परिशिष्ट एक
परिशिष्ट एक
आय-कर अधिनियम में उल्लिखित सम्बद्ध अधिनियमों के शेष उपबंधों का पाठ
बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5(ग)
निर्वचन
5. इस अधिनियम में जब तक कि विषय या संदर्भ में कोर्इ बात विरुद्ध न हो,–
| ** | ** | ** |
(ग) " बैंककारी कंपनी" से कोर्इ ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जो भारत में बैंककारी कारबार करती है।
स्पष्टीकरण.–जो कोर्इ कंपनी माल के विनिर्माण में लगी हुर्इ है या कोर्इ व्यापार करती है तथा ऐसे विनिर्माता या व्यापारी के रूप में अपने कारबार का वित्तपोषण करने के प्रयोजन से ही जनता से धन के निक्षेप स्वीकार करती है, उसकी बाबत यह न समझा जाएगा कि वह इस खंड के अर्थ में बैंककारी कारबार करती है।
बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 45
किसी बैंककारी कंपनी द्वारा कारबार के निलंबन के लिए तथा पुनर्गठन या समामेलन की स्कीम तैयार करने के लिए केंद्रीय सरकार से आवेदन करने की रिज़र्व बैंक की शक्ति
45. (1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि, या किसी करार, या अन्य लिखत में किसी बात के होते हुये भी रिज़र्व बैंक किसी बैंककारी कंपनी की बाबत अधिस्थगन आदेश देने के लिए केंद्रीय सरकार को उस दशा में आवेदन कर सकेगा जब रिज़र्व बैंक को यह प्रतीत होता है कि ऐसा करने के लिए अच्छा कारण है।
(2) रिज़र्व बैंक द्वारा उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन पर विचार करने के पश्चात् केंद्रीय सरकार, कंपनी के विरुद्ध सब कार्यों और कार्यवाहियों का प्रारंभ किया जाना या चालू रखा जाना, किसी नियत अवधि के लिए ऐसे निबंधनों और शर्तों पर रोकने का आदेश दे सकेगी जो वह ठीक और समुचित समझे तथा उस अवधि को समय-समय पर बढ़ा सकेगी किन्तु इस प्रकार कि अधिस्थगन की कुल अवधि छह मास से अधिक न हो।
(3) उपधारा (2) के अधीन या तत्पश्चात् किसी समय केंद्रीय सरकार द्वारा दिए गए आदेश में उसके द्वारा दिए गए किन्हीं निदेशों द्वारा जैसा अन्यथा उपबन्धित हो उसके सिवाय बैंककारी कंपनी अधिस्थगन की अवधि के दौरान न तो किन्हीं निक्षेपकर्ताओं को कोर्इ संदाय करेगी और न उन दायित्वों या बाध्यताओं का उन्मोचन करेगी जो उसकी किन्हीं अन्य लेनदारों के प्रति हैं।
(4) यदि अधिस्थगन की अवधि के दौरान रिज़र्व बैंक का समाधान हो जाता है कि–
(क) लोक हित में; अथवा
(ख) निक्षेपकर्ताओं के हितों में; अथवा
(ग) बैंककारी कंपनी का समुचित प्रबंध सुनिश्चित करने के उद्देश्य से; अथवा
(घ) संपूर्ण देश की बैंककारी प्रणाली के हित में;
यह आवश्यक है कि–
(i) बैंककारी कंपनी का पुनर्गठन किया जाए; अथवा
(ii) बैंककारी कंपनी का किसी अन्य बैंककारी संस्था के साथ (जिसे इस धारा में "अंतरिती बैंक" कहा गया है) समामेलन किया जाए,
तो रिज़र्व बैंक उसके लिए एक स्कीम तैयार कर सकेगा।]
(5) पूर्वोक्त स्कीम में निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध हो सकेंगे, अर्थात्:–
(क) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर उसका अथवा, यथास्थिति, अन्तरिती बैंक का गठन, नाम और रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, पूंजी, आस्तियां, शक्तियां, अधिकार, हित, प्राधिकार और विशेषाधिकार, दायित्व, कर्त्तव्य और बाध्यताएं;
(ख) बैंककारी कंपनी के समामेलन की दशा में उस बैंककारी कंपनी के कारबार, उसकी सम्पत्तियों, आस्तियों और उसके दायित्वों का अंतरिती बैंक को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर अन्तरण जो उस स्कीम में विनिर्दिष्ट हों;
(ग) बैंककारी कंपनी के पुनगर्ठन पर उसके या, यथास्थिति, अंतरिती बैंक के निदेशक बोर्ड में कोर्इ तब्दीली या नए निदेशक बोर्ड की नियुक्ति तथा वह प्राधिकारी जिस द्वारा, वह रीति, जिससे, तथा वे अन्य निबंधन और शर्तें, जिस पर ऐसी तब्दीली या नियुक्ति की जाएगी तथा नए बोर्ड या किसी निदेशक की नियुक्ति की दशा में वह अवधि जिसके लिए ऐसी नियुक्ति की जाएगी;
(घ) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर उसके या, यथास्थिति, अंतरिती बैंक के संगम-ज्ञापन और संगम-अनुच्छेदों में इस प्रयोजन से कि उसकी पूंजी परिवर्तित की जाए या ऐसे अन्य प्रयोजनों से, जिसे पुनर्गठन या समामेलन को Ûियान्वित करने के लिए आवश्यक हों, परिवर्तन;
(ड़) स्कीम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर उसके अथवा, यथास्थिति, अंतरिती बैंक के द्वारा या विरुद्ध ऐसे किन्हीं कार्यों या कार्यवाहियों का चालू रखा जाना जो अधिस्थगन के आदेश की तारीख से ठीक पहले बैंककारी कंपनी के विरुद्ध लंबित है;
(च) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व उसमें या उसके विरुद्ध सदस्यों, निक्षेपकर्ताओं तथा अन्य लेनदारों के जो हित या अधिकार हैं उनका उस सीमा तक कम किया जाना जिस तक कम करना रिज़र्व बैंक लोकहित में, या सदस्यों, निक्षेपकर्त्ताओं और अन्य लेनदारों के हित में, अथवा, बैंककारी कंपनी के कारबार को बनाए रखने के लिए, आवश्यक समझे;
(छ) निक्षेपकर्त्ताओं और अन्य लेनदारों को–
(i) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व उसमें या उसके विरुद्ध उनके हित या अधिकारों के बारे में, अथवा
(ii) उस दशा में, जिसमें बैंककारी कंपनी में या उसके विरुद्ध उनके पूर्वोक्त हित या अधिकार खंड (च) के अधीन कम कर दिए गए हैं, ऐसे कम किए गए हित या अधिकारों के बारे में,
उनके दावों की पूर्ण तुष्टि में नकद या अन्यथा संदाय;
(ज) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व उसमें जो शेयर सदस्यों द्वारा धारित किए हुए थे चाहे उन शेयरों में उनका हित खंड (च) के अधीन कम कर दिया गया है या नहीं, उनके लिए उनको बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर उसमें अथवा, यथास्थिति, अंतरिती बैंक में शेयरों का आबंटन तथा जहां कोर्इ सदस्य संदाय का न कि शेयरों में आबंटन का दावा करते हैं या जहां किन्हीं सदस्यों को शेयर आबंटित करना संभव नहीं है वहां उन सदस्यों को–
(i) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व उनके शेयरों में उनके हित के बारे में; अथवा
(ii) उस दशा में, जिसमें ऐसा हित खंड (च) के अधीन कम कर दिया गया है, शेयरों में ऐसे कम किए गए उनके हित के बारे में,
उनके दावों की पूर्ण तुष्टि में नकद संदाय;
(झ) बैंककारी कंपनी के जो कर्मचारी, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार न होते हुए, स्कीम में विनिर्दिष्टत: उल्लिखित हैं उनको छोड़कर, सब कर्मचारियों की सेवाओं का, यथास्थिति, बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर स्वयं उसमें अथवा अंतरिती बैंक में, उसी पारिश्रमिक पर, तथा सेवा संबंधी उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर बना रहना जो अधिस्थगन आदेश की तारीख से ठीक पहले, यथास्थिति, उनको मिलता था या जो उन पर लागू थीं :
परंतु स्कीम में एक उपबंध यह होगा कि–
(i) बैंककारी कंपनी उक्त कर्मचारियों को उस तारीख से, जिसको वह स्कीम केंद्रीय सरकार द्वारा मंजूर की जाती है, तीन वर्ष की अवधि के अवसान के पहले-पहले वही पारिश्रमिक दे देगी और सेवा के वैसे ही निबंधन और शर्तें मंजूर कर देगी, जो किसी सदृश बैंककारी कंपनी की तत्समान पंक्ति या दर्जे के कर्मचारियों के संबंध में ऐसे संदाय या मंजूरी के समय लागू होते हैं जिस सदृश बैंककारी कंपनी का उस प्रयोजन के लिए अवधारण रिजर्व बैंक द्वारा किया जाएगा (जिसका इस बारे में अवधारण अन्तिम होगा);
(ii) अंतरिती बैंक उक्त कर्मचारियों को तीन वर्ष की पूर्वोक्त अवधि के अवसान के पहले-पहले वही पारिश्रमिक दे देगी और सेवा के वे ही निबंधन और शर्तें मंजूर कर देगी जो अंतरिती बैंक के तत्समान पंक्ति या दर्जे के अन्य कर्मचारियों के संबंध में ऐसे संदाय या मंजूरी के समय लागू होते हैं किंतु इस बात के अधीन रहते हुए कि उक्त कर्मचारियों की अर्हताएं और अनुभव अंतरिती बैंक के ऐसे अन्य कर्मचारियों के जैसा हो या उसके समतुल्य हो :
परंतु यह और कि यदि प्रथम परंतुक के खंड (ii) के अधीन किसी मामले में इस बाबत कोर्इ शंका या मतभेद पैदा होता है कि उक्त कर्मचारियों में से किन्हीं की अर्हताएं और अनुभव अंतरिती बैंक के तत्समान पंक्ति या दर्जे के अन्य कर्मचारियों की अर्हताओं और अनुभव के जैेसे ही या उसके समतुल्य है या नहीं तो वह शंका या मतभेद, उस खंड में उल्लिखित संदाय या मंजूरी की तारीख से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पूर्व रिजर्व बैंक को निर्दिष्ट किया जाएगा उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा;
(ञ) खंड (झ) में किसी बात के होते हुए भी जहां बैंककारी कंपनी के कर्मचारियों में से कोर्इ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अर्थ में कर्मकार न होते हुए खंड (झ) के अधीन स्कीम में विनिर्दिष्टत: उल्लिखित हैं अथवा जहां बैंककारी कंपनी के किन्हीं कर्मचारियों ने उस तारीख से, जिसको वह स्कीम केंद्रीय सरकार द्वारा मंजूर की गर्इ है, ठीक आगामी एक मास के अवसान के पूर्व किसी भी समय, यथास्थिति, बैंककारी कंपनी या अंतरिती बैंक को लिखित सूचना द्वारा अपने इस आशय से अवगत करा दिया है कि वे बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन पर उसके या, यथास्थिति, अंतरिती बैंक के कर्मचारी नहीं बनना चाहते हैं वहां यदि ऐसे कर्मचारी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन किसी प्रतिकर के हकदार हैं तो उन्हें उस प्रतिकर का, यदि कुछ हो, तथा ऐसी पेंशन, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य निवृत्ति फायदे का संदाय जो मामूली तौर पर उन्हें अधिस्थगन की तारीख से ठीक पहले बैंककारी कंपनी के नियमों या प्राधिकरणों के अधीन अनुज्ञेय थे;
(ट) बैंककारी कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के लिए कोर्इ अन्य निबंधन और शर्तें;
(ठ) ऐसी आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक बातें जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि पुनर्गठन पर समामेलन पूर्ण और प्रभावी रूप से कर दिया जाएगा।
(6)(क) रिजर्व बैंक द्वारा तैयार की गर्इ स्कीम की एक प्रति प्रारूप के तौर पर उस बैंककारी कंपनी को या अंतरिती बैंक और किसी अन्य बैंककारी कंपनी को भी, जो समामेलन से संबंधित हो, भेजी जाएगी जिससे वे यानी अवधि के अंदर, जितनी रिजर्व बैंक इस प्रयोजन के लिए विनिर्दिष्ट करे अपने सुझाव और आक्षेप, यदि कोर्इ हो, प्रस्तुत कर सकें;
(ख) रिजर्व बैंक स्कीम के प्रारूप में ऐसे परिवर्तन, यदि कोर्इ हो, कर सकेगा जो वह उस बैंककारी कंपनी में तथा अंतरिती बैंक और किसी अन्य बैंककारी कंपनी से भी जो समामेलन से संबंधित हो और उन कंपनियों में? के तथा अंतरिती बैंक के किन्हीं सदस्यों, निक्षेपकर्ताओं या अन्य लेनदारों से प्राप्त सुझावों तथा आक्षेपों को देखते हुए आवश्यक समझे।
(7) तत्पश्चात् वह स्कीम केंद्रीय सरकार की मंजूरी के लिए उसके समक्ष रखी जाएगी तथा केंद्रीय सरकार कोर्इ परिवर्तन किए बिना या ऐसे परिवर्तन करके, जैसे वह आवश्यक समझे, उस स्कीम को मंजूर कर सकेगी तथा केंद्रीय सरकार द्वारा मंजूर रूप में वह स्कीम उस तारीख को प्रवृत होगी जिसे केंद्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे :
परंतु स्कीम के विभिé उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी।
(7क) केंद्रीय सरकार द्वारा उपधारा (7) के अधीन चाहे बैंककारी विधि (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1963 (1963 का 55) की धारा 21 के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् दी गर्इ मंजूरी उस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि इस धारा की, यथास्थिति, पुनर्गठन या समामेलन संबंधी सभी अपेक्षाओं की पूर्ति कर दी गर्इ है, तथा मंजूर की गर्इ स्कीम की ऐसी प्रति, जिसका ऐसी स्कीम की सही प्रति होना केंद्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा लिखित रूप में प्रमाणित किया गया है सब विधिक कार्यवाहियों में (चाहे वे अपील में या अन्यथा और चाहे उक्त धारा 21 के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् संस्थित की गर्इ हों) साक्ष्य में उसी सीमा तक ग्रहण की जाएगी जिस तक मूल स्कीम।
(8) स्कीम या उसके किसी उपबंध के प्रवृत्त होने की तारीख से उक्त स्कीम या ऐसा उपबंध, यथास्थिति, बैंककारी कंपनी का अंतरिती बैंक और समामेलन के संबंधित किसी अन्य बैंककारी कम्पनी पर और उन कम्पनियों में से प्रत्येक के तथा अंतरिती बैंक के सब सदस्यों, निक्षेपकर्ताओं और अन्य लेनदार तथा कर्मचारियों पर तथा ऐसे किसी अन्य व्यक्ति पर भी आबद्धकर होगा जिसके उन कंपनियों में से किसी के तथा अंतरिती बैंक के संबंध में कोर्इ अधिकार या दायित्व है और जिसके अंतर्गत ऐसा न्यासी या अन्य व्यक्ति है, जो उन कंपनियों में से किसी के द्वारा या अंतरिती बैंक द्वारा रखी गर्इ भविष्य निधि या किसी अन्य निधि का प्रबंध कर रहे हैं या उससे संबंद्व हैं।
(9) यथास्थिति, स्कीम के प्रवृत्त होने की तारीख या उसमें इस निमित विनिर्दिष्ट तारीख से ही अंतरिती बैंक को बैंककारी कंपनी की संपत्ति और आस्तियां उस स्कीम के आधार से और उसमें उपबंधित सीमा तक अंतरित हो जाएंगी और उसमें निहित हो जाएंगी तथा बैंककारी कंपनी के दायित्व उस स्कीम के आधार से और उसमें उपबंधित सीमा तक अंतरिती बैंक को अंतरित हो जाएंगे और उसके दायित्व हो जाएंगे।
(10) यदि स्कीम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोर्इ कठिनार्इ पैदा होती है तो केन्द्रीय सरकार ऐसे उपबंधों से असंगत न होने वाली ऐसी कोर्इ बात आदेश द्वारा कर सकेगी जो उस कठिनार्इ को दूर करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होती है।
(11) स्कीम की अथवा उपधारा (10) के अधीन दिए गए किसी आदेश की प्रतियां केंद्रीय सरकार द्वारा, यथास्थिति, उस स्कीम के मंजूर किए जाने के या, उस आदेश के दिए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएंगी।
(12) जहां स्कीम बैंककारी कंपनी के समामेलन के लिए स्कीम है, वहां अंतरिती बैंक ने उस स्कीम या उसके किसी उपबंध के अधीन जो कोर्इ कारबार अर्जित किया है वह, उस स्कीम या ऐसे उपबंध के प्रवर्तन में आने के पश्चात् अंतरिती बैंक द्वारा उस विधि के अनुसार, जो अंतरिती बैंक पर लागू होती है उस विधि में ऐसे परिवर्तनों के अथवा अंतरिती बैंक को उसके किन्हीं उपबन्धों के प्रवर्तन से ऐसी छूटों के अधीन रह कर चलाया जाएगा जैसी रिज़र्व बैंक की सिफारिश पर केंद्रीय सरकार उस स्कीम को पूर्णत: प्रभावी करने के प्रयोजन से राजपत्र में अधिसूचना द्वारा करे या दे :
परंतु ऐसा कोर्इ भी परिवर्तन इस प्रकार न किया जाएगा या ऐसी कोर्इ भी छूट इस प्रकार न दी जाएगी कि वह ऐसे कारबार के अर्जन की तारीख से सात वर्ष से अधिक के लिए प्रभावी हो ।
(13) इस धारा की कोर्इ बात ऐसी अनेक कंपनियों का, जिनमें से प्रत्येक के संबंध में इस धारा के अधीन आल्वगन आदेश दिया गया है, किसी एक स्कीम द्वारा किसी बैंककारी संस्था के साथ समामेलन रोकने वाली नहीं समझी जाएगी।
(14) इस धारा के और इसके अधीन बनार्इ गर्इ किसी स्कीम के उपबंध, इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में अथवा उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी करार, अधिनिर्णय या अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।
(15) इस धारा में "बैंककारी संस्था" से कोर्इ बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है तथा इसके अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक अथवा कोर्इ समनुषंगी बैंक या तत्स्थायी नया बैंक है।
स्पष्टीकरण.–इस धारा में किसी कर्मचारी को लागू होने वाले सेवा के निबंधनों और शर्तों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि उनका विस्तार ऐसे कर्मचारी की पंक्ति और प्रास्थिति पर भी है।
छावनी अधिनियम, 1924 की धारा 3
छावनियों की परिभाषा
3. (1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे किसी स्थान या स्थानों को, जिसमें या जिनमें बलों का कोर्इ भाग आवासित है, अथवा जो ऐसे किसी स्थान या स्थानों के सन्निकट होते हुए ऐसे बलों की सेवा के लिए अपेक्षित है या हैं, इस अधिनियम तथा अन्य सब तत्समय प्रवृत्त अधिनियमितियों के प्रयोजनों के लिए छावनी घोषित कर सकेगी, तथा वैसी ही अधिसूचना द्वारा किसी छावनी की बाबत यह घोषित कर सकेगी कि वह छावनी नहीं रही है।
(2) केन्द्रीय सरकार सदृश अधिसूचना द्वारा किसी छावनी की सीमाएं पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए परिनिश्चित कर सकेगी।
(3) जब कोर्इ स्थान पहली बार छावनी घोषित किया जाता है तब केन्द्रीय सरकार तब तक के लिए, जब तक इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता, आदेश द्वारा ऐसा कोर्इ उपबन्ध कर सकेगी जो या तो छावनी के प्रशासन के लिए या बोर्ड के गठन के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।
(4) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि जो स्थान उपधारा (1) के अधीन छावनी घोषित किया गया है उसमें स्थानीय स्वायत्त शासन सम्बन्धी किसी ऐसी अधिनियमिति के उपबन्ध, जो इस अधिनियम से भिन्न हैं इतने विस्तार तक ही अथवा ऐसे उपान्तरों के किए जाने पर ही प्रभावी होंगे अथवा किसी ऐसी अधिनियमिति के अधीन गठित कोर्इ प्राधिकरण ऐसे विस्तार तक ही प्राधिकार का उपयोग करेगा जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया गया हो।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(13) ''निदेशक'' के अंतर्गत ऐसा कोर्इ व्यक्ति आता है, जो निदेशक के पद का अधिभोग कर रहा है भले ही वह किसी नाम से ज्ञात हो;
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(24) ''प्रबंधक'' से (प्रबंध अभिकर्ता से भिन्न) वह व्यष्टि अभिप्रेत है, जो किसी कंपनी के सम्पूर्ण कार्यकलाप का या सारत: सम्पूर्ण कार्यकलाप का प्रबंध निदेशक बोर्ड के अधीक्षण, नियंत्रण तथा निदेश के अधीन रहते हुए करता है तथा इसके अंतर्गत निदेशक या ऐसा अन्य कोर्इ व्यक्ति आता है, जो प्रबंधक के पद का अधिभोग कर रहा है चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो और चाहे वह सेवा संविदा पर हो या न हो;
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कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3
''कंपनी'', ''विद्यमान कंपनी'', ''प्राइवेट कंपनी'' तथा ''पब्लिक कंपनी'' की परिभाषाएं
3. (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए ''कंपनी'', ''विद्यमान कंपनी'', ''प्राइवेट कंपनी'' तथा ''पब्लिक कंपनी'' पदों के वही अर्थ होंगे, जो नीचे विनिर्दिष्ट हैं :–
(i) ''कंपनी'' से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है, जो इस अधिनियम के अधीन बनार्इ गर्इ या रजिस्ट्रीकृत की गर्इ है या जो खंड (ii) में परिभाषित विद्यमान कंपनी है,
(ii) ''विद्यमान कंपनी'' से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जो नीचे विनिर्दिष्ट पूर्ववर्ती कंपनी विधियों में से किसी के अधीन बनार्इ तथा रजिस्ट्रीकृत की गर्इ थी :–
(क) कंपनियों से संबंधित ऐसा कोर्इ अधिनियम या ऐसे कोर्इ अधिनियम जो इंडियन कंपनीज़ ऐक्ट, 1866 (1866 का 10) के पूर्व प्रवृत्त थे तथा जो उस ऐक्ट द्वारा निरसित कर दिए गए;
(ख) इंडियन कंपनीज़ ऐक्ट, 1866 (1866 का 10);
(ग) इंडियन कंपनीज़ ऐक्ट, 1882 (1882 का 6);
(घ) इंडियन कंपनीज़ ऐक्ट, 1913 (1913 का 7);
(ड़) रजिस्ट्रेशन ऑफ ट्रांसफर्ड कंपनीज़ आर्डिनेन्स, 1942 (1942 का 54); तथा
(च) पूर्वोक्त किसी भी ऐक्ट या आर्डिनेन्स की तत्स्थानी कोर्इ भी विधि, जो–
(1) विलयित राज्यक्षेत्रों में या (जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय) भाग ख राज्यों में या उनके किसी भाग में उस समय से पूर्व प्रवृत्त थी जब इंडियन कंपनीज़ ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) का विस्तार उन पर किया गया था; अथवा
(2) बैंककारी, बीमा तथा वित्तीय निगमों का जहां तक संबंध है, जम्मू-कश्मीर (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1956 के प्रारम्भ होने से पूर्व, तथा जहां तक अन्य निगमों का संबंध है, केन्द्रीय विधि (जम्मू-कश्मीर पर विस्तारण) अधिनियम, 1968 के प्रारम्भ होने से पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त थी; और
(छ) पोर्तुगीज कमर्शियल कोड, जहां तक उसका संबंध "सोसियेडेड्स अनोनिमस" से है;
(iii) ''प्राइवेट कंपनी'' से वह कंपनी अभिप्रेत है जिसकी कम से कम एक लाख रुपए की समादत्त पूंजी है या ऐसी उच्चतर समादत्त पूंजी है, जो विहित की जाए, और जो अपने अनुच्छेदों द्वारा–
(क) अपने अंशों (शेयरों) को, यदि कोर्इ हों, अन्तरित करने का अधिकार निर्बन्धित करती है;
(ख) अपने सदस्यों की संख्या पचास तक परिसीमित रखती है, जिस संख्या के अंतर्गत–
(i) वे व्यक्ति नहीं आते हैं जो कंपनी के नियोजन में हैं; तथा
(ii) वे व्यक्ति नहीं आते हैं जो कंपनी के नियोजन में पहले रहे थे, और जब वे उस नियोजन में थे, तब कंपनी के सदस्य थे और उस नियोजन के समाप्त होने के पश्चात् भी सदस्य बने रहे हैं, तथा
(ग) यह बात प्रतिषिद्ध करती है कि उसमें के अंशों (शेयरों) या उसके डिबेंचरों को प्रतिश्रुत के लिए लोक साधारण को आमंत्रित किया जाए;
(घ) यह बात प्रतिषिद्ध करती है कि उसके सदस्यों, निदेशकों या उनके नातेदारों से भिé व्यक्तियों से निक्षेप आमंत्रित किए जाएं या स्वीकार किए जाएं :
परन्तु जहां कि दो या दो से अधिक व्यक्ति संयुक्तत: एक या एक से अधिक अंश (शेयर) कंपनी में धारण करते हैं, वहां उनकी बाबत इस परिभाषा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वे एक सदस्य हैं;
(iv) ''पब्लिक कंपनी'' से वह कंपनी अभिप्रेत है–
(क) जो प्राइवेट कंपनी नहीं है;
(ख) जिसकी कम से कम पांच लाख रुपए की समादत्त पूंजी है या ऐसी उच्चतर समादत्त पूंजी है, जो विहित की जाए;
(ग) जो ऐसी प्राइवेट कंपनी है, जो उस कंपनी की समनुषंगी है जो प्राइवेट कंपनी नहीं है।
(2) जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो निम्नलिखित कंपनियां उपधारा (1) के खंड (i) से लेकर (iv) तक में परिभाषित किन्हीं शब्दों की अर्थव्याप्ति के अन्तर्गत नहीं समझी जाएंगी तथा ऐसी कंपनियों की बाबत, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, यह समझा जाएगा कि वे भारत के बाहर बनार्इ गर्इ तथा रजिस्ट्रीकृत है :–
(क) कोर्इ कंपनी, जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय बर्मा, अदन या पाकिस्तान में है तथा जो उस देश के भारत से पृथक् होने के ठीक पूर्व उपधारा (1) के खंड (i) में परिभाषित कंपनी थी;
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कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4
''नियंत्री कम्पनी'' तथा ''समनुषंगी'' का अर्थ
4. (1) किसी कम्पनी की बाबत इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह बात कि वह किसी दूसरी कम्पनी की समनुषंगी है उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस दशा में और केवल उस दशा में ही समझी जाएगी जिसमें कि:–
(क) वह दूसरी कम्पनी उस कम्पनी के निदेशक बोर्ड की सदस्यता का नियंत्रण करती है; अथवा
(ख) वह दूसरी कम्पनी उस दशा में–
(i) जिसमें कि प्रथम वर्णित कम्पनी ऐसी विद्यमान कम्पनी है जिसके बारे में उन अधिमानी अंशों (प्रिफ्रेन्स शेयरों) के धारक, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व निर्गमित किए गए थे, सब बातों के बारे में वे ही मताधिकार रखते हैं जैसे साधारण अंशों (इक्विटी शेयरों) के धारक रखते हैं, ऐसी कम्पनी की कुल मत शक्ति के अर्धांश से अधिक को प्रयुक्त या नियंत्रित करती है;
(ii) जिसमें कि प्रथम वर्णित कम्पनी ऐसी कोर्इ अन्य कम्पनी है, जो उसकी साधारण अंश (इक्विटी शेयर) पूंजी के अभिहित मूल्य के अर्धांश से अधिक को धारण करती है; अथवा
(ग) प्रथम वर्णित कम्पनी किसी ऐसी कम्पनी की समनुषंगी है जो उस दूसरी कम्पनी की समनुषंगी है।
दृष्टांत
कम्पनी ख कम्पनी क की समनुषंगी है, तथा कम्पनी ग कम्पनी ख की समनुषंगी है; कम्पनी ग कम्पनी क की ऊपर वाले खण्ड (ग) के आधार पर समनुषंगी है। यदि कम्पनी घ कम्पनी ग की समनुषंगी है, तो कम्पनी ग कम्पनी ख की समनुषंगी होगी तथा परिणामस्वरूप वह ऊपर वाले खण्ड (ग) के आधार पर कम्पनी क की भी समनुषंगी होगी; तथा इसी प्रकार यह बात आगे भी लागू होगी।
(2) कम्पनी के निदेशक बोर्ड की सदस्यता की बाबत उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए यह बात कि वह दूसरी कम्पनी द्वारा नियंत्रित है उस दशा में, और केवल उस दशा में ही समझी जाएगी जिसमें कि वह दूसरी कम्पनी ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग द्वारा, जो किसी अन्य व्यक्ति की सम्मति या सहमति के बिना स्वविवेकाधिकार से उस द्वारा प्रयोक्तव्य है, निदेशक पद धारण करने वाले सभी धारकों को या उनमें से बहुसंख्यकों को नियुक्त कर सकती है या हटा सकती है किन्तु उस दूसरी कम्पनी की बाबत इस उपबन्ध के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि ऐसे ही निदेशक पद के लिए नियुक्ति करने की शक्ति उसे प्राप्त है जिसके बारे में निम्नलिखित शर्तों में से किसी की पूर्ति होती है, अर्थात्:–
(क) कोर्इ व्यक्ति पूर्वोक्त जैसी किसी शक्ति का प्रयोग उस दूसरी कम्पनी द्वारा उसके पक्ष में किए बिना उस पर नियुक्त नहीं किया जा सकता;
(ख) उस पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति अनिवार्यत:, उस दूसरी कम्पनी के निदेशक या प्रबन्धक के रूप में अथवा अन्य किसी पद पर अपनी नियुक्ति के या उस अन्य कम्पनी में अपने नियोजन के परिणामस्वरूप हो जाती है;
(ग) निदेशक पद को कोर्इ ऐसा व्यक्ति धारित करता है जो उस दूसरी कम्पनी द्वारा या उसकी समनुषंगी द्वारा नामनिर्देशित किया गया है।
(3) यह अवधारण करने के लिए कि क्या कोर्इ कम्पनी किसी दूसरी कम्पनी की समनुषंगी है:–
(क) ऐसे किन्हीं अंशों (शेयरों) या किसी शक्ति की बाबत, जो उस दूसरी कम्पनी द्वारा वैश्वासिक हैसियत में धृत हैं या प्रयोक्तव्य हैं, यह माना जाएगा कि वे या वह उस द्वारा धृत या प्रयोक्तव्य नहीं हैं या नहीं है;
(ख) खण्ड (ग) तथा (घ) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए:–
(i) उस दूसरी कम्पनी के नामनिर्देशिती के रूप में किसी व्यक्ति द्वारा (वहां के सिवाय जहां कि वह दूसरी कम्पनी से वैश्वासिक हैसियत में ही संबद्ध है); अथवा
(ii) उस दूसरी कम्पनी की समनुषंगी द्वारा या उसके नामनिर्देशिती द्वारा, जो ऐसी समनुषंगी नहीं है, जो केवल वैश्वासिक हैसियत में सम्बद्ध है,
किन्हीं धृत अंशों (शेयरों) या प्रयोक्तव्य शक्ति की बाबत यह माना जाएगा कि वे या वह उस दूसरी कम्पनी द्वारा धृत या प्रयोक्तव्य हैं या है;
(ग) प्रथमवर्णित कम्पनी के किन्हीं डिबेंचरों के या ऐसे न्यास विलेख के उपबन्धों के आधार पर, जो ऐसे डिबेंचरों का कोर्इ निर्गमन अभिप्राप्त करने के लिए है, किसी व्यक्ति द्वारा धृत अंशों (शेंयरों) या प्रयोक्तव्य शक्ति को विचार में नहीं लिया जाएगा;
(घ) उस दूसरी कम्पनी या उसकी समनुषंगी द्वारा या उसके नामनिर्देशिती द्वारा धृत अंशों (शेयरों) या प्रयोक्तव्य शक्ति की बाबत [जो खण्ड (ग) में वर्णित रूप में धृत नहीं हैं या प्रयोक्तव्य नहीं है] यह बात कि वे या वह उस दूसरी कम्पनी द्वारा धृत नहीं हैं या प्रयोक्तव्य नहीं है उस दशा में मानी जाएगी, जिसमें कि, यथास्थिति, उस दूसरी कम्पनी या उसकी समनुषंगी के मामूली कारबार के अन्तर्गत उधार पर धन देना है तथा उस कारबार के साधारण अनुक्रम में किए गए संव्यवहार के प्रयोजनों के लिए केवल प्रतिभूति के रूप में पूर्वोक्त प्रकार से वे अंश (शेयर) धृत हैं या वह शक्ति प्रयोक्तव्य है।
(4) किसी कम्पनी की बाबत इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह बात कि वह किसी दूसरी कम्पनी की नियंत्री कम्पनी है उस दशा में और केवल उस दशा में ही समझी जाएगी जिसमें कि वह दूसरी कम्पनी उसकी समनुषंगी है।
(5) इस धारा में ''कम्पनी'' पद के अन्तर्गत कोर्इ निगम निकाय भी है तथा ''साधारण अंश पूंजी (इक्विटी शेयर कैपिटल)'' पद का वही अर्थ है जो धारा 85 की उपधारा (2) में उसका है।
(6) जो निगम निकाय भारत के बाहर किसी देश में निगमित है उस दशा में उस कम्पनी की बाबत, जो ऐसे देश की विधि के अनुसार उस निगम निकाय की समनुषंगी या नियंत्री कम्पनी है, यह समझा जाएगा कि वह ऐसे निगम निकाय की, इस अधिनियम के अर्थांतर्गत तथा इसके प्रयोजनों के लिए भी, समनुषंगी या नियंत्री कम्पनी है भले ही इस धारा की अपेक्षाओं की पूर्ति होती हो या न होती हो।
(7) किसी प्राइवेट कम्पनी की बाबत, जो भारत के बाहर निगमित ऐसे निगम-निकाय की समनुषंगी है जो यदि भारत में निगमित किया जाता तो इस अधिनियम के अर्थ के भीतर पब्लिक कम्पनी होती, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह बात कि वह पब्लिक कम्पनी की समनुषंगी है उस दशा में समझी जाएगी जिसमें कि उस प्राइवेट कम्पनी की सम्पूर्ण अंश (शेयर) पूंजी उस निगम निकाय द्वारा अकेले ही या भारत से बाहर निगमित एक या एक से अधिक निगम निकायों के साथ धृत नहीं है।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क
लोक वित्तीय संस्थाएं
4क. (1) इस उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रत्येक वित्तीय संस्था इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए लोक वित्तीय संस्था समझी जाएगी, अर्थात् :–
(i) इंडस्ट्रीयल क्रेडिट एण्ड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, जो भारतीय कंपनी अधिनियम, 1913 (1913 का 7) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है;
(ii) औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम;
(iii) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक;
(iv) जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम;
(v) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट;
(vi) दि इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट फाइनेंस कंपनी लिमिटेड, जो इस अधिनियम के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है;
| (vii) [** | ** | **] |
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अन्य ऐसी संस्थाओं को विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिन्हें वह लोक वित्तीय संस्था होने के लिए ठीक समझे :
परन्तु कोर्इ संस्था तभी इस प्रकार विनिर्दिष्ट की जाएगी जब–
(i) वह किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या के अधीन स्थापित या गठित की गर्इ हो, या
(ii) उस संस्था की समादत्त शेयर पूंजी का कम से कम 51 प्रतिशत केन्द्रीय सरकार द्वारा धृत या नियंत्रित हो।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क(2) के अधीन अधिसूचित संस्थाएं
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 4क की उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित संस्थाओं को लोक वित्तीय संस्थाओं के रूप में विनिर्दिष्ट करती है :
(1) भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक अधिनियम, 1984 (1984 का 62) के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण निगम; (2) साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) के अधीन स्थापित भारतीय साधारण बीमा निगम; (3) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड; (4) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड; (5) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत ओरियंटल फायर एण्ड जनरल इंश्योरेन्स कंपनी लिमिटेड; (6) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत यूनार्इटेड फायर एण्ड जनरल इंश्योरेन्स कंपनी लिमिटेड; (7) [* * *]; (8) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत टूरिज़्म फाइनेन्स कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड; (9) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत रिस्क कैपिटल एण्ड टैक्नोलाजी फाइनेन्स कारपोरेशन लिमिटेड; (10) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत टैक्नोलाजी डेवेलपमेंट एण्ड इंफोरमेशन कंपनी ऑफ इण्डिया लिमिटेड; (11) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत पावर फाइनेन्स कारपोरेशन लिमिटेड; (12) राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक; (13) भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक; (14) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत रूरल इलैक्ट्रीफिकेशन कारपोरेशन लिमिटेड; (15) इंडियन रेलवे फाइनेंस कारपोरेशन लिमिटेड; (16) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत इंडस्ट्रीयल फाइनेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड; (17) आंध्र प्रदेश राज्य वित्त निगम; (18) असम वित्त निगम; (19) बिहार राज्य वित्त निगम; (20) दिल्ली वित्त निगम; (21) गुजरात राज्य वित्त निगम; (22) हरियाणा वित्त निगम; (23) हिमाचल प्रदेश वित्त निगम; (24) जम्मू-कश्मीर राज्य वित्त निगम; (25) कर्नाटक राज्य वित्त निगम; (26) केरल वित्त निगम; (27) मध्य प्रदेश वित्त निगम; (28) महाराष्ट्र राज्य वित्त निगम; (29) उड़ीसा राज्य वित्त निगम; (30) पंजाब वित्त निगम; (31) राजस्थान वित्त निगम; (32) तमिलनाडु इंडस्ट्रीयल डेवेलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड; (33) उत्तर प्रदेश वित्त निगम; (34) पश्चिमी बंगाल वित्त निगम; (35) इंडियन रिन्यूएबिल एनर्जी डेवेलपमेंट एजेन्सी लिमिटेड; (36) पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम लिमिटेड; (37) आवास और शहरी विकास निगम लिमिटेड; (38) भारतीय निर्यात-आयात बैंक; (39) कृषि और ग्रामीण विकास राष्ट्रीय बैंक (एन.ए.बी.ए.आर.डी.); (40) राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एन.सी.डी.सी.); (41) राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड; (42) उत्तर प्रदेश प्रदेशीय औद्योगिक और विनिधान निगम लिमिटेड; (43) राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास और विनिधान निगम लिमिटेड; (44) एस आर्इ सी ओ एम (सिकोम) लिमिटेड; (45) पश्चिमी बंगाल औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड; (46) तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड।
स्रोत : अधिसूचना सं. का.आ. 1329, तारीख 13.5.1978 जो का.आ. 2901, तारीख 9.10.1987, का.आ. 7(र्इ), तारीख 3.1.1990, का.आ. 238(र्इ), तारीख 20.3.1990, का.आ. 674(र्इ), तारीख 31.8.1990, का.आ. 321(र्इ), तारीख 12.4.1990, का.आ. 484(र्इ), तारीख 26.7.1991, का.आ. 812(र्इ), तारीख 2.12.1991, का.आ. 128(र्इ), तारीख 11.2.1992, का.आ. 765(र्इ), तारीख 8.10.1993, का.आ. 98(र्इ), तारीख 15.2.1995, का.आ. 247(र्इ), तारीख 28.3.1995, का.आ. 843(र्इ), तारीख 17.10.1995, का.आ. 529(र्इ), तारीख 23.7.1996, का.आ. 837(र्इ), तारीख 9.12.1996, का.आ. 433(र्इ), तारीख 14.6.1999, का.आ. 440(र्इ), तारीख 17.4.2002, का.आ. 322 (र्इ), तारीख 25.3.2003, का.आ. 518 (र्इ) तारीख 9.5.2003, का. आ. 219(र्इ), तारीख 23.2.2004 और का.आ. 544 (र्इ) तारीख 30.4.2004 द्वारा संशोधित की गर्इ।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25
पूर्त या अन्य कंपनी के नाम से ''लिमिटेड'' शब्द जोड़ने से अभिमुक्ति देने की शक्ति
25. (1) जहां केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि कोर्इ संगम–
(क) परिसीमित कंपनी के रूप में वाणिज्य, कला, विज्ञान, धर्म, पूर्त या किसी अन्य उपयोगी उद्देश्य के लिए काम करने के लिए बनाया ही जाने वाला है, तथा
(ख) अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों, या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए काम करने में लगाने का आशय रखती है तथा इस बात का उस पर प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ लाभांश दें,
वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए यह निदेश दे सकेगी कि वह परिसीमित दायित्व वाली कंपनी के रूप में संगम को उसके नाम में ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्द जोड़े बिना रजिस्ट्रीकृत कर लिया जाए।
(2) तदुपरि यह संगम तदनुसार रजिस्ट्रीकृत किया जा सकेगा; तथा रजिस्ट्रीकरण होने पर वह परिसीमित कंपनियों के सभी विशेषाधिकारों का उपभोग करेगा तथा (इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए) उनकी सभी बाध्यताओं के अधीन रहेगा।
(3) जहां केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि–
(क) किसी ऐसी कंपनी के उद्देश्य, जो इस अधिनियम के अधीन परिसीमित कंपनी के रूप में रजिस्ट्रीकृत की गर्इ है, उपधारा (1) के खंड (क) में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों तक परिसीमित है, तथा
(ख) अपने गठन में कंपनी से यह बात अपेक्षित है कि वह अपने लाभों को, यदि कोर्इ हों या अन्य आय को अपने उद्देश्यों के लिए, काम करने में लगाए तथा उस पर यह प्रतिषेध है कि वह अपने सदस्यों को कोर्इ भी लाभांश न दे,
वहां केन्द्रीय सरकार अनुज्ञप्ति के जरिए कंपनी को प्राधिकृत कर सकेगी कि अपने विशेष संकल्प द्वारा वह अपने नाम को तब्दील कर ले, जिसके अंतर्गत अपने नाम में ''लिमिटेड'' शब्द को या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का जोड़ना या लुप्त कर देना आता है; तथा इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील कर लेने के बारे में धारा 23 उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम तब्दील करने को लागू होती है।
(4) कोर्इ फर्म इस धारा के अधीन अनुज्ञापित संगम या कम्पनी का सदस्य हो सकेगी किंतु उस फर्म के विघटन पर उसकी उस संगम या कंपनी की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
(5) इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी शर्तों पर और ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जैसी या जैसे वह ठीक समझती है, अनुदत्त की जा सकेगी तथा वे शर्तें और विनियम उस निकाय पर, जिसे अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जाती है; आबद्ध कर होंगे तथा जहां कि यह अनुदान उपधारा (1) के अधीन है वहां यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा निदेश देती है, तो वह ज्ञापन में या अनुच्छेदों में या भागत: पूर्वकथित में और भागत: पश्चात् कथित में अन्त:स्थापित किया जा सकेगा।
(6) किसी निकाय के लिए, जिसे ऐसी अनुज्ञप्ति दी जाती है, यह आवश्यक नहीं होगा कि वह अपने नाम के किसी भाग के रूप में ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों का प्रयोग करे तथा जब तक कि उसके अनुच्छेद अन्यथा उपबंधित नहीं करते हैं, तथा उस दशा में जिसमें कि केन्द्रीय सरकार ने साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश दिया है, उस निदेश में विनिर्दिष्ट विस्तार तक ऐसे निकाय को इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों से छूट मिली रहेगी जैसे उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं।
(7) वह अनुज्ञप्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय प्रतिसंहृत की जा सकेगी तथा प्रतिसंहरण करने पर रजिस्ट्रार उस नाम के अंत में, जो उस निकाय का, जिसे अनुज्ञप्ति दी गर्इ थी, रजिस्टर में है, ''लिमिटेड'' शब्द या ''प्राइवेट लिमिटेड'' शब्दों को दर्ज कर देगा; तथा ऐसा निकाय इस धारा के अधीन दी गर्इ छूट का उपभोग करने से परिविरत हो जाएगा:
परन्तु केन्द्रीय सरकार इससे पूर्व कि कोर्इ अनुज्ञप्ति ऐसे प्रतिसंहृत की जाए, अपने आशय की सूचना उस निकाय को लिखित रूप में देगी तथा ऐसे प्रतिसंहरण के विरुद्ध सुनवार्इ का अवसर उस निकाय को देगी।
(8) (क) कोर्इ निकाय, जिसके बारे में इस धारा के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति प्रवृत्त है, उन उपबंधों में, जो उसके ज्ञापन में उसके उद्देश्यों संबंधी है, कोर्इ परिवर्तन केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, जो लिखित रूप में संज्ञापित किया जाएगा, न करेगा।
(ख) केन्द्रीय सरकार ऐसे निकाय की अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण उस दशा में कर सकेगी जिसमें कि वह खंड (क) के उपबंधों का उल्लंघन करता है।
(ग) केन्द्रीय सरकार, खंड (क) में निर्दिष्ट अनुमोदन देते समय, उन शर्तों और विनियमों के, यदि कोर्इ हो, जिनके अधीन वह अनुज्ञप्ति पहले थी, बदले में या अतिरिक्त ऐसी शर्तों तथा विनियमों के अधीन करके, जैसी या जैसे वह सरकार ठीक समझती है, उस अनुज्ञप्ति में फेरफार कर सकेगी।
(घ) जहां किसी निकाय के ज्ञापन के उपबंधों में इस उपधारा के अधीन प्रस्थापित कोर्इ परिवर्तन उस निकाय के उद्देश्यों के बारे में जिस हद तक इस वास्ते अपेक्षित हो कि वह निकाय धारा 17 की उपधारा (1) के खंड (क) से (छ) तक में विनिर्दिष्ट किसी बात को करने के लिए समर्थ हो जाए, वहां उस हद तक इस धारा के उपबंध उस धारा के उपबंधों के अतिरिक्त, न कि उनके अल्पीकरण में, होंगे।
(9) उस अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण किए जाने पर, जो ऐसे निकाय को, जिसके नाम में ''वाणिज्य मंडल'' शब्द अन्तर्विष्ट हैं, इस धारा के अधीन अनुदत्त की गर्इ थी, वह निकाय प्रतिसंहरण किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर या ऐसी दीर्घतर कालावधि के भीतर, जैसी केन्द्रीय सरकार अनुज्ञात करना ठीक समझे, अपना नाम ऐसे नाम से बदल सकेगा जिसमें वे शब्द अन्तर्विष्ट नहीं हैं; तथा–
(क) उस सूचना में, जो उस निकाय को उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन दी जाने वाली है, उस प्रभाव का विवरण दिया होगा जो इस उपधारा के पूर्वगामी उपबंधों का है; तथा
(ख) धारा 23 इस उपधारा के अधीन नाम तब्दील करने को उसी प्रकार लागू होगी जैसे वह धारा 21 के अधीन नाम की तब्दीली करने को लागू होती है।
(10) यदि कोर्इ निकाय उपधारा (9) की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में व्यतिक्रम करता है, तो वह जुर्माने से, जो हर दिन के लिए, जिसके दौरान वह व्यतिक्रम चालू रहता है, पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 77क
अपनी प्रतिभूतियां खरीदने की कंपनी की शक्ति
77क. (1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी किंतु इस धारा की उपधारा (2) और धारा 77ख के उपबंधों के अधीन रहते हुए कंपनी–
(i) अपनी खुली आरक्षितियों में से; या
(ii) प्रतिभूति प्रीमियम लेखे में से; या
(iii) किन्हीं शेयरों या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों के आगमों में से,
अपने निजी शेयर या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियां (जिसे इसमें आगे ''क्रय द्वारा वापस लेना'' कहा गया है) क्रय कर सकती है :
परन्तु किसी भी प्रकार के शेयरों या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों का कोर्इ "क्रय द्वारा वापस लेना" उसी प्रकार के शेयरों या उसी प्रकार की अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों के पूर्ववर्ती निर्गमन (इश्यू) के आगमों में से किया जाएगा।
(2) कोर्इ भी कंपनी अपने निजी शेयर या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियां उपधारा (1) के अधीन तब तक क्रय नहीं करेगी जब तक कि–
(क) क्रय द्वारा वापस लेना उसके अनुच्छेदों द्वारा प्राधिकृत न हो;
(ख) कंपनी के साधारण अधिवेशन में क्रय द्वारा वापस लेने को प्राधिकृत करने वाला एक विशेष संकल्प पारित न किया गया हो :
परंतु इस खंड की कोर्इ बात किसी भी ऐसे मामले में लागू नहीं होगी जहां–
(अ) क्रय द्वारा वापस लिया जाना कंपनी की कुल समादत्त साधारण पूंजी और खुली आरक्षितियों का दस प्रतिशत या उससे कम है; और
(आ) बोर्ड द्वारा उसके अधिवेशन में पारित किसी संकल्प द्वारा ऐसा क्रय द्वारा वापस लिया जाना प्राधिकृत कर दिया गया है:
परन्तु यह और कि क्रय द्वारा वापस लेने की प्रस्थापना तीन सौ पैंसठ दिन की अवधि के भीतर की जाएगी, जिसकी संगणना क्रय द्वारा वापस लेने की पूर्व प्रस्थापना, यदि कोर्इ हो, की तारीख से की जाएगी।
स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "क्रय द्वारा वापस लेने की प्रस्थापना" पद से ऐसे क्रय द्वारा वापस लेने की प्रस्थापना अभिप्रेत है जो प्रथम परन्तुक में निर्दिष्ट बोर्ड के संकल्प के अनुसरण में की गर्इ हो;
(ग) क्रय द्वारा वापस लेना कंपनी की कुल समादत्त पूंजी और खुली आरक्षितियों का पच्चीस प्रतिशत या उससे कम न हो :
परन्तु किसी वित्तीय वर्ष में साधारण शेयरों का क्रय द्वारा वापस लेना उस वित्तीय वर्ष में उसकी कुल समादत्त साधारण पूंजी के पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं होगा;
(घ) कंपनी के ऋण का अनुपात ऐसे क्रय द्वारा वापस लेने के पश्चात् पूंजी और उसकी खुली आरक्षितियों के दुगुने से अधिक न हो :
परन्तु केन्द्रीय सरकार कंपनियों के किसी वर्ग या वर्गों के लिए इस खंड के अधीन विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक ऋण अनुपात विहित कर सकेगी।
स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए ''ऋण'' पद के अंतर्गत अप्रतिभूत और प्रतिभूत ऋण की समस्त राशियां भी होंगी;
(ड़) क्रय द्वारा वापस लेने के लिए सभी शेयर या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियां पूरी तरह समादत्त न हों;
(च) किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध शेयरों या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड द्वारा इस निमित्त बनाए गए विनियमों के अनुसार न हो;
(छ) खंड (च) में विनिर्दिष्ट से भिन्न शेयरों या अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों की बाबत को क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ विहित किए गए मार्गदर्शक सिद्धान्तों के, जो विहित किए जाएं, अनुसार न हो।
(3) इस अधिवेशन की सूचना, जिसमें विशेष संकल्प पारित किया जाना प्रस्तावित है, के साथ एक स्पष्टीकारक विवरण दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित का उल्लेख होगा–
(क) सभी तात्विक तथ्यों का ठीक-ठीक और पूर्ण प्रकटन;
(ख) क्रय द्वारा वापस लेने की आवश्यकता;
(ग) क्रय द्वारा वापस लेने के अधीन क्रय के लिए आशयित प्रतिभूतियों का वर्ग;
(घ) क्रय द्वारा वापस लेने में निवेश की जाने वाली रकम; और
(ड़) क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ पूरा करने की समय-सीमा।
(4) प्रत्येक क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन विशेष संकल्प पारित करने की तारीख से बारह मास के भीतर पूरी करनी होगी।
(5) उपधारा (1) के अधीन क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ–
(क) वर्तमान प्रतिभूतिधारकों से आनुपातिक आधार पर की जा सकेगी; या
(ख) खुले बाजार से की जा सकेगी; या
(ग) ओड लाटों से, अर्थात् जहां पब्लिक कंपनी की, जिसके शेयर किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं, प्रतिभूतियों का लाट ऐसे विक्रेय लाट से छोटा है जो स्टाक एक्सचेंज द्वारा विनिर्दिष्ट है, से की जा सकेगी; या
(घ) स्टाक आप्शन या स्वेट इक्विटी की स्कीम के अनुसरण में कम्पनी के कर्मचारियों को जारी की गर्इ प्रतिभूतियां खरीदकर की जा सकेगी।
(6) जहां कंपनी ने इस धारा के अधीन अपने निजी शेयरों या अन्य प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेने के लिए उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन विशेष संकल्प पारित किया है वहां वह, ऐसे क्रय द्वारा वापस लेने से पूर्व भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के रजिस्ट्रार के यहां ऐसे प्ररूप में जो विहित की जाए ऋण शोधन क्षमता संबंधी घोषणा फाइल करेगा और जो इस आशय के शपथ पत्र द्वारा सत्यापित हो कि बोर्ड ने कम्पनी के कार्यकलाप के बारे में पूरी जांच कर ली है जिसके परिणामस्वरूप उनकी राय है कि वह अपने दायित्वों को पूरा कर सकती है और बोर्ड द्वारा अंगीकृत घोषणा की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर दिवालिया नहीं होगी, और उस पर कम्पनी के कम से कम दो निदेशकों के, जिनमें से एक प्रबंध-निदेशक हो, यदि कोर्इ हो, हस्ताक्षर हों :
परन्तु ऋण शोधन क्षमता संबंधी घोषणा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में ऐसी कंपनी द्वारा फाइल नहीं की जाएगी जिसके शेयर किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं।
(7) जहां कंपनी अपनी निजी प्रतिभूतियां क्रय द्वारा वापस लेती है वहां वह इस प्रकार क्रय द्वारा वापस ली गर्इ प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ पूरा होने की अंतिम तारीख से सात दिन के भीतर समाप्त और भौतिक रूप से नष्ट कर देगी।
(8) जहां कोर्इ कंपनी अपने शेयरों और अन्य विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों को क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ इस धारा के अधीन पूरा कर लेती है वहां वह चौबीस मास की अवधि के भीतर बोनस इश्यु के रूप में या अस्तित्वशील बाध्यताओं के निर्वहन में कार्रवार्इ करने के सिवाय, जैसे वारन्टों का बदलना, स्टाक आप्शन स्कीम, स्वेट इक्विटी या अधिमानी शेयरों या डिबेंचरों को साधारण शेयरों में बदलना, उसी प्रकार के शेयरों का आगे कोर्इ निर्गम नहीं करेगी [जिसके अंतर्गत धारा 81 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन और शेयरों का आबंटन भी है]।
(9) जहां कंपनी इस धारा के अधीन अपनी प्रतिभूतियां क्रय द्वारा वापस लेती है, वहां वह इस प्रकार क्रय की गर्इ प्रतिभूतियों का, क्रय द्वारा वापस ली गर्इ प्रतिभूतियों के लिए दिए गए प्रतिफल का, प्रतिभूतियों को रद्द करने की तारीख, प्रतिभूतियों को समाप्त और भौतिक रूप से नष्ट करने की तारीख तथा अन्य ऐसी विशिष्टियों का, जो विहित की जाएं, एक रजिस्टर रखेगी।
(10) इस धारा के अधीन क्रय द्वारा वापस लेने की कार्रवार्इ पूरा करने के बाद कोर्इ कंपनी रजिस्ट्रार और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में एक विवरणी फाइल करेगी जिसमें ऐसी कार्रवार्इ पूरा होने के तीस दिन के भीतर क्रय द्वारा वापस लेने संबंधी ऐसी विशिष्टियां होंगी, जो विहित की जाएं :
परन्तु भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में ऐसी कंपनी द्वारा विवरणी फाइल नहीं की जाएगी जिसके शेयर किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं।
(11) यदि कोर्इ कंपनी इस धारा के उपबंधों का उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों अथवा उपधारा (2) के खंड (च) के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों का पालन करने में व्यतिक्रम करती है तो वह कंपनी या कंपनी का कोर्इ अधिकारी जो व्यतिक्रम करता है, ऐसे कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा।
स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए–
(क) ''विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों'' के अन्तर्गत कर्मचारी स्टाक आप्शन या अन्य प्रतिभूतियां भी हैं जो केंद्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित की जाएं;
(ख) "खुली आरक्षिति" का वही अर्थ होगा जो उसका धारा 372क के स्पष्टीकरण के खंड (ख) में है।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 200
कर-मुक्त संदायों का प्रतिषेध
200. (1) कोर्इ कंपनी अपने किसी अधिकारी या कर्मचारी को, चाहे तो उसकी उस हैसियत में या अन्यथा कोर्इ कर-मुक्त अथवा उस अधिकारी या कर्मचारी द्वारा देय किसी कर के अथवा किसी ऐसे कर की दर या मानक दर के या उसकी रकम के प्रति निर्देश से संगणित अथवा घटने-बढ़ने वाला पारिश्रमिक न देगी।
स्पष्टीकरण–इस उपधारा में ''कर'' शब्द में किसी प्रकार का आय-कर, जिसके अर्थान्तर्गत अधिकार आता है, समाविष्ट है।
(2) जहां इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पहले प्रवृत्त किसी उपबंध के आधार पर, भले ही वह उपबंध कंपनी के अनुच्छेदों में अथवा कंपनी से की गर्इ संविदा में या कंपनी द्वारा साधारण अधिवेशन में अथवा कंपनी के निदेशकों के बोर्ड द्वारा पारित संकल्प में अंतर्विष्ट हो, कंपनी का कोर्इ अधिकारी या कर्मचारी, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर कोर्इ पद धारण किए हुए है ऐसी किन्हीं रीतियों से, जो उपधारा (1) द्वारा प्रतिषिद्ध हैं, पारिश्रमिक पाने का हकदार है, वहां ऐसा उपबंध उस अवधि के अवशेष भाग के दौरान, जिसके लिए वह ऐसा पद ऐसे प्रारम्भ पर धारण करने का हकदार है ऐसे प्रभावशाली होगा मानो उसमें उसके बदले प्रश्नगत कर के अधीन ऐसी सकल राशि के उस संदाय के लिए उपबंध में जिसमें से ऐसा कर काटने के पश्चात् वह शुद्ध राशि निकलेगी जो वास्तव में ऐसे उपबंध में विनिर्दिष्ट है।
(3) यह धारा ऐसे किसी पारिश्रमिक को लागू न होगी–
(क) जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व शोध्य हो गया है, अथवा
(ख) जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की किसी कालावधि की बाबत ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् शोध्य हो।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 205(1)
लाभों में से ही लाभांश का दिया जाना
205. (1) किसी वित्तीय वर्ष के लिए कोर्इ भी लाभांश कंपनी के उस वर्ष के लिए उन लाभों में से, जो उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार अवक्षयण के लिए उपबंध करने के पश्चात् निकलते हैं, अथवा कंपनी के किसी पूर्व वित्तीय वर्ष या वर्षों के उन लाभों में से, जो उन उपबंधों के अनुसार अवक्षयण के लिए उपबंध किए जाने के पश्चात् निकलते हैं तथा अवितरित रहे हैं, अथवा दोनों में से अथवा उन धनराशियों में से, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार ने उस सरकार द्वारा दी गर्इ प्रत्याभूति के अनुसरण में लाभांश के दिए जाने के लिए उपबंधित की हैं, घोषित किए जाने चाहिए, या दिए जाने के सिवाय न तो घोषित किया जाएगा और न दिया जाएगा :
परन्तु–
(क) यदि कंपनी ने ऐसे किसी पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष या वर्षों लेखे, जो कंपनीज (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 1960 के प्रारम्भ के पश्चात् पड़ता है या पड़ते हैं अवक्षयण के लिए उपबंध नहीं किया है तो वित्तीय वर्ष के लिए लाभांश घोषित करने या देने के पूर्व वह उस वित्तीय वर्ष के लाभों में से अथवा किसी या किन्हीं अन्य पूर्व वित्तीय वर्ष या वर्षों के लाभों में से ऐसे अवक्षयण के लिए उपबंध करेगी;
(ख) यदि कंपनी ने ऐसे किसी पूर्व वित्तीय वर्ष या वर्षों लेखे कोर्इ हानि, जो कंपनीज (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 1960 के प्रारम्भ के पश्चात् पड़ता है या पड़ते हैं, उठार्इ है तो उस हानि की रकम और उस रकम में से, जो उस वर्ष या वित्तीय वर्षों के लिए अवक्षयण के लिए उपबंधित रकम के बराबर है, जो भी कम हो, वह रकम कंपनी के उस वर्ष के लाभों में से, जिनके लिए लाभांश घोषित किए जाने या दिए जाने की प्रस्थापना है अथवा पूर्व वित्तीय वर्ष या वर्षों के कंपनी के लाभों में से जो दोनों दशाओं में उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार अवक्षयण के लिए उपबंध करने के पश्चात् निकलते हैं या दोनों में से मुजरा की जाएगी;
(ग) यदि केन्द्रीय सरकार लोक हित में ऐसा करना आवश्यक समझती है तो वह कंपनी को यह अनुज्ञा दे सकेगी कि वह कंपनी अवक्षयण के लिए उपबंध किए बिना किसी वित्तीय वर्ष के लिए लाभांश उस वर्ष के लिए या किसी पूर्व वित्तीय वर्ष या वर्षों के लिए कंपनी के लाभों में से घोषित कर दे या दे दे :
परन्तु यह और भी कि कंपनी के लिए यह आवश्यक न होगा कि वह पूर्वोक्त रूप से अवक्षयण के लिए उपबंध उस दशा में करे जिसमें कि किसी वित्तीय वर्ष के लिए लाभांश किसी ऐसे पूर्व वित्तीय वर्ष या किन्हीं ऐसे पूर्व वित्तीय वर्षों के लाभों में से, जो कंपनीज (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 1960 के पूर्व पड़ता है या पड़ते हैं घोषित किया जाता है या दिया जाता है।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 226(2)
संपरीक्षकों की अर्हताएं और अनर्हताएं।
| 226. (1) ** | ** | ** |
(2) (क) उस प्रमाणपत्र का धारक, जो, यथास्थिति, भाग ख राज्य (विधि) अधिनियम, 1951 (1951 का 3) के प्रारम्भ के अव्यवहितपूर्व किसी पूरे भाग ख राज्य या उसके किसी भाग में प्रवृत्त किसी विधि के अथवा जम्मू-कश्मीर (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1956 (1956 का 62) के अधीन उसे इस बात का हकदार करने के लिए दिया गया था कि वह उन राज्यक्षेत्रों में, जो 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के अव्यवहितपूर्व उस राज्य में समाविष्ट थे, या उसके भाग में कंपनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य कर सकता है भारत में कहीं भी रजिस्ट्रीकृत कंपनियों के संपरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त किए जाने का हकदार उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किंतु खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए होगा।
(ख) केन्द्रीय सरकार उन राज्यक्षेत्रों में, जो 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के अव्यवहितपूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे, व्यक्तियों को संपरीक्षक प्रमाणपत्रों के दिए जाने, नवीकरण, निलंबन या रद्द किए जाने के लिए उपबंध खंड (क) के प्रयोजनों के लिए नियम तथा ऐसे दिए जाने, नवीकरण, निलंबन या रद्द किए जाने के लिए शर्तें और निर्बन्धन विहित करने वाले नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 233ख
कतिपय मामलों में लागत लेखा की संपरीक्षा
233ख. (1) जहां कि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि ऐसी किसी कंपनी के संबंध में, जिससे धारा 209 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन यह अपेक्षा है कि वह अपनी लेखा बहियों में उस खंड में निर्दिष्ट विशिष्टियां सम्मिलित करे, ऐसा करना आवश्यक है, वहां केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि कंपनी के लागत लेखा की संपरीक्षा ऐसी रीति से, जैसी उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो, ऐसे संपरीक्षक द्वारा की जाए, जो लागत और संकर्म अकाउंटेट अधिनियम, 1959 (1959 का 23) के अर्थ में लागत लेखापाल है :
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की राय है कि लागत संकर्म अकाउंटेट अधिनियम, 1959 (1959 का 23) के अर्थ में लागत लेखापाल साधारणत: कंपनियों की लागत लेखा की संपरीक्षा करने के लिए पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं तो वह सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि उस अवधि के लिए, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) के अर्थ में ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट भी, जो विहित अर्हताएं रखता है, कंपनियों के लागत लेखा की संपरीक्षा कर सकेगा और तब विहित अर्हताएं रखने वाला चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी की लागत लेखा की संपरीक्षा करने के लिए नियुक्त किया जा सकेगा।
(2) इस धारा के अधीन संपरीक्षक धारा 224 की उपधारा (1ख) के उपबंधों के अनुसार और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से कंपनी के निदेशक बोर्ड द्वारा नियुक्त किया जाएगा :
परन्तु बोर्ड द्वारा किसी संपरीक्षक की नियुक्ति करने से पूर्व बोर्ड द्वारा इस प्रकार नियुक्त किए जाने के लिए प्रस्तावित संपरीक्षक से इस प्रभाव का लिखित प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किया जाएगा कि यदि नियुक्ति की जाती है तो वह धारा 224 की उपधारा (1ख) के उपबंधों के अनुसार होगी।
(3) संपरीक्षक द्वारा इस धारा के अधीन की जाने वाली संपरीक्षा उस संपरीक्षा के अतिरिक्त होगी जो धारा 224 के अधीन नियुक्त संपरीक्षक द्वारा की जाती है।
(4) संपरीक्षक को वे ही शक्तियां और उसके वे ही कर्तव्य उस द्वारा इस धारा के अधीन की जाने वाली संपरीक्षा के संबंध में होंगे जो धारा 227 की उपधारा (1) के अधीन कंपनी संपरीक्षक को होते हैं तथा ऐसा संपरीक्षक अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय के अन्दर, जैसा विहित किया जाए, देगा तथा उसी समय रिपोर्ट की एक प्रति कंपनी को भी भेजेगा।
(5) (क) धारा 226 की उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट व्यक्ति कंपनी के लागत लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए नियुक्त या पुनर्नियुक्त नहीं किया जाएगा।
(ख) कंपनी के संपरीक्षक के रूप में धारा 224 के अधीन नियुक्त किया गया व्यक्ति उसी कंपनी के लागत लेखाओं की संपरीक्षा के लिए नियुक्त या पुनर्नियुक्त नहीं किया जाएगा।
(ग) यदि कंपनी के लागत लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए नियुक्त व्यक्ति अपनी नियुक्ति के पश्चात् इस उपधारा के खंड (क) या खंड (ख) में विनिर्दिष्ट निरर्हताओं में से किसी के अध्यधीन हो जाता है तो वह उस तारीख से ही, जिससे वह इस प्रकार निरर्हताओं के अध्यधीन हो जाए, उस कंपनी के लागत लेखाओं की संपरीक्षा करना बंद कर देगा।
(6) उपधारा (1) के अधीन आदेश की प्राप्ति पर कंपनी का यह कर्तव्य होगा कि वह कंपनी को लागत लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए नियुक्त व्यक्ति को सभी सुविधा और सहायता दे।
(7) उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट की प्रति की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर कंपनी केन्द्रीय सरकार को उस रिपोर्ट में दिए गए प्रत्येक आरक्षक या विशेषक खंड के बारे में पूरी जानकारी और स्पष्टीकरण देगी।
(8) यदि उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट पर तथा कंपनी द्वारा उपधारा (7) के अधीन दी गर्इ जानकारी और स्पष्टीकरण पर विचार करने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार की राय है कि कोर्इ अतिरिक्त जानकारी या स्पष्टीकरण आवश्यक है, तो वह सरकार ऐसी अतिरिक्त जानकारी या स्पष्टीकरण मांग सकेगी और तब कंपनी वह जानकारी या स्पष्टीकरण ऐसे समय के भीतर देगी जो उस सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए।
(9) उपधारा (4) में निर्दिष्ट रिपोर्ट की तथा कंपनी द्वारा उपधारा (7) और उपधारा (8) के अधीन दी गर्इ जानकारी और स्पष्टीकरणों की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार रिपोर्ट पर इस अधिनियम के या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अनुसार ऐसी कार्रवार्इ कर सकेगी जो वह आवश्यक समझे।
(10) केन्द्रीय सरकार उस कंपनी के, जिसके लागत लेखाओं की संपरीक्षा उस धारा के अधीन की गर्इ है निदेश दे सकेगी कि वह ऐसी रिपोर्ट दी जाने के पश्चात् पहली बार किए जाने वाले वार्षिक साधारण अधिवेशन की सूचना के साथ उक्त सम्पूर्ण रिपोर्ट या उसका वह भाग, जो वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, सदस्यों में परिचालित करे।
(11) यदि इस धारा के उपबंधों का अनुपालन करने में व्यतिक्रम किया जाता है, तो कंपनी जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगी और कंपनी का हर अधिकारी जो व्यतिक्रम करता है, कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक हो सकेगा या दोनों से दंडनीय होगा।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 293क
राजनैतिक स्वरूप के अभिदायों के बारे में प्रतिषेध और निर्बंधन
293क. (1) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के हुए भी–
(क) कोर्इ सरकारी कंपनी; और
(ख) कोर्इ ऐसी अन्य कंपनी, जो तीन वित्तीय वर्ष से कम के लिए विद्यमान रही है,
किसी रकम या किन्हीं रकमों का, प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:–
(i) किसी राजनैतिक दल को; या
(ii) किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति को,
अभिदाय नहीं करेगी।
(2) ऐसी कोर्इ कंपनी, जो उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट कोर्इ कंपनी नहीं है, किसी रकम या किन्हीं रकमों का, प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:–
(i) किसी राजनैतिक दल को; या
(ii) किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति को,
अभिदाय कर सकेगी:
परन्तु यह कि, यथास्थिति ऐसी रकम या रकमों का योग, जिसका कि किसी कंपनी द्वारा किसी वित्तीय वर्ष में अभिदाय किया जा सकेगा, तीन ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्षों के दौरान धारा 349 और 350 के उपबंधों के अनुसार अवधारित औसत शुद्ध लाभ के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।
स्पष्टीकरण–जहां कंपनी के किसी वित्तीय वर्ष का एक भाग, कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 1985 के प्रारंभ के पूर्व पड़ता है, और एक भाग ऐसे प्रारंभ के पश्चात् पड़ता है, वहां पश्चात्वर्ती भाग के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस उपधारा के अर्थांतर्गत और तट प्रयोजनों के लिए वित्तीय वर्ष है:
परन्तु यह और कि ऐसा कोर्इ अभिदाय किसी कंपनी द्वारा तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि निदेशक बोर्ड की बैठक में ऐसा अभिदाय करने संबंधी संकल्प पारित नहीं कर दिया जाता और ऐसा संकल्प इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए उसके द्वारा प्राधिकृत अभिदाय को करने और उसको स्वीकार करने को विधि की दृष्टि में न्यायोचित समझा जाएगा।
(3) उपधारा (1) और (2) उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना–
(क) किसी कंपनी द्वारा या उसकी ओर से या उसके लेखे ऐसे किसी व्यक्ति को दिलाया जाने वाला संदान या अभिदाय या संदाय, जो उसकी जानकारी में कोर्इ ऐसा क्रियाकलाप कर रहा है, जो ऐसा संदान या अभिदाय या संदाय किए जाने के समय युक्तिप्रक्त रूप से किसी राजनैतिक दल के लिए लोक समर्थन पर संभवत: प्रभाव डालने वाला समझा जा सकता है, ऐसे व्यक्ति को किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिए ऐसा संदान, अभिदाय या संदाय की रकम का अभिदाय समझा जाएगा;
(ख) किसी राजनैतिक दल द्वारा या उसकी ओर से अथवा उसके फायदे कि लिए किसी प्रकाशन में (जो स्मारिका, विवरणिका, टे्रक्ट, पंफलेट या उसी प्रकार का प्रकाशन हो) विज्ञापन पर किसी कंपनी द्वारा प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: उपगत व्यय की रकम–
(i) जहां ऐसा प्रकाशन किसी राजनैतिक दल द्वारा या उसकी ओर से किया जाता है, वहां ऐसे राजनैतिक दल को ऐसी रकम का अभिदाय समझी जाएगी;
(ii) जहां ऐसा प्रकाशन किसी राजनैतिक दल द्वारा या उसकी ओर से नहीं किया जाता है किन्तु उसके फायदे के लिए किया जाता है वहां उसका प्रकाशन करने वाले व्यक्ति को राजनैतिक प्रयोजन के लिए अभिदाय समझी जाएगी।
(4) प्रत्येक कंपनी अपने लाभ-हानि लेखा में उस वित्तीय वर्ष के दौरान, जिससे वह लेखा संबंधित है, किसी राजनैतिक दल को या किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिए किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अभिदाय की रकम या रकमें, अभिदाय की गर्इ कुल रकम की विशिष्टियां और उस दल या व्यक्ति का नाम देते हुए, जिन्हें ऐसी रकम का अभिदाय किया गया है, प्रकट करेगी।
(5) यदि कोर्इ कंपनी इस धारा के उपबंधों का उल्लंधन करते हुए कोर्इ अभिदाय करती है तो–
(क) वह कंपनी जुर्माने से, जो इस प्रकार अभिदाय की गर्इ रकम का तीन गुना हो सकेगा, दंडनीय होगी; और
(ख) कंपनी का प्रत्येक ऐसा अधिकारी, जो व्यतिक्रम करता है, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष की हो सकेगी और जुर्माने से भी दंडनीय होगी।
स्पष्टीकरण.–इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "राजनैतिक दल" से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 29क में रजिस्ट्रीकृत राजनैतिक दल अभिप्रेत है।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 391
लेनदारों और सदस्यों के साथ समझौता या ठहराव करने की शक्ति
391. (1) जहां कि कोर्इ समझौता या ठहराव–
(क) किसी कंपनी और उसके लेनदारों या उनके किसी वर्ग के बीच, अथवा
(ख) किसी कंपनी और उसके सदस्यों या उनके किसी वर्ग के बीच,
करने को प्रस्थापना है, वहां न्यायालय यथास्थिति लेनदारों या लेनदारों के वर्ग या सदस्यों या सदस्यों के वर्ग का अधिवेशन कंपनी के या कंपनी के किसी लेनदार या सदस्य के या ऐसी कंपनी की दशा में, जिसका परिसमापन किया जा रहा है, उसके समापक के आवेदन पर ऐसी रीति से, जैसी न्यायालय निर्दिष्ट करे, बुलाए जाने, आयोजित किए जाने और संचालित किए जाने के लिए आदेश दे सकेगा।
(2) यदि इतनी बहुसंख्या, जितनी यथास्थिति, लेनदारों या लेनदारों के वर्ग के अथवा सदस्यों या सदस्यों के वर्ग के धनमूल्य के तीन-चौथार्इ धनमूल्य का प्रतिनिधित्व करती है, अधिवेशन में उपस्थित होकर और या तो स्वयं अथवा उस दशा में, जिसमें कि परोक्षियों द्वारा धारा 643 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन अनुज्ञात है, परोक्षी के जरिए मत देकर किसी समझौते या ठहराव की बाबत, सहमत हो जाती है, तो वह समझौता या ठहराव उस दशा में, जिसमें कि वह न्यायालय द्वारा मंजूर कर दिया गया है, यथास्थिति, उन सब लेनदारों पर, उस वर्ग के सब लेनदारों पर, सब सदस्यों पर या उस वर्ग के सब सदस्यों पर और कंपनी पर भी, अथवा ऐसी कंपनी की दशा में, जिसका परिसमापन किया जा रहा है, कंपनी के समापक और अभिदायियों पर आबद्धकर होगा :
परन्तु किसी समझौते या ठहराव को मंजूर करने वाला कोर्इ आदेश न्यायालय द्वारा तब के सिवाय न दिया जाएगा जबकि न्यायालय का इस बारे में समाधान हो जाता है कि जिस कंपनी या जिस अन्य व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन आवेदन किया है, उसने कंपनी संबंधी सब तात्विक तथ्य तथा कंपनी की अंतिम वित्तीय स्थिति, कंपनी के लेखाओं पर संपरीक्षकों की अंतिम रिपोर्ट, कंपनी के संबंध में धारा 235 से लेकर 251 तक की धाराओं के अधीन किन्हीं अन्वेषण कार्रवाइयों का लम्बित होना तथा ऐसी ही अन्य बातें शपथ-पत्र द्वारा या अन्यथा न्यायालय पर प्रकट कर दी हैं।
(3) वह आदेश, जो न्यायालय द्वारा उपधारा (2) के अधीन किया गया है तब तक प्रभावी न होगा जब तक कि उस आदेश की प्रमाणित प्रति रजिस्ट्रार के यहां फाइल न कर दी गर्इ हो।
(4) हर ऐसे आदेश की एक प्रति उस आदेश की प्रमाणित प्रति पूर्वोक्त रूप से फाइल किए जाने के पश्चात् कंपनी के निकाले गए ज्ञापन की हर प्रति के साथ, अथवा ऐसी कंपनी की दशा में, जिसका ज्ञापन नहीं है, उस लिखत की ऐसी निकाली गर्इ हर प्रति के साथ, जिससे कंपनी गठित की गर्इ है या कंपनी का गठन परिनिश्चित किया गया है, उपाबद्ध की जाएगी।
(5) यदि उपधारा (4) का अनुपालन करने में व्यतिक्रम किया जाता है, तो कंपनी और कंपनी का हर ऐसा अधिकारी, जो व्यतिक्रम करता है, जुर्माने से, जो ऐसी हर प्रति की बाबत जिसके बारे में व्यतिक्रम किया गया है, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।
(6) न्यायालय, कंपनी के विरुद्ध किसी वाद या कार्रवार्इ के प्रारम्भ या चालू रखे जाने को इस धारा के अधीन अपने से किए गए आवेदन के पश्चात् किसी समय ऐसे निबंधनों पर, जैसे न्यायालय ठीक समझता है, तब तक के लिए रोक सकेगा जब तक उस आवेदन का अंतिम रूप से निपटारा न हो जाए।
| (7) ** | ** | ** |
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 392
समझौतों और ठहरावों को प्रवृत्त कराने की उच्च न्यायालय की शक्ति
392. (1) जहां कि उच्च न्यायालय किसी कंपनी के बारे में समझौते या ठहराव को मंजूर करने वाला कोर्इ आदेश धारा 391 के अधीन करता है, वहां–
(क) उसकी यह शक्ति होगी कि वह उस समझौते या ठहराव के क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करे; तथा
(ख) वह किसी बात की बाबत ऐसे निदेश अथवा उस समझौते या ठहराव में ऐसे कोर्इ उपान्तर, जैसे वह उस समझौते या ठहराव के समुचित क्रियान्वयन के लिए आवश्यक समझे, ऐसे आदेश देने के समय या तत्पश्चात् किसी समय कर सकेगा।
(2) यदि पूर्वोक्त न्यायालय का समाधान हो जाता है कि धारा 391 के अधीन मंजूर किए गए समझौते या ठहराव का समाधानपूर्वक क्रियान्वयन उपान्तरों के सहित या बिना नहीं किया जा सकता है, तो कंपनी के समापन का आदेश वह या तो स्वप्रेरणा से या कंपनी के कार्यकलाप में हितबद्ध किसी व्यक्ति के आवेदन पर दे सकेगा तथा ऐसे आदेश की बाबत यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम की धारा 433 के अधीन किया गया आदेश है।
(3) इस धारा के उपबंध, यावत्शक्य, ऐसी कंपनी के संबंध में लागू होंगे जिसकी बाबत समझौते या ठहराव को मंजूर करने वाला कोर्इ आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2001 के अधीन दिया गया है।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 393
लेनदारों और सदस्यों से हुए समझौते या ठहरावों की बाबत इत्तिला
393. (1) जहां लेनदारों या लेनदार के किसी वर्ग अथवा सदस्यों या सदस्यों के किसी वर्ग का अधिवेशन धारा 391 के अधीन बुलाया जाता है, वहां–
(क) अधिवेशन बुलाने वाली ऐसी हर सूचना के साथ, जो लेनदारों या सदस्यों को भेजी जाती है एक ऐसा कथन भी उपाबद्ध किया जाएगा जिसमें समझौते या ठहराव के निबंधन उपवर्णित हैं, तथा उनके प्रभाव की व्याख्या कर दी गर्इ है तथा विशिष्टत: जिसमें कंपनी के निदेशकों, प्रबंध निदेशक या प्रबंधक के कोर्इ भी तात्विक हित, भले ही वे उनकी उस हैसियत में या सदस्यों या लेनदारों की हैसियत में या अन्यथा हों, तथा समझौते या ठहराव का उन हितों पर उस दशा में और वहां तक प्रभाव में जिस तक कि और जहां तक कि वह प्रभाव अन्य व्यक्तियों के वैसे ही हितों पर प्रभाव से भिन्न है, कथित है;
(ख) अधिवेशन बुलाने वाली ऐसी हर सूचना में भी, जो विज्ञापन के जरिए दी गर्इ है, या तो पूर्वोक्त जैसा कथन या उस स्थान की, जिसमें, और उस रीति की, जिससे अधिवेशन में हाजिर होने वाले हकदार, लेनदार या सदस्य पूर्वोक्त जैसे कथन की प्रतियां अभिप्राप्त कर सकते हैं, अधिसूचना सम्मिलित होंगी।
(2) जहां कि समझौते या ठहराव का प्रभाव कंपनी के डिबेंचरधारियों के अधिकारों पर पड़ता है वहां डिबेंचरों का निर्गमन प्रतिभूत करने वाले किसी विलेख के न्यासियों की बाबत वैसी ही जानकारी और व्याख्या उक्त कथन में दी हुर्इ होगी, जैसी कंपनी के निदेशकों की बाबत दिए जाने के लिए अपेक्षित है।
(3) जहां कि विज्ञापन द्वारा दी गर्इ सूचना के अन्तर्गत यह अधिसूचना दी हुर्इ है कि उस समझौते या ठहराव के, जिसे करने की प्रस्थापना है, निबंधन उपवर्णित करने वाले तथा उनके प्रभाव की व्याख्या करने वाले कथन की प्रतियां अधिवेशन में हाजिर होने के हकदार लेनदारों या सदस्यों द्वारा अभिप्राप्त की जा सकती है, वहां उस कथन की प्रति ऐसे हकदार हर लेनदार या सदस्य उस रीति से आवेदन करने पर, जो सूचना में प्रज्ञापित की हुर्इ है, कंपनी से प्रभार-मुक्त पाने का हकदार होगा।
(4) जहां कि इस धारा की अपेक्षाओं में से किसी का अनुपालन करने में व्यतिक्रम किया जाता है वहां कंपनी और कंपनी का हर ऐसा अधिकारी, जो व्यतिक्रम करता है, जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा, तथा कंपनी के किसी समापक की तथा कंपनी के डिबेंचरों के निर्गमन को प्रतिभूत करने वाले विलेख के किसी न्यासी की बाबत इस उपधारा के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि वह कंपनी का अधिकारी है :
परन्तु कोर्इ भी व्यक्ति इस उपधारा के अधीन उस दशा में दण्डनीय न होगा, जिसमें कि वह दर्शित कर देता है कि अपने तात्विक हितों की बाबत आवश्यक विशिष्टियां देने से ऐसे किसी अन्य व्यक्ति के इन्कार के कारण वह व्यतिक्रम हुआ है, जो निदेशक, प्रबंध-निदेशक, प्रबंधक या डिबेंचरधारियों के लिए न्यासी है।
(5) कंपनी का हर निदेशक, प्रबंध-निदेशक या प्रबंधक तथा कंपनी के डिबेंचरधारियों का हर न्यासी अपने से संबंधित ऐसी सब बातों की सूचना कंपनी को देगा जैसी इस धारा के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हों तथा यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 394
कंपनियों के पुनर्गठन और समामेलन को सुकर बनाने के लिए उपबंध
394. (1) जहां कि न्यायालय में धारा 391 के अधीन कोर्इ आवेदन ऐसे समझौते या ठहराव को मंजूर करने के लिए किया जाता है, जिसे कंपनी और ऐसे किन्हीं व्यक्तियों के बीच, जो उस धारा में वर्णित हैं, करने की प्रस्थापना है, तथा न्यायालय को यह दर्शित कर दिया जाता है कि–
(क) यह समझौता या ठहराव करने का प्रस्थापना उस स्कीम के प्रयोजनों के लिए या उसके संबंध में की गर्इ है, जो किसी कंपनी या किन्हीं कंपनियों के पुनर्गठन के या किन्हीं दो या अधिक कंपनियों के समामेलन के बारे में है, तथा
(ख) जिस कंपनी का स्कीम से वास्ता है (और जिसे इस धारा में अन्तरक कंपनी कहकर निर्दिष्ट किया गया है) उस कंपनी का पूरा उपक्रम, सम्पत्ति या दायित्व या उसका या उनका कोर्इ भाग दूसरी कंपनी को (जिसे इस धारा में अन्तरिती कंपनी कहकर निर्दिष्ट किया गया है) उस स्कीम के अधीन अन्तरित कर दिया जाना है या कर दिए जाने हैं;
वहां न्यायालय या तो उस आदेश से, जिससे वह समझौते या ठहराव को मंजूर करता है, या किसी पश्चात्वर्ती आदेश से निम्नलिखित सभी बातों के लिए या उनमें से किन्हीं के लिए उपबंध कर सकेगा–
(i) किसी अन्तरक कंपनी के पूरे उपक्रम, सम्पत्ति या दायित्वों का या उसके या उनके किसी भाग का अन्तरिती कंपनी को अन्तरण;
(ii) अन्तरिती कंपनी द्वारा ऐसे किन्हीं अंशों (शेयरों), डिबेंचरों, पालिसियों का या अन्य वैसे ही हितों का, जो उस कंपनी में हैं, आबंटन या विनियोग, जो समझौते या ठहराव के अधीन उस कंपनी द्वारा किसी व्यक्ति को या के लिए आबंटित या विनियोजित किए जाने हैं;
(iii) अन्तरक कंपनी के द्वारा या विरुद्ध किसी लंबित विधिक कार्यवाही का अंतरिती कंपनी के विरुद्ध या द्वारा चालू रखा जाना;
(iv) किसी अन्तरक कंपनी का परिसमापन किए बिना उसका विघटन;
(v) उन व्यक्तियों के लिए किया जाने वाला उपबंध, जो समझौते या ठहराव के प्रति ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से, जैसी न्यायालय निर्दिष्ट करता है, अपनी विसम्मति प्रकट करते हैं; तथा
(vi) ऐसी आनुषंगिक, पारिमाणिक और अनुपूरक बातें, जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि पुनर्गठन या समामेलन पूर्ण रूप से और प्रभावी तौर पर कर लिया जाएगा:
परन्तु ऐसे किसी भी समझौते या ठहराव के लिए मंजूरी, जिसके करने की प्रस्थापना उस कंपनी का, जिसका परिसमापन किया जा रहा है, किसी अन्य कंपनी या किन्हीं अन्य कंपनियों से समामेलन करने की स्कीम के प्रयोजनों के लिए अथवा वैसी स्कीम के संबंध में है, न्यायालय तब के सिवाय न देगा जबकि कंपनी विधि बोर्ड से या रजिस्ट्रार से यह रिपोर्ट न्यायालय को प्राप्त हो गर्इ है कि कंपनी के कार्यकलाप का संचालन ऐसी रीति से नहीं किया गया है कि जिससे सदस्यों के हितों पर या लोक हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है :
परन्तु यह और कि किसी अन्तरक कंपनी के विघटन के लिए खंड (iv) के अधीन कोर्इ आदेश न्यायालय तक के सिवाय नहीं करेगा जबकि शासकीय समापक ने कंपनी की बहियों और कागजपत्रों की संवीक्षा करके न्यायालय को यह रिपोर्ट कर दी है कि कंपनी के कार्यकलाप का संचालन ऐसी रीति से नहीं किया गया है जिससे उसके सदस्यों के हितों पर या लोक हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
(2) जहां कि इस धारा के अधीन वाला कोर्इ आदेश किसी सम्पत्ति या दायित्वों के अन्तरण के लिए उपबंध करता है, वहां उस आदेश के आधार पर वह सम्पत्ति तथा उस दशा में जिसमें कि आदेश में यह निदेश दिया गया है, ऐसे किसी भार से मुक्त होकर, जो उस समझौते या ठहराव के कारण प्रभावशील नहीं रह गया है, अन्तरिती कंपनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगी और वे दायित्व अंतरिती कंपनी को अंतरित हो जाएंगे और उसके दायित्व हो जाएंगे।
(3) इस धारा के अधीन आदेश के किए जाने के तीस दिनों के अन्दर हर कंपनी, जिसके संबंध में वह आदेश दिया गया है, उस आदेश की एक प्रमाणित प्रति रजिस्ट्रार के यहां रजिस्ट्रीकरण के लिए फाइल करा देगी।
यदि इस उपधारा के अनुपालन में व्यतिक्रम किया जाता है तो कंपनी और कंपनी का हर ऐसा अधिकारी, जो व्यतिक्रम करता है, जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा।
(4) इस धारा में–
(क) ''सम्पत्ति'' के अंतर्गत हर वर्णन की सम्पत्ति, अधिकार और शक्तियां आती हैं; और दायित्वों के अंतर्गत हर वर्णन के कर्तव्य आते हैं, तथा
(ख) ''अन्तरिती कंपनी'' के अंतर्गत ऐसी कोर्इ कंपनी नहीं आती जो ऐसी कंपनी से भिन्न है, जो इस अधिनियम के अर्थ के अन्दर कंपनी है, किंतु ''अन्तरक कंपनी'' के अंतर्गत कोर्इ निगम निकाय आता है भले ही वह इस अधिनियम अर्थ के अंदर कंपनी हो या नहीं।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 620क
निधियों आदि को इसके लागू होने में, अधिनियम में उपांतरित करने की शक्ति
620क. (1) इस धारा में ''निधि'' या ''पारस्परिक फायदा सोसाइटी'' से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार ने शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यथास्थिति यह घोषित किया हो कि वह निधि या पारस्परिक फायदा सोसाइटी है।
(2) केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के उपबंधों में से ऐसे कोर्इ उपबंध, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हैं,–
(क) किसी निधि या पारस्परिक फायदा सोसाइटी को लागू नहीं होंगे, अथवा
(ख) किसी निधि या पारस्परिक फायदा सोसाइटी को ऐसे अपवादों, उपान्तरों और अनुकूलनों सहित लागू होंगे जैसे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हों।
(3) उपधारा (1) के अधीन निकाली गर्इ हर अधिसूचना की प्रति उसके निकाले जाने के यथाशक्य शीघ्र पश्चात् संसद के हर सदन के समक्ष रखी जाएगी।
कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 620क के अधीन अधिसूचित निधियां/पारस्परिक फायदा सोसाइटियां
कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 620क द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केन्द्रीय सरकार–
(i) इससे उपाबद्ध अनुसूची 1 और 2 में विनिर्दिष्ट कंपनियों को क्रमश: निधियां और पारस्परिक फायदा सोसाइटियां घोषित करती है; और
(ii) यह निदेश देती है कि इससे उपाबद्ध अनुसूची 3 के स्तंभ (1) में विनिर्दिष्ट उक्त अधिनियम के उपबंध ऐसी निधियों और पारस्परिक फायदा सोसाइटियों को, यथास्थिति, लागू नहीं होंगे या उसके स्तंभ (2) में तत्स्थानी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट अपवादों, उपांतरणों और अनुकूलनों के साथ लागू होंगे।
अनुसूची 1 : निधियां
1. आडमबक्कम जनोपकार शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
2. अलंडूर प्रजा सहाय शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
3. भुवनगिरी हिन्दू शाश्वत परोपकार निधि लिमिटेड, मद्रास
4. चेन्नर्इ श्री अंडल धनशेखर शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
5. चेन्नर्इ श्री एकमबरेश्वरर शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
6. चिदम्बरम् हिन्दू शाश्वत जननुकुल निधि लिमिटेड, मद्रास
7. चिंगलपुट धनशेखर निधि लिमिटेड, मद्रास
8. चूलर्इ जनोपकार निधि लिमिटेड, मद्रास
9. कांजीवरम होडसनपेट धनशेखर निधि लिमिटेड, मद्रास
10. कुड्डालूर परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
11. एगमोर बेनिफिट सोसाइटी थर्ड ब्रांच लिमिटेड, मद्रास
12. कुंबकणम म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
13. मद्रास कैथेलिक परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
14. मद्रास क्रिश्चियन बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
15. मद्रास म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
16. मद्रास पुरसवाल्कम हिन्दू जनोपकार शाश्वत निधि या परमानेन्ट जनरल बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
17. मदुरा हिन्दू परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
18. मुथियाल्पेट बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
19. मय्लापोर हिन्दू परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
20. नागापट्नम् परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
21. नुगमबक्कम् शाश्वत धन रक्षा निधि लिमिटेड, मद्रास
22. पुडुपक्कम परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
23. पुरसवातकम् धनवर्धन शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
24. पुरसवातकम् हिन्दू संतत् संघ निधि फस्र्ट ब्रांच लिमिटेड, मद्रास
25. पुरसवातकम् परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
26. परस्पर सहाय निधि (पेरम्बूर) लिमिटेड, मद्रास
27. श्याली जनोपकार निधि लिमिटेड, मद्रास
28. शिवगण श्री मीनाक्षी स्वदेशी शाश्वत् निधि लिमिटेड, मद्रास
29. श्री विल्लीपुथुर परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
30. सनराइज कारपोरेशन लिमिटेड, मद्रास
31. थियागरायनगर फंड लिमिटेड, मद्रास
32. तिनेलवेल्ली डिस्ट्रिक्ट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
33. थिरुवत्तीश्वरन् हिन्दू जनोपकार निधि लिमिटेड, मद्रास
34. ट्रिप्लीकेट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
35. त्रिवेल्लूर जनोपकार शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
36. विल्लुपुरम् पीपुल्स म्युचुअल बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड, मद्रास
37. अबिरामपुरम् फंड लिमिटेड, मद्रास
38. अर्काट धन शेखर निधि लिमिटेड, मद्रास
39. अर्काट तिरुवल्लुवर निधि लिमिटेड, मद्रास
40. सरस्वती विलासम "ाणमुगनन्दा निधि लिमिटेड, मद्रास
41. थिरुमगल म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
42. वरलक्ष्मी (फंड) (वेल्लूर) लिमिटेड, मद्रास
43. वेल्लूर शाश्वत् निधि लिमिटेड, मद्रास
44. वलजाबाद धनशेखर शाश्वत् निधि लिमिटेड, मद्रास
45. चित्तूर शाश्वत् निधि लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
46. मदनापल्ले श्री वेंकटेश्वर निधि लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
47. अनंतपुर श्री सत्यनारायण निधि लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
48. नेल्लोर परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
49. अडोनी आर्य वैश्य फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
50. धर्मवरम् म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड, आंध्र प्रदेश
51. अनन्तपुर नेशनल फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
52. हिन्दूपुर म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
53. मडकासिरा म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
54. पेणुकोंडा मारुथि बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
55. बंगलौर कंटोनमेन्ट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मैसूर
56. हरपनहल्लर्इ श्री वेंकटरमनास्वामी परमानेंट भंडार लिमिटेड, मैसूर
57. बल्लेरी ब्रुसेपेट्टाह हिन्दू म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मैसूर
58. होस्पेट रियोत्स एग्रो-इंडस्ट्रियल कारपोरेशन लिमिटेड, मैसूर
59. अनन्तपुर श्री वसवम्बा परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
60. श्री वसवी परमेश्वरी परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
61. कुरीज और ट्रेड्स लिमिटेड, एर्नाकुलम्
62. सैदापेट शाश्वत् निधि लिमिटेड, मद्रास
63. श्री राजगोपाल बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
64. मद्रास क्रोमपेट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
65. अडोनी म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, आंध्र प्रदेश
66. श्रीमन मध्व सिद्धांत परमानेन्ट निधि लिमिटेड
67. थिरुमलर्इ शाश्वत् सहाय निधि लिमिटेड
68. तहेरी एड फंड लिमिटेड
69. कुंबकोणम् डायोसेशन कैथोलिक्स परमानेंट फंड लिमिटेड
70. मठ वार निधि लिमिटेड
71. अमृतसर राधास्वामी फाइनेन्स कंपनी (प्रा.) लिमिटेड
72. नम्बालम् बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड
73. मक्कल नला अभिवृद्धि निधि लिमिटेड
74. किल्पंक बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड
75. समरस म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
76. क्रोमपेट शाश्वत निधि लिमिटेड
77. श्री राजा राजा चोलन म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
78. पालघाट परमानेन्ट फंड लिमिटेड
79. ग्राम नला शाश्वत निधि लिमिटेड
80. कोंडन म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
81. श्री सैथर्इ म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
82. मिनी म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
83. अन्नानगर जनोपकार निधि लिमिटेड
84. धनलक्ष्मी फंड (इंडिया) लिमिटेड
85. अमीनजीकरर्इ बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
86.
87. जवाहर नगर निधि (मद्रास) लिमिटेड
88. शिनाय नगर शाश्वत निधि लिमिटेड, मद्रास
89.
90.
91. कायनात परमानेंट फंड लिमिटेड
92. पीरावोम् फंडस लिमिटेड
93. चेन्नापुरी म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
94. चेटपेट शाश्वत निधि लिमिटेड
95. रोयापेट्टाह बेनिफिट फंड लिमिटेड
96. शिनाय नगर बेनिफिट फंड लिमिटेड
97. कलर्इमगल म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
98. मिनी मुथुत्तु म्युचुअल फंड लिमिटेड
99. द्रविड़ियन बेनिफिट फंड लिमिटेड
100. अशोकनगर जनोपकार शाश्वत निधि लि.
101.
102. सेंट मैरीज़ फाइनेन्स लिमिटेड
103. तमिलनाडु विश्वकर्मा म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
104. श्री अम्बिका निधि लिमिटेड
105. वैस्ट मम्बलम् परमानेन्ट फंड लिमिटेड
106. अल-फतह म्युचुअल बेनिफिट्स लिमिटेड
107. मनिपाल सौभाग्य निधि लिमिटेड
108. जयलक्ष्मी म्युचुअल बेनिफिट्स फंड लिमिटेड
109. कोडम् बक्कम् बेनिफिट्स फंड लिमिटेड
110.
111. पार्क टाउन बेनिफिट फंड लिमिटेड
112.
113.
114.
115. कांची म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
116. थिरुमंगलम् जनोपकार परमानेन्ट फंड लिमिटेड
117. सेंट मेरीज़ फंड लिमिटेड
118. श्रीवरी बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड
119. गिलनगर बेनिफिट फंड लिमिटेड
120. केरल परमानेन्ट फंड लिमिटेड
121. पम्मल मक्कल नला फंड लिमिटेड
122. पांडिचेरी म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड
123. ब्लिस बेनिफिट फंड लिमिटेड
124-131.
132. अल्वरपेट बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
133. अल-नजीब मिल्ली म्युचुअल बेनिफिट फंड्स लिमिटेड, उत्तर प्रदेश
134. निराप्पुकट्टिल म्युचुअल फंड्स लिमिटेड, केरल
135. मन्नाडी परमानेन्ट फंड लिमिटेड
136. विरुधु नगर बेनिफिट फंड लिमिटेड
137. श्री अखिलकृष्ण बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड
138. साउथ र्इस्ट बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
139. रासी निधि लिमिटेड, कोयम्बत्तूर
140. श्री कंडास्वामी परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
141. श्री पद्मनाभ परमानेंट फंड लिमिटेड, मद्रास
142.
143. शुभम् बेनिफिट फंड लिमिटेड, तमिलनाडु
144. सार्इबाला बेनिफिट फंड लिमिटेड, तमिलनाडु
145. थुलांशी कृष्ण परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
146. इंडियन मेम्बर्स बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
147. नंगानल्लूर परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
148. पेरावल्लूर परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
149. अयोध्या बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
150. सेल्फ ग्रोथ निधि लिमिटेड, बंगलौर
151. श्री समुन्देश्वरी बेनिफिट फंड लिमिटेड
152. आर्इ.सी.एस. बेनिफिट फंड लिमिटेड
153. श्री नवरत्न बेनिफिट फंड लिमिटेड
154. सुलीवन गार्डन बेनिफिट फंड लिमिटेड
155. शबाब इस्लामिक इन्वेस्टमेंट एंड म्युचुअल बेनिफिट्स (इंडिया) लिमिटेड, लखनऊ
156. वेंकटेशपुरम् बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
157. कनारा निधि लिमिटेड, मणिपाल
158. एस.एम.पी. म्युचुअल बेनिफिट लिमिटेड, हल्द्वानी, उत्तरांचल
159. ट्राइवेल फाइनेन्स म्युचुअल बेनिफिट कम्पनी लिमिटेड, नर्इ दिल्ली
160. दि हसनपुरम् म्युचुअल बेनिफिट परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
161. मनप्पुरम् बेनिफिट फंड लिमिटेड, त्रिसूर
162. गलेक्सी म्युचुअल बेनिफिट कंपनी लिमिटेड, लखनऊ
163. अलगेन्द्रन बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
164.
से
171.
172. देवता म्युचुअल बेनिफिट्स लिमिटेड, मेरठ
173. संजीवारायन बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
174. मनाली बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
175. एल्डीको म्युचुअल बेनिफिट कंपनी लिमिटेड, लखनऊ
176. सिद्धार्थ म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड, नर्इ दिल्ली
177. पल्लवन् म्युचुअल बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
178. देवीदास फाइनेन्स लिमिटेड, पुत्तूर
179. थिरु-वी-का नगर बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
180. कुमारी बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
181. वेल्लावेडु बेनिफिट फंड लिमिटेड वल्लावेडु, तमिलनाडु
182. प्रोम्पटेक बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
183. सर्वजन बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
184. श्री मुथुकुमारस्वामी परमानेन्ट फंड लिमिटेड, मद्रास
185. परफेक्ट बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास
186. त्रिचि रोकसिटी बेनिफिट फंड लिमिटेड, त्रिचि, तमिलनाडु
187. वेडारनियम बेनिफिट फंड लिमिटेड, वेडारनियम, तमिलनाडु
188. क्रिस्टल इंडिया म्युचुअल बेनिफिट्स लिमिटेड, जिला नैनीताल, उत्तरांचल
189. गौत्तमी परमानेन्ट फंड लिमिटेड, काकीनाडा, आंध्र प्रदेश
190. कावेरीपटनम् बेनिफिट फंड लिमिटेड, धर्मपुरी, तमिलनाडु
191. श्री शान्तिनाथ बेनिफिट फंड लिमिटेड, वल्लुपुरम, तमिलनाडु
192. वीजे बेनिफिट फंड लिमिटेड, मद्रास।
193. चेपक बेनिफिट फंड लिमिटेड, चेन्नर्इ।
194. भाग्य लक्ष्मी बेनिफिट फंड लिमिटेड, चेन्नर्इ।
195. समाया पुरम मारियाम्मन बेनिफिट फंड लिमिटेड, त्रिचि, तमिलनाडु।
196. लक्ष्मी पुरम बेनिफिट फंड लिमिटेड, तिरूनिनरापुर, चेन्नर्इ।
197. श्री देवीगायत्रि बेनिफिट फंड लिमिटेड, चेन्नर्इ।
198. इराबि विनयागार बेनिफिट फंड लिमिटेड, कन्याकुमारी जिला, तमिलनाडु।
199. भावसर मराटाह बेनिफिट फंड लिमिटेड, चेन्नर्इ।
200. मिन्जुर बेनिफिट फंड लिमिटेड, मिन्जुर, तमिलनाडु।
201. शक्ति बेनिफिट फंड लिमिटेड, चेन्नर्इ।
202. कुलितलर्इ बेनिफिट फंड्स लिमिटेड, कुलितलर्इ, तमिलनाडु।
203. कुडुम्बा विलाक्कु बेनिफिट फंड लिमिटेड, थंजावुर, तमिलनाडु।
204. करूर बेनिफिट फंड लिमिटेड, करूर, तमिलनाडु।
205. टाऊन बेनिफिट फंड (कुम्बाकोनम) लिमिटेड, कुम्बाकोनम, तमिलनाडु।
206. सिटी बेनिफिट फंड (कुम्बाकोनम) लिमिटेड, कुम्बाकोनम, तमिलनाडु।
207. कस्तूरीबार्इ बेनिफिट फंड लिमिटेड, वेल्लौर, तमिलनाडु।
208. मर्चेंट्स बेनिफिट फंड लिमिटेड, 341, इंदिरा नगर, नेवेली - 607801, तमिलनाडु।
209. बेथेल बेनिफिट फंड लिमिटेड, 33(ओल्ड नं. 18) श्रीनिवास राघवन रोड़, श्रीनिवास नगर, पेरूनगलापुर, चेन्नर्इ - 600063।
210. टिंडीवनम बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 4, थिरूवल्लूवर स्ट्रीट, टिंडीवनम - 604001 तमिलनाडु।
211. नीमा बेनिफिट फंड लिमिटेड, नीमा बिल्डिंग, अडूर, पाथानामथिट्टा जिला, केरल - 691523।
212. श्री मारगथामबिगार्इ बेनिफिट फंड लिमिटेड, 466, जे. एन. स्ट्रीट, टिंडीवनम - 604001 तमिलनाडु।
213. वर्थ का मंडल निधि लिमिटेड, XL/6013, टी.डी. शापिंग काम्पलेक्स, टी.डी. वेस्ट रोड़, एर्नाकुलम - 682035, केरल।
214. आयनावरन परमानेंट फंड लिमिटेड, 11/7, परसुराम र्इशवरन कोइल स्ट्रीट, आयनावरम चेन्नर्इ, 600023।
215. अमरावत्ती बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 15, पहली स्ट्रीट, कोनरानस्थिल रोड़, गोपालपुरम, चेन्नर्इ 600086।
216. श्री वेंकर करूपा परमानैंट फंड लिमिटेड, 3-5-131 अदरली सेन, तिरूपत्ति, 577501, आंध्र प्रदेश।
217. अरूमबक्कम बेनिफिट फंड लिमिटेड, 28ए, न्यू नं. 6, पूनामल्लर्इ हार्इ रोड़ अरूमबम्कम, चेन्नर्इ - 600160।
218. थिरूवनमियूर परमानैंट फंड लिमिटेड, अन्नामल्लर्इ काम्पलेक्स, 123ए. डा. मुथुलक्ष्मी रोड़, चेन्नर्इ - 600041।
219. हरि शंकर बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 5, र्इस्ट स्ट्रीट, तिरुकोइलूर - 605757, तमिलनाडु।
220. चिरंजीवी बेनिफिट फंड लिमिटेड, 13/7, थिरूचेंदूर रोड़, तुटीकोरीन - 628003, तमिलनाडु।
221. श्री बेनिफिट फंड लिमिटेड, 39, बाजार स्ट्रीट श्री कली, 609110, तमिलनाडु।
222. विल्लीवम्कम जनोपकार फंड लिमिटेड, 1, मीटू स्ट्रीट, विल्लीवक्कम, चेन्नर्इ 600049।
223. साउथ मद्रास बेनिफिट फंड लिमिटेड, 20 कल्लुकरन स्ट्रीट, मार्इलापोर, चेन्नर्इ 600004।
224. थिरुवल्लूर थिरिपुरासुंदरी बेनिफिट फंड लिमिटेड, 33, नार्थ राजा स्ट्रीट, थिरुवल्लूर- 602001, तमिलनाडु।
225. श्री अन्नामलर्इ बेनिफिट फंड लिमिटेड, प्रथम तल, अन्नामलर्इ टावर, 50, कुबेरा स्ट्रीट, विल्लुपुरम-605602, तमिलनाडु।
226. थेन्डरल बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 44, छठी क्रास स्ट्रीट, एम.के.बी. नगर, चेन्नर्इ-600039।
227. टी.वी.आर. बेनिफिट फंड लिमिटेड, 66, र्इस्ट मेन स्ट्रीट, थिरुवरुर-610001, तमिलनाडु।
228. लालपेट बेनिफिट फंड लिमिटेड, 2/60 (नया संख्यांक 2/87), मेन रोड, लालपेट-639105, करूर जिला, तमिलनाडु।
229. जय भारत बेनिफिट फंड लिमिटेड, नया संख्यांक 15(8), सी.एन.के. रोड, चेपक, चेन्नर्इ-600005।
230. ट्विन सिटिज़ परमानेंट फंड लिमिटेड, 1.1.1990, अशोक नगर एक्सटेंशन, गांधी नगर, हैदराबाद-500080, आंध्र प्रदेश।
231. थियागडुरूगम बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 7, कावरर्इ स्ट्रीट, थियागडुरूगम-606206, तमिलनाडु।
232. सेमबियम बेनिफिट फंड लिमिटेड, नया सं. 154 (पुराना सं. 251), पेपर मिल्स रोड, प्रथम तल, पेरमबूर, चेन्नर्इ-600011।
233. विजयशुभम बेनिफिट फंड लिमिटेड, 117, नार्थ कार स्ट्रीट, सरकली-609110, तमिलनाडु।
234. मदुरर्इ सिटी बेनिफिट फंड लिमिटेड, 71, नार्थ वेली स्ट्रीट, सिम्मक्काल, मदुरर्इ-625001, तमिलनाडु।
235. राजापलायम बेनिफिट फंड लिमिटेड, 428-ए, अंबालपुली बाजार, प्रथम तल, राजापलायम-626117, तमिलनाडु।
236. प्रकाशम डिस्ट्रिक्ट परमानेंट फंड लिमिटेड, 23-1-106, गांधी रोड, ओंगोल-523001, आंध्र प्रदेश।
237. कलक्टर नगर बेनिफिट फंड लिमिटेड, 2/267, मुगाप्पेयर र्इस्ट, चेन्नर्इ-600050।
238. चोरडिया बेनिफिट फंड लिमिटेड, 29/ए2, पनरुति रोड, उलुंडरपेट-606107, तमिलनाडु।
239. एस.आर.एम. बेनिफिट फंड लिमिटेड, 3, वीरासामी स्ट्रीट, वेस्ट मामबलम, चेन्नर्इ-600033।
240. र्इस्ट वेस्ट बेनिफिट फंड लिमिटेड, एफ 41/4, प्रथम तल, फस्र्ट मेन रोड, अन्ना नगर र्इस्ट, चेन्नर्इ-600102।
241. वरियार बेनिफिट फंड लिमिटेड, फ्लैट सं. 193/8, एशियाड कालोनी, जवाहरलाल नेहरू रोड, अन्ना रोड, वेस्ट एक्सटेंशन, चेन्नर्इ-600101।
242. एजाक्स बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 666/1, टी.एच. रोड, चेन्नर्इ-600019।
243. मुथुट मर्केंटाइल सिंडिकेट लिमिटेड, 75, अट्टुकल शापिंग काम्प्लेक्स, र्इस्ट फोर्ट, थिरूवनंथापुरा-695023, केरल।
244. उत्तिरामेरूर बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 45, बाजार स्ट्रीट, उत्तिरामेरूर-603406, तमिलनाडु।
245. काशी विश्वनाथार (चेन्नर्इ) बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 9, मार्केट स्ट्रीट (प्रथम तल) आयनावरम, चेन्नर्इ-600023।
246. राज बेनिफिट फंड लिमिटेड, 2 एफ, भारती रोड, कुड्डालोर-607001, तमिलनाडु।
247. त्रिशि बेनिफिट फंड लिमिटेड, 227 एफ, राय बिल्डिंग, राजाक्कामंगलम रोड, रामनपुथुर, नगरकोइल-4, तमिलनाडु।
248. विलावनकोड सेल्फरिलाइंस क्रेडिट सर्विसेज़ लिमिटेड, गुड न्यूज़ सेंटर, उन्नामलाकाड़र्इ- 629179, तमिलनाडु।
249. मुथुट एम. जार्ज परमानेंट फंड लिमिटेड, पी.बी. सं. 11, मुथुट बिल्डिंग्स, कोजनचेरि, केरल।
250. नार्थ वेस्ट मद्रास बेनिफिट सोसाइटी लिमिटेड, 59/22ए, फस्र्ट मेन रोड, जवाहर नगर, चेन्नर्इ-600082।
251. पुरासर्इ बेनिफिट फंड लिमिटेड, 60 (पुराना सं. 169), वेल्लाला स्ट्रीट, पुरासावल्कम, चेन्नर्इ-600084.
252. धन चक्र परमानेंट फंड (इंडिया) लिमिटेड, द्वार सं. 3-57/1, विनायक मंदिर के पीछे, मेन रोड, कोन्डापल्ली, 521228, विजयवाडा, आंध्र प्रदेश।
253. विजय कृष्ण बेनिफिट फंड लिमिटेड, गजावल्ली मेन्शन्स, 11-14-5, एस.बी.आर्इ. वेलागलेटीवरी स्ट्रीट, विजयवाड़ा-520001, आंध्र प्रदेश।
254. रानी मंगाम्माल बेनिफिट फंड लिमिटेड, 160, बिग बाजार स्ट्रीट, त्रिचि-620008, तमिलनाडु।
255. श्री वरदाराजा बेनिफिट फंड लिमिटेड, नया सं. 149/1, पुराना सं. 63/1, पुरासावल्कम हार्इ रोड, पुरासावल्कम, चेन्नर्इ-600007.
256. श्री काल्लिहाम्बाल बेनिफिट फंड लिमिटेड, सं. 281/18, टी.एच. रोड, चेन्नर्इ-600021.
257. कोस्टल परमानेंट फंड लिमिटेड, 11-62-125, कनाल रोड, विजयवाड़ा-520001, आंध्र प्रदेश।
अनुसूची 2 : पारस्परिक फायदा सोसाइटियां
बीमा कंपनी, 1938 (1938 का 4) की धारा 95 की उपधारा (1) के खंड (क) में यथापरिभाषित प्रत्येक ''पारस्परिक बीमा कंपनी''।
कंपनी अधिनियम, 1956 की अनुसूची 6 का भाग 2 और 3
अनुसूची 6
भाग 2
लाभ-हानि लेखा विषयक अपेक्षाएं
1. इस भाग के उपबंध उस आय-व्यय लेखा को, जो अधिनियम की धारा 210 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट है, वैसी ही रीति से, जैसी वे लाभ-हानि लेखा को लागू होते हैं, किंतु निदेशों विषयक उपान्तर सहित, जो उस उपधारा में विनिर्दिष्ट है, लागू होंगे।
2. लाभ-हानि लेखा–
(क) इतनी स्पष्टता से ऐसे तैयार किया जाएगा कि जितनी कालावधि का वह लेखा है उतनी के दौरान कंपनी के कर्म साधन का फल स्पष्ट रूप से संप्रकट हो जाए; तथा
(ख) अनावर्ती संव्यवहारों पर या असाधारण स्वरूप के संव्यवहारों के विषय में आकलन या प्राप्तियों तथा विकलनों या व्ययों सहित हर तात्विक बात संप्रकट करने वाला होगा।
3. लाभ-हानि लेखा में वे सब मदें, जो कंपनी की आय और कंपनी के व्ययों से संबंधित हैं, अत्यंत सुविधापूर्ण शीर्षकों के नीचे कराने से लिखी होगी तथा विशिष्टत: उसमें उस कालावधि के बारे में, जितनी के लिए वह लेखा है, निम्नलिखित जानकारी संप्रकट की जाएगी–
(i) (क) व्यापारावर्त, अर्थात् वह संकलित रकम जितनी के कंपनी द्वारा विक्रय किए गए हैं, जिसमें कंपनी द्वारा व्यौहार किए गए मालों के प्रत्येक वर्ग के बारे में विक्रय की रकम दी जाएगी और प्रत्येक वर्ग के ऐसे विक्रयों की मात्राएं उपदर्शित की जाएंगी।
(ख) अधिनियम की धारा 294 के अंतर्गत एकमात्र विक्रय अभिकर्ताओं को दिया जाने वाला कमीशन।
(ग) अन्य विक्रय अभिकर्ता को दिया गया कमीशन।
(घ) विक्रयों पर प्रायिक व्यापारिक डिस्काउंट (बट्टे) में भिन्न दलाली और डिस्काउंट (बट्टा)।
(ii) (क) विनिर्माता कंपनियों की दशा में,–
(1) मद के अनुसार ह्रास बतलाते हुए और उसकी मात्राएं उपदर्शित करते हुए उपयुक्त कच्चे माल की कीमत इस ह्रास में यथासंभव, सभी महत्त्वपूर्ण आधारिक कच्चे मालों की पृथक् मदों के रूप में दर्शित किया जाएगा। अन्य विनिर्माताओं से प्राप्त मध्यस्थ वस्तुओं या घटकों का उस दशा में उनकी मात्रा न बतलाते हुए यथोचित शीर्षकों के नीचे समूहीकरण किया जाएगा जबकि ह्रास में सम्मिलित की जाने के लिए उनकी सूची अधिक बड़ी हो। परन्तु उन सभी मदों को जिनका अलग-अलग मूल्य, उपयुक्त किए गए कच्चे माल के कुल मूल्य का 10 प्रतिशत या अधिक है, ह्रास में उनकी मात्रा सहित पृथक् और सुभिन्न मदों के रूप में दिखाया जाएगा।
(2) प्रत्येक वर्ग के माल के बारे में ह्रास बतलाते हुए और उनकी मात्राओं को उपदर्शित करते हुए उत्पादित माल का आरंभिक और बंद स्टाक।
(ख) व्यापारिक कंपनियों की दशा में, कंपनी द्वारा व्यापार किए गए मालों के प्रत्येक वर्ग के बारे में ह्रास बतलाते हुए और उनकी मात्राएं उपदर्शित करते हुए किए गए क्रय और उसका आरंभिक और बंद स्टाक।
(ग) जो कंपनियां सेवा कर रही हैं या उनका प्रदाय कर रही हैं, उनकी दशा में की गर्इ या प्रदाय की गर्इ सेवाओं से व्युत्पन्न सकल आय।
(घ) ऊपर के खंड (क), (ख) और (ग) में वर्णित प्रवर्गों में से एक से अधिक में आने वाली कंपनी की दशा में यदि आरंभिक और बंद स्टाक क्रय, विक्रय और मूल्य और मात्रा संबंधी ह्रास कच्चे माल का उपभोग तथा की गर्इ सेवाओं में हुर्इ सकल आय दिखा दिया जाता है, तो यह बात यहां दी गर्इ अपेक्षाओं का पर्याप्त अनुपालन होगी।
(ड़) अन्य कंपनियों की दशा में, विभिन्न शीर्षकों के अधीन व्युत्पन्न सकल आय।
टिप्पण 1 : कच्चे माल की मात्रा, क्रय, स्टाक और व्यापारावर्त, मात्रा-संबंधी उन अभिधानों के नाम से अभिव्यक्त किए जाएंगे जिनसे उनका प्रसामान्यत: बाजार में क्रय या विक्रय किया जाता है।
टिप्पण 2 : मद (ii)(क), (ii)(ख) और (ii)(घ) के प्रयोजन के लिए, वे मद माल के पृथक् वर्गों के रूप में समझे जाएंगे जिनके लिए कंपनी के पास पृथक् औद्योगिक अनुज्ञप्तियां हैं। परन्तु जहां किसी कंपनी के पास एक ही मद के लिए विभिन्न स्थानों पर उत्पादन के लिए या अनुज्ञप्त हैसियत के प्राप्त विस्तार के लिए एक से अधिक औद्योगिक अनुज्ञप्तियां हैं, वहां ऐसी सभी अनुज्ञप्तियों के अंतर्गत आने वाली मद एक वर्ग के रूप में समझी जाएगी। व्यापारिक कंपनियों की दशा में, आयात अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करते समय आयातित मदों को मुख्य आयात और निर्यात नियंत्रक द्वारा अपनाए गए वर्गीकरण के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा।
टिप्पण 3 : क्रयों, स्टाक और व्यापारावर्त के ह्रास बतलाते समय, फालतू पुर्जे और उपांगों जैसी मदों को, जिनकी सूची इतनी बड़ी है कि उन्हें ह्रास में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है, परिमाण न बतलाते हुए उचित शीर्षकों के नीचे समूहीकृत किया जा सकेगा, परन्तु उन सभी मदों को जिनका अलग-अलग मूल्य, यथास्थिति, क्रय, स्टाक या व्यापारावर्त के सकल मूल्य का दस प्रतिशत या अधिक है, अलग-अलग मात्रा सहित पृथक् और सुभिन्न मदों के रूप में दिखाया जाएगा।
(iii) जिन समुत्थानों के संकर्मों पर काम चल रहा है, उनकी दशा में वे रकमें जितनी तक ऐसे संकर्म लेखा कालावधि के प्रारंभ पर और अंत पर पूरे हो चुके हैं;
(iv) स्थिर आस्तियों में अवक्षयण, उनके नवीकरण या उनके मूल्य में कमी के लिए उपबंधित रकम में,
यदि ऐसा उपबंध अवक्षयण प्रभार के रूप में नहीं किया गया है, तो ऐसा उपबंध करने के लिए अपनार्इ गर्इ रीति।
यदि अवक्षयण के लिए कोर्इ उपबंध नहीं किया गया है, तो यह तथ्य कि कोर्इ उपबंध नहीं किया गया है, दर्ज किया जाएगा तथा अधिनियम की धारा 205(2) के अनुसार संगणित अवक्षयण की बकाया का परिमाण टिप्पण के रूप में दिया जाएगा।
(v) कंपनी के डिबेंचरों और अन्य सावधिक उधारों पर अर्थात् नियत अवधि के लिए उधारों पर ब्याज की रकम, यह बात पृथक्त: दर्ज की जाएगी कि प्रबंध निदेशक, प्रबंधक अभिकर्ता, सचिव तथा कोषपालों तथा प्रबंधक को, यदि कोर्इ हो, दी गर्इ या देय यदि कोर्इ ब्याज है तो उस ब्याज की रकम क्या है;
(vi) भारतीय आय-कर तथा लाभों पर अन्य भारतीय कराधान के लिए जिसके अंतर्गत, जहां साध्य हो, भारतीय आय-कर के साथ वह कराधान है जो भारतीय आय-कर से अवमुक्ति की मात्रा तक, यदि कोर्इ हो, अन्यत्र लगाया गया है, भार की रकम, तथा वहां जहां कि यह साध्य हो, आय-कर और अन्य कराधान अलग-अलग दिखाया जाएगा।
(vii) वे रकमें जो–
(क) अंश (शेयर) पूंजी की वापसी के लिए, तथा
(ख) उधारों को चुकाने के लिए,
आरक्षित कर दी गर्इ हैं;
(viii) (क) आरक्षितियों लेखे अलग रखी या अलग रखी जाने के लिए प्रस्थापित किन्हीं रकमों का योग, यदि वह सारभूत हों, किंतु उसके अंतर्गत ऐसे किसी विनिर्दिष्ट दायित्व, आकस्मिकता या अभिबंधन की पूर्ति के लिए उपबंधित रकम नहीं आती जिसके बारे में यह जानकारी है कि वह उस तारीख को विद्यमान है, जिस तक के लिए तुलन-पत्र तैयार किया गया है।
(ख) ऐसी आरक्षितियों में से निकाली गर्इ रकमों का योग, यदि वे तात्विक हों।
(ix) (क) विनिर्दिष्ट दायित्वों, आकस्मिकताओं या अभिबंधनों की पूर्ति करने के लिए उपबंध करने के वास्ते अलग रख दी गर्इ रकमों का, यदि वे सारभूत हों, योग।
(ख) ऐसी उपबंधित रकमों में, जिनकी आवश्यकतायें आगे के लिए नहीं रह गर्इ है, निकाली गर्इ रकमों का, यदि कोर्इ योग हों।
(x) निम्नलिखित मदों में से हर एक मद पर अलग-अलग दिखाते हुए हर मद पर उपगत व्यय–
(क) स्टोरों और फालतू पुर्जों का उपयोग।
(ख) विद्युत और र्इंधन।
(ग) भाटक।
(घ) भवनों की मरम्मत।
(ड़) मशीनरी की मरम्मत।
(च) (1) संबलम्, मजदूरी और बोनस।
(2) भविष्य और अन्य निधियों में अभिदाय।
(3) कर्मकारों और कर्मचारिवृन्द के कल्याण पर हुए व्यय, जहां तक कि वे किन्हीं पूर्ववर्ती उपबंधित रकमों या आरक्षितियों में से समायोजित नहीं किए गए हैं।
टिप्पण 1 : इस मद संबंधी जानकारी तुलन-पत्र में भी सुसंगत उपबंधित रकम या आरक्षिति खाता के शीर्षक के नीचे दी जानी चाहिए।
| टिप्पण 2 : ** | ** | ** |
(छ) बीमा।
(ज) आय पर कर को अपवर्जित कर के, रेट और कर।
(झ) प्रकीर्ण व्यय :
परन्तु ऐसी कोर्इ मद जिसके अधीन खर्चे, कंपनी के कुल राजस्व के एक प्रतिशत या पांच हजार रुपए में से जो भी अधिक हो, उससे अधिक हो, लाभ-हानि खाते में समुचित लेखा के सामने पृथक् और सुभिन्न मद के रूप में दिखाया जाएगा और उसे ''प्रकीर्ण व्यय'' के अधीन दिखाए जाने वाली किसी अन्य मद के साथ नहीं जोड़ा जाएगा।
(xi) (क) व्यापारिक विनिधानों और अन्य विनिधानों में प्रभेद करते हुए विनिधानों से आय की रकम।
(ख) ब्याज के तौर पर अन्य आय, उस आय का स्वरूप विनिर्दिष्ट किया जाए।
(ग) यदि सकल आय उपरोक्त उपपैरा (क) और (ख) के अधीन दिखार्इ गर्इ है तो काट लिए गए आय-कर की रकम।
(xii) (क) किसी भागीदारी फर्म की सदस्यता मद्दे उपार्जित लाभों या हानियों के विस्तार को स्पष्टत: दिखाते हुए विनिधानों पर उस मात्रा तक लाभ और हानियां, जिस तक वे किसी पूर्ववर्ती उपबंधित रकम या आरक्षिति से समायोजित नहीं कर दी गर्इ हैं।
टिप्पण : इस मद के बारे में जानकारी तुलन-पत्र में भी सुसंगत उपबंध या आरक्षिति खाता शीर्षक के नीचे दी जाएगी।
(ख) उस किस्म के संव्यवहारों के बारे में जो, प्राय: कंपनी द्वारा हाथ में नहीं लिए जाते, अथवा आपवादिक या अनावर्ती परिस्थितियों में हाथ में लिए जाते हैं, लाभ या हानि यदि उनकी रकम सारभूत हो।
(ग) प्रकीर्ण आय।
(xiii) (क) समनुषंगी कंपनियों से लाभांश।
(ख) समनुषंगी कंपनियों की हानियों के लिए उपबंधित रकमें।
(xiv) उन लाभांशों की सकलित रकम जो दे दिए गए हैं या दिए जाने के लिए प्रस्थापित हैं, तथा यह भी दर्ज किया जाए कि उन रकमों में से आय-कर की कटौती होनी है या नहीं;
(xv) वह रकम, यदि सारभूत हो, जिसके कारण लाभ-हानि खाते में दिखार्इ गर्इ किन्हीं मदों पर उस दशा में असर पड़ेगा जिसमें कि लेखाकरण के आधार पर कोर्इ तब्दीली की जाती है।
4. लाभ-हानि लेखा में निम्नलिखित को पृथक्त: दिखाते हुए वे संदाय भी दिए होंगे अथवा उनकी बाबत ब्यौरेवार जानकारी एक टिप्पण के रूप में उसमें दी जाएगी जो निदेशकों (जिसके अंतर्गत प्रबंध निदेशक आता है) $[प्रबंध अभिकर्ताओं, सचिवों तथा कोषपालों] अथवा प्रबंधक को, यदि कोर्इ हो, कंपनी, कंपनी की समनुषंगियों और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वित्तीय वर्ष के दौरान उपबंधित किए गए या दिए गए हैं:–
(i) अधिनियम की धारा 198 के अधीन प्रबंधकीय पारिश्रमिक, जो निदेशकों (जिसके अंतर्गत प्रबंध निदेशक आता है) $[प्रबंध अभिकर्ताओं, सचिवों तथा कोषपालों] अथवा प्रबंधक को, यदि कोर्इ हो, वित्तीय वर्ष के दौरान दिए गए हैं या देय है;
$[(ii) वे व्यय जिनकी बाबत प्रबंध अभिकर्ता की प्रतिपूर्ति द्वारा 354 के अधीन की गर्इ है;]
(iii) प्रबंध अभिकर्ता या उसके सहयुक्त को धारा 356, 357, 358 के अधीन पृथक्त: देय कमीशन या अन्य पारिश्रमिक;
$[(iv) वह कमीशन जो उन संविदाओं लेखे अन्य समुत्थानों के विक्रय या क्रय अभिकर्ता के रूप में प्रबंध अभिकर्ता या उसके सहयुक्त को अधिनियम की धारा 359 के अधीन प्राप्त हुआ है या उसे प्राप्य है, जो संविदा ऐसे समुत्थान द्वारा उस कंपनी से की गर्इ थी;]
(v) मालों तथा सामग्रियों के क्रय या विक्रय की या सेवाओं के प्रदाय की उन संविदाओं का धनमूल्य जो कंपनी ने वित्तीय वर्ष के दौरान प्रबंध अभिकर्ता या उसके सहयुक्त से धारा 360 के अधीन की है;
(vi) अन्य मोक और कमीशन जिसके अंतर्गत प्रत्याभूति कमीशन आता है (इनके ब्यौरे दिए जाएं);
(vii) कोर्इ अन्य नकदी में या वस्तु रूप में परिलब्धियां या फायदे (जहां साध्य हो वहां उनका लगभग धनमूल्य लिखा जाए);
(viii) पेंशनें आदि–
(क) पेंशनें,
(ख) उपदान,
(ग) अपने चंदों और उन पर ब्याज से आधिक्य में भविष्य निधियों से संदाय,
(घ) पद हानि के लिए प्रतिकर,
(ड़) पद के निवर्तन से संबंधित प्रतिफल।
4क. लाभ-हानि लेखा में अधिनियम की धारा 349 के अनुसार शुद्ध लाभों की संगणना देते हुए या वह संगणना दर्शित करते हुए कथन के रूप में एक टिप्पण कमीशन के उन सुसंगत ब्यौरों के साथ दिया हुआ होगा जो ऐसे लाभों के प्रतिशत भाग के रूप में निदेशकों (जिनके अंतर्गत प्रबंध निदेशक आते हैं) $[प्रबंध अभिकर्ताओं, सचिवों तथा कोषपालों] या प्रबंधक को, यदि कोर्इ हो, देय है।
4ख. लाभ-हानि लेखा में, इसके अतिरिक्त उन रकमों की बाबत ब्यौरेवार जानकारी अन्तर्विष्ट होगी या टिप्पण के रूप में दी हुर्इ होगी जो चाहे देय फीस, व्यय या अन्यथा की गर्इ सेवाओं के लिए संपरीक्षक को–
(क) संपरीक्षक के रूप में,
(ख) निम्नलिखित के बारे में सलाहकार के रूप में या किसी अन्य हैसियत में,–
(i) कराधान संबंधी मामले,
(ii) कंपनी विधि मामले,
(iii) प्रबंधक सेवाएं; और
(ग) किसी अन्य रीति में।
4ग. विनिर्माण कंपनियों की दशा में, लाभ-हानि खाते में टिप्पण के रूप में विनिर्मित मालों के प्रत्येक वर्ग की बाबत निम्नलिखित के बारे में परिमाण विषयक सूचना विस्तार सहित होगी, अर्थात् :–
(क) अनुज्ञप्त क्षमता (जहां अनुज्ञप्ति प्रवृत्त है),
(ख) प्रतिष्ठापित क्षमता, और
(ग) वास्तविक उत्पादन।
टिप्पण 1 : कंपनी की अनुज्ञप्ति और प्रतिष्ठापित क्षमता, जैसी कि वह उस वर्ष के अंतिम दिन की है जिससे लाभ-हानि संबंधित है, क्रमश: उपरोक्त मद (क) और (ख) के सामने उल्लिखित की जाएगी।
टिप्पण 2 : मद (ग) के सामने, विक्रय के लिए परिष्कृत उत्पादों के संबंध में वास्तविक उत्पादन उल्लिखित किया जाएगा। उन मामलों में जहां कंपनी द्वारा अर्ध-साधित उत्पादों का विक्रय भी किया जाता है, वहां उनके पृथक् ब्यौरे दिए जाएंगे।
टिप्पण 3 : इस पैरे के प्रयोजन के लिए, वे मद जिनके लिए कंपनी के पास पृथक् औद्योगिक अनुज्ञप्तियां हैं, माल के पृथक् वर्गों के रूप में समझी जाएंगी, किंतु जहां कंपनी के पास विभिन्न स्थानों पर मद के उत्पादन के लिए या अनुज्ञप्ति क्षमता के विस्तार के लिए एक से अधिक औद्योगिक अनुज्ञप्तियां हैं, वहां ऐसी सभी अनुज्ञप्तियों के अंतर्गत आने वाली मद को एक वर्ग के रूप में समझा जाएगा।
4घ. लाभ-हानि खाते में टिप्पण के रूप में निम्नलिखित सूचना भी होगी, अर्थात्:–
(क) वित्तीय वर्ष के दौरान निम्नलिखित के बारे में कंपनी द्वारा सी.आर्इ.एफ. के आधार पर संगणित आयातों का मूल्य :–
(i) कच्चा माल;
(ii) संघटक और फालतू पुर्जे;
(iii) पूंजी माल;
(ख) वित्तीय वर्ष के दौरान स्वामिस्व, जानकारी, वृतिक और परामर्श फीसें, ब्याज और अन्य बातों के कारण विदेशी मुद्रा में हुए व्यय;
(ग) वित्तीय वर्ष के दौरान उपयुक्त सभी आयातित कच्चे माल, फालतू पुर्जों और संघटकों का मूल्य और उन सभी देशी कच्चे माल, फालतु पुर्जों और संघटकों का मूल्य जिनका उपभोग समान रूप से होता है और प्रत्येक का सकल उपयोग से प्रतिशत;
(घ) लाभांशों मद्दे विदेशी मुद्रा में वर्ष के दौरान भेजी गर्इ रकम जिसमें अनिवासी अंशधारियों की संख्या, उनके द्वारा धारित उन अंशों की संख्या जिन पर लाभांश प्रोद्भूत हुए थे और उस वर्ष का जिसके बारे में लाभांश दिए गए हों विशेष उल्लेख हो,
(ड़) वे उपार्जन जो विदेशी मुद्रा में हैं, निम्नलिखित शीर्षकों में वर्गीकृत किए जाते हैं, अर्थात्:–
(i) एफ.ओ.बी. आधार पर संगणित मालों का निर्यात :
(ii) स्वामिस्व, जानकारी, वृत्तिक और परामर्श फीस;
(iii) ब्याज और लाभांश;
(iv) वह आय, जिसमें उसकी प्रकृति उपदर्शित होगी।
5. केन्द्रीय सरकार यह निदेश दे सकेगी कि कंपनी आस्तियों में अवक्षयण, उनके नवीकरण या उनके मूल्य में कमी के लिए उपबंधित रकमों को, जो अलग-अलग ली गर्इ हैं, दिखाने के लिए आबद्ध उस दशा में न होगी जिसमें कि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो गया है कि वह जानकारी लोक हित में संप्रकट न की जानी चाहिए और उससे कंपनी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। किंतु यह बात इस शर्त के अधीन रहते हुए है कि ऐसे अलग रखी गर्इ रकम को गणना में लेने के पश्चात् निकली रकम जिस किसी शीर्षक के अधीन दिखार्इ गर्इ है वह उपबंध ऐसे किया या अंकित किया जाएगा कि उससे वह तथ्य उपदर्शित हो जाए।
6. (1) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् कंपनी के समक्ष रखे गए प्रथम लाभ-हानि लेखा की दशा को छोड़कर लाभ-हानि लेखे में अव्यवहित पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में लाभ-हानि लेखे में दी गर्इ सब मदों के लिए तत्स्थानी रकमें दिखा दी जाएंगी।
(2) उपखंड (1) में जो अपेक्षा है, वह ऐसी कंपनियों की दशा में, जो त्रैमासिक या अर्द्धवार्षिक लेखा तैयार करती हैं, उस कालावधि के लाभ-हानि लेखा से संबंधित होगी जो पूर्ववर्ती वर्ष में तत्स्थानी तारीख को दर्ज हुआ था।
$ टिप्पण : प्रबंध अभिकर्ताओं, सचिवों और कोषपालों के प्रति निर्देश का लोप किया जाना चाहिए।
भाग 3
निर्वचन
7. (1) जब कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, इस अनुसूची के भाग 1 और 2 के प्रयोजनों के लिए–
(क) ''उपबंधित रकम'' पद से इस खंड के उपखंड (2) के अधीन रहते हुए वह रकम अभिप्रेत होगी जो अवक्षयण, नवीकरण या आस्तियों के मूल्य में कमी के लिए उपबंध करने के रूप में अपलिखित कर दी गर्इ है या प्रतिधृत कर ली गर्इ है या ऐसे किसी ज्ञात दायित्व के लिए उपबंधित के रूप में, जिसकी पर्याप्त रूप से ठीक-ठीक रकम अवधारित नहीं की जा सकती, प्रतिधृत कर ली गर्इ है;
(ख) ''आरक्षिति'' शब्द के अंतर्गत पूर्वोक्त के अधीन रहते हुए ऐसी रकम नहीं आएगी जो अवक्षयण, नवीकरण या आस्तियों के मूल्य में कमी के लिए अपलिखित कर दी गर्इ है या प्रतिधृत कर ली गर्इ है अथवा किसी ज्ञात दायित्व के लिए उपबंधित के रूप में प्रतिधृत कर ली गर्इ है;
(ग) ''पूंजी आरक्षिति'' पदावली के अंतर्गत ऐसी कोर्इ रकम नहीं आएगी जिसकी बाबत यह समझा जाता है कि लाभ-हानि लेखा के जरिए यह वितरण के लिए मुक्त है तथा ''आमदनी आरक्षिति'' पदावली से पूंजी आरक्षिति से भिन्न कोर्इ आरक्षिति अभिप्रेत होगी;
तथा इस उपखंड में ''दायित्व'' शब्द के अंतर्गत उस व्यय विषयक सब दायित्व जो कर लिया गया है, तथा सब विवादग्रस्त या समाश्रित दायित्व आएंगे।
(2) जहां कि–
(क) कोर्इ रकम अवक्षयण, नवीकरण या आस्तियों के मूल्य में कमी के लिए उपबंध करने के लिए उपबंधित के रूप में अपलिखित कर दी गर्इ है या प्रतिधृत कर ली गर्इ है किंतु जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व स्थिर आस्तियों के संबंध में अपलिखित रकम नहीं है; या
(ख) किसी ज्ञात दायित्व के लिए उपबंधित के रूप में प्रतिधृत रखी गर्इ रकम;
उस रकम से अधिकार्इ में है, जिसकी बाबत निदेशकों की यह राय है कि वह उस प्रयोजन के लिए युक्तियुक्त रूप से आवश्यक है वहां अधिकार्इ की बाबत इस अनुसूची के प्रयोजनों के लिए यह माना जाएगा कि वह आरक्षिति न कि उपबंधित रकम है।
8. पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए ''कोट किए गए विनिधान'' से ऐसा विनिधान अभिप्रेत है जिसकी बाबत मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में कुटेशन करने दिया जाता है या उसमें व्यवहार करने दिया जाता है तथा "कोट न किए जाने वाले विनिधान'' पदावली का अर्थ तदनुकूल लिया जाएगा।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 243(घ) और 243 (ड़)
परिभाषाएं
| 243. ** | ** | ** |
(घ) "पंचायत" से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अनुच्छेद 243ख के अधीन गठित स्वायत्त शासन की कोर्इ संस्था (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अभिप्रेत है;
परिभाषाएं
| 243त. ** | ** | ** |
(ड़) "नगर पालिका" से अनुच्छेद 243थ के अधीन गठित स्वायत्त शासन की कोर्इ संस्था अभिप्रेत है;
भारत के संविधान का अनुच्छेद 276(2)
276. (2) राज्य को या उस राज्य में किसी एक नगरपालिका, जिला बोर्ड, स्थानीय बोर्ड या अन्य स्थानीय प्राधिकारी को किसी एक व्यक्ति के बारे में वृत्तियों, व्यापारों, आजीविकाओं और नियोजनों पर करों के रूप में संदेय कुल रकम दो हजार पांच सौ रुपए प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी।
भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची
[अनुच्छेद 344(1) और अनुच्छेद 351]
भाषाएं
1. असमिया
2. बंगला
3. बोडो
4. डोगरी
5. गुजराती
6. हिन्दी
7. कन्नड़
8. कश्मीरी
9. कोंकणी
10. मैथिली
11. मलयालम
12. मणिपुरी
13. मराठी
14. नेपाली
15. उड़िया
16. पंजाबी
17. संस्कृत
18. संथाली
19. सिंधी
20. तमिल
21. तेलुगु
22. उर्दू
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 60
वह सम्पत्ति, जो डिक्री के निष्पादन में कुर्क और विक्रय की जा सकेगी
60. (1) निम्नलिखित सम्पत्ति डिक्री के निष्पादन में कुर्क और विक्रय की जा सकेगी अर्थात् भूमि, गृह या अन्य भवन, माल, धन, बैंक-नोट, चैक, विनिमय पत्र, हुण्डी, वचनपत्र, सरकारी प्रतिभूतियां, धन के लिए बन्धपत्र या अन्य प्रतिभूतियां, ऋण, निगम-अंश और उसके सिवाय जैसा इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, विक्रय की जा सकने वाली अन्य ऐसी सभी जंगम या स्थावर सम्पत्ति, जो निण्र्ाीत-ऋणी की या जिसके लाभों पर वह ऐसी व्ययन शक्ति रखता है जिसे वह अपने फायदे के लिए प्रयोग कर सकता हो, चाहे वह निण्र्ाीत-ऋणी के नाम में धारित हो या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसके लिए न्यास में या उसकी ओर से धारित हो:
परन्तु निम्नलिखित विशिष्ट वस्तुएं ऐसे कुर्क या विक्रय नहीं की जा सकेंगी, अर्थात्:–
(क) निण्र्ाीत-ऋणी, उसकी पत्नी और उसके बच्चों के पहनने के आवश्यक वस्त्र, भोजन पकाने के बर्तन, चारपार्इ और बिछौने और ऐसे निजी आभूषण जिन्हें कोर्इ स्त्री धार्मिक प्रथा के अनुसार अपने से अलग नहीं कर सकती;
(ख) शिल्पी के औजार, और जहां निण्र्ाीत-ऋणी कृषक है वहां उसके खेती के उपकरण और ऐसे पशु और बीज, जो न्यायालय की राय में उसके लिए वैसी हैसियत में अपनी जीविका का उपार्जन करने के लिए समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हैं और कृषि-उपज का या कृषि-उपज के किसी वर्ग का ऐसा भाग जो ठीक अगली धारा के उपबंधों के अधीन दायित्व से मुक्त घोषित कर दिया गया है;
(ग) वे गृह और अन्य भवन (उनके मलबों और आस्थानों के तथा उनसे अव्यवहित रूप से अनुलग्न और उनके उपभोग के लिए आवश्यक भूमि के सहित) जो कृषक या श्रमिक या घरेलू नौकर के हैं और उसके अधिभोग में है;
(घ) लेखा वहियां;
(ड़) नुकसानी के लिए वाद लाने का अधिकारमात्र;
(च) वैयक्तिक सेवा कराने का कोर्इ अधिकार;
(छ) वे वृत्तिकाएं और उपदान जो सरकार के या किसी स्थानीय प्राधिकारी के या किसी अन्य नियोजक के पेंशन भोगियों का अनुज्ञात हैं या ऐसी किसी सेवा कुटुम्ब पेंशन निधि में से, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित अधिसूचित की गर्इ है, संदेय हैं और राजनैतिक पेंशन;
(ज) श्रमिकों और घरेलू नौकरों की मजदूरी चाहे वह धन में या वस्तु के रूप में संदेय हो;
(झ) भरणपोषण की डिक्री से भिन्न किसी डिक्री के निष्पादन में वेतन के प्रथम एक हजार रुपए और बाकी का दो-तिहार्इ:
परन्तु जहां ऐसे वेतन के प्रभाग का, जो कुर्क किया जा सकता है, कोर्इ भाग, कुल मिलाकर चौबीस मास की अवधि तक लगातार या आंतरायिक रूप से कुर्क रहा है वहां जब तक आगे की बारह मास की अवधि समाप्त न हो जाए तब तक ऐसे भाग को कुर्की से छूट प्राप्त होगी और जहां ऐसी कुर्की एक ही डिक्री के निष्पादन में की गर्इ है वहां कुल मिलाकर चौबीस मास की अबधि तक कुर्की चालू रहने के पश्चात् ऐसे भाग को उस डिक्री के निष्पादन में कुर्की से अन्तिम रूप से छूट प्राप्त होगी,–
(झक) भरणपोषण की डिक्री के निष्पादन में वेतन का एक-तिहार्इ;
(ञ) ऐसे व्यक्तियों के वेतन और भत्ते, जिन्हें वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) लागू है;
(ट) किसी ऐसी निधि में या उससे व्युत्पन्न, जिसे भविष्य-निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) तत्समय लागू है, सभी अनिवार्य निक्षेप और अन्य राशियां, जहां तक कि उनके बारे में उक्त अधिनियम द्वारा यह घोषित किया गया है कि वे कुर्क नहीं की जा सकेंगी;
(टक) किसी ऐसी निधि में के या उससे व्युत्पé, जिसे लोक भविष्य-निधि अधिनियम, 1968 (1968 का 23) तत्समय लागू है, सभी निक्षेप और अन्य राशियां, जहां तक कि उनके बारे में उक्त अधिनियम द्वारा यह घोषित किया गया है कि वे कुर्क नहीं की जा सकेंगी;
(टख) निण्र्ाीत-ऋणी के जीवन पर बीमा पालिसी के अधीन संदेय सभी धन;
(टग) किसी ऐसे आवासीय भवन के पट्टेदार का हित जिसको भाटक और वास-सुविधा के नियंत्रण से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंध लागू हैं;
(ठ) सरकार के किसी सेवक की या रेल कम्पनी या स्थानीय प्राधिकारी के सेवक की उपलब्धियों के भाग रूप ऐसा कोर्इ भत्ता, जिसके बारे में समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषित करे कि वह कुर्की से छूट-प्राप्त है और ऐसे किसी सेवक को उसके निलम्बन-काल में दिया गया कोर्इ जीवन-निर्वाह अनुदान या भत्ता;
(ड) उत्तरजीविता द्वारा उत्तराधिकार की प्रत्याशा अथवा अन्य केवल समाश्रित या सम्भव अधिकार या हित;
(ढ) भावी भरणपोषण का अधिकार;
(ण) ऐसा भत्ता, जिसके बारे में किसी भारतीय विधि ने यह घोषित किया है कि वह डिक्री के निष्पादन में कुर्की या विक्रय के दायित्व से छूट-प्राप्त है; तथा
(त) जहां निण्र्ाीत-ऋणी कोर्इ ऐसा व्यक्ति है जो भू-राजस्व के संदाय के लिए दायी है वहां कोर्इ ऐसी जंगम संपत्ति, जो ऐसे राजस्व की बकाया की वसूली के लिए विक्रय से ऐसी विधि के अधीन छूट-प्राप्त है जो उसे तत्समय लागू है।
स्पष्टीकरण I–खण्ड (छ), (ज), (झ), (झक), (ञ), (ठ) और (ण) में वर्णित वस्तुओं के संबंध में संदेय धन उनके वस्तुत: संदेय होने के पहले या उसके पश्चात् कुर्की या विक्रय से छूट-प्राप्त है, और वेतन की दशा में उसकी कुर्की योग्य प्रभाग को, उसके वस्तुत: संदेय होने के पहले या उसके पश्चात् कुर्क किया जा सकता है।
स्पष्टीकरण II–खण्ड (झ) और (झक) में "वेतन" से, ऐसे भत्तों को छोड़कर जो खण्ड (ठ) के उपबन्धों के अधीन कुर्की से छूट-प्राप्त घोषित किए गए हैं, वे समस्त मासिक उपलब्धियां अभिप्रेत हैं जो किसी व्यक्ति को उसके नियोजन से, चाहे वह कर्तव्यारूढ़ हो या छुट्टी पर हो, व्युत्पé होती हैं।
स्पष्टीकरण III–खण्ड (ठ) में "समुचित सरकार" से अभिप्रेत है–
(i) केन्द्रीय सरकार की सेवा में किसी व्यक्ति अथवा रेल प्रशासन के या छावनी प्राधिकारी के या महापत्तन के पत्तन प्राधिकारी के किसी सेवक के बारे में, केन्द्रीय सरकार;
(ii) [लोप किया गया;]
(iii) सरकार के किसी अन्य सेवक या किसी अन्य स्थानीय प्राधिकारी के सेवक के बारे में, राज्य सरकार।
स्पष्टीकरण IV–इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए, "मजदूरी" के अन्तर्गत बोनस है और "श्रमिक" के अन्तर्गत कुशल, अकुशल या अर्धकुशल श्रमिक है।
स्पष्टीकरण V–इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए, "कृषक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो स्वयं खेती करता है और जो अपनी जीविका के लिए मुख्यत: कृषि-भूमि की आय पर निर्भर है चाहे स्वामी के रूप में या अभिधारी, भागीदार या कृषि श्रमिक के रूप में।
स्पष्टीकरण VI–स्पष्टीकरण 5 के प्रयोजनों के लिए, कोर्इ कृषक स्वयं खेती करने वाला समझा जाएगा, यदि वह–
(क) अपने श्रम द्वारा; अथवा
(ख) अपने कुटुम्ब के किसी सदस्य के श्रम द्वारा; अथवा
(ग) नकद या वस्तु के रूप में (जो उपज का अंश न हो) या दोनों में संदेय मजदूरियों पर सेवकों या श्रमिकों द्वारा,
खेती करता है।
(1क) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, वह करार, जिसके द्वारा वह व्यक्ति इस धारा के अधीन छूट के फायदे का अधित्यजन करने का करार करता है, शून्य होगा।
(2) इस धारा की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किन्हीं ऐसे गृहों या अन्य भवनों को (उनके मलवों और आस्थानों के तथा उनसे अव्यवहित रूप से अनुलग्न और उनके उपभोग के लिए आवश्यक भूमि के सहित) ऐसे किसी गृह, भवन, आस्थान या भूमि के भाटक के लिए डिक्रियों में निष्पादन में कुर्की या विक्रय से छूट देती है।
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360
सदाचरण की परिवीक्षा पर या प्रताड़ना के पश्चात् छोड़े जाने का आदेश
360. (1) जब कोर्इ व्यक्ति जो इक्कीस वर्ष से कम आयु का नहीं है केवल जुर्माने से या सात वर्ष या उससे कम अवधि के कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता अथवा जब कोर्इ व्यक्ति जो इक्कीस वर्ष से कम आयु का है या कोर्इ स्त्री, ऐसे अपराध के लिए, जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय नहीं है, दोषसिद्ध की जाती है और अपराधी के विरुद्ध कोर्इ पूर्व दोषसिद्धि साबित नहीं की गर्इ है तब, यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष उसे दोषसिद्ध किया गया है, अपराधी की आयु, शील या पूर्ववृत्त को और उन परिस्थितियों को, जिनमें अपराध किया गया, ध्यान में रखते हुए यह प्रतीत होता है कि अपराधी को सदाचरण की परिवीक्षा पर छोड़ देना समीचीन है तो न्यायालय उसे तुरन्त कोर्इ दण्डादेश देने के बजाय निदेश देता है कि उसे प्रतिभुओं सहित या रहित उसके द्वारा यह बंधपत्र लिख देने पर छोड़ दिया जाए कि वह (तीन वर्ष से अनधिक) इतनी अवधि के दौरान, जितनी न्यायालय निर्दिष्ट करे, बुलाए जाने पर हाजिर होगा और दण्डादेश पाएगा और इस बीच परिशांति कायम रखेगा और सदाचारी बना रहेगा :
परन्तु जहां कोर्इ प्रथम अपराधी किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा, जो उच्च न्यायालय द्वारा विशेषतया सशक्त नहीं किया गया है, दोषसिद्ध किया जाता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है कि इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए वहां वह उस भाव की अपनी राय अभिलिखित करेगा और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को वह कार्यवाही निवेदित करेगा और उस अभियुक्त को उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा अथवा उसकी उस मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिरी के लिए जमानत लेगा और वह मजिस्ट्रेट उस मामले का निपटारा उपधारा (2) द्वारा उपबंधित रीति से करेगा।
(2) जहां कोर्इ कार्यवाही प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को उपधारा (1) द्वारा उपबंधित रूप में निवेदित की गर्इ है, वहां ऐसा मजिस्ट्रेट उस पर ऐसा दण्डादेश या आदेश दे सकता है जैसा यदि मामला मूलत: उसके द्वारा सुना गया होता तो वह दे सकता और यदि वह किसी प्रश्न पर अतिरिक्त जांच या अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह स्वयं ऐसी जांच कर सकता है या ऐसा साक्ष्य ले सकता है अथवा ऐसी जांच किए जाने या ऐसा साक्ष्य लिए जाने का निदेश दे सकता है।
(3) किसी ऐसी दशा में, जिसमें कोर्इ व्यक्ति चोरी, किसी भवन में चोरी, बेर्इमानी से दुर्विनियोग, छल या भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दो वर्ष से अनधिक के कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए या केवल जुर्माने से दण्डनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है और उसके विरुद्ध कोर्इ पूर्व दोषसिद्धि साबित नहीं की गर्इ है, यदि वह न्यायालय, जिसके समक्ष वह ऐसे दोषसिद्ध किया गया है, ठीक समझे, तो वह अपराधी की आयु, शील, पूर्ववृत्त या शारीरिक या मानसिक दशा को और अपराध की तुच्छ प्रकृति को, या किन्हीं परिशमनकारी परिस्थितियों को, जिनमें अपराध किया गया था, ध्यान में रखते हुए उसे कोर्इ दण्डादेश देने के बजाय सम्यक् भत्र्सना के पश्चात् छोड़ सकता है।
(4) इस धारा के अधीन आदेश किसी अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।
(5) जब किसी अपराधी के बारे में इस धारा के अधीन आदेश दिया गया है तब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय, उस दशा में जब उस न्यायालय में अपील करने का अधिकार है, अपील किए जाने पर, या अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए, ऐसे आदेश को अपास्त कर सकता है और ऐसे अपराधी को उसके बदले में विधि अनुसार दण्डादेश दे सकता है :
परन्तु उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय इस उपधारा के अधीन उस दण्ड से अधिक दण्ड न देगा जो उस न्यायालय द्वारा दिया जा सकता था जिसके द्वारा अपराधी दोषसिद्ध किया गया था।
(6) धारा 121, 124 और 373 के उपबंध इस धारा के उपबंधों के अनुसरण में पेश किए गए प्रतिभुओं के बारे में, जहां तक हो सके, लागू होंगे।
(7) किसी अपराधी के उपधारा (1) के अधीन छोड़े जाने का निदेश देने के पूर्व न्यायालय अपना समाधान कर लेगा कि उस अपराधी का, या उसके प्रतिभू का (यदि कोर्इ हो) कोर्इ नियत वास स्थान या नियमित उपजीविका उस स्थान में है जिसके संबंध में वह न्यायालय कार्य करता है या जिसमें अपराधी के उस अवधि के दौरान रहने की सम्भाव्यता है, जो शर्तों के पालन के लिए उल्लिखित की गर्इ है।
(8) यदि उस न्यायालय का, जिसने अपराधी को दोषसिद्ध किया है, या उस न्यायालय का, जो अपराधी के संबंध में उसके मूल अपराध के बारे में कार्यवाही कर सकता था, समाधान हो जाता है कि अपराधी अपने मुचलके की शर्तों में से किसी का पालन करने में असफल रहा है तो वह उसके पकड़े जाने के लिए वारंट जारी कर सकता है।
(9) जब कोर्इ अपराधी ऐसे किसी वारंट पर पकड़ा जाता है तब वह वारंट जारी करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष तत्काल लाया जाएगा और वह न्यायालय या तो तब तक के लिए उसे अभिरक्षा में रखे जाने के लिए प्रतिप्रेषित कर सकता है जब तक मामले में सुनवार्इ न हो, या इस शर्त पर कि वह दण्डादेश के लिए हाजिर होगा, पर्याप्त प्रतिभूति लेकर जमानत मंजूर कर सकता है और ऐसा न्यायालय मामले की सुनवार्इ के पश्चात् दण्डादेश दे सकता है।
(10) इस धारा की कोर्इ बात अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) या बालक अधिनियम, 1960 (1960 का 60) या किशोर अपराधियों के उपचार, प्रशिक्षण या सुधार से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों पर प्रभाव नहीं डालेगी।
सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 50
निर्यात के लिए माल की प्रविष्टि
50. (1) किसी माल का निर्यातकर्ता किसी जलयान या वायुयान में निर्यात किए जाने वाले माल की दशा में पोत पत्र और भूमि मार्ग द्वारा निर्यात किए जाने वाले माल की दशा में निर्यात पत्र, उचित अधिकारी को विहित प्ररूप में पेश करके उसकी प्रविष्टि करेगा।
(2) किसी माल का निर्यातकर्ता, पोत पत्र या निर्यात पत्र पेश करते समय उसके नीचे की ओर उसकी अंतर्वस्तु की सच्चार्इ के बारे में एक घोषणा करेगा और उस पर हस्ताक्षर करेगा।
निक्षेपागार अधिनियम, 1996 की धारा 2(1)(क), (ड़), (ठ)
परिभाषाएं
2. (1) इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,–
(क) ''हिताधिकारी स्वामी'' से ऐसा कोर्इ व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका नाम इस हैसियत में किसी निक्षेपागार में अभिलिखित है;
| ** | ** | ** |
(ड़) ''निक्षेपागार'' से ऐसी कोर्इ कंपनी अभिप्रेत है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत है और जिसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 की उपधारा (1क) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है;
| ** | ** | ** |
(ठ) ''प्रतिभूति'' से ऐसी कोर्इ प्रतिभूति अभिप्रेत है जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
| ** | ** | ** |
कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 1
संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना
| 1. (1) ** | ** | ** |
(3) धारा 16 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यह निम्नलिखित को लागू होगा :–
(क) हर ऐसे स्थापन को, जो अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग में लगा हुआ कारखाना है और जिसमें बीस या अधिक व्यक्ति नियोजित हैं, तथा
(ख) बीस या अधिक व्यक्ति नियोजित करने वाले किसी अन्य स्थापन को या ऐसे स्थापनों के वर्ग को, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें :
परन्तु केन्द्रीय सरकार ऐसा करने के अपने आशय की दो मास से अन्यून की सूचना राजपत्र में अधिसूचना द्वारा देने के पश्चात्, इस अधिनियम के उपबंधों की बीस से कम संख्या में इतने व्यक्तियों को, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, नियोजित करने वाले किसी भी स्थापना को लागू कर सकेगी।
(4) इस धारा की उपधारा (3) में या धारा 16 की उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां केन्द्रीय भविष्य-निधि आयुक्त को, या तो इस निमित्त उसको आवेदन किए जाने पर या अन्यथा, यह प्रतीत होता है कि किसी स्थापन के संबंध में नियोजक और कर्मचारियों की बहुसंख्या के बीच यह करार हो गया है कि इस अधिनियम के उपबंध उस स्थापन को लागू किए जाने चाहिए तो वह ऐसे करार की तारीख से ही या ऐसे करार में विनिर्दिष्ट किसी पश्चात्वर्ती तारीख से उस स्थापन को इस अधिनियम के उपबंध, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा लागू कर सकेगा।
विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
| ** | ** | ** |
(ग) "प्राधिकृत व्यक्ति" से ऐसा प्राधिकृत व्यवहारी, मुद्रा परिवर्तक, अपतट बैंककारी इकार्इ या कोर्इ अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूतियों का कारबार करने के लिए धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत है;
| ** | ** | ** |
(ज) "करेंसी" के अन्तर्गत सभी करेंसी नोट, पोस्टल नोट, पोस्टल आर्डर, मनीआर्डर, चैक, ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र, विनिमय पत्र और वचन पत्र, क्रेडिट कार्ड या ऐसी अन्य समरूप लिखतें भी हैं, जो रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित की जाएं;
| ** | ** | ** |
(ड) "विदेशी करेंसी" से भारतीय करेंसी से भिन्न कोर्इ करेंसी अभिप्रेत है;
(ढ) "विदेशी मुद्रा" से विदेशी करेंसी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत है,–
(i) किसी विदेशी करेंसी में संदेय जमा राशियां, जमा खाते और अतिशेष;
(ii) भारतीय करेंसी में अभिव्यक्त या लिखे गए, किन्तु किसी विदेशी करेंसी में संदेय ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र या विनिमय पत्र;
(iii) भारत से बाहर के बैंकों, संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा लिखे गए किन्तु भारतीय करेंसी में संदेय ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र या विनिमय पत्र;
| ** | ** | ** |
(थ) "भारतीय करेंसी" से ऐसी करेंसी अभिप्रेत है जो भारतीय रुपयों में अभिव्यक्त की गर्इ या लिखी गर्इ है किन्तु इसके अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 28क के अधीन जारी किए गए विशेष बैंक नोट और एक रुपए वाले विशेष नोट नहीं हैं;
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(फ) "भारतीय में निवासी व्यक्ति" से अभिप्रेत है–
(i) ऐसा कोर्इ व्यक्ति जो पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान एक सौ बयासी दिन से अधिक तक भारत में निवास कर रहा था किन्तु इसके अन्तर्गत:–
(अ) ऐसा व्यक्ति नहीं है जो–
(क) भारत से बाहर नियोजित होने के लिए या नियोजित हो जाने पर; या
(ख) भारत से बाहर कोर्इ कारबार या व्यवसाय भारत से बाहर चलाने के लिए; या
(ग) ऐसा परिस्थितियों में, किसी अन्य प्रयोजन के लिए जिनमें उसका भारत से बाहर अनिश्चित काल तक ठहराने का आशय पता चलता हो,
भारत से बाहर चला गया है या भारत से बाहर ठहरता है,
(अ) ऐसा व्यक्ति नहीं है जो–
(क) भारत में नियोजित होने के लिए या नियोजित हो जाने पर; या
(ख) भारत में कोर्इ कारबार या व्यवसाय भारत में चलाने के लिए; या
(ग) ऐसी परिस्थितियों में किसी अन्य प्रयोजन के लिए जिनसे उनका भारत में अनिश्चित काल तक ठहरने का आशय पता चलता हो,
भारत लौट आता है या भारत में ठहरता है;
(ii) कोर्इ व्यक्ति या भारत में रजिस्ट्रीकृत या निगमित कोर्इ निगम निकाय;
(iii) भारत से बाहर निवासी किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन भारत में कोर्इ कार्यालय, शाखा या अभिकरण;
(iv) भारत में निवासी किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन भारत से बाहर कोर्इ कार्यालय शाखा या अभिकरण;
(ब) "भारत के बाहर निवासी व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत में निवासी नहीं है।
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 21
''लोक सेवक''
21. ''लोक सेवक'' शब्द उस व्यक्ति का द्योतक है जो एतस्मिनपश्चात् निम्नगत वर्णनों में से किसी में आता है, अर्थात् :–
| ** | ** | ** |
दूसरा - भारत की सेना, नौसेना या वायुसेना का हर आयुक्त आफिसर;
तीसरा - हर न्यायाधीश जिसके अंतर्गत ऐसा कोर्इ भी व्यक्ति आता है जो किन्हीं न्यायनिर्णायक कृत्यों का चाहे स्वयं या व्यक्तियों के किसी निकाय के सदस्य के रूप में निर्वहन करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो;
चौथा - न्यायालय का हर आफिसर (जिसके अंतर्गत समापक, रिसीवर या कमिश्नर आता है) जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह विधि या तथ्य के किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे, या कोर्इ दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे, या रखे, या किसी सम्पत्ति का भार संभाले या उस सम्पत्ति का व्ययन करे, या किसी न्यायिक आदेशिका का निष्पादन करे, या कोर्इ शपथ ग्रहण कराए या निर्वचन करे, या न्यायालय में व्यवस्था बनाए रखे और हर व्यक्ति, जिसे ऐसे कर्तव्यों में से किन्हीं का पालन करने का प्राधिकार न्यायालय द्वारा विशेष रूप से दिया गया हो;
पांचवां - किसी न्यायालय या लोक सेवक की सहायता करने वाला हर जूरी सदस्य, असेसर या पंचायत का सदस्य;
छठा - हर मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति, जिनको किसी न्यायालय द्वारा, या किसी अन्य सक्षम लोक प्राधिकारी द्वारा कोर्इ मामला या विषय, विनिश्चय या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया हो;
सातवां - हर व्यक्ति जो किसी ऐसे पद को धारण करता हो, जिसके आधार से वह किसी व्यक्ति को परिरोध में करने या रखने के लिए सशक्त हो;
आठवां - सरकार का हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह अपराधों का निवारण करे, अपराधों की इतिला दे, अपराधियों को न्याय के लिए उपस्थिति करे, या लोक के स्वास्थ्य, क्षेम या सुविधा की संरक्षा करे;
नवां - हर आफिसर जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह सरकार की ओर से किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, या सरकार की ओर से कोर्इ सर्वेक्षण, निर्धारण या संविदा करे, या किसी राजस्व आदेशिका का निष्पादन करे या सरकार के धन-संबंधी हितों पर प्रभाव डालने वाले किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे या सरकार के धन-संबंधी हितों से संबंधित किसी दस्तावेज को बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे, या सरकार के धन-संबंधी हितों की संरक्षा के लिए किसी विधि के व्यतिक्रम को रोके;
दसवां - हर आफिसर, जिसका ऐसे आफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह किसी ग्राम, नगर या जिले के किसी धर्मनिरपेक्ष सामान्य प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, कोर्इ सर्वेक्षण या निर्धारण करे, या कोर्इ रेट या कर उद्गृहीत करे, या किसी ग्राम, नगर या जिले के लोगों के अधिकारों के अभिनिश्चयन के लिए कोर्इ दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकृत करे या रखे;
ग्यारहवां - हर व्यक्ति जो कोर्इ ऐसा पद धारण करता हो जिसके आधार से वह निर्वाचक नामावली तैयार करने, प्रकाशित करने, बनाए रखने या पुनरीक्षित करने के लिए या निर्वाचन के किसी भाग को संचालित करने के लिए सशक्त हो;
बारहवां - हर व्यक्ति, जो–
(क) सरकार की सेवा या वेतन में हो, या किसी लोक-कर्तव्य में पालन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पारिश्रमिक पाता हो;
(ख) स्थानीय प्राधिकारी की, अथवा केन्द्र, प्रान्त या राज्य के अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित निगम की अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कम्पनी की सेवा या वेतन में हो।
दृष्टांत
नगरपालिका आयुक्त लोक सेवक है।
स्पष्टीकरण 1 - ऊपर के वर्णनों में से किसी में आने वाले व्यक्ति लोक सेवक हैं, चाहे वे सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हों या नहीं।
स्पष्टीकरण 2 - जहां कहीं ''लोक सेवक'' शब्द आए हैं, वे उस हर व्यक्ति के संबंध में समझे जाएंगे जो लोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण किए हुए हों, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधिकार में कैसी ही विधिक त्रुटि हो।
स्पष्टीकरण 3 - ''निर्वाचन'' शब्द ऐसे किसी विधायी, नगरपालिका या अन्य लोक प्राधिकारी के नाते, चाहे वह कैसे ही स्वरूप का हो, सदस्यों के वरणार्थ निर्वाचन का द्योतक है जिसके लिए वरण करने की पद्धति किसी विधि के द्वारा या अधीन निर्वचन के रूप में विहित की गर्इ हो।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोर्इ बात विरुद्ध न हो–
| ** | ** | ** |
(छ) नियोजक से–
(i) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी विभाग द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन चलाए गए उद्योग के संबंध में इस निमित्त विहित प्राधिकारी, या जहां कि कोर्इ प्राधिकारी विहित नहीं है, वहां विभागाध्यक्ष, अभिप्रेत है;
(ii) किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा या उसकी ओर से चलाए गए उद्योग के संबंध में, उस प्राधिकारी का मुख्य कार्यपालक अधिकारी अभिप्रेत है;
| ** | ** | ** |
(ध) ''कर्मकार'' से कोर्इ ऐसा व्यक्ति (जिसके अंतर्गत शिक्षु भी आता है) अभिप्रेत है, जो किसी उद्योग में भाड़े या इनाम के लिए कोर्इ शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, संक्रियात्मक, लिपिकीय या पर्यवेक्षणिक कार्य करने के लिए नियोजित है, चाहे नियोजन के निबंधन, अभिव्यक्त हों या विवक्षित, और किसी औद्योगिक विवाद के संबंध में इस अधिनियम के अधीन की किसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए इसके अंतर्गत कोर्इ ऐसा व्यक्ति आता है जो उस विवाद के संबंध में या उसके परिणामस्वरूप पदच्युत या उन्मोचित कर दिया गया है या जिसकी छंटनी कर दी गर्इ है अथवा जिसकी पदच्युति, उन्मोचन या छंटनी किए जाने से वह विवाद पैदा हुआ हो, किंतु इसके अन्तर्गत कोर्इ ऐसा व्यक्ति नहीं आता है जो–
(i) वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के अधीन हो; अथवा
(ii) पुलिस सेवा में या किसी कारागार के अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में नियोजित हो; अथवा
(iii) मुख्यत: प्रबंधकीय या प्रशासनिक हैसियत में नियोजित हो; अथवा
(iv) पर्यवेक्षणिक हैसियत में नियोजित होते हुए प्रतिमास एक हजार छ: सौ रुपए से अधिक मजदूरी लेता हो अथवा या तो पद से संलग्न कर्तव्यों की प्रकृति के या अपने में निहित शक्तियों के कारण ऐसे कृत्यों का प्रयोग करता है जो मुख्यत: प्रबंधकीय प्रकृति के हैं।
उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 की धारा 11ख
केन्द्रीय सरकार की उन अपेक्षाओं को विनिर्दिष्ट करने की शक्ति जिनका लघु औद्योगिक उपक्रमों द्वारा अनुपालन किया जाएगा
11ख. (1) केन्द्रीय सरकार यह अभिनिश्चित करने की दृष्टि से कि किन्हीं आनुषंगिक और लघु औद्योगिक उपक्रमों को इस अधिनियम के अधीन अनुपोषक उपायों, छूटों या अन्य अनुकूल व्यवहार की आवश्यकता है ताकि वे अपनी वर्धिष्णुता और सामथ्र्य इस प्रकार बनाए रख सकें कि वे :
(क) देश की औद्योगिक अर्थ-व्यवस्था को सामंजस्यपूर्ण रीति से प्रोन्नति करने और बेकारी की समस्या को सुलझाने में, और
(ख) यह सुनिश्चित करने में कि समुदाय के भौतिक साधनों के स्वामित्व और नियंत्रण का वितरण इस प्रकार से किया जाए कि उससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम साधन हो,
प्रभावकारी हों, उपधारा (2) में वर्णित बातों को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचित आदेश द्वारा, वे अपेक्षाएं विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनका किसी औद्योगिक उपक्रम द्वारा अनुपालन किया जाएगा ताकि उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम माना जा सके तथा विभिन्न प्रयोजनों के लिए या विभिन्न वस्तुओं के विनिर्माण या उत्पादन में लगे औद्योगिक उपक्रमों की बाबत इस प्रकार भिन्न-भिन्न अपेक्षाएं विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी :
परन्तु किसी औद्योगिक उपक्रम को आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रम नहीं माना जाएगा जब तक कि वह :–
(i) पुर्जों, संघटकों, उपसमन्वायोजनों, उपकरणों या मध्यवर्तियों के विनिर्माण में; अथवा
(ii) अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए अन्य यूनिटों को, यथास्थिति, सेवाएं देने या अपने उत्पादन के या अपनी कुल सेवाओं के पचास प्रतिशत से अनधिक का प्रदाय करने या देने में,
न लगा हो या न लगने देने वाला हो।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट बातें निम्नलिखित हैं, अर्थात् :–
(क) औद्योगिक उपक्रम द्वारा निम्नलिखित में विनिधान :–
(i) संयंत्र और मशीनरी, या
(ii) भूमि, भवन, संयंत्र और मशीनरी;
(ख) औद्योगिक उपक्रम के स्वामित्व की प्रकृति;
(ग) औद्योगिक उपक्रम में नियोजित कर्मकारों की संख्या की अल्पता;
(घ) औद्योगिक उपक्रम के उत्पाद की प्रकृति, लागत और क्वालिटी;
(ड़) औद्योगिक उपक्रम द्वारा किसी संयंत्र या मशीनरी का आयात किए जाने के लिए अपेक्षित विदेशी मुद्रा, यदि कोर्इ हो; और
(च) अन्य ऐसी ही सुसंगत बातें जो विहित की जाएं।
(3) उपधारा (1) के अधीन किए जाने के लिए प्रस्थापित प्रत्येक अधिसूचित आदेश की एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन प्रस्थापित अधिसूचित आदेश में कोर्इ परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि उस आदेश का जारी किया जाना अनुमोदित कर दिया जाना चाहिए तो वह आदेश नहीं किया जाएगा।
(4) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा औद्योगिक उपक्रम जो उद्योग (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1984 के प्रारम्भ के ठीक पहले, तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार, आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम की परिभाषा के अधीन आता था, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात्, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए तब तक आनुषंगिक या लघु औद्योगिक उपक्रम माना जाता रहेगा जब तक कि पूर्वोक्त परिभाषा को उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी अधिसूचित आदेश द्वारा परिवर्तित या अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता।
लघु उद्योग/अनुषंगी उद्योग माने जाने के लिए औद्योगिक उपक्रमों द्वारा अनुपालित की जाने संबंधी अपेक्षाएं
का.आ. 857(र्इ), तारीख 10.12.1999 - केन्द्रीय सरकार यह पता लगाने की दृष्टि से यह आवश्यक समझती है कि कौन से अनुषंगी और लघु औद्योगिक उपक्रमों को अपनी क्षमता और सामथ्र्य बनाए रखने के लिए उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) (जिसे इसमें इसके पश्चात् 'उक्त अधिनियम' कहा गया है) के अधीन सहायक उपायों, छूट या अन्य अनुकूल व्यवहार की आवश्यकता है ताकि वे–
(क) देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का सौहार्दपूर्ण तरीके से संवर्धन करने के लिए और बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए प्रभावी भूमिका निभा सकें; और
(ख) यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी भूमिका निभा सकें कि समाज के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इतने बढ़िया तरीके से वितरित किया जाए कि वह जन-साधारण की भलार्इ में काम आ सके;
और प्रारूप अधिसूचना उक्त अधिनियम की धारा 11ख की उपधारा (3) के अनुसार तीस दिन की अवधि के लिए संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी गर्इ थी;
और संसद् के दोनों सदनों ने प्रस्तावित अधिसूचना में किसी उपांतरण का सुझाव नहीं दिया है;
अत: अब उक्त अधिनियम की धारा 11ख की उपधारा (1) और धारा 29ख की उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए और उद्योग मंत्रालय (औद्योगिक विकास विभाग), भारत सरकार की अधिसूचना सं. का.आ. 232(र्इ), तारीख 2 अप्रैल, 1991 को अतिष्ठित करते हुए केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित संघटक विनिर्दिष्ट करती है जिनके आधार पर कोर्इ औद्योगिक उपक्रम उक्त अधिनियम के प्रयोजनों के लिए लघु या अनुषंगी औद्योगिक उपक्रम माना जाएगा :–
(1) लघु औद्योगिक उपक्रम – ऐसा औद्योगिक उपक्रम जिसमें संयंत्र और मशीनरी में स्थिर आस्तियों में, चाहे वह स्वामित्व के रूप में धारित हो या पट्टे पर या अवक्रय पर धारित हो, विनिधान एक करोड़ रुपए से अधिक न हो :
परन्तु उस लघु उद्योग उपक्रम की बाबत, जो इस आदेश के परिशिष्ट में विनिर्दिष्ट मदों का विनिर्माण करता है, निवेश की अधिकतम सीमा पांच करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी।
(2) अनुषंगी औद्योगिक उपक्रम - ऐसा औद्योगिक उपक्रम जो पुर्जे, संघटक, सबएसेम्बली, औजार या इण्टरमिडिएट के विनिर्माण या उत्पादन के अथवा सेवाएं देने के काम में लगा है या उसका उस रूप में कार्य करने का प्रस्ताव है और सप्लार्इ का काम हाथ में लेने के लिए लगी है या सप्लार्इ करने का उसका प्रस्ताव है या यथास्थिति अपने उत्पादन या सेवाओं का अधिक से अधिक पचास प्रतिशत एक या अधिक अन्य औद्योगिक उपक्रमों को देता है और जिसका संयंत्र और मशीनरी में स्थिर आस्तियों में, चाहे स्वामित्व के रूप में धारित हो या पट्टे पर या अवक्रय पर धारित हो, विनिधान एक करोड़ रुपए से अधिक नहीं है :
परन्तु यह कि उस समनुषंगी औद्योगिक उपक्रम की बाबत, जो इस आदेश के परिशिष्ट में विनिर्दिष्ट मदों का विनिर्माण करता है, निवेश की अधिकतम सीमा पांच करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी।
टिप्पण 1 : ऊपर उल्लिखित कोर्इ भी लघु या अनुषंगी औद्योगिक उपक्रम किसी अन्य औद्योगिक उपक्रम का सहायक उपक्रम या उसके स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन नहीं होगा।
स्पष्टीकरण.–इस टिप्पण के प्रयोजनों के लिए–
(अ) ''स्वामित्वाधीन'' का वही अर्थ होगा जो उक्त अधिनियम की धारा 3 के खंड (च) में विनिर्दिष्ट ''स्वामी'' पद की परिभाषा से लिया गया है;
(आ) ''सहायक उपक्रम'' का वही अर्थ होगा जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4 के साथ पठित धारा 2 के खंड (47) में दिया गया है;
(इ) ''किसी अन्य औद्योगिक उपक्रम के नियंत्रणाधीन'' पद से निम्नलिखित अभिप्रेत है :–
(i) जहां दो या अधिक औद्योगिक उपक्रम स्वत्वधारी के रूप में एक ही व्यक्ति द्वारा स्थापित किए जाएं वहां ऐसा प्रत्येक औद्योगिक उपक्रम अन्य औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों के नियंत्रणाधीन समझा जाएगा,
(ii) जहां दो या अधिक औद्योगिक उपक्रम भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 1) के अधीन भागीदारी फर्म के रूप में स्थापित किए जाएं और एक या अधिक भागीदार ऐसी फर्मों में सामान्य भागीदार है या हैं वहां ऐसा प्रत्येक उपक्रम दूसरे उपक्रम या उपक्रमों के नियंत्रणाधीन समझा जाएगा,
(iii) जहां औद्योगिक उपक्रम कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन कंपनियों द्वारा स्थापित किए जाएं वहां औद्योगिक उपक्रम दूसरे औद्योगिक उपक्रम के नियंत्रणाधीन समझा जाएगा यदि–
(क) उसमें दूसरे औद्योगिक उपक्रम द्वारा धारित इक्विटी उसकी कुल इक्विटी के चौबीस प्रतिशत से अधिक है; या
(ख) किसी उपक्रम का प्रबंध नियंत्रण दूसरे औद्योगिक उपक्रम को इस प्रकार चला जाता है कि प्रथमवर्णित उपक्रम का प्रबंध निदेशक दूसरे औद्योगिक उपक्रम में भी प्रबंध निदेशक या निदेशक है या प्रथमवर्णित उपक्रम के निदेशक बोर्ड में अधिकांश निदेशक उपखंड (iv) की निम्नलिखित मद (क) और (ख) के उपबंधों के अनुसार दूसरे औद्योगिक उपक्रम में इक्विटी धारक हैं;
(iv) उपरोक्त उपखंड (iii) के अनुसार किसी उपक्रम में दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों द्वारा इक्विटी सहभागिता की सीमा निम्न प्रकार निकाली जाएगी :–
(क) दूसरे औद्योगिक उपक्रम द्वारा इक्विटी सहभागिता में विदेशी और देशी दोनों इक्विटी शामिल होंगी;
(ख) दूसरे औद्योगिक उपक्रम द्वारा इक्विटी सहभागिता से किसी औद्योगिक उपक्रम में दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों द्वारा चाहे लघु हों या अन्यथा एक साथ धारित कुल इक्विटी अभिप्रेत होगी एवं उन व्यक्तियों द्वारा धारित इक्विटी अभिप्रेत होगी जो किसी दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में निदेशक हैं भले ही संबंधित व्यक्ति दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में निदेशक है;
(ग) किसी लघु औद्योगिक उपक्रम में निदेशक के रूप में नियुक्त और विशेष तकनीकी योग्यता और अनुभव रखने वाले व्यक्ति द्वारा धारित अर्हक शेयरों की सीमा तक इक्विटी, यदि संगम-अनुच्छेदों में ऐसा उपबंधित हो, तो दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों द्वारा धारित इक्विटी की गणना नहीं गिनी जाएगी भले ही संबंधित व्यक्ति दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों में निदेशक हो;
(v) जहां कोर्इ औद्योगिक उपक्रम उपखंड (i), (ii) या (iii) के निबंधनो के अनुसार किसी दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों का सहायक उपक्रम है अथवा उसके स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन है और यदि प्रथमवर्णित औद्योगिक उपक्रम और दूसरे औद्योगिक उपक्रम या उपक्रमों के संयंत्र और मशीनरी में स्थिर आस्तियों में कुल मिलाकर इस अधिसूचना के यथास्थिति, पैरा (1) या (2) में विनिर्दिष्ट विनिधान की सीमा से अधिक है वहां इनमें से कोर्इ भी औद्योगिक उपक्रम लघु या अनुषंगी औद्योगिक उपक्रम नहीं समझा जाएगा।
टिप्पण 2 : (क) इस अधिसूचना के पैरा (1) और (2) के प्रयोजनों के लिए संयंत्र और मशीनरी का मूल्य निकालते समय उसकी मूल कीमत, भले ही संयंत्र और मशीनरी नर्इ हो या पुरानी, हिसाब में ली जाएगी।
(ख) संयंत्र और मशीनरी का मूल्य निकालते समय निम्नलिखित को छोड़ दिया जाएगा, अर्थात:–
(i) उपकरणों जैसे औजषर, जिग, डार्इ, मोल्ड और रखरखाव के फालतू पुर्जों की लागत और उपभोग्य सामान की लागत;
(ii) संयंत्र और मशीनरी लगाने की लागत;
(iii) अनुसंधान और विकास उपस्कर तथा प्रदूषण नियंत्रण उपस्कर की लागत;
(iv) राज्य विद्युत बोर्ड के विनियमों के अनुसार उपक्रमों द्वारा लगाए गए बिजली उत्पादन सेटों और अतिरिक्त ट्रांसफार्मर की लागत;
(v) राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम या राज्य लघु उद्योग निगम को दिए गए बैंक प्रभार और सेवा प्रभार;
(vi) केबल, तार, बस, बार, विद्युत नियंत्रण पैनल (वे नहीं जो अलग-अलग मशीनों पर लगे हैं), आयल सर्किट ब्रेकर या मिनिएचर सर्किट ब्रेकर, जिनका प्रयोग संयंत्र और मशीनरी में बिजली देने के लिए या सुरक्षा उपायों के लिए आवश्यक है प्राप्त करने या उन्हें लगाने की लागत;
(vii) गैस उत्पादक संयंत्रों की लागत;
(viii) निर्माण स्थल से कारखाने तक देशी मशीनरी ले जाने के प्रभार (विक्रय कर और उत्पाद शुल्क को छोड़कर);
(ix) संयंत्र और मशीनरी स्थापित करने के लिए तकनीकी जानकारी के लिए दिए गए प्रभार;
(x) ऐसे भंडारण टैंकों के लागत जिनमें केवल कच्ची सामग्री तैयार उत्पाद ही रखे जाते हैं और वे विनिर्माण प्रक्रिया से जुड़े नहीं होते; और
(xi) आग बुझाने के उपकरणों की लागत।
(ग) आयातित मशीनरी की दशा में निम्नलिखित को मूल्य निकालते समय जोड़ा जाएगा :–
(i) आयात शुल्क (प्रकीर्ण खर्चों को जैसे पत्तन (पोर्ट) से कारखाने तक ले जाने के खर्च, पत्तन पर दिए गए डेमरेज को छोड़कर);
(ii) पोत परिवहन प्रभार;
(iii) सीमाशुल्क निकासी प्रभार; और
(iv) विक्रय कर।
प्रत्येक औद्योगिक उपक्रम, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा उक्त अधिनियम की धारा 10 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र या उक्त अधिनियम की धारा 11, 11क और 13 के अधीन अनुज्ञप्ति दी गर्इ है और वे अनुषंगी और लघु औद्योगिक उपक्रम से संबंधित उपरोक्त पैरा (1) और (2) के उपबंधों के अंतर्गत आता है, इस अधिसूचना के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से 180 दिन की अवधि के भीतर इस प्रकार स्वामी के विवेकानुसार रजिस्ट्रीकृत किया जा सकेगा।
परिशिष्ट
मद-सूची
[पैरा (1) और (2) का परन्तुक देखिए]
| उत्पाद कोड | मदों का नाम |
| 260101 | बुना हुआ सूती कपड़ा |
| 260102 | बुनी हुर्इ सूती बनियान |
| 260103 | बुनी हुर्इ सूती जुराबें |
| 260104 | बुने हुए सूती अधोवस्त्र |
| 260106 | बुनी हुर्इ सूती शाल |
| 260199 | बुने हुए अन्य सूती पहनावे |
| 260201 | बुना हुआ ऊनी कपड़ा |
| 260202 | बुनी हुर्इ ऊनी बनियान |
| 260203 | बुनी हुर्इ ऊनी जुराबें |
| 260204 | बुने हुए ऊनी स्कार्व (गलबंद) |
| 260205 | बुने हुए ऊनी अधोवस्त्र |
| 260206 | बुनी हुर्इ ऊनी टोपिया |
| 260207 | बुनी हुर्इ ऊनी शाल |
| 260208 | ऊन के दस्ताने |
| 260207 | बुने हुए ऊनी मफलर |
| 260299 | बुने हुए अन्य ऊनी पहनावे |
| आर्ट सिल्क/मानव निर्मित फाइवर होजरी | |
| 260310 | 1. सिंथेटिक बुनी हुर्इ जुराबें और लंबी जुराबें (स्टाकिंग्स) |
| 260302 | 2. सिंथेटिक बुने हुए अधोवस्त्र जैसे बनियान, ब्रीफस और ड्रायर |
| 260304 | 3. सिंथेटिक बुने हुए बाह्य वस्त्र जैसे जर्सी, स्लिपओवर्स, पुलोवर्स, कार्डिगन्स और जैकेट्स |
| 260308 | 4. सिंथेटिक बुने हुए बच्चों के वस्त्र जैसे बेबी सूट, निकर, फ्राक, अधोवस्त्र और बाह्य वस्त्र |
| 260309.01 | 5. सिंथेटिक बुने हुए फैब्रिक, सिल्वर बुनार्इ से बनाए गए हार्इ पाइल फैब्रिक को छोड़कर, तथा सिंथेटिक बुने हुए कंबल |
| 260311 | 6. सिंथेटिक बुने हुए तैराकी वस्त्र जैसे ट्रंक और कास्ट्यूम |
| 260312 | 7. सिंथेटिक बुने हुए वस्त्र जैसे स्कार्फ, मफलर, शाल, टोपी, टार्इ, ब्लाउज और जीन |
| 260313 | 8. सिंथेटिक बुनी शर्ट (कमीज), टी-शर्ट, कालर शर्ट और स्पोर्ट-स्कर्ट |
| 260314 | 9. सिंथेटिक बुने हुए होज |
| 260315 | 10. सिंथेटिक बुने हुए गैस मेंटल फैब्रिक |
| 260316 | 11. अन्य सिंथेटिक बुने कपड़े |
| 343101 | हैकसा फ्रेम्स |
| 343102 | प्लाइर्स |
| 343103 | स्क्रू ड्राइवर्स |
| 343104 | स्पैनर्स |
| 343106 | हैमर्स |
| 343108 | एनविल्स |
| 343109 | वुड वर्किंग सा |
| 343111 | रेंचर्स |
| 343112 | नाइफ (चाकू) और कटार्इ के ब्लैड (सभी प्रकार के जिनके अंतर्गत वे भी हैं जो हाथ के कामों के लिए धातु, कागज, बांस और लकड़ी के बने हैं)। |
| 343113 | नेल पुलर्स (कील निकालने वाले) |
| 343114 | छेनी |
| 343115 | चिमटा |
| 343116 | तार काटने वाले औजार (वायर कटर्स) |
| 343199 | लोहार, बढ़र्इ, हाथ की गढ़र्इ, ढलार्इ आदि का काम करने से संबंधित अन्य हाथ के औजार |
| लेखन सामग्री सेक्टर | |
| 319911 | लेखन स्याही और फाउंटेन पेन की स्याही |
| 387101 | बाल प्वाइंट पेन |
| 387103 | फाउंटेन पेन |
| 387104 | पेन की निबें |
| 387105 | फाउंटेन पेन और बाल पेन के संघटक, मेटेलिक टिपों को छोड़कर |
| 387201 | पेंसिलें |
| 387401 | हाथ की स्टेपलिंग मशीन |
| 387501 | पेंपर पिन |
| 387601 | कार्बन पेपर |
| 387602.10 | मेकेनिकल टाइपराइटरों के लिए टाइपराइटर रिबन |
| 387901 | हैंड नंबरिंग मशीन |
| 387903 | पेंसिल शर्पनर्स |
| 387907 | पेन होल्डर्स |
| औषधि और फार्मास्यूटिकल्स सेक्टर | |
| 310601.01 | पारा अमिनो फेनोल इंडल ग्रेड |
| 310628 | पाइराजोलोन्स |
| 310650 | बेंजिल बेंजोएट |
| 310658 | नियासिनामाइड |
| 313125 | पेरासेटामोल |
| 313158.01 | मेथिल पेराबेन्स और सोडियम साल्ट, पैरा हाइड्राक्सी बेनजोइक ऐसिड से आरंभ करते हुए। |
| 313159.01 | एथिल पेराबेन्स और सोडियम साल्ट, पैराहाइड्राक्सी बेनजोइक एसिड से आरंभ करते हुए। |
| 313195.01 | प्रोपाइल पेराबेन्स और सोडियम साल्ट, पैरा हाइड्राक्सी बेनजोइक एसिड से आरंभ करते हुए। |
| 3131960 | कैलशियम ग्लुकोनेट |
| 310126 | एलुमिनियम हाइड्रोक्साइड जेल |
| 261401 | स्पोट्र्स नेट, सभी प्रकार के |
| 385101 | शटल काक्स |
| 385104 | हाकी स्टिक्स |
| 385105.10 | स्पोट्र्स के लिए संरक्षात्मक उपस्कर, जैसे कि चमडे़ के माल के पैड, ग्लोव्स, आदि |
| 385106 | डम्ब-बेल्स और चेस्ट एक्सपेंडर्स |
| 385107 | क्रिकेट और हाकी की गेंद |
| 385108 | फुटबाल, वालीबाल और बास्केट बाल कवर्स। |
| 20-21 | खाद्य और संबद्ध उद्योग |
| 202501 | अचार और चटनी |
| 205101 | ब्रेड |
| 303 | प्लास्टिक उत्पाद |
| 303705 | पोलीप्रोपीलीन बाक्स स्टे्रपिंग |
| 30391201 | पी.वी.सी. पाइप, जिसके अंतर्गत 110 मि.मि. डाइ तक के कन्ड्यूट हैं |
| 30393501 | पी.वी.सी. पाइप के लिए फिटिंग, जिसके अंतर्गत 110 मि.मि. डाइ तक के कन्ड्यूट हैं। |
| 31 | रसायन और रसायन उत्पाद |
| रंजक पदार्थ क्षारकीय रंजक (डाइस्टफ बेसिक डार्इ) | विनिर्देश | |
| 31220301 | 1. बेसिक येलो | 2 |
| 31220302 | 2. बेसिक ग्रीन | 4 |
| 31220303 | 3. बेसिक ग्रीन | 1 |
| 31220304 | 4. बेसिक वायलेट | 11 |
| 31220305 | 5. बेसिक वायलेट | 1 |
| 31220306 | 6. बेसिक ब्लू | 7 |
| 31220307 | 7. बेसिक वायलेट | 10 |
| 31220308 | 8. बेसिक ब्लू (मेथिलीन ब्लू) | 9 |
| ए जैड ओ डार्इ | ||
| प्रत्यक्ष (डायरेक्ट) | ||
| 31220701 | 1. डायरेक्ट येलो | 8 |
| 31220702 | 2. डायरेक्ट येलो | 17 |
| 31220703 | 3. डायरेक्ट येलो | 9 |
| 31220704 | 4. डायरेक्ट येलो | 29 |
| 31220705 | 5. डायरेक्ट रेड (कोंगो रेड) | 28 |
| 31220706 | 6. डायरेक्ट रेड | 13 |
| 31220707 | 7. डायरेक्ट डार्इ [चमकीला कोंगो सी(ए)] | |
| 31220708 | 8. डायरेक्ट रेड | 1 |
| 31220709 | 9. डायरेक्ट ब्राउन | 2 |
| 31220710 | 10. डायरेक्ट ब्राउन | 59 |
| 31220711 | 11. डायरेक्ट ओरेंज | 1 |
| 31220712 | 12. डायरेक्ट येलो | 20 |
| 31220713 | 13. डायरेक्ट ओरेंज | 1 |
| 31220714 | 14. डायरेक्ट वायलेट | 45 |
| 31220715 | 15. डायरेक्ट वायलेट | 1 |
| 31220716 | 16. डायरेक्ट ब्लैक | 29 |
| 31220717 | 17. डायरेक्ट ब्लू | 2 |
| 31220718 | 18. डायरेक्ट ब्लू | 6 |
| 31220719 | 19. डायरेक्ट रेड | 61 |
| 31220725 | 25. डायरेक्ट येलो | 4 |
| 31220726 | 26. डायरेक्ट येलो (क्रिसोफेनिक) | 12 |
| 31220727 | 27. डायरेक्ट वायलेट | 7 |
| 31220728 | 28. डायरेक्ट वायलेट | 31 |
| 31220729 | 29. डायरेक्ट वायलेट | 9 |
| 31220730 | 30. डायरेक्ट वायलेट | 51 |
| 31220731 | 31. डायरेक्ट रेड | 81 |
| 31220732 | 32. डायरेक्ट येलो | 44 |
| 31220733 | 33. डायरेक्ट रेड | 31 |
| 31220734 | 34. डायरेक्ट ओरेंज | 26 |
| 31220735 | 35. डायरेक्ट रेड | 23 |
| 31220736 | 36. डायरेक्ट रेड | 83 |
| 31220737 | 37. डायरेक्ट ब्राउन | 1 |
| 31220738 | 38. डायरेक्ट ब्राउन | 5 |
| 31220739 | 39. डायरेक्ट ब्लैक | 38 |
| 31220740 | 40. डायरेक्ट ग्रीन | 1 |
| 31220741 | 41. डायरेक्ट ग्रीन | 6 |
| 31220742 | 42. डायरेक्ट ग्रीन | 8 |
| 31220743 | 43. डायरेक्ट ब्राउन | 75 |
| 31220744 | 44. डायरेक्ट ब्लू | 71 |
| 31220745 | 45. डायरेक्ट ब्लैक | 86 |
| अम्ल रंजक (एसिड डाइ) | ||
| 31220761 | 1. एसिड येलो | 36 |
| 31220762 | 2. एसिड ओरेंज | 7 |
| 31220763 | 3. एसिड रेड | 88 |
| 31220764 | 4. एसिड रेड (फूड रेड 7) | 18 |
| 31220765 | 5. एसिड रेड (फूड रेड 10) | 1 |
| 31220766 | 6. एसिड वायलेट (फूड रेड 11) | 7 |
| 31220767 | 7. एसिड येलो | 11 |
| 31220768 | 8. एसिड येलो | 76 |
| 31220769 | 9. एसिड येलो (फूड येलो 5) | 17 |
| 31220770 | 10. एसिड येलो (फूड येलो 4) | 23 |
| 31220771 | 11. एसिड ब्राउन | 55 |
| 31220772 | 12. एसिड ओरेंज | 24 |
| 31220773 | 13. एसिड ब्राउन | 14 |
| 31220774 | 14. एसिड ब्लैक | 1 |
| 31220775 | 15. एसिड रेड | 85 |
| 31220776 | 16. एसिड येलो | 42 |
| 31220778 | 17. एसिड ब्लू | 113 |
| 31220779 | 18. एसिड रेड | 142 |
| 31220781 | 19. एसिड रेड | 17 |
| 31220782 | 20. एसिड येलो | 73 |
| नैप्थोल | ||
| 31220801 | 1. ऐजोइक युग्मक (कपलिंग) कम्पोनेंट्स | |
| (नेप्थोल ए.एस.) | 2 | |
| 31220802 | 2. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस.र्इ.) | 10 | |
| 31220803 | 3. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस.बी.एस.) | 17 | |
| 31220804 | 4. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-डी.) | 19 | |
| 31220805 | 5. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-टी.आर.) | 8 | |
| 31220806 | 6. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-ओ.एल.) | 20 | |
| 31220807 | 7. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-एल.टी.) | 24 | |
| 31220808 | 8. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-पी.एच.) | 14 | |
| 31220809 | 9. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-बी.ओ.) | 4 | |
| 31220810 | 10. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-एस.डब्ल्यू) | 7 | |
| 31220811 | 11. ऐजोइक कपलिंग कम्पोनेंट | |
| (नेप्थोल ए.एस-जी.) | 5 | |
| 31220901 | फिथालोकाइनाइन ब्लू (फिथेल काइनाइन ग्रीन के निर्माण के लिए केप्टिव उपभोग को छोड़कर) |
| अभिक्रियाशील रंजक (रिएक्टिव डार्इ) | विनिर्देश | ||
| 31221001 | 1. चमकीला (ब्रिलिएंट) रेड | एम-5 बी. | रिएक्टिव रेड-2 |
| 31221002 | 2. ब्रिलिएंट रेड | एच-7 बी. | रिएक्टिव रेड-4 |
| 31221003 | 3. रूबीन | एम-5 बी. | रिएक्टिव रेड-6 |
| 31221004 | 4. स्कारलेट | एच-सीआर | रिएक्टिव रेड-8 |
| 31221005 | 5. ब्रिलिएंट रेड | एम-8 बी. | रिएक्टिव रेड-11 |
| 31221006 | 6. ब्रिलिएंट रेड | एच-8 बी. | रिएक्टिव रेड-31 |
| 31221007 | 7. रूबीन | एच-बी.एन. | रिएक्टिव रेड-32 |
| 31221008 | 8. पिंक | आर.बी. | रिएक्टिव रेड-37 |
| 31221009 | 9. ब्रिलिएंट रेड | र्इ.बी. | रिएक्टिव रेड-73 |
| 31221010 | 10. ब्रिलिएंट पिंक | बी. | रिएक्टिव रेड-74 |
| 31221011 | 11. ब्रिलिएंट पर्पल | एच-आरआर | रिएक्टिव वायलेट-1 |
| 31221012 | 12. ब्रिलिएंट मेजेंटा | बी. | रिएक्टिव वायलेट-13 |
| 31221013 | 13. ब्रिलिएंट वायलेट | पीआर | रिएक्टिव वायलेट-14 |
| 31221014 | 14. ब्रिलिएंट वायलेट | 5आरएक्स | रिएक्टिव वायलेट-21 |
| 31221015 | 15. मेजेंटा | बी | |
| 31221016 | 16. येलो | एमवार्इ-आर | रिएक्टिव येलो-1 |
| 31221017 | 17. येलो | 4-एएस | रिएक्टिव येलो-3 |
| 31221018 | 18. येलो | एमवार्इ-आर | रिएक्टिव येलो-4 |
| 31221019 | 19. येलो | एम-जीआर | रिएक्टिव येलो-7 |
| 31221020 | 20. येलो | एच-4जी | रिएक्टिव येलो-18 |
| 31221021 | 21. ब्रिलिएंट येलो | एम4-जी | रिएक्टिव येलो-22 |
| 31221022 | 22. ब्रिलिएंट येलो | 6जी | रिएक्टिव येलो-43 |
| 31221023 | 23. येलो | आर | रिएक्टिव येलो-44 |
| 31221024 | 24. ब्लैक | एच-एन | रिएक्टिव ब्लैक-8 |
| 31221025 | 25. ब्रिलिएंट ब्लू | एच-70 | रिएक्टिव ब्लू-3 |
| 31221026 | 26. ब्रिलिएंट ब्लू | एम-आर | रिएक्टिव ब्लू-4 |
| 31221027 | 27. ब्रिलिएंट ब्लू | एच-जीआर | रिएक्टिव ब्लू-5 |
| 31221028 | 28. नेवी ब्लू | एम-3आर | रिएक्टिव ब्लू-9 |
| 31221029 | 29. ब्रिलिएंट ब्लू | एच-5जी | रिएक्टिव ब्लू-25 |
| 31221030 | 30. नेवी ब्लू | एच-3आर | रिएक्टिव ब्लू-28 |
| 31221031 | 31. नेवी ब्लू | आरएक्स | रिएक्टिव ब्लू-39 |
| 31221032 | 32. ब्लू | बीआरआर | रिएक्टिव ब्लू-56 |
| 31221033 | 33. नेवी ब्लू | आरएक्स | रिएक्टिव ब्लू-59 |
| 31221034 | 34. ओरेंज | एमएक्स-जी | रिएक्टिव ओरेंज-1 |
| 31221035 | 35. ब्रिलिएंट ओरेंज | एम-2आर | रिएक्टिव ओरेंज-4 |
| 31221036 | 36. गोल्डन येलो | एच-आर | रिएक्टिव ओरेंज-11 |
| 31221037 | 37. ब्रिलिएंट ओरेंज | एच-2आर | रिएक्टिव ओरेंज-13 |
| 31221038 | 38. ओरेंज | रिएक्टिव ओरेंज-14 | |
| 31221039 | 39. ओरेंज | जीर्इएक्स | रिएक्टिव ओरेंज-36 |
| 31221040 | 40. ब्रिलिएंट ओरेंज | आरएक्स | रिएक्टिव ओरेंज-37 |
| 31221041 | 41. ब्रिलिएंट ओरेंज | 3 आरएक्स | रिएक्टिव ओरेंज-38 |
| 31221042 | 42. ब्राउन | 4-आरएच | रिएक्टिव ब्राउन-9 |
| 31221043 | 43. ब्राउन | एम-4आर | रिएक्टिव ब्राउन-10 |
| 31221044 | 44. येलो | एम-एएस | रिएक्टिव येलो-46 |
| 31221045 | 45. नेवी ब्लू | 3 आरएच | रिएक्टिव ब्लू-26 |
| पक्का रंग आधार (फास्ट कलर बेस) | ||
| 31221101 | 1. फास्ट येलो जी जी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 44) | 37000 |
| 31221102 | 2. फास्ट ओरेंज जी सी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 2) | 37005 |
| 31221103 | 3. फास्ट स्कारलेट जी जी/जी सी एस बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 4) | 37010 |
| 31221104 | 4. ऐजोइक डायजो कोम्प 7 | 37030 |
| 31221105 | 5. फास्ट रेड 3 जीएल बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 9) | 37040 |
| 31221107 | 7. फास्ट रेड के बी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 32) | 37090 |
| 31221109 | 9. फास्ट रेड जी एल बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 8) | 37110 |
| 31221110 | 10. फास्ट रेड आर/आर सी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 10) | 37120 |
| 31221111 | 11. फास्ट रेड बी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 5) | 37125 |
| 31221112 | 12. फास्ट स्कारलेट आर/आर सी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 13) | 37130 |
| 31221113 | 13. फास्ट वायलेट बी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 41) | 37165 |
| 31221114 | 14. फास्ट ब्लू बी बी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 20) | 37175 |
| 31221115 | 15. फास्ट गारमेंट जी ओ सी बेस (ऐजोइक डायजो कोम्प 4) | 37129 |
| कांच और चीनी मिट्टी (ग्लास और सिरामिक्स) | |
| 320101 | अग्निसट्ट मृत्तिका, र्इटें और ब्लाक, जिसमें 40» से कम एलुमिना हो |
| छत की टाइलें | |
| 320401 | 3. छत की टाइलें-मृत्तिका |
| 329202 | 7. छत की टाइलें सीमेंट कंक्रीट |
| फर्श की टाइलें | |
| 320402 | 3. फर्श की टाइलें - मृत्तिका |
| 326316 | 5. फर्श की टाइलें-संगमरमर (10मिमि. से कम मोटार्इ की टाइलों को छोड़कर) |
| 326137 | 6. फर्श की टाइलें-ग्रेनाइट (10मिमि. से कम मोटार्इ की टाइलों को छोड़कर) |
| 328903 | 7. फर्श की टाइलें-सीमेंट मोजाइक |
| 329204 | 8. फर्श की टाइलें-सीमेंट कंक्रीट |
| चीनी मिट्टी के खाने पीने के बर्तन और प्रस्तर बर्तन की संबंद्ध मदें, अर्ध काचसम बर्तन और मिट्टी के बर्तन अर्थात् | |
| 323101 | 1. डिनर सेट |
| 323102 | 2. टी सेट |
| 323103 | 3. कप और सासेज |
| 322104 | 4. जार और अन्य आधान |
| 321002 | ब्लाक ग्लास |
| 321003 | काचित ग्लास (कैप्टिव उपयोग के सिवाय) |
| 32110601 | ग्लास बीड्स, औद्योगिक बीड्स के सिवाय |
| 321202015 | ग्लास मिरर, उनको छोड़कर जो आटोमेटिक स्प्रे और वैक्यूम कोटिंग प्रोसेस का उपयोग करके विनिर्मित किए गए हों। |
| 321408 | वैज्ञानिक प्रयोगशाला ग्लासवेयर (बोरो सिलिकेट किस्म को छोड़कर) |
| 321409 | माइक्रो-कवर ग्लास और माइक्रोस्कोप के लिए स्लाइड्स |
| 321701 | कांच की चूड़ियां |
| 321908 | ग्लास होलोवेयर, मुंह से और/या अर्धस्वचालित प्रक्रिया द्वारा फुलाकर |
| 32190901 | सोडालाइम सिलिका दाबित कांच के गिलास (टंबलर) |
| 32190902 | 1. सोडालाइम सिलिका दाबित कांच की प्लेटें |
| 32190903 | 2. सोडालाइम सिलिका दाबित कांच की बाउल |
| 32190904 | 3. सोडालाइम सिलिका दाबित कांच की एशटे्र |
| 32190905 | 4. सोडालाइम सिलिका दाबित कांच के कलश (वास) |
| 321910 | कांच (ग्लास) संगमरमर (सभी किस्म के) |
| 323301 | निम्न तनन इसुलेंटर |
| केमिकल पार्सिलेन मदें इस प्रकार हैं | |
| 32380401 | 1. फ्लैट टिप्पड बेसिन |
| 32390402 | 2. गोल और आयाताकार थालियां (डिशेज़) |
| 32390403 | 3. कम्ब्यूशन (दहनशील) स्तंभ |
| 32390404 | 4. क्रूसिबल (घड़िया) |
| 32390405 | 5. वेक्यूम प्रेशर के लिए फिल्टर फनल |
| 32390406 | 6. ग्रेविटी फिल्ट्रेशन |
| 32390407 | 7. पिपेट रेस्ट्स |
| 32390408 | 8. स्पाटिंग प्लेट्स |
| 32390409 | 9. डेसिकेटर प्लेट्स |
| 324201 | सन्निर्माण के लिए प्रयुक्त चूना और चूनाश्म (सफेदी) |
| 32420401 | निर्माण के लिए प्रयुक्त जलयोजित चूना |
| 324901 | प्लास्टर आफ पेरिस (सन्निर्माण सामग्री के रूप में प्रयोग के सिवाय) |
| 326906 | स्टोनवेयर जार और बाउल की कुंडी |
| 326904 | साल्ट ग्लेज्ड सीवर पाइप |
| 38060601 | थर्मोमीटर-150 (डिग्री) सेñ तक |
| 38110201 | नैत्र लेंस, ब्लैकंस से (ग्लास) आटो पाट्र्स कम्पोनेन्ट और सहायक पुर्जे |
| 374606 | ग्रीस निप्पल |
| 374708 | गन मेटल बुश |
| 374721 | होज पाइप और रेडिएटर होज-आटो |
| 374722 | हार्न बटन |
| 37472601 | शेकल पिन-आटोमोबाइल प्रयोग |
| 374752 | रेडिएटर ग्रिल-आटो |
| 374759 | सीट कुशन |
| 374778 | सन शेड-आटो |
| 37478001 | साइड लैंप एसेम्बली-आटो, कम्बिनेशन लैंप एसेम्बली को छोड़कर |
| 374811 | बैटरी केबल और फिटिंग |
| 374812 | बैटरी सेल टेस्टर |
| 374869 | इलैक्ट्रिकल फ्यूज बोक्स-आटो |
| 374870 | इलैक्ट्रिकल फ्यूज-आटो |
| 374883 | फ्यूल टैंक कैप-आटो |
| 374901 | आरमेचर टेस्टर |
| 374902 | बैटरी टर्मिनल लिफ्टर |
| 374903 | कन्डेन्सर और रिसिस्टेंस टेस्टर |
| 374904 | फेन्डर, स्पून और हैमर्स |
| 374905 | फीलर गेज |
| 374906 | फ्लेरिंग टूल्स |
| 374907 | गियर फ्लशर |
| 374908 | पुल्लर, सभी प्रकार के |
| 374909 | रिंग एक्सपेंडर्स |
| 374910 | रिंग कम्पे्रेशर |
| 374911 | स्क्रू एक्सटे्रक्टर |
| 374912 | स्पार्क प्लग टेस्टर और क्लीनर |
| 374913 | स्टड रिमूवर-एक्सटे्रक्टर |
| 374914 | टो-इन-गेज |
| 374915 | टायर वाल्व पुल आउट टूल्स |
| 374916 | ट्यूब कटर |
| 374917 | फ्लेंजिंग टूल्स |
| 374921 | पेंटिंग के उपस्कर जैसे स्प्रे गन आदि |
| 374925 | ग्रीस गन |
| 374926 | टायर इन्फ्लेटर-हाथ और पैर द्वारा चालित |
| 374944 | आटो रबर कम्पोनेंट, निम्न प्रकार है : |
| 37499401 | 1. ब्रेक पैडल |
| 37499402 | 2. क्लच पैडल |
| 37499403 | 3. डस्ट कवर |
| 37499404 | 4. वाइपर ब्लेड कम्पोनेंट |
| 37499405 | 5. विंडस्क्रीन बीडिंग |
| 37499406 | 6. डोट चेनल |
| 37499407 | 7. रबर बीडिंग |
| 3026071 | 8. रबर मेट |
| 375804 | स्पोक और निपल-आटो सार्इकिल स्वेज्ड किस्म से भिन्न और औषधि तथा फार्मास्यूटिकल सेक्टर में सभी मदें। |
उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 की धारा 14
अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा के अनुदान के लिए प्रक्रिया
14. धारा 11, धारा 11क, धारा 13 या धारा 29ख के अधीन कोर्इ अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा अनुदत्त करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी से, जिसे वह उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, अपेक्षा कर सकेगी कि वह उस निमित्त प्राप्त आवेदनों के संबंध में विस्तृत और पूरा अन्वेषण करे और ऐसे अन्वेषण के परिणाम की उसको रिपोर्ट दे तथा ऐसा अन्वेषण करने में वह अधिकारी या प्राधिकारी ऐसी प्रक्रिया का अनुपालन करेगा जो विहित की जाए।
सूचना प्रौद्योगिकी अघिनियम, 2000 की धारा 2(1)(न)
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो–
| ** | ** | ** |
(न) "इलैक्ट्रानिक अभिलेख" से किसी इलैक्ट्रानिक रूप में या माइक्रोफिल्म या कम्पयूटर जनित माइक्रोफिशों में डाटा अभिलेख या उत्पादित डाटा, स्टोर किया गया, प्राप्त किया गया या भेजा गया प्रतिबिंब या ध्वनि अभिप्रेत है ;
बीमा अधिनियम, 1938 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि कोर्इ बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो–
| ** | ** | ** |
(5ख) "बीमा नियंत्रक" से केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम या भारतीय जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) या साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) या बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के अधीन प्राधिकारी की सभी शक्तियों, कृत्यों का निर्वहन और कर्तव्यों का पालन करने के लिए धारा 2ख के अधीन नियुक्त अधिकारी अभिप्रेत है।
| ** | ** | ** |
(7क) "भारतीय बीमा कंपनी" से ऐसा बीमाकर्ता अभिप्रेत है–
(क) जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनार्इ गर्इ और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है ;
(ख) जो ऐसी कंपनी है, जिसमें किसी विदेशी कंपनी द्वारा, चाहे स्वयं या अपनी किन्हीं समनुषंगी कंपनियों या अपने नामनिर्देशितियों के माध्यम से, साधारण शेयरों की कुल धारिता ऐसी भारतीय बीमा कंपनी की समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत से अधिक न हो ;
(ग) जो ऐसी कंपनी है, जिसका एकमात्र प्रयोजन जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार या पुनर्बीमा कारबार करने का है।
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए "विदेशी कंपनी" पद का वही अर्थ है जो उसका आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (23क) के अधीन दिया गया है।
| ** | ** | ** |
(9) ''बीमाकर्ता'' से निम्नलिखित अभिप्रेत है :–
(क) बीमा कारबार करने वाला कोर्इ व्यष्टि या व्यष्टियों का अनिगमित निकाय या भारत से भिन्न किसी देश की विधि के अधीन निगमित निकाय, जो इस खंड के उपखंड (ग) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति न होते हुए :–
(i) भारत में ऐसा कारबार करता है, या
(ii) जिसके कारबार का प्रधान कार्यालय भारत में है या जो भारत में अधिवसित है, या
(iii) बीमा कारबार अभिप्राप्त करने के उद्देश्य से भारत में प्रतिनिधि नियोजित करता है या कारबार का स्थान बनाए रखता है;
(ख) बीमा कारबार करने वाला [किन्तु इस खंड के उपखंड (ग) में विनिर्दिष्ट व्यक्ति से भिन्न] कोर्इ ऐसा निगमित निकाय जो भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निगमित निकाय है; या जो ऐसे किसी निगमित से इंडियन कंपनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) की धारा 2 की उपधारा (2) में परिभाषित समनुषंगी कंपनी के रूप में उस अधिनियम के अर्थ में सम्बद्ध है, और
(ग) कोर्इ ऐसा व्यक्ति जिसकी ऐसे हामीदारों से, जो सोसायटी ऑफ लायड्स के सदस्य हैं, भारत में स्थायी संविदा है, जिसके द्वारा ऐसा व्यक्ति ऐसी संविदा के निबंधनों के अंतर्गत अन्य व्यक्तियों को हामीदारों की ओर से जोखिम संरक्षण पत्र, जोखिम ग्रहण पत्र या बीमा रक्षण देने वाली अन्य दस्तावेजें देने के लिए प्राधिकृत है,
किंतु इसके अंतर्गत प्रधान अभिकर्ता, मुख्य अभिकर्ता, विशेष अभिकर्ता या बीमा अभिकर्ता या भाग 3 में परिभाषित क्षेमदा सोसाइटी नहीं है।
जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 की धारा 43
बीमा अधिनियम का लागू होना
43. (1) बीमा अधिनियम की निम्नलिखित धाराएं, अर्थात् :–
धाराएं 2, 2ख, 3, 18, 26, 33, 38, 39, 41, 45, 46, 47क, 50, 51, 52, 110क, 110ख, 110ग, 119, 121, 122 और 123,
निगम को यावत्साध्य ऐसे लागू होंगी जैसे वे किसी अन्य बीमाकर्ता को लागू हैं।
(2) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथासम्भव शीघ्र, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश देगी कि बीमा अधिनियम की निम्नलिखित धाराएं, अर्थात्:–
धाराएं 2घ, 10, 11, 13, 14, 15, 20, 21, 22, 23, 25, 27क, 28क, 35, 36, 37, 40, 40क, 40ख, 43, 44, 102 से 106 तक, 107 से 110 तक, 111, 113, 114 और 116क,
निगम को ऐसी शर्तों और ऐसे उपान्तरणों के अधीन रहते हुए लागू होंगी, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की या किए जाएं।
(2क) बीमा अधिनियम की धारा 42 निगम के लिए बीमा कारबार अभियाचित या उपाप्त करने के प्रयोजन के लिए अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अनुज्ञप्ति किसी व्यष्टि को दिए जाने के संबंध में ऐसे प्रभावशील होगी मानो उसकी उपधारा (1) में इस निमित्त प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के प्रति निर्देश के अंतर्गत निगम के ऐसे अधिकारी के प्रति निर्देश हो जो इस निमित प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत किया गया है।
(3) केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि उपधारा (1) या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट उपबंधों से भिन्न बीमा अधिनियम के सब या कोर्इ उपबंध निगम को ऐसी शर्तों पर और ऐसे उपान्तरणों के अधीन रहते हुए लागू होंगे जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की या किए जाएं।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन निकाली गर्इ प्रत्येक अधिसूचना उसके निकाले जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष तीस दिन से अनधिक के लिए रखी जाएगी और ऐसे उपान्तरणों के अधीन रहेगी जैसे संसद्, उसके, जिसमें उसे इस प्रकार रखा जाता है, या उसके अव्यवहित पश्चात्वर्ती सत्र के दौरान करे।
(5) इस धारा में यथा उपबंधित के सिवाय, बीमा अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोर्इ बात निगम को लागू नहीं होगी।
पोत परिवहन अधिनियम, 1958 की धारा 3(12)
परिभाषाएं
3. इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(12) "मछली पकड़ने वाला यान" से प्रोपल्शन के यांत्रिक साधनों से युक्त ऐसा पोत अभिप्रेत है जो लाभ के लिए अनन्य रूप से समुद्र में मछली पकड़ने के कार्य में लगा हुआ है;
राष्ट्रीय स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता और बहु-नि:शक्तताग्रस्त व्यक्ति कल्याण न्यास अधिनियम, 1999 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
(क) "स्वपरायणता" से किसी व्यक्ति के संप्रेषण और सामाजिक योग्यताओं को प्रभावित करने वाली असमान कौशल के विकास की अवस्था अभिप्रेत है और जो आवृतिमय और कर्मकांड व्यवहार से परिलक्षित होती है;
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(ग) "प्रमष्तिष्क घात" से किसी व्यक्ति की अविकासशील अवस्था समूह अभिप्रेत है जो प्रसवपूर्व, प्रसव कालीन या बाल की विकास अवधि में होने वाले प्रमष्तिष्क आघात या क्षति के फलस्वरूप असमान्य प्रेरक नियंत्रण स्थिति द्वारा सुस्पष्ट होती है;
| ** | ** | ** |
(छ) "मानसिक मंदता" से किसी व्यक्ति के मस्तिष्क के अवरूद्ध या अपूर्ण विकास की दशा अभिप्रेत है जो विशेषतया बुद्धिमता की अवसामान्यता से सुस्पष्ट होती है;
| ** | ** | ** |
(ज) "बहु:निशक्तता" से नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (1996 का 1) की धारा 2 के खंड(झ) में परिभाषित दो या अधिक नि:शक्तताओं का संयोजन अभिप्रेत है;
| ** | ** | ** |
(ञ) "नि:शक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता या ऐसी अवस्थाओं में से किन्हीं दो या अधिक अवस्थाओं के संयोजन से संबंधित किसी भी अवस्था से ग्रस्त है और इसमें गंभीर बहु:नि:शक्तता से ग्रस्त व्यक्ति भी आता है;
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(ण) "गंभीर बहु:नि:शक्तता" से ऐसी नि:शक्तता अभिप्रेत है जो एक या अधिक बहु:नि:शक्तताओं का अस्सी प्रतिशत या उससे अधिक है;
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पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 2
परिभाषाएं और निर्वचन
| 2. ** | ** | ** |
(ख) "नियंत्रक" से पेटेंट, डिजाइन और व्यापार चिन्ह महानियंत्रक अभिप्रेत है जो धारा 73 में निर्दिष्ट है ;
| ** | ** | ** |
(ण) "पेटेंटकृत वस्तु" और "पेटेंटकृत प्रक्रिया" से क्रमश: ऐसी वस्तु या प्रक्रिया अभिप्रेत है जिसकी बाबत कोर्इ पेटेंट प्रवृत्त है ;
| ** | ** | ** |
(थ) "परिवर्धन पेटेंट" से धारा 54 के अनुसार अनुदत्त पेटेंट अभिप्रेत है ;
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(म) "वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता" के अंतर्गत न तो आविष्कार का भारत में प्रथम आयातकर्ता है और न ऐसा व्यक्ति है जिसे कोर्इ आविष्कार भारत से बाहर से प्रथम बार संसूचित किया गया है।
उपदान संदाय अधिनियम, 1972 की धारा 4
उपदान संदाय
| 4. (1) ** | ** | ** |
(2) नियोजक कर्मचारी को, सेवा के प्रत्येक सम्पूरित वर्ष के लिए अथवा छह मास से अधिक के उसके भाग के लिए, सम्बद्ध कर्मचारी द्वारा सबसे अंत में प्राप्त की गर्इ मजदूरी की दर पर आधारित पन्द्रह दिनों की मजदूरी की दर से उपदान देगा :
परन्तु मात्रानुपाती दर से मजदूरी प्राप्त करने वाले कर्मचारी की दशा में, दैनिक मजदूरी उसके नियोजन के पर्यवसान के ठीक पूर्ववर्ती तीन मास की कालावधि के लिए उसके द्वारा प्राप्त कुल मजदूरी की औसत पर संगणित की जाएगी और इस प्रयोजन के लिए किसी अतिकालिक कार्य के लिए संदत्त मजदूरी गणना में नहीं ली जाएगी :
परन्तु यह और कि ऐसे कर्मचारी की दशा में, जो मौसमी स्थापन में नियोजित है और जो वर्ष भर ऐसे नियोजित नहीं है, नियोजक प्रत्येक मौसम के लिए सात दिन की मजदूरी की दर से उपदान देगा।
स्पष्टीकरण.–मासिक दर से मजदूरी प्राप्त करने वाले कर्मचारी की दशा में, पन्द्रह दिनों की मजदूरी, सबसे अंत में उसके द्वारा प्राप्त मजदूरी की मासिक दर को छब्बीस से भाग करके और भागफल को पन्द्रह से गुणा करके परिकलित की जाएगी।
(3) किसी कर्मचारी को संदेय उपदान की रकम तीन लाख पचास हजार रुपए से अधिक नहीं होगी।
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नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 2
परिभाषाएं
| 2. ** | ** | ** |
(क) "समुचित सरकार" से अभिप्रेत है,–
(i) केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा पूणर्त: या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन या छावनी अधिनियम, 1924 के अधीन गठित किसी छावनी बोर्ड के संबंध में, केन्द्रीय सरकार ;
(ii) किसी राज्य सरकार या उस सरकार द्वारा पूणर्त: या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित किसी स्थापन या छावनी बोर्ड से भिन्न किसी स्थानीय प्र्राधिकारी के संबंध में, राज्य सरकार ;
(iii) केन्द्रीय समन्वय समिति और केन्द्रीय कार्यपालिका समिति की बाबत, केन्द्रीय सरकार ; और
(iv) राज्य समन्वय समिति और राज्य कार्यपालिका समिति की बाबत, राज्य सरकार ;
(ख) "अंधता" उस अवस्था को निर्दिष्ट करती है जहां कोर्इ व्यक्ति निम्नलिखित अवस्था में से किसी से ग्रसित है, अर्थात्:–
(i) दृष्टि का पूर्ण अभाव ; या
(ii) सुधारक लेंसों के साथ बेहतर नेत्र में दृष्टि की तीक्ष्णता जो 6/60 या 20/200 (स्नेलन) से अधिक न हो ; या
(iii) दृष्टि क्षेत्र की सीमा जो 20 डिग्री कोण वाली या उससे बदतर है ;
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(झ) "नि:शक्तता" से अभिप्रेत है,–
(i) अन्धता ;
(ii) कम दृष्टि ;
(iii) कुष्ठ रोग मुक्त ;
(iv) श्रवण शक्ति का ह्रास ;
(v) चलन नि:शक्तता ;
(vi) मानसिक मंदता ;
(vii) मानसिक रुग्णता ;
| ** | ** | ** |
(ठ) "श्रवण शक्ति का ह्रास" से अभिप्रेत है संवाद संबंधी रेंज की आवृति में बेहतर कर्ण में साठ डेसीेबेल या अधिक की हानि ;
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(ढ) "कुष्ठ रोग मुक्त व्यक्ति" से कोर्इ ऐसा व्यक्ति अभिपे्रत है, जो कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया है किन्तु,–
(i) हाथों या पैरों में संवेदना की कमी और नेत्र और पलक में संवेदना की कमी और आंशिक घात से ग्रस्त है किन्तु प्रकट विरूपता से ग्रस्त नहीं है ;
(ii) प्रकट विरूपता और आंशिक घात से ग्रस्त है, किन्तु उसके हाथों और पैरों में पर्याप्त गतिशीलता है, जिससे वह सामान्य आर्थिक क्रियाकलाप कर सकता है ;
(iii) अत्यन्त शारीरिक विरूपता और अधिक वृद्धावस्था से ग्रस्त है जो कोर्इ भी लाभपूर्ण उपजीविका चलाने से रोकती है ;
और "कुष्ठ रोग मुक्त" पद का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा ;
(ण) "चलन नि:शक्तता" से हड्डियों, जोड़ों या मांसपेशियों की कोर्इ ऐसी नि:शक्तता अभिप्रेत है, जिससे अंगों की गति में पर्याप्त निबंधन या किसी प्रकार का प्रमस्तिष्क घात हो ;
(त) "चिकित्सा प्राधिकारी" से कोर्इ ऐसा अस्पताल या संस्था अभिप्रेत है जो समुचित सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विनिर्दिष्ट की जाए ;
(थ) "मानसिक रुग्णता" से मानसिक मंदता से भिन्न कोर्इ मानसिक विकार अभिप्रेत है ;
(द) "मानसिक मंदता" से अभिप्रेत है, किसी व्यक्ति के चित्त की अवरुद्ध या अपूर्ण विकास की अवस्था, जो विशेष रूप से बुद्धि की अवसामान्यता द्वारा अभिलक्षित होती है ;
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(न) "नि:शक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किसी नि:शक्तता के कम से कम चालीस प्रतिशत से ग्रस्त है ;
(प) "कम दृष्टि वाला व्यक्ति" से ऐसा कोर्इ व्यक्ति अभिप्रेत है जिसकी उपचार या मानक अपवर्तनीय संशोधन के पश्चात् भी दृष्टि क्षमता का ह्रास हो गया है किन्तु जो समुचित सहायक युक्ति से किसी कार्य की योजना या निष्पादन के लिए दृष्टि का उपयोग करता है या उपयोग करने में संभाव्य रूप से समर्थ है ;
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(ब) "पुनर्वास" ऐसी प्रक्रिया के प्रति निर्देश करता है जिसका उद्देश्य नि:शक्त व्यक्तियों को, उनका सर्वोत्तम शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, मानसिक या सामाजिक कृत्यकारी स्तर प्राप्त करने में और उसे बनाए रखने में समर्थ बनाना है।
नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 56
गंभीर रूप से नि:शक्त व्यक्तियों के लिए संस्थाएं
56. (1) समुचित सरकार, ऐसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे, गंभीर रूप से नि:शक्त व्यक्तियों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उनका अनुरक्षण कर सकेगी।
(2) जहां समुचित सरकार की यह राय है कि उपधारा (1) के अधीन स्थापित किसी संस्था से भिन्न कोर्इ संस्था, गंभीर रूप से नि:शक्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए ठीक है वहां सरकार ऐसी संस्था को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए गंभीर रूप से नि:शक्त व्यक्तियों के लिए संस्था के रूप में मान्यता दे सकेगी :
परन्तु इस धारा के अधीन किसी संस्था को तब तक मान्यता नहीं दी जाएगी जब तक ऐसी संस्था ने इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन न किया हो।
(3) उपधारा (1) के अधीन स्थापित प्रत्येक संस्था, ऐसी रीति से अनुरक्षित की जाएगी और ऐसी शर्तों को पूरा करेगी जो समुचित सरकार द्वारा विहित की जाएं।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "गंभीर रूप से नि:शक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो अस्सी प्रतिशत या अधिक की एक या अधिक नि:शक्तताओं से ग्रस्त है।
प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की धारा 2(कग)
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(कग) "व्युत्पन्न" के अंतर्गत निम्नलिखित हैं,–
(अ) ऐसी प्रतिभूति, जो किसी ऋण-लिखत, शेयर, उधार, चाहे प्रतिभूत हो या अप्रतिभूत, जोखिम-लिखत या अंतर के लिए संविदा से व्युत्पन्न हो या प्रतिभूति का कोर्इ अन्य प्ररूप;
(आ) ऐसी संविदा जो अपना मूल्य अंतर्निहित प्रतिभूतियों की कीमतों या कीमतों के सूचकांक (इन्डेक्स) से व्युत्पन्न करती है।
भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 2(ड़)
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक कि कोर्इ बात विषय या संदर्भ के प्रतिकूल हो,–
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(ड़) ''अनुसूचित बैंक'' से दूसरी अनुसूची में सम्मिलित कोर्इ बैंक अभिप्रेत है;
रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 की धारा 3(1)(छक)
परिभाषाएं
3. (1) इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो–
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(छक) ''शुद्ध मालियत'' से समादत्त पूंजी और खुली आरक्षितियों की कुल राशि अभिप्रेत है;
स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ''खुली आरक्षितियों'' से लाभों और शेयर प्रीमियम लेखा में से उधार दी गर्इ सभी आरक्षितियां अभिप्रेत हैं किंतु इनके अंतर्गत आस्तियों के पुनर्मूल्यांकन में से उधार दी गर्इ आरक्षितियां, अवक्षयण उपबंधों का पुनरांकन और समामेलन नहीं हैं;
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रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 की धारा 17
जांच के पूरा होने पर यथोचित आदेश करने की बोर्ड की शक्तियां
17. (1) यदि धारा 16 के अधीन जांच करने के पश्चात् बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि कोर्इ कंपनी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो गर्इ है तो बोर्ड मामले के सभी सुसंगत तथ्यों और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् लिखित आदेश द्वारा यथाशक्य शीघ्र विनिश्चय करेगा कि क्या कंपनी के लिए उचित समय के भीतर अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना साध्य है।
(2) यदि बोर्ड उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय करता है कि किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के लिए उचित समय के भीतर अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना साध्य है, तो बोर्ड लिखित आदेश द्वारा और ऐसे निबंधनों या शर्तों के अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, कंपनी को उतना समय देगा जितना वह अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करने के लिए ठीक समझे।
(3) यदि बोर्ड उपधारा (1) के अधीन यह विनिश्चय करता है कि किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के लिए उचित समय के भीतर अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना साध्य नहीं है और उक्त कंपनी के संबंध में धारा 18 में विनिर्दिष्ट सभी या कोर्इ उपाय अपनाना लोक हित में आवश्यक या समीचीन है तो वह आदेश में विनिर्दिष्ट किसी प्रचालन अभिकरण को, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी कंपनी के संबंध में ऐसे उपायों के लिए उपबंध करने वाली कोर्इ स्कीम तैयार करने का निदेश दे सकेगा।
(4) बोर्ड–
(क) यदि उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट निबंधनों या शर्तों में से किन्हीं का संबंधित कंपनी द्वारा अनुपालन नहीं किया जाता है या यदि वह कंपनी उक्त आदेश के अनुसरण में पुनरुज्जीवित होने में असफल रहती है तो धारा 15 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण द्वारा उस निमित्त किए गए किसी निर्देश पर या स्वप्रेरणा पर ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और ऐसी कंपनी के संबंध में उपधारा (3) के अधीन नया आदेश पारित कर सकेगा;
(ख) यदि उपधारा (3) के अधीन किए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन अभिकरण उस निमित्त कोर्इ निवेदन करता है तो ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और आदेश को ऐसी रीति से उपांतरित कर सकेगा जो वह उचित समझे।
रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 की धारा 18
स्कीमें तैयार करना और मंजूर करना
18. (1) जहां किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में धारा 17 की उपधारा (3) के अधीन कोर्इ आदेश किया जाता है वहां उस आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन अभिकरण यथासंभव शीघ्र और सामान्यत: ऐसे आदेश की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर ऐसी कंपनी की बाबत एक स्कीम तैयार करेगा जिसमें निम्नलिखित एक या अधिक उपायों के लिए उपबंध किए जाएंगे, अर्थात् :–
(क) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के वित्तीय पुनर्गठन के लिए;
(ख) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के प्रबंध में परिवर्तन करके या उसका प्रबंध ग्रहण करके उस रुग्ण औद्योगिक कंपनी के समुचित प्रबंध के लिए;
(ग) (i) रुग्ण औद्योगिक कंपनी का किसी अन्य कंपनी के साथ, या
(ii) किसी अन्य कंपनी का रुग्ण औद्योगिक कंपनी के साथ,
समामेलन करने के लिए (जिसे इस धारा में इसके पश्चात्, उपखंड (i) की दशा में, अन्य कंपनी को और उपखंड (ii) की दशा में, रुग्ण औद्योगिक कंपनी को ''अंतरिती कंपनी'' कहा गया है);
(घ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के किसी औद्योगिक उपक्रम को पूर्णत: या भागत: बेचने या पट्टे पर देने के लिए;
(घक) प्रबंधकार कार्मिकों, पर्यवेक्षण कर्मचारिवृंद और श्रमकारों का विधि के अनुसार सुव्यवस्थीकरण करने के लिए;
(ड़) ऐसे अन्य निवारक, सुधारात्मक और उपचारी उपायों के लिए जो उपयुक्त हों;
(च) ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक या अनुपूरक उपायों के लिए जो खंड (क) से खंड (ड़) तक में विनिर्दिष्ट उपायों के संबंध में या उनके प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन हों।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट स्कीम में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात् :–
(क) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या अंतरिती कंपनी का गठन, नाम और रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, पूंजी आस्तियां, शक्तियां, अधिकार, हित, प्राधिकार और विशेषाधिकार, कर्तव्य और बाध्यताएं;
(ख) अन्तरिती कंपनी को, रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कारबार, संपत्ति, आस्तियों और दायित्वों का ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाएं, अन्तरण;
(ग) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के निदेशक बोर्ड में कोर्इ परिवर्तन या नए निदेशक बोर्ड की नियुक्ति और वह प्राधिकरण जिसके द्वारा, वह रीति जिससे और ऐसे अन्य निबंधन तथा शर्तें जिन पर, ऐसा परिवर्तन या नियुक्ति की जाएगी और किसी नए निदेशक बोर्ड या किसी निदेशक की नियुक्ति की दशा में वह कालावधि जिसके लिए ऐसी नियुक्ति की जाएगी;
(घ) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या अन्तरिती कंपनी के संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेद में, उसके पूंजी संघटन में परिवर्तन करने के प्रयोजन के लिए या ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए परिवर्तन जो पुनर्गठन या समामेलन को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हों;
(ड़) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या अन्तरिती कंपनी द्वारा या उसके विरुद्ध ऐसी किसी कार्रवार्इ या अन्य विधिक कार्यवाहियों का चालू किया जाना, जो धारा 17 की उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश की तारीख से ठीक पूर्व रुग्ण औद्योगिक कंपनी के विरुद्ध लंबित थीं;
(च) ऐसे हित या अधिकारों में, जो शेयर धारक रुग्ण औद्योगिक कंपनी में रखते हैं, उस परिमाण तक कमी, जिसे निदेशक बोर्ड रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन, पुनरुज्जीवन या पुनरुद्धार के हित में या रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कारबार को बनाए रखने के लिए आवश्यक समझे;
(छ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के शेयर धारकों को, यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या अन्तरिती कंपनी में शेयरों का आबंटन और जहां कोर्इ शेयर धारक नकद संदाय के लिए, न कि शेयरों के आबंटन के लिए दावा करता है, या जहां किसी शेयर धारक को शेयरों का आबंटन करना संभव नहीं है, वहां उन शेयर धारकों को उनके दावों की पूर्ण तुष्टि के लिए :–
(i) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व शेयरों में उनके हित के संबंध में; या
(ii) जहां ऐसे हित को खंड (च) के अधीन कम कर दिया गया है वहां इस प्रकार कम किए शेयरों में उनके हित के संबंध में,
नकद संदाय;
(ज) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के लिए कोर्इ अन्य निबंधन और शर्तें;
(झ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम का, सभी विल्लंगमों और कंपनी के सभी दायित्वों या अन्य ऐसे विल्लंगमों और दायित्वों से रहित, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी व्यक्ति को, जिसके अंतर्गत ऐसे उपक्रम के कर्मचारियों द्वारा विरचित सहकारी सोसाइटी है, विक्रय करना या ऐसे विक्रय के लिए आरक्षित कीमत नियत करना;
(ञ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम का किसी व्यक्ति को, जिसके अंतर्गत ऐसे उपक्रम के कर्मचारियों द्वारा विरचित सहकारी सोसाइटी है, पट्टा देना;
(ट) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम की आस्तियों के विक्रय का ढंग जैसे लोक नीलामी द्वारा या निविदाएं आमंत्रित करके या किसी अन्य रीति से, जो विनिर्दिष्ट की जाए, और उसके लिए प्रचार की रीति के लिए;
(ठ) किसी औद्योगिक कंपनी या किसी व्यक्ति को जिसके अंतर्गत रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कार्यपालक और कर्मचारी भी हैं, रुग्ण औद्योगिक कंपनी में शेयरों का, अंकित मूल्य पर या वास्तविक मूल्य पर जो कि बट्टा मूल्य पर हो सकेगा, या ऐसे अन्य मूल्य पर, जो विनिर्दिष्ट किया जाए, अन्तरण या निर्गमित किया जाना;
(ड) ऐसे आनुषंगिक, परिणामिक और अनुपूरक विषय जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों कि स्कीम में वर्णित पुनर्गठन या समामेलन या अन्य उपाय पूर्ण और प्रभावी रूप से किए गए हैं।
(3) (क) प्रचालन अभिकरण द्वारा तैयार की गर्इ स्कीम की बोर्ड द्वारा परीक्षा की जाएगी और उस स्कीम के प्रारूप की एक प्रति, बोर्ड द्वारा किए गए उपान्तरण के साथ, यदि कोर्इ हो, रुग्ण औद्योगिक कंपनी और प्रचालन अभिकरण को तथा समामेलन की दशा में, संबंधित किसी अन्य कंपनी को भी, भेजी जाएगी और बोर्ड प्रारूप स्कीम को संक्षेप में ऐसे दैनिक समाचारपत्रों में, जिन्हें बोर्ड आवश्यक समझे, ऐसी अवधि के भीतर, जो बोर्ड विनिर्दिष्ट करे, सुझावों और आक्षेपों के लिए, यदि कोर्इ हों, प्रकाशित करेगा या प्रकाशित कराएगा;
(ख) बोर्ड स्कीम के प्रारूप में ऐसे उपान्तरण, यदि कोर्इ हो, कर सकेगा जो वह रुग्ण औद्योगिक कंपनी और प्रचालन अभिकरण से, और अन्तरिती कंपनी से भी और समामेलन से संबंधित किसी अन्य कंपनी से तथा ऐसी कंपनियों के किसी शेयर धारक या अन्य लेनदारों अथवा कर्मचारियों से प्राप्त हुए सुझावों और आक्षेपों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझे :
परन्तु जहां स्कीम समामेलन के संबंध में हो, वहां उक्त स्कीम को रुग्ण औद्योगिक कंपनी से भिन्न कंपनी के समक्ष उसके साधारण अधिवेशन में शेयर धारकों के अनुमोदन के लिए रखा जाएगा और ऐसी किसी स्कीम पर तब तक कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक उसे उपांतरण सहित या उसके बिना अन्तरिती कंपनी शेयर धारकों द्वारा पारित विशेष संकल्प द्वारा अनुमोदित न कर दिया गया हो।
(4) तत्पश्चात् स्कीम यथाशक्य शीघ्र बोर्ड द्वारा मंजूर की जाएगी (जिसे इसमें इसके पश्चात् 'मंजूर की गर्इ स्कीम' कहा गया है) और उस तारीख को प्रवृत्त होगी जो बोर्ड इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे :
परन्तु स्कीम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी।
(5) बोर्ड प्रचालन संबंधी अभिकरण की सिफारिशों पर या अन्यथा मंजूर की गर्इ किसी स्कीम का पुनर्विलोकन कर सकेगा और ऐसे उपांतरण कर सकेगा जो वह उचित समझे या लिखित आदेश द्वारा, आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन संबंधी किसी अभिकरण को, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसे उपायों के लिए जो प्रचालन अभिकरण आवश्यक समझे, उपबंध करने वाली नर्इ स्कीम बनाने का निदेश दे सकेगा।
(6) जब उपधारा (5) के अधीन कोर्इ नर्इ स्कीम तैयार की जाती है तब उस संबंध में उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जैसे उपधारा (1) के अधीन तैयार की गर्इ किसी स्कीम के संबंध में लागू होते हैं।
(6क) जहां मंजूर की गर्इ किसी स्कीम में रुग्ण औद्योगिक कंपनी की किसी संपत्ति या दायित्व को किसी अन्य कंपनी या व्यक्ति के पक्ष में अंतरण करने के लिए उपबंध किया जाता है या जहां ऐसी स्कीम में किसी अन्य कंपनी या व्यक्ति की किसी संपत्ति या दायित्व का रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पक्ष में अंतरण करने के लिए उपबंध किया जाता है, वहां उस स्कीम के आधार पर और उसमें उपबंधित सीमा तक, मंजूर की गर्इ स्कीम या उसके किसी उपबंध के प्रवर्तन में आने की तारीख से ही, ऐसी संपत्ति, यथास्थिति, ऐसी अन्य कंपनी या व्यक्ति या रुग्ण औद्योगिक कंपनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जायेगी और ऐसा दायित्व यथास्थिति, ऐसी अन्य कंपनी या व्यक्ति या रुग्ण औद्योगिक कंपनी का दायित्व हो जाएगा।
(7) उपधारा (4) के अधीन बोर्ड द्वारा दी गर्इ मंजूरी इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि उसमें विनिर्दिष्ट पुनर्गठन या समामेलन या किसी अन्य उपाय से संबंधित इस स्कीम की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन किया गया है और मंजूर की गर्इ स्कीम की ऐसी प्रति जिसे बोर्ड का कोर्इ अधिकारी उसकी सत्य प्रति के रूप में प्रमाणित करे, सभी विधिक कार्यवाहियों में (चाहे अपील में या अन्यथा) साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जाएगी।
(8) मंजूर की गर्इ स्कीम या उसके किसी उपबंध के प्रवर्तन में आने की तारीख से ही, स्कीम या ऐसा उपबंध, यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी और अन्तरिती कंपनी या अन्य कंपनी पर और उक्त कंपनियों के शेयर धारकों, लेनदारों, प्रत्याभूतिदाताओं और कर्मचारियों पर भी आबद्धकर होगा।
(9) यदि मंजूर की गर्इ स्कीम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोर्इ कठिनार्इ उत्पन्न होती है तो बोर्ड प्रचालन अभिकरण की सिफारिश पर या अन्यथा आदेश द्वारा कोर्इ भी ऐसी बात कर सकेगा जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो और जो कठिनार्इ दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो।
(10) यदि बोर्ड ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है तो वह लिखित आदेश द्वारा, आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन किसी अभिकरण को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे निबंधनों और शर्तों सहित और ऐसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, मंजूर की गर्इ किसी स्कीम को कार्यान्वित करे।
(11) जहां रुग्ण औद्योगिक कंपनी के सम्पूर्ण उपक्रम का मंजूर की गर्इ स्कीम के अधीन विक्रय कर दिया जाता है, वहां बोर्ड विक्रय आगम के हकदार पक्षकारों को कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 529क के उपबंधों और अन्य उपबंधों के अनुसार उसका वितरण कर सकेगा।
(12) बोर्ड, मंजूर की गर्इ स्कीम के कार्यान्वयन को कालिकत: मानीटर कर सकेगा।
विशेष आर्थिक जोन अधिनियम, 2005 की धारा 2
परिभाषाएं
2. इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,–
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(छ) "विकासकर्ता" से ऐसा कोर्इ व्यक्ति या राज्य सरकार अभिप्रेत है जिसे या जिसको धारा 3 की उपधारा (10) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदन पत्र अनुदत्त किया गया है और इसके अंतर्गत कोर्इ प्राधिकारी और सह-विकासकर्ता भी है;
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(ञ) "उद्यमकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे धारा 15 की उपधारा (9) के अधीन विकास आयुक्त द्वारा अनुमोदन पत्र अनुदत्त किया गया है;
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(थ) "अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र" से ऐसा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन अनुमोदित किया गया है;
(द) "विनिर्माण" से हाथ से या मशीन द्वारा, किसी नए उत्पाद को, जिसका सुभिन्न नाम, लक्षण या उपयोग हो, बनाना, उत्पादित करना, गढ़ना, संयोजन करना, प्रक्रिया या अस्तित्व में लाना अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत प्रशीतन, कर्तन करना, पालिश करना, मिश्रण करना, मरम्मत करना, पुन: बनाना, पुन: इंजीनियरी है और इसके अंतर्गत कृषि, जल कृषि, पशुपालन, पुष्प कृषि, उद्यान कृषि, मत्स्य पालन, कुकुट पालन, रेशम कीड़ा पालन, द्राक्षा कृषि और खनन भी है;
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(प) "अपतट बैंककारी यूनिट" से विशेष आर्थिक जोन में स्थित बैंक की कोर्इ शाखा अभिप्रेत है और जिसने बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 23 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अनुज्ञा अभिप्राप्त कर ली है;
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(यक) "विशेष आर्थिक जोन" से धारा 3 की उपधारा (4) के परन्तुक और धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित प्रत्येक विशेष आर्थिक जोन (मुक्त व्यापार और भाण्डागार जोन सहित) अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विद्यमान विशेष आर्थिक जोन भी है;
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(यग) "यूनिट" से किसी विशेष आर्थिक जोन में किसी उद्यमकर्ता द्वारा स्थापित कोर्इ यूनिट अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विद्यमान यूनिट, अपतट बैंककारी यूनिट और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र में की कोर्इ यूनिट, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व में स्थापित की गर्इ हो या उसके पश्चात् स्थापित की गर्इ हो;
व्यापार संघ अधिनियम, 1926 की धारा 2
परिभाषाएं
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(ड़) "रजिस्ट्रीकृत व्यापार संघ" से इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यापार संघ अभिप्रेत है ;
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 53क
भागिक पालन
53क. जहां कि कोर्इ व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अन्तरित करने के लिए अपने द्वारा अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेखबद्ध ऐसी संविदा करता है जिससे उस अन्तरण को गठित करने के लिए आवश्यक निबंधन युक्तियुक्त निश्चय के साथ अभिनिश्चित किए जा सकते हैं,
और अन्तरिती ने संविदा के भागिक पालन में उस सम्पत्ति या उसके किसी भाग का कब्जा ले लिया है या अन्तरिती, जिसका कब्जा पहले से ही है, संविदा के भागिक पालन में अपना कब्जा चालू रखता है और उस संविदा को अग्रसर करने के लिए कोर्इ कार्य कर चुका है,
और अंतरिती संविदा के अपने भाग का पालन कर चुका है या पालन करने के लिए रजामन्द है,
वहां इस बात के होते हुए भी कि संविदा, यद्यपि उसका रजिस्ट्रीकरण अपेक्षित है, रजिस्ट्रीकृत नहीं की गर्इ है या जहां कि अन्तरण की कोर्इ लिखत है, वहां पर अन्तरण किसी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा उसके लिए विहित रीति से पूरा नहीं किया गया है, अन्तरक या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाला कोर्इ व्यक्ति अन्तरिती या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध उस सम्पत्ति के विषय में जिसका कब्जा अन्तरिती ने ले लिया है या चालू रखा है कोर्इ भी ऐसा अधिकार जो संविदा के निबंधनों द्वारा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित अधिकार से भिन्न है, प्रवर्तित कराने से विवर्जित होगा:
परन्तु इस धारा की कोर्इ बात ऐसे सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसे उस संविदा या उसके भागिक पालन की कोर्इ सूचना न हो।
[वित्त अधिनियम, 2006 द्वारा संशोधित रूप में]

