहीत कर के लिए दिए गए सभी प्रमाणपत्रों में। यह उल्लेखनीय है कि 1.4.2005 को या उसके पश्चात् काटे गए/संगृहीत कर की बाबत ये प्रमाणपत्र देने संबंधी अपेक्षा समाप्त कर दी गर्इ है;

() धारा 206, 206ग(5क) या 206ग(5ख) के अनुसार परिदत्त की गर्इ सभी विवरणियां;

() ऐसे संव्यवहारों से संबंधित उन सभी अन्य दस्तावेजों में जो राजस्व के हित में विहित किए जाएं।

यह उल्लेख किया जा सकता है कि इस उपधारा में ही सभी तीनों संख्यांकों (अर्थात्, टी.डी.ए.एन., टी.सी.ए.एन. और टी.डी.सी.ए.एन.) का उल्लेख इस आशय का स्पष्ट संकेत करता है कि उन व्यक्तियों को, जिन्हें पहले टी.डी.ए.एन. या टी.सी.ए.एन. आबंटित किया गया है, विनिर्दिष्ट दस्तावेजों में केवल वही संख्यांक कोट करते रहना चाहिए और यह कि उन पर टी.डी.सी.ए.एन. के आबंटन के लिए नए सिरे से आवेदन करने की कोर्इ बाध्यता नहीं डाली गर्इ है।

धारा 285खक/नियम 114ड़ : वार्षिक सूचना विवरणी

कानूनी पृष्ठभूमि

1. वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 द्वारा 1.4.2005 से यथा-प्रतिस्थापित धारा 285खक कतिपय विनिर्दिष्ट व्यक्तियों पर प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान रजिस्ट्रीकृत या अभिलिखित कतिपय विनिर्दिष्ट संव्यवहारों के ब्यौरे अंतर्विष्ट करते हुए एक वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने की बाध्यता डालती है। प्रथम विवरणी के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2004-05 के ऐसे संव्यवहार आएंगे।

धारा 285खक की स्कीम इस पैरा में कालानुक्रम में संक्षिप्तत: स्पष्ट की गर्इ है।

1.1 वे व्यक्ति, जो वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है–उपधारा (1) निम्नलिखित व्यक्तियों को विहित करती है जिनसे वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है :

• कोर्इ निर्धारिती;

• सरकार के किसी कार्यालय की दशा में विहित व्यक्ति;

• कोर्इ स्थानीय प्राधिकारी या अन्य लोक निकाय या संगम;

• रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 6 के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रार या उप-रजिस्ट्रार;

• मोटर यान अधिनियम, 1988 के अध्याय 4 के अधीन मोटर यानों को रजिस्टर करने के लिए सशक्त रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी;

• भारतीय डाकघर अधिनियम, 1898 की धारा 2 के खंड (ञ) में यथानिर्दिष्ट महाडाकपाल;

• भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 3 के खंड () में निर्दिष्ट कलक्टर;

• प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की धारा 2 के खंड () में निर्दिष्ट मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज;

• भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय बैंक का कोर्इ अधिकारी;

• निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट कोर्इ निक्षेपागार।

उपर्युक्त व्यक्तियों को, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी विनिर्दिष्ट वित्तीय संव्यवहार को रजिस्टर करने या उसकी लेखा बहियां बनाए रखने या उसके अभिलेख से संबंधित दस्तावेजों को रखने के लिए उत्तरदायी है, ऐसे वित्तीय संव्यवहार की बाबत, जो 1.4.2004 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले किसी वित्तीय वर्ष के दौरान उसके द्वारा रजिस्टर किए गए हैं या अभिलेखित किए गए हैं और जिनसे संबंधित जानकारी आय-कर अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सुसंगत और अपेक्षित है, एक वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने का निदेश दिया जाता है यह विवरणी विहित आय-कर प्राधिकारी या ऐसे अन्य प्राधिकारी या अभिकरण को, जो विहित किया जाए, प्रस्तुत की जानी अपेक्षित है। अत: इस उपबंध के अधीन प्रथम विवरणी के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2004-05, अर्थात्, 1.4.2004 से 31.3.2005 के दौरान अभिलिखित विनिर्दिष्ट वित्तीय संव्यवहार आएंगे।

1.2 विवरणी प्रस्तुत करने के लिए नियत तारीख–उपधारा (2) में यह उपबंध है कि वार्षिक सूचना विवरणी सुसंगत वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् विहित समय के भीतर प्रस्तुत की जाएगी। विवरणी ऐसे प्ररूप और रीति में, जो कि विहित की जाए (जिसके अंतर्गत किसी फ्लापी, डिस्कैट, मैग्नेटिक कार्ट्रिज टेप, सीडी-रोम या कम्प्यूटर पठनीय संचार माध्यम भी है) दी जानी अपेक्षित है।

1.3 'विनिर्दिष्ट वित्तीय संव्यवहार' का अर्थ–उपधारा (3) में 'विनिर्दिष्ट वित्तीय संव्यवहार' पद की परिभाषा दी गर्इ है जिससे निम्नलिखित अभिप्रेत है–

() माल या संपत्ति या किसी संपत्ति में अधिकार या हित के क्रय, विक्रय या विनिमय का कोर्इ संव्यवहार; या

() कोर्इ सेवा प्रदान करने के लिए संव्यवहार; या

() किसी संकर्म संविदा के अधीन संव्यवहार; या

() ऐसा संव्यवहार जो किए गए किसी विनिधान या उपगत किसी व्यय के रूप में हो; या

() कोर्इ ऋण लेने या निक्षेप प्राप्त करने संबंधी संव्यवहार,

जो विहित किए जाएं।

1.4 संव्यवहारों के मूल्य की धनीय सीमा–उपधारा (3) के अधीन दो परन्तुक सुसंगत हैं। प्रथम परन्तुक के अधीन बोर्ड (केन्द्रीय प्रत्यक्ष बोर्ड) भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के संबंध में भिन्न-भिन्न संव्यवहारों के लिए ऐसे संव्यवहारों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए भिन्न-भिन्न मूल्य विहित करने के लिए सशक्त है इसका अभिप्राय यह है कि एक ही संव्यवहार की बाबत कतिपय वर्ग के व्यक्तियों के लिए, जब उनकी अन्य वर्गों के व्यक्तियों के लिए विहित धनीय सीमा से तुलना की जाए तो भिन्न-भिन्न धनीय सीमाएं नियत की जा सकती हैं। दूसरे परन्तुक के अधीन, किसी वित्तीय वर्ष के दौरान इस प्रयोजन के लिए विहित मूल्य या कुल मूल्य पचास हजार रुपए से कम नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऐसे किसी वित्तीय संव्यवहार को, जिसका एकल मूल्य पचास हजार रुपए से कम है या जिसका वर्ष के लिए कुल मूल्य पचास हजार रुपए से कम है, वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने की स्कीम से पूर्ण उन्मुक्ति प्रदान की गर्इ है। इससे ऐसे संव्यवहारों के दोनों पक्षकारों को पर्याप्त राहत प्रदान करना बाध्यकर है।

1.5 त्रुटिपूर्ण विवरणियों पर कार्यवाही–उपधारा (4) में विहित आय-कर प्राधिकारी से यह अपेक्षित है कि वह उस व्यक्ति को, जिसने विवरणी प्रस्तुत की है, त्रुटियों की, यदि कोर्इ हों, सूचना दे और उस व्यक्ति को सामान्यत: उस तारीख से, जिसको उस व्यक्ति को त्रुटि की सूचना दी गर्इ है, एक मास की अवधि के भीतर त्रुटि को ठीक करने का अवसर दे। उपधारा द्वारा विहित आय-कर प्राधिकारी में उपयुक्त मामलों में एक मास की उक्त अवधि को बढ़ाने का विवेकाधिकार निहित किया गया है यदि वह व्यक्ति इस प्रकार समय बढ़ाने के लिए आवेदन करता है। तथापि यदि एक मास के भीतर या विहित आय-कर प्राधिकारी द्वारा अनुदत्त बढ़ार्इ गर्इ किसी अवधि के भीतर त्रुटि को ठीक नहीं किया जाता है तो ऐसी विवरणी अविधिमान्य विवरणी मानी जाएगी और शास्तिक उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो ऐसा व्यक्ति वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करने में असफल रहा है।

1.6 विवरणी मांगने की सूचना–उपधारा (5) में उन व्यक्तियों को माफी देने का उपबंध है जो समय के भीतर वार्षिक विवरणी प्रस्तुत करने में असफल रहे हैं यद्यपि उन्हें ऐसा करना चाहिए था। ऐसे मामलों में, यह उपधारा यह उपबंध करती है कि विहित आय-कर प्राधिकारी ऐसे व्यक्ति पर एक सूचना की तामील कर सकेगा जिसमें उससे एक विनिर्दिष्ट तारीख के भीतर जो सूचना की तामील की तारीख से साठ दिन की अवधि से अधिक नहीं होनी चाहिए, ऐसी विवरणी प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाएगी। उदाहरणार्थ, यदि विवरणी की मांग करते हुए सूचना 1.10.2005 को तामील की जाती है तो विहित आय-कर प्राधिकारी ऐसी किसी तारीख तक, जो 30.11.2005 से परे न हो, समय अनुज्ञात कर सकता है। सूचना प्राप्त होने पर वह व्यक्ति सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर वार्षिक सूचना विवरणी प्रस्तुत करेगा। तथापि, यह भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि उपधारा में 'तामील कर सकेगा' अभिव्यक्ति का न कि 'तामील करेगा' अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है। अत: ऐसी सूचना जारी करना पूर्णत: विहित आय-कर प्राधिकारी के विवेकाधिकार के अधीन है और सूचना जारी न करने का बचाव अपचारी व्यक्ति को उपलब्ध नहीं है।

नियम 114ड़ की अंतर्वस्तु

2. धारा 285खक के उपबंधों को प्रभावी करने की शुरूआत करने के लिए पैरा 3 से 9 में प्रगणित मामले नए अंत:स्थापित नियम 114ड़ में विहित किए गए हैं जिन्हें तारीख 1.12.2004 की अधिसूचना सं. का.आ. 1316() के अधीन जारी किए गए आय-कर (सत्रहवां संशोधन) नियम, 2004 के अधीन अधिसूचित किया गया है।

विवरणी का प्ररूप

3. नियम 114ड़(1) के अधीन वार्षिक सूचना विवरणी प्ररूप सं. 651 में प्रस्तुत की जानी अपेक्षित है और उसे उस प्ररूप में उपदर्शित रीति में सत्यापित किया जाएगा।

अधिसूचित वित्तीय संव्यवहार और व्यक्ति

4. नियम 114ड़(2) में की सारणी वे वित्तीय संव्यवहार, उनके धनीय मूल्य और वे व्यक्ति विनिर्दिष्ट किए गए हैं जिन्हें उन संव्यवहारों की बाबत विवरणी प्रस्तुत करनी चाहिए। इन्हें सारणीबद्ध रूप में नीचे दिया गया है :

क्रम सं. संव्यवहार का नाम मूल्य विवरणी फाइल करने के लिए दायी व्यक्ति
1. किसी व्यक्ति के बैंक में रखे गए किसी बचत खाते में किसी वर्ष में जमा निक्षेपों का योग 10 लाख रुपए या उससे अधिक बैंककारी कंपनियां/संस्थाएं
2. किसी व्यक्ति को जारी किए गए क्रेडिट कार्ड की बाबत जारी बिलों के संबंध में उस व्यक्ति द्वारा किसी वर्ष में किए गए भुगतानों का योग 2 लाख रुपए या उससे अधिक बैंककारी कंपनियां या संस्थाएं या क्रेडिट कार्ड जारी करने वाली कोर्इ अन्य कंपनी या संस्था
3. किसी व्यक्ति से किसी पारस्परिक निधि के यूनिट अर्जित करने के लिए प्राप्तियां 2 लाख रुपए या उससे अधिक यूनिट जारी करने वाली पारस्परिक निधि
4. किसी व्यक्ति से बंधपत्र या डिबेंचर अर्जित करने के लिए प्राप्तियां 5 लाख रुपए या उससे अधिक उक्त बंधपत्र या डिबेंचर जारी करने वाली कंपनी या संस्था
5. किसी व्यक्ति से शेयर अर्जित करने के लिए प्राप्तियां 1 लाख रुपए या उससे अधिक उक्त शेयर जारी करने वाली कंपनी
6. किसी व्यक्ति द्वारा जंगम संपत्ति का क्रय या विक्रय 30 लाख रुपए या उससे अधिक विक्रय-विलेख रजिस्टर करने वाला रजिस्ट्रार/उप-रजिस्ट्रार
7. किसी व्यक्ति से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए बंधपत्रों के लिए किसी वर्ष में प्राप्तियों का योग 5 लाख रुपए या उससे अधिक भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत अधिकारी

वह प्राधिकारी जिसे विवरणी प्रस्तुत की जानी है

5. नियम 114ड़(3) के अधीन, विवरणी आय-कर आयुक्त (केन्द्रीय सूचना शाखा) को प्रस्तुत की जानी अपेक्षित है। इस उपनियम के परन्तुक में यह अनुबद्ध है कि जहां केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने आय-कर आयुक्त (केन्द्रीय सूचना शाखा) की ओर से ऐसी विवरणी प्राप्त करने के लिए किसी अभिकरण को प्राधिकृत किया हो वहां यह विवरणी उस अभिकरण को प्रस्तुत की जाएगी। इससे विवरणियों का प्रक्रिया-संबंधी कार्य किसी बाहरी अभिकरण को सौंपने का संकेत मिलता है।

वह माध्यम जिसमें विवरणी प्रस्तुत की जानी है

6. नियम 114ड़(4)(क) में यह अनुबंधित है कि विवरणी, जिसमें उपनियम (1) में निर्दिष्ट प्ररूप सं. 65 का भाग क और भाग ख सम्मिलित है, कम्प्यूटर पठनीय संचार माध्यम से, जो कि फ्लापी (3.5 इंच और 144 एम.बी. क्षमता) या सीडी-रोम (650 एम.बी. या उच्चतर क्षमता) या डिजीटल वीडियो डिस्क (डीवीडी) हो सकती है, प्रस्तुत की जाएगी और इसके साथ उसका भाग क कागज पर भी प्रस्तुत किया जाएगा।

विवरणी प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति पर डाली गर्इ बाध्यता

7. नियम 114ड़(4)() के अधीन, विवरणी प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति यह सुनिश्चित करेगा कि–

(i) यदि विवरणी या कथन से संबंधित डाटा, डाटा संपीड़न (कंपै्रशन) या बैकअप साफ्टवेयर यूटिलिटी का उपयोग करके कापी किया जाता है तो उसके असंपीड़न (डिकंप्रैशन) या प्रत्यावर्तन के लिए तत्स्थानी साफ्टवेयर यूटिलिटी या प्रक्रिया भी कम्प्यूटर संचार माध्यम विवरणी या कथन के साथ प्रस्तुत की जाएगी; और

(ii) विवरणी के साथ डाटा के स्वच्छ और वायरस रहित होने के संबंध में एक प्रमाणपत्र लगाया जाएगा।

विवरणी प्रस्तुत करने की नियत तारीख

8. नियम 114ड़(5) में यह अपेक्षित है कि वार्षिक सूचना रिपोर्ट उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें संव्यवहार रजिस्ट्रीकृत या अभिलिखित किया जाता है, ठीक पश्चात् 31 अगस्त को या उससे पूर्व प्रस्तुत की जाएगी। अत: प्रथम विवरणी, जिसमें 1.4.2004 से 31.3.2005 की अवधि के दौरान किए गए संव्यवहार हो, 31.8.2005 को या उससे पूर्व फाइल की जानी चाहिए।

विवरणी पर हस्ताक्षर कौन करेगा

9. नियम 114ड़(6) के अधीन, विवरणी निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित और सत्यापित की जाएगी:

9.1 जब व्यक्ति एक 'निर्धारिती' है–जहां व्यक्ति आय-कर अधिनियम की धारा 2(7) में यथा-परिभाषित एक 'निर्धारिती' है वहां विवरणी पर उस अधिनियम की धारा 140 में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए।

यह पैरा 4 में दी गर्इ सारणी के क्रम सं. 1, 2, 4 और 5 में निर्दिष्ट बैंककारी कंपनियों, बैंककारी संस्थाओं और कंपनियों को लागू होगा। धारा 140() के अधीन, किसी कंपनी की दशा में विवरणी पर उसके प्रबंध निदेशक द्वारा हस्ताक्षर किए जाने अपेक्षित हैं। तथापि जहां किन्हीं अपरिहार्य कारणों से ऐसा प्रबंध निदेशक विवरणी पर हस्ताक्षर करने या उसका सत्यापन करने में असमर्थ है या जहां कोर्इ प्रबंध निदेशक नहीं है वहां विवरणी पर कंपनी के किसी निदेशक द्वारा हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। जहां कंपनी भारत में निवासी नहीं है वहां विवरणी पर ऐसा व्यक्ति हस्ताक्षर और सत्यापन कर सकेगा जो कंपनी की ओर से ऐसा करने के लिए एक विधिमान्य मुख्तारनामा धारण करता है और ऐसे मुख्तारनामे की एक प्रति विवरणी के साथ अवश्य संलग्न की जानी चाहिए।

9.2 जब व्यक्ति पैरा 9.1 के अधीन नहीं आता–इसके अंतर्गत पैरा 4 में दी गर्इ सारणी के क्रम सं. 3, 6 और 7 आते हैं। उनकी दशाओं में विवरणी निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित और सत्यापित होनी चाहिए :

• पारस्परिक निधियां पारस्परिक निधि का न्यासी या पारस्परिक निधि के कामकाज का प्रबंध करने वाला ऐसा अन्य व्यक्ति जिसे न्यासी द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए।
• जंगम संपत्ति का क्रय/विक्रय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 6 के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रार या उप-रजिस्ट्रार
• भारतीय रिजर्व बैंक के बंधपत्र भारतीय रिजर्व बैंक का ऐसा अधिकारी, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किया गया हो।

अधिसूचित संव्यवहारों की बाबत ध्यान रखी जाने वाली मुख्य बातें

10. कुछ महत्वपूर्ण बातों को जिन्हें पैरा 4 में उल्लिखित संव्यवहारों की बाबत ध्यान में रखा जाना चाहिए, आगामी पैराओं में स्पष्ट किया गया है :

10.1 बैंकों में नकद निक्षेप–दो महत्वपूर्ण बातें जिन्हें आरम्भ में ही ध्यान में रखा जाना चाहिए, ये हैं :

• प्रस्तुत की जाने वाली सूचना खाता-धारक द्वारा नकद किए गए निक्षेपों की बाबत होनी चाहिए। नकद से अन्यथा किए गए निक्षेपों (जैसे चैक, डिमांड ड्राफ्ट और अंतरण समायोजन) को किसी एक वर्ष में दस लाख की धनीय सीमा के लिए हिसाब में नहीं लिया जाना है।

• केवल बचत खातों में किए गए निक्षेपों पर विचार किया जाना है। अन्य खातों जैसे चालू खाता, सावधिक निक्षेप खाता, आवर्ती निक्षेप खाता, आदि में किए गए निक्षेपों को हिसाब में नहीं लिया जाना है।

सामान्यत: () खुदरा दुकानदारों, () दुग्ध विक्रय बूथों, () प्राइवेट टेलीफोन बूथों, () सिनेमाघरों, () होटलों और रेस्टोरेंटों, () शॉपिंग माल्स, () किराना स्टोर्स, () रेलवे आरक्षण केन्द्रों, () रेलवे बुकिंग कार्यालयों (टिकट जारी करने के लिए और माल और पार्सलों के वहन, दोनों के लिए), (ञ) सड़क-मार्ग द्वारा यात्रियों के परिवहन, () आटो रिक्शावालों, () टैक्सी आपरेटरों आदि द्वारा चलाए जा रहे कारबारों में लगभग प्रतिदिन नकद प्राप्तियां होती हैं। ये सभी व्यक्ति दैनिक विक्रय आगामों को, यदि संभव हो तो उसी दिन अथवा अगले दिन अपने-अपने बैंक खाते में जमा कराते हैं। इनमें से अधिकांश केवल बचत खाते में ही धन का निक्षेप करते हैं। यदि इन व्यक्तियों द्वारा किया गया औसत दैनिक निक्षेप 3000 रुपए से अधिक हो जाता है तो एक वर्ष में किए गए नकद निक्षेपों का योग 10 लाख से अधिक हो जाएगा। बैंकों को इन सभी व्यक्तियों की बाबत अपेक्षित सूचना प्रस्तुत करनी होगी।

एक अन्य ध्यान में रखने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि सूचना किसी 'बैंक' में किसी व्यक्ति द्वारा धारित निक्षेपों की बाबत उसी 'बैंक' द्वारा प्रस्तुत की जानी चाहिए। 'किसी बैंक की शाखा' पद का प्रयोग नहीं किया गया है। अत: प्रत्येक बैंक किसी व्यक्ति द्वारा किए गए नकद निक्षेपों के योग का अवधारण करने के प्रयोजन तथा सूचना प्रस्तुत करने के प्रयोजन दोनों के लिए यूनिट है। अत:, यदि किसी व्यक्ति के एक ही बैंक की विभिन्न शाखाओं में एक से अधिक बचत खाते हैं (जो कि संभव तथा अनुज्ञेय है) उस बैंक द्वारा उस व्यक्ति की बाबत सूचना प्रस्तुत की जानी अपेक्षित होगी यदि उस व्यक्ति द्वारा बैंक की विभिन्न शाखाओं में किए गए जमा निक्षेपों का योग उस वर्ष के लिए दस लाख से अधिक हो जाता है भले ही प्रत्येक ऐसी शाखा की बाबत ऐसा योग इस सीमा से अधिक न हो।

10.2 क्रेडिट कार्ड भुगतान–दो लाख रुपए की धनीय सीमा, कंपनी द्वारा जारी किए गए प्रत्येक क्रेडिट कार्ड को लागू होगी। यदि कोर्इ 'एड आन' कार्ड जारी किया गया है तो वह किसी भिन्न नाम से होगा और ऐसे 'एड आन' कार्ड की बाबत बिल भी क्रेडिट कार्ड जारी करने वाली कंपनी द्वारा पृथकत: जारी किए जाएंगे। अत:, ऐसी दशाओं में जहां प्राथमिक क्रेडिट कार्ड और 'एड आन' कार्ड एक ही कंपनी द्वारा जारी किया गया है, वहां सूचना केवल उसी क्रेडिट कार्ड की बाबत प्रस्तुत करनी होगी जिसके द्वारा वर्ष के दौरान दो लाख रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है। इस प्रकार, जहां कोर्इ व्यक्ति विभिन्न कंपनियों/बैंकों द्वारा जारी किए गए एक से अधिक क्रेडिट कार्ड धारण किए हुए हैं, वहां ऐसी कंपनियों/बैंकों द्वारा ही सूचना प्रस्तुत की जानी अपेक्षित होगी जिनकी बाबत उनके द्वारा जारी किए गए क्रेडिट कार्ड द्वारा किए गए भुगतान एक वर्ष के लिए दो लाख रुपए से अधिक हो गए हैं।

10.3 पारस्परिक निधियों में विनिधान–यदि किसी पारस्परिक निधि ने किसी व्यक्ति से उस निधि के यूनिट अर्जित करने के लिए दो लाख रुपए से अधिक प्राप्त किए हैं तो उक्त पारस्परिक निधि से यह अपेक्षित है कि वह वार्षिक सूचना विवरणी में ऐसे व्यक्ति के बारे में सूचना प्रस्तुत करे। यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि–

() 'किसी वर्ष में' शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है और 'प्राप्ति' शब्द का एकवचन में प्रयोग किया गया है। अत: दो लाख रुपए की धनीय सीमा प्रत्येक विनिधान के संबंध में लागू होगी न कि वर्ष के दौरान किए गए विनिधानों के योग के संबंध में लागू होगी। यदि कोर्इ व्यक्ति, मान लीजिए एक ही पारस्परिक निधि में वर्ष के दौरान तीन भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रत्येक बार 1.90 लाख रुपए का विनिधान करता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह पारस्परिक विधि वार्षिक सूचना विवरणी में ऐसे व्यक्ति की बाबत सूचना प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं है।

() रकम की प्राप्ति 'यूनिट अर्जित करने' के लिए होनी चाहिए न कि किसी अन्य प्रयोजन के लिए।

10.4 बंधपत्र और डिबेंचर जारी करना–यदि किसी कंपनी या संस्था ने, किसी व्यक्ति से, उस कंपनी/संस्था द्वारा जारी किए गए बंधपत्र और डिबेंचर अर्जित करने के लिए, पांच लाख रुपए या अधिक राशि प्राप्त की है तो उक्त कंपनी/संस्था द्वारा वार्षिक सूचना विवरणी में उस संव्यवहार की बाबत सूचना प्रस्तुत की जानी अपेक्षित होगी। बंधपत्र और डिबेंचर जारी करना आकस्मिक विशेषता है न कि 'ओपन एंडिड', जैसा कि यूनिटों की दशा में होता है। संभवत: इसी कारण 'किसी वर्ण में' शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है और यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पांच लाख रुपए की धनीय सीमा लागू करने के लिए एक ही व्यक्ति से वर्ष के दौरान कुल प्राप्तियों पर विचार किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्राप्ति पर पृथकत: विचार किया जाना चाहिए और यदि यह पांच लाख रुपए से कम है तो ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ऐसी किसी प्राप्ति की बाबत सूचना प्रस्तुत करने का प्रश्न उद्भूत होता है।

10.5 शेयर जारी करना–यदि किसी कंपनी ने किसी व्यक्ति से, उस कंपनी द्वारा जारी किए गए पब्लिक या अधिकारित निर्गम के माध्यम से शेयर अर्जित करने के लिए एक लाख रुपए या उससे अधिक राशि प्राप्त की है तो उक्त कंपनी द्वारा वार्षिक सूचना विवरणी में ऐसे किसी संव्यवहार की बाबत सूचना प्रस्तुत की जानी अपेक्षित होगी। पब्लिक निर्गम और अधिकाराश्रित निर्गम सामान्यत: एक बार किए जाते हैं (उसी वर्ष के दौरान भी) और इसलिए 'किसी वर्ष में' पद का प्रयोग नहीं किया गया है। अत: एक लाख रुपए की धनीय सीमा केवल प्रत्येक प्राप्ति के संबंध में लागू होगी। (पैरा 10.4 भी देखिए)

10.6 जंगम संपत्ति का क्रय/विक्रय–रजिस्ट्रार या उप-रजिस्ट्रार अर्थात् रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा ऐसे मामलों को रिपोर्ट करना होगा जिनमें 30 लाख रुपए या उससे अधिक मूल्य की जंगम सम्पत्तियों का क्रय या विक्रय किया जाता है। चूंकि सूचना रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा प्रस्तुत की जानी अपेक्षित है इसलिए रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 में दी गर्इ 'स्थावर संपत्ति' की परिभाषा सुसंगत होगी। अधिनियम की धारा 2(6) के अधीन 'स्थावर संपत्ति' के अंतर्गत भूमि, निर्माण आनुवंशिक भत्ते, मार्ग के प्रकाश के, पारघाट के, मीनक्षेत्र के, अधिकार या भूमि से उद्भूत होने वाले कोर्इ भी अन्य फायदे और भू-बद्ध वस्तुएं या भू-बद्ध किसी भी वस्तु के स्थायी रूप से जकड़ी वस्तुएं आती हैं किन्तु खड़ा काष्ठ, उगती फसलें और घास इसके अंतर्गत नहीं आती। तीस लाख रुपए की धनीय सीमा रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा अंगीकृत मूल्य को लागू होगी।

10.7 भारतीय रिजर्व बैंक के बंधपत्र–यदि भारतीय रिजर्व बैंक ने किसी व्यक्ति से किसी वर्ष में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निकाले गए बंधपत्र जारी करने के लिए पांच लाख रुपए या उससे अधिक राशि प्राप्त की हो तो वार्षिक सूचना विवरणी में ऐसे संव्यवहारों की बाबत सूचना प्रस्तुत की जानी अपेक्षित होगी। धनीय सीमा किसी व्यक्ति से वर्ष के दौरान प्राप्त रकमों के योग को लागू होती है न कि प्रत्येक एकल प्राप्ति को लागू होती है। इस प्रकार, यदि किसी व्यक्ति ने भारतीय रिजर्व बैंक के बंधपत्र जारी करने के लिए वर्ष के दौरान पांच अवसरों पर प्रत्येक बार एक लाख रुपए का अंशदान किया है तो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वार्षिक सूचना विवरणी में उस व्यक्ति की बाबत सूचना प्रस्तुत की जानी चाहिए।

 

*तारीख 1.8.1997 से।

*तारीख 1.8.1997 से।

**तारीख 1.5.1999 से।

तारीख 1.8.1997 से।

तारीख 1.8.1997 से।

तारीख 24.4.2000 से।

$तारीख 1.5.1999 से।

£तारीख 29.2.2000 से।

1. प्ररूप सं. 66 के रूप में पुनर्संख्यांकित करने की अपेक्षा है।

 

 

[वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा संशोधित रूप में]

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